Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 101–110
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण अथ पुनः प्रपद्य । चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा सावित्रं प्रसवाय जुहोति सविता वै देवानां प्रसविता सवितृप्रसूताय यज्ञं तनवामहाऽइति तस्मात्सावित्र जुहोति ॥१० ॥
स जुहोति । युञ्जते मन उत युञ्जते धियइति मनसा च वै वाचा च यज्ञं तन्वते स यदाह युञ्जते मनऽइति तन्मनो युनक्त्युत युञ्जते धिय इति तद्वाचं युनक्ति धिया धिया तया मनुष्या जुज्यूषन्त्यनूक्तेनेव प्रकामोद्येनेव गाथाभि-रिव ताभ्यां युक्ताभ्यां यज्ञं तन्वते ॥११ ॥
विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित इति । ये वै ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोनूचा-नास्ते विप्रास्तानेवैतदभ्याह बृहतो विपश्चितऽइति यज्ञो वै बृहन्विपश्चिद्यज्ञमेवै-तदभ्याह विहोत्रा दधे वयुनाविदेक इदिति वि हि होत्रा दधते यज्ञं तन्वाना मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहेति तत्सावित्रं प्रसवाय जुहोति ॥ १२ ॥
प्रथापरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा । उपनिष्क्रामति दक्षिणया द्वारा पत्न t fromra न्ति स दक्षिरणस्य हविर्धानस्य दक्षिणायां वर्तन्यां हिरण्यं निधाय जुहोतीदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे स्वाहेति सं-वं पत्न्यै पारगावानयति साक्षस्य सन्तापमुपानक्ति देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतमिति प्रछति प्रतिप्रस्थात्रे स्रुचं चाज्यविलापनों च पर्यारणयन्ति पत्नीमुभौ जघने-नाग्नी ॥१३ ॥
चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा । प्रतिप्रस्थातोत्तरस्य हविर्धानस्य दक्षिणायां वर्तन्यां हिरण्यं निधाय जुहोतीरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनवे दशस्या । व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहेति संस्रवं पत्यै पारणावानयति साक्षस्य सन्तापमुपानक्ति देवश्रुतौ देवेष्वाघोष-तमिति तद्यदेवं जुहोति ॥ १४ ॥
देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्विभयाञ्चक्रुर्वत्रो वाप्राज्यं तएतेन वज्रेणाज्येन दक्षिणतो नाष्ट्रा रक्षांस्यवाध्नंस्तथैषां नियानं [ ८३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण नान्ववायंस्तथोऽएवैष ऽएतेन वज्रेणाज्येन दक्षिणतो नाष्ट्रा रक्षांस्यवहन्ति तथास्य नियानं नान्ववयन्ति तद्यद्वैष्णवीभ्यामृग्भ्यां जुहोति वैष्णवं हि धनम् ॥१५ ॥ हवि-अथ यत्पत्न्यक्षस्य सन्तापमुपानक्ति । प्रजननमेवैतत्क्रियते यदा वै स्त्रिये
च पुंसश्च सन्तप्यतेऽथ रेतः सिच्यते तत्ततः प्रजायते परागुपानक्ति पराग्ध्येव रेतः सिच्यतेऽथाह हविर्धानाभ्यां प्रवर्त्यमानाभ्यामनुब्रूहीति ॥१६ ॥
अथ वाचयति । प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयंतीऽइत्यध्वरो वै यज्ञः प्राची यज्ञं कल्पयन्तीऽइत्येवैतदाहोर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतमित्यूर्ध्वमिमं प्रेतं लोकं नयतमित्येवैतदाह मा जिह्वरतमिति तदेतस्मायलामाशास्ते समुद्गृह्येव यज्ञं देव-प्रवर्तयेयुर्यथा नोत्सर्जेतामसुर्या वाडएषा वाग्याऽक्षे नेदिहासूर्या वाग्वदादिति यद्युत्सर्जेताम् ॥१७ ॥
एतद्वाचयेत् । स्वङ्गोष्ठमावदतं देवी दुर्येप्रायुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमिति तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः ॥ १८ ॥
तदाहुः । उत्तरवेदेः प्रत्यप्रक्रामेत्त्रीन्विक्रमांस्तद्धविर्धाने स्थापयेत्सा हविर्धानयोर्मात्रेति नात्र मात्राऽस्ति यत्रैव स्वयं मनसा मन्येत न्तिके नो दूरे तत्स्थापयेत् ॥१ ९ ॥ नाहैव सत्राइत्य-अभिमन्त्रयते । अत्र रमेथां वर्ष्मन्पृथिव्याऽइति वर्ष्म भवति दिवि स्याहवनीयो भवति नभ्यस्थे करोति तद्धि क्षेमस्य ह्येतत्पृथिव्यं रूपम् ॥२० ॥
अथोत्तरेण पर्येत्याध्वर्युः । दक्षिणं हविर्धानमुपस्तभ्नाति विष्णोर्नुकं णि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । योऽअस्कभायदुत्तरं वीर्या-मास्त्रेधोरुगाय विष्णवे त्वेति मेथीमुपनिहन्तीतरतस्ततो यदु सधस्थं विचक्र-च मानुषे ॥२१ ॥
अथ प्रतिप्रस्थाता उत्तरं हविर्धानमुपस्तम्नाति दिवो पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना वा विष्णऽउत वा पुरणस्वा प्रयच्छ [ ८४ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मरण दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वेति मेथीमुपनिहन्तीतरतस्ततो यदु च मानुषे तद्य-द्वैष्णवैर्य जुभिरुपचरन्ति वैष्णवं हि हविर्धानम् ॥२२ ॥
श्रथ मध्यमं छदिरुपस्पृश्य वाचयति । प्रतद्विष्णुस्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वे -तीदं हैवास्यैतछीर्षकपालं यदिदमुपरिष्टादधीव ह्येतत्क्षियन्त्यन्यानि शीर्षक-पालानि तस्मादाहाधिक्षियन्तीति ॥२३ ॥
अथ रराट्यामुपस्पृश्य वाचयति । विष्णो रराटमसीति ललाटं हैवास्यै-तदथोछ्राया उपस्पृश्य वाचयति विष्णोः श्नप्त्रे स्थ इति स्रक्वे हैवास्यैतेऽथ यदिदं पश्चाच्छदिर्भवतीदं हैवास्यैतछीर्षकपालं यदिदं पश्चात् ॥ २४ ॥
अथ लस्पूजन्या स्पन्द्यया प्रसीव्यति । विष्णोः स्यूरसोत्यथ ग्रन्थिं करोति विष्णोर्बुवोऽसीति नेद्वयवपद्याताऽइति तं प्रकृते कर्मन्विष्यति तथो हाध्वर्युं वा यजमानं वा ग्राहो न विन्दति तन्निष्ठितमभिमृशति वैष्णवमसीति वैष्णवं हि हविर्धानम् || २५ || [ अनुवाद ] प्राकृतिक ( आधिदैविक ) यज्ञ की प्रकृति पर यजमान की दिव्यात्मा को जाग्रत करने वाला मानुष वैध यज्ञ होता है । अतः प्राकृतिक यज्ञ के विधान को तथा उसके स्वरूप को जानना अत्यावश्यक है ॥ १ ॥
प्रकृत में पृथिवी से सूर्य तक महावेदि का स्वरूप है । पृथिवी क्रान्तिवृत पर ३६५ दिनों में सूर्य की परिक्रमा कर लेती है । किन्तु पिण्डपृथिवी २४ घण्टे में अपनी धुरी की परिक्रमा कर लेती है । इसे ही स्वाक्ष परिभ्रमरण कहते हैं । पृथिवी के स्वाक्षपरिभ्रमण से दिन और रात्रि का स्वरूप बनता है । पिण्ड पृथिवी का जो भाग सूर्य के सम्मुख रहता है वह सौर- रश्मियों के द्वारा प्रकाशयुक्त बन जाता है । उस भाग से पृथिवी का प्रातिस्विक कृष्णरूप नष्ट हो जाता है । पृथिवी का प्रकाशयुक्त आधाभाग प्रकाशमय दिन है । सूर्य से विपरीत दिशा वाला पृथिवीभाग कृष्णवर्णयुक्त होने से अन्धकारमयी रात्रि कहलाता है । पृथिवी का सौरप्रकाशयुक्त ग्रहः प्रारण ही पृथिवी पिण्डरूप हविर्वेदि का आहवनीय है और अन्धकारमय प्राण है वही हविर्वेदि का गार्हपत्य है । स्वयं पृथिवी पिण्ड हविर्वेदि के आहवनीय चन्द्रसो की आहुति होती रहती है । उसी से दर्शपूर्णमास यज्ञ होता है— अमावस्या में दर्शष्टि तथा पूर्णिमा में पौर्णमासेष्टि प्रकृति में निरन्तर होती है । पृथिवी अन्तरिक्ष - युलोक [ ८५ ]
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प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण मूलद्वार से नाभिपर्यन्त वक्षःस्थल के अधोभाग पर्यन्त वक्षःस्थल से ऊपर शिरः पर्यन्त दोनों हाथ दोनों पैर उदरस्थ वैश्वानराग्नि उदरस्थ अन्तरिक्ष्याग्नियाँ उदरस्थ बलप्रद रस मुख जिह्वा शिखा यही अध्यात्म यज्ञरूप - पुरुष का स्वरूप हैं । [ ५६ ] यज्ञपुरुष ब्राह्मण हविर्वेद । सदोमण्डप | हविर्धानमण्डप | आग्नीध्रीय व मार्जालीय अग्नियाँ । हविर्यज्ञ के गार्हपत्य व ग्राहवनीय | दक्षिणाग्नि । धिष्ण्याग्नियाँ । दुम्बरी | उत्तरावेदि आहवनीय । नाभिका | यूप । रूपी तीनों विश्वों के अधिष्ठाता, अग्नि, वायु, श्रादित्य से एक नवीन वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है । इस वैश्वानर का स्थान पृथिवी का दक्षिण भाग है । यह वैश्वानर ही श्रवणीयाग्नि भी कहा जाता है । महावेदि का प्रारम्भ पृथिवी - पृष्ठ से होता है तथा २१ वें अहर्गण में स्थित सूर्यरूपी यूप पर उसकी समाप्ति होती है । पृथिवी केन्द्र से निकल कर प्रारणरूपा अमृता अग्नि २१ वें अहर्गण तक जाती है । यही महावेदि है । इसमें पृथिवीपिण्ड का प्रकाशमय दिन - भाग जो पृथिवीपिण्डरूप हविर्वेदि का आहवनीय था वह महावेदि का गार्हपत्य है | पञ्चदश स्तोम का अर्वाक् याम महावेदि का सदोमण्डप है । पञ्चदशस्तोम से ऊपर हविर्धानमण्डप है । १७ वें अहर्गण पर हवनीय अग्नि है । इसमें ऊपर से आने वाले सोम की प्राहुति होती है । १५ वें अहर्गण पर जो सदोमण्डप है उसमें प्रकार की धिष्ण्याग्नियाँ ( अन्तरिक्ष्याग्नियाँ ) रहती हैं । इन ८ धिष्ण्याग्नियों में ६ अग्नियाँ सदोमण्डप के मध्य में हैं तथा मार्जालीय नामक धिष्ण्याग्नि सदोमण्डप के दक्षिण में और आग्नीध्रीय नामक दक्षिणाग्नि सदोमण्डप के उत्तर भाग में है । दक्षिणाग्नि कुण्ड ही महावेदि की श्रवणाग्नि है जिसमें हव्य पकाया जाता है । १७ वाँ स्थान यज्ञपुरुष का मुख है जिसमें सोम ( अन्न ) की आहुति होती है । सदोमण्डप के दक्षिण में वर्तमान मार्जालीय अग्नि से सोम का परिपाक होता है । हविसोम ( अन्न ) का धिष्ठाता विष्णु है । विष्णु ३३ आग्नेय देवताओं में अन्तिम देवता है । जैसा कि ' अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' यह ब्राह्मण श्रुति बतला रही है । अतः उसको यज्ञ का मस्तक कहा गया है । संक्षेप में अध्यात्मयज्ञ का स्वरूप इस प्रकार है-
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण इस अध्यात्मयज्ञ की अनुकृति पर यजमान के वैध यज्ञ का वितान किया गया है । अतः यह यज्ञ पुरुषाकार है - ' पुरुषो वै यज्ञः ' । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह इस कारण यज्ञ पुरुष है कि इस यज्ञ का वितान पुरुष ने किया है तथा यह पुरुषाकार ही है । इस यज्ञ की महावेदि में जो हविर्धानमण्डप है वह इस यज्ञ का मस्तक है । विष्णु प्राकृतिक यज्ञ के शिरः स्थानीय हैं | यज्ञिय देवताओं में विष्णु का स्थान सर्वान्ति में है । देवताओं का अन्नरूप क्रीत सो हविर्धानमण्डप में ही रक्खा जाता है । सोम रखने के कारण ही उसे हविर्धान कहा जाता है || २ || यज्ञ का सप्तदशस्थानीय ग्राहवनीय ही यज्ञपुरुष का मुख है । लोक में भी पुरुष मुख में ही अन्न की प्राहुति होती है ॥ ३ ॥
महावेद के २१ वें स्थान पर बना हुआ जो यूप है वही इस यज्ञ का स्तूप है । हविर्धान दोनों ओर विद्यमान श्राग्नीघ्रीय व मार्जालीय दोनों दक्षिणाग्नियां यज्ञपुरुष के दोनों हाथ हैं । सदोमण्डप ही इस यज्ञपुरुष का उदर है । उदररूप सदोमण्डप में ही सारे देवता रहते हैं तथा सोमभक्षण करते हैं, क्योंकि उदर में जठराग्नि रहती है । यद्यपि सोम की हुति मुखरूप ग्राहवनीय में होती है तथापि उसके द्वारा तृप्ति मुख की न हो कर उदरस्थ देवताओं की होती है । क्योंकि अध्यात्मयज्ञ में सारे आग्नेय देवता उदर में ही भोजन ग्रहरण करते हैं उसी प्रकार मनुष्ययज्ञ में भी ऋत्विक्रूप मनुष्यदेवता तथा यज्ञ में आगत नाना गोत्रीय ब्राह्मण भी सदोमण्डप में ही भोजन करते हैं ॥ ५ ॥
हविर्वेदि की गार्हपत्य व आहवनीयाग्नियां ही यज्ञपुरुष के दोनों पैर हैं । पुरुषाकार होने से ही यज्ञ को पुरुष कहा जाता है ॥ ६ ॥
हविर्धानमण्डप तथा सदोमण्डप में दो - दो द्वार होने चाहिएँ - एक ओर पश्चिम में मूल द्वार तथा दूसरी ओर पूर्व में हृदयद्वार । यज्ञपुरुष भी मस्तक से मूलाधारपर्यन्त छिद्र वाला है । इसी अभिप्राय से कहा है ' तस्मादयं पुरुषान्तं सन्तृरण: ' इति । हविर्धानमण्डप में दो शकट रखे जाते हैं । उन्हें रखने से पूर्व धो कर साफ कर लेना चाहिए जिससे कि थोड़ा सा भी सुर भाव न रहे । इसी भाव से कहा है: - ' प्ररिक्ते हविर्धानेऽउपतिष्ठते ' इति || ७ || उन दोनों हविर्धानशकटों को नियत स्थान पर हविर्धानमण्डप की ओर ठीक प्रकार से पहुँचा देते हैं । पुरुष की छाती का दक्षिणभाग दक्षिणशकटस्थानापन्न है, वामभाग उत्तर-शकटस्थानापन्न । वामभाग की अपेक्षा दक्षिण भाग एक बाल जितना बड़ा होता है । अपिच पुरुष का दाहिना भाग सोम से बना हुआ है । सोम में अधिक स्नेह होता है । ग्रतएव वाम-भाग की अपेक्षा पुरुष का दक्षिणभाग अधिक बलवान् होता है । सभी प्राणियों में यही I ८७ 1
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण स्थिति है | अतः दक्षिणभाग - स्थानीय शकट कुछ बड़ा बनाना चाहिए -- ' यद्वर्षी यस्तदक्षिणं स्यात् ' इति || ८ || इस प्रकार हविर्धानमण्डप में दोनों हविर्धानशकटों के रख दिये जाने पर उन पर दोनों तरफ चटाई रख देनी चाहिए । जिससे खराब वस्तु तथा नाशक जीव - जन्तु उनमें न घुस सकें । यदि चटाई न हो तो उन पर भित्ति ही डाल देनी चाहिए । दीर्घ बाँस ला कर उनको मध्य में चीर कर उनको कूट लिया जाता है । कुटे हुए बाँसों के बराबर - बराबर जोड़े कर उसके दोनों भागों में और मध्य में फरचट लगा कर जो एक टाटी बनाई जाती है उसे ही भित्ति कहते हैं । यह चटाई या भित्ति शकट के मुख भाग पर, मध्य में और शकट के पीछे की ओर तीन जगह डाली जाती है ॥ ॥ अध्वर्यु आज्याभिचार के लिए उत्तरावेदिस्थ ग्राहवनीय के पास था । अब वह चार बार घृत लेकर आहवनीय से पुनः हविर्धान में आकर सविता देवता की प्रेरणा या ( अनुज्ञा ) प्राप्त करने के लिए सावित्रहोम करता है । सोम को यज्ञ में सम्मिलित करता है । उसके लिए सविता का प्रसव ( अनुज्ञा ) प्राप्त करना आवश्यक है । ' सविता वै देवानां प्रसविता ' इस ब्राह्मण श्रुति के अनुसार वही यज्ञ में होने वाले कर्मों के लिए अनुज्ञा प्रदान करने वाला है । इसीलिए सावित्र होम किया जाता है तथा सविता के लिए आाज्याहुति दी जाती है || १० ॥
वह अध्वर्यु — ' युञ्जते मनऽउत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।
विहोत्रा दधे वयुनाविदेक s इत् मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा ' ॥
इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आहुति देता है । अर्थात् मेधावी अध्वर्यु प्रमुख ऋत्विक् तथा वषट्कार करने वाले होत्रा भी सविता से अनुज्ञा प्राप्त कर के ही मन और वाणी को यज्ञ में लगाते हैं । सविता ही संसार के यावन्मात्र वयुनों का ज्ञाता है । ऐसे सविता देवता के लिए स्वाहा है । मन्त्र में ' युञ्जते मनः ' का अर्थ मन को तथा ' युञ्जते धियः ' का अर्थ वाणी को यज्ञ में लगाना है । केवल बुद्धि, जीवन - यात्रा का साधन नहीं अपितु बुद्धिपूर्वक वाक् ही जीवन-यात्रारूप व्यवहार का साधन है । संसार - व्यवहार की साधक यह वाक् तीन प्रकार की होती है । कुछ वाक् प्रवचन अर्थात् अध्यापन से व्यवहार में लाई जाती है; यह असाधारण वाक् है, क्योंकि अध्यापन करना साधारण कार्य नहीं है । दूसरी प्रकार की वाक् प्रकामवादरूप है
जो कि लौकिक व्यवहार की वाक् है । तीसरी वाग् गाथा रूप है, जिसका वक्ता अज्ञात है ।
मनोयोग व वाग्योग से ही यज्ञ का वितान ऋत्विक् लोग करते हैं ॥ ११ ॥
' विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित: ' इस मन्त्रांश की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञ-वल्क्य कहते हैं कि इस मन्त्रांश में ' विप्राः ' पद अनुवचन करने वाले विद्वान् ब्राह्मणों का द्योतक है जो कि ऋत्विक् हैं । इसी प्रकार ' बृहतो विपश्चितः ' यह वाक्यांश यज्ञ का सूचक [ 55 ] 1
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण है, जैसा कि ' यज्ञो बृहत्वपश्चित् ' इस उक्ति से स्पष्ट हो रहा है । क्यों कि सोमयज्ञ बहुत बड़ा है, सारा विश्व इसके अन्तर्गत आ जाता है । ' वि होत्रादधे वयुना विदेक इति ' इस मन्त्रांश की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञकर्ता भी यज्ञ में युक्त हो रहे हैं । सविता की यह स्तुति अर्थात् प्रशंसा महती है । इस प्रकार इस मन्त्र से अध्वर्यु सविता की अनुज्ञा के लिए सावित्र अर्थात् सविता देवताक आाज्य की आहुति दे देता है ॥१२ ॥
वर्धा की स्थापना हेतु सविता देवता की अनुज्ञा प्राप्त कर तथा सविता होम कर ध्वर्यु चार बार घृत ले कर प्राचीन वंश से पुनः हविर्धान के पास आता है । इसके बाद प्रति-प्रस्थाता प्रादि अन्य ऋत्विक् हविर्वेदि की दक्षिण - पश्चिम श्रेणी में रहने वाली यजमान पत्नी को दक्षिण मार्ग से ला कर वहाँ उपस्थित करते हैं जहाँ पर कि अध्वर्यु आज्याहुति देगा | तदनन्तर वह अध्वर्यु पृष्ठ्या सूत्र ( मध्यमशकु से पूर्वार्ध्य शंकु तक खिची रेखा ) से दक्षिण भाग में रखा हुआ जो हविर्धान शकट है उसके दाहिने पहिए की रेखा में ( वर्तनी में ) सोने की टिकिया रख कर चतुर्गृहीत प्राज्य की आहुति दे देता है । आहुति देता हुआ निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है-' इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे स्वाहा ' इति । इस विश्व को त्रिविक्रमावतारधारी विष्णु ने विक्रान्त किया । उसने पृथिवी, अन्त-रिक्षक द्युलोक में तीन प्रकार से पद रक्खा । इस विष्णु के रजोयुक्त पद में तीनों लोक संलग्न हैं । अर्थात् पृथिवी से सूर्य तक जो महाविशाल विश्व दिखलाई देता है जिसे कि रोदसी त्रिलोकी कहते हैं उसको विष्णु ने तीन पदों से नाप लिया । यज्ञमूर्ति विष्णु की जो पद धूलि है उसमें तीन अवस्थाओं के रूप में पृथिवी - पृष्ठ से २१ वें ग्रहरण तक त्रिलोकी वितत हैं । इस front को विष्णु ने व्याप्त कर रखा है । आहुति देने पर जुहू में कुछ घृत बच जाता है उसे संस्रव कहते हैं । अध्वर्यु उस संस्रव को पत्नी के हाथ में दे देता है जो ' देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम् ' इस मन्त्र को बोलती हुई हवि -न शकट के दोनों पक्षों ( धुरों ) का जो सन्तापस्थान है, उसे घर्षण से उत्पन्न ताप की शान्ति के लिए घृत से आँज देती है । मन्त्र का अर्थ है कि देवताओं को सुनाने वाले धुरी के प्राधार प्रदेशों! आप देवताओं में इस शब्द को सुना दीजिए, कि ऋत्विक् यजमान आदि ठीक प्रकार से यजन कर रहे हैं । इस प्रकार दक्षिण हविर्धान शकट की वर्तनी ( रेखा ) और धुरों की भाँति ही उत्तर हविर्धान शकट की वर्तनी और धुरे पर भी घृत डाला जाता है । किन्तु दक्षिण हविर्धान शकट में अध्वर्यु घृत डालता है तथा उत्तर हविर्धान शकट की वर्तनी अध्वर्यु पर प्रतिप्रस्थाता डालता है । दक्षिण हविर्धान शकट विषयक कार्य समाप्त हो जाने पर आहवनीय जुहू, उपभृत तथा प्राज्यविलापनी को प्रतिप्रस्थाता को सौंप देता है । हविर्वेदि के शकट के रूप गार्हपत्याग्नि से पश्चिम में हो कर ऋत्विक महावेदि के अन्तर्गत उत्तर हविर्धान पास यजमान - पत्नी को ले जाते हैं ॥ १३ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणे यज्ञपुरुष ब्राह्मण प्रतिप्रस्थाता यजमान - पत्नी सहित पृष्ठ्या सूत्र के उत्तर में हविर्धान के पास जा कर चार बार आज्य ले कर उत्तर हविर्धान शकट के दाहिने पहिए की रेखा में सुवर्ण की MM रखकर -" इरावती धेनुमती हि भूतं सूय वसिनी मनवे दशस्या । व्यस्कना रोदसी विष्णवे ते दाघर्थं पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा " इति । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ चतुर्गृहीत आज्य की आहुति दे देता है । मन्त्र का अर्थ है: - हे द्यावापृथिवी! आप दोनों, यजमान के लिए अन्नवाली, बहुधेनुयुक्त बनें तथा शोभनं तृणयुक्त व अभिमत फल देने वाली हों । हे विष्णु! आपने त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश-रूप अनेक प्रकार से रोदसी द्यावा - पृथिवी को स्कम्भित किया है तथा यज्ञसूत्रों से पृथिवी को सब ओर से धारण किया है । इसके बाद ऋत्विक् जुहू में बचे हुए घृत को पत्नी के हाथ में देता है जो उसे ' देव देवेष्वाघोषतम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करती हुई शकट के धुरों के सन्तापस्थान में डाल देती है । देवता असुरों व राक्षसों के आक्रमण से डरने लगे कि असुर हम पर आक्रमण कर कहीं हमारे यज्ञ को नष्ट न कर दें । अतः देवताओं ने इस आज्य रूप वज्र के दक्षिण भाग से यज्ञविनाशक असुर राक्षसों को मार कर भगा दिया । इस प्राज्याहुति के तीव्र ताप से असुर-राक्षसों ने देवतानों के मार्ग को नहीं पहचाना । प्रकृतियाग में २१ वें अहर्गण तक विततः अग्नि में उत्तर से आने वाले सोम की आहुति के कारण अग्नि अति प्रज्वलित रहती है अतः उसमें श्राप्यप्राणप्रधान असुरों का प्रवेश नहीं हो सकता । इसी प्रकार भौम - स्वर्गवासी देव-ताों पर दक्षिण अफ्रीका से असुर ा कर आक्रमण किया करते थे । देवताओं ने प्राकृतिक यज्ञ के आधार पर यज्ञविद्या का प्राविष्कार किया और अग्नि में आज्याहुति डाल कर अपना आत्मबल बढ़ा कर असुरों को परास्त किया । उसी प्रकार आज यह मनुष्य यजमान भी इस आज्य वज्र से दक्षिण से आक्रमण करने वाले राक्षसों या शत्रुनों को परास्त कर देता है | भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यह हविर्धानमण्डप विष्णुदेवताक है । हविर्धान-मण्डप में सोम रखा जाता है और सोम विष्णुदेवताक है तथा हविर्धान यज्ञ का मस्तक है । हविर्धान विष्णुदेवताक है, वैष्णव है । इसीलिए इस हविर्धान की रेखा पर प्राहुति देते समय वैष्णवी ऋक् का बोलना ही उचित है ॥१५ ॥
भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अक्ष के सन्ताप प्रदेश पर घृत डालना प्रजनन करना ही है । जब स्त्री - पुरुष दोनों सङ्गम करते हैं उस समय घर्षण होता है । घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है और उससे पुरुष का वीर्य स्त्रीयोनि में सिक्त हो जाता है । बिना रेतः सेक के गर्भा -धान नहीं होता । इस प्रकार हविर्धान शकट के पहिये के अक्ष के सन्ताप- प्रदेश में घृत डालना [ 80 ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मरण यज्ञपुरुष ब्राह्मण प्रजननार्थ रेतः सेक करना है । प्रकृत में प्रक्ष पुरुष - स्थानापन्न तथा शकट का पहिया स्त्री-स्थानापन्न है । उन दोनों के घर्षण से अग्नि उत्पन्न होता है अतः अक्ष के सन्ताप- प्रदेश में श्राज्य डालना है वह रेतः सेक ( वीर्यसिंचन ) है । यह श्रहुत रेत ( सिक्त वीर्य ) वायु में जा कर सोमयाग से उत्पन्न होने वाले दिव्यात्मा की उत्पत्ति में सहायक होता है । पुरुष द्वारा रेतः सेक ऊपर से होता है अतः यह घृत ऊपर से पृथक् रूप से अक्ष के सन्तापस्थान में डाला जाता है - ' परागुपानक्ति, पराग्ध्येव रेतः सिच्यते ' । इसके बाद अध्वर्यु होता को हविर्धान शकटों के आवर्तन के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलने के लिए प्रैष करता है ॥१६ ॥
हविर्धन शकटों को लाते समय अध्वर्यु. होता से यह बुलवाता है - ' प्राची प्रेतमध्वरं-कल्पयन्तीऽऊर्ध्वयज्ञं नयतम्मा जिह्वरतम् ' इति । हे हविर्धान शकटो! पूर्व दिशा में जाते हुए सोमयाग को फलप्रद बनाने में आप ही समर्थ हैं । अध्वर शब्द का अर्थ यज्ञ है । यज्ञ अग्निमय है | अध्वर शब्द कौटिल्यार्थक ' ध्वृ ' धातु से निष्पन्न है । ध्वरतीति ध्वरः, न ध्वर: अध्वरः! अर्थात् जो सीधा सूर्य में जाता है कुटिलगति वाला नहीं होता । पूर्व की ओर, सूर्य की ओर जाते हुए इस यज्ञ को फलयुक्त बनाने वाले आप इस यज्ञ को ऊर्ध्व अर्थात् स्वर्ग लोक में ले जाएँ । ' जिह्वरतम् ' कौटिल्यार्थक व धातु से निष्पन्न है । अतः ' मा जिह्वरतम् ' का अर्थ कुटिल अर्थात् टेढ़े न हों, अन्यथा टेढे होने पर शकट के गिर जाने से यजमानात्मा स्वर्ग से च्युत हो जाएगा । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि शकटों को हविर्धान- मण्डप में रखते समय सावधानी से उठा कर धीरे से रखना चाहिए जिससे शकट की रगड़ से शब्द न हो क्यों कि शकट के घर्षण का शब्द असुर्यावाक् है । जो श्रवण- कटु शब्द होता है वह असुर्यावाक् कहलाती है । यज्ञ में असुर्या वाक् निषिद्ध है । अन्यथा असुरों के प्रवेश से यज्ञ ध्वंस हो जाएगा || १७ || यदि हविर्धान शकट को उठा कर हविर्धानमण्डप में रखते समय प्रमादवश शब्द हो जाए तो प्रायश्चित्त के रूप में निम्नलिखित मन्त्र का वाचन कराए-' स्वङ्गोष्ठमावदतं देवी दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टम् । प्रजां मा निर्वादिष्टम् ' । १ हे देवि हविर्धा! तथा हे घरों में साधुरूप देवि! आप दोनों, यजमान के पशु समृद्ध हों, ऐसी वाणी का उच्चारण कराएँ । एवं हमारी श्रायु की रक्षा और पुत्रादिरूप प्रजा की रक्षा कराने वाली वाणी का उच्चारण कराएँ । यह उस प्रमादवश उच्चरित होने वाली असुर्या वाक् की प्रायश्विति है ॥ १८ ॥
कतिपय याज्ञिकों का कथन है कि उत्तरावेदि से पश्चिम की ओर तीन विक्रम अर्थात् ६ पाँवड़े रख कर वहाँ हविर्धान शकटों को स्थापित करना चाहिए । परन्तु याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हविर्धान शकटों को रखने का मात्रा नियम नहीं है कि उन्हें उत्तरावेदि से ३ विक्रम १ साया ने ' निर्वाधिष्टम् ' पाठ माना है । [? ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मणा पश्चिम ही रखे । जहाँ अपने मन से ठीक समझें वहीं उन्हें स्थापित कर दे 1 । अर्थात् न उत्तरा-वेदि से अधिक दूर और न प्रति समीप रखें ॥१६ ॥
इस प्रकार उत्तरावेदि से पश्चिम तथा पृष्ठ्यासूत्र से उत्तर व दक्षिण की ओर दोनों हविर्धानि शकटों को स्थापित कर निम्नलिखित मन्त्र से उनका अभिमन्त्रण ( स्तुति ) करता है-' अत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्या: ' अर्थात् इस प्रदेश पर पृथिवी के शरीर पर ये हविर्धान शकट रमण करें । यह हविर्धानमण्डप पृथिवी का शरीर है । द्युलोक में इसका आहवनीय है । अर्थात् उत्तरांवेदि द्युलोक - स्थानीय हैं तथा हविर्धानमण्डप पृथिवी - स्थानीय है । हविर्धान-को पृथिवी का शरीर मानना उचित है, क्यों कि द्युलोक से नीचे ही पृथिवी है । दोनों हविर्धान शकट पृष्ठ्या सूत्र के उत्तर एवं दक्षिण में रखने चाहिएँ । केन्द्र में
रखने से गिरने का भय नहीं रहता । केन्द्र में रखना कल्याण का स्वरूप है ॥ २० ।
तदनन्तर अध्वर्यु दक्षिण हविर्धान के उत्तर की ओर आ कर दक्षिण हविर्धन शकट के नीचे पृष्ठभाग की ओर शकट को स्थिर रखने के लिए लकड़ी लगा देता है जिसे कि उप-स्तम्भनी कहते हैं । उस समय निम्नलिखित मन्त्र बोलता है— " विष्णोर्नकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो प्रस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा " ॥ इति अर्थात् पृथिवी सम्बन्धी सौम्य त्रिलोकी को तीन विक्रमों से नापते हुए द्युलोक को ऊपर स्तम्भित कर देने वाले बहु - स्तूयमान विष्णु द्युलोक और पृथिवी लोक के बीच में मेथी ( काष्ठ या स्तम्भ ) स्वरूप खड़े हैं । इसीलिए पृथिवीलोक और द्युलोक स्थिर रूप से स्थित हैं । इस प्रकार ' विष्णवे त्वा ' बोलता हुआ ग्रध्वर्यु हविर्धान शकट के नीचे मेथी अर्थात् खूंदा लगा देता है । ' विष्णवे त्वा ' की व्याख्या करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हे मेथी अर्थात् स्तम्भ! मैं तुम्हें विष्णु अर्थात् यज्ञ के लिए गाड़ता हूँ । किन्तु इतना अन्तर है कि मानुष शकट में जिस ओर मेथी लगाई जाती है, उससे विपरीत हविर्धान शकट में लगाई जाती है क्योंकि हविर्धान शकट में मेथी लगाना दिव्य कर्म है । दिव्यकर्म मानुषकर्म से विपरीत होता है । इसी अभिप्राय से कहा है ' इतरतस्ततो यदु च मानुषे ' इति ॥ २१ ॥
इसके बाद प्रतिप्रस्थाता निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ उत्तर हविर्धान शंकट के नीचे मेथी लगाता है -" दिवो वा विष्णऽउत वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृरणस्वा प्रयच्छदक्षिणादोत सन्याद्विष्णवे त्वा " ॥ इति [ २ ]