Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 111–120
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण वो! पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक इन तीनों लोकों में से सम्पत्ति को अपनी मुट्ठी में भर कर दोनों हाथों से उसे यजमान को प्रदान कीजिए । यह मेथी भी मानुष शकट से विपरीत ही गाड़ी जाती है । इस मेथिस्थान में विष्णु देवता का मन्त्र बोलने का कारण यही है कि इस हविर्धान में सोम रखा है और सोम विष्णु देवता से सम्बन्ध रखने वाले हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' यद् वैष्णवैर्यजुभिरुपचरन्ति वैष्णवै हि हविर्धानम् ' इति ॥२२ ॥
हविर्धान में तीन चटाइयाँ लगाई जाती हैं- एक पृष्ठ भाग में, एक मध्य में तथा एक रराटी में । इन तीनों में से जो बीच की छदि ( चटाई ) है उसका स्पर्श करके अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है-' प्रतद्विष्णुस्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥ इति ॥ अर्थात् विष्णु का इतना प्रबल पराक्रम है जिससे हम को परबस हो कर उनकी स्तुति करनी पड़ती है । जिस प्रकार सिंह पराक्रम सब वन्य पशुओं का दमन करता हुआ गिरि-कन्दरानों में घूमा करता है उसी प्रकार यह विष्णु रोदसी त्रिलोकी के तमः प्रधान असुरों का दमन करता हुआ घूमा करता है । इस विष्णु के प्रतिविस्तृत त्रिवृत्, पञ्चदश तथा एक-विंश ये तीन विक्रम हैं । इन में तीनों लोक समा रहे है । हविर्धान विष्णु का मस्तक है । इस मस्तक के मध्य की जो चटाई है वही इसका कपाल है । इस प्रकार कुल आठ कपाल होते हैं । इनके मध्य में भेजा होता है जिसे पुरोडाश कहते हैं । उत्तरावेदि के पश्चिम की ओर तीन विक्रम करने पर उपरिशीर्षकपालस्थानीय जो मध्यम छदि है उस पर बैठे हुए विष्णु ने पृथिवी व द्युलोक दोनों को स्तब्ध कर रखा है । अर्थात् मध्यमछदि रूप जो मध्यम कपाल है उस पर अन्य सातों शीर्ष कपाल प्राश्रित हैं । २३ । इसके बाद रराटी ( शकटाग्र भाग ) का स्पर्श कर ' विष्णो रराटमसि ' इस मन्त्र को बुलवाता है । शकटाग्रभाग विष्णु का ललाट है । शकट को समतल बनाने के लिए उसके अग्रभाग ' दो लम्बी लकड़ियाँ ' कस्तम्भी ' और ' उच्छ्रामी ' लगी रहती हैं । उनका स्पर्श करके कहा जाता हैं— ' विष्णोः श्नप्त्रे स्थः ' अर्थात् प्राप विष्णु के स्रक्व ( गलफाड़ ) दोनों ओर के प्रान्तभाग हैं । इस शकट के पश्चिम भाग की छदि इस यज्ञ - मस्तक का पश्चिम कपाल है ॥२४ ॥
इसके बाद हविर्धानमण्डप की द्वारशाखा है । उसके बहि लपेटकर ' विष्णोः स्यूरसि ' मन्त्र को बोलता हुआ, उसे गिरने से बचाने के लिए सूतली पिरोए सूए से सीने के बाद ' विष्णो वोऽसि ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसमें गांठ लगा देता है, जिसे यज्ञकर्म समाप्त [ ६३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मणे होने पर खोल देता है । यज्ञ समाप्त होने पर यदि ग्रन्थि खोली न जाएगी तो वह गांठ यज-मानव अध्वर्यु को पकड़ लेगी अर्थात् उन्हें गठियावात हो जाएगा । गांठ लगाने के बाद उस स्यूत ( सीए हुए ) स्थान का, ' वैष्णवमसि ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए, स्पर्श करता है । हविर्धान विष्णुदेवताक होने के कारण सारी ऋचाएँ विष्णुदेव-ताक ही बोली जाती हैं ॥ २५ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] महावेदि और उत्तरावेदि का निर्माण हो चुका । अब हविर्धान- मण्डप का निर्माण किया जाता है । यज्ञ - विद्या प्राकृतिक यज्ञ पर निर्भर है - यह बात हम कई बार बतला चुके हैं । प्रकृति - मण्डल में जो यज्ञ - संस्था है ठीक उसी की अनुकृति पर हमारे मानुष यज्ञ का वितान होता है । पहले उसी प्राकृतिक यज्ञ संस्था का स्वरूप जान लेना श्रावश्यक है । पृथिवी से सूर्य्यं तक महावेदि बत्ती हुई है । सूर्य्य इस महावेदि का अन्तःस्थान है - इसे ही यूप कहा जाता है । इसमें पृथिवी पृष्ठ से महावेद प्रारम्भ होती है और पृथिवी ( ऐ. ब्रा. हविर्धाने प्रमाणम् - प्रथम काण्डम् ) हविवेदि है । पृथिवी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती रहती है । पृथिवी परिक्रमा लगाती हुई साक्ष परिभ्रमण भी किया करती है । संवत्सर परिभ्रमण ३६५ दिन में होता है और स्वाक्ष परिभ्रमण २४ घण्टे में हो जाता है । स्वाक्ष परिभ्रमण से ही ' अहोरात्र ' का जन्म होता है । स्वाक्ष परिभ्रमण के कारण पृथिवी का आधा भाग सूर्य के सम्मुख रहता है- आधा पृष्ठ में रहता है । यह विभाग नियत नहीं है । प्रतिक्षण होने वाले परिवर्त्तन के कारण पृथिवी का बिन्दु - बिन्दु प्रकाश और अन्धकार में जाता रहता है । इतना होने पर भी यह अवश्य ही मानना पड़ेगा कि पृथिवी के प्राधे भाग में सदा प्रकाश रहता है - आधे में अन्धकार रहता | सूर्य्यं सामुख्य जो पार्थिव दैनिक प्राण है - उसे ही हम आहवनीय अग्नि कहेंगे एवं सूर्य के विरुद्ध भाग में जो पार्थिव नैशिक प्ररणा हैं उसे हम गार्हपत्य कहेंगे । पृथिवी प्रातिस्विक रूपेण कृष्णा है । इसका अपना स्वरूप रात्रि में ही उल्वरण रहता है । अतएव नैशिक श्रग्नि को हम गार्हपत्य कहने के लिए तैय्यार हैं । ' गृहा वै गार्हपत्याः ' से घर को ही गार्हपत्य माना जाता है । पृथिवी का अपना अग्नि रात्रि में ही उत्वरण रहता है अतएव हम अवश्य ही नैशिक पार्थिव श्राग्नेय प्राण को ' गार्हपत्य ' कहने के लिए तैय्यार हैं एवं जो दिन का प्रग्नि है वह सौराग्नि युक्त है - सौराग्नि को ही दिव्याग्नि कहते हैं अतएव पार्थिव दैनिक प्राणाग्नि को ' दिव्याग्नि ' कहने के लिए तैय्यार हैं । इस पार्थिव अग्नि में चान्द्र-सोम श्राहुत होता रहता है । शुक्ल - कृष्ण पक्ष के हिसाब से इस ग्राहवनीय अग्नि में चान्द्रसोम की आहुति से दर्शपूर्णमास यज्ञ होता रहता । अमा को दर्शष्टि होती रहती है- पूर्णिमा को पौर्णमासेष्टि होती रहती है । इस प्रकार प्रकृतिमण्डल में दर्शपूर्णमास अनवरत हुआ करता है । इस श्राहवनीय दिव्याग्नि के और नैशिक गार्हपत्याग्नि के बीच में जो पृथिवी पिण्ड है वही हविर्वेदी है एवं पृथिवी -अन्तरिक्ष द्यौ इन तीनों विश्वों के जो अग्नि वायु आदित्य तीन नर हैं अर्थात् अधिष्ठाता हैं - उनसे एक नया अग्नि और उत्पन्न होता है । इसी का नाम ' वैश्वानर अग्नि ' है । इस वैश्वानर का स्थान पृथिवी का दक्षिण भाग है । बस, औषधि अन्नादि का परिपाक करना इसी दक्षिणाग्नि का काम है । हविर्यज्ञ में यही वैश्वानर दक्षिणाग्नि है । इस प्रकार ग्राहवनीय - गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि युक्त- पृथिवी रूपा जो विवेदि है उस पर अनवरत हविर्यज्ञ हुआ करता है । इसी की नकल पर भारतीय वैज्ञानिक महर्षियों [ ६४ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण ने यज्ञ का - हविर्यज्ञ का वितान किया है । प्रत्येक पिण्ड अग्निसोमात्मक है । अग्नि विष्णु - स्वरूप है-सोम के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । विष्णु अन्नाहरण करके शरीराग्नि की मात्रा बढ़ाते रहते है एवं इन्द्र प्रगत सोम को - अन्न को - बाहर फेंका करते हैं । बस, इस इन्द्र और विष्णु की स्पर्द्धा से वह अग्नि - सोम बड़ी दूर तक वितत हो जाते हैं । जहाँ तक श्रग्नि - सोम व्याप्त रहते हैं वहां तक के मण्डल को ' साहस्र ' कहा करते हैं । पृथिवी के केन्द्र में मन - प्राण - वाङ्मय प्रजापति रहता है । इसी मन - प्राण - वाकू का ३३ तक विज्ञान होता है । चूँकि वाक् स्थूल है अतएव इस मण्डल को ' वषट्कार ' कह दिया जाता है । इस वषट्कार - मण्डल में अग्नि- सोमं स्वरूप वाक्साहस्री, वेदसाहस्री लोकसाहस्री ये तीन साहस्री रहती हैं । इसका एकमात्र कारण इन्द्र - विष्णु की स्पर्द्धा है । जैसा कि श्रुति कहती है-" उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः । : इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम् " ॥ ( ऋग्वेद मं ० ६६८ ) तीन साहस्री कौन - कौन सी हैं यह प्रश्न कर ब्राह्मणश्रुति इसका उत्तर देती हुई कहती है-तत् सहस्रमिति इमे लोकाः, इमे वेदा: ' इस साहस्र मण्डल में हजार गौ रहती हैं । इन हजार गौनों में से ३० - ३० गौ का एक - एक अहर्गण होता है । इस प्रकार ११० गौ में ३३ अहर्गण हो जाते हैं । बाकी बचते हैं १० गौ । यही ३४ वां प्रजापति कहलाता है । यज्ञ - स्तोम भेदेन देवता दो प्रकार के होते हैं । उन दो में से- यही स्तोम देवता है । जिस पृथिवी को हमने हविर्वेदि बतलाया था उसमें ग्रहः ३३ विभाग हैं । ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' के अनुसार पृथिवी को भी अग्नीषोमात्मक मानना पड़ता है । इस अग्नि - सोम का जो मण्डल है उसी का नाम वषट्कार मण्डल है । इसमें भी ३३ ग्रह होते हैं । इसमें अधि तक अर्थात् १७ तक अग्नि रहता है - ३३ तक सोम रहता है । पृथिवी अग्नि का पिण्ड है । अनि विशकलनधर्मा है, फाड़ने वाला है । इसके विशकलन से पृथिवी को बचाने के लिए उसी सत्य प्रजापति ने स्वयंभू प्रजापति ने - वायु अवतार धारण कर इसे चारों ओर गिरफ्तार कर रखा है अर्थात् पृथिवी पिण्ड के चारों ओर १२ योजन तक वायु - स्तर रहता है । इसी का नाम वराह भगवान् है । पाँचों पिण्डों के वराहों का नाम पृथक् - पृथक् है । स्वयंभू, परमेष्ठि, सूर्य्य, चन्द्रमा और पृथिवी ये पाँच पिण्ड हैं । विष्णु अग्निमय होता है । उसकी स्थिति बिना वायु के स्तर के नहीं बन सकती अंतएव पाँचों पिण्डों के चारों ओर वायु स्तर मानना पड़ता है । इसमें जो स्वयंभू का वायु - स्तर है उसका नाम ' आदिवराह ' है । पारमेष्ठ्य वायु - स्तर का नाम ' यज्ञवाराह ' है । पारमेष्ठ्य प्रापोमय है । यज्ञ अर्थात् मैथुनी सृष्टि इस पानी से ही प्रारम्भ होती है अतएव इसे ' यज्ञ वाराह ' कहते हैं । सूर्य पिण्ड के वायु स्तर का नाम ' श्वेतवाराह ' है । सूर्य ज्योतिर्मय है अतएव इसे ' श्वेतवाराह ' कहा जाता है । हमारा सम्बन्ध इसी सूर्य्यं से है । सूर्य्यं ही पृथिवी की प्रतिष्ठा है अतएव यच्चयावत् धार्मिक काव्यों में ' श्वेत-वाराह कल्पे ' यहीं कहा जाता है । पृथिवी के वायु का नाम ' एषवाराह ' है । इस वायु ने चारों ओर से एककालावच्छदेन पृथिवी को पकड़ रखा है अतएव ' श्रा - ईम वसति वरहुले इति वा श्रोत - अहः । पश्नवा सौ प्रहृश्च । ' इस व्युत्पत्ति से एमूषवाराह कहा जाता है । इसीको आधुनिक वैज्ञानिक [ ६५
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण ' एट्म स्फयर ' नाम से व्यवहृत किया करते हैं । यही वराह भगवान् पृथिवी को पकड़े हुए हैं । यदि पृथिवी के चारों ओर वायुस्तर न होता तो अभी पृथिवी के टुकड़े - टुकड़े हो जाते । इन चारों वराहों में से प्रकृत में इसी एमूषवराह का सम्बन्ध है । पृथिवी पिण्ड के चारों ओर यह एमूषवराह रहता है । ३३ अहर्गण में ६-६ अहर्गण के ६ स्तोम होते हैं । इनमें से पहला जो स्तोम है वह त्रिवृत् स्तोम कहलाता है । वायु स्थानीय ३ अहर्गणों में जब ' स्तोम ' मिला दिए जाते हैं तो ' त्रिवृत् ' स्तोम हो जाता है । इनमें जब छः मिला दिए जाते हैं तो पश्ञ्चदश स्तोम हो जाता हैं । इनमें जब छः मिला दिए जाते हैं तो एकविशस्तोम हो जाता है । इनमें जब छः मिला दिए जाते हैं तो त्रिणव ( २७ ) स्तोम हो जाता है एवं जब ६ और मिला दिए जाते हैं तो त्रयस्त्रिंशस्तोम हो जाता है । इस प्रकार ६ ' स्तोम ' हो जाते हैं । छः में त्रिवृत् के पहले का स्तोम तीन ही अहर्गण का मालूम होता है परन्तु है वह भी वास्तव में ६ ही क्योंकि तीन अहर्गण ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र के हिसाब से पृथिवी पिण्ड में चले जाते हैं अतएव वायुस्तर में तीन ही अहर्गण बच जाते हैं । वास्तव में सारे स्तोम ६-६ अहर्गण के ही होते हैं । त्रयस्तोम, त्रिवृत् पञ्चदश, एकविंश, त्रिणव, त्रयस्त्रिंश भेदेन ६ स्तोम हो जाते हैं । इनमें से त्रयस्तोम तो पृथिवी पिण्ड है । इसमें तो हविर्यज्ञ का स्वरूप रहता है । इसके बाद तीन अहर्गण का वायुस्तर रहता है । इसके बाद में महावेदि प्रारम्भ होती है । तीन अहर्गण के बाद चौथे से महावेदि का प्रारम्भ होता है । चूँकि महावेदि और पृथिवी के बीच में तीन प्रहर्गण वायुस्तर रहता है अतएव मानुष यज्ञ में ही हवि-दि के पूर्वार्ध्य स्थूणराज से ३ विक्रम आगे से महावेदि प्रारम्भ की जाती है । तीन विक्रम आगे ही मध्य शकु क्यों गाड़ा जाता है - इसकी यही उपपत्ति है - यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि पृथिवी का जो दैनिक दिव्य प्राण है जिसे कि हमने आहवनीय बतलाया है वह इस सोमवेदि का - महा-वेदिका - गार्हपत्य बन जाता है । बस, इस गार्हपत्यस्वरूप पृथिवी से २१ तक अर्थात् सूर्य्य तक महावेदि बनी हुई है । इसमें पञ्चदश स्तोम का - प्रर्वाक्सदोमण्डप है एवं इससे ऊपर हविर्धानमण्डप है | इससे ऊपर ठीक सत्रहवें स्थान में आहवनीय श्रग्नि है । पृथिवी में अग्नि और सोम दोनों रहते हैं । अग्नि १७ तक रहता है । सोम ३३ तक रहता है । इसमें जो १७ तक रहने वाला अग्नि है वह अग्नि का असली स्वरूप है । इसमें चू ंकि ऊपर रहने वाला सोम प्राहुत होता रहता है अतएव इसे ' ग्राहवनीय ' कहते हैं । सोम की आहुति से प्रज्वलित होकर यह श्रग्नि यज्ञीय बनता हुआ २१ तक चला जाता है, अतएव अग्नि की सत्ता २१ वें अहः तक मान ली जाती है । इस इक्कीस को केन्द्र में रख कर १७- १५ अहर्गण तक का एक ऐन्द्राग्न यज्ञ होता है जिसे कि नवाह यज्ञ भी कहते हैं । यही श्वेतद्वीप निवासी कभी न सोने वाले विष्णु भगवान् हैं । अस्तु इस विषय में हमें कुछ नहीं कहना | कहना है - महावेदि के विषय में । महावेद में यह १७ वाँ अग्नि आहवनीय है एवं पञ्चदश स्थान में जहाँ कि सदोमण्डप है ८ धिष्ण्याग्नियाँ रहती हैं । यही प्रान्तरिक्ष्य अग्नि भी कहलाती हैं । इन आठ में से ६ तो सदोमण्डप के बीच में हैं । मार्जालीय नाम का अग्नि दक्षिण में है और आग्नीध्रीय उत्तर में है । आहवनीय इस यज्ञ पुरुष का मुख है । इसमें सोमाहुति होती है वह पञ्चदश स्थान में रहने वाले सदोमण्डप में जमा होती है । यहाँ पर मार्जालीय श्रवणाग्नि उसका परिपाक करता है । यही यज्ञपुरुष का उदर है एवं संवत्सर परिभ्रमण वृत्त की जो दोनों पार्श्वों की दो रेखाएँ हैं वही ' पावमानी ' हैं एवं २१ वा सूर्य्य यूप है । हविर्धान को [ ६६ J
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तृतीय काण्ड श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणं यज्ञपुरुष ब्राह्मण यज्ञ का शिर कहा जाता है । इसका एकमात्र कारण विष्णु है । हवि नाम है - सोम का । अन्न के अधि-ठाता वही विष्णु हैं अतएव विष्णु को पालक कहा जाता है । विष्णु ३३ देवताओं के अन्त में है - मुख भाग में है अतएव हविर्धान को मस्तक कह दिया जाता है । इस प्रकार पृथिवी से सूय्यं पर्यन्त महावेदि वितत हो रही है । इसी महावेदि में अधिदैवत यज्ञ होता रहता है । इसी यज्ञ से अध्यात्म और अधि-भूत का निर्माण होता है । जैसी स्थिति उस महावेदि की है ठीक नही स्थिति, वही क्रम अध्यात्म में समझना चाहिए । उसी अधिदैवत यज्ञ के अनुसार हमारा निर्माण होता है । पेट छाती से पहले क्यों न हो गया - पैर हाथ की जगह क्यों न हो गए - मुख छाती में ही क्यों न हो गया - इन प्रश्नों का उत्तर है - प्रकृति - यज्ञ । प्राकृतिक यज्ञपुरुष में जो संस्था है वही यहाँ होती है । वह एक ढाँचा है । उसीसे हमारा निर्माण हुआ है परन्तु इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि चतुर्दशविध भूतसर्ग में जो समान भाव है उसी का अधिदेवत यज्ञ कारण बनता है । जो विशेषता है उसका कारण महान् है | पेट मस्तक-हाथ - पैर इत्यादि समान भाव हैं, यह सबमें होंगे परन्तु यह समानता उसी ढाँचे की है । किन्तु बैल दूसरी तरह का है - मनुष्य दूसरी तरह का है - घोड़ा दूसरी तरह का है यह भेद महान् से होता है । यह महान् कुल ८४००००० ( चौरासी लाख ) हैं । बस, योनियाँ कुल इतनी ही होती हैं । सारे कथन का निष्कर्ष यही हुआ कि पृथिवी से २१ तक महावेदि है । पृथिवी गार्हपत्य है । सप्तदशाग्नि आहवनीय है । प्रान्त रिक्ष्य - माजलीय, धिष्ण्याग्नि दक्षिणाग्नि है । पञ्चदश स्थान के नीचे सदोमण्डप है । १५ से ऊपर उत्तरवेदि से पश्चिम में हविर्धान मण्डप है । इसमें पृथिवी का जो ग्राहवनीय गार्हपत्य है - वही दोनों और पैर हैं । पञ्चदश स्थानीय सदोमण्डप उदर है । उसके ऊपर का हविर्धान मण्डप छाती है । प्राग्नीध्रीय मार्जालीय दोनों हाथ हैं । श्राहवनीय मुख है । सूर्य्य शिखा है । इस प्रकार वह प्राकृतिक यज्ञ - । पुरुष इसी पृथिवी से सूर्य्यं तक खड़ा हुआ है । इसी अग्नीषोमात्मक यज्ञ से सारे विश्व का निर्माण होता है अधिदैवत से अध्यात्म का निर्माण होता है । मूलाधार से नाभि तक हविर्वेदि है । यहाँ तक पार्थिव अपान प्राण रहता है । यह नाभि ही उस महावेदि का मध्य शकु है । नाभि से हृदय तक जो उदर है-वही सदोमण्डप है । यहीं व्यान का स्थान है । नाभि के नीचे प्रपान रहता है - नाभि से ऊपर तथा । छाती यही में व्यान रहता है । व्यान अन्तरिक्ष की वस्तु है । अान्तरिक्ष्य अग्नि को धिष्ण्याग्नि कहते हैं के अधि धिष्ण्यानि यहाँ इसी उदर में रहता है । इस सदोमण्डप के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । अन्तरिक्ष ष्ठाता वायु हैं । वायु में एक हिस्सा इन्द्र का रहता है अतएव ' वायुर्वेन्द्रोऽन्तरिक्षस्थानः ' यह कहा जाता सकते है | चूँकि उदर अन्तरिक्ष स्थान है - इसमें व्यान प्राण रहता है अतएव इसे हम इन्द्राश्रित बतला है हैं । इसके बाद चलिए छाती की ओर । कण्ठ से नीचे उदर से ऊपर का जो स्थान है अर्थात् छाती वही हविर्धान मण्डप है | यहाँ दो फुफ्फुस रहते हैं । चूँकि यहाँ दो फुफ्फुस होते हैं अतएव है जिसे इस कि वैश्वा- यज्ञ में भी दो शकट रखे जाते हैं । नाभि से ऊपर - कण्ठ से नीचे- दक्षिण पार्श्व में जो अग्नि नर, कोष्ठ्चाग्नि, यकृत् इत्यादि नामों से व्यवहृत किया करते हैं, वही दक्षिणाग्नि श्रवणीयाग्नि कह-लाती है एवं जो दोनों हाथ हैं वे ही प्राग्नीध्रीय और मार्जालीय हैं । इसके बाद है मुख । यह जो मुख है, वही उत्तरावेदि है । यही आहवनीय है । इसी में तो उदरस्थ देवताओं के लिए प्राहुति दी जाती है । 1 इसमें जो जिह्वा है वही ' नाभिका ' ( धुरी केन्द्र ) है एवं जो शिखा है - वही यूप है । पुरुष यज्ञमूर्ति है-यज्ञस्वरूप है - श्रतएव इसे यूपस्थानीय शिखा अवश्य ही रखनी चाहिए— [ ६७ ]
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शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) ' मूलद्वारतो नाभिपर्य्यन्तम्- हविर्वेदिः । ततो वक्षस्थलस्याधोभागपर्य्यन्तम्- सदोमण्डपम् || " • कपठ पर्य्यन्तम्- हविर्धानमण्डपम् । हस्तौ - आग्नीध्रीय मार्जालीयो । पादद्वयम् — हविर्यज्ञस्य गार्हपत्यः श्राहवनीयः । उदरस्थ वैश्वानराग्निः - दक्षिणाग्निः । तत्रस्थ अन्तरिक्ष्याग्नयः - धिष्ण्याग्नयः । उदरस्थ बलप्रदरसः — प्रौदुम्बरी । मुखम् - उत्तरावेदिराहवनीयः । जिह्वा - नाभिका | शिखा -- यूपः । इति पुरुषस्वरूपम् । पृथिवी हविर्वेदि ( गार्हपत्याहवनीयो पादो ) पञ्चदश स्तोमपर्यन्तम् तत उत्तरम् सदोमण्डपम् ( उदरम् ) हविर्धानमण्डपम् ( वक्षस्थल ) अन्तरिक्ष्याभ्यः अष्टौधिष्ण्याग्नयः पृथिव्याः नैशिक दैनिक प्राणी पादों सप्तदशाश्चाहवनीयः मुखम् सूर्य:
यूपः ।
॥ सैषा प्राकृतिकयज्ञे महावेदि ॥
इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि उस महायज्ञ से हमारे अध्यात्मयज्ञ का निर्माण होता है । हम उस यज्ञ से बने हैं अतएव वेद में बार - बार ' पुरुषो वै यज्ञः ' यह लिखा रहता है । महर्षियों ने इसी आध्यात्म यज्ञ की नकल पर चूँकि इस यज्ञ का वितान किया है प्रतएव हम यज्ञ को पुरुष कहने के लिए तैय्यार हैं । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" पुरुषो वै यज्ञः " । यहाँ पर यज्ञ उद्देश्य है और पुरुष विधेय है । यज्ञ में पुरुष का विधान किया जाता है । श्रुति कहती है - इस यज्ञ को तुम पुरुष समझो । यज्ञ को पुरुष कैसे समझें? इसका उत्तर देती हुई श्रुति कहती है कि चूँकि इस यज्ञ को पुरुष ( मनुष्य ) वितत करता है प्रर्थात् पुरुष ही यजमान ही इस यज्ञस्वरूप को उत्पन्न करता है अतएव ' पुरुषोत्पन्नत्वात् ' हम इस यज्ञ को पुरुष कहने के लिए तैय्यार हैं । इसी अभि-प्राय से कहते हैं-" पुरुषस्तेन यज्ञः ( तेन कारणेन यज्ञः पुरुष उच्यतेइत्यर्थः कार्य्यः ) यदेनं ( यज्ञ ) पुरुषस्तनुते " । [ ६८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण एक तो यज्ञ का पुरुष कहलाने का यही कारण है । दूसरा कारण यह है कि तायमान जो यह यज्ञ है वह पुरुष की आकृति से ही युक्त होता है । जैसा पुरुष का अर्थात् श्रध्यात्मयज्ञ का स्वरूप है-ठीक वैसा ही स्वरूप इस यज्ञ का भी है अतएव हम इसे ' पुरुष ' कहने के लिए तैय्यार हैं । हमारा निर्माण आधिदैवत यज्ञ के अनुरूप है । हमारी अनुकृति पर यह मनुष्ययज्ञ है अतएव यह यज्ञ ' पुरुष ' कहा जाता है-" एष वै तायमानो यावानेव पुरुषस्तावान्विधीयते । तस्मात् पुरुषो यज्ञः ( पुरुषाकारेण वितायमानत्वादेषसोमयज्ञः पुरुषः इति भावः:) ) " ॥१ ॥
यह यज्ञ पुरुषाकार कैसे हैं? यह बतलाते हैं । इस महावेदि में जो हविर्धानमण्डप है - वही इस यज्ञ का मस्तक है । हविर्धान को मस्तक क्यों कहा जाता है - इसका उत्तर है- विष्णु । हवि नाम है - सोम का । सोम ही देवताओं का अन्न है । अन्न के अधिष्ठाता विष्णु हैं । विष्णु ही यज्ञ के मस्तक भाग में रहते हैं इसीलिए कहा गया है-" अग्निर्वे देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः ” । ( ऐ ० ब्रा ० अ ० १1१ ) यह कहा जाता है | चूँकि हविर्धान में हवि रहता है । हवि विष्णु देवता का है । विष्णु प्राकृ- हमने तिक यज्ञ का शिरस्थानीय है अतएव हम हविर्धान को अवश्य ही यज्ञ का शिर कह सकते सत्ता हैं समझनी । हृदय से कण्ठ तक हविर्धन बतलाया था परन्तु असल में हृदय से मस्तक पर्य्यन्त उसकी मस्तक है वह चाहिए क्योंकि इसके अधिष्ठाता विष्णु हैं । विष्णु २१ वें ग्रहण पर रहते हैं । हमारा जो २१ पर है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" शिर एवास्य हविर्धानम् । वैष्णवं देवतया " । मस्तक ' कहा विष्णु देवता के वाक् भाग से हवि का निर्माण होने के कारण ही हविर्धान हविर्धान में को क्रीत ' सोम रहता जाता है | इसका नाम हविर्धन क्यों हुआ इसका कारण बतलाते हैं - इस अतएव इस मण्डप है । यह सोम देवताओं का हवि है । चूँकि इस मण्डप में शकट पर सोम रहता है को ' हविर्धान मण्डप ' कहते हैं--" अथ यदस्मिन् सोमो भवति । हविर्वै देवानां सोमः । तस्माद्धविर्धानं नाम " ॥२ ॥
दी इस यज्ञ का सप्तदश स्थानीय जो ग्राहवनीय है वही मुखस्थानीय है देना । - इसी मुख में में तो ग्रास प्राहुति देने के जाती है । अध्वर्युं आहवनीय में जो आहुति देता है तो इसका यह आहुति है । पुरुष मुख में माफिक है । जैसे मुख में अन्न डाला जाता है तथैव आहवनीय में आहुति डालना [ ee ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण आहुति डालते हैं यहाँ आहवनीय में प्राहुति डाली जाती है अतएव हम श्राहवनीय को मुख कहने के लिए तैय्यार हैं-" स यदाहवनीये जुहोति यथा मुख आसिञ्चेदेवं तत् " ॥३ ॥
महावेदि के २१ वें स्थान पर बना हुआ जो यूप है वही इस यज्ञ का स्तूप है अर्थात् शिखा है एवं उत्तरवेदि के बीच में जो नाभिका है - वही चिह्ना है । " स्तुप एवास्य यूप: ( यूप एवास्य यज्ञस्य स्तूपः - इति भावः ) " । इस हविर्धान के दक्षिणोत्तर आग्नीध्रीय और मार्जालीय होती है । मस्तक के दोनों ओर जैसे दो हाथ होते हैं तथैव हविर्धान के दोनों ओर के मार्जालीय और श्राग्नीध्रीय अग्नि इस यज्ञ पुरुष के दोनों हाथ हैं-" बाहू एवास्याग्नीध्रीयश्च मार्जालीयश्च " ॥४ ॥
हविर्धान मण्डप से पश्चिम में जो सदोमण्डप है - वही इस यज्ञपुरुष का उदर है । उदर में सारे देवता रहते हैं अतएव उदर को, ' विश्वे देवा श्रसीदन ' इस व्युत्पत्ति से सदोमण्डप कहते हैं । जिस समय पेट खाली रहता है तो उस समय खाऊँ खाऊँ होने लगती है । यह जो खाऊँ खाऊँ है वह इसी उदरस्थ प्राण का धर्म है । उदर में भृगु प्रङ्गिरा श्रादि १० प्रधान प्राण रहते हैं एवं जठराग्नि रहता है । ३३ देवता अग्नि की अवस्था विशेष ही हैं प्रतएव अग्नि से हम सारे देवताओं का ग्रहरण कर सकते हैं । इसी-लिए ' श्रग्निः सर्वा देवता: ' ( ऐ. ब्रा. अ. ६ । ३ ) कहा जाता है । जिस समय अन्न की कमी हो जाती है तो यह नाद अग्नि कुलबुला उठता है - इसी का नाम भूख है । पेट में रहने वाले आग्नेय देवता और भृगु आदि प्रारण ही खाऊँ - खाऊँ करते हैं । उनके लिए ग्राहवनीय स्वरूप मुख में प्राहुति दी जाती है । उस आहुति का भोक्ता उदरस्थ प्राण देवता है । लेने वाले उदरस्थ प्राण हैं - साधन मुख है । मुख तो द्वार मात्र है, असल में तृप्ति उदरस्थ अग्नि की अर्थात् देवताओं की ही होती है । चूंकि प्राध्यात्म में सारे देवता उदर में ही प्रतिष्ठित रहते हैं एवं भृगु आदि प्राण भी जो कि भिन्न - भिन्न जाति के हैं - यहीं प्रति-ष्ठित रहते हैं एवं यहीं भोजन करते हैं अतएव हम हमारे उदर को ' सदोमण्डप ' कहने के लिए तैय्यार हैं । बस ठीक इसी उदर की नकल पर इस यज्ञ में सदोमण्डप बनाया जाता है । आध्यात्म में प्राण देवता इसी उदर में खाते हैं अतएव यहाँ भी जो यज्ञीय देवता हैं ऋषि हैं अर्थात् ऋत्विक् हैं वे भी इसी सदोमण्डप में भोजन करते हैं । जो कुछ मुख में हो कर खाया जाता है, मनुष्यवर्गमुख में हो कर जो कुछ खाते हैं वह सारा उदर में जाकर प्रतिष्ठित हो जाता है । उदरस्थ देवता ही उसका उपभोग करते । खाने वाले तो उदरस्थ देवता ही हैं । ग्रतएव यहाँ भी ऋत्विक् लोग जो कि देवता ही हैं- इसी सदोमण्डप में बैठ कर भोजन करते हैं । ऋषि क्या खाते हैं - उदर में बैठे हुए प्रारण देवता तृप्त हो रहे हैं [ १०० I
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणं यज्ञपुरुष ब्राह्मण " तस्मात् सदसि भक्षयन्ति । यद्धीदं किञ्चाश्नन्ति - उदरऽएवेदं सर्वं प्रतितिष्ठति " । चूँकि इसमें सारे देवता बैठते हैं प्रतएव उदर को तो सदोमण्डप कहना उचित है परन्तु यहाँ कौन से सारे देवता बैठे हुए हैं - इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - यज्ञ में प्राए हुए जो नाना गोत्र वाले ब्राह्मण हैं - यही विश्वेदेव हैं । उदर में जैसे भृगु - प्रङ्गिरादि नाना प्राण हैं - तथैव यहाँ भी भृगु-वशिष्ठ कश्यप भारद्वाजादि नाना गोत्र वाले ब्राह्मण बैठते हैं अतएव हम इसे सदोमण्डप कहने के लिए तैय्यार हैं । " अथ यदस्मिन्विश्वे देवा असीदन् तस्मात्सदो नाम । त उडएवास्मिन्नेते ब्राह्मणा विश्वगोत्रा ः सीदन्ति ( तस्मात् सदोनाम - इति शेषः ) ” ॥५ ॥
महावेदि के पश्चिम भाग में हविर्वेदि की जो गार्हपत्य और आहवनीय दो अग्नियाँ हैं - वे ही इस यज्ञपुरुष के पैर हैं । अथवा हविर्वेदि और महावेदि के बीच में जो आहवनीयाग्नि और पथ्याग्नि होती हैं - उन्हें पैर समझना चाहिए । " अथ यावेतौ जघनेनाग्नी । पादावेवास्यैतौ ( सौमिकवेदेः पश्चाद्-भागेयो हविर्यज्ञस्याहवनीय गार्हपत्यौ तौ प्रस्य यज्ञपुरुषस्य पादौ " ) । इस प्रकार तायमान यह यज्ञ पुरुषाकारवत् वितत किया जाता है - पुरुष के आकार के माफिक इस यज्ञ का स्वरूप बनाया जाता है अतएव हम इस यज्ञ को अवश्य ही पुरुष कहने के लिए तैय्यार हैं-" एष वै तायमानो यावानेव पुरुषस्तावान्विधीयते । तस्मात् पुरुषो यज्ञः " ॥६ ॥
यज्ञ को पुरुष क्यों कहा जाता है - इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब हविर्थान मण्डप कैसा होना चाहिए एवं सदोमण्डप कैसा होना चाहिए - यह बतलाते हैं - वह हविर्धान मण्डप और सदोमण्डप उभयतो द्वार युक्त होना चाहिए । पूर्व और पश्चिम दोनों प्रोर उसमें दर्वाजे होने चाहिए । पुरुष के आकार पर इस यज्ञ का वितान किया जाता है । पुरुष की जो छाती है उसमें दोनों ओर रास्ते हैं । पश्चिम में हृदय द्वार है - पूर्व में मुख द्वार है । एवमेव सदोमण्डप में प्रर्थात् उदर में भी दोनों ओर दव हैं । इधर मूलद्वार है - उदर- हृदय है । मस्तक से मूल द्वार तक रास्ता बना हुआ है परन्तु दोनों पार्श्व ढंके हुए हैं अतएव यहाँ भी दोनों पाश्र्वों को टाटी से ढक देना चाहिए परन्तु द्वार दोनों ओर रखने चाहिए । असल में पुरुष में जो ये द्वार हैं - वे श्रधिदैवत के आधार पर ही हैं । अधिदेवत यज्ञ में चूँकि पूर्व - पश्चिम द्वार हैं प्रतएव पुरुष जो है वह मस्तक से मूलाधार पर्यन्त सन्तृरण- सुषिर: छिद्र ) युक्त होता है । इस अधिदैवत विज्ञान की ओर लक्ष्य करते हुए कहते हैं-[ १०१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण " तस्मादयं पुरुष प्रान्तं ( अन्तपर्यन्तम् ) सन्तृण्णः ( सुषिरवान् ) भवति " । इस हविर्धान मण्डप में दो शकट रखे जाते हैं । उन्हें रखने से पहले खूब धो - धाकर साफ कर लेना चाहिए जिससे कि जरा भी श्रासुर भाव न रहे । जब वे साफ हो जाते हैं तो उन्हें उस हविर्धान मण्डप में ले आते हैं ---" प्रणिते हविर्धाने उपतिष्ठते " ॥७ ॥
उन दोनों हविर्धानों को नियत स्थान पर जमा कर रखते हैं--" ते ( हविर्द्धा ) समववर्त्तयन्ति ( हविर्धानमण्डपं स्थापयन्ति ऋत्विजः ) ” । - मध्यम शंकु से जो कि अन्तःपात कहलाता है - पूर्वादय शंकु तक जो एक रेखा होती है उसे पृष्ठ्या सूत्र कहते हैं । जैसा कि यास्क मुनि कहते हैं— " वेदीमध्ये प्रवर्त्तमाना प्राची रेखा पृष्ठ्या " । ( या ० नि ० ) इस प्राची रेखा से - पृष्ठ सूत्र से दक्षिण भाग में दक्षिण हविर्धान को स्थापित करते हैं एवं उत्तर हविर्धान को उत्तर में स्थापित करते हैं । तात्पर्य यही है कि दोनों को पृष्ठ्यासूत्र के इधर - उधर बिल्कुल ठीक नाप से जमा कर स्थापित करना चाहिए । जरा भी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए-" ते समववर्तयन्ति ( सम्यक् स्थापयन्ति ) दरिणेनैव दक्षिणं ख्य मध्यरज्ज्वोर्द क्षिरण देशेन दक्षिणम् ) तथैव उत्तरेणोत्तरम् " । ( पृष्ठया-दो शकट बनाए जाते हैं - एक छाती का दाहिनी हिस्सा है एक बाँया हिस्सा है । पृष्ठ्या सूत्र मेरुदण्ड है । पुरुष का ही नहीं - प्राणिमात्र का दाहिना भाग -वाम भाग से एक बाल भर बड़ा होता है । एक चिड़िया के दोनों पंखों को ले लीजिए और उनका विशकलन कीजिए । विशकलन करते समय-उस विकलन में - दाहिने पंख में प्रधा एक बाल विशेष पाएँगे । श्रपिच पुरुष का जो दाहिना भाग है वह सोम से बना हुआ है । सोम में अधिक स्नेहन होता है अतएव बाँए के बजाय दाहिना भाग अधिक बलवान् होता है । दाहिने हाथ से जो काम हो सकता है - वह बांए से नहीं हो सकता । चूँकि ये दोनों शकट दक्षिण- वाम भाग स्थानीय हैं एवं दक्षिण भाग बड़ा और बलवान् होता है अतएव एक शकट बड़ा बनाना चाहिए । बस जो बड़ा शकट हो उसे पृष्ठ - सूत्र के दक्षिण भाग में रखना चाहिए । इसी अभि-प्राय से कहते हैं-" यद् वर्षीयस्तद्दरिणं स्यात् ॥८ ॥
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