Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 91–100
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण से दक्षिण में जाया करता है अतः सोम दक्षिण में जा कर ही स्थित रहता है । इसी अभिप्राय से दक्षिण दिशा सोम की बतलायी गयी है ॥ ६ ॥
तदनन्तर ' विश्वकर्मा त्वाऽदित्यैरुत्तरतः पातु ' विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर की ओर आपकी रक्षा करें - इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ वदि के उत्तर भाग का प्रोक्षण करता है || ७ || इस प्रकार चौतरफ प्रोक्षण करने पर जो पानी बचता है उसे वेदि के पूर्व के जो दोनों कोरण हैं, उनमें जो दक्षिण का कोण है उसके पास ही स्पर्श से बचा कर उत्तरावेदि के बाहर डाल देता है तथा साथ ही ' इदमहं तप्तं वार्बहिर्द्धा यज्ञान्निः सृजामि ' अर्थात् इस तप्त पानी को मैं यज्ञ से ( उत्तरवेदि से ) बाहर डाल देता हूँ - इस मन्त्र का उच्चारण करता है । तात्पर्य यह है कि देवासुर युद्धकाल में यह वाक् पृथिवी सिंही बन कर क्रुद्ध हो, देवताओं से अलग हो गई थी । उस वाक् के शोक भाग को आज यज्ञ से बाहर करता है । अर्थात् यह प्रोक्षणीशेष पानी निदानविधया उस वाग्रूप पृथिवी का शोक ही है । इसीलिए जल का विशेषरण ' तप्तम् ' दिया है । यदि यजमान को किसी पर अभिचार करने की इच्छा न हो तो पूर्वोक्त मन्त्र का ही उच्चारण करना चाहिए । यदि किसी शत्रु पर अभिचार क्रिया करने की इच्छा हो तो ' इदमहं तप्तं वारमुमभि निःसृजामि ' इस प्रकार मन्त्र का उच्चारण कर जल डाल दे । ऐसा करता हुआ यजमान इस शोक संतप्त जल से शत्रु को विद्ध कर देता है और वह शत्रु उससे शोक सन्तप्त होता हुआ शीघ्र ही यमलोक का अतिथि बन जाता है || ८ || महावेद के गार्हपत्य से अग्नि ला कर उत्तरवेदि में स्थापित कर देने पर उत्तरवेदि का घृत से सेचन क्यों किया जाता है इसका कारण यह है कि पृथिवी सिंही बन कर चली गई थी । इसीलिए देवताओं द्वारा आज्याघार से यज्ञ में प्रथमाहुति प्रदान से प्रसन्न हो कर वारूप पृथिवी ने देवताओं से कहा था कि जिस कामना की इच्छा करोगे तुम्हारी ही कामना पूरी होगी । प्रकृतियज्ञ की इस प्रक्रिया के अनुसार आज्याहुति दे कर ऋत्विक् यजमान के लिए आशी: मांगते हैं और उनकी आशी: पूर्ण होती है ॥ ॥ इस प्रकार उत्तरावेदि में प्राज्याघार करता हुआ अध्वर्यु एक कार्य से दो प्रयोजन सिद्ध करता है । एक तो वह उत्तरवेदि का आधार करता है तथा दूसरे, यजमान को आशीः प्राप्ति हो जाती है । इसके बाद उत्तरावेदि के चारों कोणों के मध्य में नाभिका के समान जो थोड़ी ऊँची होती है उसके पूर्व की ओर के जो दोनों कोरण हैं उनमें से दक्षिण की ओर के कोरण में ' सिंह्यसि स्वाहा ' मन्त्र का उच्चारण कर श्राज्याघार कर देता है ॥१० ॥
इसके बाद नाभि की पश्चिम दिशा में वर्तमान कोणों में से उत्तर दिशा की ओर वर्तमान वायव्यकोण में ' सिंह्यस्यादित्यवनिः स्वाहा ' इस यजुर्मंन्त्र का उच्चारण करता हुआ [ ७३ 1
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मणं घृत की आहुति दे देता है । अर्थात् यजमान के लिए आदित्यों की सेवा करने वाली सिंही हो आप सम्यक् प्रकार से आहुति प्राप्त करो । इसके अनन्तर नाभि की पश्चिम दिशा में वर्तमान दोनों करणों में से दक्षिण की तरफ के नैऋत्य कोण में ' सिंह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्रवनिः स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ घृताहुति दे देता है । भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राशीर्वादात्मक यजुर्मन्त्रों से बहुत सी प्राशी: मांगी जा सकती हैं । उनमें से इस यजुर्मन्त्र द्वारा ब्रह्म तथा क्षत्र इन दोनों वीर्यों की याचना की जाती है । इन दोनों वीर्यों से अधिक और आशास्य है भी क्या? ॥ ११ ॥
तदनन्तर ' सिंह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ वेदि की पूर्व दिशा में वर्तमान कोणों में से उत्तर दिशा के कोरण ईशान कोण में घृताहुति देता है । इस मन्त्र में ' सु प्रजावनी ' द्वारा शोभन प्रजा की कामना करता है तथा ' रायस्पो-षवनिः ' मंत्र के द्वारा सम्पत्ति - वृद्धि की कामना करता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मन्त्र में रामस्पोष शब्द भूमा का, बाहुल्य का, वाचक है ॥ १२ ॥
इसके बाद ' सिंह्यस्यावह देवान् यजमानाय स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ नाभि के मध्य में घृत डालता है । अर्थात् हे वाक् रूप सिंही पृथिवी! आप यजमान के यज्ञ के लिए देवताओं को बुलाइए! मध्य में मन्त्रोच्चारण पूर्वक घृताघार करने के बाद ' भूतेभ्यस्त्वा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ स्र ुक् को ऊपर उठाता है । प्रजा को भूत कहते हैं । अतः प्रजा के लिए अर्थात् दिव्यात्मा का प्रजनन करने के लिए तुम्हें उठाता हूँ यही इस मन्त्र का अर्थ है ॥१३ ॥
तत्पश्चात् तीनों ओर तीन परिधियाँ रखता है । ये तीनों परिधियाँ उन्हीं तीनों अग्नियों की स्थानापन्न हैं जो अग्नियाँ देवताओं के द्वारा होता रूप से वरण करने के समय पलायन कर गई थीं तथा जिनका नाम एकता, द्विता व त्रिता है । वह ' ध्रुवोऽसि पृथिवीं दृह ' अर्थात् हे परिधि! आप दृढ़ हो अतः पृथिवी को दृढ करो इस मन्त्र का उच्चारण करता मध्यम परिधि को रखता है । ' ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षं दृ'ह ' । तुम अविचलरूप से स्थिर रहती हो, अन्तरिक्ष को दृढ़ करो । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मध्यम परिधि से दक्षिण भाग में परिधि रखता है । वह ' अच्युतक्षिदसि दिवं दृ'ह ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उत्तर भाग में परिधि रखता है । इस प्रकार तीनों परिधियों को रख देता है । पश्चात् ' अग्नेः पुरीषमसि ' यह कहता हुआ गुग्गुलु और सुगन्धितेजन आदि संभारों को वेदि पर रख देता है । गुग्गुलु आदि संभारों का निवास अग्नि की सर्वता के लिए है । अर्थात् जो अग्नि इन संभारों में बँट गया था ( अग्नेः पुरीषमसीति निवपति गुग्गुलु सुगन्धितेजन वृष्णे: स्तुका श्चोपरिशीर्षण्या अभावेऽन्या इति ) ( का. श्रौ. सू. ५/६४ ) उसकी कृत्स्नता इन संभारों के द्वारा हो जाय इसलिए संभारों को रखता है ॥१४ ॥
पीतदारु नाम की गूलर अग्नि का शरीर है । जैसा कि ' स यां वनस्पतिष्ववसत्ता ' पितुद्र ' ( तै. सं. ६ | २८ | ४ ) तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है । तात्पर्य यह है कि अग्नि से [ ७४ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण शरीर में बलवृद्धि होती है और गूलर वृष्य है । इस गूलर को अग्नि का शरीर बत-लाया है । अतः पीतदारु की परिधि रखता हुआ अध्वर्यु अग्नि को शरीर से समृद्ध करता है, अनकी कृत्स्नता का सम्पादन करता है ॥१५ ॥
गुग्गुलु इस अग्नि का मांस है । गुग्गुलु को रखता हुआ अध्वर्यु इसमें मांसाधान द्वारा अग्नि में मांस की समृद्धि करता हैं, मांस की कृत्स्नता सम्पादन करता है ॥१६ ॥
सुगन्धितेजन इस अग्नि का गन्ध है अग्नि की वस्तु है । अतः सुगन्धितेजन को समृद्ध करता है ॥ १७ ॥
। क्यों कि पृथिवी अग्नि का पिण्ड है अतः गन्ध रखता हुआ अध्वर्यु गन्ध से ही इस अग्नि को इस वेद पर जो भेड़ के बाल रखे जाते हैं उसका कारण बतलाया जा रहा है -- भेड़ के दोनों शृङ्गों के मध्य अग्नि एक रात्रि रही थी । अर्थात् संवत्सर के अग्निप्रारण से भेड़ का मस्तक बना है । अतः इसमें सब से अधिक बल रहता है । इसमें से जो अग्नि की मात्रा चली गई थी वह पुन: इसमें ना जाए इसलिए भेड़ के मस्तक के बाल रक्खे जाते हैं । चूँकि अग्नि भेड़ के मस्तक में रहा था अतः जहाँ तक हो सके, मस्तक के पास के ही बाल लेने चाहिए | किन्तु यदि भेड़ के मस्तक के बाल न मिलें तो भेड़ के अन्य स्थान के बाल लेने चाहिएँ । परिधि - स्थापन का कारण बतला रहे हैं कि अग्नि वेदि से बाहर न बिखर जाए अतः परिधियाँ स्थापित करना अति आवश्यक है । क्यों कि परिधियाँ विप्रकृष्टकाल में अर्थात् होमकाल में काम आती हैं तथा होमकाल तक अग्नि को सुरक्षित रखना है अतः परिधि लगाना अति आवश्यक है ॥ १८ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] महावेदी और उत्तरवेदी का निर्माण हो चुका । इस महावेदी का ग्राहव-नी यह उत्तरवेदी है । इसी उत्तरवेदी में सोमयाग होगा । प्रत्येक यज्ञ में आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि ये तीन अग्नि रहती हैं । प्रकृत सोम यज्ञ में जो ऐष्टिक वेदि ( हविर्वेदि ) का ग्राहवनीय है, वह इस महावेदी का गार्हपत्य बन जाता है । उत्तरवेद्यन्तर्गत ग्रग्नि ग्राहवनीय अग्नि कहलाता है - मार्जा-लीयाग्नि दक्षिणाग्नि कहलाता है । आहवनीय में नया अग्नि प्रज्वलित नहीं किया जाता अपितु गाई-पत्य का अग्नि ही आहवनीय में लाया जाता है । हविर्वेदी का जो गार्हपत्य है उसी में से आहवनीय के लिए अग्नि ले जाया जाता है परन्तु ध्यान रहे अग्नि गार्हपत्य में से ही आता है । जो हविर्वेदी का आह-वीय अग्नि है, वह महावेदी का गार्हपत्य ही है अतएव इसमें से अग्नि ले जाना - गार्हपत्य से ले जाना ही कहलाएगा । वेदी तैय्यार हो चुकी । अब ऐष्टिक वेदी के ग्राहवनीय में से ( महावेदी के गार्हपत्य में से ) अग्नि ले जाया जाएगा । यदि उस अग्नि को ले जाया जाएगा तो गार्हपत्य निरग्निक हो जाएगा । ऐसा न हो, अतः अध्वर्यु उस गार्हपत्य में अग्नि- बाहुल्य के लिए समिधा डाल देता है । अग्नि - बाहुल्य के लिए गार्हपत्य में - जिसमें से कि उत्तरावेदी में अग्नि ले जाया जाएगा - काष्ठ डाल देना चाहिए- ' इध्म-भ्यादधति ' उसी समय ऋत्विक् वहाँ ' उपयमनी ' तैय्यार रखते हैं । एक स्थान में बालू रख ली जाती [ ७५ 1
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्म है । इस पर अग्नि को रख कर ले जाया जाता है । बालू सहित जो पात्री है उसी को उपयमनी कहते हैं । इसीलिए यास्क मुनि कहते हैं- ' उपयभ्यते उपगृह्यते श्रग्निरभिरित्युपयभ्यतः सिकताः । इधर एक ऋत्विक् उपयमनी लिए खड़ा रहता है - उधर दूसरा ऋत्विक् स्रवा और स्र ुचि ( जुहूपभृत ) को पानी से धोकर साफ कर लेता है । इस प्रकार सबसे पहले ये चार अङ्ग - कर्म कर लिए जाते हैं-" १. इध्ममभ्यादधति । २. उपयमनीरुपकल्पयन्ति । ३. श्राज्यमधिश्र-यति । ४. स्रुवं च स्रुचं च सम्माष्टि " । इसके बाद अध्वर्यु उत्तरावेदिस्थ अग्नि में आहुति देने के लिए इस तपे हुए - श्राज्य में पड़े हुए-तृणादि को निकाल कर, शुद्ध कर उसमें से पांच बार उपभृत में घृत डाल लेता है । इसी पञ्चगृहीत घृत की उस अग्नि में आहुति दी जाएगी -" थोत्याज्यं पञ्चगृहीतं गृह्णीते इति " । शीघ्र ही यह काष्ठ प्रज्वलित हो जाता है जिस समय वह प्रज्वलित हो जाता है उस समय अध्वर्यु उसे चीमटे से उठा लेता है और उपयमनी पात्री में - जिसमें कि बालू बिछी हुई है - रख देता है-" यदा प्रदीप्त इध्मो भवति " ॥१ ॥
" अथोद्यच्छन्तीध्मम् । उपयच्छन्त्युपयमनीः " । उसे जब उपयमनी में रख लिया जाता है तो श्रध्वर्यु होता से यह प्रेष करता है-" अग्नये हियमाणायानुब्रूहि " | उत्तरवेदी में नीयमान जो अग्नि है - उसके लिए सूक्त वाक् बोलने का विधान है अर्थात् देवताओं को ज्ञात हो जाए कि अब उनके यजन के लिए अग्नि ले जाया जा रहा है । इस प्रकार अध्वर्यु ' ' अग्नये ' इत्यादि प्रैष तो होता के प्रति करता है-" एकस्पययाऽनूदेहीति " । यह प्रैष प्रतिप्रस्थाता को करता है- हे प्रतिप्रस्थाता! स्पय से रेखा खींच कर उसी मार्ग से होते. हुए तुम मेरा अनुगमन करो- अर्थात् मेरे पीछे - पीछे चले आओ । प्रतिप्रस्थाता प्रेषानुसार एक स्पय या पद्धति से अध्वर्यु का अनुगमन करता हुआ चलता है । स्पय या पद्धति किसे कहते हैं - यह बतलाते हैं । हविर्वेदी के आहवनीय के प्रर्थात् महावेदी के गार्हपत्य के और महावेदी के बीच में तीन विक्रम की दूरी का स्थान खाली रहता है । गार्हपत्य से पूर्व की ओर तीन विक्रम दूर एक शकु गाड़ा जाता है - वही मध्य शङ्कु कहलाता है । यह मध्य शङ्कु महावेदी के पश्चिमार्द्ध में होता है । वेदी के जघनार्ध में रहने [ ७६ ] }
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मणे वाले शङ्कु पर्यन्त जो स्थान होता है - उसमें प्रतिप्रस्थाता स्पय से एक लकीर खींच देता है । एक ही बार वह लकीर खींची जाती है अतएव उसे ' एकस्पयया ' कहा गया है-" अनूदैति प्रतिप्रस्थातैकस्पययैतस्मान्मध्यमाच्छङ्कोयं एष वेदेर्जघनार्थे भवति " । इस अन्त: पात से गार्हपत्य और वेदी के बीच का जो व्यवच्छिन्न स्थान होता है - स्फ्य से रेखा करता हुआ अध्वर्यु उसी व्यवधान को मिटाता है । गार्हपत्य का जो अग्नि है - वह यज्ञस्वरूप है । इसे महावेदस्थ उत्तरावेदी में ले जाना पड़ता है । ऐसी अवस्था में दोनों के बीच में तीन विक्रम अन्तरीय पड़ते हैं । अतः इसमें होकर जाने से अग्निस्वरूप यज्ञ - यज्ञवेदी से बाहर निकल जाएगा एवं सारा यज्ञ भ्रष्ट हो जाएगा । ऐसा न हो, अतएव स्फ्य से एक रेखा खींच कर दोनों का सम्बन्ध जोड़ दिया जाता है । बस, इसी मार्ग से हो कर ये लोग अग्नि ले जाते हैं । चूँकि वह मार्ग एक स्पय से होता है अतएव इसे एक स्पयया पद्धति ( मार्ग, सरणि, संचर ) कहते हैं -" तद्यदेवात्रान्तः पातेन गार्हपत्यस्य वेदेर्व्यवच्छिन्नं भवति तदेवैतदनुसन्त-नोति " ॥२ ॥
कई प्राचार्य गार्हपत्य से प्रारम्भ कर उत्तरवेदी तक स्फ्य से रेखा खींचते हैं । उनका मत है कि दोनों को मिलाने के लिए यहाँ से उत्तरवेदी तक स्फ्य से रेखा खींचनी चाहिए परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए - इस मध्यम शकु तक ही रेखा खींचनी चाहिए - इसीसे व्यवच्छेद का संधान हो जाता है--" तर्द्धके श्रोत्तरवेदेरनूदायन्ति तदु तथा न कुर्यादेवैतस्मान्मध्यमाच्छङ्को-नूयात् " । इसके अनन्तर होता, प्रतिप्रस्थाता और अध्वर्यु तीनों उस एक स्पय या मार्ग से उत्तरवेदी के पास आते हैं--" तप्रायन्त्यागच्छन्त्युत्तरवेदिम् " ॥३ ॥
इस प्रकार वहाँ आकर अध्वर्यु प्रोक्षणी पात्र नाम का बर्तन ) उठाता है-प्रोक्षण करने के लिए नियत प्रतएव प्रोक्षणी “ प्रोक्षरणीरध्वर्युरादत्ते ” । सबसे पहले अध्वर्यु उत्तरावेदी का जो पूर्वभाग है वहाँ स्वयं उत्तराभिमुख हो कर उस पूर्व भाग का प्रोक्षण करता है और साथ ही में मन्त्र बोलता है— “ इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु इति " । ( वा ० सं ० ५।११ ) [ ७७ 1
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मणं इन्द्र शब्द से व्यवहृत जो देवता हैं वह वसुओं के साथ प्रापकी असुरादि से रक्षा करें । तानूनप्त्र ब्राह्मण में बतलाया गया है कि अग्नि वसुओं के साथ रहते हैं - सोम रुद्रों के साथ रहते हैं, वरुण आदित्यों के साथ रहते हैं, इन्द्र मरुतों के साथ रहते हैं । इनमें यह देवता जोड़ले ( युग्म ) हैं | आदित्य वसुत्रों के साथ भी सम्बन्ध रखते हैं । मरुत् रुद्रों के साथ सम्बन्ध रखतें । जैसा कि श्रुति कहती है-" यथादित्या वसुभिः संबभूवुर्मरुद्भिरुग्रा प्रहरणीयमानाः । एवा त्रिरणामन्नणीयमान इमान् जनान्त्संमनसस्कृधीह " ॥ ( अथर्व ६।८।७४ ) श्रतएव आदित्यों में एक इन्द्र भी है । चूँकि आदित्य वसुत्रों के साथ रहते हैं प्रतएव ' इन्द्र घोष-स्त्वा वसुभि: ' कहा गया है । पूर्व के अधिष्ठाता सूर्य्य है । सूर्य्यं ही का नाम तो इन्द्र है । वह आपकी पूर्व की ओर रक्षा करें - यही तात्पर्य है । पूर्व दिशा के दिक्पाल इन्द्र ही हैं--" इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्ताद्गोपायत्वित्येवैतदाह " ॥४ ॥
" प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात् पातु " । ( वा ० सं ० ५।११ ) इसके बाद यह बोलता हुआ उत्तरावेदी के पश्चिम भाग का प्रोक्षण करता है । पश्चिम दिशा के लोकपाल वरुण हैं अतएव ' प्रचेतास्त्वा ' कहा है ॥ ५ ॥
" मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिरणतः पातु " । ( वा ० सं ० ५।११ ) इसके बाद यह मन्त्र बोलता हुआ वेदी के दक्षिण भाग का प्रोक्षण करता है । पितर सौम्य प्रारण का नाम है । सोम उत्तर से दक्षिण में जाया करता है । सोम से ही मन बनता है एवं सोम का अपना स्थान दक्षिण है अतएव ' मनोजवा ' कहा जाता है ॥ ६ ॥
" विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरतः पातु " । ( वा ० सं ० ५।११ ) इसके अनन्तर यह मन्त्र बोलता हुआ वेदी के उत्तरभाग का प्रोक्षण करता है ॥ ७ ॥
इस प्रकार प्रोक्षण क्रिया के अनन्तर जो प्रोक्षणी पानी बच जाता है उसे वेदी के पूर्व के जो दो कोने हैं उनमें से जो दक्षिरण का कोना है उसके पास ही, किन्तु स्पर्श से बचा कर इस उत्तरावेदी के बाहर डाल देता है । उत्तरावेदी के अग्नि कोण में बचा हुआ पानी डाल देना चाहिए - यही तात्पर्य है । विनयन करते समय यह मन्त्र बोलना चाहिए । " इदमहं तप्तं वार्बहिर्धा यज्ञान्निः सृजामि " । ( वा ० सं ० ५।११ ) उसी देवासुर युद्धकाल में यह वाक् सिंही बनकर - प्रतिक्रुद्ध हो - देवताओं से अलग हो गई थी पृथिवी का - वाक् का - जो शोक है- निदानेन उसे ही आज यज्ञ के बाहर डालता है । पानी से उसके क्रोध को शान्त कर दिया अब जो बचा हुआ पानी है - वह उसका शोक नहीं है - प्रतएव उसके लिए ' तप्तम् ' कहा है । यदि किसी पर अभिचार करने की इच्छा न हो तो पूर्वोक्त ' इदमहं तप्तं वा बहि [ ७८ }
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मणं यज्ञान्निः सृजामि ' यही बोल दे । यदि कोई शत्रु हो और उसे नुकसान पहुंचाने की इच्छा हो तो यह कह करें जल डाल दे -" इदमहं तप्तं वारमुमभि निःसृजामि " । ऐसा करता हुआ यह यजमान इस शोक संतप्त पानी से शत्रु को बींध डालता है एवं वह शोक से संतप्त मानस होता हुआ शीघ्र ही यजमान का अतिथि बन जाता है-" अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्यन्ते तद्येऽएते पूर्वे स्रक्ती तयोर्या दक्षिणा तान्यन्तेन ( श्रत्यन्तान्तदेशन ) बहिर्वेदि निनयति - ' इदमहं तप्तं वार्बहिर्धा यज्ञातिः सृजामि " - इति ॥ ८ ॥
उत्तरवेदी में धार्यमाण जो अग्नि है उसमें घृत की आहुति डालने का कारण यही है कि जब पृथिवी सिंही बन कर चली गई थी तो देवताओं ने खुशामद करके उसे अपने पास बुलाया एवं पहली प्राहुति उसी में दी । तथैव प्रकृत्यनुसार पहली प्राहुति इसी में दी जाती है । इससे वह यजमान की सारी आशाएँ पूरी कर देती है । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसी समय ऋत्विक् लोगों द्वारा यजमान के लिए वाक् से श्राशीः माँगने का मौका है - यही तात्पर्य है ॥ ६ ॥
इस प्रकार उत्तरावेदी में घृताधार डालता हुआ अध्वर्यु एक काम से दो मतलब निकाल लेता है । एक ढेले में दो शिकार कर लेता है । एक तो उत्तरवेदी का आधार हो जाता है अर्थात् वाक् को आहुति मिल जाती है एवं दूसरे प्रशी: मिल जाता है— " तद्वातदेकं कुर्वन् द्वयं करोति - यदुत्तरवेदि व्याधारयति " । इसके अनन्तर उत्तरावेदी के चारों कोनों के बीच में जो जरा ऊँची वेदी होती है - उसके अग्नि कोण में ' सिसि स्वाहा ' बोलकर घृत डालते हैं— " अथ येषां मध्ये नाभिकेव भवति तस्यै ये पूर्वे स्रक्ती तयोर्या दक्षिणा " ॥१० ॥
" तस्यामाधारयति - सिंह्यसि स्वाहेति " । इसके बाद यह कहता हुआ वायव्य कोण में घृत डाल देता है-" सिंह्यस्यादित्यवनिः स्वाहा " । ( वा ० सं ० ५।१२ ) " अथापरयोरुत्तरस्याम् ( वायव्यादिगवस्थितायां संक्त्याम् ) सिंह्यस्यादि-त्यनिः स्वाहेति ” । [ ७६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण अग्निप्रणयन ब्राह्मण इसके बाद नैऋत कोरण में यह कह कर घृत डाल देते हैं-" सिंह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्रवनिः स्वाहा " ( वा ० सं ० ५।१२ ) याज्ञवल्क्य कहते हैं कि आशीर्वादात्मक जो यजुः मन्त्र हैं उनसे बहुत श्राशी: मांगी जा सकती हैं । उनमें से यह यजमान केवल ब्रह्म और क्षत्र इन दो वीयों की ही याञ्चा करता है । इन दो से बढ़कर और बचता ही क्या है? " था परयोर्दक्षिणस्यां ( नैर्ऋतकोणकोष्ठे ) सिंह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्र-निः स्वाहेति बह्वी वै यजुःष्वाशीः तद् ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्ते उभे वीर्य्ये " ॥११ ॥
" सिंह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहेति । ( वा ० सं ० ५।१२ ) इसके अनन्तर यह बोलता हुआ ईशान कोण में घृत डालता सुप्रजायनी से प्रजा की याञ्चा करता है । भूमा को अर्थात् संपत्ति - वृद्धि को रायस्पोष कहते हैं । रायस्पोषवनि से इसी संपत्ति वृद्धि की याञ्चा करता है ---" प्रथ वर्पूयोरुत्तरस्याम् ( ईशानस्त्रक्त्याम् ) सिंह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहेति तत् प्रजामाशास्ते यदाह सुप्रजावनिरिति रायस्पोष-वनिरिति भूमा वै रायस्पोषस्तद्भूमानमाशास्ते ” ॥१२ ॥
" सिंह्यस्यावह देवान् यजमानाय स्वाहा " । ( वा ० सं ० ५।१५ ) इसके बाद इस मन्त्र से उसके बीचों - बीच घृत डालता है । हे वाक् हे सिंही! आप यजमान के यज्ञ के लिए देवताओं को बुलाइए - ऐसे आपके लिए स्वाहा है-" तद्देवान् यजमानायावाहयति " । इसके अनन्तर ' भूतेभ्यस्त्वा ' ( वा ० सं ० ५। १२ ) यह बोलता हुआ - ऊँचा उठता है । प्रजा को ही भूत कहते हैं । आज मैं प्रजा के लिए - दिव्यात्मा प्रजनन के लिए तुम्हें उठा रहा हूँ - यही. ' भूतेभ्य-स्वा ' का तात्पर्य है ॥ १३ ॥
इसके बाद तीनों ओर तीन परिधियाँ रखता है । ये तीनों परिधियाँ उन्हीं एकता - द्विता - त्रिता के स्थान में समझनी चाहिए । पार्थिवाग्नि ध्रुव है अर्थात् निविड है । आन्तरिक्ष्य धर्त्र है - दिव्य - धरुण है अर्थात् तरल - विरल है । इनमें पहले पृथिवी स्थानीय मध्यम परिधि का स्थापन करते हुए मन्त्र बोलते हैं-र! अग्नि से रहती है-" ध्रुवक्षिस्यन्तरिक्षं दृह " । ( वा ० स ० ५।१३ ) पढ़ो प्रतएव इस पृथिवी को दृढ़ करो । पिण्ड पृथिवी की स्थिति इसी ध्रुव [ 501 ,
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तृतीय काण्ड ( ग्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण. अग्निप्रणयन ब्राह्मगा " ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षं दृह । " इससे दक्षिण भाग में परिधि रखते हैं । जो अविचल भाव से रहती है - उसका नाम ध्रुवक्षित् है । " अच्युतक्षिदसि दिवं दृह । " दूसरों से विचलित न होकर जो स्थिर रहती है उसका नाम ' प्रच्युतक्षित् ' है । इस प्रकार तीनों परिधियाँ लगा देते हैं । इसके बाद ' अग्नेः पुरीषमसि ' ( वा ० स ० ५।१३ ) यह कहते हुए ' गुलगुल और सुगन्धि - तेजन इन दोनों को उस वेदी पर रख देते हैं । वेदी में किसलिए संभार रक्खे जाते हैं - उसका कारण बतलाते हैं । जो अग्नि इनमें बँट गया था वह भी हमारे यज्ञ में शामिल हो जाए । अग्निदेव सर्वात्मना यज्ञ में शामिल हो जाएँ अतएव संभार रखे जाते हैं ॥ १४ ॥
पीतदारु नाम की जो गूलर है - वह अग्नि का शरीर है अतएव स यां वनस्पतिष्ववसत्तां पुतुद्रों ' ( तै ० सं ० ६ २८४ ) यह कहा जाता है । श्रग्नि से ही शरीर में बल रहता है एवं गूलर सबसे पीतदारु अधिक की वृष्य है अतएव कह सकते हैं कि वास्तव में यह अग्नि का शरीर है । तो यहाँ पर जो कि परिधियाँ होती हैं इनसे अध्वर्यु इस अग्नि को शरीर से ही समृद्ध करता है एवं इसे साङ्गोपाङ्ग बनाकर पूरा स्वरूप बनाता है ॥ १५ ॥
इस प्रकार शरीर तो इसका परिधि है एवं गुलगुल मांस है । इससे मांसाधान कर ' मांसकलता ' की जाती है ॥ १६ ॥
' गन्धवती पृथिवी ' यह सिद्धांत है । पृथिवी अग्नि का पिण्ड है अतएव मानना पड़ता है कि गन्ध अग्नि की वस्तु है । बस, जो गन्ध सुगन्धित तेजन में चला गया था उसे रख कर गन्ध के कार्य को दूर किया जाता है || १७ ॥ इस वेदी पर भेड़ के जो बाल रखे जाते हैं उसका कारण बतलाते हैं - ' अथ यद् वृष्णे: तुका भवति ' भेड़ के दोनों सींगों के बीच में अग्नि एक रात्रि रहा था अर्थात् सम्वतसराग्नि के अग्नि मात्रा प्राण अलग से भेड़ का मस्तक बना हुआ है अतएव इसमें सबसे अधिक बल रहता है । तो बस अग्नि की जो हो गई है, इसमें भी सबसे अधिक बल रहता है तो वह भी इसमें मिला दी जाए इसीलिए के भेड़ नजदीक के माथे के के बाल रखे जाते हैं । चूँकि अग्नि मस्तक में रहा था अतः जहाँ तक हो सके मस्तक ही बाल होने चाहिएँ परन्तु मेढ़े मस्तक से लड़ते बहुत हैं कहते के ही बाल ले लेने चाहिएँ । परिधियाँ क्यों लगाई जाती हैं इसका कारण बतलाते हुए याज्ञवल्क्य हैं-- अग्नि, वेदी से बाहर न निकल जाए अतएव परिधि लगाना अत्यन्त ही श्रावश्यक है । अतः वहाँ बाल न मिलें तो फिर अन्य स्थान
। इति अग्निप्रणयनं ब्राह्मणं समाप्तम् ।
॥ इति पञ्चमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
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पञ्चमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' यज्ञपुरुष ब्राह्मणम् ' [ मूल ] पुरुषो वै यज्ञः । पुरुषस्तेन यज्ञो यदेनं पुरुषस्तनुतएष वै ताय-मानो यावानेव पुरुषस्तावान्विधीयते तस्मात्पुरुषो यज्ञः ॥१ ॥
शिर एवास्य हविर्धानम् । वैष्णवं देवतयाथ यदस्मिन्त्सोमो भवति हविर्वै देवानां सोमस्तस्माद्धविर्धानं नाम ॥२ ॥
मुखमेवास्याहवनीयः । स यदाहवनीये जुहोति यथा मुखनासिञ्चे-देवं तत् ॥३ ॥
स्तुप एवास्य यूपः । बाहूएवास्याग्नीध्रीयश्च मार्जालीयश्च ॥ ४ ॥
उदरमेवास्य सदः । तस्मात्सदसि भक्षयन्ति यद्धीदं किञ्चानन्त्युदर s -एवेदं सर्वं प्रतितिष्ठत्यथ यदस्मिन्विश्वे देवाऽग्रसीदंस्तस्मात्सदो नाम त उडएवा-स्मिन्नेते ब्राह्मणा विश्वगोत्रा ः सीदन्ति ॥५ ॥
अथ यावेतौ जघनेनाग्नी । पादावेवास्यैतावेष वै तायमानो यावानेव पुरुषस्तावान्विधीयते तस्मात्पुरुषो यज्ञः ॥ ६ ॥
उभयतोद्वारं हविर्धानं भवति । उभयतोद्वारं सदस्तस्मादयं पुरुष आतं सन्तृपः प्रणिते हविर्धानेऽउपतिष्ठते ॥७ ॥
ते समववर्तयन्ति । दक्षिणेनैवं दक्षिणमुत्तरेणोत्तरं यद्वर्षीयस्तद्दक्षिणं स्यात् ॥८ ॥
तयोः समववृत्तयोः । छदिरधिनिदधति यदि छदिर्न विन्देश्छदिः सम्मितां भिति प्रत्यानह्यन्ति ररायां परिश्रयन्त्युछायीभ्यां छदिः पश्चादधिनिदधति छदिः सम्मितां वा भित्तिम् ॥९ ॥
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