Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 11–20
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या हिन्दी विज्ञान - भाष्य प्रारम्भ २४७ यज्ञ - स्वरूप यूप २८६ सू - यूप ही वैष्णव यूप २४७ ध्रुव द्वारा कदम्ब - विष्णु की परिक्रमा २८७ पार्थिवाग्नि से यज्ञ - स्वरूप की निष्पत्ति २४८ यूप का रशना से वेष्टन २८७ यूप के लिए वृक्ष- चयन २५० यो वृषा सृष्टि २८८ वा से वृक्ष - स्पर्श २५२ निगम - अनुगम भेदेन श्रुति २८८ यूप का शकट द्वारा आहरण २५३ अन्न का त्रिवृतत्व २८८ वज्र और यूप २५४ आप वायु औषधि एवं अन्न- गव्य व्यञ्जन २०६ कटे वृक्ष पर धृताहुति • २५६ भोज्य- लेा चोष्य भेदेन अन्न २८६ यूप के विभिन्न अरत्नि परिमारण २५७ सूर्य्य - यूप और काष्ठ - यूप २६० अपरिमित यूप २५६ अग्निष्ठ यूप २६१ अठपहलू यूप २५६ यूप' की सन्तान - यूपशकल २६१ यूपों की विभिन्न संख्याएँ २६१ अथ सप्तम अध्याय यूपशकल - रशना - चषालयुक्त यूप २६२ यूप एवं चार लोकों की कल्पना २६३ १- यूपनिधान ब्राह्मण --यूपनिधान ब्राह्मण ( मूल ) २६१ २ - यूपैकादशिनी ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण ( अनुवाद ) २६५ पैकादशिनी ब्राह्मण ( मूल ) २६६ हिन्दी विज्ञान - भाष्य प्रारम्भ २७३ यूपैकादशिनी ब्राह्मण ( अनुवाद ) ३०० षड्ग्रह ( वायु ) - परिक्रमा २७३ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ३०५ भृगु और अङ्गिरा २७३ पशु और यूप का अविनाभूतत्व ३०५ पारमेष्ठ्य हंस- वायु २७४ पुरुष -श्व- गौ से सूर्य का सम्बन्ध ३०६ द्युम्न, तेज, वर्च, ओज, भ्राज नामक पाँच प्रताप २७४ - अवि- गौ - श्व और वर्णव्यवस्था अज के ग्यारह विभाग और ग्यारह रुद्र ३०६ ३०७ परमेष्ठी के छह मनोता २७५ प्रग्निष्टोम में ११ पशुओं का प्रलम्भन ३०८ प्रेरणा, शरीर बल, दृष्टि - बल २७५ ११ सवनीय पशु ३०८ यूप के तीन प्रधान स्थान २७६ वेद की प्रतिष्ठा - वेदि ३०८ यूप की जड़ में कुशास्तरण २७८ वेद का प्रारम्भ और अन्तिम छोर ३१० अवट में घृताहुति २८० ग्यारह रुद्रों का स्वरूप ३१० मधु और त्रिलोकी २८१ ब्रह्मदन और प्रवर्ग्य ३१२ चषाल का स्वरूप २८२ अरण और प्रारण्य ३१३ चाल एवं यूप का परस्पर सम्बन्ध २८२ यूप स्थापन के दो मत ३१३ श्रग्निष्ठा का घृत वेष्टन २८३ यूप स्थापन का क्रम ३१५ परिव्ययण स्थान और घृत का वेष्टन २८३ यूप - स्थापन औरयूपकी नाप ३१६ [ 8 ] 1
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या पत्नीवत यूप स्थापन ३१७ यज्ञ का संभार संहार ३५४ बलाधान हेतु श्री देवता का यजन ३५५ ३- पशूपाकररण ब्राह्मण यज्ञ के चार कर्म ३५५ पशूपाकरण ब्राह्मण ( मूल ) ३१६ प्राण अपान एवं व्यान ३५६ पशूपाकरण ब्राह्मण ( अनुवाद ) ३२० मिताक प्राण ३५६ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ३२४ अग्निष्ठा यूप एवं स्थान ३५७ पशु - उच्छृंखलता और यूप ३२५ स्वरु एवं प्रदिति युपशकल ३५८ पशु का यूप से बन्धन ३२६ पग्निकररण कर्म ३५६ पशु के सामने तृण ( घास ) डालना ३२८ उल्मुकाग्नि से मांस - परिपाक ३५६ मांस - परिपाक विषयक विभिन्न मत ३६० ४- पशुसंज्ञपन ब्राह्मरण पञ्चावयव यज्ञ ३६१ यजमान का अन्वारम्भरण ३६२ पशुसंज्ञपन - ब्राह्मण ( मूल ) ३३१ पशुसंज्ञपन - ब्राह्मण ( अनुवाद ) ३३२ यज्ञ में मन - प्रारण वाक् का नियोग ३६३ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ३३६ ऋत्विक् वाक् ३६६ रज्जु एवं वरुण्या ३३७ पशु - आलम्भन के पूर्व बहि ( कुश - तृण ) अग्निषोम के लिए नियोग का आस्तरण ३६६ ३३८ यवमयी आप से प्रोषरण का महत्त्व ३३८ पशु - प्रलम्भन पूर्व के नियम ३६८ पूर्वाधार एवं उत्तराधार ३४० २- पशुवपा ब्राह्मरण यज्ञ का मस्तक- उत्तराधार ३४० श्राश्रावण - कर्म पशुवा ब्राह्मण ( मूल ) ३७१ ३४२ पशुवा ब्राह्मण ( अनुवाद ) ३७५ श्रथ अष्टम अध्याय हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ३८४ यज्ञ के पाक एवं वितान भेद ३८४ १ - प्राप्रीब्राह्मण यज्ञ में पत्नी का महत्त्व ३८५ पत्नी द्वारा पशु - इन्द्रियों का स्पर्श ३८८ आ ब्राह्मण ( मूल ) ३४५ पशुविशासन - कर्म ३८८ ब्राह्मण ( अनुवाद ) ३४७ उपविष्ट जल द्वारा पशु - सिञ्चन ३६१ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ३५२ पशु - सिवन का अभिप्राय ३६२ ग्यारह आनी पशु ३५३ पशु एवं असि के मध्य तृण - स्थापन ३६५ ऋतु एवं छन्द ३५३ हृदय का मेद - वपा ३६७ श्री प्राण एवं निरुक्तकार का मत ३५३ ३६७ आप्रियों का यजन ३५३ वनस्पतियों एवं प्रौषधियों के निर्माणक आत्मा, प्राण एवं वाक् ३५४ सूर्य - चन्द्र ३६८ [ १० ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या मेरुदण्ड का स्वरूप ३६८ अंकुर का प्रस्फुटन ३६६ पशु के प्रधान स्विष्टकृत् - उपयत् विभाग प्राण - देवताओं द्वारा सृष्टि निर्माण ४४१ ४४३ ऋत और सत्य ३६६ आकारात्मक एवं वर्णात्मक पदार्थ ४४३ शामित्रशाला ४०१. पञ्च पशुओं का आलम्भन ४४३ ४०१ मस्तक का निर्माण ४४४ आहवनीय में वपा का परिपाक ४०२ क्य ( मांस ) एवं मज्जा का निर्माण ४४४ वापर घृताहुति ४०५ पशु अधिष्ठाता पूषा प्राण ४४५. अग्नि एवं पर्जन्य द्वारा वृष्टि ४०६ बीज से अंकुर एवं वृक्ष का निर्माण ४४५ वर्षा का मूलाधार - वृक्ष ४०७ प्लक्ष या प्रख्य वृक्ष ४४६ प्रयाज एवं अनुयाज कर्म्म ४०८ विभिन्न वृक्षों के लिए शुभ दिशाएँ ४४६ प्रयाज के बारह भेद ४०८ अकृत्स्न पशु की कृत्स्नता ४४६ पाहोम के चार कर्म्म ४०६ जुहूमें रखे जाने वाले विभिन्न पृषदाज्याभिधारण ४०६ मांस- अवयव ४४७ वाभिधार ४११ उपभृत में रखे जाने वाले मांस अवयव ४४७ पाकी आहुति ४१३ पशु श्रवयव रखने के चार पात्र ४४७ मन एवं मनोता ४४८ ३ - पशुपुरोडाश ब्राह्मण जुहूमें अवयव रखने का क्रम ४४६ पशुपुरोडाश ब्राह्मण ( मूल ) ४१७ प्राणों के आधार पर योनि भेद ४४६ पशुपुरोडाश ब्राह्मण ( अनुवाद ) ४२१ हृदय का अवदान ४५० हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ४३१ जिह्वा अवदान ४५० निर्वाण एवं अनुनिर्वाप भेदेन आहुति द्रव्य ४३२ क्रोड ( भुजान्तर ) मांस का अवदान ४५० पा निर्वाण एवं अनुर्वाप ४३२ वामहस्त के मांस का अवदान ४५१ पशुयज्ञ में पुरोडाश का अनुनिर्वा ४३४ यकृत् श्रवदान ४५१ शमिता का कार्य्य ४३५ यकृत् के दो भेद ४५१ इडाप्राशन कर्म्म ४३५ दोनों वृक्कों का अवदान ४५१ शमिता द्वारा पशु श्रवयवों का त्रिधा पशु - गुदा के तीन खण्ड ४५१ विभाजन ४३६ दक्षिण हस्त एवं गुदा अवदान ४५२ त्रिवृत् - सत्य पदार्थ ४३८ पूषा - प्रारण का स्थान ४५३ हृदय - बल एवं मन ४३६ इडापात्री में अवदानों का निक्षेप ४५५ प्रज्ञानात्मा ४३६ हिरण्य - शकल एवं स्वर्ण टिकड़ी स्थापन ४५५ प्रज्ञा एवं प्राण ४४० यज्ञ - विद्या के आविष्कारक साध्य देव ४५७ पृषदात्म प्रारण ४४० असुरों द्वारा अवदान ४५६ प्रविनाभूत - प्रज्ञामन एवं प्राण ४४० अनुवाक्या एवं याज्या कर्म्म III [ ११ ]
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तपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या त्रिपदा गायत्री एवं उसके पद ४६० ५ -- उपयाज ब्राह्मण मनुष्य का जीवन - पृथिवी - रस ४६१ जीवन का कारण - द्युलोकस्थ रस ४६१ उपयाज ब्राह्मण ( मूल ) ५०१ त्रिपदा ' याज्य ऋकू ' ४६२ उपयाज ब्राह्मण ( अनुवाद ) ५०२ उदानत्य प्रजा ४६३ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ५०५ वनस्पति- रूपा यूप ४६४ स्नेह एवं तेज ५०६ दिक् - व्यापार ४६५ पारमेष्ठ्य श्रद्धा श्रापः श्रद्धा आप की पुरुषमें परिणति ५०७ ४- प्रयाजानुयाज ब्राह्मण गर्भ की प्रतिष्ठा - श्रग्नि ५०८ जघन- प्रदेश ५११ प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ( मूल ) II जाघनी के दो भाग ५११ प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ( अनुवाद ) ४७१ जाघनी के प्रान्तर भाग का अवदान ५११ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ४७६ हृदय - परिपाक - साधक हृदय - शूल ५१२ पशु - प्रारण का स्वरूप ४७७ अव्यय - अक्षर - क्षर - परात्पर समष्टि श्रात्मा ४७८ हृदय का शूल - वेधन ५१२ अन्तर्वेदी - बहिर्वेदी स्थित याज्ञिक ५१३ प्रयाज- अनुयाज पशु ४७६ हृदयशूल की स्थापना ५१४ ४५० उपयाज- पशु अग्नि भेदेन अनन्त प्रारण ४८० अथ नवम अध्याय मस्तक के सात प्रारण ४८० षडङ्ग वैश्वानरात्मा ४८१ १ - - पश्वेकादशिनी ब्राह्मण अध्यात्म के तेतीस प्रारण ४८१ प्राण का प्रधानत्व ४८३ पश्वेकादशिनी ब्राह्मण ( मूल ) ५१७ वाक् वषट्कार - मण्डल ४८४ पश्वेकादशिनी ब्राह्मण ( अनुवाद ) ५२० स्तोम्य त्रिलोकी एवं मानुष - त्रिलोकी ४८५ हिन्दी विज्ञान - भाष्य प्रारम्भ ५२६ प्रषदाज्य से अनुयाज उपयाज याग ४८६ प्राणों में परस्पर वैजात्य ५२६ प्रयाज- श्रनुयाज पशु ४८६ प्रजापति तत्त्व की व्यापकता ५२७ प्रजोत्पत्ति के साधक सात उपयाज ४६३ षोडशी प्रजापति ५२७ गर्भाधान एवं रिक्त गर्भाशय ४६४ आकाश ( वाक् ) के मर्त्य - अमृत भेद ५३० सविता - वायु एवं शिशु उत्पत्ति ४६५ वाक् सृष्टि ५३१ श्वास - प्रश्वास ४६६ मन - प्राण - वाक् से सृष्टि- निर्माण ५३२ छन्द के शब्द - अर्थ - भेद ४६७ प्रजापति द्वारा पशु - प्राणों का आदान ५३३ सूर्य - पृथिवी आकर्षण ४६८ प्रजापति द्वारा अर्चन एवं श्राम्यन ५३४ उत्पन्न प्रजा का सूर्य्य - पृथिवी आकर्षण पश्वेकादशिनी यजन ५३५ से सम्बन्ध ४६८ ग्यारह पशु - प्राणों के नाम ५३६ [ १२ ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय विषय सूची ( द्वितीय खण्ड ) पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या यज्ञ - निष्पादक ' अग्नि ' ५३७ यज्ञ के तीन कर्म ५८७ अर्णव सरस्वान् नभस्वान् समुद्र ५३७ यज्ञ - साधकत्वात् यज्ञ शकट ५६० आम्भृणी ( सरस्वती ) वाक् द्वारा शकट की दो ईषाएँ ५६० पानी की उत्पत्ति ५३६ मन - प्रारण वाक् से उत्पन्न - वैश्वानर-अर्थी एवं शाब्दी वाक् ५३६ तेजस प्राज्ञ ५६२ ज्ञान- क्रिया एवं अर्थ ५४० सोम - यज्ञ के दो फल ५६३ मारुत पशु का आलम्भन ५४३ भोक्ता एवं भोग्य - राजा एवं प्रजा ५६४ ऐन्द्राग्न पशु का आलम्भन ५.४४ पापवस्यस व्यवहार ५६४ सावित्र पशु का आलम्भन ५४४ होता एवं प्रध्वर्यु कृत अनुवाक्या-सविता - पशु का श्रालम्भन ५४५ याज्या कर्म्म ५६५ २ -- वसतीवरी ब्राह्मण प्रातरनुवाक कर्म ५६५ प्रातर्यावरण एवं यावानः देवता ५६६ वसतीवरी ब्राह्मण ( मूल ) ५४७ छन्दो देवता का समिन्धन ५६७ वसतीवरी ब्राह्मण ( अनुवाद ) III यातयाम छन्द ५६७ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ५५४ छन्दों का श्राप्यायन ५६७ सोमलताओं का कुट्टन ५५४ ' शस्त्र - स्तोत्र - ग्रह ' देवकर्म्म ५६८ हयग्रीवावतार कथा ५५५ अभिगर और प्रतिगर ५६८ प्रतिष्ठा - तत्त्व ब्रह्मा ५५६ वसतीवरी, एकधना एवं निग्राभ्या विक्षेपण शक्ति इन्द्र ५५६ नामक जल ६०१ अशनाया शक्ति - विष्णु ५५६ देव - संपत्ति के लिए १७ अक्षरों का प्रयोग ५५७ प्रचरणी - होम कर्म्म ६०३ ध्रुव - अग्नि शब्द और अर्थ - उभयविध सृष्टि की ५५६ यज्ञ - रस ५६१ जननी श्रम्भृणी वाक् ६०४ भाई के साथ चुटकी बजाने का रहस्य ६०४ यज्ञ - स्वरूप रक्षक यज्ञ - रस ५६१ देवताओं का हवि यज्ञ रस पाँचों पिण्डों के भिन्न - भिन्न पाँच प्राण ६०६ ५६५ विकलन एवं संयोगधर्म्मा-सूर्यास्थ से पूर्व वसतीवरी जल का ग्रहण ५६६ अग्नि और पानी ६०७ सात यजुः मन्त्र ५७१ शक्री छन्द सृष्टि निर्माता प्राण के दो भेद ६०८ ५७२ अपांनपात् पानी ६११ ३- - सुत्या ब्राह्मण पानी की तीन गतियाँ ६१२ सुत्या ब्राह्मण ( मूल ) ५७३ यौगिक और मौलिक तत्त्व ६१२ सुत्या ब्राह्मण ( अनुवाद ) ५७८ पान्नेजन पानी ६१४ हिन्दी विज्ञान - भाष्य प्रारम्भ ५८७ मैत्रावरुण चमस से पानी का ग्रहण ६१५ [ १३ ]
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय विषय - सूची ( द्वितीय खण्ड ) पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या ज्योतिष्टोम यज्ञ के सात भेद ६१८ सुतसोम के आठ भेदों द्वारा पुरुष के ४- श्रधिषवण ब्राह्मण आठ अवयवों का निर्माण ६४७ परमेष्ठी के दो मनोता.. ६५१ विवरण ब्राह्मण ( मूल ) ६२३ निरायतन - सोम ( दिक् - सोम ) ६५२ धिषवण ब्राह्मण ( अनुवाद ) ६२७ ऋतसोम ६५२ हिन्दी विज्ञान भाष्य प्रारम्भ ६३५ बृहस्पति साम ६५३ सुवर्ण एवं सुवर्णभस्म ६३७ वृत्रासुर ६५५ सरस्वान् समुद्र ६३८ वृषभ - इन्द्र का विक्षेपाक्रमण ६५७ वृत्र सोम ६३६ ६५८ नासत्य और दस्र देवता ६४० इन्द्र द्वारा निग्राभ्या पानी का ग्रहण ६६१ वज्र रूप ग्रावा ६४१ निग्राभ्या से सोम - सेचन ६६२ सत्या - आम्भृणी - सौरी अनुष्टुप् वाक् ६४३ सोमाभिषव एवं विराट् छन्द ६६५ उपांशुग्रह - या ६४५ निम्राभ्योपायन द्वारा यज्ञ में उपांशु सवन एवं व्यान ६४६ सोम का ग्रहण ६६६ उपांशु सवन पर सोम मापन ६४७ योषा से प्रजा उत्पत्ति ६६६ [ १४ ]
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१ - ऋग्वेद संहिता २ - शुक्ल यजुर्वेद संहिता ३ - सामवेद संहिता ४- अथर्ववेद संहिता ग्रन्थ में उद्धृत सन्दर्भ ग्रन्थ - सूची ५- कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीय संहिता ६- कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीय संहिता ७- वाजसनेयी संहिता ८- ईशावास्योपनिषत् E- कठोपनिषत् १०- कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषत् ११ - छान्दोग्योपनिषत् १२- तैत्तिरीयोपनिषत् १३ - नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषत् १४- प्रश्नोपनिषत् १५ - बृहदारण्यकोपनिषत् १६- महानारायणोपनिषत् [ वैदिक यन्त्रालय, अजमेर में मुद्रित संस्करण संवत् १ ९ ५७ वि ० ] [ निर्णयसागर मुद्रण यन्त्रालय में मुद्रित संस्करण सन् १ ९ २६ ई ० ] [ प्रकाशक - श्री वसंत श्रीपाद सातवलेकर, संवत् २०२० वि ० ] [ वैदिक यन्त्रालय, अजमेर में मुद्रित संस्करण संवत् १ ९ ५७ वि ० ] [ भट्टभास्कर एवं श्री सायण भाष्य समेत - वैदिक संशोधन मण्डल पूना, द्वारा प्रकाशित-सन् १ ९ ७० ई ० ] [ श्री वसंत श्रीपाद सातवलेकर द्वारा प्रकाशित-भारत मुद्रणालय, स्वाध्याय मण्डल द्वारा मुद्रित-संस्करण संवत् २०१३ वि ० ] [ ' उपनिषत् - संग्रह ' - प्रकाशक - मोतीलाल बनारसीदास संस्करण - सन् १ ९ ७० ई ० ] 37 31 17 " 1 " 11 11 11 " " " 7 11 } } 31 } } १७- मुण्डकोपनिषत् १८- मैत्रायण्युपनिषत् १६ - रामपूर्वतापिन्युपनिषत् [ १५ ] } } " " 13 11
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) २०- ऐतरेयारण्यक २१- तैत्तरीय आरण्यक २२- ऐतरेय ब्राह्मण २३- कौषीतकी ब्राह्मण २४ - गोपथ ब्राह्मण २५- ताण्ड्य महाब्राह्मरण २६ - कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय ब्राह्मरण २७- माध्यन्दिन शतपथब्राह्मण २८ - शुक्लयजुर्वेद शतपथब्राह्मण माध्यन्दिनी शाखा २६- महाभारत ३०- गीता ३१ - मनुस्मृति ३२- कात्यायन श्रौत सूत्र ३३- सांख्य कारिका ३४ यास्क कृत निरुक्त सन्दर्भ ग्रन्थ सूची ( द्वितीय खण्ड ) [ श्री सायणाचार्य्यं भाष्य समेत - प्रानन्दाश्रम मुद्रणा-लय में मुद्रित संस्करण सन् १८६८ ई ० ] [ श्री सायणाचार्य भाष्य समेत बॅप्टिष्ट मिशन मुद्रणालय, कलकत्ता द्वारा मुद्रित सन् १८७१ ई ० ] [ श्री सायणाचार्य्यं भाष्य समेत - श्रानन्दाश्रम मुद्रणा-लय में मुद्रित, संस्करण सन् १८ ९ ६ ई ० ] [ प्रकाशक- एसियाटिक सोसाइटी बंगाल, कलकत्ता, संस्करण सन् १८७२ ई ० ] [ श्री सायणाचार्य भाष्य समेत, चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, बनारस, संस्करण संवत् १ ९ ६१ वि ० ] [ श्री सायणाचार्य्यं भाष्य समेत - श्रानन्दाश्रम मुद्रणा-लय में मुद्रित, संस्करण सन् १८६८ ई ० ] [ श्री सायणाचार्य्यं भाष्य समेत, गंगाविष्णु श्री कृष्ण-दास, लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस, कल्याण, बम्बई मुद्रित संस्करण सन् १ ९ ४० ई ० ] [ श्री सायणाचार्य्यं भाष्य एवं डॉ अल्बेर्तेन वेबेरेरण शोधित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, ग्राफिस, वारा-णसी, विद्या विलास मुद्रणालय में मुद्रित संस्करण सन् १ ९ ६४ ई ० ] [ गणपत कृष्णजी यन्त्रालय, बम्बई में मुद्रित शकाब्दाः १७८५ [ गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा मुद्रित संस्करण ] मणिलाल इच्छाराम देशाई, गुजराती मुद्रणालय द्वारा मुद्रित संस्करण सन् १ ९ १३ ई ० ] [ डॉ ० अल्बेर्तेन वेबेरेण द्वारा शोधित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज श्राफिस, वारासणी, संस्करण सन् १ ९ ७० ई ० ] [ निघण्टु पाठ सहित प्रकाशक - क्षेमराज - श्रीकृष्णदास श्रेष्ठिना बम्बई, श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्ररण यन्त्रा-लय में मुद्रित संस्करण संवत् १६६६ वि ० ] [ १६ ]
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अथ पञ्चमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' वेदिनिर्माण ब्राह्मणम् ' [ भूल ] तद्य एष पूर्वार्ध्या वर्षिष्ठः स्थणाराजो भवति । तस्मात्प्राङ्घ्रका-मति त्रीन्विक्रमांस्तच्छङ्कं निहन्ति सोऽन्तः पतिः || १ || तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । दक्षिणा पञ्चदश विक्रमान्प्रक्रामति तच्छङ्कं निहन्ति सा दक्षिणा श्रोणिः ॥ २ ॥
तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । उदपञ्चदश विक्रमान्प्रक्रामति तच्छङ्कं निह-न्ति सोत्तरा श्रोणिः || ३ || तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । प्राङ्क्षत्रिशतं विक्रमान्प्रक्रामति तच्छकु निहन्ति स पूर्वार्धः ॥ ४ ॥ 1
तस्मान्मध्यमाच्छङ्को: । दक्षिणा द्वादश विक्रमान्प्रक्रामति तच्छङ्कं निहन्ति स दक्षिणोऽसः ॥ ५ ॥
तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । उदद्वादश विक्रमान्प्रक्रामति तच्छङ्कं निहन्ति स उत्तरोंस एषा मात्रा वेदेः ॥ ६ ॥
अथ यत्त्रिंशद्विक्रमा पश्चाद्भवति । त्रिशदक्षरा वै विराड़ विराजा वै देवा अमिलोके प्रत्यतिष्ठस्तथोऽएवैष एतद्विराजैवास्मिलोके प्रतितिष्ठति ॥७ ॥
ortsoft त्रयस्त्रिशत्स्युः । त्रयस्त्रिंशदक्षरा वै विराट् तद् विराजैवास्मि-लोके प्रतितिष्ठति ॥८ ॥
अथ यत् द्विकमा प्राची भवति । षत्रिंशदक्षरा वै बृहती बृहत्या वै देवाः स्वर्गं लोकं समाश्नुवत तथोऽएवैष एतद् बृहत्यैव स्वर्गं लोकं समश्नुते सो s स्य दिव्याहवनीयो भवति ॥ ९ ॥
[ १ }
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मरण वेदिनिर्माण ब्राह्मण अथ यच्चतुर्विंशतिविक्रमा पुरस्ताद्भवति । चतुर्विंशत्यक्षरा वै गायत्री पूर्वार्धो वै यज्ञस्य गायत्री पूर्वार्ध एष यज्ञस्य तस्माच्चतुर्विंशतिविक्रमा पुरस्ताद्भ-वत्येषा मात्रा वेदेः ॥ १० ॥
अथ यत्पश्चाद्वरीयसी भवति । पश्चाद्वरीयसी पृथुश्रोणिरिति वै योषां प्रशंसन्ति यद्वेव पश्चाद्वरीयसी भवति पश्चादेवैतद्वरीयः प्रजननं करोति तस्मा-पश्वाद्वयसः प्रजननादिमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥११ ॥
नासिका ह वाएषा यज्ञस्य यदुत्तरवेदिः । अथ यदेनामुत्तरां वेदेरुप कि-रति तस्मादुत्तरवेदिर्नाम ॥१२ ॥
यो ह वा ss दम प्रजा आसुः । आदित्याश्चैवाङ्गिरसश्च ततोऽङ्गिरसः पूर्वे यज्ञं समभस्ते यज्ञं सम्भृत्योचुरग्निमिमां नः श्वः सुत्यामावित्येभ्यः प्रब्रूह्यनेन नो यज्ञेन याजयतेति ॥ १३ ॥
तेहादित्या ऊचुः । उपजानीत यथा वा s स्मानेवाङ्गिरसो याजयान्न वयमङ्गिरस इति ॥१४ ॥
ते होचुः । न वाऽन्येन यज्ञादपक्रमरण मस्त्यन्तरामेव सुत्यां प्रियामहाड-इति ते यज्ञं सञ्जह्नुस्ते यज्ञं सम्भृत्योचुः श्वः सुत्यां वै त्वमस्मभ्यमग्ने प्रावोचोऽथ वयमद्य सुत्यमेव तुभ्यं प्रब्रूमोऽङ्गिरोभ्यश्च तेषां नस्त्वं होतासीति ॥१५ ॥
तेऽन्यमेव प्रतिप्रजिघ्यु: । अङ्गिरसोऽच्छ ते हाप्यङ्गिरसोऽग्नयेऽन्वागत्य चुकुधुरिव कथं नु वो इतश्वरन्न प्रत्यास्था इति ॥ १६ ॥
स होवाच । अनन्या वै मावृबत सोऽनिन्धैर्वृतो नाशकमपक्रमितुमिति तस्मादु हानिन्द्यस्य वृतो नापक्रामेत्तएतेन सद्यः क्रियाऽङ्गिरस श्रादित्यानयाजयन्त्स सद्यःकीः || १७ || तेभ्यो वाच दक्षिणामानयन् । तां न प्रत्यगृह्णन्हास्यामहे यदि प्रतिग्रही-व्याम इति तदु तद्यज्ञस्य कर्म न व्यमुच्यत यद्दाक्षिणमासीत् || १८ || ! २ ]