Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 21–30
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणे अर्थभ्यः सूर्य दक्षिणामानयत् तं प्रत्यगृहांस्तस्मादु ह स्माहुरङ्गिरसो वयं वा s त्विजीनाः स्मो वयं दक्षिणीया अपि वाऽस्माभिरेष प्रतिगृहीतो य एष तपतीति तस्मात्सद्यः क्रियोऽश्वः श्वेतो दक्षिणा ॥ १ ९ ॥ तस्य रुक्मः पुरस्ताद्भवति । तदेतस्य रूपं क्रियते य एष तपति यद्यश्वं श्वेतं न विन्देदपि गौरेव श्वेतः स्यात्तस्य रुक्मः पुरस्ताद्भवति तदेतस्य रूपं क्रियते य एष तपति ॥ २० ॥
तेभ्यो ह वाक् चुक्रोध । केन मदेष श्रेयान्बन्धुना ३ केना ३ यदेतं प्रत्यग्र-हीष्ट न मामिति सा हैभ्योऽपचक्राम सोभयानन्तरेण देवासुरान्त्संयत्तान्त्सिं ही भूत्वाददाना चचार तामुपैव देवा अमन्त्रयन्तोपासुरा अग्निरेव देवानां दूत आस सहरक्षा इत्यसुररक्षसामसुराणाम् ॥ २१ ॥
सा देवानुपावर्त्यन्त्युवाच । यद्व उपावर्तेय किं मे ततः स्यादिति पूर्वा-मेव त्वाग्नेराहुति: प्राप्स्यतीत्यथ हैषा देवानुवाच यां मया काञ्चाशिषमाशा-सिष्यध्वे सा वः सर्वा समधिष्यतइति सवं देवानुपाववर्त || २२ || सद्धार्यमाणेऽग्नौ । उत्तरवेदि व्याघारयति यदेवैनामदो देवा अब्रु-वन्पूर्वां त्वाग्नेराहुतिः प्राप्स्यतीति तदेवैनामेतत्पूर्वामग्नेराहुतिः प्राप्नोति वाग्ध्येषा निदानेनाथ यदुत्तरवेदिमुपकिरति यज्ञस्यैव सर्वत्वाय वाग्धि यज्ञो वागु ह्येषा ॥२३ ॥
तां वै युगशस्येन विमिमीते । युगेन यत्र हरन्ति शम्यया यतो हरन्ति युगशम्येन वै योग्यं युञ्जन्ति सा यदेवादः सिंही भूत्वा शान्तेवाचरत्तदेवैनामे-तद्यज्ञे युनक्ति ॥ २४ ॥
तस्मान्निवृत्तदक्षिणां न प्रतिगृह्णीयात् सिंही हैनं भूत्वा क्षिणोति नो हामा कुर्वीत सिंह हैवैनं भूत्वा क्षिणोति नो हान्यस्मै दद्याद्यज्ञं तदन्यत्रात्मनः कुर्वीत तस्माद्यो ऽस्यापि पाप इव समानबन्धुः स्यात्तस्माऽएनां दद्यात्स यद्दाति तदेनं सिंही भूत्वा न क्षिणोति यदु समानबन्धवे ददाति तदु नान्यत्रात्मनः कुरुत seat निवृत्तदक्षिणायै प्रतिष्ठा ॥ २५ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण. वेदिनिर्माण ब्राह्मण अथ शम्याञ्च स्पयञ्चादत्ते । तद्य एष पूर्वार्ध्य उत्तरार्ध्यः शङ्कुर्भवति तस्मात्प्रत्यप्रक्रामति त्रीन्विक्रमांस्तच्चात्वालं परिलिखति सा चात्वालस्य मात्रा नात्र मात्रास्ति यत्रैव स्वयं मनसा मन्येताग्रेगोत्करं तच्चात्वालं परिलिखेत् ॥२६ ॥
स वेद्यन्तात् । उदीचीं शम्यां निदधाति स परिलिखति तप्तायनी मे सीतीमामेवैतदाहास्यां हि तप्त एति ॥ २७ ॥
अथ पुरस्तात् । उदीचीं शम्यां निदधाति स परिलिखति वित्तायनो मे sita मामेवैतदाहास्यां हि विविदान एति ॥२८ ॥।
अथानुवेद्यन्तम् । प्राचीं शम्यां निदधाति स परिलिखत्यवतान्मा नाथि-तादितमामेवैतदाह यत्र नाथै तन्मावतादिति ॥ २ ९ ॥ अथोत्तरतः । प्राचीं शम्यां निदधाति स परिलिखत्यवतान्मा व्यथिता-दितमामेवैतदाह यत्र व्यथै तन्मावतादिति ॥ ३० ॥
अथ हरति । यत्र हरति तदग्नीदुपसीदति स वा अग्नीनामेव नामानि गृहहरति यान्वाऽश्रमन्देवा अग्नीन्होत्राय प्रावृरणत ते प्राधन्वंस्तऽइमा एव पृथिवीरुपासर्पनिमा महैव द्वेऽस्याः परे तेनैवैतन्निदानेन हरति ॥३१ ॥
स प्रहरति । निदेदग्निर्नभो नामाग्नेऽङ्गिर आयुना नाम्नेहीति स यत्प्राधन्वंस्तदायुर्दधाति तत्समीरयति योऽस्यां पृथिव्यामसीति योऽस्यां पृथिव्या-मसीति हृत्वा निदधाति यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वादधऽइति यत्तेनाधृष्टं रक्षोभिर्नाम यज्ञियं तेन त्वादधइत्येवैतदाहानु त्वा देववीतयऽइति चतुर्थं हरति देवेभ्यस्त्वाजुष्टां हरामीत्येवैतदाह तां वै चतुः स्रक्तेश्चात्वालाद्धरति चतस्रो वै दिशः सर्वाभ्य एवैनामेतद्दिग्भ्यो हरति ॥ ३२ ॥।
प्रथा व्यूहति । सिंह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्वेति सा यदेवादः सिंही भूत्वा शान्तेवाचरतदेवैनामेतदाह सिंह्यसीति सपत्नसाहीति त्वया वयं सप-नान्पापीयसः क्रियास्मेत्येवैतदाह देवेभ्यः कल्पस्वेति योषा वाऽउत्तरवेदिस्तामे-वैतद्देवेभ्यः कल्पयति ॥३३ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण तां वै युगमात्र वा सर्वतः करोति । यजमानस्य वा दशदश पदानि दशाक्षरा वै विराड्वाग्वै विराड्वाग्यज्ञो मध्ये नाभिकामिव करोति समानत्रा-सीनो व्याघारयाणीति ॥ ३४ ॥
तामद्भिरभ्युक्षति । सा यदेवादः सिंही भूत्वा शान्तेवाचरच्छान्तिरा-पस्तामद्भिः शमयति योषा वाऽउत्तरवेदिस्तामेवैतद्देवेभ्यो हिन्वति तस्मादद्भिर-भ्युक्षति || ३५ || सोऽभ्युक्षति । सिंह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्वेत्यथ सिकताभि-रविकिरत्यलंकारो न्वेव सिकता भ्राजन्त इव हि सिकता अग्नेर्वा एतद्वैश्वा नरस्य भस्म यत्सिकता अग्नि वा अस्यामाधास्यन्भवति तथो हैनामग्निर्न हिनस्ति तस्मात्सिकताभिरनुविकिरति सोऽनुविकिरति सिंह्यसि सपत्नसाही वेवेभ्यः शुम्भस्वेत्यथैनां छादयति सा छन्नैतां रात्रि वसति ॥३६ ॥
[ अनुवाद ] - संसार के घट, पट, मठ, पुस्तक आदि जो भी पदार्थ उपलब्ध होते हैं वे सब ऋग्यजुः सामात्मक वेदत्रयीरूप हैं । वेदत्रयी के बिना वस्तु की उपलब्धि ही नहीं होती । यह सूर्य्यं वेदत्रयीरूप है । सूर्य्यबिम्ब ऋग्रूप है । इसका प्रकाशमण्डल सामरूप है तथा सूर्य के केन्द्र में जो आग्नेय मनःप्रारणवाङ्मय प्रजापति है वह प्रजापति पुरुष ही यजुः है । इसीलिए सूर्य के लिए ' सैषात्रयी विद्या तपति ' यह कहा जाता है । सूर्य्य में जो वेदत्रयी है उसको गायत्री मात्रिक वेद कहते हैं । यह गायत्रीमात्रिक सौर वेद ही पृथिवी में ना कर यज्ञमात्रिक वेद कहलाता है । पार्थिव यज्ञमात्रिक वेदत्रयी की प्रतिष्ठा यह पृथिवी है । संसार के यावन्मात्र पदार्थ वेदत्रयीरूप हैं । अर्थात् घट - पटाद्याकाराकारित सूर्यरश्मियाँ ही हमारे नेत्रों पर आ कर घटपटादि रूप से उपलब्ध होती हैं । अतः उपलब्धि वेद की ही होती है । सारे पदार्थ वेदत्रयीरूप हैं किन्तु उन की प्रतिष्ठा घटपटादिरूप पृथिवी ही है । जिस पर हम स्थित हैं उसी का नाम पृथिवी नहीं किन्तु यावन्मात्र पदार्थ पृथिवी हैं । वेद की प्रतिष्ठा ही वेदी है । यज्ञ करने के लिए अर्थात् वेद को प्रतिष्ठित करने के लिए वेदी का निर्माण किया जाता है । इस वेदिका का निर्माण किस प्रकार किया जाता है, इसी प्रक्रिया का निरूपण इस वेदब्राह्मण में किया जा रहा है-मनुष्य जो * हविर्यज्ञ या महायज्ञ आदि करता है, वह प्रकृति यज्ञ के अनुकरण पर ही करता है अन्यथा यज्ञ का स्वरूप ही नष्ट हो जाय । वह व्यृद्ध अर्थात् ऋद्धिरहित * दर्शपूर्णमास का नाम हविर्यज्ञ है जिस में पुरोडाश की प्राहुति दी जाती है । • सोमयज्ञ का नाम महायज्ञ है जिसमें ग्रहसोम की आहुति दी जाती है । [ ५ 1
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं हो जायगा । प्राकृतिक यज्ञ का तथा उसमें हविर्वेदी महावेदी का निरूपण संक्षेप से हिन्दी विज्ञानभाष्य में किया गया है । अतः पुनरुक्तिदोष से बचने के लिए यहाँ प्राकृतिक यज्ञ की नकल पर मनुष्य कृत वैधयज्ञ में वेदिका का निर्मारण कैसे होता है उसी का यहाँ प्रतिपादन किया जा रहा है । हर्वेिदी के लिए एक महाशाला बनाई जाती है जो कि छप्पर की होती है । उस महाशाला के भीतर आहवनीयाग्नि के पास आहवनीयागार ( कमरा ) बनाया जाता है एवं गार्हपत्यानि के पास गार्हपत्यागार बनाया जाता है । महाशाला के मध्य एक बड़ा वंश ( बाँस ) होता है जिसे प्राचीनवंश कहते हैं । इस प्राचीनवंश को दोनों ओर दो बड़े - बड़े थूणे लगाये जाते है और मध्य में छोटी - छोटी थूणियाँ लगाई जाती हैं । इस शाला के पूर्वभाग व पश्चिमभाग के दो थूण सब से बड़े होते हैं । अतः उन्हें वर्षिष्ठ ( बड़े ) होने से स्थूणराज कहा जाता है । एक स्थूण शाला के पूर्वभाग में होता है जहाँ कि हविर्वेदी का ग्राहवनीय होता है । दूसरा पश्चिमभाग में होता है जहाँ कि हविर्वेदी का गार्हपत्य होता है । इन में छप्पर के मध्य के प्राचीनवंश के पूर्वभाग में ग्राहवनीय के पुरोदेश में वर्तमान जो विशाल स्तम्भ ( स्थूगराज ) है उससे अध्वर्यु पूर्व की ओर तीन प्रक्रम करता है । सामान्यतया एक कदम १२ अंगुल का होता है उसी का यहाँ ग्रहरण है । दो पदों या कदमों का एक प्रक्रम होता है अतः वह २४ अंगुल का होता है । अध्वर्यु प्राचीनवंश के पूर्व भाग में व ग्राहवनीय के पुरोदश में वर्तमान पृथु स्तम्भ से तीन प्रक्रम करता है । तीन प्रक्रम में ७२ अंगुल प्रदेश होता है । उसके अन्त में वह शङ्कु ( कीला ) गाड़ देता है । यही ७२ अंगुल का प्रदेश ववेदी तथा महावेदी के अन्तरकाल का प्रदेश है ॥ १ ॥
वेदी पर वेद प्रतिष्ठित रहता है । वेदी वेद पुरुष की स्त्री है । अतः स्त्री के आकार ही वेदी का निर्माण किया जाता है । इसके बाद प्रध्वर्यु उस मध्यम शकु से दक्षिण की ओर १५ प्रक्रम करता है और वहाँ कीला गाड़ देता है । यह उस वेदी की दक्षिण श्रोणि ( नितम्ब ) है || २ || इसी प्रकार मध्यम शङ्कु से उत्तर की तरफ श्रध्वर्यु १५ प्रक्रम कर वहाँ शङ्कु गाड़ देता है । यह उस वेदी का उत्तर श्रोणि ( नितम्ब ) हैं ॥ ३ ॥
उसी मध्यम शङ्कु से अध्वर्यु पूर्व की ओर ३६ प्रक्रम ( ७२ कदम ) करता है और
वहाँ शकु गाड़ देता है । यही इस वेदि का पूर्वार्ध है ॥ ४ ॥
तत् पश्चात् उसी मध्यम शङ्कु से अध्वर्यु दक्षिण की ओर १२ प्रक्रम करता है और
वहाँ शकु गाड़ देता है । यह इस वेदी का दक्षिण स्कन्ध है ॥ ५ ॥
इसी प्रकार इसी मध्यम शङ्कु से उत्तर की तरफ १२ विक्रम करता है और वहाँ
कु गाड़ देता है । यही वेदि का उत्तर स्कन्ध है । यही वेदी का परिमाप है ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण वेदी का पश्चात् भाग मध्यम शङ्कु से १५ प्रक्रम दक्षिण व १५ प्रक्रम उत्तर इस प्रकार ३० प्रक्रम का होता है क्योंकि बिराट् छन्द तीस अक्षरों का होता है । विराट् छन्द से ही देवता इस लोक में प्रतिष्ठित हुए थे । उसी प्रकार ३० प्रक्रमों के द्वारा त्रिशिनी विराट् सम्पत्ति का निर्माण हो जाता है और इस विराट् के द्वारा यजमान इस लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है || ७ || “ दशाक्षरा वै विराट् " इस ब्राह्मरण श्रुति के द्वारा विराट् छन्द को दशाक्षर चरणयुक्त बतलाया गया है । प्रस्तुत कण्डिका में विराट् को ३३ अक्षर वाला बतलाया है । क्योंकि ' न वा एकेनाक्षरे छन्दांसि वियन्ति ( ऐ. ब्रा. १।१।६ ) इस ऐतरेय श्रुति के अनुसार, एक अक्षर की न्यूनता व अधिकतर से छन्द की हानि नहीं होती है । अतः इन अक्षरों के द्वारा भी विराट् सम्पत्ति की प्राप्ति हो जाती है ॥ ८ ॥
विषुव वृत्त से २४ अंश दक्षिण का तथा २४ अंश उत्तर का जो परिसर है उसे कान्तिवृत्त कहा जाता है । पृथिवी अपने इस क्रान्तिवृत्त पर बृहती छन्द पर स्थित सूर्य की परिक्रमा करती है । बृहती ३६ अक्षर का होता है । एक - एक अक्षर १० अक्षरों की समष्टिरूप है | अतः बृहती छन्द पर स्थित सूर्य की परिक्रमा पृथिवी ३६० दिन में कर लेती है । जो सौर प्रारण प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी में आ गया था वह इस परिक्रमा द्वारा ३६० दिनों में अर्थात् एक संवत्सर में सूर्य में जाकर मिल जाता है । यही पार्थिव देवतानों का सूर्य अर्थात् द्युलोक में मिल जाना है अथवा स्वर्ग प्राप्ति है । उसी प्राकृतिक यज्ञ की नकल पर ३६ विक्रम की वेदी इस वैध यज्ञ ( मानुषयज्ञ ) में बनाई जाती है । जिस प्रकार देवताओं का आहवनीय सूर्य होता है उसी प्रकार ३६ वें विक्रम के पास उत्तर वेदी के मध्य में इस यजमान का दिव्य ग्राहवनीय है । यजमान की आत्मा का स्वर्ग से सम्बन्ध करने के लिए ही वेदी का पूर्वभाग ३६ विक्रम का बनाया जाता है ॥ ॥ प्राचीन दिशा में स्थित वेदी का दक्षिण व उत्तर स्कन्ध मध्यम शङ्कु से १२, १२ विक्रम मिल कर वह भाग २४ विक्रम का हो जाता है । इस का वैज्ञानिक रहस्य यह है कि पृथिवी केन्द्र से निकल कर पार्थिवाग्नि रूप संवत्सराग्नि २१ वें अहर्गण तक वितत रहता है । उससे ऊपर रहने वाले पारमेष्ठ्य सोम की प्राहुति होती रहती है । संवत्सराग्नि यज्ञ है । यज्ञ का प्रारम्भ त्रिवृत् स्तोम गायत्री छन्दात्मक है । गायत्री छन्द में २४ अक्षर होते हैं । क्यों कि पार्थिवाग्नि को ही गायत्री कह जाता है और उस में पारमेष्ठ्य सोमरूप चन्द्रमा का सम्बन्ध होता है । यह संवत्सराग्नि दशमासात्मक है । इस अग्नि में सोमात्मक चन्द्रमा का सम्बन्ध होता है । उसके उद्ग्राभ व निग्राभ से १ मास शुक्ल कृष्ण भेद से दो भागों में विभक्त हो जाता है और द्वादशमा-सात्मक संवत्सराग्नि २४ भागों में विभक्त हो जाती है । इस प्रकार पार्थिवाग्नि रूप गायत्री २४ अक्षरात्मक हो जाती है । गायत्री छन्द ही पार्थिवाग्नि रूप यज्ञ का प्रारम्भ है | अतः वेदी का पूर्वार्ध २४ विक्रम का बनाया जाता है ॥१० ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं वेदका पश्चिमार्द्ध भाग पूर्वार्ध भाग की अपेक्षा विशाल अर्थात् स्थूल होता है । क्यों कि वेदीरूप स्त्री का पश्चिमार्ध भाग श्रोणि ( नितम्ब ) रूप है इसलिए लोक में योषा ( स्त्री ) वही अच्छी मानी जाती है जिसका श्रोणि ( नितम्ब ) भाग स्थूल होता है । वेदी का भी पश्चिमा भाग श्रोणि रूप है अतः उसे पूर्वार्ध की अपेक्षा पृथु ही बनाया जाता है । अथवा निम्नलिखित कारण से भी वेदि के पश्चिम भाग को विशाल बनाया जाता है क्यों कि वेदी का पश्चिमार्ध भाग प्रजनन शक्ति युक्त है ॥११ ॥
यज्ञाङ्ग वेदी की जो उत्तर वेदी है वही वेदी का नासिका भाग है । नासिका भाग मुखप्रदेश में प्रांख, कान आदि से भी अधिक उन्नत होता है । इसलिए समाज में अग्रणी पुरुष को समाज की नाक कहा जाता है । अतः सोमयागी वेदी की नासिका स्थानीय उत्तर वेदीको अधिक उन्नत बनाया जाता है । सोमयाग के पूर्वावयवभूत प्रदेश अधिक उन्नत होने के कारण उत्तर वेदी नाम से कहा जाता है । यह उत्तरा वेदी महावेदी के पूर्व भाग में है अर्थात् मस्तक भाग में है । इसी में श्राहवनीय होता है, जिसमें देवताओं को आहुति दी जाती है । उत्तर वेदी को कुछ मिट्टी लगा कर महावेदी की अपेक्षा ऊँची बनाते हैं । इसलिए भी इसे उत्तरावेदी कहा जाता है ॥१२ ॥
रोदसी त्रिलोकी में दृश्यमान सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व आदित्य व प्रङ्गिरा दो प्रकार की प्रजाएँ थीं । उन में पूर्वभावी अङ्गिराम्रों ने पहले यज्ञ का - सोम का संभरण किया कि तथा वे अग्नि से कहा कि आप कल होने वाली अभिषव क्रिया के विषय में आदित्यों से कह दे हमें यज्ञ कराएँ तथा आप भी हमें यज्ञ कराएँ ॥ १३ ॥
उन प्रादित्यों ने विचार किया कि ऐसा कौन सा उपाय हो सकता है जिससे कि अङ्गिरा तो हमें यज्ञ कराएँ और हम अङ्गिरात्रों को यज्ञ न कराएँ ॥१४ ॥
अन्त में विचार कर उन श्रादित्यों ने कहा कि बीच में ही अधसुत्या ( साद्यस्क्र याग ) के अनुष्ठान के बिना और कोई उपाय नहीं हो सकता जिससे कल अङ्गिरात्रों के द्वारा किये जाने वाले यज्ञ से हमारा छुटकारा हो सके । यह विचार कर आदित्यों ने अगले दिन होने वाली अङ्गिरात्रों की सुत्या से पूर्व ही सोम का संभरण कर अग्नि से कहा कि आपने अङ्गिराओं द्वारा कल की जाने वाली सुत्या में यजन कराने के लिए हम से कहा है किन्तु हम आज ही साद्यस्क्र याग की सुत्या का अनुष्ठान कर रहे हैं जिसके यजन के लिए आप अङ्गिरा से भी कह दें और आप हमारे इस. आज के सवन ( यज्ञ ) में होता बनें ॥ १५ ॥
जब अग्नि ने अङ्गिराओं से आज सम्पन्न होने वाली प्रादित्यों के द्वारा की जाने वाली साद्यस्क्रयाग की सुत्या में सम्मिलित होने के लिए कहा, तब आदित्यों ने अग्नि के स्थान में अन्य प्रतिनिधि को अङ्गिरात्रों के पास सूचना के लिए भेजा । श्रङ्गिनों ने इस बात को सुन कर अग्नि पर कुपित हो कर कहा कि तुमने हमारे दूत हो कर हमारे कथन का प्रत्यादर नहीं किया ॥१६ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण अग्नि ने उत्तर दिया कि अनिन्द्य अर्थात् द्युलोकवर्ती होने कर से पूज्य सका आदित्यों । इसलिए ने लोक मुझे वरण किया अत: मैं उनकी बात का अपक्रमरण ( उल्लंघन ) मनुष्य नहीं उस की बात को न टाले । में निन्द्य अर्थात् श्रेष्ठ या पूज्य द्वारा वरण करने पर कराया । दक्षिणा सोमक्रयरणादि अन्त में अङ्गिरा ने आदित्यों को साद्यस्क्रयाग का यजन ॥ सद्य: किये जाते हैं अतः उनका नाम सद्यःक्री: हो गया है ॥ १७ के आदित्यों एवं अंगिराओं की उक्त कथा का वैज्ञानिक रहस्य हिन्दी विज्ञान - भाष्य आधार पर संक्षेप में प्रस्तुत है । 1 प्रकृति में सौर प्रारणों का नाम आदित्य है तथा पृथिवी की प्रातिविक है किन्तु वस्तु भास्वर बने हुए सौरप्राण ही ङ्गिरा हैं । सूर्य में पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती आहुति होती है । इस सोम चन्द्रमा का पृथिवी से सम्बन्ध है । पार्थिवाग्नि में इसी सोम पृथिवी की पर पृथिवी से टकरा चन्द्र सोम का संभरण अङ्गिराम्रों ने ही किया । जो सौरप्राण, पृथिवी की परिक्रमा करता कर पुन: सूर्य में लौट जाते हैं वे आदित्य कहलाते हैं । चन्द्रमा है । पृथिवी चित्य चितेनि-है और पृथिवी चन्द्रमा को साथ लेकर सूर्य्यं की परिक्रमा करती ही चित्य व मर्त्य पृथिवी है य एवं मर्त्य मृत भेद से दो प्रकार की है । पृथिवी पिण्ड वितत अग्निप्रामरूप पृथिवी तथा पृथिवी पिण्ड के केन्द्र से निकल कर २१ वें अहर्गण तक चितेनिधेय व अमृत है । इसी प्रकार अङ्गिरा भी मर्त्य अमृत भेद से दो प्रकार से का सम्बन्ध है । पृथिवी रखने वाला पिण्ड से सम्बन्ध रखने वाला मर्त्य अङ्गिरा तथा प्राणरूप प्राणरूप पृथिवी आदित्य करते हैं न कि अमृताङ्गिरा है | चान्द्र सोम का उपभोग पहले सौर द्वारा पहले सूर्य में पार्थिवाग्निरूप अङ्गिरा । अङ्गिराओं द्वारा संभृत सोम, पार्थिवाग्नि बन कर जब पृथिवी की वस्तु आहुत होता है । पश्चात् सौर प्रारणरूप आदित्य, प्रवर्ग्य अङ्गिरात्रों से होता है । बन जाते हैं तथा अङ्गिरा कहलाते हैं तब चान्द्रसोम का सुत्या सम्बन्ध का सम्बन्ध अङ्गिरात्रों से है । इसीलिए अद्यत्या का सम्बन्ध आदित्यों से तथा श्वः हेतु अग्नि को सौरप्रारण रूप श्रादित्यों अङ्गिरात्रों द्वारा क्रियमाण श्वः सुत्या की सूचना देने बन गई । जो सौर प्राण पृथिवी के पास जाना पड़ा अतः वह भी द्युलोक की वस्तु जाते हैं वे ही ग्रादित्य हैं । इसीलिए पिण्ड पर आ कर पृथिवी से टकरा कर वापस चले पृथिवी से आदित्यों का सम्बन्ध हो चन्द्रमारूप सोम के साथ सूर्य की परिक्रमा करती हुई बन कर पृथिवी की वस्तु बन गये जाता है । तथा जो सौरप्राण पृथिवी में आ कर प्रवर्ग्य लौटते हैं । उनके जाने में विलम्ब हैं वे अङ्गिरा हैं । पार्थिव भाग को साथ लेकर सूर्य में सम्बन्ध होता है तथा अङ्गिराम्रों होता है । अतः आदित्यों का चान्द्र सोम के साथ पहले क्रीः याग, व अङ्गिराम्रों की का बाद में 1 । इसी रहस्य को आदित्यों की अद्यसुत्या या सद्यः श्वः सुत्या के द्वारा बतलाया गया है । आदित्याग्नि और अङ्गिरा में स्पर्धा आदित्याग्नि शुद्ध सौराग्नि था । उसका चली कि पहले कौन द्युलोक में पहुँचता है । पृथिवी से मात्र बहिर्याम सम्बन्ध था । उस में [ e ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण पार्थिव भूत भाग का मिश्रण नहीं था । श्रङ्गिराग्नि का पार्थिव भूत भाग से अन्तर्याम सम्बन्ध था और भूत भाग का उस में मिश्रण था । अतः शुद्ध सौराग्निरूप आदित्य, पहले स्वर्ग लोक में पहुँचे और भूत सम्बन्ध के कारण निर्बल हुए अङ्गिराग्नि विलम्ब से स्वर्ग में पहुँचे । आदित्यों द्वारा कृत अद्य सुत्या वाले साद्यस्क्री याग की समाप्ति पर उस का यजन करने वाले अङ्गिरात्रों को आदित्यों ने दक्षिरणा प्रदान की । दक्षिणा में उन्होंने मर्त्याकाश रूप अनुष्टुप् वाक् को प्रदान किया । किन्तु श्रङ्गिराम्रों ने उसे स्वीकार नहीं किया । क्योंकि अङ्गिरा पार्थिव अमृत प्राण हैं और अनुष्टुप् मर्त्या वाक् है अतः मर्त्य वाक् का से सम्बन्ध ही नहीं हो सकता और अमृताग्नि रूप अङ्गिराओं की सत्ता अमृताग्नि अमृत से अङ्गिरा ही हो सकती है । यज्ञानुष्ठान का पूर्ण फल यजमान को तब तक प्राप्त नहीं होता और यजमान की दिव्यात्मा का पूर्ण स्वरूप तब तक नहीं बनता, जब तक यज्ञ सम्बन्धी दक्षिणा नहीं होता । इसलिए दक्षिणा देना आवश्यक है - " तदु तद् यज्ञस्य कर्म न कर्म पूर्ण दाक्षिणमासीत् " । इति ॥ १८ ॥ व्यमुच्यत यद्
जब अङ्गिरात्रों ने अनुष्टुप् रूप मर्त्या वाक् को स्वीकार नहीं किया तब आदित्यों ने सूर्य को दक्षिणारूप में प्रदान किया । श्रङ्गिरात्रों ने उसे स्वीकार कर लिया । यदि सौर पदार्थ इस प्रङ्गिराग्नि रूप पृथिवी में न आते तो पार्थिव पदार्थ कुछ दिनों में नष्ट हो प्रतिक्षरण पदार्थों के निर्माण में खर्च होने वाली पार्थिव अग्नि की पूर्ति सौर प्रारणों जाते । होती है । इसीलिए अङ्गिरात्रों ने सूर्य को दक्षिणारूप में स्वीकार कर लिया । क्यों से कि ही प्रकृतियाग में अङ्गिरा ऋत्विजों को प्रकाशी सूर्य दक्षिणारूप में दिया गया अतः इस मानुषयाग में भी सूर्य के प्रतिनिधि के रूप में सद्यः क्रियः श्वेत अश्व दक्षिणा में देना वैध चाहिए || १६ || 1 जिसके चौतरफ २१ सोने की किरणें हो और मध्य में सूर्य की मूर्ति हो को अश्व के गले में बाँध देना चाहिए और ऐसे अश्व को दक्षिणा में देना चाहिए ऐसे रुक्म सुवर्ण सूर्य की वस्तु है अतः ऐसा रुक्म अश्व को पहिनाता हुआ यजमान उसको । साक्षात् क्योंकि उस सूर्य का स्वरूप बना देता है जो कि आकाश में तप रहा है । यदि श्वेत घोड़ा न मिले तो श्वेत बैल को ही दक्षिणा में देना चाहिए तथा उसके भी गले में वैसा ही रुक्म देना चाहिए || २० पहिना अङ्गिराओं ने जब वाक् को ( अनुष्टप मार्ग वाक् को ) दक्षिणा में लेना स्वीकारन किया तो वाक् बहुत अप्रसन्न हुई और पार्थिव अङ्गिरा देवताओं को छोड़ कर चली गई । संसार के यावन्मात्र पदार्थों का निर्माण प्रजापति से होता है- " प्रजापतिरेवेदं सर्व-मसृजत यदिदं किञ्च ” । अव्यय प्रजापति आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् है | ज्ञान - रूप - प्रानन्द - विज्ञान कलाओं के भेद से पञ्चकल कारण वह मुक्तिसाक्षी तथा कर्म - -रूप I - वाक्-[ १० ]
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तृतीय काण्ड ( ० ५ ) शतपथ ब्राह्मरण वेदिनिर्माण ब्राह्मण प्राण- इन कलाओं के कारण सृष्टिसाक्षी है । मन उभयात्मक अर्थात् मुक्तिसाक्षी व सृष्टि साक्षी दोनों है । मुक्तिसाक्षी प्रजापति अमृत है तथा मनःप्राणवाङ्मय प्रजापति मर्त्य है । सृष्टिसाक्षी मनःप्राणवाङ्मय प्रजापति में मन के संकल्प एवं प्रारणव्यापार से सृष्टि रूप में परिणत होने वाली वाक् ही है । यह वाक् भी अमृत मर्त्य भेद से दो प्रकार की है । वाक् को ही प्रकाश कहते हैं । अतः यह वाक्रूप आकाश भी मर्त्याकाश व अमृताकाश भेद से द्विविध है । अमृताकाश का नाम इन्द्र है तथा मर्त्याकाश का नाम इन्द्रपत्नी है । अमृताकाश या अमृतावाक् से देवता उत्पन्न होते हैं तथा मर्त्याकाश या मर्त्यवाक् से भूत उत्पन्न होते हैं । भूत से पिण्ड का निर्माण होता है । पृथिवी - पिण्ड का निर्माण भूतभाग अर्थात् मर्त्या-Sara से होता है । पृथिव - पिण्ड से निराकार प्रारणात्मक अग्निप्राणरूप अङ्गिरा निकलते रहते रहते हैं । सूर्य की परिक्रमा करती हुई पिण्डरूप पृथिवो ज्यों - ज्यों आगे बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों अङ्गिरा प्राण उससे निकल कर प्रवर्ग्य बनते जाते हैं । जैसे - जैसे वह आगे बढ़ती है, अङ्गिरा प्राण निकल कर उससे अलग हटते जाते हैं और नये - नये अङ्गिराप्राणरूप पार्थिव देवता उत्पन्न होते रहते हैं । यही इस पिण्डरूप वागग्नि का अङ्गिरा देवताओं से कुपित होना तथा अपक्रमण करना है । सूर्य की परिक्रमा करती हुई मर्त्य पृथिवी कृष्णवर्णा है । किन्तु पृथिवी का जो सूर्य-सम्मुख भाग है उस पर सूर्य के प्रकाश का सम्बन्ध होने से असुर तमोमय कृष्णप्राण का नाश हो जाता है अर्थात् प्रकाशी सौरप्राण पृथिवी पर आता है और वही पृथिवी - पिण्ड से टकरा कर पुनः सूर्य में लौटता है । पृथिवी में प्रतिफलित सौरप्राण ही अश्व कहलाता है । यही सौरप्रकाशी प्रारणदेवता है । सूर्य से विपरीत दिशा वाला प्रारण कृष्ण है, तमोमय है, जो असुर कहलाता है । इस प्रकार यही पिण्ड - रूप पृथिवी देवता व असुर दोनों के मध्य में वर्तमान है | वह सिंही हिंसक बन कर देवता व असुर दोनों प्राणों को व्याघ्रमुखी बन कर खाती रहती है । उस मध्यस्थ पृथिवी पर देवता व असुर दोनों अपना अधिकार करना चाहते हैं । प्रकाशी प्रारणदेवताओं ने उसे लेने के लिए अपना दूत अग्नि प्रकाशीप्रारण को भेजा तथा असुरों ने राख से दबे हुए अप्रकाशी प्राण सहरक्षा श्रग्नि को भेजा । सूर्य सम्मुखीन अग्निमय प्रकाशी प्रारण, देवताओं का और सूर्य से विपरीत दिशा में निकलने वाला सह-रक्षा अग्नि, तमोमय होने से असुरों का दूत बना । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- अग्निरेव देवानां दूत प्रास सहरक्षा इत्यसुर रक्षसामसुराणाम् ' इति ॥ २१ ॥
यद्यपि देवता और असुरों ने अपना - अपना दूत भेज कर पृथिवी को अपनी ओर खींचने का प्रयास किया किन्तु पृथिवी देवताओं की प्रोर हो गई क्यों कि सूर्य का आकर्षण सुर आकर्षण से प्रबल है 1 । देवताओं ( सौर प्रारणों ) की ओर जाती हुई पृथिवी ने कहा कि यदि मैं आपके पास आती हूं तो मुझे क्या लाभ होगा? देवताओं ने कहा कि अग्नि की पहली आहुति को ही प्राप्त होगी । इसीलिए सौर प्रारणों का सम्बन्ध पहिले पृथिवीपिण्ड से ही होता है । देवताओं पर प्रसन्न होकर वाग् ( अग्नि ) उनके पास आ गई । इसका यही रहस्य [ ११ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वैदिनिर्माण ब्राह्मण है कि सौररश्मिरूप सौरप्राण जो वाक् ( मर्त्य पार्थिवाग्नि ) पर आते हैं, वे टकरा कर वापिस पार्थिव रसों को चूस कर अपने स्थान या प्रभव सूर्य में चले जाते हैं ॥ २२ ॥
उत्तरवेदि में १७ वें स्थान पर बनाए हुए आहवनीय कुण्ड में अग्नि को रखने के साथ ही उसमें प्राज्याहुति डाली जाती है । प्राकृतिकयज्ञ में सृष्टि के प्रारम्भ में देवताओं ने इस से कहा था कि हे वाक्! सबसे पहली आहुति तुम्हें ही दी जाएगी । इस प्रकृति - नियम के अनुसार ही निदानेन वागुरूप उत्तरवेदी में अग्नि में प्राज्याहुति देना प्रकृतिवत् वाक् को सर्वप्रथम याहुति देना है | इसके बाद वेदी का उपकिरण करते हैं अर्थात् उसमें मिट्टी लगाकर उसे ऊंची बनाते हैं । वाग् यज्ञरूप है । उत्तरवेदी को ऊंचा बनाना यज्ञ को ही ऊंचा बनाना है || २३ || सोमयाग की महावेदी के पूर्व की ओर एक उत्तरवेदी युग और शम्या के द्वारा नाप कर बनाई जाती है । युग, बैलों के कन्धों पर रखने का जूआ ( जूड़ा ) होता है तथा जुए के दोनों ओर जो कीले रहते हैं उन्हें शम्या कहा जाता है । इस शम्या की नाप विभिन्न कर्मों में भिन्न परिमाण की होती है । जो वाक् अर्थात् पृथिवी अप्रसन्न हो कर देवताओं से अपक्र-मण कर गई थी और सिंही बन कर देवासुरों के मध्य में विचर रही थी, वही निदानेन उत्तरवेदी वाक् का स्वरूप है । वह अश्व बन कर देवताओं के लिए हव्य का वहन करती है । लोक में अश्व ( योग्य ) युग और शम्या से युग्म हो कर ही हव्य अर्थात् पदार्थों का वहन करता है । प्रकृतयज्ञ में उत्तर वेदी देवताओं के लिए हव्य वहन करने वाला अश्व है । अतएव इस उत्तरवेदी का नाप ( मर्यादा ) युग और शम्या के द्वारा ही करना चाहिए । उत्तर वेदी बनाने के लिए जहाँ से मिट्टी लाई जाती है वह स्थान तादर्थ्यात् उतरावेदी कहा जाता है । उस स्थान को शम्या से नापते हैं तथा जहाँ लाई जाती है उस उत्तरावेदी को युग से नापते हैं || २४ || अङ्गिराओं ने आदित्यों द्वारा दी हुई वागुरूप दक्षिणा को अस्वीकार किया तो कुपित हो कर उसने सिंही बन कर उन पर आक्रमण किया था । अतः मनुष्य को चाहिए कि निवृत्त दक्षिरणा कभी न ले । प्रकृति याग में वाक् सिंही का रूप धारण कर देवताओं के मध्य में विचरने लगी थी । उसी प्रकार निवृत्त दक्षिणा, प्रतिग्रहकर्ता का अनिष्ट करने वाली बन कर प्रतिग्रह लेने वाले का नाश कर देती है । किन्तु देने वाला भी उस निवृत्त दक्षिणा को अपने पास न रखे । क्योंकि अपने पास रखने पर वह सिंही बन कर यजमान का भी नाश कर देती है । दक्षिणा ही आत्मा का यज्ञ है । निवृत्तदक्षिणा को दूसरे को देना यज्ञ - रूप आत्मा को दूसरे को देना है; अतः न स्वयं रखे और न दूसरे को दे । किन्तु यजमान अपने जिन भाई बन्धुओं को अपना अनिष्टकारी शत्रु समझता है उन को दे । इससे यजमान निवृत्तदक्षिणा द्वारा विनाश से बच जाता है तथा अपना अनिष्ट करने वाले भाई बन्धु को देने से वह अन्य को दी हुई भी नहीं कहलाती एवं आत्मयज्ञ से बहिभूर्त भी नहीं होतो । निवृत्तदक्षिणा की यही व्यवस्था है ॥२५ ॥
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