Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 121–130

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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तृतीय काण्ड ( ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण इस प्रकार जब दोनों शकट रख दिए जाएँ तो उन पर चटाई रख देनी चाहिए जिससे कि ऊपर से कोई खराब वस्तु एवं वायु में रहने वाले नाष्ट्राप्राण युक्त सूक्ष्म जीव उस सोम में न घुस पड़ें जो कि सोम इनमें रखा हुआ है । इस शकट में तीन जगह चटाई छदि ) डालनी पड़ती है - एक तो शकट के मुख भाग पर - एक मध्य में और एक पीछे । यदि चटाई उस समय न मिले तो भित्ति ही डाल दी जाती है । लम्बे - लम्बे बाँस ला कर उनको बीच में से चीर लिया जाता है । बाद में उनको कूट कर चौड़ा कर लिया जाता है । ऐसे कुटे हुए कितने ही बाँस बराबर - बराबर जोड़ कर उनके दोनों भागों में और बीच मैं बाँस की फर्चंट लगा कर जो एक टाटी बनाई जाती है - इसी को भित्ति कहते हैं । इसी का वैदिक नाम ' किञ्जल्क्य ' है - जैसा कि यास्क मुनि कहते हैं-" भित्ति छदि वा तुल्यां वैणुः शकलैः कृतं किञ्जल्कम् " । ( या ० दे ० ) इस अभिप्राय से कहते हैं उन दोनों हविर्धानों के ठीक स्थान पर स्थित हो जाने पर उन दोनों के ऊपर एक चटाई रखते हैं । यदि चटाई नहीं मिलती है तो चटाई जितनी भित्ति ( किञ्जल्क्य रख देते हैं-" तयोः समववृत्तयोः । छदिरधिनिदधति ( उपरि तृणमयं कटं स्थाप-यति ) यदि छदिर्न विन्देश्छदिः सम्मितां वा भित्तिं प्रत्यानह्यन्ति " | इस अभिप्राय से महर्षि कात्यायन कहते हैं-" वर्षीयो दक्षिणम् । तयोश्छदिरध्यस्यति भिति वाभावे " । ( का ० श्रौ ० सू ० ८।७३–७५ ) यह तो शकट- मध्य का आस्तरण हुआ । अब अग्र भाग का आच्छादन बतलाते हैं । हविर्धान का जो ललाट अर्थात् मुख प्रदेश है जहाँ पर कि एक नाक सा निकला रहता है - उस प्रदेश में नीचे की ओर लगी हुई जो उच्छ्रायी है ( दो काष्ठ के डण्डे हैं ) उनके बीच में एक चटाई डाल देते हैं । शकट को जमीन पर न टिकने देने के लिए उसके नीचे दो लकडियाँ लगा दी जाती हैं । उनसे शकट खड़ा रहता है । इन्हीं को - शकट को उठाए रखने के कारण उच्छ्रायी कहते हैं । इन्हीं को ' उत्तम्भिनी ' भी कहते हैं । इनके ऊपर भी एक चटाई डाल देनी चाहिए-" रराट्यां ( ललाट्यां हविर्धानयोर्मुखप्रदेशे ) परिश्रयन्त्युच्छ्रायीभ्याम् " । शकट के पृष्ठ भाग में भी एक चटाई डाल देते हैं । यदि चटाई नहीं मिलती है तो उतनी ही बड़ी भित्ति डाल देते हैं-" छदिः पश्चादधिनिदधति । छदिः सम्मितां वा भित्तिम् " || ९ || [ १०३ ]

पृष्ठ 122

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण. [ १०४ ] यज्ञपुरुष ब्राह्मणे : ( वा ० सं ० ५।१४ ) इस प्रकार एक आगे - एक मध्य में एक पीछे ये तीन चटाइयाँ हविर्धानों पर डाल दी जाती हैं । सारा विश्व सविता की अनुज्ञा में चलता है । प्रसविता प्राण का नाम सविता है । यह सविता सूर्य से ऊपर परमेष्ठिमण्डल में रहता है । बिना इसकी प्रज्ञा के - ( बिना सविता के - बिना प्रसव के - ) यदि कोई काम कर लिया जाता है तो वह सर्वथा निष्फल हो जाता है । आज दोनों हविर्धान यहाँ रखे जाते हैं । दोनों में ही यज्ञ का सार - भाग सोम रखा हुआ है । इस प्रकार हविर्धानों को प्रतिष्ठित करना सोम को ही यज्ञ में शामिल करना है अतएव इसके लिए सविता के प्रसव की अत्यन्त आवश्यकता है । इन दोनों को स्थापित करने के अनन्तर श्रौर और कामों से पहले सावित्रहोम किया जाता है । श्रध्वर्यु श्रभिचार के लिए - उत्तरावेदिस्थ ग्राहवनीय के पास था । वहाँ से चार बार घृत लेकर वापस इसी हवि-मण्डप में लौट कर सावित्र आज्य की सविता के प्रसव के लिए आहुति देता है । सविता देवताओं के प्रसविता हैं । सवितृ प्रसूत के लिए अर्थात् प्राज्ञा के लिए प्रर्थात् उसी - सविता के लिए हम यज्ञ वितान करें इसलिए सावित्र श्राज्याहुति देता है । मेरा सारा यज्ञ सविता की आज्ञा से हो इसलिए यज्ञ - प्रारम्भ में सविता की आज्ञा लेने के लिए ही सावित्रहोम किया जाता है-" थ पुनः प्रपद्य ( श्राहवनीयात् ) चतुर्गुहीतमाज्यं गृहीत्वा सावित्र प्रसवाय जुहोति । सविता वै देवानां प्रसविता । सवितृप्रसूताय यज्ञं तनवा-महाऽइति तस्मात्सावित्रं जुहोति ॥ १० ॥

सावित्रहोम क्यों करना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु निम्न- लिखित मन्त्र बोलता हुआ प्राहुति देता है—

" युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।

विहोत्रा दधे वयुनाविदेकइत्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा " ॥

" विप्रा: ( मेधाविन: अध्वर्यु प्रमुखां ऋत्विजः ) - विप्रस्य ( विदुषः ) बृहतः ( महतः ) - विपश्चितः ( मेधाविन: यज्ञस्य ) मनः युञ्जते उत् धियः युञ्जते ) एवं होत्रा ( वषट्कर्त्तारः ) ( सवित्रानुज्ञाता एवं ) मनोधियश्च विदधे ( वदधते ) एक इत् ( एव ) वयुनावित् ( वयुनस्य वेदिता - एक एव ) तस्य सवितुर्देवस्य परिष्टुतिः मही ( महती ) एतादृशाय स्वाहा । मेधावी महाविद्वस् जो ऋत्विक् लोग हैं वे बड़ा ही विपश्चित जो यज्ञ है उसमें अपने मन और वाक् को लगाते हैं । यज्ञ का कार्य मामूली नहीं है । इसमें मन - वाक् दोनों पर ध्यान रखना पड़ता है । खाली बोलने से भी इसमें काम नहीं चलता और खाली मनन करने से भी काम नहीं चलता एवं जो सप्तहोत्रक हैं उन्होंने भी सविता की श्राज्ञा में ही अपने मन और वाक् को लगा रखा है । उस सविता की क्या स्तुति करें? संसार में जितने भी वयुन हैं- उनको सर्वात्मना जानने वाला यह एक सविता ही है | ' नासदासीनो सदासीत्तदानीम् ' १० याद बस लाए गए हैं । उनमें से पाँचवें पाद का नाम ' आवरण '

पृष्ठ 123

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणे यज्ञपुरुष ब्राह्मण याद है । आवरण बाद में वयुन से ही सारी सृष्टि मानी जाती है । संसार के जितने भी पदार्थ हैं-सब वयुन हैं । यह वयोनाध और वय इन दो भागों में विभक्त है । वय नाम छन्द और प्राण का है । आयतन का नाम ही वयोनाध है एवं इस प्रायतन में रहने वाली जो वस्तु है उसका नाम ' वय ' है । ar को लेने के लिए वयोनाध को तोड़ना पड़ता है । रोटी एक वय है परन्तु उसे तभी खा सकते हैं जबकि उसके आयतन को तोड़ दें । बस इन दोनों की समष्टि का नाम ही वयन है । वास्तव में वयन के अलावा और कुछ भी नहीं है । इन सारे वयनों के अधिष्ठाता यही सविता देवता हैं । ऐसे सविता देवता की स्तुति बहुत बड़ी है । उनकी स्तुति करवाना भी मामूली काम नहीं है । ऐसे सविता देवता के लिए स्वाहा है । मन्त्र का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं- मन्त्र श्रौर वाक् से ही अध्वर्यु आदि ऋत्विक् यज्ञ-वितान करते हैं । ' युञ्जते ' मन से मन को युक्त करता है । बुद्धिपूर्वक ही वाक् बोली जाती है । व्यवहार बुद्धि - सापेक्ष व्यवहार से ही होता है । बुद्धि का फल वाकू ही है अतएव यहाँ बुद्धि से वाक् का ग्रहण कर लिया गया है । मनुष्य लोग बुद्धि से ही प्रर्थात् बुद्धिपूर्विका वाक् से ही जीवनयात्रा में व्यवहार करने की इच्छा करते हैं । बुद्धिपूर्विका वाक् से ही संसार का व्यवहार चलता है । उन्मत्त प्रलाप को छोड़ कर वाक् व्यवहार तीनों में बढ़ा हुआ है । कुछ वाक् तो अनुवचन से अर्थात् अध्यापन से व्यवहार में लाई जाती । यह असाधारण है । पढाने का काम सर्वसाधारण नहीं करवा सकता । दूसरा है-प्रकामवाद | लौकिक व्यवहार की जो वाक् है - वह प्रकामवाद है । तीसरी है - गाथा । इस प्रकार तीन ही तरह की वाक् हैं । बस इस वाक् श्रौर मन से जो यज्ञ है - ऋत्विक् लोग उसी का वितान करते हैं ॥११ ॥

जो प्रवचन करने वाले विद्वान् ब्राह्मण हैं - वे ही विप्र कहलाते हैं । ' विप्राः ' पद इन्हीं के लिए आया है -" तानेवैतद् ( मन्त्रगतं विप्राः - इति पदम् ) अभ्याह " । यह यज्ञ अर्थात् सोम यज्ञ बहुत बड़ा है और सारा विश्व इसी के अन्तर्गत है । यह सबके मन की जानता है । यज्ञ करते हुए जो यज्ञकर्ता हैं वे भी यज्ञ में युक्त हो रहे हैं । इस प्रकार इस मन्त्र से सविता 1. के लिए आहुति दे देता है-" तत् - सावित्रं प्रसवाय जुहोति " इति ॥ १२ ॥

हविर्धन को स्थापित करने के लिए सविता की अनुज्ञा ले ली गई । इस प्रकार सावित्रहोम करके अध्वर्यु चार बार घृत लेकर वापस हविर्धान के पास आता है । सावित्रहोम हविर्धान मण्डप में किया गया था एवं घृत उत्तरावेदि के पास रखा रहता है अतएव घृत लेने के लिए वहीं जाना पड़ता अतएव उत्तरावेदि से चतुर्गृहीत आज्य लेकर है | चूँकि इसकी आहुति हविर्धन की वर्तनी पर होती है वापस यहीं आना पड़ता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-[ १०५ ]

पृष्ठ 124

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण " चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा उपनिष्क्रामति- उत्तरवेदेः सकाशात् श्राज्यं गृहीत्वा - हविर्धानमण्डपे आगच्छति " । इसके अनन्तर और और प्रतिप्रस्थाता आदि ऋत्विक् लोग हविर्वेदि के दक्षिण - पश्चिम श्रोणी में रहने वाली जो यजमान पत्नी है उसे दक्षिण मार्ग से ही ला कर वहाँ उपस्थित कर देते हैं जहाँ पर कि अध्वर्यु ज्याहुति देगा -" दक्षिणया द्वारा पत्नों निष्क्रामयन्तीति " । इसके बाद अध्वर्यु पृष्ठ्यासूत्र से दक्षिण भाग में रखा हुआ जो हविर्धान है उसके दाहिने पहिए की लीक है उसमें एक सोने की टिकिया रखकर निम्नलिखित मन्त्र से चतुगृ हीत आज्य की आहुति देता है । प्राहुति बिना अग्नि के नहीं डाली जाती प्रतएव स्वर्ण रखवा दिया जाता है । स्वर्ण पर प्राहुति संपत्ति के लिए ही स्वर्ण रखा जाता है अतएव कहा जाता है-" स हिरण्यं पदे निधाय जुहोति । न वाऽनग्नावाहुतिर्हयते अग्निरेतसं वै हिरण्यं तथो हास्यैषाग्निमत्येवाहुतिर्हता भवति । ( शत ० ३।३ । १ । ३ ) जिस मन्त्र से आहुति देते हैं - वह मन्त्र यह है—

" इदं विष्णु विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे स्वाहेति " ॥

( वा ० सं ० ५।१५ ) इदं ( विश्वम् ) विष्णु: ( त्रिविक्रमावतारधारी ) विचक्रमे ( विक्रा-न्तवान् ) । केन प्रकारेण विचक्रमे तदुच्यते - त्रेधा ( त्रिप्रकारेण - पृथिवी, अन्त-रिक्ष, लोकेषु ) पदं निदधे ( स्थापितवान् ) । अस्य ( यज्ञसूतैः विष्णोः ) पांसुरे रजोयुक्ते पदे ( लोकत्रयं - इति शेषः ) समूढम् - संलग्नम् । आँख खोलने पर पृथिवी से सूर्य्य तक जो एक महाविशाल विश्व दिखलाई पड़ता है जिसे कि रोदसी त्रिलोकी कहा करते हैं- उसे भगवान् विष्णु ने छलांग मार कर नाप लिया है । एक पाँव पृथिवी पर रख कर पृथिवी को नाप लिया है । दूसरे से अन्तरिक्ष को नाप लिया है । तीसरे से द्युलोक को नाप लिया है । इस प्रकार तीन पैर से सारी त्रिलोकी नाप रखी है । यज्ञमूर्ति इस विष्णु की जो पादधूलि है - चरणरज है - उसमें तीनों लोक समा रहे हैं । पृथिवी का जो साम है उसमें ३३ अहर्गण होते हैं । ३३ में से २१ तक अग्नि रहता है २७ तक भास्वर सोम रहता है - ३३ तक दिक् सोम रहता है । इसमें २१ तक रहने वाला अग्नि त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंश इन तीन भागों में बँटा हुआ है । इस विभाग त्रय का एकमात्र कारण अग्नि की घन - तरल- विरलावस्था हैं । इस २१ वाले अग्नि में सोमाहुति पड़ती है । [ १०६ ] f

पृष्ठ 125

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण अतएव अग्नि को यज्ञ कहा जाता है । जो त्रिवृत् अग्नि की आठ अवस्थाएँ हैं उन्हें आठ वसु कहा जाता है | पञ्चदशस्थ तरलाग्नि ( की अवस्थाओं ) को रुद्र कहा जाता है एवं विरलाग्नि की १२ अवस्थाओं को द्वादश श्रादित्य कहा जाता है । इनमें से १२ वें श्रादित्य का नाम विष्णु है । वही अग्नि त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश तक वितत होकर विष्णु कहलाने लगता है । इसी में सोमाहुति होती है अतएव इस त्रिविक्रम विष्णु को हम यज्ञमूर्ति कहने के लिए तैय्यार हैं । त्रिवृत् तक पृथिवीलोक कहलाता है - पत्र-दश तक अन्तरिक्षलोक कहलाता है एवं एकविंश तक द्युलोक कहलाता है । इस प्रकार २१ पर जा कर तीनों लोक समाप्त हो जाते हैं । इन तीनों में वही यज्ञ - विष्णु व्याप्त हो रहा है । यज्ञमूर्ति ने त्रिवृत्-पञ्चदश- एकविंश इन तीन पैरों से सारी त्रिलोकी को नाप रखा है । बस यही मन्त्र का तात्पर्य है । इस प्रकार अध्वर्यु यह मन्त्र बोलता हुआ उस चतुर्गृहीत श्राज्य की, पहिए की लीक में रखे हुए सोने पर आहुति दे देता है -" स ( अध्वर्युः ) दक्षिणस्य हविर्धानस्य दक्षिरणायां वर्त्तन्यां ( दक्षिण-चक्ररेखायाम् ) हिरण्यं निधाय जुहोति । इदं विष्णुः ( इत्यादि मन्त्रेणेति शेषः ) " । आहुति डालने के बाद जुहू में कुछ घृत शेष रह जाता है उसे संस्रव कहा करते को श्रध्वर्यु यजमान पत्नी के हाथ में दे देता है । । उस संस्रव ' संस्रवं ( जुहूलिप्तमाज्यम् ) पत्न्यै ( पत्न्याः ) पारणावानयति " । वह पत्नी ' देव देवेष्वाघोषत मिति ' ( वा ० सं ० ५।१७ ) यह कहती हुई हविर्धान के धुरे का के जो संतप्त स्थान है उस पर उस संस्रव को अर्थात् घृत को डाल देती है । दोनों पहिए जिस कीले वैदिक आवार पर स्तब्ध रहते हैं - इधर - उधर विचलित नहीं हो सकते वही धुरा कहलाता है । इसी का नाम अक्ष । यह अक्ष पहिए के स्थान में घर्षण के द्वारा अग्निमय हो जाता है । मारे घर्षण के पहिए यही के समीप का अक्ष स्थान इतना गरम हो जाता है कि उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता । बस कारण स्थान संतप्त स्थान कहलाता है । इसी पर पत्नी घृत डालती है । चूँकि यह स्थान संताप में के जो घृत आग्नेय है अतएव इस पर घृत डालना - प्रग्नि में ही घृत की आहुति डालना है । इस अग्नि लेते हैं । इससे डाला जाता है वह वायु में शामिल हो जाता है । वायु में रहने वाले देवता इसे ले आज्या-यजमानात्मा में बल बढ़ता है । जिन देवताओं से यजमानात्मा बना है - उन्हीं देवताओं को वह हुति मिलती है । मन्त्र का अर्थ यह है--" हे देवश्रुतौ! ( अक्षयोराधारप्रदेशौ युवां ) देवेषु ( मध्येऽस्मान् ) आघोषतम् - ( ते सम्यग् यजन्तीति शब्दं कुरुतम् ) " । हे देवताओं को सुनाने वाले प्रक्षिप्रदेश! आप देवतानों में हमारे शब्द को पहुँचा दीजिए । हैं- हम अच्छी प्रकार यज्ञ कर रहे हैं - यह देवताओं से निवेदन कर दीजिए । प्रकृति - मण्डल के जो हविर्धान [ १०७ ]

पृष्ठ 126

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मणं उन्हीं पर तो प्राकृतिक यज्ञ अवलम्बित है अतएव उन्हीं के धुर प्रदेशों से प्रार्थना की जाती है कि आपकी जो घर्घर् ध्वनि हो वह देवताओं को यही सूचित करे कि यजमान ठीक तरह से यज्ञ कर रहा है । " सा अक्षस्य सन्तापं ( चक्र संघर्षेणदेशम् ) उपानक्ति लेपनं करोति ( देवश्रुतौ इत्यादिमन्त्रेण ) " । जिस प्रकार दक्षिण हविर्धान के वर्त्तनी और धुरे में घृत डाला जाता है तथैव उत्तर हविर्धान में भी डाला जाता है । दक्षिण में अध्वर्यु डालता है - उत्तर में प्रतिप्रस्थाता डालता है । चूँकि दक्षिण हविर्धन कर्म समाप्त हो चुका, अब उत्तर में प्रतिप्रस्थाता करेगा अतएव अध्वर्यु जुहूपभृत और आज्य-विलापनी को- प्रतिप्रस्थाता को सौंप देता है-" प्रयच्छति प्रतिप्रस्थात्रे स्रुचं आज्यविलापनीं च । ( अध्वर्युरिति " शेषः ) । " एवं वह प्रतिप्रस्थाता हविर्वेदि की जो गार्हपत्याग्नि है - उससे पश्चिम में होकर नियत मार्ग से महावेद्यन्तर्गत उत्तर हविर्धान के पास ले आता है क्यों कि यहाँ भी तो अक्षाञ्जन पत्नी को ही करना पड़ेगा-" पर्यारणयन्ति पत्नीमुभौ ( गार्हपत्याहवनीयौ ) जघनेन ( पश्चाद्भागेन ) अग्नी " इति ॥ १३ ॥

इस प्रकार यजमान पत्नी सहित प्रतिप्रस्थाता पृष्ठ्या सूत्र के हविर्धान के पास जा कर चतुर्गृ-हीत श्राज्य ले कर उत्तर हविर्धान के दाहिने पहिए की जो लीक है- रेखा है - उस पर सोने की टिकड़ी रख कर यह मन्त्र बोलता है-" इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनो मनवे दशस्या । व्यस्कना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा || ” ( वा ० सं ० ५।१६ ) इस मन्त्र को बोलता हुआ उस स्वर्ण पर चतुर्गृहीत आज्य की आहुति डाल देता है -" हे द्यावापृथिव्यौ! युवां ' मनवे ' ( यजमानाय ) इरावती ( श्रन्नवत्यौ ) धेनुमती ( बहुधेनुयुक्ते च ) भूतम् ( भवतम् ) तथा च सूयवसिनी ( शोभन तृरण-युक्ते घासयुक्ते ) दशस्या ( दशस्यौ - श्रभिमतफलदात्र्यौ ) भवतम् । एतादृश एते रोदस्य हे विष्णो! ( त्वं ) व्यस्कभ्नाः ( त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंशति विविधं [ १०८ ]

पृष्ठ 127

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण भितवानसि ) एव मयूखै: ( स्व यज्ञ सूत्रः ) पृथिवों प्रभितः ( आसमन्तात् ) दार्थ ( धारयसि ) " । हे द्यावापृथिवी! आप इस यजमान के लिए प्रन्नवती और रसवती बनिए एवं बहुधेनुवाली बनिए । आप में खूब गाएँ हों - यही हमारी इच्छा है । आपमें खूब अच्छी - अच्छी घास उत्पन्न हों । आप शस्य - श्यामला बनें एवं आप अभीष्ट फल को देने वाली बनें । ऐसी जो यह द्यावापृथिवी है इसे यज्ञमूर्ति भगवान् विष्णु ने स्थिर कर रखा है । यज्ञ से ही रोदसी त्रिलोकी स्थित है । यदि यज्ञ न हो तो तीनों की सत्ता उच्छिन्न हो जाए । अपिच हे विष्णु । आपने इस पृथिवी को अपनी किरणों से चारों ओर से धारण कर रखा है । लोक के अधिष्ठाता सूर्य्यं हैं । १२ श्रादित्यों की समष्टि का नाम ही सूर्य्यं है । इनमें से १२ वें आदित्य ही विष्णु हैं । इन्हीं की पकड़ में यह पृथिवी है । यदि इसकी पकड़ न हो तो पृथिवी खण्ड - खण्ड हो जाए । केन्द्र में ब्रह्मा इन्द्र विष्णु ये तीन शक्तियाँ रहती हैं । तीनों में से विष्णु २१ अहर्गण तक जाते हैं । बाहर से अन्नाहरण करना - सोमाहरण करना इन्हीं विष्णु भगवान् का काम | सोम संकोचधर्म्मा है । अग्नि विकासधर्म्मा है । पृथिवी अग्नि पिण्ड है । यह पृथिवी को विशकलित करना चाहता है परन्तु विष्णु द्वारा प्राहुतसोम इसे अपनी संकोच शक्ति द्वारा दबाता रहता है । यदि सोमाहरण न हो तो पृथिवी पिण्ड एक सैकिण्ड में खण्ड - खण्ड हो कर नष्ट हो जाए । श्रतएव हम विष्णु को अवश्य ही पृथिवी को धारण करने वाला बतला सकते हैं । इस प्रकार यह मन्त्र बोलता हुआ श्राहुति दे देता है । तदन-न्तर जुहूपलिप्त प्राज्य को पत्नी " देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम् " यह बोलती हुई अक्ष के संतप्त देश में घृत लगा देती है-" चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा प्रतिप्रस्थाता उत्तरस्य हविर्धानस्य दक्षिणायां वर्तन्यां हिरण्यं निधाय जुहोति - ( इरावतीत्यादि मन्त्रेरण ) संस्रवं पत्न्यै पारणा-वानयति । सा अक्षस्य संतापमुपानक्ति - देवश्रुतौ इत्यादि मन्त्रेरण " । यहाँ पर दक्षिणेतर हविर्धान की लीक और अक्ष में घृत डालने की आवश्यकता क्या है- क्यों घृत डालना चाहिए इसका कारण बतलाते हैं— " तत् ( तत्र ) यदेवं ( यस्मात् कारणात् ) जुहोति ( तदुच्यते - इति शेषः ) " ॥ १४ ॥

यज्ञ वितान करते हुए देवता लोग असुर और राक्षसों के भय से डरने लगे । उन्हें डर लगा कि कहीं असुर - दल ग्रा कर अपना यज्ञ विध्वंस न कर डालें । इस भय से त्राण पाने के लिए देवताओं ने इस श्राज्य वज्र को देखा । श्राज्य वास्तव में वज्र है । इसी श्राज्य वज्र से देवताओं ने दक्षिण भाग से असुर और राक्षसों को मार भगाया । बस, इस श्राज्याहुति के प्रखर ताप से असुर लोगों ने देवताओं [ १०६ ]

पृष्ठ 128

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मग के मार्ग को न पहचाना । अर्थात् आज्याहुति से देवता असुरों की दृष्टि से प्रोझल हो गए । यह कथा-अधिदैवत और अधिभूत दोनों पर लागू होता है । प्रकृति - यज्ञ में दक्षिण भाग में इस श्राज्य - स्वरूप सोमाहुति से अग्नि प्रति प्रज्वलित रहता है । सोम उत्तर से दक्षिण में जाया करता है । इससे वह दक्षिणाग्नि प्रतिप्रज्वलित रहता है अतएव तमोमय आज्य प्राण - प्रधान असुर इस यज्ञ में और यज्ञीय देवताओं में जो कि पृथिवी से २१ तक वितत हो रहे हैं - नहीं घुस सकते हैं । एवमेव भुवनस्वर्गवासी देवताओं पर दक्षिण अफ्रीका से असुर लोग आ आ कर आक्रमण किया करते थे । इस आक्रमण से बचने के लिए देवताओं ने यज्ञविद्या का श्राविष्कार किया एवं अग्नि में प्राज्याहुति डाल कर उससे अपना आत्मबल बढा कर असुरों को परास्त किया । बस, उसी प्रकार आज यह यजमान भी इस आज्य वज्र से दक्षिण से प्राक्रमण करने वाले जो राक्षस हैं अथवा जो इसके शत्रु हैं उन्हें परास्त करता है एवं ऐसा करने से इसके शत्रु अपने मार्ग को ही भूल जाते हैं । उन्हें इसका पता ही नहीं लगता । पता लगे, तब तो हमला करें । इस प्रकार इस श्राज्याहुति से यह शत्रुओं को परास्त कर देता । बस, दक्षिण भाग में हिरण्य रख कर श्राज्याहुति देने का यही कारण है । " देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गाद् ( श्राक्रमरणात् ) बिभयाञ्चक्रुः । वज्रो वाऽप्राज्यम् । तएतेन वत्रेणाज्येन दक्षिणतो नाष्ट्रा रक्षस्यवान् । तथैषां ( देवानाम् ) नियानम् ( मार्गम् ) नान्ववायन् ( नान्ववि-न्दन् ) तथोऽएवैष एतेन वत्रेणाज्येन दक्षिणतो नाष्ट्रा रक्षांस्यवहन्ति तथाऽस्य नियानं नान्ववयन्ति " । दूसरा प्रश्न यह बच जाता है कि विष्णु देवता की ऋचा से ही आहुति क्यों दी जाती है - इसका भी कारण बतलाते हैं--" तद्यद्वैष्णवीभ्यामृग्भ्यां जुहोति ( तस्यकारणमुच्यते ) " । यह जो हविर्धान मण्डप है - वह विष्णु देवता का है जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । हविर्धान यज्ञ का मस्तक है एवं विष्णु इसका मस्तक भाग है अतएव ' वैष्णवं देवतया ' हम हविर्धान को विष्णु देवता का कहने के लिए तैय्यार हैं । चूँकि यह वैष्णव है एवं इसकी रेखा पर

प्राहुति डाली जाती है अतएव ' वैष्णव की ही ऋक् बोलना उचित है ।

" वैष्णवं हि हविर्धानम् " ॥१५ ॥

अब पत्नी हविर्धान के अक्ष के संतप्त प्रदेश में क्यों घृत डालती है - इसका कारण बतलाते हैं-" श्रथ यत् - प्रक्षस्य संतापमुपानक्ति ( तस्य कारणमुच्यते ) " । पत्नी-याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अक्ष पर घृत डालना - प्रजनन ही करना है । जिस समय स्त्री और पुरुष दोनों परस्पर संगम करते हैं तो उससे घर्षण होता है । घर्षण से श्रग्नि पैदा होता है - बस उसी समय [ ११० }

पृष्ठ 129

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण पुरुष का रेत स्त्री की योनि में सिक्त होता है । जब तक घर्षण नहीं होता तब तक अग्नि उत्पन्न नहीं होता है एवं जब तक उस अग्नि में रेत की आहुति नहीं डाली जाती है तब तक गर्भधारण नहीं होता है । तात्पर्य यही है कि स्त्री - पुरुष के संघर्ष से उत्पन्न जो गरमी है उसमें जब रेत जाता है तभी संतान उत्पन्न होती है । यहाँ पर प्रक्ष पुरुष है- पहिया स्त्री है । उसके घर्षण से एक अग्नि पैदा होता है । इसमें जो प्राज्य डाला जाता है वह रेत की आहुति है । यह ग्रहुत रेत, वायु में जाकर सोमयज्ञ में उत्पन्न होने वाले दिव्यात्मा में मदद पहुंचाता है । यह घृत ऊपर से पृथक्त्वेनैव डाला जाता है क्योंकि पुरुष भी ऊपर से ही तो रेत - सिञ्चन करता है । प्रजनन - संपत्ति प्राप्त्यर्थ ही इस संतप्त अक्ष स्थान में आज्य डाला जाता है--" प्रजननमेवैतत् क्रियते । यदा वै स्त्रियै च पुंसश्च सन्तप्यतेऽथ रेतः सिच्यते तत्ततः प्रजायते । पराक् ( पृथक्त्वेन ) उपानक्ति पराग्ध्येव रेतः सिच्यते इति । " इसके बाद अध्वर्यु होता को - हविर्धानों के आवर्तन के लिए अनुवाक्यार्थ प्रैष करता है -" हविर्धानाभ्यां प्रवर्त्यमानाभ्यामनुब्रूहीति ॥ १६ ॥

" हे होता! प्रवर्त्त्यमान जो यह दोनों शकट हैं उनके लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलते । " अध्वर्यु के प्रेषानन्तर हविर्धानों लाते समय निम्न लिखित मन्त्र बुलवाता है--" प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम् " । ( वा ० सं ० ५।१७ ) " हे हविर्धाने! प्राचीप्रेतम् ( पूर्वदिशायां प्रगच्छतम् ) अध्वरं ( सोम-यागम् ) कल्पयन्ती ( फलजननसमर्थं कर्तुं शक्ते ) यज्ञम् ( सोमयागम् ) ऊर्ध्वम् ( स्वर्गलोकम् ) नयतम् ( प्रापयतम् ) मा जिह्वरतम् ( चलनभ्रंशं मा कुरु-तम् ) ' । हविर्धानो! पूर्व की ओर जाता हुआ जो यज्ञ है - उसे फलयुक्त बनाने का सामर्थ्य आप ही में है | वास्तव में बात सच है - हविर्धन पर सोम रहता है । सोम ही की तो करामात है । सोम न हो तो यज्ञ ही नहीं हो सकता है । ऐसे जो प्राप हैं वे हमारे इस यज्ञ को स्वर्ग में ले जाइए और बीच ही में से मत गिर जाइए । प्रकृति - यज्ञ को स्वर्ग में देवलोक में ले जाने वाले यही प्राकृतिक हविर्धान हैं । उन्हीं की नकल पर यह हविर्धान है । अतएव उनसे प्रार्थना की जाती है । मन्त्र के प्रत्येक पद का अर्थ याज्ञ-वल्क्य स्वयं करते हैं - ग्रध्वर को ही यज्ञ कहते हैं । यज्ञ अग्निमय है । यह पृथिवी के केन्द्र से बद्ध हो कर एकदम सीधा सूर्य्यं तक वितत हो रहा है । क्या मजाल यह जरा भी टेढ़ा हो जाए, अतएव हम इसे ' नध्वरति ' इस व्युत्पत्ति से अध्वर कहने के लिए तैय्यार हैं । यह यज्ञ सदा पूर्व की घोर अर्थात् सूर्य्यं की [ १११ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मणं ओर ही जाता रहता है । बस, पूर्व की ओर जाते हुए यज्ञ को आप फलयुक्त बनाने वाली हैं - यही तात्पर्य है-" अध्वरो वै यज्ञः । प्राची प्रेतं यज्ञं कल्पयन्ती - इत्येवैतदाह " । इस यज्ञ को आप स्वर्ग लोक में - देव लोक में अर्थात् २१ वें स्थान में ले जाइए - यही तात्पर्य है । " ऊर्ध्वमिमं यज्ञं देवलोकं नयतमित्येवैतदाह मा जिह्वरतम् " । इस यजमान के लिए अह्वला चाहते हैं । यदि हविर्धान गुड़क जाएगा तो यज्ञ गुड़क जाएगा-यज्ञ गुड़क जाएगा तो यजमानात्मा स्वर्ग से च्युत हो जाएगा । इस प्रकार परम्परा सम्बन्ध से गुड़कने का फल ' यजमान को भोगना पड़ता है । ऐसा न हो, यजमान का दिव्यात्मा स्वर्गलोक से च्युत न हो, श्रतएव ' मा जिह्वरतम् ' कहा है-" तदेतस्माऽअह्वलामाशास्ते " । इन दोनों हविर्धानों को अच्छी प्रकार से मजबूती से उठा कर ही उस नियत स्थान पर रखने चाहिए - जिससे कि वे दोनों वागुत्सर्जन न करें अर्थात् दोनों की ऐसी सावधानी से उठाकर रखना चाहिए जिससे कि जरा भो व्वनि न हो । हविर्धान शकटों में से जरा भी घड़घडाट नहीं निकलना चाहिए-" समुद्गृह्येव ( सम्यगुद्धृतं गृहीत्वेव ) प्रवर्तयेयुर्यथा नोत्सर्जेताम् ” । ऐसा क्यों करें - इसका कारण बतलाते हैं । अक्ष में - धुरे में रगड़क से जो आवाज होती है वह-असुर्यावाक् है । जो श्रवणकटु होती है - यह सब असुवाक् है । गाड़ी का जो घड़घड़ाटा है - वह श्रवण कटु है अतएव हम इसे सूर्य्या कहने के लिए तैय्यार हैं । हमारे दिव्य कर्म में - यह हविर्धान- प्रासुरी-राक्षसी वाक् न बोले अतएव धीरे से ही हविर्धानों को रखना चाहिए । " असुर्या वाडएषा वाग्याऽक्षे नेदिहासुर्या वाग् वदादिति " । यदि खूब सावधानी करने पर भी हविर्धान में से शब्द हो जाए तो -“ यद्युत्सर्जेताम् ” ॥१७ ॥

" एतद् वाचयेत् ” । उसी समय निम्नलिखित मन्त्र पढ़वाएँ -मिति " । " स्वंगोष्ठमावदतं देवी दुर्गे आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्ट-[ ११२ ]