Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 131–140
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण " हे देवी ( हविर्द्धा! ) हे दुर्ये! ( गृहेषु साधुरूपे ) युवां - यजमानस्य स्वभूतं गोष्ठं प्रावदतम् । पशवः समृद्धाः स्युरिति ब्रूतम् । अस्मदायुषं - मा निर्बाधिष्टम् । प्रजां मा निर्बाधिष्टम् " । हविर्धान! आप यजमान के जो पशु हैं वे समृद्ध हों - यही वाणी बोलिए । श्राप हमारी आयु की रक्षा कीजिए एवं पुत्रादि की रक्षा कीजिए अर्थात् प्रापका शब्द करना हमारे अनिष्ट का कारण न - ऐसी कृपा कीजिए । जो असुर्या ध्वनि थी - उसकी यह प्रायश्चित्ति है । इस मन्त्र के प्रभाव से असुर्या बाजनित अनिष्ट निवृत्त हो जाता है-19 " तस्यो हैषा प्रायश्चित्तिः ॥ १८ ॥
कितने ही याज्ञिकों का कहना है कि उत्तरावेदि से पश्चिम की ओर तीन विक्रम आक्रमण करे और वहाँ पर हविर्धान रखे । उत्तरावेदि से तीन विक्रम अर्थात् ७ पैड़े - पश्चिम में दोनों हविर्धान स्थापित हैं-करने चाहिए - यही उनका अभिप्राय है परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इसका खण्डन करते - इस बन्धन हुए कहते की कोई यहाँ मात्रा का नियम नहीं है । उत्तरवेदि से तीन ही विक्रम पश्चिम में रखने चाहिए और न भिड़ा आवश्यकता नहीं है । जहाँ अपने मन से ठीक समझें वहीं - न उत्तरावेदि से एकदम दूर करके ही दोनों हविर्धानों को स्थापित कर दें-" तदाहु: - उत्तरवेदेः प्रत्यङ् प्रक्रामेत्, त्रीन् विक्रमान् । तत् ( तत्र ) हवि -धने स्थापयेत् । सा हविर्धानयोर्मात्रा । नात्र मात्राऽस्ति । यत्रैव स्वयं मनसा मन्येत । नाहैव सत्रा आत्यन्तिके नो दूरे तत्स्थापयेत् " ॥१ ९ ॥ को स्थापित इस प्रकार उत्तरावेदि से पश्चिम पृष्ठ्यासूत्र से उत्तर - दक्षिण में दोनों हविर्धानों करके निम्नलिखित मन्त्र से उनका अभिमन्त्ररण ( स्तुति ) करता है -" अत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्या इति " । ( वा ० सं ० ५।१७ ) का ही इस प्रदेश में पृथिवी के शरीर पर हविर्धान रमण करे । यह हविर्धान है कि उत्तरावेदि मण्डप पृथिवी द्युलोकस्था-शरीर बनता है एवं द्युलोक में इसका ग्राहवनीय होता है । तात्पर्य यही विक्रम पर है अतएव प्राचीनों ने नीय है एवं हविर्धन पृथिवी स्थानीय है । पृथिवी से द्युलोक तीन में स्थापित करने के लिए कहा पृथिवी स्थानीय हविर्धान मण्डपों को उत्तरावेदि से तीन विक्रम पश्चिम पर द्युलोकस्थ आहवनीय - उत्तरा-था । प्रकृतिमण्डल में जो द्युलोकस्थ ग्राहवनीय है उसी की नकल प्रदेश को पृथिवी का शरीर वेदस्थ आहवनीय है एवं पृथिवी स्थानीय हविर्धान है प्रतएव इस हविर्धन बतलाया है-[ ११३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण ते ( स्थापनानन्तरं हविर्द्धानि ) अभिमन्त्रयते त्र रमेथा वर्ष्मन् ( वर्ष्मरिण ) पृथिव्याः । वर्ष्म ह्येतत् पृथिव्यै ( व्याः ) भवति । दिवि ह्यस्याहवनीयो भवति ( यस्मात् उपरिभागे उत्तरवेदिरूपः श्राहवनीयः बुलोकस्थानीयः प्रतस्तदधो-वर्तवेदिदेशस्य पृथिवीशरीरत्वं युज्यते इति भावः ) " । दोनों हविर्धा पृष्ठसूत्र के उत्तर - दक्षिण में रखे जाते हैं । इसमें पृष्ठ्यासूत्र जो दक्षिणस्थान उसके और उत्तर स्थान के ठीक केन्द्र में हविर्धानों को रखते हैं । दोनों को केन्द्र में रखना है-यही तात्पर्य है । जो वस्तु केन्द्र में रहती है - उसको पतन का भय नहीं रहता है । केन्द्र चाहिए-कल्याण का स्वरूप है अर्थात् प्रह्वला का स्वरूप है अतएव केन्द्र में ही हविर्धानों को स्थापित में रखना चाहिए- करना
" नभ्यस्थे करोति । तद्धि क्षेमस्य रूपम् " ॥२० ॥
श्रध्वर्यु दक्षिण हविर्धान में रहता है । वहाँ से दक्षिण हविर्धान के उत्तर में से श्राकर • हविर्धान के नीचे पृष्ठ भाग की ओर एक काष्ठ लगाता है । शकट गिर न जाए इसके दक्षिण लकड़ी लगाई जाती है - उसे मेथी कहते हैं । उसी को लगाता है । लिए जो एक " अथोत्तरेण ( दक्षिण हविर्धानस्योत्तरतः ) पर्येत्याध्वर्युः दक्षिणं हवि-धनमुपस्तम्नाति ( हविर्धानं यथा प्रधो न पतेत् तथा कस्मिश्चित् काष्ठे स्थाप-यति - इति भावः ) " । उपस्तम्भन करते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलता है -" faruti वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो भायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगाय विष्णवे त्वा " । ( वा ० सं ० ५।१८ ) " विष्णोः ( त्रिविक्रमावतारस्य यज्ञमूर्तेः ) वीर्याणि ( पराक्रमरिण मा कर्माणि ) प्रवोचम् प्रब्रवीमि ) तानि वीर्याणि कानि तदुच्यन्ते- महि-( विष्णु: ) पार्थिवानि ( पृथिवीसम्बन्धीनि ) रजांसि ( स्तोम लोकानि ) विम -यः ( विविधं यथा स्यात् तथा परिच्छिन्नवान् ) अपिच यः उत्तरम् ( उपरितनं) . सधस्थम् ( सहस्थानं द्युलोकम् ) ( इदं विश्वम् ) त्रेधा विचक्रमाण: उरुगायः ( बहुभिर्महात्मभिः श्रुत्यादिमुखेन या स्तूयमानः सन् ) अस्कभायत् ( स्तम्भित-वान् ) एतादृश्यस्य विष्णो वीर्याणि प्रवोचम् ” । [ ११४ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण जिस विष्णु ने - पृथिवी के परमाणुत्रों को नाप डाला है - जिसे पृथिवी के यच्चयावत् परमाणुओं की संख्या मालूम है एवं जिसने इस विश्व को तीन विक्रमों से नापते हुए द्युलोक को ऊपर रहा हूँ ही | स्तम्भित तात्पय्यं कर रखा है एवं जो अतिस्तूयमान है - ऐसे विष्णु के पराक्रमों का मैं आज बखान कर यही है कि द्युलोक और पृथिवी लोक के बीच में स्तम्भ स्वरूप वह यज्ञ मूर्ति विष्णु खड़े हुए हैं । इस पृथिवी है और उस ओर द्यौ है । क्या मजाल दोनों अपने स्थान से च्युत हो जाएँ । दोनों सर्वथा विष्णु स्थिर भाव से खड़े है | यह इसी विष्णु की महिमा है । अपिच रोदसी त्रिलोकी का निर्माण यही न होते तो करते हैं । यदि यज्ञ न होता तो त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश स्तोम ही न होते । यदि स्तोम । त्रिलोकी विभाग ही न होता । श्रपिच यह त्रिलोकी पृथिवी के परमाणुत्रों से ही सम्बन्ध रखती है पृथिवी का अमृताग्नि ही घन - तरल - विरल भेद से रोदसी स्वरूप में परिणत हो जाता है । अर्थात् ही ' पार्थिवानि विममे रजांसि कहा है । श्राज यह जो उत्तम्भिनी लगाई गई है - वह विष्णु के लिए के अर्थात् यज्ञ के लिए ही लगाई गई है । इस प्रकार ' विष्णवे त्वा ' बोलता हुआ अध्वर्यु उस हविर्धान के लिए नीचे मेथी अर्थान् खूँटा लगा देता है । हे मेथी! हे स्तम्भ! मैं विष्णु के लिए अर्थात् यज्ञ मेथी गाड़ देता है । " विष्णवे त्वेति मेथीमुपनिहन्ति । " परन्तु तुम्हें गाड़ता हूं । यह कहता हुआ अध्वर्यु जाती है - इस हविर्धान इतना विशेष अवश्य समझ लेना चाहिए- पार्थिव शकट में जिस और मेथी लगाई कर्म से विप-शंकट में ठीक उसके विपरीत लगाई जाती है । चूँकि यह दिव्य कर्म है अतएव मनुष्य रीत करना ही उचित है -" इतरतस्ततो यदु च मानुषें " ॥२१ ॥
है-इसके बाद प्रतिप्रस्थाता निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ उत्तरहविर्धान के नीचे मेथी लगाता " अथ प्रतिप्रस्थाता उत्तरं हविर्धानमुपस्तम्नाति " - इति । “ दिवो वा वि ons उत वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । त्वा ” । उभा हि हस्ता वसुना पूरणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद् विष्णवे ( वा ० सं ० ५।१६ ) " हे विष्णो! दिवः ( द्युलोकात् ) उत पृथिव्या: ( सकाशात् हस्तौ ) हे विष्णो! - महः ( महतः ) उरो: ( विस्तीर्णात् ) अन्तरिक्षात् - उभौ ). वसुना ( धनेन ) पृणस्व ( पूरय ) ततो- दक्षिरणात्, सव्याच्च हस्तात् श्रा ( सर्वतः ( यजमानाय वसु ) प्रयच्छ " । में भर कर दोनों-विष्णु! पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यो तीनों लोकों में से संपत्ति को अपनी विष्णु मुट्ठी के लिए मण्डप दो हाथों से वह संपत्ति यजमान को प्रदान कीजिए । हे मेथी से विपरीत ! ऐसे प्रदाता ही गाड़ी जाती है । हैं तएव उभी कहा गया है । यह मेथी भी मानुष शकट [ ११५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मरण " मेथीमुप निहन्तीतरतस्ततो यदु च मानुषे " । इस मेथी स्थान में विष्णु देवता के मन्त्र बोलने का कारण यही है कि यह हविर्धान विष्णु देवता से सम्बन्ध रखने वाले हैं- जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है-" तद्यद्वैष्णवैर्य जुभिरुपचरन्ति वैष्णवं हि हविर्धानम् " ॥२२ ॥
हविर्धानों में तीन चटाइयाँ लगाई जाती हैं । एक पृष्ठ भाग में एक मध्य में - एक रराठी शकट के अन्त स्थान में लगाई जाती है । इन तीनों में से जो बीच की छदि ( चटाई ) है उसका अर्थात् करके अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है— - स्पर्श " प्रथ मध्यमं छदिरुपस्पृश्य वाचयति " । " प्रतद् विष्णुस्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । rering त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा " । ( वा ० सं ० ५।२० ) " विष्णु: - वीर्येण ( पराक्रम महिम्ना ) स्तवते ( लौकैः प्रस्तूयते ) कुत्सितं यथा स्यात्तथा हिंसन् संचरन् - भीम: ( सर्वप्राणिभीतिजनकः ) गिरिष्ठाः ( गिरिस्थायी ) मृगो न ( सिंहतुल्योऽयं विष्णुः ) यस्य ( विष्णोः ) उरुषु ( अतिविस्तृतेषु विपुलेषु ) त्रिषु विक्रमणेषु - विश्वा भुवनानि ( सर्वाणि भुव-ना न f ) अधिक्षियन्ति ( अधिनिवसन्ति ) ” । मनुष्य वर्ण पराक्रमाधिक्य के कारण विष्णु की स्तुति किया करते हैं ग्रर्थात् विष्णु का जबर्दस्त पराक्रम है जिससे हमको झक मार कर उनकी स्तुति करनी पड़ती है । जिस प्रकार इतना क्रम से सबका दमन करता हुआ गिरिकन्दराओं में घूमा करता है तथैव यह विष्णु सिंहवत् सिंह परा-त्रिलोकी के तमप्रधान असुरों का दमन करता हुआ घूमा करता है । इस विष्णु के प्रतिविस्तृत जो रोदसी पञ्चदश- एकविंश ये तीन विक्रम हैं इनके पेट में सारे लोक सभा रहे हैं । सारी रोदसी त्रिलोकी त्रिवृत्-विष्णु के तीनों पाँवों के विक्रम में समाई रहती है । भला ऐसे विष्णु की स्तुति से कौन इस सकता है? यह हविर्धान विष्णु का शिर है, यह पूर्व में बतला दिया गया है । इस हविर्धान विमुख स्वरूप हो मस्तक के बीच की जो चटाई है वही इसका अग्रकपाल है । हमारे मस्तक में पूर्व और पश्चिम दो कपाल प्रत्यक्ष दीखते हैं । इनमें से प्रत्येक में चार - चार कपाल होते हैं, जिनका प्रत्यक्ष चारों के प्रयोग से हो सकता है । इन श्राठ कपालों के बीच में भेजा होता है - जिसे पुरोडाश कहते हैं । इन आठों कपालों में जो अग्रकपाल होता है- अन्य सातों कपालों की सत्ता उसी के आधार पर रहती है । हविर्धान मस्तक है - इसकी जो मध्य की छदि है - वह मध्य का विक्रम है, अन्तरिक्ष स्थानीय विक्रम है शकट । अन्त- का [ ११६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मणे यज्ञपुरुष ब्राह्मण रिक्ष में बैठे हुए विष्णु ने दोनों चोर से पृथिवी और द्यौ दोनों को स्तब्ध कर रखा है । यह मध्यम कपाल है । अन्य सारे कपाल इसी के आधार पर रहते हैं अतएव ' अधिक्षियन्ति ' कहा है-" इदं ( मध्यमं छदिः ) हैवास्यैतच्छीर्षकपालं यदिदमुपरिष्टात् । प्रधीव ह्येतत्क्षियन्ति श्रन्यानि शीर्षकपालानि ( शीर्षकपालस्थानानि श्रन्यानि छन्दोंषि
अत्रैव मध्ये निवसन्ति ) । तस्मादाह अधिक्षियन्तीति ॥ २३ ॥
इसके बाद रराटी ( शकटाग्रभाग ) का स्पर्श करके निम्नलिखित मन्त्र बुलवाते हैं-" विष्णो रराटमसि ' इति । ( वा ० सं ० ५।२१ ) बास्तव में यह अग्रभाग यज्ञ - विष्णु का ललाट है अतएव ' विष्णो रराटमसि ' कहा है । ' ललाट हैवास्यैतत् ' । शकट के अग्रभाग में इसे समतल बनाने के लिए दो लम्बी लकड़ियाँ लगी रहती हैं- इन्हें कस्तम्भी और उच्छ्रायी नाम से व्यवहृत करते हैं । उसका स्पर्श करते हुए बोलते हैं - ' विष्णोः श्नपत्रे स्थ ( वा ० सं ० ५। २१ ) इति । ' श्राप विष्णु की गलफाड़ हो । ' स्रक्वे हैवास्यैते ' ( वा ० सं ० ५। २१ ) इति । ' इस शटक के पश्चिम भाग में जो छदि होती है वह इस यज्ञ - मस्तक का पश्चिम कपाल है--" अथ यदिदं पश्चाच्छदिर्भवतीदं हैवास्यैतत् शीर्षकपालं यदिदं पश्चात् " || २४ || इसके बाद हविर्धान मण्डप की जो द्वारा शाखा है उसे बहि से लपेट कर ' विष्णो स्यूरसि ' यह बोलते हुए सुतली पिरोए हुए सूए से सीते हैं आप विष्णु के स्यूत प्रदेश हो - यही मन्त्र का अर्थ है । सीने के बाद ' विष्णो ध्रुवो s सि ' बोलते हुए उसमें गाँठ लगा देते हैं । यह बाँदरवार खुल न जाए इसीलिए इसके अन्त में गांठ लगाई जाती है । " नेवपद्याताऽइति ( तस्माद् ग्रन्थि करोति - इति शेषः ) " । इसके बाद जब सोमयज्ञ समाप्त हो जाए तो इस ग्रन्थि को खोल दे ---" तम् ( ग्रन्थिम् ) प्रकृते ( परिसमाप्ते ) कर्म्मन् ( कर्म्मरिण ) विष्यति ( विमुञ्चेत् ) " । यज्ञ समाप्त होने पर भी यदि यह गाँठ न खोली जाएगी तो यह गाँठ यजमान और अध्वर्यु को पकड़ लेगी अर्थात् इसके गठिया वात की बीमारी हो जाएगी । यदि खोल देता है तो उसके बीमारी नहीं होती है--" तथो हाध्वर्युं वा यजमानं वा ग्राहो न विन्दति " । [ ११७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) II शतपथ ब्राह्मण यज्ञपुरुष ब्राह्मण जब अध्वर्यु गाँठ लगा लेता है तो उस स्यूत ( निष्ठित ) स्थान का ' वैष्णवमसि ' यह बोलता हुआ स्पर्श करता है | चूँकि यह हविर्धान विष्णु देवता का है अतएव यहाँ सारी कथाएँ वैष्णवी ही बोली जाती हैं-" तन्निष्ठितं ( स्यूतम् ) अभिमृशति - वैष्णवमसीति । वैष्णवं हि हवि -धनम् ॥२५ ॥
॥ इति यज्ञपुरुषब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति पञ्चमाध्याये तृतीयं ब्राह्मरणम् समाप्तम् ॥ [ ११५ ]
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पञ्चमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' उपरव ब्राह्मणम् ' [ मूल ] द्वयं वाऽअभ्युपरवाः खायन्ते । शिरो वै यज्ञस्य हविर्धानं तद्य शीर्षश्चत्वारः कूपाऽइमावह द्वाविमौ द्वौ तानेवैतत्करोति तस्मादुपरवा खनति ॥१ ॥
देवाश्च वासुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुरा एंबु लोकेषु कृत्यां वगान्नचख्नुरुतै वञ्चिद्देवानभिभवेमेति ॥ २ ॥
तद्वै देव sagar | as एतैः कृत्यां वलगानुदखनन्यदा वै कृत्यामुत्ख-नन्त्य सालसा मोघा भवति तथोऽएवैष एतद्यद्यस्मात्र कश्चिद्विषन् भ्रातृव्यः कृत्यां वलान्निखति तानेवैतदुत्किरति तस्मादुपरवान्खनति स दक्षिणस्य हवि धनस्याधो s धः प्रउगं खनति ॥ ३ ॥
सोऽभ्रमादत्ते । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ता-भ्यामाददे नार्यसीति समान एतस्य यजुषो बन्धुर्योषो वाऽएषा यदभिस्तस्मादाह नार्यसीति ॥४ ॥
तान्प्रादेशमात्रं विना परिलिखति । इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामीति वज्रो वार्विवैतन्नाष्ट्राणां रक्षसां ग्रीवाऽअपिकृन्तति ॥ ५ ॥
तद्यावेतौ पूर्वी । तयोर्दक्षिणमेवाग्रे परिलिखेदथापरयोरुत्तरमथापर-योईक्षिणमथ पूर्वयोरुत्तरम् || ६ || अथोऽइतरथाऽहुः । श्रपरयोरेवाग्रऽउत्तरं परिलिखेदथ पूर्वयोर्दक्षिणमथा-परयोर्दक्षिरणमथ पूर्वयोरुतरमित्यथोऽपि समीच एव परिलिखेदेतं त्वेवोत्तमं परिलिखेद्य एष पूर्वयोरुत्तरो भवति ॥ ७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपर ब्राह्मण तान्यथा परिलिखितमेव यथापूर्वं खनति । बृहन्नसि बृहद्रवाऽइत्युपस्तौत्येवै नानेतन्मयत्येव यदाह बृहन्नति बृहद्रवाऽइति बृहतीमिन्द्राय वाचं वदेतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता वैष्णवं हविर्धानं तत्सेन्द्रं करोति तस्मादाह बृहतीमिन्द्राय वाचं वदेति || ८ || रक्षोहणं वलगहनमिति । रक्षसां ह्येते वलगानां बधाय खायन्ते वैष्णवी-मिति वैष्णवी हि हविर्धाने वाक् ॥९ ॥
तान्यथाखातमेवोत्किरति । इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ठयो यममात्यो निचखानेति निष्ठ्यो वा वाऽअमात्यो वा कृत्यां वलगान्निखनति ताने-वैतदुरिकरति ॥१० ॥
इदमहं तं वलगमुत्किरामि । यं मे समानो यमसमानो निचखानेति समानो वा वा s समानो वा कृत्यां वलगान्निखनति तानेवैतदुत्किरति ॥११ ॥
दहं तं वलगमुत्किरामि । यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुनिचखानेति सबन्धुर्वा वा s असबन्धुर्वा कृत्यां वलगान्निखनति तानेवैतदुत्रिति ॥१२ ॥
इदमहं तं बलगमुत्किरामि । यं मे सजातो यमसजातो निचखानेति सजातो वा वासजातो वा कृत्यां वलगान्निखनति तानेवैतदुत्किरत्युत्कृत्यां किरामत्यन्तत उद्वपति तत्कृत्यामुत्किरति ॥१३ ॥
तान्याहुमात्रान्नेत् । अन्तो वाऽएषोऽन्तेनैवैतत्कृत्यां मोहयति तान-या संतृन्दन्ति यद्यक्ष्णया न शक्नुयादपि समीचस्तस्मादिमे प्राणाः परः संतृणाः ॥१४ ॥
तान्यथाखातमेवावमर्शयति । स्वरा s सि सपत्नहा सत्रराजस्यभिमा-तिहा जनरा s सि रक्षोहा सर्वराडस्यमित्रहेत्याशीरेवैषैतस्य कर्मणश्राशिषमेवैत-दाशास्ते ॥१५ ॥
प्रथाध्वर्युश्च यजमानश्च सम्पृशेते । पूर्वयोर्द्दक्षिणेऽध्वर्युर्भवत्यपरयोरुत्तरे यजमानः सोऽध्वर्युः पृछति यजमान किमत्रेति भद्रमित्याह तन्नौ सहेत्युपां-श्वध्वर्युः ॥१६ ॥
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7 तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण श्रथापरयोर्द्दक्षिणेऽध्वर्युर्भवति । पूर्वयोरुत्तरे यजमानः स यजमानः पृच्छ-त्यध्वय किमत्रेति भद्रमित्याह तन्म इति यजमानस्तद्यदेवं सम्मृशेते प्राणाने-वैतत्सयुजः कुरुतस्तस्मादिमे प्राणाः परः संविद्रेऽथ यत्पृष्टो भद्रमिति प्रत्याह कल्याणमेवैतन्मनुष्ये वाचो वदति तस्मात्पृष्टो भद्रमिति प्रत्याहाथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षणस्य बन्धुर्मेध्यानेवैतत्करोति ॥१७ ॥
स प्रोक्षति । रक्षोहरणो वो वलगहनऽइति रक्षोहणो ह्येते वलगहनो ह्येते प्रोक्षामि वैष्णवानिति वैष्णवा ह्येते ॥ १८ ॥ ।
अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्यन्ते । ता अवटेष्ववनयति तद्या इमाः प्राणेष्वापस्ता एवैतद्दधाति तस्मादेषु प्राणेष्विमाप्रापः ॥ १६ ॥
सोऽवनयति रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयामि वैष्णवानित्यथ बहषि प्राचीनाग्राणि चोदीचीनाग्राणि चावस्तृणाति तद्यानीमानि प्राणेषु लोमानि तान्येवैतद्दधाति तस्मादेषु प्राणेष्विमानि लोमानि ॥ २० ॥
सो s वस्तृणाति । रक्षोहणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णवानित्यथ बर्हीषि तनूनीवोपरिष्टात्प्रच्छादयति केशा हैवास्यैते ॥ २१ ॥
प्रथाधिषवणे फलकेऽउपदधाति । रक्षोहणौ वां वलगहनाऽउपदधामि arrat sa ति हनू हैवास्यैतेऽथ पर्यूहति रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवऽइति हत्येवैनेऽएतदशिथिले करोति ॥ २२ ॥
प्राधिषवणं परिकृत्तं भवति । सर्वरोहितं जिह्वा हैवास्यैषा तद्यत्सर्व-रोहितं भवति लोहिनीव होयं जिह्वा तन्निदधाति वैष्णवमसीति वैष्णवं ह्येतत् || २३ || अथ ग्राव्ण उपावहरति । दंता हैवास्थ ग्रावारणस्तद्यद्ग्रावभिरभिषुण्वन्ति यथा दद्भिः प्सायादेवं तत्तान्निदधाति वैष्णवा स्थेति वैष्णवा ह्येतऽएतदु यज्ञस्य शिरः संस्कृतम् ॥ २४ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरेव ब्राह्मण [ अनुवाद ] यज्ञपुरुष ब्राह्मण में बतलाया गया है कि हविर्धानमण्डप विष्णु देवता के सम्बन्ध से यज्ञ का मस्तक है । मस्तक में दो तो कान व दो नासिका में कुल चार छिद्र होते हैं । अतएव तदनुसार इस मानुषयज्ञ में यज्ञमस्तकरूप हविर्धानमण्डप में इन्द्रियस्थानीय चारे कूप ( खड्डे ) बनाये जाते हैं । इन्हें उपरव कहा जाता है । अर्थात् चार खड्डे खोदना हविर्धानमण्डप रूप यज्ञ के मस्तक में २ नाक के व २ कान के छिद्रों को बनाना है ॥१ ॥
दूसरा प्रयोजन बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि असुरों ने सोचा कि शस्त्रास्त्रों के द्वारा तो हम देवताओं को मारते ही हैं परन्तु कृत्या प्रयोग द्वारा भी इनको पराजित कर दें, नष्ट कर दें । इस प्रकार मन्त्ररणा कर असुरों ने कृत्या साधनभूत वलगा को भूमि में गाड़ दिया || २ || देवता असुरों से अधिक बुद्धिमान थे । उन्होंने गुप्तचरों द्वारा असुरों की पाप - लीला को जान कर कृत्यासाधनभूत, भूमि में गाड़ी हुई वलगा को उपरवों से नष्ट कर दिया । चतुर्दश भूतसर्गों में पशु, पक्षी, सर्प, कीट, स्थावर भेद से पञ्चविध तामस सर्ग हैं | ब्रह्मा, प्रजापति, देव, पितर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस व पिशाच ये अष्टविध सात्त्विक सर्ग हैं । इनमें अन्तिम चार प्रकार का सर्ग लोकों की हानि करने वाला, दुःख पहुँचाने वाला है । दोनों सर्गों में जो राक्षस सर्ग है वहीं कृत्यारूप है । इस राक्षसरूप कृत्या को वलगारूप साधन के द्वारा वश में किया जाता है । चौराहे में चतुर्मुख दीपक रखना, मूठ चलाना, किसी के घर में सेही का काँटा रख देना आदि साधनों से जिस अनिष्टकारिणी शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, वही कृत्या कहलाती है । उसी प्रकार यजमान भी खड्डा खोद कर इस कृत्या - साधनभूत वलगा को उखाड़ कर उसे सारहीन, व्यर्थ बना देता है । किन्तु जब भी यज्ञ होता तो देवता पुनः वहाँ कृत्या प्रयोग कर देते । तब उन्होंने उससे सदा के लिए परित्राण पाने हेतु इन चार उपरवों का विधान किया । यज्ञ चार उपरवों के बनाने से असुरों की सम्पूर्ण कृत्याएँ नष्ट हो जाती हैं । क्योंकि पार्थिव विद्युत् सारी पृथिवी में एक ही है । दक्षिण हविर्धान का को प्रउग ( शकट की दोनों ईषाओं के मिलने का प्रदेश ) है उसके नीचे उपरव खोद देता है अर्थात् शकट के पहियों के दोनों ओर दो लम्बी लकड़ियां लगी रहती हैं । वे लकड़ियां उत्तरोत्तर संकुचित होती जाती हैं अर्थात् उनके मध्य का अन्तर कम होता जाता है । अन्त में जा कर दोनों मिल जाती हैं । इन लकड़ियों को ईषा कहते हैं । इन दोनों ईषाओं का जो मिला हुआ अन्तिम प्रदेश है उसे ही प्रउग कहते हैं । प्रउग हविर्धन शकट का मस्तक है । ये चारों उपरव मस्तक स्थानीय छिद्र हैं । अतः इन्हें प्रउग के नीचे ही खोदना चाहिए ॥ ३ ॥
अध्वर्यु यह मंत्र बोलता है - देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽअश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ता-भ्यामाददे नार्यसि - सभी कार्यों के लिए अनुज्ञा प्रदान करने वाले सविता देवता के आदेश [ १२२ ]