Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 141–150

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण अश्विनी कुमारों की बाहुनों से व पूषा देवता के हाथों से हे स्त्रीरूपा अनि! मैं आप को उठाता हूँ । अनि स्त्रीलिङ्ग है अतः उसे नारी कहा गया है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस यजुर्मन्त्र का अर्थ शतपथ ब्राह्मण ( १।१।२।२७ ) में बतलाया जा चुका है, वही अर्थ यहाँ है || ४ || एक उपरव से दूसरे उपरव के मध्य में प्रादेशमात्र ( 10 अंगुल जगह छोड़ कर इन उपरवों को बनाना चाहिए । उपरव के लिए अभि से रेखा खींचते समय - ' इदमहं रक्षसां ग्रीवा s पिकृन्तामि ' अर्थात् मैं इस अत्रि से कृत्यारूप राक्षसों की ग्रीवा काटता हूँ - इस मन्त्र का उच्चारण करता है । यह अभ्रि वस्त्र है । इस अभिरूप वज्र से अध्वर्यु राक्षसों की ग्रीवा काटता है । राक्षसों की विनाशकारिणी शक्ति को ही नाष्ट्रा कहते हैं ॥ ५ ॥

इन चारों उपरवों में किस क्रम से अभि से रेखा खींचे यह बतला रहे हैं-इन चारों उपरवों को खोदने के दो प्रकार हैं - एक अक्ष्णा प्रकार और दूसरा समीचीन प्रकार | उनमें से अक्ष्णा प्रकार का निरूपण किया जा रहा है: -- प्रउग के नीचे पूर्व दिशा में दो उपरवों पर रेखाएँ खींची जाती हैं, उन दोनों में पहिले दक्षिण के प्रर्थात् आग्नेयकोण • के ऊपर रेखा खींचे । इसके बाद पश्चिम दिशा की ओर के जो दो उपरव हैं उनमें उत्तर की ओर अर्थात् वायव्य कोण के ऊपर रेखा खींचे । इसके बाद पश्चिम दिशा के दक्षिण की ओर के उपरव अर्थात् नैर्ऋत्य कोण के ऊपर रेखा खींचे । अन्त में पूर्व दिशा में वर्तमान दो उपरवों में उत्तर की ओर के अर्थात् ईशान कोण के उपरव पर रेखा खींचे ॥ ६ ॥

कतिपय आचार्यों के अनुसार प्रउग के नीचे पश्चिम दिशा की तरफ जो दो उपरव ( श्रवट ) हैं उनमें पहले उत्तर की ओर के अर्थात् वायव्य कोण के उपरव पर रेखा खींचे । पश्चात् पूर्व दिशा के दो उपरवों में दक्षिण की ओर के अर्थात् आग्नेय कोण के उपरव पर रेखा खींचे । इसके बाद पश्चिम दिशा में दक्षिण की ओर के अर्थात् नैर्ऋत्य कोण के उपरव पर रेखा खींचे । पश्चात् पूर्व दिशा के दो उपरवों में उत्तर की ओर के अर्थात् ईशान कोण के उपर पर रेखा खींचे । इस तरह दो प्रकार के प्रक्ष्ण्या क्रम का उल्लेख कर अब समीचीन प्रकार का निरूपण किया जा रहा है । सीधे क्रम से आग्नेय कोण के उपरव से प्रारम्भ कर प्रदक्षिणा क्रम से उपरवों पर रेखा खींचे । प्रथम ग्राग्नेय कोण के उपरव पर, पश्चात् नैर्ऋत्य कोण के, तत्पश्चात् वायव्य कोण के और अन्त में ईशान कोण के उपरव पर रेखा खींचे । किन्तु पूर्व दिशा के उपरवों में उत्तर की ओर के अर्थात् ईशान कोण के उपरव पर अन्त में ही रेखा खींचे । अर्थात् चाहे अक्ष्ण्या प्रकार हो या समीचीन प्रकार, दोनों में ही ईशान कोण के उपरव पर ही रेखा खींच कर उसकी समाप्ति करनी चाहिए, क्यों कि ईशान अपराजिता दिक् है । यहाँ आकर असुर सर्वात्मना पराजित हो जाते हैं । अतः यहीं पर श्रा कर असुर राक्षसों की ग्रीवा काटने की प्रक्रिया को समाप्त करना चाहिए ॥७ ॥

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पृष्ठ 142

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण तदनन्तर जिस क्रम से उपरवों पर रेखा खींची है, उसी क्रम से उन्हें खोदता है । अर्थात् अक्ष्ण्या प्रकार से रेखा खींची है तो उसी प्रकार से ( क्रम से ) उनका खनन करना चाहिए | अक्ष्ण्याक्रम में भी यदि पहिले आग्नेय कोण या वायव्य कोण के उपरव पर रेखा खींची है तो उसी क्रम से उन उपरवों का खनन करना चाहिए । यदि समीचीन प्रकार से उपरवों पर रेखा खींची है तो उसी क्रम से उनको खोदे । खनन करते समय निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण किया जाता है: -' बृहन्नसि बृहद्रवा बृहतीमिन्द्राय वाचं वद । रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीम् ॥ इति ॥ ( वा ० सं ० ५।२२-२३ ) हे अवट! आप महान् हैं तथा बहुत जोरदार ध्वनि करने वाले हैं । अतः आप इन्द्र के लिए राक्षसों को नष्ट करने वाली तथा कृत्यासाधनभूत वलगा को मारने वाली विष्णु-देवता महती वाक् का उच्चारण करो । इन्द्र यज्ञ का देवता है । यह हविर्धान वैष्णव है । विष्णु बिना इन्द्र के नहीं रहता । अर्थात् बिना इन्द्र के यज्ञ नहीं होता । अतः इस यज्ञ को सेन्द्र बनाया जाता है । इसी अभिप्राय से ' बृहतीमिन्द्राय वाचं वद ' यह कहा जाता है || ८ || इन उपरवों से जो ध्वनि निकलती है उससे राक्षस मारे जाते हैं । हविर्धान में जो वाक् है वह विष्णुदेवता के सम्बन्ध से वैष्णवी है । पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु चारों उपरवों की मिट्टी खोदता है ॥ ॥ जिस क्रम से उपरवों को खोदा गया है उसी क्रम से उन अवटों से मिट्टी को बाहर फका जाता है । अर्थात् प्रक्ष्ण्या प्रकार के अनुसार पहले प्राग्नेय कोण के उपरव को खोदा गया है तो पहले उसी उपरव की मिट्टी को बाहर फेंकता है । सबसे पहले प्रक्ष्या प्रकार के अनुसार आग्नेय कोण के उपरव की मिट्टी को - ' इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ठ्यो यममात्यो निचखान ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ बाहर फेंकता है । अर्थात् मैं आज उस वलगा को उखाड़ कर फेंकता हूँ जिस वलगा को मेरे अपरिचित तथा परिचित शत्रु व्यक्ति ने भूमि में गाड़ा है । इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आग्नेय-कोण के उपरव को खोदता है और उसकी मिट्टी को बाहर फेंक देता है || १० || इसके बाद प्रक्ष्ण्या प्रकार के अनुसार वायव्य कोण के उपरव को ' इदमहं तं वलग-किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखान ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ खोदता है और उसकी मिट्टी को बाहर फेंकता है । जो प्रतिष्ठा में अपने बराबर है उसे समान कहते हैं । जो प्रतिष्ठा में अपने से अधिक या न्यून है उसे असमान कहते हैं । इस समान अथवा असमान व्यक्ति ने जो वलगा भूमि में गाड़ी है उसे ही मैं खोद कर बाहर फेंक देता हूँ ॥११ ॥

इसके पश्चात् ' इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुनिचखान ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ नैर्ऋत्य कोण के उपरव की मिट्टी को खोद कर बाहर फेंक देता [ १२४ ]

पृष्ठ 143

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण है । समान आजीविका वाले साथी को तथा एक पाठशाला में साथ पढने वाले साथी को सबन्धु तथा तद् भिन्न को असबन्धु कहते हैं । इन दोनों प्रकार के शत्रुनों ने जो भूमि में वलगा गाड़ी है उसी को पूर्वोक्त मन्त्र का उच्चारण करता हुआ नैर्ऋत्य कोण के उपरव को खोद कर मिट्टी सहित बाहर फेंक देता है अर्थात् कृत्यासाधनभूत वलगा को समूल उखाड़ कर - फेंक देता है, नष्ट कर देता है ॥१२ ॥

| इसके अनन्तर ' इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सजातो यमसजातो निचखान ' इति इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सजात ( सजातीय ) प्रसजात ( विजातीय ) शत्रु के द्वारा भूमि में जो कृत्यासाधनभूत वलगा गाड़ी है, उसको ईशान कोण में स्थित उपरव को खोद कर बाहर मिट्टी फेंक कर समूल उखाड़ फेंकता है । निष्ठ्य, अमात्य, समान, असमान, सबन्धु, असबन्धु, सजात व प्रसजात भेद से आठ प्रकार के जो शत्रु हैं, जो कि हम पर अनिष्टकारिणी शक्ति कृत्या का प्रयोग करने वाले हैं, उपरवों से मिट्टी निकाल कर यह अध्वर्यु उन्हीं के द्वारा किये गये कृत्या प्रयोग को उखाड़ कर फेंक देता है, नष्ट कर देता है । किन्तु इन से भिन्न शत्रु भी हो सकते हैं जो यजमान पर कृत्या का प्रयोग कर सकते हैं । उनकी कृत्या को उखाड़ने के लिए ' उत्कृत्यां किरामि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु चारों उपरवों में से थोड़ी - थोड़ी मिट्टी ले कर बाहर फेंक देता है । चारों उपरवों से मिट्टी फेंकने के बाद इन चारों से थोड़ी - थोड़ी मिट्टी ले कर और फेंकना उस सामान्य कृत्या को उखाड़ फेंकना है ॥१३ ॥

अब उपरवों के अन्तर- प्रदेश को चीरने का तथा उसके प्रकार का निरूपण किया जा रहा है । वह अध्वर्यु अक्ष्ण्या क्रम के अनुसार पूर्व दिशा में वर्तमान दो उपरवों ( छिद्रों ) में से दक्षिण की ओर वर्तमान प्राग्नेय कोण के उपरव के तथा पश्चिम दिशा में वर्तमान उपरवों में उत्तर की ओर वर्तमान वायव्य कोण के उपरव के अन्तराल प्रदेश को चीर देते हैं । इसी प्रकार पश्चिम दिशा में वर्तमान उपरवों में से दक्षिण की ओर के नैर्ऋत्य कोण के उपरव तथा पूर्व दिशा में वर्तमान उपरवों में से उत्तर की ओर वर्तमान ईशान कोण के उपरव के अन्तराल प्रदेश को चीर देते हैं । यदि प्रक्ष्या क्रम के अनुसार उपरवों के अन्तराल प्रदेश के वक्र होने से चीरना शक्य न हो तो समीचीन क्रम से उन उपरवों के अन्तराल प्रदेश को चीर देते हैं । क्यों कि ये उपरव के अन्तर्भाग संतृण्ण हैं, जैसे कि उपरव स्थान कर्ण नासिका रूप प्रारण ( इन्द्रियाँ ) भी अन्तः सन्तृण्ण हैं, चिरे हुए हैं ॥१४ ॥

अध्वर्यु हाथों से उन उपरवों को समतल बनाता है । चारों उपरवों के समतली-करण ( मर्श ) हेतु भिन्न - भिन्न मन्त्रों का विधान है । चारों उपरवों को क्रमशः इन स्वराट् चार, सत्रराट्, जनराट् तथा सर्वराट् कहते हुए उनसे सपत्न, अभिमाति, रक्ष, अमित्र -प्रकार के शत्रुओं के नाश एवं आशीः प्राप्ति की याचना की गयी है ॥१५ ॥

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पृष्ठ 144

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण उपरव तैय्यार होने के बाद पूर्व दिशा की ओर के दो उपरवों में जो दक्षिण की ओर का अर्थात् प्राग्नेय कोण का उपरव है, वहाँ अध्वर्यु बैठ जाता है और पश्चिम दिशा के • उपरवों में उत्तर के वायव्य कोण के उपरव के पास यजमान बैठ जाता है । इस प्रकार प्रक्ष्या प्रकार से अध्वर्यु और यजमान दोनों बैठ कर हाथ मिलाते हैं । तब वह अध्वर्यु यजमान से पूछता है कि यजमान! इस उपरव में क्या है? यजमान उत्तर देता है कि कल्याण ही कल्याण है । यह सुन कर अध्वर्यु धीरे से कहता है कि यह कल्याण हम दोनों का है । अर्थात् इस कल्याण में हम दोनों सम्मिलित हैं । वस्तुतः यज्ञ का फल यजमान का ही होता है क्यों कि यज्ञ का स्वामी वही है । इसलिए अध्वर्यु धीरे से कहता है कि इस कल्याण में हम -दोनों सम्मिलित हैं जिसे कि दूसरा न सुन सके । इसीलिए ' उपांशु ' शब्द का प्रयोग हुआ ॥१६ ॥

यजमान और अध्वर्यु जो परस्पर हाथ मिलाते हैं उसका कारण यह है कि अध्वर्यु और यजमान हाथ की विद्युत् द्वारा अपने प्राणों का परस्पर मेल करते हैं । चूँकि उपरब यज्ञ का मस्तक है, प्रारम्भ भाग है, अत: यहीं पर प्राणों का सम्मेलन अच्छा है । अपिच ये इन्द्रियरूप प्रारण इन चारों उपरवों के प्राणों को परस्पर मिलाते हैं । इन्हीं अध्यात्म के इन्द्रियरूप उपरवों की नकल पर इस वैध यज्ञ में उपरव बनाये जाते हैं । चूंकि अध्यात्म में चारों प्रारण मिले हुए हैं, अतः यहाँ वैध यज्ञ में भी अध्वर्यु और यजमान अपने प्राणों को मिलाने के साथ ही उन उपरवों के प्राणों को भी मिला देते हैं । अध्वर्यु और यजमान पर-' स्पर पूछने पर जो ' भद्रम् ' यह उत्तर देते हैं, उसका अभिप्राय यही है कि लोक में एक दूसरे से कुशल पूछने पर मनुष्य परस्पर कल्याणरूप वाक् का ही उच्चारण करें । अर्थात् यदि कोई मनुष्य किसी से पूछता है कि आपका क्या हाल चाल है तो वह उत्तर में यही कहता है कि आप की कृपा से सब कल्याण है । इस लौकिक मर्यादा के अनुसार मनुष्यों में परस्पर इसी प्रकार का प्रत्युत्तर होना चाहिए । इसके अनन्तर अध्वर्यु प्रोक्षणीपात्र में जल ले कर चारों उपरवों के बाहर की ओर चौतरफ इस जल को छिड़क देता है । प्रोक्षण करने का कारण यही है कि जल मेध्य अर्थात् सङ्गमन योग्यता वाले हैं । अतः इस जल के छिड़कने से उपरवों की मिट्टी में सङ्गमन-योग्यता आ जाती है और उसमें बिखराव नहीं होता || १७ || प्रोक्षण करते समय श्रध्वर्यु ' रक्षोहणो यो वलगहनः । प्रोक्षामि वैष्णवान् ' इस मन्त्र को बोलता है । अर्थात् ये उपरव राक्षसों का नाश करने वाले हैं एवं कृत्यासाधनभूत वलगा का नाश करने वाले हैं । हविर्धान विष्णु देवताक है तथा हविर्धान में बनाये हुए ये उपरव

भी विष्णु देवताक ही हैं । इसीलिए इन के लिए वैष्णवान् कहा गया है ॥ १८ ॥

प्रोक्षण के बाद प्रोक्षणीपात्र में जो जल बच जाता है उसे चारों उपरवों में डाल देता है | ये चारों उपरव चारों इन्द्रियरूप हैं । चारों इन्द्रियाँ प्राणस्वरूप हैं और अध्यात्म के [ १२६ ]

पृष्ठ 145

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण प्राण ' आपोमयः प्राण: ' इस छन्दोमय श्रुति के अनुसार श्रापोमय हैं । अर्थात् प्राणसत्ता पानी पर निर्भर है । अतः इन्द्रियों में स्नेहन करना चाहिए । ये उपरव भी प्राणस्वरूप हैं । अतः इनमें स्नेहन के लिए पानी डालना आवश्यक है ॥ १६ ॥

वह अध्वर्यु “ रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयामि वैष्णवान् ' अर्थात् राक्षसों को तथा वल्गा का नाश करने वाले आप को इन उपरवों में डाल देता हूँ । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रोक्षणीपात्र में बचे हुए जल को उपरवों में डाल देता है । इसके पश्चात् प्राची-नाग्र अर्थात् पूर्व की ओर मुख कर के व उदीचीनाग्र अर्थात् उत्तर की ओर मुख कर के कुशा को बिखेर देता है, डाल देता है । अध्यात्म में हमारे शरीर में जो लोक हैं वे ही इन्द्रियप्राणस्वरूप उपरवों की कुशाएँ हैं । इन उपरवों में कुशा डालना इनमें लोम उत्पन्न करना है | हमारे शरीर में लोम औषधियों से उत्पन्न होते हैं, जैसा कि प्रोषधीर्लोमानि ' यह श्रुति बतला रही है ॥२० ॥

वह ध्वर्यु ' रक्षोहरणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णवान् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस पर कुशा बिछा देता है, डाल देता है । इसके बाद कुशा के छोटे - छोटे टुकड़े • करके उस पर और डाल देता है, अर्थात् कुशा के टुकड़ों से उसे आच्छादित कर देता है । कुशा के इन टुकड़ों को उपरवों के केश समझना चाहिए । अर्थात् कुशा के टुकड़े उपरवों के केशरूप हैं ॥२१ ॥

इसके बाद ' रक्षणौ वां वलगहनाऽउपदधामि वैष्णवी ' इस मन्त्र का उच्चारण करता दो गुल के फासले पर दो शिलाएँ, जिनसे कि सोम कूटा जाएगा, पूर्व की तरफ मुख करके रख देता है । ये दोनों शिलाएँ इस यज्ञपुरुष के हविर्धान - रूप मस्तक की हनुस्थानीय हैं । तदनन्तर - ‘ रक्षोहणौ दां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ इन शिलानों को चौतरफ से दृढ ( अशिथिल ) बनाता है ॥ २२ ॥

इसके पश्चात् शिला के परिमाण का चमड़ा काटता है । यह चमड़ा लाल होता है । इस चमड़े को इन दोनों शिलाओं पर बिछाता है । यह चमड़ा इस यज्ञपुरुष की जिह्वा है । पुरुष की जिह्वा लाल होती है । अतः यज्ञपुरुष का जिह्वा - स्थानीय चमड़ा भी लाल होता है । इस तरह ' वैष्णवमसि ' यह मन्त्र बोलता हुआ उस चमड़े को शिलाओं पर बिछा देता है || २३ || इसके बाद उस चर्म पर सोम कूटने के लिए पाँच प्रस्तर रखे जाते हैं । ये ५ प्रस्तर यज्ञपुरुष के दन्त हैं । जिस प्रकार मनुष्य दाँतों से चबाता है वैसे ही इन ५ प्रस्तरों से सोम को कूटते हैं । वह ' वैष्णवा स्थ ' यह मन्त्र बोल कर उस चर्म पर उन प्रस्तरों को रख देता है । इस प्रकार शकट की आदि व मध्य की छदि, उपरव, शिला, चर्म, प्रस्तर आदि सब के द्वारा यज्ञ-- पुरुष का मस्तक बनाया जाता है || २४ || [ १२७ ]

पृष्ठ 146

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तृतीय काण्ड ( ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण [ विज्ञान भाष्य ] यज्ञ पुरुष ब्राह्मण में बतलाया गया है हमारा यह यज्ञ रुष स्वरूपेण वितत होता है । जैसा स्वरूप हमारा है - ठीक वैसा ही स्वरूप इस यज्ञ का बनाना पड़ता है । जिसका कि विस्तृत विवेचन पूर्व के ब्राह्मण में कर दिया गया है । इस यज्ञ पुरुष में उत्तरावेदि से पश्चिम में पृष्ठ्या सूत्र से उत्तर - दक्षिण दो हविर्धान शकट रखे जाते हैं । जिस स्थान में ये दोनों शकट रखे जाते हैं-उसका नाम ' हविर्धान मण्डप ' है । यह हविर्धान मण्डर विष्णु देवता के सम्बन्ध से यज्ञ का मस्तक है । मस्तक में दो कान, दो नाक, ये चार खड्डे होते हैं । अतएव उचित है कि यहाँ भी मस्तक स्वरूप हवि-धन में इन्द्रिय स्थानीय चार खड्डे बनाए जाएँ । बस इन्हीं खड्डों का नाम ' उपरव ' रखा जाता है | भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं- जिसलिए उपरव खोदे जाते हैं- उसके दो कारण हैं । दो कारणों की वजह से उपरव खोदे जाते हैं । उपरव खोदने में दो उपपत्तियाँ हैं -" द्वयं वा अभि- उपरवाः खायन्ते ( प्रयोजनद्वयमभिलक्ष्य उपरवाः खायन्ते ) " । पहला प्रयोजन यही है कि हविर्धान यज्ञ का मस्तक है - तो बस मस्तक में दो कान, दो नाम ये चार कुए ( खड्डे ) होते हैं । उन्हीं कुत्रों को इस यज्ञ पुरुष के मस्तक में बनाते हैं । चार खड्डे खोदना हविर्धन स्वरूप मस्तक में नाक और कान के चार छिद्र कायम करना है । पुरुष स्वरूप सम्पत्ति के लिए ही चार कूप खोदे जाते हैं । " शिरो वै यज्ञस्य हविर्धानम् । तद्य इमे शीर्षश्चत्वारः कूपाः - इमावह ( क ) इमौ द्वौ ( नासिकाच्छिद्रे द्वे ) तानेवैतत् करोति । तस्मादु-परवान् खनति " ॥१ ॥

' इ ' से अगुल्यन्त निर्देश किया गया है । कान एवं नाम की प्रोर इशारा करके कहते हैं - दो यह और दो यह । बस इस अभिनय के लिए ही यह कहा है । " इमावह द्वौ - इमौ द्वौ " । दूसरा कारण उपरव खोदने का यह है - देवता और असुर जो कि भगवान् प्रजापति की सन्तान थे- आपस में स्पर्द्धा करने लगे । देवता असुरों से कम थे - प्रसुर संख्या में अधिक थे । देवता भोले थे-असुर बड़े मायावी थे । इस स्पर्द्धा में असुरों ने इन तीनों लोकों में कृत्या की सावन वलगा को जमीन में गाड़ दिया । असुरों ने विचारा कि शस्त्रास्त्रों से तो अपन देवताओं को मारते ही हैं परन्तु इस तरह से कृत्या प्रयोग द्वारा भी अपने को इन्हें परास्त करना चाहिए । इस प्रकार दोनों का सहारा लेकर देव-ताओं को निःशेष कर देना चाहिए । बस इतनी मन्त्रणा करके असुरों ने कृत्या की साधनभूत वलगा को जमीन में गाड़ दिया । पञ्च पुण्डीरा प्राजापत्य बल्शा में कुल १४ चतुर्दशविध भूतसर्ग हैं । इस चतुर्दश विध भूतसर्ग में ५ तो स्तम्ब से प्रारम्भ कर हमारे से नीचे - नीचे हैं एवं छठे हम हैं । ८ हमसे ऊपर हैं । वे पाँचों तमोविशाल कहलाते हैं । इनमें से किसी के एक इन्द्रिय है, किसी के चार, किसी के पाँच हैं । [ १२८ ]

पृष्ठ 147

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 147 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण हम रजोविशाल कहलाते हैं तथा हमारे में १ ९ १ इन्द्रियाँ हैं एवं = देवता सत्वविशाल हैं तथा इनमें २८ इन्द्रियाँ होती हैं । इस प्रकार ब्रह्मा से स्तम्ब पर्यन्त १४ चतुर्दशविध भूतसर्ग हैं । जैसा कि ' ईश्वर कृष्ण ' कहते हैं-" प्रष्ट विकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति । मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः " ॥ ( सां ० का ० ५३ ) “ ऊर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालश्च मूलतः सर्गः । मध्ये रजोविशाल ब्रह्मादि स्तम्ब पर्य्यन्तः " ॥ ( सां ० का ० ५४ ) इनमें से आठ देवता निम्नलिखित नामों से व्यवहृत होते हैं-१. ब्राह्म, २. प्राजापत्य, ३. दिव्य ( ऐन्द्र ), ४. पित्र्यं ५. गान्धर्व, ६. यक्ष, ७. राक्षस, पिशाच । पशु, पक्षी, सर्प, कीट, स्थावर - यह पाँच तैय्र्य्यग्योनियाँ हैं । इनमें से जो प्रष्टविध देवसर्ग हैं उसमें पहले के चार देवता तो संसार का उपकार करते हैं अवशिष्ट चारों अपकार करते हैं । यह आठों ही देवता अन्तरिक्ष में रहते हैं । इनमें हमारे से ऊपर सबसे पहले पिशाच हैं एवं सबसे अन्त में ब्रह्मा । क्रमा-नुसार ६ बीच में हैं । इनमें गन्धर्व, यक्ष - राक्षस और पिशाच यह स्वभाव से ही दुष्ट होते हैं । इनमें से भी राक्षस और पिशाच तो महादुष्ट होते हैं । इनमें से जो राक्षस हैं उनकी पत्नियों के नाम नाष्ट्रा हैं-ये ' वायु में घूमा करते हैं । " हमें इस प्रपञ्च से सिर्फ यही बतलाना है कि पूर्वोक्त देवयोनियों में से जो राक्षस हैं वे को ही वश कृत्या में कहलाते हैं । यह कृत्या स्त्री और पुरुष दोनों ही हो सकती हैं । उपाय विशेष से राक्षस अर्थात् कृत्या को कर के - तद्वारा शत्रु विनाश करवाया जाता है । बस इस राक्षस को किंवा राक्षसी को मूठ चलाना, वश में करने का जो साधन है उसे ' वलगा ' कहते हैं । चतुष्पथ में चौमुखा दीपक रखना, होता किसी के घर में सेह का काँटा रख देना इत्यादि साधनों से जो अनिष्टकारिणी - शक्ति का कर प्रादुर्भाव चला जाए तो है वही ' कृत्या ' है । जमीन में ऐसी वस्तु गाड़ दी जाती है यदि उस पर कोई पैर रख उसी समय उसका सर्वनाश हो जाए । षोडश महाविद्याओं में से कृत्यासाधनभूता एक कारण ' वल्गामुखी आज ' ' बगु- भी है । उसके साधन से शत्रु एकान्ततः विनष्ट हो जाते हैं । यही वल्गामुखी अपभ्रंश में ( के मन्त्र तन्त्रादि शास्त्रों लामुखी ' कहलाने लग गई है । इन कृत्याओं का विस्तृत विवेचन आगम शास्त्र ही आगम की स्थिति है । में ) किया गया है परन्तु उन सब का मूल निगम ही है । निगम के आधार पर में गाड़ दी जाती है । इस कृत्या में कुछ अवधि होती है । कोई वस्तु किसी को मारने की वजह से जमीन वह वस्तु ' वल्गा ' कहलाती उससे जो प्रारण उत्पन्न होता है वही कृत्या कहलाती है एवं कृत्या साधनभूत होती है-है । भिन्न - भिन्न कृत्या के लिए भिन्न - भिन्न समय नियत है । किसी से १० दिन में कृत्या उत्पन्न विषयों का विस्तृत १. इनसे क्या- क्या बीमारियाँ होती हैं उनकी चिकित्सा कैसे हो सकती है इत्यादि । विवेचन महर्षि चरक प्रणीत चरक के ' भूतोपशमनीयाध्यायः ' में देखना चाहिए [ १२६ ]

पृष्ठ 148

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण किसी से दो महीने में होती है । यदि इस अवधि के बीच में उसे खोद डाला जाता है तो वह कृत्या व्यर्थ चली जाती है उसकी शक्ति मारी जाती है । भुवनस्बर्ग निवासी देवता और अफ्रीकादि श्रासुर त्रिलोकी के निवासी असुर दोनों ही काश्यपीयन समुद्र में रहने वाले भगवान् प्रजापति की सन्तान थी, परस्पर खूब लड़ा करते थे । इनमें सदा युद्ध होता रहता था । एक समय मौका पाकर मायावी असुरों ने भोले - भाले देवताओं का सर्वनाश करने के लिए कृत्यासाधनभूत वलगा को जमीन में गाड़ दिया । शस्त्रों से तो मारते ही हैं - ऐसे भी इन्हें मारें, जिससे कि ये लोग सर्वथा निःशेष हो जाएँ- इसी दुष्ट बुद्धि ने उन्हें वलगा गाड़ने को प्रेरित किया ---" देवाश्च वाऽश्रसुराश्च - उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुराएषु लोकेषु कृत्यां बलगान् निचख्नुः - उतैवञ्चित् ( एवमपि ) देवानभिभवेमेति-( श्रनेनाप्युपायेन देवान् हनिष्यामः - इति हि तेषामसुराणामभिप्रायः ) ” ॥२ ॥

देवता तो आखिर देवता थे । असुर मायावी थे तो देवता विद्वान् थे । अतिबुद्धिमान् थे । ये असुरों के पीछे गुप्तचर लगाए रखते थे । असुरों ने जब कृत्या प्रयोग किया तो उसी समय गुप्तचरों ने इसकी सूचना देवताओं को दे दी । देवतालोग असुरों की इस पापलीला को सहन न कर सके । उसी समय वे ' प्रागबबूला हो गए । उसी समय उस स्थान पर जा पहुंचे जहाँ पर कि असुरों ने ' कृत्या ' को जमीन में गाड़ा था । वहाँ पहुँच कर उन्होंने इन्हीं उपरवों से ( खड्डों से ) उस कृत्या - साधक वलगा को उखाड़ कर फेंक दिया । खड्डे खोदकर उस कृत्या साधक वस्तु को जड़ से उखाड़ कर बाहर फेंक दिया--" तद्वै देवा अस्पृण्वत । तएतैः ( उपरवैः ) कृत्यां वलगानुदखनन् " । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, यदि समय से पूर्व वलगा को उखाड़ दिया जाता है तो वह कृत्या सर्वथा व्यर्थ एवं शक्ति रहित हो जाती है । जैसा कि हमने पूर्व में बतला दिया है । चूँकि देवताओं ने समय से पहले ही उसे उखाड़ फेंका प्रतएव वह सर्वथा अलसा ( सारशून्या मारणव्यापारे - उदासीना ) और मोघा हो गई । इस प्रकार देवताओं ने कृत्या को उखाड़ कर असुरों की सारी माया को नष्ट - भ्रष्ट कर उन्हें परास्त कर डाला । यहाँ इतना और समझ लेना चाहिए कि यदि समय से पूर्व ही कृत्या को उखाड लियाजाता तो वह कृत्या गाड़ने वाले का ही सर्वनाश कर डालती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ----प्रथ सालसा मोघा भवति " । “ यदा वै कृत्यामुत्खनन्ति-देवता लोगों ने उस समय तो असुरों को परास्त कर दिया परन्तु सदा के लिए नष्ट न कर सके । देवता जब भी यज्ञ करते असुर मौका पाकर चुपके से कृत्या प्रयोग कर देते । इन आपत्तियों से सदा के वास्ते बचने के लिए इस यज्ञ में उपरव विधान कर दिया । यज्ञ में चार उपरव बनाने से असुरों की जो भी कृत्या होगी वह सब निकल जाएगी क्योंकि पार्थिव विद्युत् तो सारी पृथिवी में एक ही है अव यहाँ चार खड्डे खोदने से अवश्य ही ' असुरों द्वारा गाड़ी गई कृत्या अवश्य ही निकल जाएगी ' इस विचार [ १३० ]

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण - प्राप्त कर से देवतानों ने उपरव का यज्ञ में विधान ही कर दिया । उनसे जो फल देवताओं ने चाहा था कोई लिया । बस इसी प्रकार से इस सोमयज्ञ में अध्वर्यु इस उपरव कर्म्म से, यजमान के को लिए जड़, से जो उखाड़ इसका भ्रातृव्य और द्विषत् - जमीन में कृत्यासाधनभूता वलगा गाड़ता है- उन वलगाओं चार कूप कर फेंक देता है । बस उपरव खोदने की यही दूसरी उपपत्ति है । इस प्रकार मस्तकस्थानीय रख कर उपरव संपत्ति प्राप्त्यर्थं एवं शत्रु के द्वारा गाड़े गए वलगा विनाशार्थ दो कारणों को लक्ष्य में खोदे जाते हैं ----" तथोऽएवैष एतद्यद्यस्मा ( अस्मै यजमानाय ) श्रत्र कश्चिद् द्विषन् भ्रातृव्यः कृत्यां वलगान्निखनति - तान् ( वलगान् ) एवैतदुत्किरति । तस्मादुप-रवान् खनति " । फल और बतलातें हैं-इस प्रकार उपरव खोदने के ये दो तो दृष्ट फल हैं । अब एक अदृष्ट जिसका कि विवेचन अन्य ब्राह्मणों में किया गया है । हविर्धान के नीचे की ओर चार खड्डे खोदे जाते हैं । चारों खड्डे एक - एक हाथ ओंडे ( गहरे ) पर पूर्वाग्र में दो शिलाएँ होते हैं एवं प्रादेशमात्र चौडे होते हैं । इन चारों खड्डों में दो अंगुल के पाँच फासले लोढ़ी रखी जाती हैं । उन रखी जाती हैं । उन पर लाल चमड़ा बिछाया जाता है । उस पर ) से गूंजती हुई मीठी आवाज लोढियों से उस लालच पर सोम कूटा जाता है । कूटते समय छिद्रों ( खड्डों कहा जाता है । जो निकलती हैं । चूंकि ये छिद्र गम्भीर आवाज निकालते हैं अतएव एवं इन्हें जो ठोस ' उपरव आवाज ' होती वह श्रवण मधुर एवं गूँजती हुई वाणी होती है वह दिव्या कहलाती है यज्ञ दिव्य कर्म है । ऐसी अवस्था में यदि कटु होती है अतएव वह श्रसुर्य्या वाक् हो जाती है । यह निकलेगी । यह वाक् असुर्य्या नीचे खड्डे न खोदकर यों ही सोम कूटा जाएंगा तो उससे श्रवणकटु वाक् तन्निवृत्यर्थं चार खड्डे खोदना है अतएव इसके प्रविष्ट होने से दिव्यकर्म - श्रासुरकर्म हो जाएगा आवाज अतः निकले । बस यही तीसरा अत्यन्त ही आवश्यक है जिससे कि वाद्य की तरह गूँजती हुई मीठी हैं-कारण है । उपरव के नाम का निर्वचन करते हुए अभियुक्त कहते निधीयेते । " उपरवा नाम कूपकाः । तेषाँ चोपरि अभिषवर फलके तयोरुपरि अधिषवण च । तत्र सोमोऽभिषूयते । तस्मिन् ग्रावभिहन्यमाने ” । वादित्रोदरवत् सुषिरस्ति कूपा गम्भीर उपरवन्तीत्युपरवा इत्यभिधीयन्ते ( का ० श्र ० ८।४।२५ ) अतएव खड्डे अवश्य ही बनाने इस प्रकार उपरव बनाने में दो अदृष्ट फल हैं - एक दृष्ट फल है चाहिए - यही इन सबका निष्कर्ष है । हविर्धान का जो प्रउग हैं उपरव किस तरफ बनाने चाहिए - यह बतलाते हैं । अध्वर्यु से दोनों दक्षिण श्रोर लम्बी लकड़ियाँ लगी ठीक उसके नीचे उपरव खोद देता है । शकट के पहियों के सहारे [ १३१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण रहती हैं । ये लकड़ियाँ उत्तरोत्तर सिकुड़ती जाती हैं । यहाँ तक कि शकट के अन्तिम भाग तक आकर मिल जाती हैं । इन लकड़ियों को ' ईषा ' कहा जाता है । इन दोनों ईषात्रों का जो जुड़ा हुआ अन्तिम प्रदेश है यही ' प्रउग ' कहलाता है । जैसा कि कहा है-" प्रउगं प्राप्त युगं - ईषा संगमादपरार्द्धम् " ( या ० दे ० ) इस प्रउग के ठीक नीचे उपरव खोदने चाहिए । प्रउग हविर्धान शकट का मस्तक है । ये चारों उपर चूंकि मस्तक स्थानीय छिद्र हैं प्रतएव इन्हें प्रउग के नीचे ही खोदने चाहिए-" स ( अध्वर्युः ) दक्षिणस्य हविर्धानस्याधोऽधः प्रउगं खनति ॥ ३ ॥

चार उपरव बनाए जाते हैं । चारों के पहले अभि ' से निशान बना दिए जाते हैं- बाद में वहाँ से मिट्टी खोदकर बाहर फेंक दी जाती है अतएव वह प्रध्वर्यु -" देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि । ( वा ० सं ० ५।२२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अभि उठाता है । हे नारी प्रर्थात् स्त्री रूपा अनि! मैं सविता देवता की आज्ञा से अश्विनीकुमार के बाहु और पूषा देवता के हाथ से आपको उठाता हूँ । संसार में प्रसवकर्त्ता सविता का ही काम है । बिना सविता की आज्ञा के कोई भी काम नहीं हो सकता । आज अध्वर्यु इस अभि से उपरव बनाने वाला है अतएव इसे सविता की श्राज्ञा लेना आवश्यक है । बस इसीलिए सावित्रमन्त्र से अभ्रि उठाई जाती है । पूर्व प्रकरण में इस मन्त्र की व्याख्या कर दी गई है अतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' देवस्य त्वा सवितु: ' ( वा ० सं ० ५।२२ ) इसका जो तात्पर्य्य पहले बताया था वही इसका भी समझना चाहिए । " समान एतस्य यजुषो बन्धुः " । यह अभि स्त्री लिङ्गत्वेन योषा अर्थात् स्त्रीरूपा है अतएव ' नारी असि ' यह कह दिया गया है-" योषा वा एषा यदभिस्तस्मादाह नार्यसीति ॥४ ॥

कितने - कितने फासले पर उपरव बनाने चाहिए - यह बतलाते हैं । अध्वर्यु एक -के अन्तर से अभि से रेखा खींचता है । १०३ अङ्गुल का एक प्रदेश होता है । एक प्रादेश के फासले पर होने चाहिए | अग्निकोण, वायव्यकोण, नैर्ऋतकोण, और ईशानकोण ये उपरव , इन १०३ चारों अङ्गुल कोणों में चार उपरव बनाए जाते हैं । इन चारों का फासला एक - एक प्रादेश का होता है एवं यह स्वयं एक - एक प्रादेश जितने ही बनते हैं । प्रादेशमात्र के अन्तर का और प्रादेशमात्र के आकार का कारण भी १. अनि- ' काष्ठ से बनी हुई कुदाल, कुदाली ' । [ १३२ ]