Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 151–160
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण यही है कि ये चारों ही उपरव चार इन्द्रियाँ हैं । इन्द्रियों का अधिष्ठाता प्रारण होता है । प्रारण प्रादेश-मित ' होता है । " प्रादेशमितो वै प्राणः " यह सिद्धान्त हैं, अतएव प्रारण स्वरूप उपरव- प्रादेशमित के अन्तर पर ही होने चाहिए, इसी अभिप्राय से कहते हैं -" तान् ( उपरवान् ) प्रादेशमात्रं विना ( मध्ये मध्ये प्रादेशमात्रान्तरालं विहाय ) परिलिखति । ( चतुरोऽवटान् प्रादेशमात्रान्तरे, प्रादेशमात्रानेव परि-लिखेत् इति भाव: ) " । जिस समय अत्रि से अध्वर्यु प्रउय के नीचे उपरव के लिए निशान बनाता है - उस समय मन्त्र यह बोलता है-" इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपि कृन्तामि " । ( वा ० सं ० ५।२२ ) मैं इस अभ्रि से कृत्यास्त्र - रूप राक्षसों का गला काटता हूँ । यह जो अनि है वह वज्र है | अध्वर्यु इसी अभ्रि रूप वज्र से उन नाष्ट्रा और राक्षसों का - जो कि कृत्यारूप से यज्ञ में बैठे हुए हैं - उनका गला काटता है । असे रेखा करना क्या है, राक्षसों के गले पर छुरी चलना है । अर्थात् उपरव के लिए जो अभि से चारों ओर निशान बनाए जाते हैं वह उन राक्षसों के गलों को काटने के समान है ---" वत्रो वाऽअभ्रिः । वत्रेणैवेतन्नाष्ट्राणां रक्षसां ग्रीवाऽअपि कृन्तति " ॥५ ॥
चार उपर बनाए जाते हैं । इनमें से पहले किस उपरव के लिए निशान करना चाहिए- पहले किस उपरव को बनाना चाहिए, यह बतलाते हैं । प्रउग के नीचे वाले स्थान में जो पूर्व दिशा के दो अवट ( खड्डे ) हैं, उनमें से जो दक्षिणावट है अर्थात् अग्निकोण का अवट है, पहले उस पर रेखा खींचे । " तद्यावेतौ पूर्वी । तयोर्दक्षिणमेवाग्रे परिलिखेत् ” । बाद में पश्चिम के जो दो श्रवट हैं, उनमें से जो उत्तरावट है अर्थात् वायव्यकोण का अवट है उस पर रेखा खींचे-" प्रथापरयोरुत्तरम् ( परिलिखेदिति शेषः ) " । इसके अनन्तर पश्चिम के दाहिने अवट की ( नैर्ऋत कोण के अवट की ) रेखा खींचे—-१. प्रादेशमित - ' अँगूठे की नोंक से लेकर तर्जनी की नोंक तक का प्रदेश ' ( एक बिलान्द या एक बालिस्त ) | [ १३३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मणे " अथापरयोर्दक्षिणम् ( परिलिखेत् ) " ॥ ६ ॥
उपरव ब्राह्मण इसके बाद पूर्व के दोनों अवटों में उत्तरावट की ( ईशानकोणस्थ ) रेखा खींचे । इस प्रकार अक्ष्णयाक्रम से रेखा खींचनी चाहिए । इसी अक्ष्णा में कई आचार्य जरा सा हेर - फेर करते हैं । उनका कहना है कि पश्चिम के जो दो अवट हैं, उनमें से जो उत्तर का है, अर्थात् वायव्यकोण का है, पहले उस पर रेखा खींचे, बाद में अग्नि-कोण में खींचे, फिर नैर्ऋतकोण में खींचे और अन्त में ईशानकोण में खींचें । इस मत में ईशान और नैर्ऋत में कोई अन्तर नहीं है, केवल आग्नेय और वायव्यकोणों में व्यत्यास ' है, परन्तु यहाँ भी है वही अक्ष्णया क्रम । इसी दूसरे अक्ष्णया मत का उल्लेख करते हुए कहते हैं-“ अथोऽइतरथाआहुः । अपरयोरेवाग्रऽउत्तरं परिलिखेत् । अथ पूर्वयोर्द-क्षिणम् । अथ पूर्वयोरुत्तरम् " । तीसरा मत है कि सम्यक् प्रकारेणैव उपरव बनाने चाहिए अर्थात् अक्ष्णया क्रम की कोई प्राव श्यकता नहीं है अपितु सीधे तौर से ही रेखा खींचनी चाहिए, परन्तु इतना अवश्य समझना चाहिये जो पूर्वावट का उत्तरावट है अर्थात् ईशानकोण का प्रवट है, उसे सबके अन्त में ही रेखायुक्त करना चाहिए | चाहे अक्ष्णया पक्ष हो अथवा समीचीन पक्ष हो । ईशान को अन्त में ही करना पड़ेगा, कारण इसका यही है कि ईशान अपराजिता दिकू है । यहाँ पर आ कर असुर सर्वात्मना परास्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था में इसी पर आ कर असुरों के गले काटने की क्रिया को समाप्त करना चाहिए । " अपि समीच एव परिलिखेत् । एतं ( चतुर्थ अवटम् ) त्वेवोत्तमं परिलिखेत् । य एष पूर्वयोरुत्तरो ( ईशानो ) भवति ॥७ ॥
इसमें प्रक्ष्णया क्रम नहीं है । इस प्रकार दो तो अक्ष्णया पक्ष हैं और एक समीचीन पक्ष है । तीनों में ही काम चार है । इतना अवश्य है कि तीनों में से कोई सा भी पक्ष हो, ईशान वाले को अन्त में अर्थात् चौथे क्रम में ही करना पड़ेगा और नैऋत को दूसरा ही करना पड़ेगा । प्रकृत में बतलाना हमें यही है कि अध्वर्यु तीनों पक्षों में से किसी भी पक्ष के अनुसार " इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपि कृन्तामि " ( वा ० सं ० ५।२२ ) यह मन्त्र बोलते हुए अनि से चारों उपरवों के निशान बना देता है || ७ || इसके बाद उन उपरवों की परिलिखित क्रमानुसार ही ( अर्थात् यदि अक्ष्णया क्रम से रेखा की हो तो उसी क्रम से मिट्टी खोदनी चाहिए । प्रक्ष्णया में भी पहले अग्निकोण में रेखा की हो तो उसकी मिट्टी फोड़नी चाहिए । यदि पहले वायव्यकोण की हो तो वायव्यकोण की ही उठानी चाहिए । यदि समीचीन पक्ष हो तो उसी क्रमानुसार मिट्टी खोदनी चाहिए यथा परिलिखितमेव का यही तात्पर्य है ) मिट्टी खोदता है । " तान्यथा परिलिखितमेव यथापूर्वं खनति " । या विक्रांत स्थिति या क्रम ' । [ १३४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मणे उपरेवं ब्राह्मण जिस समय मिट्टी खोदता है उस समय यह मन्त्र बोलता है-" बृहन्नति बृहद्रवाः बृहतीमिन्द्राय वाचं वद । रक्षोहणं वलगहनं वैष्ण-वीमिति " || ( वा ० सं ० ५।२३ ) हे श्रवट! आप बृहत् हो अर्थात् महान् हो एवं बृहद्रवा हो अर्थात् बड़ी गूंजती हुई वाक् बोलने वाले हो । ऐसे प्राप इन्द्र के लिए राक्षसों को और वलगा को अर्थात् कृत्या को और कृत्या के साधनों को मारने वाली जो बृहतीवाक् है उसे इन्द्र के लिए बोलिए । द्वादशप्राण समष्टि का नाम आदित्य है । इसमें सेवाधिष्ठाता अमृतप्राण का नाम इन्द्र है । सौरीय संस्था में यही इन्द्र व्याप्त हो रहा है । पृथिवी का सारा सम्वत्सर- मण्डल - संवत्सराग्नि इसी इन्द्र के कब्जे में है । यह इन्द्र अर्थात् सूर्य्य बृहतीवाक् पर - बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित है । " पार्थिववाक् का नाम अनुष्टुप् है - सौरीवाक् का नाम बृहती है । बृहती अनुष्टुप् की अपेक्षा सबसे बड़ा छन्द है अतएव इसे बृहती कहा जाता है । चूंकि यह अवट बृहद्रा है प्रतएव इसे बृहतीवाक् बोलने के लिए ही कहा जाता है । संवत्सराग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । सारा संवत्सर इस इन्द्र के कब्जे में है अतएव इन्द्र को यज्ञ का देवता बनाया जाता है । २ ऐसी अवस्था में जब तक इन्द्र यज्ञ में नहीं आते हैं तब तक यज्ञ सर्वात्मना सुसम्पन्न नहीं होता है । बस इस उपरव में भी इन्द्र शामिल हो जाए अतएव ' इन्द्राय ' कहा है । चूँकि उपरव राक्षस और तत् साधक वलगा के लिए खोदा जाता है अतएव ' रक्षोहरण ' कहा है । चूँकि हविर्धान वैष्णव है अतएव ऐन्द्री -बृहतीवा में विष्णु का सम्बन्ध करने लिए ' वैष्णवीम् ' कह दिया है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह अध्वर्यु जो कि ' बृहन्नसि ' इत्यादि बोलता है । इससे इन उपरवों की स्तुति ही करता है । एवं उन्हें बढ़ावा देता है । हे उपरव! आप बृहत् हैं - प्राप बृहद्ग्रावा हैं - यह कहना उनकी स्तुति करना है -" उपस्तीत्येवैनानेतन्महयत्येव यदाह बृहन्नसि बृहद्रवा - इति " । इन्द्र यज्ञ के देवता हैं | यह हविर्धान वैष्णव है । विष्णु बिना इन्द्र के रहते नहीं हैं अर्थात् यज्ञ विना इन्द्र के नहीं होता अतएव इस यज्ञ को ऐन्द्र बताते हैं-“ इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता । वैष्णवं हविर्धानम् । तत् सेन्द्रं करोति-तस्मादाह बृहतीमिन्द्राय वाचं वदेति " ॥८ ॥
यह उपरव राक्षसों और तत् साधक वलगाओं के विनाश के लिए ही खोदे जाते हैं । इनसे जो आवाज निकलती है उससे राक्षस - असुर मर जाते हैं अतएव उपरव से निकलने वाली गूँजती हुई वाक् को हम ' रक्षोहण ' और वलगहन कहने के लिए तय्यार हैं- इसी अभिप्राय से कहते हैं— १. ' सूर्य्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' । २. ' इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता ' ( शत ० १ | ४ | १ | ३३ ) [ १३५ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण " रक्षोहणं ( रक्षांसिहन्ति तादृशीं वाचम् ) वलगहनं ( वलगान् कृत्या साधकान् हन्ति सा वलगहा तादृशीम् ) इति । रक्षसां ह्येते ( उपरवाः ) वलगानां वधाय खायन्ते " । कहा है । हविर्धान में जो वाक् है वह विष्णु देवता के सम्बन्ध से वैष्णवी | अतएव ' वैष्णवीम् ' " वैष्णवीमिति । वैष्णवी हि हविर्धाने वाक् " ॥ ९ ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र से अध्वर्यु चारों उपरवों की मिट्टी खोद लेता है । चारों उपरवों की मिट्टी खोदने के बाद जिस क्रम से मिट्टी खोदी है अर्थात् अक्ष्णया क्रमानु-सार पहले अग्निकोण से खोदना प्रारम्भ किया है तो उसी से एवं वायव्यकोण से प्रारम्भ किया है । तो उसी से एवं समीचीक्रम हो तो उसी क्रम से मिट्टी को बाहर फेंकता है । चारों उपरवों की मिट्टी फेंकने के लिए भिन्न - भिन्न चार मन्त्र बोलता | अक्ष्णया क्रमानुसार सबसे पहले अग्निकोण के उपरव की मिट्टी-" इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ठ्यो यममात्यो निचखान " । ( वा ० सं ० ५।२३ ) उक्त मन्त्र बोलता हुआ फेंकता है । आज मैं उस वलगा को जड़ से उखाड़ कर फेंकता हूँ । मेरा गैर और अपना शत्रु है । जो गैर आदमी होता है जिसका अपने साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है अर्थात् जो अपरिचित है उसे ' निष्ठ्य ' कहते हैं एवं जो परिचित है उसे श्रमात्य कहते हैं । दोनों ही हमारा नुकसान कर सकते हैं । परिचित मनुष्य भी बाजे मौके पर धोखा दे देता है और गैर भी प्रहार कर बैठता है । दोनों ही हमारे लिए कृत्या प्रयोग कर सकते हैं । आज इस मिट्टी को मैं नहीं फेंकता अपितु मैं उस कृत्यासाधन वलगा को उखाड़ कर फेंकता हूँ जिसको मेरे गैर ने और अमात्य ने गाड़ी थी । " तान्यथाखातमेवोत्किरति ( खाताया मद उद्वपनेऽपि खननक्रम एवेति भावः ) इदमहं तं वलगसुत्किरामि यं मे निष्ठ्यो यममात्यो निचखान ( इति मन्त्रेणोत्किरति इति शेषः ) । निष्ठ्यो वा ( अपरिचितो वा ) वाश्रमात्यो वा
( परिचितो वा ) कृत्यां वलगान् ( कृत्या - साधनाम् वस्तु - विशेषान् ) निखनति ।
तान् ( बलगान् ) एवैतदुत्किरति " ॥१० ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अग्निकोण के उपरव की मिट्टी को बाहर फेंकता है ॥ १० ॥
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरेव ब्राह्मणं इसके बाद अक्ष्णया क्रमानुसार निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ वायव्यकोण की - उपरव की मिट्टी खोद कर फेंकता है, वह मन्त्र यह है -" इदमहं तं वलगमुत्किरामि । यं मे समानो यमसमानो निचखान " । ( वा ० सं ० ५ | २३ जो प्रतिष्ठा में अपने बराबर होता है उसे समान कहते हैं एवं जो प्रतिष्ठा में अपने से अधिक अथवा नीचा होता है उसे असमान कहते हैं - उदाहरणार्थ कौंसिल तक के मेम्बर- इतर मेम्बर के समान हैं एवं कौंसिल से नीचे के तथा कौंसिल से भी ऊपर के श्रमात्य दोनों असमान हैं । ये दोनों ही इसका नाश चाह सकते हैं, अतएव कहते हैं-" समानो वा वाऽअसमानो वा ( प्रतिष्ठा पदे ) कृत्यां वलगान् निखनति तानेवैतदुत्किरति " ॥११ ॥
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ नैर्ऋतकरण के उपरव की मिट्टी फेंक देता है-" इदमहं तं वलगमुत्किरामि । बन्धुर्यमबन्धुनिचखान " । ( वा ० सं ० ५।२३ ) हम पेशे वाले साथी को सबन्धु कहते हैं । एक कारखाने में काम करने वाले, एक पाठशाला में पढ़ने वाले जो साथी हैं वे सबन्धु हैं एवं जिनका पेशा पृथक् - पृथक् है वे प्रसबन्धु हैं । इन दोनों से ही हमारा अनिष्ट सम्भावित है । दोनों ही हमारे ऊपर कृत्या प्रयोग कर सकते हैं, इसी अभिप्राय से कहते हैं-" सबन्धुर्वा वा सबन्धुर्वा कृत्यां वलगान्निखनति तानेवैतदुत्किरति " ॥१२ ॥
इसके अनन्तर निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ ईशानकोण वाले उपरव की मिट्टी निकाल कर फेंक देता है-" इदमहं तं वलगमुत्किरामि । यं मे सजातो यमसजातो निचखान " -इति । ( वा ० सं ० ५। २३ ) हम कौम को सजात कहते हैं एवं विजातीय को प्रसजात कहते हैं । यह दोनों ही हमारे लिए कृत्या प्रयोग कर सकते हैं अतएव कहते हैं-रति " । " सजातो वा वासजातो वा कृत्यां वलगान्निखनति तानेवैतदुत्कि [ १३७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) उपर ब्राह्मणं पूर्व के प्रपञ्च से सिद्ध हो जाता है कि हमारा अनिष्ट चाहने वाले संसार में ये दो ही हो सकते हैं-( १ ) निष्ठ्य = गैर - अपरिचित मनुष्य हमारा नुकसान कर सकता है । ( २ ) श्रमात्य परिचित - साथ रहने वाले भी धोखा दे सकते हैं । ( ३ ) समान = एक प्रतिष्ठा पद पर रहने वाला भी कृत्या प्रयोग कर सकता है । ( ४ ) समान = अपने से नीचे पद पर रहने वाला भी अनिष्ट चाह सकता है । ( ५ ) सबन्धु = एक पेशे वाला भी हमें मार सकता है । ( ६ ) सबन्धु = भिन्न पेशे वाला भी हमारा शत्रु बन सकता है । ( ७ ) सजात = सजातीय भी हम पर वार कर सकता है । ( ८ ) असजात = विजातीय से भी हमें नुकसान पहुँच सकता है । इस प्रकार संसार में हमारे कुल आठ तरह के शत्रु हो सकते हैं । यज्ञ में हम इन चारों उप-रवों में से मिट्टी नहीं फेंकते अपितु हमारे ऊपर कृत्या प्रयोग करने वाले आठों की कृत्या को हम जड़ से उखाड कर फेंक देते हैं । यह तो है - विशेष शत्रु । एक शत्रु दल ऐसा होता है जो सामान्य है । सभी शत्रु बन सकते हैं । यहाँ तक कि पुत्र, पत्नी तथा शिष्य आदि भी शत्रु बन सकते हैं । चूँकि उनसे प्रयुक्त कृत्या की भी निकालना आवश्यक है इसी अभिप्राय से कहते हैं— " उत्कृत्यां किरामि । अन्तत उद्वपति । तत् कृत्यां ( सामान्य कृत्याम् ) उत् किरति " ॥१३ ॥
पूर्वोक्त मन्त्रों को बोलता हुआ अध्वर्यु चारों उपरवों की मिट्टी फेंकने के बाद ' उत्कृत्यां किरामि ( कृत्यामुत् किरामि ) यह बोलता हुआ चारों में से ही थोड़ी - थोड़ी मिट्टी लेकर बाहर फेंक देता है । चारों के बाद जो यह थोड़ी - थोड़ी और लेकर फेंकता है वह सामान्य कृत्या को ही फेंकता है । इस प्रकार उपरवों में से मिट्टी निकाल कर बाहर फेंक दी जाती है ॥ १३ ॥
इस सारे प्रपञ्च में एक सन्देह बना रह जाता है । वह यही है कि चौड़ाई में तो उपरव प्रादेश-मात्र होते हैं - परन्तु - गहरे कितने होने चाहिए - इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं-" तान् बाहुमात्रान् खनेत् " । इन उपरवों को एक हाथ गहरा खोदें । परिमाण के उपयोग में अंगुलि, प्रादेश, वितस्ति और बाहु, ये चार अवयव काम में आते हैं । इनमें अंगुल्यादि की अपेक्षा - हाथ का प्रमाण सबसे आखिर है । इसीलिए - ' साढ़े तीन हाथ ' का ही पुरुष कहा जाता है अतएव मानना पड़ता है कि हाथ प्रमाणों में १. वा ० सं ० ५।२३ । [ १३८ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरेवं ब्राह्मण अन्त प्रमाण है । तो अन्त स्वरूप हाथ जितना खोदना इस अन्त से उस कृत्या का ही - अन्त करना 1 जो अन्त है, वही अन्त अच्छी तरह कर सकता है - प्रतएव एक हाथ ही गहरा खोदते हैं । " अन्तो वा एषः, अन्तेनैवैतत् कृत्यां मोहयति " । इन उपरवों को अक्ष्णया क्रम से काटते हैं, अर्थात् अक्ष्णया क्रम से ही रेखा खैचनी चाहिए-जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है । " तानक्ष्णया सन्तृन्दन्ति " । यदि अक्ष्णया न कर सकें तो फिर - समीच ही कर दें । तात्पर्य यही है कि- उत्तमपक्ष तो अक्ष्णया ही है | यदि किसी कारणवश वह नहीं हो सके या उसमें कठिनाई मालूम हो तो सीधा कर दें--" अक्षरया न शक्नुयादपि समीच: ( एवाभितृन्द्यात् - इति शेषः ) " । अक्ष्णया और समीच का फल क्या है - यह बतलाते हैं-हमारे मस्तक में जो चार उपरव हैं, अर्थात् खड्डे हैं - उन चारों का इन चारों से सम्बन्ध है । चारों छिद्रों में भीतर ही भीतर रास्ता है । यहाँ पर ये उपरव इन्हीं की नकल पर बनाए जाते हैं-अतएव चारों का सम्बन्ध करने के लिए - अक्ष्णया करना आवश्यक है । प्रकृति में चारों का चूंकि अक्ष्णया सम्बन्ध होता है अतएव चारों अलग रह कर भी परस्पर बद्ध हैं । इसी को परोक्ष भाव से बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" तस्मादिमे प्राणाः परः सन्तृष्णाः " । अथवा इसका अर्थ यह भी समझना चाहिए कि हमारे में जो चार खड्डे हैं वे हमारी ओर से बाहर निकल रहे हैं । कई ब्राह्मणों में " अन्तः सन्तृष्णा: " पाठ है । इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिए क्योंकि बाहर से देखने पर कान - नाक के छिद्र भीतर की ओर ही मालूम होते हैं । इस अभिप्राय से ' अन्तः सन्तृष्णाः ' कहा है । " तस्मादिमे प्राणाः अन्तः सन्तृष्णा: - ( अन्तः - छिद्रयुक्ताः ) भवन्तीति शेषः " ॥१४ ॥
खड्डे खोद लिए गए - अब अध्वर्यु- जिस क्रम से खड्डे खोदे थे उसी क्रम से उन उपरवों के भीतर हाथ से ऊँचे - नीचे स्थान को सम बनाता है । अर्थात् उपरवों के भीतर की मिट्टी को हाथ से एकसार ( समतल ) कर उन्हें ( उपरवों को ) सुपरिष्कृत करता है -[ १३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मरण उपरव ब्राह्मण " तान् यथाखातमेवावमर्शयति ( उपरवान्तः प्रदेशस्य निम्नोन्नतत्वपरि-हाराय सम्मृशेत् ) " । चारों उपरवों के श्रवमर्श के भिन्न - भिन्न निम्नलिखित चार मन्त्र हैं-१ - ' स्वराडसि सपत्नहा ' २ - ' सत्रराजस्य भिमातिहा ' ३- ' जनराडति रक्षोहा ' ४- ' सर्व राडस्यमित्रहा ' अक्ष्णया क्रम में-अग्नि- कोरणस्थोपरवस्य वायव्य परवस्य नैर्ऋतकोणस्थोपरवस्य ईशानस्थस्य ' स्वराजसि सपत्नहा ' - यह बोलते हुए अग्निकोण के उपरव का स्पर्श करते हैं । हे उपरव! आप स्वराट् हो । एवं सपत्नों को मारने वाले हो । हमारे भी सपत्नों को प्राप मारकर हमें भी स्वराट् बनाइए - यही अभिप्राय है । जो - एक साथ सर्वत्र दीप्त हो रहा है, वह सत्रराट् कहलाता है । हे उपरव! आप सत्रराट् हैं, एवं हिंसक जनों का नाश करने वाले हैं । हमें भी ऐसा ही बनाइए - यही तात्पर्य है । तीसरे का स्पर्श करते हैं - हे उपरव! आप जनराट् हैं, एवं अमित्र हैं । रक्षोहा हैं । चौथे का स्पर्श करते हैं - हे उपरव! आप सर्वराट् हैं, अर्थात् समस्त भू - मण्डल प्रापके ( यज्ञ के ) अधीन है । एवं प्राप अमित्रहा हैं । पूर्वोक् मन्त्रों का स्पष्टीकरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस उपरव कर्म की यह आशी: ही है । आप जैसे हैं वैसा ही हमें भी बना दीजिए-" श्राशीरेवैषैतस्य कर्मरण: आशिषमेवैतदाशास्ते " ॥१५ ॥
पूर्वोक्त कथन से सिद्ध होता है कि शत्रु चार प्रकार के होते हैं: --1. सपत्न - - ( एकवृत्ति परं वैरम् ) समान पेशे पर जो ईर्ष्या करने वाला होता है । २. श्रभिमाति - तरक्की को रोकने वाला हिंसक मनुष्य अभिमाति कहलाता है । ३. रक्ष- दुष्ट बुद्धि विश्व का शत्रु - रक्ष कहलाता है । ४. श्रमित्र - जातिगत द्वेष करने वाला श्रमित्र कहलाता है । इन चारों शत्रुओं को नष्ट कर मुझे असपत्न बनाइए - यही तात्पर्य है ॥ १५ ॥
उपरव बनकर तैय्यार हो गए । बाद में अध्वर्यु और यजमान परस्पर हाथ मिलाते हैं । पूर्व के जो दो उपरव हैं - उनमें जो दक्षिण का उपरव है अर्थात् श्रग्निकोण का उपरव है, वहाँ अध्वर्यु बैठ [ १४० 1
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण जाता है एवं पश्चिम के उत्तर उपरव के समीप ( वायव्य के पास ) यजमान बैठ जाता है । इस प्रकार अक्ष्णया क्रम से बैठकर दोनों हाथ मिलाते हैं-" अथाध्वर्युश्च यजमानश्च सम्मृशेते ( परस्परं हस्तसंस्पर्शं कुर्य्यातामि-त्यर्थः ) पूर्वयोर्दक्षिणे ( ( श्रग्निकोणे ) अध्वर्युर्भवति, अपरयोत्तरे ( वायव्ये ) यजमानः " । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि पहले अध्वर्यु और यजमान अपने - अपने उपरवों में हाथ डाल लेते हैं एवं अध्वर्यु यजमान से पूछता है- यजमान इसमें क्या है? यजमान उत्तर देता है-' भद्रम् ' अर्थात् कल्याण ही कल्याण है । यह सुन कर अध्वर्यु धीरे से बोलता है कि वह कल्याण हम दोनों का है, अर्थात् उस कल्याण में मैं और आप दोनों शामिल हैं । यज्ञ का फल वास्तव में यजमान का ही होता है क्योंकि यजमान ही यज्ञ का स्वामी है । अध्वर्यु का इसमें अधिकार नहीं है अतएव वह साफ तौर से - उच्चस्वर से ' इसमें मेरा भी हिस्सा है ' यह नहीं कह सकता है अतः धीरे से कहता है । इस प्रकार परस्पर संलाप होने के अनन्तर दोनों हाथ मिलाते हैं-' सो s ध्वर्युः पृच्छति ' यजमान! किमत्रेति ( उपर वे )? ' भद्रमित्याह ( यजमानः ) तन्नौ सह इति - उपांश्वध्वर्युः ( श्राह इति शेषः ) ॥ १६ ॥
इसके बाद पश्चिम के दक्षिण उपरव स्थान के समीप अध्वर्यु बैठ जाता है एवं पूर्व के उत्तर स्थान के समीप यजमान बैठ जाता है । वहाँ पर यजमान अध्वर्यु से पूछता है - अध्वर्यो! बतलाओ तुम्हारे उपरव में क्या है? अध्वर्यु कहता है - इसमें कल्याण ही कल्याण है । चूँकि यज्ञ फल यजमान की अपनी वस्तु है, श्रतएव वह उसी समय बोल उठता है - यह कल्याण संपत्ति मेरी है-" अथापरयोर्द्दक्षिणे ( नैऋते ) श्रध्वर्युर्भवति, पूर्वयोरुत्तरे ( ईशाने ) यज-मानः । स यजमानः पृच्छति ' अध्वर्यो! किमत्रेति? भद्रमित्याह ( ध्वर्युः ) । तन्मे इति यजमानः " । इस प्रकार यहाँ पर बैठ कर यजमान और श्रध्वर्यु जिसलिए हाथ मिलाते हैं - वह कारण बतलाते हैं-" तत् ( तत्र उपरवकर्म्मणि ) यत् ( यस्मात् ) एवं सम्मृशेते ( तस्य-कारणमुच्यते ) इति शेषः ” । दोनों ओर बैठ कर हाथ मिलाते हुए अध्वर्यु और यजमान हाथ की विद्युत् द्वारा अपने प्राणों को परस्पर मिलाते हैं । अध्वर्यु यजमान का प्रतिनिधि हैं अतएव इन दोनों के प्राणों का परस्पर सम्बन्ध होना बहुत ही आवश्यक है । उपरव यज्ञ का मस्तक है - प्रारम्भ भाग है अतएव यहीं पर प्रारण सम्मेलन [ १४१ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) ' वा ० सं ० ५।२५ ' । १. शतपथ ब्राह्मण उपरव ब्राह्मण [ १४२ ] करना अच्छा है । अपिच अपने साथ ही इन्द्रिय स्वरूप - प्रतएव प्राणरूप उन चारों उपरवों के प्राणों को भी परस्पर मिलाते हैं । इसीलिए मनुष्य शरीर के प्रारण एक से एक मिले रहते हैं - तात्पर्य यही है कि हमारे अध्यात्म के जो उपरव हैं अर्थात् इद्रियाँ हैं उनके जो प्रारण हैं वे परस्पर मिले हुए हैं । उन्हीं उपरवों की नकल पर यह उपरव बनाए जाते हैं । चूँकि अध्यात्म में चारों प्राण मिले हुए हैं अतएव यहाँ भी अध्वर्यु और यजमान निदानेन अपने प्राण मिलाने के साथ - साथ ही उनके ( उपरवों के ) प्राणों को भी मिला देते हैं । इसी विज्ञान को परोक्ष बना कर बतलाने के लिए इन यज्ञीय उपरवों के बयान से याज्ञवल्क्य कहते हैं--" प्राणानैवैतत्सयुजः कुरुतः । तस्मादिमे प्रारणाः परः संविद्रे ( संविद्रते-संगता भवन्ति ) " । पूछने पर जो ' भद्रम् ' यह उत्तर दिया गया है वह मानुष्यवाक् स्वरूप कल्याण ही बोलना है अर्थात् लौकिक व्यवस्था में यह रिवाज है कि यदि कोई मनुष्य पूछता है कि कहिए क्या हाल - चाल हैं - तो चाहे वह दुःखी ही क्यों न हो परन्तु उत्तर में ' आपकी कृपा से आनन्द है ', यही कहता । इसी लौकिक मर्यादानुसार उत्तर में यहाँ भी भद्र कहा गया है । इससे वेदभगवान् शिक्षा देते हैं कि तुम्हें प्रत्युत्तर में सदा ' भद्रं भद्रम् ' ही बोलना चाहिए-" अथ यत्पृष्टो भद्रमिति प्रत्याह ( तस्य कारणमुच्यते - इति शेषः ) कल्याणमेवैतन्मनुष्य वाचो वदति । तस्मात् पृष्टः ( सन् श्रध्वर्युर्यजमानश्च ) भद्रमिति प्रत्याह - ( तस्माल्लौकिकवचनेषु भद्रत्वाय अवश्यं भद्रवचनं कर्त्तव्य-मिति भावः ) " । इसके अनन्तर प्रोक्षणी पात्र में से पानी लेकर इन चारों उपरवों के बाहर - भीतर सब ओर छिड़क देते हैं --- ' अथ प्रोक्षति ' । प्रोक्षण करने का एकमात्र कारण यही है कि यह मेध्य हो जाए । जब तक पानी नहीं डाला जाता है तब तक मिट्टी खिरती रहती है, अतएव उसके धसकने का डर बना रहता है परन्तु पानी से मिट्टी में स्नेहन धर्मं श्रा जाता है । उसमें चिकनाई आ जाती है श्रतएव पानी डाला जाता है । पानी डालने का और कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है - केवल मेध्यता के लिए ही प्रोक्षण किया जाता है-" एको वै प्रोक्षणस्य बन्धुर्मेध्यानेवैतत्करोति ” ॥ १७ ॥
प्रोक्षण क्यों करना चाहिए उसकी उपपत्ति बतला दी गई अब पद्धति बतलाते हैं । अध्वर्यु ' रक्षोहरणो वो वलगहनः प्रोक्षामि वैष्णवान् ' " ये मन्त्र बोलता हुआ प्रोक्षण करता है । ये उपरव राक्षसों का नाश करने वाले हैं एवं वलगाओं का नाश करने वाले हैं । ये हविर्धान के अन्तर्गत हैं अतः एव तत् सम्बन्धेन ये भी वैष्णव ही हैं-