Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 171–180

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण ( स्तुतियाँ ) समृद्धिशाली बनें । प्रजा स्तुति रूप वाणी है । इन्द्र क्षत्र है, प्रजा विट् है । स्तुति रूप प्रजा के द्वारा इन्द्ररूप क्षत्र को चारों ओर से वेष्टित करते हैं । ग्रन्थकार ( स्व ० ) पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने मर्त्यामृतभेद से द्विविध वाक् का उल्लेख कर इन्द्र को अमृता वाक् मान कर उसको मर्त्या वाक् रूप प्रजानों से परिवेष्टित बतलाया है तथा इसी रूप से पूर्वोक्त मन्त्र की व्याख्या की है ॥ २४ ॥

इसके बाद- ' इन्द्रस्यूरसि ' यह कहता हुआ सदोमण्डप के चारों ओर लगी हुई कनात सूतीयुक्त सुए से सीं देता है । सीने के बाद उसके अन्त में ' इन्द्रस्य ध्रुवोऽसि ' का उच्चारण करता हुआ गांठ लगा देता है - जिससे सींवन खुल न जाए | पश्चात् कर्म समाप्त होने पर उस ग्रन्थि को खोल देता है जिससे यजमान व अध्वर्यु को गठिया न हो जाए । क्यों कि इस सदोमण्डप का अधिष्ठाता इन्द्र है, अतः ' ऐन्द्रमसि ' कह कर उसका स्पर्श करता है ॥२५ ॥

सदोमण्डप में आठ धिष्ण्याग्नियाँ, प्रकृतियज्ञ ( आन्तरिक्ष्य अग्नियों ) की नकल पर बनाई जाती हैं । जिन में ६ अग्नियाँ सदोमण्डप के बीच में होती हैं तथा श्राग्नीध्रीय और मार्जालीय ये दो अग्नियाँ क्रमशः हविर्धान शकटों के पश्चिम भाग के ठीक उत्तर में व दक्षिण में होती हैं । हविर्धान शकटों के पश्चिम भाग को अच्छी प्रकार देख कर उसके ठीक उत्तर में प्राग्नीधमण्डप को बनाता है । इसमें भी तीन मत हैं- प्रथम मत यह है कि आग्नीध्रीय-वेदिका आधा भाग महावेदि के भीतर रहना चाहिए तथा उसका प्राधा भाग महावेदि के बाहर । दूसरा मत यह है कि आग्नीध्रीय वेदि का आधे से अधिक भाग महावेदि के भीतर होना चाहिए तथा शेष भाग वेदि के बाहर होना चाहिए । तीसरा मत यह है कि सारी भारतीय वेदि महावेदि के अन्दर रहनी चाहिए । जब आग्नीध्रीय वेदि बन जाए तो अध्वर्यु-' वैश्वदेवमसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उसका स्पर्श करता है । विश्वेदेवो के सम्बन्ध से ही आग्नीध्रीयमण्डप को वैश्वदेव कहा जाता है ॥ २६ ॥

आग्नीधीमण्डपको वैश्वदेव कहने का दूसरा कारण आगे की कण्डिकानों में बत-लाया जा रहा है - अर्थात् देवताओं ने जब यज्ञ का वितान किया तब वे असुर और राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गए । सदोमण्डप में स्थित देवताओं पर दक्षिण दिशा से आ कर असुर और राक्षसों ने आक्रमण कर दिया और जीत कर सदोमण्डप पर अपना अधिकार कर लिया । उन्होंने केवल सदोमण्डप में रहने वाले देवताओं को ही नहीं जीता । किन्तु सदो-मण्डप में रहने वाली छहों प्रज्वलित धिष्ण्याग्नियों को भी नष्ट कर दिया ॥ २७ ॥

इस असुरों के आक्रमण से पूर्व ये छहों धिष्ण्याग्नियाँ उसी प्रकार प्रज्वलित रहती थीं जिस प्रकार ग्राहवनीयाग्नि, गार्हपत्याग्नि व आग्नीधीयाग्नि । किन्तु असुरों ने इन धिष्ण्याग्नियों पर आक्रमण कर उन्हें शान्त कर दिया, बुझा दिया तब से इनका जलना बन्द हो गया । किन्तु इतनी देर में देवता सावधान हो गए । अतः प्राग्नीधमण्डप के पास पहुँचते-[ १५५ ]

पृष्ठ 172

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण दो - ब्राह्मण पहुँचते उन्होंने असुरों को जीत लिया । चूँकि आग्नीध्र अग्नि के सामर्थ्य से देवता असुर-राक्षसों की हिंसा से मुक्त हो गये । अतः आग्नीध्रमण्डप को वैश्वदेव कहा जाता है || २८ ॥ असुरों के परास्त हो कर भाग जाने के बाद देवताओं ने सदोमण्डप के मध्य में स्थित धिष्ण्याग्नियों को पुनः प्रज्वलित किया । जो संसार में प्रसिद्ध है, जिसका यश त्रिभुवन में विस्तृत है, जो वेद का ज्ञाता है वही समृद्ध कहलाता है । ऐसे को ही आग्नीध्र बनना चाहिए | चूँकि आग्नीध्र सब से श्रेष्ठ है, अतः सर्वप्रथम आग्नीध्र को ही दक्षिणा देनी चाहिए । क्यों कि इसी के बल से देवताओं ने असुरों को परास्त किया था । ऋत्विजों में से यदि कोई रुग्रण हो जाए तो उसी समय ' आग्नीध्रमेनं नयत ' इसको आग्नीध्र के पास ले जाओ, ऐसा कह दें । ऐसा कहने से उसका रोग नष्ट हो जाएगा, दुर्बलता नष्ट हो जाएगी । तात्पर्य यह है कि आग्नीध्र के बल से सारे देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की । अतः श्राग्नीध्रमण्डप को वैश्वदेव कहा जाता है ॥ २६ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] हविर्धान- मण्डप तय्यार हो चुका एवं उसमें दो शकट पूर्वमुख करके रख दिए गए । छदि, उपरव, सोमाभिषव के पत्थर, चर्म, ग्रावा इत्यादि रख कर यज्ञपुरुष का मस्तक तय्यार कर दिया गया । अब हम सदोमण्डप में जो काम होता है - वह बतलाते हैं । जिस प्रकार हविर्धान इस यज्ञ -पुरुष का मस्तक है तथैव सद स्थान इसका उदर है इसीलिए उदरस्थ प्राण - देवता इसी में भोजन करते हैं । मुख द्वार से आहुत आहुति को प्राणदेवता इस उदर में ही बैठ कर खाते हैं एवं इसी में प्राण - देवता प्रति-ष्ठित रहते हैं अतएव उसी उदर की प्रतिकृति पर बनाया गया यह उदर स्थानीय सदोमण्डप है - इसी सारे ऋत्विक भोजन करते हैं एवं यहीं रहते हैं । यही उनका शयनालय है - यही विश्राम स्थान है-यही भोजन स्थान है । सोमयज्ञ में १६ ऋत्विक होते हैं । यजमान और यजमान पत्नी रहती है । एक पुरोहित रहता है । एक सोम प्रवाक् रहता है । एक सदस्य रहता है । एक परि - कर्मी रहता है । इसमें परि कर्मी और यजमान पत्नी को छोड़ कर बाकी सारे ऋत्विक् इसी सदोमण्डप में भोजन करते हैं । इसी में सोते हैं । यही इन ऋत्विजों की प्रतिष्ठा । हमारा जो उदर है - उसमें नाना गोत्र के प्राण रहते हैं । दस प्राण मुख्य हैं । दसों भृगु - अङ्गिरा आदि नामों से व्यवहृत होते हैं । दसों ही प्रारण भिन्न - भिन्न गोत्र के हैं । चूंकि हमारे उदर में नाना गोत्र के नाना प्राण रहते हैं अतएव हम हमारे उदर को ' सद ' कह सकते हैं । जिस प्रकार हमारे उदर में नाना गोत्र वाले ऋषि - प्राण- श्राग्नेय - प्राण रहते हैं तथैव इस सदो-मण्डप में भी नाना गोत्र के ब्राह्मण रहते हैं अतएव इसे भी उदरवत् हम अवश्य ही सदो स्थान कहने के लिए तय्यार हैं । यह सद स्थान त्रिवृत् के ऊपर और पञ्चदश के मध्य में है - यह अन्तरिक्ष कहलाता है । अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता इन्द्र और वायु हैं । अतएव ' वायुर्वेन्द्रोऽन्तरिक्ष स्थान इति ' । यह कहा जाता है । जिस प्रकार विष्णु का यज्ञ मस्तक होने के कारण तत्सम्बन्धेन हविर्धान वैष्णव कहलाता है तथैव त्रिवृत् के ऊपर होने के कारण प्रतएव इन्द्रदेवता से सम्बन्ध हो जाने से यह सद ऐन्द्र कहलाता है । इसी अभि-प्राय से कहते हैं-[ १५६ ]

पृष्ठ 173

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) तीन बृहस्पतियों में से एक । १. सदो - ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ १५७ “ उदरमेवास्य सदः । तस्मात् सदसि भक्षयन्ति । यद्धीदं किञ्चाश्नन्त्यु-resea दं सर्वं प्रतितिष्ठति । अथ यदस्मिन् विश्वे देवा श्रसीदंस्तस्मात्सदो नाम ases एवास्मिन् ब्राह्मणा विश्वगोत्राः सोदन्ति ऐन्द्रं देवतया - ( यथा हविर्धानं विष्णुदेवत्यं एवं सद इन्द्रदैवत्यमित्यर्थः ) " ॥१ ॥

इस सदोमण्डप के बीचों - बीच औदुम्बरी गाड़ते हैं । गूलर के वृक्ष का नाम उदुम्बर है । इसकी जो एक बहुत मजबूत थूणी होती है- जिसके कि अन्त में दो शाखा निकली रहती है ऐसी औदुम्बरी को सदोमण्डप के बीच में गाड़ा जाता है-" तन्मध्ये ( सदसो मध्यदेशे ) औदुम्बरों मिनोति ” । सदोमण्डप में प्रौदुम्बरी गाडने का क्या कारण है - यह बतलाते हैं । यह जो उदम्बर है - वह ऊ स्वरूप है । ऊ का नाम ही अन्न है । यह अन्न उदर में ही प्रतिष्ठित होता है । यहाँ पर इस यज्ञ-पुरुष का उदर यही स्थान है अतएव इसमें भी अन्न रखना आवश्यक है । बस प्रौदुम्बरी रखना सद स्वरूप यज्ञपुरुष के उदर में अन्न प्रतिष्ठित करना है । ऊ रस एक ऐसा रस है - जिससे शरीर में एक-दम स्फूर्ति आ जाती है । जिसमें जितना अधिक ऊ रस होता है - वह उतना ही फुर्तीला होता है एवं जिसमें ऊ की मात्रा जितनी कम रहती है - वह उतना ही सुस्त रहता है । जिसमें ऊ की कमी रहती है - उसके मुख पर मक्खियाँ भिनभिनाया करती हैं । यह ऊ रस परमेष्ठि - मण्डल में उत्पन्न होता है । ऊ इस परमेष्ठी की वस्तु है इसीलिए परमेष्ठी की नाड़ी को ' ऊर्जस्वती ' ' कहा करते हैं । ऊ रस दिव्य-लोक की वस्तु है । यह जितना अधिक रहता है- हमारा खिचाव दिव्यलोक की तरफ उतना ही अधिक रहता है । ऊ रस यदि ज्यादा हो जाता है तो दिव्याकर्षण की अधिकता के कारण पार्थिव आकर्षण कमजोर जाता है - प्रतएव हम हलके हो जाते हैं । अम्बर आकाश को कहते हैं । चूंकि ऊ से ऊँचे आकाश की ओर हमारा आत्मा खिंच जाता । हमारे में एक प्रकार की ऐसी स्फूर्ति आ जाती है-जिसके ना जाने से हम उछलते रहते हैं । हमारा आत्मा ऊँचा उठा रहता है अतएव इस रस को उद-म्बर कहते | परोक्षप्रिय देवता उदम्बर को हो उदुम्बर कहा करते हैं । यह उदुम्बर प्राण ऊ प्रारण चूंकि गूलर के पक्ष में रहता है अतएव गूलर को प्रौदुम्बर कहा जाता है । विश्व में जितनी भी वनस्प तियाँ हैं - उन सबमें ऊप्रारण रहता है परन्तु गूलर में बहुत ही अधिक मात्रा से रहता है अतएव इसका नाम ही ' औदुम्बरी ' हो जाता है । परमेश्वर की लीला विचित्र है । आकाश में जितने भी नक्षत्र हैं उन सब में भिन्न - भिन्न प्रारण हैं परन्तु लुब्धक " नाम का एक नक्षत्र ऐसा है जिसमें थोड़ी - थोड़ी मात्रा में सारे नक्षत्रों का प्राण मौजूद है अतएव लुब्धक को ' पशुपति ' कहा जाता है । एवमेव संसार में जितनी भी भक्ष्य औषधियाँ हैं उन सबका रस इस ' जो ' में मौजूद है । ठीक इसी प्रकार संसार की यच्चयावत् वनस्पतियों का रस इस गूलर में मौजूद है अतएव गूलर को सबसे अधिक बलप्रद माना जाता है । गूलर

पृष्ठ 174

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण में सबसे अधिक ऊ प्राण है - इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि अन्य औषधियों की अपेक्षा गूलर में बहुत जल्दी कीड़े पैदा हो जाते हैं । ऊ ही जीवन शक्ति का अधिष्ठाता है । गुलर में ऊ प्रतिमात्रा से उत्वरण रहता है अतएव इसमें बहुत जल्दी चेतना का आविर्भाव हो जाता है । परमेष्ठी से आ कर यह ऊ प्रारण सारे अन्तरिक्ष में भरा रहता है । त्रिवृत् से प्रारम्भ कर पश्चदशस्तोम के पूर्व का नाम ही अन्तरिक्ष है - इसी में ऊ रहता है । त्रिवृत् से पञ्चदश तक प्राकृतिक सोमयज्ञ का सदोमण्डप है । रस भरा हुआ है । जिस प्रकार अधिदैवत के अन्तरिक्ष में ऊ रस भरा वही उदर है । उसमें ऊ है तथैव अध्यात्म में भी अन्तरिक्ष स्थानीय उदर में जिसे कि हमने सद बतलाया है ऊ रस भरा रहता है । ऊ का स्थान उदर ही । चूंकि इस यज्ञ का वितान अध्यात्म - पुरुष की प्रतिकृति पर किया गया है एवं त्रिवृत् से पञ्चदश तक उदरस्थानीय सद है । प्रकृति में चूंकि सद में ऊ भरा रहता है त -एव यहाँ भी ऊ प्राण रखना चाहिए । प्राण निराकार वस्तु है - वह पकड़ में नहीं आ सकता श्रतएव ऊर्स् -प्राण युक्त प्रौदुम्बरी को ही यहाँ रख दिया जाता है । बस प्रौदुम्बरी गाड़ने का यही कारण है | यहाँ पर ऊ को न कह दिया गया है परन्तु वास्तव में ऐसी बात नहीं है । अन्न से ऊ उत्पन्न होता है न कि अन्न ही ऊ है । ऊ कार्य्यं है - अन्न कारण है । हम जो अन्न खाते हैं पहले उसका ऊ रस बनता है, ऊ से प्रारण बनते हैं । ऊ रसयुक्त प्राण रोमकूपों में होकर बाहर निकल जाता है । उस कमी को पूरी करने के लिए शनाया ' फिर अन्न की प्राहुति के लिए प्रेरित करता है - श्रन्न फिर ऊ बन जाता है- ऊ प्रारण बन जाता है - इस धारा - क्रम से शरीर यज्ञ होता रहता है अतएव ' अन्नो प्राणानामन्योन्य कार्य्य-परिग्रहो यज्ञः ' यह कहा जाता है । घृत से तेज उत्पन्न होता है न कि घृत ही तेज है । तथापि • कारण के अभेद की विवक्षा करके जैसे ' तेजो वै घृतम् ' कह दिया जाता है तथैव यहाँ भी अन्न और ऊ के अभेद की विवक्षा से ' अन्नं वा ऊ दुम्बरः ' कह दिया जाता है । वास्तव में ऊ अन्न नहीं है - अन्न का का है । अस्तु प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि प्राध्यात्मोदर में ऊक् है । उसी की नकल पर इस यज्ञ का वितान किया जाता है एवं इसका जो सदस्थान है वह उदर है अतएव इसमें भी ऊर्को स्थापन से करना चाहिए । बस इसीलिए सदोमण्डप के मध्य में औदुम्बरी गाड़ी जाती है । इसी अभिप्राय कहते हैं-" तन्मध्ये श्रौदुम्बरों मिनोति । अन्नं वाऽऊर्गुदुम्बरः । उदरमेवास्य ( यज्ञ-पुरुषस्य ) सदः । तन्मध्येऽश्रौदुम्बरों मिनोति ” ॥२ ॥

सदोमण्डप के बीच में प्रौदुम्बरी गाडनी चाहिए - यह मध्य का प्रदेश कौन - सा है - यह बतलाते हैं-हर्वेिदी के पूर्वार्द्ध स्थूणराजा से तीन विक्रम पूर्व की ओर जो मध्यम शकु गाडा जाता है जो कि वेदि . के पश्चिमार्द्ध में रहता है उससे पूर्व की ओर ६ विक्रम विक्रमण करता है एवं उस छठे विक्रम से दक्षिण दिशा की ओर एक विक्रम विक्रमण करता है - बस वहीं औदुम्बरी को गाड़ने के लिए खड्डा खोदता है । अन्तः शङ्कु से छह विक्रम पूर्व जाकर वहाँ से फिर एक विक्रम दक्षिण जाकर उसी स्थान में प्रौदुम्बरी १. भुभुक्षा को प्रेरित करने वाले बल ( प्राण ) को ही अशनाया ( बल ) कहा गया है । 1 [ १५८ ]

पृष्ठ 175

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) वास्ते । ' वा ० सं ० ५।२६ ' | १. दो - ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण १ [ १५६ ] के लिए खड्डा खोदना चाहिए यही तात्पर्य है । ऊ रस को ही इस खड्डे में रखा जाता है । रस कुल सात ही प्रकार का है । बस रस सम्पत्ति की सर्वात्मकता के लिए सातवें विक्रम पर औदुम्बरी गाडी जाती है । यदि सीधे ही सातवें विक्रम पर गाड़ी जाती तो सदोमण्डप के केन्द्र से बाहर निकल जाती । श्रदम्बरी अर्थात् ऊ रस केन्द्र में रहता है अतः सीधे सातवें विक्रम पर नहीं गाड़ सकते । रस सम्पत्ति के लिए सात विक्रम श्रावश्यक हैं अतएव छह विक्रम पूर्व की ओर विक्रमण किया जाता है एवं एक विक्रम दक्षिण की ओर विक्रमरण किया जाता है और यहाँ पर खड्डा खोदा जाता है— " अथ य एष मध्यमः शङ्कुर्भवति । वेदेर्जघनार्धे ( सौमिकवेद्या पश्चिमार्धस्य यः शकुविहितः ततः ) तस्मात् प्राङ् प्रक्रामति षड्विक्रमान् । दक्षिणा सप्तम पक्रामति सम्पदः कामाय । तत् ( तत्र ) श्रवटं ( गतं ) परिलि-खति " ॥३ ॥

किस जगह खड्डा खोदना चाहिए - यह बतला दिया गया । वह अध्वर्यु खड्डे के लिए निशान के " देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि " । ( वा ० सं ० ५।२६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अनि उठता है । इस मन्त्र का तात्पर्य पूर्व के मन्त्रानुसार ही समझना चाहिए । सविता देवता की आज्ञा लेने के लिए ही यह मन्त्र बोला जाता है । यह अनि स्त्रीरूपा है अतएव ' नासि ' कहा गया है । “ सोऽभ्रिमादत्ते 1 । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ता-भ्यामाददे नार्यसीति । समानऽएतस्य यजुषो बन्धुः । योषो वा एषा यदस्ति-स्मादाह नार्यसीति " ॥४ ॥

वह अध्वर्यु ' इदमहं रक्षसां प्रीवा अपिकृन्तामि " यह बोलता हुआ खड्डे के लिए अभि का निशान बनाता है । इस परिलेखन से मैं राक्षसों का गला काटता हूं । वज्र तीक्ष्णधारयुक्त होता है एवं उससे गला कट जाता है । काटने का काम वज्र से होता है । यह अभि भी तीक्ष्ण धार वाली होती है एवं इससे भी काटने का ही काम लिया जाता है अतएव अभि को वज्र कहा जाता है । प्राज श्रध्वर्यु अि से मिट्टी पर निशान नहीं बनाता अपितु वज्र से राक्षस का गला काटता है अतएव - ' रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि ' यह कहा गया है । " थावट परिलिखति । ' इदमहं रक्षसां ग्रीवाश्रपिकृन्तामि ' इति । वज्रो वा अभिः । वज्रेणैवैतन्नाष्ट्राणां रक्षसां ग्रीवा पिकृन्तति ॥५ ॥

पृष्ठ 176

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणं सदो - ब्राह्मण अभ्रि से रेखा बनाने के बाद उस मिट्टी को खोदता है एवं खोदा हुआ जो मिट्टी का समूह है उसे चूंकि मिट्टी श्रवट के समीप ही पूर्व प्रदेश में रख देता है । प्रौदुम्बरी गाड़ने के बाद उसे के दाबने पास ही के लिए पूर्व की ओर रख काम में आती है अतएव उसे इधर - उधर नहीं फेंकनी चाहिए अपितु अवट उत्तर भाग में महावेदि देनी चाहिए । उत् करके फेंकने की वस्तु को उत्कर कहा करते हैं । महावेदि वस्तु के कूड़ा वगैरह ) डाला .से बड़ा एक खड्डा बना दिया जाता है उसमें यज्ञ का उत्कर ( फेंकने भी की उत्कर कह दिया जाता है । जाता है अतएव ' तात्स्थ्यात् ताच्छन्दत्वम् ' न्यायेन उस खड्डे को वास्तव में फेंकने की वस्तु का नाम उत्कर है -" थ खनति । प्राञ्चमुत्करमुत्किरति ( खातं मृनिचयं वटस्य समीपे प्राग्देशे उत्किरति ) " । को नाप कर इस प्रकार खड्डा तय्यार करके बाद में यजमान के जितनी लम्बी - उस यजमान प्रौदुम्बरी जितनी नाप कर बाकी बचे हुए अंश को काट देता है । जो श्रीदुम्बरी यहां लाई जाती है - उसे देते हैं । कारण इसका रख ली जाती है- जो यजमान से अधिक अंश बच जाता है उसे काट कर फेंकऊ रस केन्द्र में रह कर यही है कि इस यज्ञ से यजमान का ही दिव्य भाव में जन्म होता है । यह यहाँ भी यजमान ' श्रालोमभ्य श्रानखाग्रेभ्यः ' व्याप्त रहता है । शरीर तक ही ऊ रस रहता है अतएव संमित ही प्रौदुम्बरी होनी चाहिए । " यजमानेन सम्माय ( यजमानप्रमाणं कृत्वा ) श्रौदुम्बरों परिवासयति ( अवशिष्टमंशं छिनत्ति ) " । रख इसके बाद उस औदुम्बर शाखा को अवट के पूर्व भाग में आगे की ओर मुख भाग करके एवं उसके देता है । औदुम्बरी का मूल भाग जो कि अवट में दबेगा उसे तो अवट के पास देना रखना चाहिए- चाहिए मुख भाग को पूर्व की ओर रखना चाहिए । इस प्रकार उसे अवट के पास रख " तामग्रेण प्राचीं निदधाति " इसके बाद औदुम्बरी प्रमाण तक इस पर चारों ओर कुशा रख देता है । श्रौदुम्बरी से बाहर देनी चाहिए -कुशा नहीं रहनी चाहिए । मूल से अन्त तक प्रदुम्बरी जितनी ही कुशा बिखेर " एतावन्मात्राणि ( श्रदम्बरीप्रमाणानि ) बहष्युपरिष्टादधिनिदधाति ( दुम्ब उपरि श्राच्छादयति ) " ॥ ६ ॥

दिए श्रीदुम्बरी का प्रोक्षण जिस पानी से होता है वह प्रोक्षणी यवमती होती है । उसमें यव डाल जाते हैं-" अथ यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति " । [ १६० ]

पृष्ठ 177

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण इस प्रोक्षणी में जौ क्यों डाले जाते हैं- यवमती प्रोक्षणी करने की क्या प्रावश्यकता है - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं- श्रौषधियों का ( अन्नादि का ) रस यह पानी ही है । यदि औषधियों में पानी न डाला जाए तो श्रौषधियाँ उत्पन्न न हों श्रतएव मानना पड़ता है कि इनका सारभाग पानी ही है । पानी के बिना श्रौषधियाँ बेकार हैं । यहीं कारण है कि बिना पानी के खाई हुई जो औषधियाँ हैं उनसे कभी भी तृप्ति नहीं होती है । तृप्ति का साधक यह पानी ही है । खाली चने चाबने से अथवा और कोई शुष्क न खाने से तृप्ति नहीं हो सकती । आप कितना ही अच्छा अन्न खाइए - आपकी तृप्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि आप पानी न पी लें । बिना पानी के, औषधियों से तृप्ति कभी नहीं हो सकती है । अन्न का स्वाद पानी से ही आता है । खाली चून ( आटा ) फाँकने में कोई स्वाद नहीं । तृष्टि तब होती है जबकि भुक्त अन्न आत्मा के अवयवों में भर जाए यह काम प्रारण का है । प्रारण ही प्रश्न-विधर्त्ता है । भुक्त अन्न को जहाँ की तहाँ जमा देना इसी प्राण का काम एवं प्राण आपोमय है । पानी से ही प्रारण बनता है अतएव ' अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् ' ' यह कहा जाता है । बिना पानी के मात्र औषधि से तृप्ति नहीं होती इसका यही कारण है इसीलिए भोजन करने से पहले अन्न के रस युक्त होने के लिए श्राचमन करना आवश्यक है - इसी को प्रमृतोपस्तरण कहते हैं एवं भोजनान्त में आचमन करना चाहिए- इसी को ' अमृता- विधान ' कहते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" आपो ह वा प्रोषधीनां रसः । तस्मादोषधयः केवल्यः खादिता न धिन्वन्ति ( न प्रीणयन्ति ) | ( सलिलं विहाय शुष्कान्नेन तृप्तिर्नजायते - इति भावः:) " 1 जिस प्रकार पानी श्रौषधियों का रस है, उसी प्रकार औषधियाँ पानी का रस हैं । बिना प्रौषधि के पानी भी बेकार है । पानी की प्रतिष्ठा अन्न ही है । अन्न ही पानी का आयतन है । यदि बिना अन्न खाए पानी पी लिया जाता है तो उसमें जरा भी स्वाद नहीं आता है एवं जी मिचलाने लग जाता है । इसीलिए लोक भाषा में ' निर्णे काळजे पाणी मत पीओ ' यह कहा जाता है । निर्णे ' - ' निरन्न ' का ही अप-' भ्रंश है | जब तक हृदय निरन्न हो तब तक पानी हर्गिज नहीं पीना चाहिए । बिना अन्न के पानी में न स्वाद आता है - न वह पानी प्राण ही बन सकता है । जिस प्रकार बिना पानी के खाली औषधि से तृप्ति नहीं हो सकती तथैव बिना अन्न के खाली पानी से भी तृप्ति नहीं हो सकती - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" औषधय उहा अपां रसः । तस्मादापः पीताः केवल्यो न धिन्वन्ति " | जब पानी और औषधि दोनों मिल जाती हैं - तभी इनसे तृप्ति होती | अन्न - पानी के संयोग से तृप्ति होती है एवं उसी से ऊ रस उत्पन्न होता है । अन्न पानी के मेल से तृप्ति होती है इसका कारण यही है कि उस समय वे दोनों सरस हो जाते हैं । तृप्ति का - श्रानन्द का एकमात्र कारण रस ही है प्रतएव ' रसो ह्येव सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति ' यह कहा जाता है । १. ' छां ०३० ६।५।४ ' । [ १६१ ]

पृष्ठ 178

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो ब्राह्मण -बिना अन्न के पानी नीरस है- बिना पानी के अन्न नीरस है प्रतएव दोनों से तृप्ति नहीं हो सकती । जब दोनों मिल जाते हैं तो दोनों सरस हो जाते हैं । बस रस से ही ऊ रस उत्पन्न होता है । हमें इस समय प्रदुम्बरी का प्रोक्षण करना है । पानी से इसे सरस बना कर ऊ रस युक्त करना है किन्तु खाली पानी नीरस है अतः पानी को सरस बनाने के लिए ही इसमें जो डाले जाते हैं । यवमती - प्रोक्षणी होने का यही कारण है-" यदेवोभय्यः संसृष्टा भवन्ति - अथैव धिन्वन्ति । तहि हि सरसा भवन्ति । सरसाभिः प्रोक्षणीति ( तस्माद् यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति इति शेषः ) " ॥७ ॥

यहाँ पर एक प्रश्न होता है कि चाहे जिस अन्न से ही पानी सरस हो सकता है तो फिर जौ ही ' डालने की क्या श्रावश्यकता है? क्यों न गेहूं डाल दिए जायें - चावल ही क्यों न डाल दिए जायें । इसका उत्तर देते हैं - देवता और असुर दोनों ही भगवान् प्रजापति की सन्तान हैं । ये दोनों प्रापस में स्पर्द्धा करने लगे । आपस में लड़ने लगे । देवता चूंकि कमजोर थे अतएव श्रसुरों ने इनकी सारी अन्न सम्पत्ति को छीन लिया । सारी श्रौषधियाँ इन देवताओं से छिन्न कर असुरों में चली गई । केवल यव ( जी ) ही असुरों में न गए । यव को असुर लोग न छीन सके - बाकी सबको छीन लिया । तमोमय आय प्राण का नाम असुर है - प्रकाशी प्रारण का नाम देवता है । असुरप्राण परमेष्ठि- मण्डल की वस्तु है । देवता सूर्य मण्डल की वस्तु हैं । दोनों ही स्वयम्भू से उत्पन्न होते हैं जो कि परमेष्ठी से भी ऊपर है । सूर्य और परमेष्ठी अर्थात् देवता और असुर दोनों ही स्वयम्भू प्रजापति की सन्तान होने के कारण ' प्राजापत्य ' कहलाते हैं । इन दोनों में सदा ही स्पर्द्धा चलती रहती है । ग्रन्धकार और प्रकाश का स्वाभा-विक वैर है । इन्हीं दोनों प्राणों से संसार की यच्चयावत् श्रौषधियाँ उत्पन्न होती हैं अतएव ' देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरस्थाण्वनुपूर्वशः ' यह कहा जाता है । देवेभ्यः से असुरेभ्यः भी अभिप्रेत है । संसार के सारे नों में देव और असुर दोनों प्रारण रहते हैं । इन सारे अन्नों में केवल जौ को छोड़ कर - और जितने भी न हैं उन सबमें देव प्राण अर्थात् सौर - प्राण अत्यल्प मात्रा में रहता है एवं ग्रासुर अर्थात् पार्थिव प्राण अधिक मात्रा में रहता है । जौ में सौर प्रारण अधिक रहता है एवं पार्थिव - प्रारण अल्प मात्रा में रहता है । बस इसी प्राकृतिक विज्ञान का अलङ्कार रूप से वर्णन करते हुए कहते हैं-" देवाश्च वासुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततो देवेभ्यः सर्वा एव ओषधयः ईयु: ( देवेभ्यः सकाशात् पलायिताः ) यवा हैवैभ्यो नेयुः " ॥८ ॥

देवताओं ने इस बात को बर्दाश्त नहीं किया । उन्होंने प्रसुरों की ओर गई हुई सारी औषधियों को वापस लेना चाहा । आखिर तो देवता देवता थे - असुर बलवान् थे किन्तु थे कल के अन्धे अतएव बुद्धि - बल के सामने वे परास्त हो गए । देवतालोग शत्रुत्रों के पास गई हुई सारी प्रौषधियों, यवों से पुनः युक्त हो गए अर्थात् सारी श्रौषधियाँ यवों के कारण देवताओं के पास लौट आईं । इसी यव के जरिए से चूंकि सारी श्रोषधियाँ इनसे युक्त हो गई- इनमें मिल गईं अतएव इनका नाम ' यव ' पड़ गया-[ १६२ ]

पृष्ठ 179

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण " तद्वै देवा अस्पृण्वत ( सर्वा औषधीर्वाच्छितवन्तः ) तएतैः ( यवैः ) सर्वाः सपत्नानामोषधीरयुक्त ( श्रमिश्रयन् ) यदयुवत तस्माद्यवा नाम " ॥६ ॥

देवताओं ने विचार किया कि चूंकि यह सारी औषधियाँ अपने पास इन यवों के द्वारा आई हैं । अतएव इन सारी औषधियों का जो रस है- सार भाग है उसे इन यवों में ही रख दें । इस प्रकार विचार करके उन सारी प्रौषधियों का जो रस था- देवताओं ने उसे यवों में डाल दिया । जिस प्रकार लुब्धक में सारे तारों का रस है तथैव अन्नों में एक जौ ही ऐसा अन्न है जिसमें कि सारे अन्नों का रस है । जिन - जिन अन्नों में ग्रासुर भाग ज्यादा है उन सारे अन्नों का रस इस जौ में मौजूद है - यही तात्पर्य है । अम्नों में रहने वाला जो पार्थिव रस है वाक् - भाग है- वह इस जौ में मौजूद है । बस इसी विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं --" ते " होचुः - हन्त यः सर्वासामोषधीनां रसस्तं यवेषु दधाम इति । स यः daruti रस प्रासीत् तं यवेष्वदधुः ” । इसका प्रत्यक्ष प्रमारण यही है कि फाल्गुन के अन्त में जब सारी औषधियाँ - सारे अन्न मारे शीत के मारे पाले के कुम्हला जाते हैं उस समय जौ खेत में लहराते रहते हैं अतएव मानना पड़ता है कि सारे अन्नों का रस इसमें प्रा गया है अतएव ' रसाधिक्यात् बलाधिक्यात् ' इस पर उस पाले का असर दूने नहीं पड़ता है । उस समय यह खाली लहराते ही नहीं रहते हैं अपितु बड़ी तरोताजगी के साथ दिन ' रात चौगुने बढ़ते रहते हैं । इसी प्रकार से तो देवताओं ने इनमें सारा रस डाला था अर्थात् प्राणदेव-ताओं द्वारा अन्यान्य रसों के आ जाने से चूंकि जौ अधिक शक्तिशाली जाता है प्रतएव इसका सर्दी व पाला कुछ नहीं बिगाड़ सकते ---" तस्मात् यत्र ( शीतत्तौं ) अन्या श्रोषधयो म्लायन्ति तत् ( तत्र ) एते ( यवाः ) मोदमाना वर्द्धन्ते । एवं ह्येषु रसमदधुः " । चूंकि यव में सारे अन्नों का रस मौजूद है । इस यव को पानी में डालना एक प्रकार से अपने शत्रुओं की सारी औषधियों को अपने में रखना है । यव के योग से सारे अन्न युक्त हो जाते हैं । पूर्व अन्न संदर्भ ही पानी का रस है श्रतएव अन्य किसी अन्न की न होकर प्रोक्षणी आप यवमती की ही होती है में । दिव्य प्राण से सिद्ध हो जाता है कि जो सारे अन्नों से पवित्र है - दिव्यान्न है, अन्य अन्नों की अपेक्षा जो में जौ अधिक मात्रा से रहता है अतएव दिव्यभाव चाहने वाले को अन्य ग्रन्नों की अपेक्षा अधिक मात्रा ही खाने चाहिए-" तथोऽएवैष ( अध्वर्युः ) सर्वाः सपत्नानामोषधीर्युते । तस्माद्यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति ॥१० ॥

[ १६३ ]

पृष्ठ 180

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण पानी में जौ क्यों डालने चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई है । अब पद्धति बतलाते हैं । अध्वर्यु - ' यवोऽसि यवयास्माद्वेषो यवयारातोः इति ' मन्त्र बोलता है । हे यव पदार्थ! आप यव हो अर्थात् असुरों से सारी अन्न संपत्ति को पृथक् करने वाले हैं श्रतएव हमारे से द्वेष करने वाले जो हमारे शत्रु हैं उनकोआप हम पृथक् कर दें । हमारे सारे शत्रुनों का नाश हो जाए - यही तात्पय्यं है । याज्ञवल्क्य कहते हैं - इस मन्त्र में कोई भी बात तिरोहित नहीं है अर्थात् इसका अर्थ स्पष्ट है-" स यवानावपति । ' यवोऽसि ( पृथक् कर्त्ताऽसि ) यवयास्मद्वेषो ( श्रस्मत्त द्वेष्टृन् पृथक् कुरुत ) यवयाराती: ( प्रदानशीलान् पृथक् कुरुत ) । नात्र तिरोहितमिवास्ति " । इसके बाद श्रदुम्बरी का प्रोक्षण करते हैं । जहाँ - जहाँ प्रोक्षण होता है उसका केवल मात्र मेध्यता ही फल है । पवित्रता करना एवं स्नेहन करना ही प्रोक्षण की उपपत्ति है --" अथ प्रोक्षति - एको वै प्रोक्षणस्य बन्धुः - मेध्यामेवैतत् करोति ॥११ ॥

अध्वर्यु ' दिवे त्वाऽन्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यं त्वा " यह मन्त्र बोलता हुआ प्रौदुम्बरी का प्रोक्षण २ करता है । हे उदुम्बर शाखाग्र! द्युलोक के लिए, अन्तरिक्ष के लिए एवं पृथिवी के लिए मैं आपका प्रोक्षण करता हूं । पानी डालना ऊ रस की वृद्धि करना है । इस ऊ रस की वृद्धि इसलिए की जाती है कि प्रकृति यज्ञवत् हमारा यह ऊस भी तीनों लोकों में फैल जाए जिससे कि पृथिवी से लेकर द्युलोक तक वितत रहने वाले दिव्यात्मा में ऊ रस प्रविष्ट हो जाए । इसीलिए तीनों लोकों को ऊरस से ' युक्त करते हैं । तीनों में ऊरस शामिल करते हैं - यही तात्पर्य है - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" इमानेवैतल्लोकान् ऊर्जा रसेन भाजयति । एषु लोकेषु ऊर्जं रसं दधाति " ॥१२ ॥

प्रोक्षण करने के बाद जो पानी बच जाता है उसे ' शुन्धन्तां लोका: पितृषदना: ' 3 यह मन्त्र बोलता हुआ उस खड्डे में डाल देता है— " अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्यन्ते । ताऽअवटे ( गर्ते ) अवनयति - शुन्धन्तां लोका: पितृषदना: ( इति मन्त्रेणेति शेषः ) ” । देवता पितर और असुर तीन ही प्रारण मुख्य होते हैं । गन्धर्व और मनुष्यप्राण इन्हीं तीनों में अनुगत हो जाते हैं । इन तीनों प्राणों का स्वरूप भिन्न - भिन्न है । जो खुला हुआ विकसित स्वरूप वह 1 १. ' वा ० सं ० ५।२६ ' ।, २. ' मार्जन, जल छिड़क कर पवित्र करना ' ।, ३. ' वा ० सं ० ५।२६ ' । [ १६४ ]