Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 181–190
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण देवता है । देवता सूर्य्यं से उत्पन्न होते हैं । सूर्य्यं श्राग्नेय है- विशकलन धर्म्मा है । सौर प्रकाश स्वयं उभरा हुआ रहता है एवं संसार को उभरा हुआ बना देता है । बस संसार में जो उष्मत् वस्तु होती है - समझ लो वहाँ देवप्राण उल्वण है और प्रासुर प्रारण अनुत्वण है । ठीक इसके विरुद्ध जो बद्ध रहता है - जिसका स्वरूप ग्रन्थिबन्धन के कारण नहीं दीखता है - वही असुर है । जैसे देवताओं के राजा इन्द्र हैं तथैव असुरों के राजा वरुण हैं । बन्धनप्रारण प्रासुरप्राण कहलाता है अतएव ' वरुण्या वाडएषा यद् रज्जुः - ( शत ० ब्रा ० ३।२।४।१८ ) यह कहा जाता है एवं जो न तो खुला हुआ है न ही बद्ध है वही पितर है । पृथिवी का जो भाग सूर्य की ओर है उसे हम सौर - रश्मिमय देवप्रारण सम्बन्धात् देवदेवत्य कहेंगे एवं पृथिवी का जो पृष्ठ भाग है उसे तमोमयत्वात्, सौर प्रकाश का सर्वथा अभाव होने के कारण प्रासुरदेवत्य कहेंगे और पृथिवी में जो खड्डे हो गए हैं जहाँ न घोर अन्धकार ही है - न उजाला ही है उसे पितृदेवत्य कहेंगे । रात्रि आसुर देवत्य है - दिन देवदेवत्य है - संध्याकाल पितृदेवत्य है । खूब कसी हुई धोती जिससे कि उठा-बैठा न जाए वह असुर देवत्य है- खूब ढीली - ढाली जिसमें जरा भी तकलीफ मालूम न हो वह देवदेवत्य है - अधबिचली जैसी कि बाँधा करते हैं पितृदेवत्य है अतएव ' पितृदेवत्या वै नीवि: ' ( शत ० २।४।२।२४ ) यह कहा जाता है । प्रकाश देवता है - अन्धकार असुर है । छाया पितर है इसीलिए पितृकर्म में छाया सम्पत्ति के लिए दोने को श्रौंधा कर दिया जाता है । अतएव ' तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्यः ' ( शत०-२४/२/२१ ) यह कहा जाता है । प्रकृत में हमें बतलाना यही है कि संसार में जितने भी कुएँ हैं - जितने भी खड्डे हैं सब पितृदेवत्य हैं । सबमें पितरप्राण भरा रहता है जैसे देव - प्रारण की मुझे आवश्यकता पड़ती है तथैव पितर भी मेरे शरीर के अधिष्ठाता हैं, अतएव उनको भी तृप्त करना आवश्यक है । श्रतः श्रवट में पानी डालना उस पितृस्थान को ही मेध्य करना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं—
" पितृदेवत्यो वै कूपः खातः । तमेवैतन्मेध्यं करोति ॥१३ ॥
इसके बाद ' पितृषदनमसि ' ( वा ० सं ० ५।२६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु उस खड्डे में प्राचीनाग्र और उत्तराग्र कुशा बिछाता है । पूर्वादिक देवताओं की दिक् है- उत्तरादिक् मनुष्यों की दिक् है । इस यज्ञ में दोनों शामिल हैं अतएव खड्डे में उत्तराग्र और पूर्वाग्र दोनों तरफ कुशा बिछाता है-" अथ बहषि । प्राचीनाग्राणि चोदीचीनाग्रारिण चावस्तृणाति " । कुशा क्यों बिछाई जाती है - इसका कारण बताते हैं - खेती करके जो गूलर का बीज बोया जाता है । वह जंगल के वृक्ष से कम बलवान् होता है । जो प्रकृष्टपच्य गूलर का वृक्ष होता है वह खेती वाले से कहीं अधिक मजबूत होता है । कारण इसका यही है कि खेती में हल जोता जाता है । हल जोतने से पृथिवी की मिट्टी पोली हो जाती है, अतएव इसमें उतनी मजबूती नहीं हो पाती एवं जंगल में अपने - आप पैदा होने वाला जो वृक्ष है वह जमीन के ठोस होने के कारण मजबूत होता है । इस प्रकार एक तो जंगल में पैदा होने वाले के अधिक काठिन्य में पार्थिव काठिन्य ही कारण है । दूसरा कारण यह है कि जब अपने आप वृक्ष उत्पन्न होता है तो उसके प्रास - पास जो तृण समूह है - उसमें भी इसका रस अनुस्यूत हो जाता है । इससे वे सारे तृरण - विशेष भीतर ही भीतर इस वृक्ष की जड़ों से बद्ध हो जाते हैं । सारे तृण और वृक्ष [ १६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सद - ब्राह्मण की जड़ें आपस में गुथ जाती हैं - बस जंगल में पैदा होने वाले उदुम्बर वृक्ष की कठोरता का यही दूसरा कारण है । हमारा जो यह उदुम्बर है - वह उसी के माफिक मजबूत हो इसी के लिए निदानेन इसमें कुशा डाली जाती है । अकृष्टपच्या गूलर जैसे मजबूत होती है, तथैव हमारी यह प्रौदुम्बरी मजबूत रहे इसके लिए तृण देते हैं । तृण डालना औदुम्बरी की जड़ों को इनसे गूंथ कर मजबूत करना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - जो निखात स्थान होता है - खड्डा होता है वह इस पृथिवी का पितृदेवत्यं स्थान कहलाता है । खड्डे खड्डे पितृदेवत्य कहलाते हैं । जिस प्रकार यह पृथिवी अनिखाता ( अकृष्टपच्या ) होकर श्रोषधियों मजबूत होती है एवमेव बहियुक्त जो गर्त है उसमें भी औषधियाँ मजबूत हो जाती हैं । तात्पर्य यही है कि जैसे प्रकृष्टपच्या भूमि में पैदा होने वाली औषधियाँ कृष्टपच्या की अपेक्षा दृढ़ होती है तथैव जहाँ घास - फूस अधिक रहता है वहाँ उत्पन्न होने वाली औषधि भी कृष्टपच्या ' की अपेक्षा अधिक दृढ़ होती है । हमारी औदुम्बरी वैसी ही दृढ़ हो जाए अतएव कुशा डालते हैं -" पितृदेवत्यं वा अस्याः ( पृथिव्याः ) एतद् भवति यन्निखातम् । सा ( पृथिवी ) यथाऽनिखाता ( श्रकृष्टपच्या ) श्रोषधिषु मिता स्यात् एवमेतास्वोष-धिषु मिता भवति । ( सबहिष्के गर्ते मिता शाखापि दृढैव भवतीति भावः ) " । इस प्रकार मन्त्र पुरस्सर कुशा डालने के अनन्तर ' उद्दिवं स्तभानान्तरिक्षं पूरण ह हस्व पृथिव्याम् २ यह मन्त्र बोलते हुए उस औदुम्बरी को ऊँचा उठाते हैं । हे उदुम्बर शाखे! आप अपने अग्रभाग से द्युलोक को स्तम्भित कर लीजिए अर्थात् ऊपर वाले ( द्युलोक ) का सहारा बन जाइए । मध्य के स्थल भाग से इस विपुल अन्तरिक्ष को ( ऊर्को रस से ) भर दीजिए । पृथिवी में हड़ हो जाइए प्रर्थात् द्युलोक की तरह पृथिवी को भी दृढ़ कर दीजिए । तात्पर्य यही है कि आप का जो ऊ रस है - बह तीनों लोकों में व्याप्त हो जाए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" इमानेवैतल्लोकानूर्जा रसेन भाजयति । एषु लोकेषु ऊर्ज रसं दधाति " ॥१५ ॥
इसके बाद ' तानस्त्वा मारुतो मिनोतु 3 यह बोलते हुए औदुम्बरी को उस अवट में स्थापित करते हैं । द्युतान नाम का जो वायु है वह प्राप को इसमें प्रतिष्ठित करे । ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही हमने बताया है कि यह ऊ रस परमेष्ठी की वस्तु है । परमेष्ठी का जो वायु है - उसी का नाम द्युतान मारुत है । सारा ब्रह्माण्ड - रोदसी, क्रन्दसी, संयती इन तीन लोकों में विभक्त है । पृथिवी से सूर्य्य तक रोदसी-. लोक है । सूर्य से परमेष्ठी तक क्रन्दसी लोक है । क्रन्दसी से संयती तक संयती लोक है । तीनों में ही भिन्न - भिन्न प्रकार का वायु रहता है । रोदसी के वायु का नाम रुद्रवायु है । इसे ही यमवायु भी कह १. ' जोता हुआ '!, २. ' वा ० सं ० ५।२७ ' ।, ३. ' वा ० सं ० ५।२७ ' । [ १६६
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मणं. हैं । यह सूर्य के ताप के कारण सर्वथा सूखा रहता है । इसी से प्रारण विनाश होता है अतएव इसे यम कहते हैं । परमेष्ठी का जो आपोमय वायु है उसे द्युतान मारुत कहते हैं । इसी को पानी के सम्बन्ध के कारण साम्बसदाशिव भी कहते हैं । जीव अधिष्ठाता यही साम्बसदाशिव है । रुद्र से प्रतिष्ठा उखड़ती है. एवं साम्ब सदाशिव - द्युतान मारुत से प्रतिष्ठा होती है । संयती के वायु का नाम ' सूत्रात्मा ' है । यह उन दोनों की प्रतिष्ठा है । इन तीनों में से जो द्युतानमारुत है वही प्रतिष्ठा का अधिष्ठाता है एवं उसी पर -मेष्ठि - लोक की वस्तु यह प्रौदुम्बरी है अतएव ' द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोतु ' यह कहा गया है । वह द्युतान-वायु हमारी रोदसी में भी व्याप्त रहता है । आकाश में जो प्राणप्रद वायु बहता रहता है वही द्युतानमारुत है | बस ध्वर्यु प्रतिष्ठाधिष्ठाता इसी द्युतानमारुत से इस प्रदम्बरी को प्रतिष्ठित करता है । इसी अभि प्राय से कहते हैं-“ यो वाश्रयं पवते एष द्युतानो मारुतः । तदेनां ( शाखा ) एतेन मिनोति " । फिर शेष मन्त्र बोलता है-" मित्रावरुणो ध्रुवेण धर्मणा ( मिनोति - इति शेषः ) " । ( वा ० सं ० ५।२७ ) मित्रावरुण श्रविचाली धर्म से तुम्हें प्रतिष्ठित करें । प्राणोदान का नाम ही मित्रावरुण है । वास्तव में आने वाले का नाम मित्र है और जाने वाला का नाम वरुण है । ऊपर जो आता है उसका नाम प्राण है. अतएव प्रागत्वात् हम इसे प्राण कहते हैं एवं यही जब बाहर निकलता है तो उदान कहलाता है । बाहर निकलने के कारण इसे वरुण कहते हैं अतएव ' प्राणोदानौ वै मित्रावरुण ' यह कहा जाता । जब तक श्वास - प्रश्वास चलते रहते हैं तभी तक शरीर प्रतिष्ठित रहता है | बस निदानेन श्रौदुम्बरी में प्राणोदान डालने के लिए ही ' मित्रा... ' इत्यादि कहा गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ---" प्राणदानौ वै मित्रावरुणौ । तदेनां प्राणोदानाभ्यां मिनोति " ॥१६ ॥
इसके ग्रनन्तर ' ब्रह्मवनित्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामि ' ( वा ० सं ० ५।२७ ) यह मन्त्र बोलते हुए उस खोदी हुई मिट्टी को इस गढ्ढे में डालकर उसे मजबूत करते हैं । ब्रह्मवनि शत्रवनि-रायस्पोषवनि जो आप ( श्रदुम्बरी ) हैं - उनको जमाता हूँ । हे श्रौदुम्बरी अर्थात् ऊ! भाप ब्रह्म क्षत्र-वि तीनों की शक्ति हैं । ऊ रस के बिना तीनों ही बेकार हैं । यजुर्मन्त्रों में बहुत - बहुत आाशी रहती है है । किसी से क्या माँगा जाता है - किसी से क्या माँगा जाता है । भिन्न - भिन्न आशी के लिए भिन्न - भिन्न यजु हैं । उन यजुनों में से जिससे ब्रह्म - क्षत्र - विट् तीनों फल मिलते हैं उसी यजुमंन्त्र से आशी माँगते हैं | ब्रह्म - क्षत्र और विट् के अलावा और बचता हो क्या है । इस औदुम्बरी कर्म का यही फल है - यज-: मान का आत्मा ब्रह्म - क्षत्र - विट् तीनों बलों से युक्त हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " बह्वी वै यजुःष्वाशीः । तद्ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्ते उभे वीर्य्यो । राय-स्पोषवनीति भूमा वै रायस्पोषः तद्भूमानमाशास्ते " ॥१७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदा ब्राह्मरंग इसके अनन्तर उस ऊँची मिट्टी को दाबकर चारों ओर से समान कर देता | जहाँ दुम्बरी गाड़ी गई है उसमें ठीक - ठोक कर मिट्टी भर कर उसे एक सार कर देता है । इस समय निम्नलिखित मन्त्र बोलना चाहिए-" ब्रह्मह, क्षत्र बृंह, आयुर्दृ है, प्रजां बृंह " । ( वा ० सं ० ५।१७ ) अर्थात् मेरे ब्रह्म - क्षत्र - प्रायु एवं प्रजा - इन सबको दृढ़ करो । इस कर्म का यही फल है । इससे यजमान वास्तव में चारों सम्पत्तियों से युक्त हो जाता है । " आशीरेवैषैतस्य कर्मणः । आशिषमेवैतदाशास्ते " । श्रवट के चारों ओर जो मिट्टी ऊँची हो गई है - उसे समभूमि बनाते हैं । जमीन के धरातल से उस ऊँचे हिस्से को मिलाते हैं-" समभूमि पर्यर्षणं करोति । ( भूमिसमं परितः सदृशं करोति ) ” । समधरातल करने की क्या आवश्यकता है - यह बतलाते हैं- भूमि के ऊपर जो भूमि रहती है वह का साधक बन जाती है । यदि नीचे की जमीन से ऊपर की अर्थात् श्रवट की जमीन ( मिट्टी ) ऊँची है तो इससे ग ( गढ्ढा ) हो जाता है । गर्त्त पितृदेवत्य है । हमारा यह कर्म देवदेवत्य है - प्रतएव पितृदेवत्य भाग को मिटाने के लिए अवश्य समधरातल कर देना चाहिए -" गर्तस्य वाउपरि भूमि । अथैवं देवत्रा । तथा हागर्तमिद् भवति । ( समभावेन अगर्तमिता भवति तथा च देव - देवत्या भवति तदेव युक्तम् ) " ॥१८ ॥
इस प्रकार प्रौदुम्बरी गाड कर जमीन को बराबर करके उस पर पानी छिड़कते हैं । मिट्टी को खोदने से जो परमाणु विशकलित हो गए हैं - वे इस पानी से जुड कर वापस जम जाते हैं । पानी से पृथिवी अपनी असली हालत में आ जाती है । अभि से भूमि के इस भाग को खोदते हुए ऋत्विक् लोग अक्रूरा शान्ता भूमि को क्रूरा अशान्ता बनाते हैं । उसके संश्लिष्ट स्वरूप को विश्लिष्ट करते हैं । यही क्रूरता है । बस पानी से उसी क्रूरता को विश्लेषण को हटाते हैं । पानी शान्ति स्वरूप है | बस पानी की शान्ति से उखड़ी हुई पृथिवी का पुनः संधान करते हैं । पानी छिडकने का यही कारण है— " प्रथा उपनिनयति । यत्र वाऽस्यै भूम्यै ( अस्याः भूम्याः ) खनन्तः
( दारयन्तः ) क्रूरीकुर्वन्ति पघ्नन्ति । शान्तिरापः, तद् अद्भिः शान्त्या शमयति ।
तदद्भिः सन्दधाति । तस्मादप उपनिनयति ” ॥१ ९ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण खोदने से एक तो क्रूरभाव होता है - पृथिवी की हिंसा होती है एवं उसका स्वरूप बिगड़ जाता है । पानी से इन दोनों का इलाज हो जाता है । पानी से क्रूरता - हिंसाभाव भी हट जाता है एवं इससे वस्तु का संधान भी हो जाता है ॥ १६ ॥
इसके अनन्तर अध्वर्यु शाखा का स्पर्श करके यह मन्त्र बुलवाता है— " ध्रुवाऽसिध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने प्रजया भूयात् पशुभिः ” । ( वा ० सं ० ५ | २८ ) हे शाखे! आप ध्रुवा हो - प्रविचला हो । आपकी कृपा से यह यजमान भी अपने घर में प्रजा और पशुओं के साथ अविचल हो । ऊ से ही अविचाली भाव उत्पन्न होता है । उत्साह - स्थिरता-दृढ़ता यह सारे धर्म्म ऊ रस से ही उत्पन्न होते हैं प्रतएव इनके लिए इस औदुम्बरी से ही प्रार्थना की जाती है । यजमान ने पशु और प्रजा की ही समृद्धि चाही है - इससे यह नहीं समझना चाहिए कि इसे और कुछ नहीं मिलेगा । श्रपितु यह जो कुछ चाहता है- जो कुछ कामना करता है - वे सारी कामनाएँ इसकी बदौलत पूरी हो जाती हैं । ऊ - बल सब कुछ दे सकता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" एवं यं कामं कामयते - सोऽस्मै कामः समृध्यते " ॥ २० ॥
इसके अनन्तर स्रवा से - जुहूपभृत में श्राज्य लेकर ' घृतेन द्यावापृथिवी पूर्येथामिति ' ( वा ० सं ० ५।२८ ) इस मन्त्र से विष्टप की ओर प्रदुति डालता है । हमने बतलाया था कि औदुम्बरी के अग्रभाग में दो शाखा रहती हैं । ये दोनों शाखाएँ जहाँ से निकलती हैं - उस स्थान का नाम विष्टप है । द्विशाखा स्थान को विशाख कहते हैं । इसी को वैदिक भाषा में ' विष्टप ' कहते हैं । जहाँ से शाखा निकलती है उस स्थान पर ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ये तीन प्रारण रहते हैं । तीनों में ब्रह्मा प्रतिष्ठा है - प्रलम्बन है । बिना ब्रह्मा के इन्द्र विष्णु की उत्पत्ति नहीं हो सकती है । अतएव ' ब्रह्मवास्य सर्वस्य प्रथमजम् ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' यह कहा जाता है । नई वस्तु की उत्पत्ति में पहले प्रतिष्ठा के जन्म की आवश्यकता है । सबसे पहले ब्रह्मा रहता है । पार्थिव रस को ब्रह्मा खींचा करता है एवं रस को इन्द्र खींचा करता है । विष्णु उसकी व्यवस्था किया करता है । ब्रह्मा मूल में रहते हैं - विष्णु मध्य में रहते हैं - इन्द्र अन्त में रहते हैं । इन्द्र को पौराणिक परिभाषा में शिव कहा जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं—
" मूलतो ब्रह्मरूपाया मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रतः शिवरूपाय अश्वत्थाय नमोनमः " ॥
इस ब्रह्म बिन्दु का स्थान ' विष्टप ' कहलाता है । बस इसी पर यह आहुति दी जाती है । हे द्यावापृथिवी! आप इस हूयमान घृत से पूर्ण हो जाइए । प्रौदुम्बरी शाखा के एक तरफ पृथिवी है - एक तरफ लोक है । बीच में ऊ रस है अतः ऊ रस को दोनों में शामिल करते हैं । हमारा निर्माण [ १६६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण द्यावापृथिवी से होता है । ऊ रस हमारे पास सीधा न ग्राकर द्यावापृथिवी के जरिए से श्राता है अतएव हम प्रार्थना करते हैं कि हे द्यावापृथिवी! पहले आप इन से भर जाइए एवं उससे आप हमारा पालन कीजिए | इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तदि द्यावापृथिवी s ऊर्जा रसेन भाजयति । अनयोरूर्जं रसं दधाति । ते रसवत्या उपजीवनीये इमाः प्रजा उपजीवन्ति ॥२१ ॥
• श्रदुम्बरी गाड़ दी गई - अब सदोमण्डप की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हैं । हविर्धान मण्डप पूर्वापर होता है एवं सदोमण्डप उत्तर - दक्षिण होता है । चूंकि इसके मध्य का बड़ा वंश ( बांस ) जिस पर कि टाटियां रखी जाती हैं - वह उत्तर दक्षिण होता है अतएव इस सदोशाला को ' उदीचीन वंशा ' शाला कहते हैं । इस उदीची वंश के मध्य में ' इन्द्रस्य छदिरसि - विश्वजनस्य छाया ' ( वा ० सं ० ५।२८ ) यह मन्त्र बोलता हुआ चटाई लगा देता है । जिस प्रकार हविर्धान मण्डप वैष्णव है तथैव सदो - मण्डप ऐन्द्र है अतएव ' इन्द्रस्य छदिरसिं ' कहा है । इस सदोमण्डप में नाना गोत्र वाले ब्राह्मण बैठते हैं अतएव ' विश्वजनस्य छाया ' यह कहा गया है । इन्द्र सदोमण्डप के अधिष्ठाता हैं प्रत: छदि इन्द्र की ही है, यह कहा गया है । ऋत्विक् लोग तो उस छदि के आश्रित मात्र रहते हैं अतएव इनकी छाया मात्र बतलाई गई है । इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हु उस शाला के मध्य में एक छदि रख देता है । दो छदि उस मध्य की से पूर्व - पश्चिम रख देता है । इस प्रकार तीन छदियाँ मध्य भाग में हो जाती हैं एवं तीन ही छदियाँ इसी क्रम से उत्तर में लगा देता है तथा तीन ही छदियाँ दक्षिण में लगा देता है । इस प्रकार सदोमण्डप के ऊपर उत्तर - मध्य-दक्षिण क्रम से छदियाँ ( ६ चटाय ) हो जाती हैं । पार्थिव यज्ञ त्रिवृत् है । पृथिवी का जो अपना असली स्वरूप है - वह त्रिवृत् तक अर्थात् नवें प्रहरण तक रहता है एवं सदोमण्डप इस त्रिवृत् से ही प्रारम्भ होकर पश्चदश तक रहता है । इसकी पकड़ त्रिवृत् पार्थिव यज्ञ से है । बस इस पार्थिव त्रिवृत् यज्ञ सम्पत्ति के लिए ही & चाईयाँ लगाई जाती हैं । ' नौ ' त्रिवृत् हो जाता है— " थ छदिरधिनिदधाति ( मध्ये ) इन्द्रस्य छदिरसीति । ऐन्द्रं हि सदः । विश्वजनस्य छाया - इति । विश्वगोत्रा ह्यस्मिन् ब्राह्मणाऽश्रासते । तदुभयतः ( मध्यमस्य छदिषः उभयतः दक्षिणोत्तरयोः ) छदिषी उपदधाति । उत्तरत-स्त्रीणि परस्त्रीरिण ( दक्षिणतोस्त्रीरिण ) तानि नव भवन्ति । त्रिवृद्वै यज्ञः ।
नव वै त्रिवृत् । तस्मान्नव भवन्ति " ॥ २२ ।
इस महावेदि में सदोमण्डप उदीचीन वंशा होता है जैसा कि बतला आए हैं एवं हविर्धानमण्डप प्राचीनवंशा होता है । नम् " । " तत् ( तत्र महावेद्यां ) उदीचीनवंशं सदो भवति प्राचीनवंशं हविर्द्धा-[ १७० ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणे दो - ब्राह्मण सदोमण्डपक्यों उदीचीन वंश होता है एवं हविर्मण्डप क्यों प्राचीन वंश होता है इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । हविर्धानमण्डप देवताओं की प्रातिस्विक वस्तु है । इसमें सिवाय देवताओं के और कोई नहीं रह सकता है । प्रकृति यज्ञ में हविर्धानमण्डप १५ वें अहर्गण से ऊपर है । १५ से ऊपर केवल दिव्यप्राण ही रहता है एवं १५ से नीचे सदोमण्डप में पार्थिव श्रोर दिव्य दोनों प्राण रहते हैं । एवमेव अध्यात्म में भी मस्तक में केवल अग्नि वायु - श्रादित्य- दिक्- भास्वर सोम का ही राज्य है । सदो-नाम के उदर में पार्थिव प्राण और दिव्य प्राण दोनों रहते हैं । हविर्धान मण्डप खास देवताओं का निवास स्थान है । अतएव ऋत्विक्- लोग न यहाँ भोजन करते हैं - न सोते हैं- न विश्राम करते हैं । इसमें कर्म करके वापस अपने सदोमण्डप में आ जाते हैं । सच है- राजा का जो खास प्रासाद है उसमें हम बड़ी सावधानी के साथ अपनी ड्यूटी खत्म करके वापस लौट आते हैं । वहाँ पर न खा सकते - न सो सकते - न हंसी - मजाक कर सकते । जरा भी बेअदबी की कि - सजावार हुए । बस ठीक यही हालत इस हविर्धा - मण्डप की है । यह देवप्रसाद है । इसमें ऋत्विक् काम पूरा करके फौरन लौट आते हैं । यहाँ न खा सकता है न सो सकता है क्योंकि ऋत्विक् मनुष्य है । मनुष्य को देवतानों के घर में यथेच्छाचार करने की बिल्कुल निषेद है अतएव जो ऋत्विक् देव प्रतिष्ठा का उल्लंघन करके हविर्धान में यदि भोजन कर लेगा या सो जाएगा तो उसी समय इसका श्रात्मा गिर जाएगा एवं जिस नियम परिपालन महिमा से यह अपना ऊँचा सिर किए चला करता था वह मस्तक नीचा हो जाएगा अर्थात् प्रतिष्ठा नष्ट हो जाएगी । हविर्धान में फूंक - फूंक कर पैर रखने की जरूरत है । चूँकि हविर्धान देवताओं की प्रातिविक वस्तु है - देवताओं की अपनी दिक् पूर्व है अतएव हविर्धानमण्डप प्राचीनवंशा बनाया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" एत द्वैदेवानां निष्केवल्यं ( प्रातिस्त्रिकम् ) यद् हविर्धानम् । तस्मात् तत्र नाश्नन्ति ( पुरोडाशादिकम् ) न भक्षयन्ति ( सोमादिकम् ) निष्केवल्यं ह्येतद्देवा-नाम् । स यो ह तत्राश्नीयाद्वा, भक्षयेद्वा मूर्द्धा हास्य विपतेत् " । परन्तु जो सदोमण्डप और प्राग्नीघ्र मण्डप होता है वे मिश्र है अर्थात् उसमें देवता और मनुष्य दोनों रहते हैं । हविर्द्धान खास है । सदोमण्डप और आग्नीध्र ग्रामखास है । यह देवता और असुर दोनों का मिश्रण है अतएव ऋत्विक् लोग यहीं खाते हैं -यहीं सोते हैं क्योंकि यह मिश्र है अर्थात् यह देवताओं की तरह मनुष्यों की भी वस्तु है । जिस प्रकार देवताओं की अपनी दिशा सूर्य्य के कारण पूर्व है तथैव मनुष्यों की अपनी दिशा उत्तर है अतएव सदोमण्डप उदीचीनवंश बनाया जाता है— " अथैते मिश्र यदाग्नीध्रं च सदश्च । तस्मात्तयोरश्नन्ति । तस्माद् भक्ष-यन्ति । मि ह्येते । उदीची व मनुष्याणां दिक् । तस्मादुदीचीनवंशं सदो भवति " ॥२३ ॥
सदोमण्डप के ऊपर टाटियाँ लग चुकीं अब चारों ओर टाट की कनात लगाते हैं । देवता परोक्ष प्रिय हैं अतएव पर्दा लगाया जाता है ( देखें - देवयजनब्राह्मण ) परिश्रयण करने का मन्त्र यह है— [ १७१ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मणे " परित्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमतु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः " । ( वा ० सं ० ५।२६ ) " हे गिर्वणः! त्वा ( त्वां ) इमा: ( अस्माभिः प्रयुज्यमानाः ) गिरः ( स्तुतिरूपाः वाचः ) विश्वतः ( सर्वतः ) परिभवन्तु । किञ्च वृद्धायुं ( श्रमुमि-न्द्रम् ) अनुवृद्धयः ( समृद्धिमत्यः ) भवन्तु । एवं जुष्टयः ( प्रीणयन्त्यः वाचः ) जुष्टाः भवन्तु । गिर्वण ( वाणी द्वारा स्तुत्य इन्द्र ) श्रापको हमारे से निकली हुई स्तुतिरूपा वाणी चारों श्रोर से घेर ले एवं दीर्घायु जो यह इन्द्र है उसकी और उसके सम्बन्ध से हमारी वाक् समृद्धिशाली यह वाक् इन्द्र को प्यारी लगे अथवा दूसरा अर्थ यों समझना चाहिए- बने तथा हे गिर्वा अर्थात् इन्द्र अर्थात् सम्राट! यह प्रजा प्रापको चारों ओर से घेर ले । सदोमण्डप इन्द्र स्वरूप है । इसके बाहर जो कनात लगाई जाती है - वह प्रजा स्वरूप है । राजा की प्रतिष्ठा प्रजा से है । प्रजा का राजा कहलाता है - जिसके प्रजा नहीं है वह राजा स्वयं प्रजा है तो परिश्रयण करना प्रजा को राजा के अनुगत करना है । इस प्रकार यह क्षत्र अर्थात् इन्द्र चारों ओर से परिश्रयण रूप प्रजा से वेष्टित हो जाता है । मध्य में राजा है - चारों ओर प्रजा वेष्टित है एवं इन्द्र ही आयु का प्रदाताहै अत-एव ' वृद्धायुम् ' कहा है । अपिच यह इन्द्र वाक् स्वरूप । यह वाक् अमृत - मर्त्य भेदेन दो प्रकार की होती है । अमृत वाक् इन्द्र कहलाती है - मर्त्या वाक् इन्द्र- पत्नी कहलाती है । यह मर्त्या वाक् इस इन्द्र के चारों श्रोर रहती है प्रतएव ' परित्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वत: ' ( वा ० सं ० ५।२६ ) यह कहा गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ इन्द्रो वै गिर्वा, विशो गिरः । विशैवैतत्क्षत्रं परिबृंहति तदिदं क्षत्र-मुभयतो विशा परिवृढम् ” ॥२४ ॥
इसके बाद सूतली पुए हुए सूए से ' इन्द्रस्य स्यूरसि कहता हुआ चारों ओर लगी हुई टाट की कनात को सी देता है-" लस्पूजन्या ( सूआ ) स्पन्द्यया ( सूतली ) प्रसीव्यति । इन्द्रस्य स्यूर-सीति " । सीने के बाद उसके अन्त में ' इन्द्रस्य ध्रुवोऽसि ' कह कर गाँठ लगा देता है । वह सींवन खुल न जाए इसलिए गाँठ लगा दी जाती है । " अथ ग्रन्थि करोति - इन्द्रस्य ध्रुवोऽसीति - नेद्व्यवपद्याताऽइति " । [ १७२ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण जब सारा कर्म्म समाप्त हो जाता है तो उसे खोल देता है । खोल देने से यजमान और अध्वर्यु को गठियावात नहीं सताता है । यदि वह ग्रन्थि न खोलेगा तो उसके गठिया रोग हो जाएगा-" प्रकृते कर्म्मन् ( कर्म्मरिण समाप्ते ) विष्यति । तथो हाध्वर्यु वा यज-मान वा ग्राहो न विन्दति " । 1. इस प्रकार जब सदोमण्डप सम्यक्तया तैय्यार हो जाता है - सम्पन्न हो जाता है तो अध्वर्यु ' ऐन्द्रमसि ' कह कर उसका स्पर्श करता है । चूंकि वास्तव में यह ऐन्द्र है अतएव ' ऐन्द्रं सदः ' यह कहा
जाता है -----" तन्निष्ठितमभिमृशति - ऐन्द्रमसीति । ऐन्द्रं हि सदः " ॥ २५ ॥
सोमण्डप में आठ धिष्ण्याग्नियाँ और होती हैं । ये आठों प्रकृतियज्ञ की अन्तरिक्ष्य अग्नियों की नकल पर बनाई जाती हैं । प्राठ में छ तो सदोमण्डप के बीच में होती हैं और श्राग्नीध्रीय हविर्धान शकट के पश्चिम भाग के ठीक उत्तर में एवं मार्जालीय दक्षिण में होती है । बस इसी का उप-पादन करते हैं - सदोमण्डप निर्मारणानन्तर हविर्धान- मण्डप में रखे हुए जो दो हविर्धान नाम के शकट हैं - उनके पश्चिम भाग को अच्छी तरह नजर पर चढ़ाके उससे ठीक उत्तर में प्राग्नीघ्र वेदि बनाता है-" अथ हविर्द्धानयोः । जघनार्द्ध समन्वीक्ष्य ( सम्यक् आलोच्य ) उत्तरेणा-नमिनोति । ( हविर्द्धानशकटयोः पश्चाद् भागस्य साम्येन य उत्तरो देशः, तत्राग्नीध्रीयं मण्डपं कुर्यात् - इति भावः ) " । इसमें तीन मत हैं - एक मत तो यह है कि उस आग्नीध्रीय वेदि का आधा हिस्सा - महावेदि के भीतर होना चाहिए और ठीक आधा हिस्सा बाहर होना चाहिए -“ तस्यार्दमन्तर्वेदि स्यात्, अर्द्ध बहिर्वेदि ( स्यात् ) " । दूसरा मत यह है कि आधे से भी ज्यादा हिस्सा अर्थात् वेदि का पौना हिस्सा वेदि के भीतर रहना चाहिए और चौथाया बाहर रहना चाहिए-" थोऽअपि भूयोऽर्धादन्तर्वेदि स्यात्, कनीयो बहिर्वेदि ( स्यात् ) " । सारी वेदि महावेदि के भीतर ही होनी चाहिए । बाहर जरा भी हिस्सा न रहे । " थोऽपि सर्वमेवान्तर्वेदि स्यात् " । तीनों ही पक्षों में काम चार है - जैसी इच्छा हो बना सकते हो । जब वह बन कर तैय्यार हो जाती है तो अध्वर्यु ' ' वैश्वदेवमसि ' ( वा ० सं ० ५।३० ) यह कहता हुआ उसका स्पर्श करता है -[ १७३ ।
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण “ तन्निष्ठितमभिमृशति - वैश्वदेवमसीति " । विनमण्डप वैष्णव है - सदोमण्डप ऐन्द्र है परन्तु यह प्राग्नीध्रीय वैश्वदेव कैसे हैं- जबकि इसमें ' खाली अग्नि ही रहता है । इसका उत्तर देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- दो कारण दो उपपत्तियाँ ऐसी हैं जिनसे हमें इस आग्नीध्र - मण्डप को वैश्वदेव कहना पड़ता है— " द्वयेनैतद्वैश्वदेवम् " । इस स्थान पर - इसके पहले दिन सोमांशु धोने के लिए ' वसतीवरी ' नाम का घड़ा रखा जाता है । सोम देवताओं का अन्न है अतएव जहाँ वह वसतीवरी के पानी से धोया जाता है - उस पानी में प्राण-देवता घुस पड़ते हैं । सारे देवताओं का उस पानी से सम्बन्ध | जाता है । उसी स्थान पर यह श्राग्नीध्र-मण्डप बनाया जाता है अतएव उस प्रारण देवता के सम्बन्ध से हम इसे वैश्वदेव कह सकते हैं-" दस्मिन् पूर्वेद्युविश्वेदेवा वसतीवरीषूपवसन्ति तेन वैश्वदेवम् " ॥२६ ॥
दूसरा कारण निम्नलिखित है । देवताओं ने जब यज्ञ वितान किया तो वे असुरों के प्राक्रमण से डरने लगे । उनका डरना फिजूल ही नहीं गया - सदोमण्डप में स्थित देवताओं पर दक्षिण दिशा से श्राकर असुरों ने एकदम उन पर हमला कर दिया । चूंकि देवता बेखबर थे प्रतएव उनके सदोमण्डप पर असुरों ने कब्जा कर लिया एवं सदोमण्डप के भीतर रहने वाले जो छत्रों प्रज्वलित धिष्ण्याग्नि थे उनको सदो-मण्डप से बाहर उखाड़ फेंका -" देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गाद्विभयाञ्चक्रुः । तान् दक्षिणतोऽसुररक्षसान्यासेजुः । तान्त्सदसो जिग्यु: ( तान् सदोनिविष्टान् देवान् सदसः सकाशात् जितवन्तः- ततो निष्कासितवन्तश्चेति ) तेषामेतान् धिष्ण्यात् उद्वापयाञ्चक्रुः- य एते अन्तः सदसम् " ॥२७ ॥
याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस प्रसुराक्रमण से पहले जिस प्रकार ग्राहवनीय, गार्हपत्य एवं आग्नी-श्री तीनों प्रज्वलित रहते हैं तथैव प्रज्वलित रहते थे । बस जब से ग्रसुरों ने इन्हें बुझा दिया तभी से इनका आहवनीयादिवत् अनवरत प्रज्वलित रहना बन्द हो गया—-" सर्वे हम वा एते पुरा ज्वलन्ति । यथाऽयमाहवनीयो, यथा गार्ह पत्यो - यथाऽग्नीध्रीयः । तद्यतनानुदवाषयंस्ततएवैतन्न ज्वलन्ति " । ara में एक विशेष बात बतलाकर प्रकृत का अनुसरण करते हैं । सदोमण्डप से निष्कासित धिष्ण्या-ग्नियाँ प्राग्नीध्र - मण्डप के पास पहुँच जाने पर भी असुरों से संरुद्ध हो गए । असुरों ने वहाँ पर भी उनको [ १७४ ]