Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 191–200
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण ' जाघेरा परन्तु इतनी देर में देवता ' संभल ' चुके थे प्रतएव प्राग्नीध्र मण्डप के पास पहुँचते - पहुँचते उन्होंने असुरों को जीत लिया एवं उन्हें मार भगाया-" तान् आग्नीध्रमभिसंरुरुधुः ( सदसो निष्कासिता आग्नीध्रप्रविष्टाः ते देवाः तत्राप्यसुरैः संरुद्धाः इति भावः ) तानप्यर्द्धमाग्नीध्रस्य जिग्युः ( श्राग्नीध्र-स्याग्नेः समीपं गत्वा तान् सुरान् जिग्युः ) ” । बस उस आग्नीध्र के सामर्थ्य से ही देवता, असुरों की मार से बचे । चूंकि सारे देवता इसी के
श्राश्रय से बचे अतएव यह प्राग्नीध्र - मण्डप ' वैश्वदेव ' कहलाया ।
" ततो विश्वेदेवा अमृतत्वमपाजयन् तस्माद्वैश्वदेवम् ” ॥२८ ॥
इस कथा का सम्बन्ध भुवन स्वर्गनिवासी देवताओं से समझना चाहिए ॥ २८ ॥
जब असुर भाग गए - उखाड़े हुए जो छह धिष्ण्याग्नि थे - देवताओं ने उन्हें फिर प्रज्वलित किया । जिस प्रकार से वे अग्नियाँ आहुति के आधार बन जाएँ - इस प्रकार से उन्हें प्रज्वलित किया-" तान्देवाः प्रतिसमैन्धत । यथा प्रत्यवस्येत् ( यथा प्राहुत्याधारो भवेत् तथा समन्धत ) " । तात्पर्य यही है कि देवताओं ने ग्राहवनीय की तरह उनका सदा प्रज्वलित रहना बन्द कर दिया । जब - जब ग्राहुति देने की जरूरत होती थी तब - तब ही उन्हें प्रज्वलित करते थे । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तस्मादेनान्त्सवने सवन एव प्रतिसमिन्धते ( यथा प्रत्यवस्येत् ) " । देवताओं के जय का कारण आग्नीध्र अग्नियाँ श्रतएव जो सब में बलिष्ठ हो - समृद्ध हो वही इस सोमयाग में आग्नीध्र का कर्म्म करे । जो संसार में प्रसिद्ध है - जिसका यश त्रिभुवन में फैल रहा है - जो वेद का वक्ता है - वही समृद्ध कहलाने का अधिकारी है - ऐसे को ही ' आग्नीध्र ' बनाना चाहिए-" तस्माद्यः समृद्ध: सनाग्नीध्रं ( आग्नीध्रस्य कर्म ) कुर्य्यात् । यो वै ज्ञातोऽनूचानः स समृद्धः " । आग्नीध्र सबसे श्रेष्ठ है - आग्नीध्र का दर्जा सबसे ऊँचा है अतएव सबसे पहले यह दक्षिणा आग्नीध्र को ही दी जाती है क्योंकि इसी के बल से तो देवताओं ने असुरों को हराया था । [ १७५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सदो - ब्राह्मण " तस्मादग्नीधे प्रथमाय दक्षिणां नयन्ति - अतो हि विश्वेदेवा अमृत-त्वमपाजयन् " ॥ २ ९ ॥ अतएव ऋत्विजों में से यदि कोई ऋत्विक् बीमार हो जाए तो उसी समय ' एनम् प्राग्नीध्र ' नयत ' यह कह दे । ऐसा कहने से उसकी सारी बीमारी दूर हो जाएगी । सारे प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि इसी आग्नीध्र की बदौलत सारे देवता जीते थे श्रतएव हम इसे अवश्य ही वैश्वदेव कह सकते हैं । बस इसीलिए आग्नीध्र का ' वैश्वदेवमसि ' कह कर स्पर्श किया जाता है ॥ २६ ॥
॥ इति सदोब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति षष्ठाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् समाप्तम् ॥ [ १७६ ]
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षष्ठाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' धिष्ण्या ब्राह्मणम् ' [ मूल ] विजामानो हैवास्य धिष्ण्याः । इमे समङ्का ये वे समङ्कास्ते विजामान ए ass हैवास्यैतात्मानः ॥१ ॥
दिवि वै सोम श्रासीत् । अथेह देवास्ते देवा प्रकामयन्ता नः सोमो गछेत्तेनागतेन यजे महीति तएते मायेऽसृजन्त सुपरप च कहूं च वागेव सुपर्णीयं कस्ताभ्यां समदं चक्रुः ॥२ ॥
ते हर्त्तीयमाने ऽऊचतुः । यतरा नौ दवीयः परापश्यादात्मानं नौ सा जयादिति तथेति सा ह कद्रूरुवाच परेक्षस्वेति ॥३ ॥
साह सुपर्ण्यवाच । अस्य सलिलस्य पारेऽश्वः श्वेत स्थारणौ सेवते तमहं पश्यामीति तमेव त्वं पश्यसीति तं हीत्यथ ह कद्रूरुवाच तस्य वालो न्यषञ्जि तममुं वातो धूनोति तमहं पश्यामीति ॥४ ॥
सा यत्सुपर्ण्यवाच । श्रस्य सलिलस्य पारइति वेदिवै सलिलं वेदिमेव सा तदुवाचाश्वः श्वेत स्थाणौ सेवतऽइत्यग्निर्वाऽश्वः श्वेतो यूप स्थाणुरथ रशना यत्करुवाच तस्य वालो न्यषञ्जि तममुं वातो धूनोति तमहं पश्यामीति हैव सा ॥५ ॥
साह सुपर्ण्यवाच । एहीदं पताव वेदितुं यतरा नौ जयतीति सा ह कद्रू-vara त्वमेव पत त्वं वै न प्राख्यास्यसि यतरा नौ जयतीति ॥६ ॥
साह सुपर्णी पपात । तद्ध तथैवास यथा कद्ररुवाच तामागतामभ्युवाद त्वमजैषी ३ रहा ३ मिति त्वमिति होवाचैतद्धयाख्यानं सौपर्णीकाद्रवमिति ॥ ७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मरण [ १७८ ] धिष्ण्या ब्राह्मण ॥१३ ॥
॥१६ ॥
साह करुवाच । आत्मानं वै त्वाऽजैषं दिव्यसौ सोमस्तं देवेभ्य आहर तेन देवेभ्य श्रात्मानं निष्कीरणीष्वेति तथेति सा छन्दांसि ससृजे सा गायत्री दिवः सोममाहरत् || ८ || हिरण्मय्योर्ह कुश्योरन्तरवहित आस । ते ह स्म क्षुरपवी निमेषं निमेष-मभिसन्धत्त दीक्षातपसौ हैव तेऽप्रासतुस्तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुपुरिमे धिष्ण्याइमा होत्राः ॥६ ॥
तयोरन्यतरां कुशीमाचिच्छेद । तां देवेभ्यः प्रददौ सा दीक्षा तया देवा दीक्षन्त ॥ १० ॥
द्वितीयां कुशीमा चिच्छेद । तां देवेभ्यः प्रददौ तत्तपस्तया देवास्तप उपायन्तुपसदस्तपो ह्युपसदः ॥ ११ ॥
खदिरेण ह सोममाचखाद । तस्मात् खदिरो यदेनेनाखिदत्तस्मात्खादिरो यूपो भवति खादिर: स्पयोऽच्छावाकस्य हैनं गोपनायां जहार सोच्छावाको हीयत ॥१२ ॥
तमिन्द्राग्नीऽनुमतनुताम् । प्रजानां प्रजात्यै तस्मादेन्द्राग्नोऽच्छावाकः तस्माद्दीक्षिता राजानं गोपायन्ति । नेन्नोऽपहरानिति तस्मात्तत्र सुगुप्तं चिकीर्षेद्यस्य ह गोपनायामपहरन्ति हीयते ह ॥ १४ ॥
तस्माद्ब्रह्मचारिण श्राचार्य गोपायन्ति । गृहान्पशून्नोऽपहरानिति तस्मात्तत्र सुगुप्तं चिकीर्षेद्यस्य ह गोपनायामपहरन्ति होयते ह तेनैतेन सुपर्णी देवेभ्य श्रात्मानं निरक्रीणीत तस्मादाहुः पुण्यलोक ईजान इति ॥ १५ ॥
ऋणं ह वै पुरुषो जायमान एव । मृत्योरात्मना जायते स यद्यजते यथैव तत्सुपर्णी देवेभ्य आत्मानं निरक्रीणीतैवमेवैष एतन्मृत्योरात्मानं निष्क्रीणीते
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) 1 i F 1 धिष्ण्या ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ १७ ] तेन देवा अयजन्त । तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा श्रन्वाजग्मुस्तेऽन्वागत्यानु-वन्ननु नो यज्ञप्राभजत मा नो यज्ञादन्तर्गातास्त्वेव नोऽपि यज्ञे भाग इति ॥ १७ ॥
ते होचुः । किं नस्ततः स्यादिति यथैवास्यामुत्र गोप्तारोऽभूमैवमेवास्या -पीह गोप्तारो भविष्याम इति ॥ १८ ॥
तथेति देवा ब्रुवन् । सोमकयरणा व इति तानेभ्य एतत्सोमक्रयणाननु-दिशत्यथैनानब्रुवंस्तृतीयसवने वो घृत्याहुतिः प्राप्स्यति न सौम्याऽपहृतो हि युष्म-सोमपीथस्तेन सोमाहुति नाथेति सैनानेषा तृतीयसवनऽएव घृत्याहुतिः प्राप्नोति न सौम्या यच्छालाकै धिष्ण्यान्व्याघारयति ॥१९ ॥
श्रथ यदग्नौ होष्यन्ति । तद्वोऽविष्यतीति स यदग्नौ जुह्वति तदेनानवत्यथ यद्वः सोमं बिभ्रत उपर्युपरि चरिष्यन्ति तद्वोऽविष्यतीति स यदेनान्त्सोमं विभ्रत उपर्युपरि चरन्ति तदेनानवति तस्मादध्वर्युः समया धिष्ण्यान्नातीयादध्वर्युह सोमं बिर्भात तमेते व्यात्तेन प्रत्यासते स एतेषां व्यात्तमापद्येत तमग्निर्वाभिदो वा s यं देवः पशूनामीष्टे स वा हैनमभिमन्येत तस्माद्यद्यध्वर्योः शालायामर्थः स्यादुत्तरेणैवाग्नीध्रीयं सञ्चरेत् ॥२० ॥
ते वा । सोमस्यैव गुप्त्यै न्युप्यन्तऽग्राहवनीयः पुरस्तान्मार्जालीयो दक्षिणताग्नीध्रीय उत्तरतोऽथ ये सदसि ते पश्चात् ॥ २१ ॥
तेषां वाऽअर्थानुपकिरन्ति । अर्धाननुदिशस्येतऽउ हैवैतद्दधिरेऽर्धान्न उपकिरन्त्वर्धाननुदिशन्तु तथा यस्माल्लोकादागताः स्मो दिवस्तथा तं लोकं प्रति-प्रज्ञास्यामस्तथा न जिह्मा एष्याम इति ॥२२ ॥
सयानुपकिरन्ति । तेनास्मिलोके प्रत्यक्षं भवन्त्यथ याननुदिशन्ति तेना-मुष्मिलोके प्रत्यक्षं भवन्ति || २३ || ते वै द्विनामानो भवन्ति । एत s उ हैवैतद्दधिरे न वाडएभिर्नामभिररा-त्स्म येषां नः सोममपाहार्षुर्हन्त द्वितीयानि नामानि करवामहाऽइति ते द्वितीयानि
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण नामान्यकुर्वत तैरराध्नुवन्यानपहृत सोमपीथान्त्सतोऽय यज्ञ आभजंस्तस्मादद्विना-मानस्तस्माद्ब्राह्मणोऽनृध्यमाने द्वितीयं नाम कुर्वीत राध्नोति हैव य एवं विद्वान् द्वितीयं नाम कुरुते ॥२४ ॥
स यदग्नौ जुहोति । तद्देवेषु जुहोति तस्माद्देवाः सन्त्यथ यत्सदसि भक्षयन्ति तन्मनुष्येषु जुहोति तस्मान्मनुष्याः सन्त्यथ यद्धविर्धानयोर्नाराशंसाः सीदन्ति तत्पितृषु जुहोति तस्मात्पितरः सन्ति ॥ २५ ॥
या वै प्रजा यज्ञेऽनन्वाभक्ताः । पराभूता वै ता एवमेवैतद्या इमाः प्रजा अपराभूतास्ता यज्ञ आभजति मनुष्याननु पशवो देवाननु वयस्योषधयो वनस्प-तयो यदिदं किञ्चैव तत्सर्वं यज्ञप्राभक्तं ते ह स्मैतउभये देवमनुष्याः पितरः सम्पिबन्ते सैषा सम्पाते ह स्म दृश्यमाना एव पुरा सम्पिबन्तऽउतैतर्ह्यदृश्यमानाः ॥२६ ॥
[ अनुवाद ] सदोमण्डप के मध्य में ६ धिष्ण्याग्नियों की स्थापना हो चुकी है । इस ब्राह्मण में धिष्ण्याग्नियों का स्वरूप तथा सदोमण्डप में उनकी स्थापना आदि का विवेचन किया जा रहा है । इसके लिए एक वैज्ञानिक प्राख्यान का निरूपण किया जा रहा है-धिष्ण्याग्नियाँ सोम के विमाता से उत्पन्न भ्राता हैं । ये धिष्ण्याग्नियाँ सोम के समान चिह्न बाली हैं । दोनों का स्वरूप अर्थात् आकृति एक है । धिष्ण्यों का स्वरूप सर्वथा सोम के समान हैं अत: इन धिष्ण्याग्नियों को सोम का विजामा अर्थात् विमाता से उत्पन्न भ्राता बतलाया है । ये धिष्ण्याग्नियाँ सोम की आत्मा हैं । सोम की सत्ता इन्हीं पर निर्भर है || १ || सोमयाग में, सदोमण्डप में धिष्ण्याग्नियों की स्थापना की एक उपपत्ति बतलायी जा चुकी है । इसकी दूसरी उपपत्ति का प्रारम्भ द्वितीय कण्डिका से प्रारम्भ किया जा रहा है । सृष्टि के प्रारम्भ में पार्थिव देवताओं की स्थिति भूलोक में तथा सोम की स्थिति तृतीय लोक द्युलोक अर्थात् परमेष्ठी - लोक में थी । देवताओं ने विचार किया कि तृतीय लोकस्थित पारमेष्ठ्य सोम हमें प्राप्त हो जाए तो उससे हम सोमयाग करें । यहाँ देव-ताओं से आग्नेय पार्थिव देवताओं का ग्रहरण है न कि सौर देवताओं का । इसीलिए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- ' अह देवास्ते देवा श्रकामयन्त ' इति । उन देवताओं ने सोम लाने के लिए सुपर्णी और कद्रू नाम की दो माया उत्पन्न की । पार्थिव प्राग्नये देवता २१ वें अहर्गण तक वितत हैं तथा सोम सूर्य से भी ऊपर परमेष्ठिलोक में स्थित है । वाक् द्वारा यह पार; मेष्ठ सोम पार्थिव श्राग्नये देवतानों में प्राहुत होता है । उस सोम को लाने के लिए देव -[ १८० ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) कलह करवाया || २ || १. २. धिष्ण्या ब्राह्मणं शतपथ ब्राह्मणं [ १८१ ] तानों ने उपर्युक्त सुपर्णी और कद्रू नामक दो मायात्रों की सृष्टि की । इनमें सुपर्णी वाक् है तथा यह पृथिवी कद्रू है । पृथिवी रूप कद्रू सर्पों की माता कही जाती है । सर्पण करने वाला प्राण ही सर्प है । पृथिवी के चारों तरफ पार्थिव कृष्ण प्रारण व्याप्त है । पृथिवी क्रान्तिवृत्त पर सूर्य की परिक्रमा करती है । सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथिवी से सर्पण करता हुआ कृष्णप्राण निकलता है । इसी को सर्प कहा जाता है । इसी दृष्टि से सर्पों को कद्रू का पुत्र अर्थात् कद्र को सर्पों की माता कहा गया है । इन दोनों सुपर्णी ' और कद्रू में देवताओं ने उस कलह का निरूपण इस कण्डिका में किया जा रहा है- परस्पर कलह करती हुई सुपर्णी और कद्रू ने कहा कि हम में से जो सबसे दूर की वस्तु देख लेगी उसकी विजय होगी और पराजित होने वाली उसकी दासी बन जाएगी । दोनों ने इस बात को स्वीकार कर लिया । तब कद्रू ने कहा कि दूर आकाश में दृष्टि डालो ॥ ३ ॥
सुपर्णीने दूर आकाश में देख कर कहा कि इस सलिल के उस पार स्थाणु ( चट्टान ) पर एक श्वेत घोड़ा खड़ा हुआ है उसको मैं देख रही हूँ । संभवतः उसी को तुम देख रही हो । कद्रू ने कहा- मैं तो उससे अधिक देख रही हूँ कि उस घोड़े की पीठ पर काले बाल चिपके हुए हैं और वे वायु इधर - उधर हिल रहे हैं ॥४ ॥
ऊपर की कण्डिका की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' अस्य सलिलस्य पारे ' में सलिल का अर्थ वेदि है और वेदि पृथिवी का नाम है । यह वेदिरूप पृथिवी २१ वें अहर्गण तक वितत रहती है । उसमें जो सफेद घोड़ा बँधा हुआ है, वह अग्नि है । २१ वें अहर्गण पर विद्यमान जो सूर्य है, वही स्थागु है । उस अश्व के जो बाल चिपके हुए हैं और हवा से हिल रहे हैं, इन्हें रशना समझो । पृथिवी पिण्ड से निकलने वाली सूर्यलोक से ऊपर ३३ वें अहर्गण तक व्याप्त रहने वाली वाक् सुपतनशील होने से सुपर्णी शब्द से व्यवहृत हुई है । यद्यपि यह वाक् इस समय पृथिवी की वस्तु बनी हुई है तथापि वाक् वस्तुतः सूर्य की वस्तु है । प्रारणः आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद इन पाँचों भूतों में वाक् का सम्बन्ध सूर्य से ही है । सूर्य से ही प्रवृक्त होकर वह पृथिवी की वस्तु बन जाती है । क्रान्तिवृत्त पर बृहती स्थित सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथिवी सूर्य- रश्मियों के आकर्षण से प्रति बिन्दु वक्र गति होती जाती है, अतः उसका परिभ्रमरणवृत्त गोलाकार है । सूर्याकर्षण से वह प्रति बिन्दु कुटिल गति वाली है । अतः ' कुत्सितं वक्रं द्रवति गच्छति ' इस व्युत्पत्ति से उसे कद्र कहा जाता है । सुपर्णी वाक् है, कद्रू पृथिवी है । उन्हें वाक् व पृथिवी शब्द से न कह कर सुपर्णी व कद्रू इस मिथ्यनाम से कहा गया है । यही इन दोनों का मायापन है ।
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण तात्पर्य यह है कि सूर्य भी आग्नेय है, अग्निपिण्ड है । सूर्य से रश्मियाँ निकल कर पृथिवी को अपने उदर में लेती हुई बहुत दूर तक फैलती हैं । इसीलिए इसका साम बृहत् साम कहलाता है । इन सूर्यरश्मियों का समुच्चय ही सोलर सिस्टम ( सौरमण्डल ) है । इस प्रकार ' सूर्य को मध्य में रख कर श्वेत प्रकाशमण्डल चौतरफ वितत होकर खड़ा हुआ है । यही सौर प्रकाशमण्डल श्वेत अश्व है । सूर्य की रश्मियाँ अग्निमयी होने से सुनहरी हैं किन्तु इसके चौतरफ विद्यमान पारमेष्ठ्य पानी के संघर्ष से ये श्वेत हो जाती हैं । सूर्य रश्मियों में कृष्ण-वर्णा पृथिवी के सम्बन्ध से कृष्णप्रारण भी मिला हुआ है । सुपर्णी वाक् सूर्य की वस्तु है । सूर्य में कृष्णवर्ण नहीं है । किन्तु सूर्य - रश्मियाँ वितत हो कर अपने उदर में कृष्णवर्णा पृथिवी को समाविष्ट कर लेती हैं । अतः उनमें कृष्णवर्ण भी है । वाक् का सीधा सूर्य से सम्बन्ध है । उसमें कृष्णवर्ण न होने से सुपर्णीवाक् कृष्णवर्ण को नहीं देखतीं । किन्तु सौर प्रकाशमण्डल के उदर में कृष्णवर्णा पृथिवी समाविष्ट है । अतः पृथिवीरूप कद्र को काले बाल दिखाई दे जाते हैं । सूर्य रश्म्यान्तर्गत कृष्णवर्ण में अन्तरिक्ष्य वायु के सम्बन्ध से उसमें चमचमाहट पैदा हो जाती है । क्योंकि सर्वत्र व्याप्त सूर्यरश्मियों का केवल सूर्य से ही सम्बन्ध नहीं है, अपितु सम्पूर्ण त्रिलोकी से उनका सम्बन्ध है । सुपर्णी को काले बाल न दीखने का तथा कद्रू को काले बाल दीखने का यही वैज्ञानिक रहस्य है ॥५ ॥
जबकद्रू ने कहा कि मैं अश्व की पूंछ पर काले बाल भी देख रही हूँ, तब सुपर्णी कहा, इसका निर्णय करने के लिए हम दोनों ही वहाँ चलें और तय करें कि कौन जीतती हैं । कद्रू ने कहा- काले बालों के होने में सन्देह तुम्हें है, मुझे नहीं । इसलिए तुम्हीं जा कर मालूम करो और आकर मुझे कह देना कि विजय किस की हुई है । मैं उसे मान लूँगी || ६ || क के कहने से सुपर्णी उड़ी और ऊपर गयी और जा कर मालम किया तो जो कद्रू ने कहा था, वही ठीक निकला । सुपर्णी ने आ कर कहा कि तुम्हीं जीती हो । सुपर्णी तथा कद्रू से सम्बन्ध रखने के कारण यह प्राख्यान सौपर्णीकाद्रव नाम से प्रसिद्ध है || ७ || कद्रू ने एक दिन सुपर्णी से कहा कि मैंने तुम्हें जीत लिया है, तुम मेरी दासी हो । यदि तुम इस दासीपने से मुक्ति चाहती हो तो तृतीय द्युलोक अर्थात् परमेष्ठी में जो सोम है, उसे देवताओं ( पार्थिव देवताओं ) के लिए ला कर दो । सोम के बदले में तुम्हें दासीपनें से मुक्त किया जा सकता है । सुपर्णी ने इस बात को स्वीकार कर लिया । उसने ' गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती ' इन छन्दों को उत्पन्न किया । क्यों कि सुपर्णी वागुरूप है और छन्द वाक् परिमाण ही होता है । अतः सुपर्णी ने गायत्र्यादि छन्दों को उत्पन्न किया, यह कहा गया है । गायत्री पृथिवी का, त्रिष्टुप् अन्तरिक्ष का तथा जगती द्युलोक का छन्द है । इन में गायत्री इस सोम को लायी || ८ || [ १८२ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण द्युलोक में यह सोम दो तीक्ष्ण धार वाली सुनहरी छुरियों के मध्य में रहता है । सुनहरी सूर्यरश्मियाँ ही दो सुनहरी कुशियाँ हैं । ये सूर्यरश्मियाँ अग्निमयी हैं अतः सदैव प्रज्वलित रहती हैं । इन सूर्य रश्मियों के मध्य में सोम रहता है । इन सुनहरी श्राग्नेय रश्मियों के बीच में सोम जला करता ( प्राहुत होता रहता ) है उसी से सूर्य प्रकाशित होता है । इन दोनों सुनहरी सूर्यरश्मियों के प्रान्तभाग में एक प्राण रहता है जो कि आग्नेय सोम के मिश्रण से बनता है, उसे गन्धर्व प्राण कहते हैं । अर्थात् दोनों सुनहरी सूर्यरश्मियों के मध्य में सोम है । सोम के दोनों प्रान्त भागों में प्राग्नेय सूर्यरश्मियों तथा सोम के मिश्रण से गन्धर्व प्राण उत्पन्न होता है । उसी के द्वारा सूर्यरश्मियों में सोम की आहुति होती है और उससे सूर्य का प्रकाश होता है । सूर्य रश्मियाँ प्राणदपानत् व्यापार करती हुई चलती है । आगे बढने का नाम प्राणन-व्यापार है तथा पीछे हटने का नाम अपानन व्यापार है । सूर्य की रश्मियाँ पहले आगे बढती हैं फिर थोड़ी पीछे हटती हैं, तदनन्तर पुनः आगे बढती हैं । तीक्ष्णधारवाले छुरे के समान सूर्यरश्मियाँ, जिनके मध्य में सोम भरा रहता है, प्राणन, अपानन व्यापार करती हुई चलती हैं और मध्यस्थ सोम की रक्षा करती हैं । सूर्यरश्मियों की प्राणन - अपानन क्रिया को बतलाने के लिए मूल में ' निमेषं - निमेषं ' कहा है । ये सुवर्णमयी कुशियाँ दीक्षा तथा तप हैं । किसी कर्म को करने में अधिकार प्राप्ति को दीक्षा कहा जाता है । मनुष्य जिस कर्म में दीक्षित होता है उसको उस कर्म करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । प्राप्त अधिकार की रक्षा करने वाले नियमादि का परिपालन व्रत कहलाता है । प्राप्त अधिकार की यावज्जीवन स्थिति तप कहलाती है । प्रकृतिमण्डल में सोम दोनों सूर्यरश्मियों के बीच रहता है । ये दोनों रश्मियाँ दीक्षा-स्थानीय तथा तपःस्थानीय हैं । इन दोनों के मध्य में सोम प्रतिष्ठित है । प्रकृति में दीक्षा व तप से ही सोम सुरक्षित है । अतः इस मनुष्यकृत सोमयाग में दीक्षा और तप को आत्मसात् करने के लिए दीक्षणीयेष्टि तथा उपसदिष्टि की जाती है । इन्हीं दोनों इष्टियों के बीच में सोम - क्रयण किया जाता है । क्योंकि प्रकृति में दीक्षा और तप रूप सूर्यरश्मियों के मध्य में ही सोम की स्थिति है । दीक्षा और तप से ही आत्मा में दिव्यभाव आता है, तभी वह सोमयाग के कर सकता है । ऊपर बतलाया गया है कि दोनों सूर्यरश्मियों के बीच सोम है, और सोम दोनों प्रान्तभागों में प्राग्नेय रश्मियों तथा सोम के मेल से गन्धर्व प्रारण उत्पन्न होता है । यह सोम के दोनों प्रान्तभागों में है । ये गन्धर्व प्रारण ही रश्मियों में सोम की आहुति डालते हैं, जिससे प्रकाश होता है । इन्हीं गन्धर्वप्रारणों से उभय सूर्यरश्मियों के मध्य में स्थित सोम की । रक्षा होती है अतः गन्धर्व प्राणों को सोम का रक्षक कहा गया है । यह स्थिति प्रकृति में है इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- ' तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुमुः की ' इति रक्षा । वैध मानुषयज्ञ में सदोमण्डप में वर्तमान धिष्ण्याग्नियाँ ही गन्धर्व हैं जो कि सोम [ १८३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण fu ष्या ब्राह्मण करने वाली हैं । ये गन्धर्वप्राण ही सूर्यरश्मियों में सोम की आहुति देते हैं अतः इन्हें होत्रा कहा जाता है | | । पार्थिव गायत्रीरूप सुपर्णी वाक् इन कुशीरूप दोनों सूर्यरश्मियों के मध्य में प्रविष्ट हो कर उनको विशकलित कर देती हैं । ग यत्रीरूप पार्थिववाक् २१ वें अहर्गण से भी ऊपर तक वितत रहती है जहाँ कि सूर्य रहता है । यही गायत्रीछन्द - रूप वाक् का सूर्यरश्मियों में प्रविष्ट हो कर उनको विशकलित करना है । पहले इस गायत्री ने प्राणन, अपानन व्यापार द्वारा झपट्टा मार कर उन दोनों सूर्यरश्मि रूप कुशियों में से दीक्षारूप कुशी का छेदन कर उसे पृथिवी की ओर फेंक दिया और उसे पार्थिव देवों को प्रदान कर दिया । उससे देवताओं ने सोमयाग के लिए दीक्षा ग्रहण की अर्थात् दीक्षरणीयेष्टि की ॥ ६० ॥
इसके बाद गायत्री ने दूसरी कुशी का भी छेदन कर दिया और उसे भी पृथिवी की ओर फेंक दिया । वह तपोरूप कुशी थी । उससे देवताओं ने तप किया अर्थात् उपसदिष्टि की ॥११ ॥
गायत्री ने सोमाहरण करते समय खदिर ( खैर ) को साधन बना कर सोम - भक्षण किया । अतएव खादन - साधन होने से इसका नाम खदिर हुआ । खदिर का सोमाहरण में उपयोग होने से सोमयाग में ' यूप ' व ' स्फ्य ' खदिर वृक्ष के बनाने चाहिएँ । इसका इरा ( रस ) प्रतिनिविड़ होता है । सुपर्णी वाक् के द्वारा उत्पन्न किये गये गायत्री, त्रिष्टुप् जगती छन्दों में से त्रिष्टुप् व जगती सोमाहरण न कर सके । किन्तु गायत्री छन्द ही सोम लाने में समर्थ हुआ । इसका कारण यह है कि पृथिवी का जो गायत्र अग्नि है वह खदिरस्वरूप है अर्थात् प्रबल वेग से प्रज्वलित है । गायत्र तेज वस्तु को विशकलित कर देता है, फाड़ देता है । इससे जिन रश्मियों के बीच में सोम रखा हुआ है, वे विदीर्ण हो जाती हैं । अतः वह सोम पृथिवी पर गिर जाता है । प्रकृति - यज्ञ में खदिर से सोम का अपहरण हुआ था, अतः प्रकृत वैध यज्ञ में खदिर से ही यूप और स्फ्य बनाने चाहिएँ । जिस समय गायत्री ने सोम का अपहरण किया था, उस समय सोम अच्छावाक गन्धर्व की रक्षा में था । अच्छावाक गन्धर्व सोम की रक्षा न कर सका, अतः उसे अपने अधिकार से च्युत होना पड़ा और वह सोमरक्षक गन्धर्वों में निकृष्ट कहलाया । तात्पर्य यह है कि गायत्री जिस स्थान से सोम ले आती है उस स्थान का अग्निमय सौम्य प्रारण अच्छावाक कहलाता १. सोमयाग में १६ ऋत्विक् होते हैं जिनमें ४ ऋत्विक् ऋग्वेदी, ४ यजुर्वेदी, ४ सामवेदी तथा ४ त्रिवेदी हैं अर्थात् ब्रह्मवेदी हैं । ' ब्रह्मा वै त्रैविद्यो भवति ' इस निरुक्त - वचन से ब्रह्म ही त्रिवेदी कहलाता है । इनमें चारों वेदों के चार प्रधान ऋत्विक्, होता, अध्वर्यु, उद्गाता तथा ब्रह्मा एवं ४ इनके सहायक - अच्छावाक, नेष्टा, प्रतिहर्ता व आरती को छोड़ कर शेष आठ ऋत्विक ही आठों धिष्ण्याग्नियाँ हैं । [ १८४ ]