Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 201–210

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणं धिष्ण्या ब्राह्मण है । गायत्री के द्वारा अच्छावाक के सोम का अपहरण हो जाने से उसकी शक्ति घट जाती है । क्योंकि सोम ही तो गन्धर्व प्रारणों की शक्ति है । अतः अच्छावाक को हीन बतलाया है ॥१२ ॥

यद्यपि अच्छावाक सोम को गायत्री द्वारा पृथिवी पर फेंक देने से शक्तिरहित व प्रतिष्ठाच्युत हो गया तथापि श्रग्नि व इन्द्र ने उसे गन्धर्व पंक्ति में पुनः प्रविष्ट कर दिया और प्रतिष्ठित बना दिया । ' इन्द्राग्नी ' में अग्निपद से पार्थिव सोम तथा इन्द्रपद से पारमेष्ठ्य सोम अभिप्रेत है । तात्पर्य इसका यह है कि अच्छावाक नामक गन्धर्व में सोमप्रारण गायत्री द्वारा सोमापहरण करने से निकल जाता है किन्तु कुछ समय में ही वह सोम द्युलोक से आ कर पुनः प्रविष्ट हो जाता है । पृथिवी में जो सोम चला गया है वह भी सौर रश्मियों द्वारा आकृष्ट कर लिया जाता है । यदि इस सोम का अच्छावाक में पुनः प्रवेश न होता तो प्रजाओं की प्रजाति ही समाप्त हो जाती और सृष्टिक्रम अवरुद्ध हो जाता । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' तमिन्द्राग्नीऽअनुसमतनुताम् प्रजानां प्रजात्यै ' इति । इस अच्छावाक • इन्द्र और अग्नि ने पुनः सोम का प्रवेश कराया । अतः अच्छावक को ' ऐन्द्राग्न ' कहा जाता है ॥१३ ॥

प्रकृतियज्ञ में जैसे दीक्षित गन्धर्व सोम की रक्षा करते हैं, वैसे ही मनुष्ययज्ञ में दीक्षित ऋत्विक् सोमवल्ली की रक्षा करते हैं । उसी प्रकार सोम से जिसका श्रात्मा बना हुआ है ऐसे मूर्धाभिषिक्त राजाओं की, आधि - व्याधि आदि से रक्षा दीक्षित ब्राह्मण करते हैं । यदि दीक्षित ब्राह्मण राजा की रक्षा में असमर्थ हो जाता है तो वह अच्छावाक गन्धर्व की तरह अपने अधिकार से च्युत हो जाता है । अतः जिस दीक्षित को अपने अधिकार को सुरक्षित रखना हो वह राजा की अच्छी प्रकार से रक्षा करे ॥ १४ । जिस प्रकार दीक्षित ब्राह्मण राजा की रक्षा करता है उसी प्रकार ब्रह्मचारी अपने आचार्य की रक्षा करते हैं । शिष्यों - ब्रह्मचारियों को यह ध्यान रहता है कि गुरु के घर को कोई नष्ट न कर जाए और उनके पशुओं को कोई चुरा न ले जाए । ब्रह्मचारियों ( विद्या -थियों ) का कर्तव्य है कि गुरु की सब प्रकार से रक्षा करें । अन्यथा वे कर्तव्यच्युत व प्रतिष्ठा-च्युत होते हैं । गायत्री द्वारा सोमापहरण से सुपर्णी ने अपने को देवताओं के ऋण से मुक्त कर लिया, क्योंकि गायत्री द्वारा सोमाहरण करा कर कद्रू की शर्त को पूरा कर दिया था । सोमाहुति के कारण ही यह अमृता वाक् २१ तक व्याप्त होती है । पृथिवीपिण्ड मरणधर्मा किया व वाङ्मण्डल अमृत है । गायत्री द्वारा लाये गये सोम से पार्थिव देवताओं ने सोमयाग और देवलोक प्राप्त किया । तभी से ' पुण्यलोक ईजान ' यह कथन प्रचलित हो गया । अर्थात् सोमयाग से मानव पुण्यलोक अर्थात् स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है ॥१५ ॥

- जो पुरुष उत्पन्न होता है वह मृत्यु से ऋण ले कर ही उत्पन्न होता है । आत्मा अमृत-रूप है । वह पृथिवी में तब तक जन्म ग्रहण ही नहीं करता जब तक कि उसके साथ भूत का [ १८५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण सम्बन्ध न हो । भूतसम्बन्ध ही मृत्यु है । अतः यह जायमान मनुष्य मृत्यु का अर्थात् पार्थिव भौतिक पदार्थों का ऋणी है । इस ऋण को चुकाना मनुष्य का कर्तव्य है । इस ऋण को चुकाने का एकमात्र उपाय यज्ञ है । सौर पदार्थ पृथिवी में आ कर सूर्य से प्रवृक्त हो कर पार्थिव भूतों के बन्धन में आ गये हैं । क्योंकि यज्ञ में अग्नि द्वारा सौरप्राण व भूतों का विकलन हो जाता है और सौर प्रारण भूतबन्धन से मुक्त हो कर अपने लोक में चले जाते हैं । यही मनुष्य का मृत्यु के ऋण से विमोचन है । अतः इस ऋण को चुकाने के लिए यज्ञ करना आवश्यक है | यही ऋण देवऋरण कहलाता है जिसका निरूपण शतपथ ब्राह्मण के प्रथम काण्ड में ' जायमानो वै त्रिभिरणवान् जायते ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा निरूपण किया गया है । जिस प्रकार सुपर्णी पार्थिव देवताओं में सोम की प्राहुति दे कर ऋणमुक्त हो गई उसी प्रकार जो सोमयाग करता है वह मृत्यु से अपने आपको मुक्त कर लेता है । क्योंकि सोमयाग से भूत - बन्धन में बँधा हुआ भूतात्मा नवीन दिव्यात्मा की उत्पत्ति कर शरीर त्यागानन्तर दिव्यात्मा के श्राकर्षण से जन्म - मरणरूप मृत्यु से मुक्त हो कर स्वर्ग में चला जाता है । अत: मृत्यु विमोचनार्थ सोमयाग करना आवश्यक है ॥ १६ ॥

गायत्री द्वारा श्राहृत सोम से पार्थिव देवताओं ने यज्ञ किया । गायत्री द्वारा सोम के पृथिवी में आने पर उसके साथ गन्धर्व ( गन्धर्वप्राण ) भी आ गए । क्योंकि भूत की स्थिति बिना प्राण के नहीं होती । अतः सोमभूत के साथ उसका प्राण गन्धर्व भी आया । पृथिवी में आकर गन्धर्वो ने कहा कि हे देवताओ! यज्ञ में हमें भी सम्मिलित करो, हमारा भी भाग रक्खो । क्योंकि सोम हमारी वस्तु है । अतः उसके द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ में हमारा भाग आवश्यक है ॥ १७ ॥

देवताओं ने कहा कि यदि यज्ञ में हम तुम्हारा भी भाग रखें तो इससे हमें क्या लाभ होगा? गन्धर्वों ने कहा कि जिस प्रकार द्युलोक में हम सोम की रक्षा करते हैं उसी प्रकार इस वैध यज्ञ में भी हम सोम की रक्षा करेंगे । क्योंकि गन्धर्व प्राण से ही सोम प्रतिष्ठित रहता है, बिना प्राण के कभी भूत की प्रतिष्ठा नहीं रह सकती । अतः सोम भूत की रक्षा गन्धर्व प्राण पर ही अवलम्बित है ॥ १८ ॥

देवताओं ने गन्धर्वों की इस बात को स्वीकार कर लिया । प्रकृतियज्ञ में परमेष्ठी से गत सोम के रक्षक गन्धर्व प्रारण हैं । तथैव इस मनुष्य यज्ञ में सोमबल्ली के रक्षक गन्धर्व-प्राणयुक्तात्मा मनुष्य - गन्धर्व ही रक्षक हैं । मनुष्य सोमयाग करते समय इन गन्धर्वों से ही सोम खरीद कर लाया करते थे । गन्धर्वों से ही वे सोम खरीदते हैं अत: इन्हें ' सोमः क्रीयते यै: ' इस व्युत्पत्ति से सोमक्रयण कहते हैं । प्रकृति में देवताओं ने गन्धर्वो को तृतीय सवन में ' सोमक्रयणाः ' कह कर आहुति दी थी उसी प्रकार ग्राज यह यजमान भी ' सोमक्रयरणा वः इति तेभ्य एने भागाः ' यह कह कर उन्हें आहुति देता है । अर्थात् धिष्ण्यरूप से स्थित इन गन्धर्वों को समय काल में ये तुम लोगों के भाग हैं, यह कह कर आहुति दे । प्रकृति में देवताओं ने [ १८६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मणे तृतीय सवन में आहुति दी थी उसी प्रकार यजमान तृतीय सवन में धिष्ण्याग्नियों में आहुति प्रदान करता है । वह प्राहुति भी ' घृत्याव प्राहुति: ' कह कर घृत की आहुति देता है सोम की नहीं । क्योंकि सोम तो आप लोगों से छीन लिया गया है । वह देवताओं के निमित्त छीना गया है | अतः आपको नहीं मिल सकता । इसलिए मनुष्य यज्ञ में धिष्ण्यरूप से स्थित गन्धर्व प्राणों को घृत की आहुति दी जाती है न कि सोम की । इसलिए तृणसमूह से युक्त धिष्ण्या-ग्नियों पर तृतीय सवन में घृत का व्याघार किया जाता है, घृत का सेचन किया जाता है ॥१६ ॥

अग्निप्रदीपन के बाद अग्नि में जो आहुति दी जाएगी वह आप लोगों को तृप्त कर देगी । क्योंकि अग्नि में प्राहुत आाज्य वायुरूप में परिणत हो कर प्रान्तरिक्ष्य गन्धर्व - प्राणों को तृप्त करता है । इसलिए अग्नि में जो घृताहुति देता है वह इन गन्धर्वों को तृप्त करता है | किन्तु गन्धर्व घृताहुति से ही तृप्त न हुए, क्योंकि वे सोमप्रिय हैं अतः वे अपने साथ सोम का सम्बन्ध चाहते हैं । इसलिए देवताओं ने कहा कि तुम्हारे पर सोम को रखते हुए ऋत्विक् लोग जो प्रचरण करेंगे वह सोमसंसर्ग श्राप को तृप्त कर देगा । अध्वर्यु इन छहों धिष्ण्या-ग्नियों पर सोम रख कर प्राहुति के लिए जब सोम को ले जाता है तब उस सोम के सम्बन्ध से गन्धर्व - स्थानीय धिष्ण्याग्नियों को तृप्ति हो जाती है । अतः अध्वर्यु को चाहिए कि वह धिष्ण्याग्नियों के समीप जा कर उनका अतिक्रमण न करे । अध्वर्यु ही सोम को ग्राहवनीय के समीप ले जाता है तथा प्राहुति देता है । इस अध्वर्यु की ओर मुँह फाड़ कर धिष्ण्याग्नियाँ उसकी प्रतीक्षा किया करती है । अतः अध्वर्यु यदि इन पर सोम रक्खे बिना इनका प्रतिक्रमण कर जाएगा तो धिष्ण्याग्नियों के मुख में प्रवेश कर जाएगा और अग्नि उसे जला डालेगा । तथा एकादशकल पशुपति देवता उसकी हिंसा करने की इच्छा करेगा, उसको सर्व प्रकार से पीडित करेगा । इसीलिए अध्वर्यु यदि हविर्धानमण्डप से उत्तरवेदि में जाए तो धिष्ण्याग्नियों से बच कर श्राग्नीध्र के उत्तर में हो कर जावे ॥ २० ॥

प्रकृतियज्ञ में गन्धर्व ही सोम की रक्षा करने वाले हैं । अतएव मनुष्ययज्ञ में सोम की रक्षा के लिए गन्धर्व - स्थानीय धिष्ण्याग्नियों को स्थापित किया जाता है । इस सोम की रक्षा के लिए अन्तःशङ्कु से पूर्व उत्तरावेदि के मध्य में आहवनीय, हविर्धानमण्डप के दक्षिण में मार्जालीय तथा उत्तर में आग्नीध्रीय एवं हविर्धानमण्डप के पश्चिम में सदोमण्डप में धिष्ण्या-नियां रहती हैं || २१ ॥ सोमरक्षक इन धिष्ण्याग्नियों में आधों को आहुति दी जाती है जो कि सदोमण्डप के मध्य में स्थित हैं तथा शेष ग्राहवनीयादि में ' सम्राडसि कृशानु ' इत्यादि रूप से अनुदेश किया जाता है अर्थात् उनका नाममात्र ले लिया जाता है । यदि सभी को आहुति दी जाएगी तो अन्तरिक्ष्य सारे ही गन्धर्व अपना स्थान छोड़ कर आहुति लेने के लिए आ जायेंगे और वहाँ अन्तरिक्ष रूप द्युलोक में गन्धर्व प्राणों का स्थान दूसरा प्रारण ग्रहण कर लेगा तो पीछे [ १८७ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ०६ ) शतपथ ब्राह्मरण धिष्ण्या ब्राह्मण अपने लोक में जाने पर वे कठिनता से वहाँ प्रवेश पा सकेंगे । अतः श्राधों को प्राहुति दी जाती है और शेष का नाम ले लिया जाता है । वे आहुति ग्रहरण के लिए अन्तरिक्ष रूप अपने लोक को छोड़ कर यहाँ पृथिवी लोक में नहीं आते अपितु अपने द्युलोक में ही रहते हैं । अतः द्युलोक में इनकी स्थिति ( प्रतिष्ठा ) बनी रहती है । अतः आधों को ही आहुति देना उचित है । सभी का अनुदेश करने पर भूलोक में उनका प्रत्यक्ष न होगा । अतः दोनों जगह प्रतिष्ठा व प्रत्यक्षता के लिए आधों को आहुति देना तथा श्राधों का अनुदेश करना ही उचित है ॥ २२ ॥

वह अध्वर्यु जिन को धिष्ण्य नाम से सम्पन्न करता है, जिन को ग्राहुति प्रदान करता है वे इस पृथिवीलोक में प्रत्यक्ष रूप से सोमरक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं । तथा जिन का नाममात्र निर्देश किया जाता है उनसे द्युलोक में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है । दोनों काम सिद्ध हो जाते हैं ॥ २३ ॥

जिस प्रकार इन धिष्ण्य रूप गन्धर्वों के दो स्थान हैं इसी प्रकार इनके नाम भी दो हैं । इन गन्धर्वों ने अपना नाम परिवर्तित करने का विचार किया । क्योंकि पूर्व नामों से हमारी समृद्धि नहीं है । पूर्व नामों से हम से सोम छीन लिया गया । अतः हम अपने दूसरे नाम रक्खें । जिससे हम समृद्ध हो सकें । यह विचार कर उन्होंने अपने दूसरे नाम रक्खें । दूसरे नाम रखने से जिन से सोम छिन गया था वे समृद्ध बन गए । दूसरे नामों के कारण ही देव -ताओं ने तृतीय सवन में इन्हें यज्ञ ' सम्मिलित किया, यज्ञ में भाग दिया । अतः यदि पहले नाम से ब्राह्मण की समृद्धि न हो तो वह दूसरा नाम रख ले जिस नाम से वह समृद्ध हो जावे । इस रहस्य को जानता हुआ अपना दूसरा नाम रख लेता है, वह समृद्ध हो जाता है || २४ || यह सोमयाग अर्थात् यज्ञ में सोमाहुति देव, मनुष्य, पितर आदि द्वारा सकल संसार के जीवन का कारण है । इस याग में प्राकृतिक अध्वर्यु जो अग्नि में आहुति देता है उससे देवता जीवित रहते हैं । जो सदोमण्डप में सोमभक्षरण ऋत्विगादि करते हैं उससे मनुष्य जीवित हैं । तथा हविर्धान शकट के दक्षिण भाग में चमसों में प्राहुति देने से व-शिष्ट सोम नाराशंस कहलाता है उससे पितर जीवित रहते हैं । इसके तात्पर्य को स्पष्ट करते हुए ग्रन्थकार ( स्व ० ) पं ० मोतीलाल शास्त्री जी ने लिखा है कि प्रकृति में २१ वें स्तोम पर स्थित अग्नि में जो पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती है उससे देवता जीवित रहते हैं । तथा पञ्चदश स्तोम के नीच जो सदोमण्डप है उसमें आया हुआ सोम पार्थिव वैश्वानराग्नि में आहुत होता है, इससे मनुष्यों का जीवन रहता है और उत्तर से दक्षिण में जाने वाले सोम से पितृप्राण की स्थिति रहती है ॥ २५ ॥

जो प्रजा इस यज्ञ में सम्मिलित हुई वह आज तक विद्यमान है । जो असुरादि प्रजा इस में सम्मिलित नहीं हुई वह पराभूत हो गई, उसकी सत्ता नहीं रही । जो प्रजा प्रकृति -[ १८८ ]

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1 तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मरण विष्ण्याब्राह्मणं याग में सम्मिलित हुई थी उसी को आज यह यजमान इस यज्ञ में सम्मिलित करता है । मनुष्यों के ग्रहण से पशु भी अन्वाभक्त हो गये हैं । देवताओं की तृप्ति से अन्तरिक्ष निवासी पशु - पक्षी आदि भी तृप्त हो जाते हैं । संसार में यावत् प्राणियों की तृप्ति देवताओं की तृप्ति से हो जाती है । इस प्रकार देवता, मनुष्य व पितर इन तीनों को यज्ञ में सम्मिलित करने से सारी प्रजाएँ यज्ञ में सम्मिलित हो जाती हैं । इन में देवता, मनुष्य, पितर प्रत्यक्ष रूप से सोमपान करते हैं । इन का यह पान ' सम्पा ' कहलाता है । किन्तु अन्य सब उच्छिष्ट भोजी हैं वे सोमपान करते हुए दीखते नहीं हैं जब कि देवता, मनुष्य, पितर प्रत्यक्ष रूप से सोम-पान करते हुए दिखाई देते हैं || २६ || [ विज्ञान भाष्य ] सदोमण्डप तैय्यार हो चुका । सदोमण्डप में ६ ( छह ) धिष्ण्याग्निस्थापित किए जाते हैं । ये छात्रों धिष्ण्याग्नि क्या हैं? सदोमण्डप में इन्हें स्थापित करने की क्या आवश्यकता है? - इत्यादि प्रश्नों की उपपत्ति बतलाने के लिए एक वैज्ञानिक आख्यान बतलाते हैं --जो अग्नि धिष्ण्या नाम से प्रसिद्ध हैं वे इस सोमयज्ञ के प्रर्थात् सोम के वैमात्र भ्राता हैं अर्थात् दोनों भाइयों में केवल योनि भेद है । धिष्ण्या अन्य से पैदा हुए हैं एवं सोम दूसरी माता से उत्पन्न हुआ है । बस इनमें - इतना ही अन्तर है । हम इन्हें विजामान इसलिए कहने के लिए तय्यार हैं कि ये समझ हैं-समान चिह्ना हैं | सोम और धिष्ण्या का स्वरूप मिलता - जुलता है । दोनों का स्वरूप एक जैसा है । लोक में हम ' देखते हैं कि जो समङ्क होते हैं अर्थात् जिनकी आकृति एक होती है - वे विजाना कहलाते हैं । उन्हें एक जात का कहा जाता है । वे जाति - बन्धु समझे जाते हैं । मनुष्यों की आकृति समान है । वे समत होते हैं श्रतएव हम उन्हें वैमात्र भ्राता - जातिभाई कहने के लिए तय्यार हैं । गाय गाय सब विजामान हैं । घोड़े - घोड़े सब विजामान हैं - योनि मात्र का भेद है । बाकी सब भाई - भाई हैं । एक जाति वस्तु हैं । धिष्ण्यों का स्वरूप ठीक सोम के माफिक है अतएव हम इन्हें वैमात्र भ्राता कहने के लिए तय्यार हैं । इतना ही नहीं हम तो यह भी कहने के लिए तय्यार हैं कि यह धिष्ण्या ही इस सोम की आत्मा है । धिण्ण्यों से ही सोम - सत्ता रहती है । सोम की रक्षा करने वाले चूँकि यही धिष्ण्या हैं अतएव इन्हें हम अवश्य ही सोम की आत्मा कह सकते हैं इसीलिए सोम यज्ञ में आत्मभूत धिष्ण्या की स्थापना अवश्य ही करनी चाहिए । सारे विश्व में प्राण कुल पाँच ही प्रकार के हैं । ये पाँचों प्रारण - ऋषि, पितर, देवता, गन्धर्व एवं मनुष्य अर्थात् वैश्वानर- इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ऋषि - प्रारण स्वयंभू - मण्डल की वस्तु हैं । पितरप्राण परमेष्ठि- मण्डल की वस्तु हैं । देवप्रारण सूर्य्य- मण्डल की वस्तु हैं । गन्धर्वप्राण चन्द्र मण्डल की वस्तु हैं एवं वैश्वानरप्राण ( मनुष्यप्राण ) पृथिवी की वस्तु हैं । इनमें गन्धर्वप्राण का सौम्य प्राण से सम्बन्ध है । सम्बन्ध क्या है - सौम्यप्राण का नाम ही गन्धर्व है । संपूर्ण पदार्थों में ' प्राण ' और ' भूत ' ये दो विभाग होते हैं । भूत, प्राण के बिना नहीं रह सकता । ' पृथिवी जल - तेज- वायु प्राकाश'- ये पाँचों भूत हैं । ये ही पाँचों वैज्ञानिक परिभाषा में ' प्रारण आप वाक् अन्नाद श्रन्न ' कहलाते हैं । ये पाँचों भूत, प्राण के आधार पर ही स्थित हैं । यदि प्राण न हो तो इनकी सत्ता एक सैकिण्ड भी न रहे । इनमें जो अन्न है - वही सोम कहलाता है । अन्नाद को ही अग्नि कहते हैं । प्रकृत में इन दो ही से सम्बन्ध है अतएव अन्य तीन भूतों के विषय में हम कुछ नहीं कहेंगे । इस सोम भूत का जो प्रालम्बन है-[ १८६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण वह सौम्यप्राण कहलाता है - जो कि परमेष्ठी और चन्द्रमा में रहता है । अग्निभूत का आलम्बन आग्नेयप्राण है जो कि सूर्य और पृथिवी में रहता है । अतएव तत् तत् प्राणों को हम तत्तद्भूतों का आत्मा कहने के यदि प्राण न हो तो भूत सत्ता भी न रहे लिए तय्यार है । सोम भूत का श्रालम्बन सौम्या है । यह सौम्य प्राण अन्तरिक्ष में प्रर्थात् चन्द्रमा में रहते हैं । जहाँ प्राण रहता है वहीं भूत रहता है | चूँकि प्राण अन्तरिक्ष में रहता है अतएव सोम भी अन्तरिक्ष में ही व्याप्त रहता है इसीलिए ' स्व मातनो सर्वान्तरिक्षम् ' कहा जाता है । बस इस सौम्यप्रारण का नाम ही गन्धर्व है - इसी को धिष्ण्या - कहते हैं । इनमें नक्षत्राग्नि शामिल रहती है अतएव सोमात्म - भूत गन्धर्व नामक ( अन्तरिक्षं स्थित सौम्य ) प्राण को हम इस सोम को आत्मा कहने के लिए तय्यार | अग्नि - सोम के प्रान्त भागस्थ प्रारण का नाम ' गन्धर्व ' प्रारण है - जैसा कि हम आगे बतलाने वाले हैं अतएव यह सोम से बिल्कुल मिलते - जुलते हैं- योनि भेद मात्र है । गन्धर्वापरपर्यायक इन धिष्ण्याओं को हम सोम के वैमात्र भ्राता कहने के लिए तय्यार हैं । धिष्ण्या रोदसी में उत्पन्न होते हैं एवं सोम परमेष्ठी ( ब्रह्मणस्पति ) में उत्पन्न होता है । धिष्ण्या की पैदाइश दूसरे लोक से है, सोम की पैदाइश अन्य लोक से है । इतना होने पर भी दोनों समङ्क हैं - एक सरीखे, एक जाति के हैं श्रतएव इन्हें हम सोम के विजामान कहने के लिए अवश्य ही तय्यार हैं । ' इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" विजामानो हैवास्य धिष्ण्या: ( श्रस्य सोमस्य धिष्ण्या वैमात्र भ्रातरः सन्ति ) इमे ( धिष्ण्याः ) समङ्काः ( समानचिह्ना: ) ( यतः समङ्कास्तत एव reat: - इति भावः ) । ये वै समङ्का ( लोके ) स्ते विजामानः । एतउ हैवास्यैत ( सोमस्य ) आत्मानः " ॥१ ॥

धिष्ण्यात्रों को सोमयज्ञ में शामिल करना चाहिए - इसकी एक तो यही उपपत्ति है । अब दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं - सृष्टि के प्रारम्भ में- द्युलोक में सोम था एवं देवता यहाँ थे । उन देवताओं ने विचार किया - यह द्युलोकस्थ पारमेष्ठ्य सोम अपने पास आ जाए और हम इस आगत सोम से सोमयज्ञ करें । इस विचार से सोम लाने के लिए उन्होंने सुपर्णी और कद्रू नाम की दो माया उत्पन्न कीं । इस श्राख्यान का सम्बन्ध पार्थिव स्तौम्य देवताओं से समझना चाहिए जो कि स्तौम्य देवता पृथिवी के २१ अहर्गण तक वितत हैं । इन्हीं स्तौम्य देवताओं के लिए कहा जाता है-" इति स्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " । ( ऋग्वेद मं ० ८।३०।२ ) पृथिवी में से निकलने वाला एवं २१ अहर्गण तक घन - तरल - विरल ये तीन अवस्था धारण कर वितत रहने वाला जो अग्नि है - वही देवता है । अग्नि ही ३३ देवता बना हुआ है श्रतएव श्रग्निःसर्वा देवता: ' ( ऐ ० ना ० प्र ० ६ । ३ ) यह कहा जाता है । अग्नि का स्वभाव है- सोम खाना । यदि अग्नि में सोमा -हुति न हो तो अग्नि की सत्ता ही न रहे । सोम सूर्य्य से भी ऊपर परमेष्ठि मण्डल में है । ३३ प्रहर्गण [ १६ ]

पृष्ठ 207

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण तक फैली हुई वाक् द्वारा सोम इन देवताओं में श्राहुत होता है । आगत सोम से पार्थिव स्तोम्य यज्ञीय देवता सोमयज्ञ किया करते हैं । सृष्टि जब बनी ही थी- उस समय सोम नहीं श्राया था । उसको लेने के लिए देवताओं ने कद्रू और सुपर्णी नाम की माया उत्पन्न की । पृथिवी का नाम कद्रू है और वाक् का नाम सुपर्णी है । कद्रू को सर्पों की माता कहा जाता है । वास्तव में यह सर्पों की माता है । सर्प काले प्राण का नाम है । यह सर्प संख्या में सहस्र हैं । वेद में सहस्र शब्द का अर्थ ' पूर्ण ' है । पृथिवी के चारों और पार्थिव कालाप्राण भरा हुआ है । यही सहस्र सर्प हैं । पृथिवी, सूर्य के चारों ओर जिस मार्ग पर परिक्रमा लगाती है उसका नाम क्रान्तिवृत्त है । इस क्रान्तिवृत्त को ही सर्प कहते हैं । यह टेढ़ा - लहरदार बना हुआ है । इस क्रान्तिवृत्त पर पृथिवी सर्पण करती हुई चलती है । इसलिए इसे सर्पराज्ञी कहा जाता है अतएव ' इयं वै पृथिवी सर्पराज्ञी ' ( शत ० २ | १ | ४ | ३० ) कहा जाता है । पृथिवी से सर्पण करते हुए काले प्राण निकलते हैं - इसलिए इसे सर्पो की माता कहा जाता | ' वेदिब्राह्मण ' में बताया गया है कि इस पृथिवी पर सदा ही विरुद्ध बल आक्रमण किया करते हैं । एक का नाम केन्द्रा-पकर्षिणी शक्ति है - एक नाम केन्द्रापसारिणी शक्ति है । केन्द्रापसारिणी शक्ति पृथिवी को हर पल सूर्य्य से ठीक विरुद्ध ले जाना चाहती है परन्तु सूर्य्य - रश्मि स्वरूप केन्द्रापकर्षिणी शक्ति उसकी प्रतिबिन्दु को अपनी ओर खींचती रहती है । पृथिवी टेढ़ी जाना चाहती है किन्तु केन्द्रापकर्षिणी उसे अपनी ओर खींच लेती है अतएव उसका परिभ्रमरणवृत्त गोल बन जाता है ( देखिए शत ० ब्रा ० ३।५।१।२० - २२ ) इस प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि पृथिवी कुत्सितगति से - कुटिलगति से सर्पण करती हुई - क्रान्तिवृत्त पर परि क्रमा लगाती है श्रतएव ' कुत्सितं कुटिलं वा यथा स्यात् तथा द्रवति ' इस व्युत्पत्ति से पृथिवी को ' कद्र ' कहा जाता है । दूसरी है सुपर्णी । सुपर्णी वाक् का नाम है । हम जो शब्द मुँह से बोलते हैं - उसकी जननी जो सौरीवाक् है - वही यहाँ वाक्त्वेन श्रभिप्रेत है । यह वाक् पिण्ड से बाहर ३३ ( अहर्गण १ ) तक व्याप्त रहती है । चाहे एक तिल हो तो उसके भी चारों ओर वाक् मण्डल रहेगा । पहाड़ हो तो उसके भी वाक्मण्डल होगा । इसी वाङ्मण्डल को महिमामण्डल कह लेते हैं । यद्यपि संसार के यच्चयावत् पदार्थों में यह वामण्डल है किन्तु है यह सूर्य्य की ही चीज! ' प्राण - प्रापः वाक्- अन्नाद - अन्न ' इन पाँचों यज्ञाक्षरों में सूर्य्य ही इन्द्र ही वाकमण्डलाधिष्ठाता है अतएव ' वागिन्द्रः ' कहा जाता है । इसी वाङ्मण्डल के पेट में अर्थात् सूर्य के वाङ्मय सोलर सिस्टम के पेट में सारी रोदसी त्रिलोकी समा रही है अतएव " वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता " ( ते ० प्रा ० शा ४ ) यह कहा जाता है । चूँकि यह सूर्य की वस्तु है श्रतएव कई ब्राह्मणों में ' असौ सुपर्णी ' लिखा रहता है । इससे श्रृति यही सूचित करती है कि संसार के यच्चयावत् पदार्थों के जो महिमामण्डल हैं - वाक् मण्डल हैं उन्हें सूर्य की वस्तु समभो । यह वाक् पिण्ड से बाहर चारों ओर बड़ी दूर तक फैलती है प्रतएव सुपतनशीलत्त्वात् इसे ' सुपर्णी ' कहा जाता है । पिण्ड अपने स्थान पर ही रहता है किन्तु वाक् बड़ी दूर तक घावा मारती है अतएव इस बाकू को हम ' सुपर्णी ' कहने के लिए तय्यार हैं । यह वाक्समुद्र सर्वत्र भरा हुआ है । इस पर जब धक्का लगता है तो इसमें वीची - तरङ्ग उत्पन्न होती है । उसी का धक्का कान पर लगता है - वहाँ पर १. पिण्ड की महिमा इत्यादि की वैदिक माप । सभी पिण्डों का महिमा मण्डल ३३ तक व्याप्त रहता है, अर्थात् ३३ ( ग्रहण ) ही पिण्ड का उदचसाम ( निधन बिन्दु ) मानी गई है । [ १ ९ १ ]

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण बैठा हुआ प्रज्ञाप्ररणा उसको ग्रहण कर लेता है । वही क च ट त प कहलाती है । वाकू सुपतनशीला है - इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जब हम मुँह से शब्द बोलते हैं तो वह गोलमण्डल बनाता हुया-चारों ओर बड़ी दूर तक फैल जाता है । उत्पन्न शब्द स्थानान्तरित हो जाता है । वाक् एक कालाव-च्छेदने सर्वत अपना मण्डल बनाती है । यह बात पिण्ड में नहीं है । पृथिवी से निकलने वाली - सूर्य से ऊपर तक व्याप्त होने वाली जो सुपतनशीला वाक् है - उसे ही हम सुपतनधर्मत्वात् सुपर्णी कहेंगे । यद्यपि यह वाक् इस समय पृथिवी की वस्तु बन रही है परन्तु वस्तुतः हम इसे सूर्य्य की वस्तु कहेंगे । पृथिवी और वाक् सली चीज है । उन्हें किसी अन्य नाम से बतलाना ही माया है । वस्तु हो कुछ और कहा उसे दूसरे नाम से जाए, इसी को माया कहते हैं । सत्यभाव से वैपरीत्य का नाम ही माया है । चूँकि इन्हें पृथिवी और वाक् न कह कर - कद्रू और सुपर्णी कहा जाता है अतएव हम इन्हें माया कहने के लिए तैय्यार हैं । यह पृथिवी का पिण्ड भी अग्नि से ही बना हुआ है एवं वाक् भी सौरप्राण से, सौराग्नि से बनी हुई है । श्राग्नेय प्राण का नाम ही देवता है अतएव पृथिवी और वाक् दोनों को देवतो -त्पन्न बतलाया जाता है । बस इसी प्राकृतिक विज्ञान को बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं--" दिवि वै सोम आसीत् प्रथेह ( पृथिव्यां ) देवाः । ते देवा श्रकामयन्त आ नः सोमो गच्छेत् ( नः - अस्मान् प्रति सोम श्रागच्छेत् ) तेन ( आगतेन सोमेन ) यजेमहीति । तएते मायेऽअसृजन्त सुपर्णी च कहूं च । वागेव सुपर्णी इयं कद्रूः " ॥ इस प्रकार कद्रू और सुपर्णी को उत्पन्न कर देवताओं ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उनमें झगड़ा

उत्पन्न कर दिया । परस्पर कलह पैदा करा दिया-" ताभ्यां समदं चक्रुः ।

( परस्परं कलहमुदपादयन् ) " ॥ २ ॥

सुपर्णी और कद्रू दोनों परस्पर झगड़ा करती हुई बोलीं कि अपना कलह यों शांत नहीं हो सकता । इस झगड़े को मिटाने का एकमात्र उपाय यही है कि हम दोनों में से जो प्रत्यन्त दूर की वस्तु देख लेगी वह दूसरी की आत्मा को जीत लेगी अर्थात् दूसरी की स्वामिनी वन जाएगी और जो हार जाएगी वह दासी बन जाएगी । यह शर्त दोनों को मंजूर हो गई - कद्रू ने कहा कि अच्छा ग्राकाश की ओर अपनी दृष्टि फेंको--“ ते हतयमानेऽऊचतुः । यतरा नौ ( आवयोर्मध्ये यतरा ) दवीयः परा-पश्यात् ( प्रत्यन्तं दूरतरं परापश्येत् ) श्रात्मानं नौ सा जयात् इति । तथेति । सा ह करुवाच परेक्षस्वेति ॥ ३ ॥

सुपर्णीने आकाश • डाल कर कहा कि हे कद्रू! इस सलिल के उस पार चट्टान पर एक सफेद घोड़ा खड़ा हुआ है - उसे ही मैं देखती रहूँ । मेरा खयाल है - उसी को तुम देख रही होंगी । कद्रू [ १६२ ]

पृष्ठ 209

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 209 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण ने कहा- ' हाँ ' मैं उसे तो अवश्य ही देख रही हूं किन्तु मैं तुम से इतना विशेष और देख घोड़े की पीठ पर काले बाल चिपक रहे हैं एवं वे हवा से इधर - उधर हिल रहे हैं । देख रही हूँ-धिष्ण्या ब्राह्मण रही हूं कि उस ऐसे घोड़े को मैं " सा ह सुपर्ण्यवाच । अस्य सलिलस्य पारेऽश्वः श्वेत स्थागौ सेवते तमहं पश्यामीति । तमेव त्वं पश्यसीति । तं हीत्यथ ह कद्रूरुवाच - तस्य वालो न्यषञ्जि तममुं वातो धूनोति तमहं पश्यामीति ॥४ ॥

इसका वैज्ञानिक अर्थ बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - वेदि का ही नाम सलिल है । इस पृथिवी का नाम वेदि है । यह वेदि २ ९ तक व्याप्त रहती है । पृथिवी का रथन्तर - साम २१ अहर्गण सलिल तक जाता के उस है, अतएव पृथिवी की सत्ता वहाँ तक मान ली जाती है । सुपर्णी ने यह कहा था कि समझो - " इस एवं सूर्य्य को पार सफेद घोड़ा चट्टान पर खड़ा है " यहाँ पर अग्नि ही सफेद घोड़ा है, ऐसा हैं - वे बाल स्थारक समझो । कद्रू ने जो यह कहा था कि उसके बाल चिपक रहे हैं एवं हवा से हिल रहे ही रशना हैं । वैश्वानर अग्नि का सूर्य में - ' पुरुष, अश्व, गो, अवि, प्रज, ये पाँच पशु माने जाते हैं । पाँचों में है - उसी का नाम नाम तो पुरुष है । तीनों लोकों के अग्नि घर्षण से जो नया अग्नि उत्पन्न होता । संसार ' वैश्वानर ' अग्नि है । इसी से पुरुष का निर्माण होता है अतएव इसे पुरुष कह दिया जाता है ताप नहीं भर में जो तापधर्म्मा अग्नि है वह यही वैश्वानर अग्नि है । पृथिवी अन्तरिक्ष- सूर्य्य- पार्थिवाग्नि तीनों में ही जाती है-है । ताप केवल वैश्वानर अग्नि में ही है । ऊपर से सूर्य्य- रश्मियाँ आती हैं - इधर से एक चौथा अग्नि पैदा बीच में अन्तरिक्ष्याग्नि मिल जाता है । इस प्रकार तीनों के घर्षण से तापधर्म्मा है - अश्व | हो जाता है इसी का नाम ' वैश्वानर ' अग्नि है - इसी को पुरुष कहते हैं । पुरुष सातों के अनन्तर में सात रंग हैं । सूर्य की प्रत्येक रश्मि में सात - सात रश्मियाँ हैं । सात डोरे का एक डोरा है रंग । का उदय हो जाता है । सात रंग जब सक्रिय अवस्था में रह कर मिल जाते हैं तो वहाँ शुक्ल ( सफेद ) जीवित अवस्था शुक्ल रंग है । बस, संसार सात रंगों की मृत्यु - अवस्था कृष्ण ( काला ) रंग है । सातों की हैं । में असली शुक्ल और कृष्ण दो ही रंग हैं । बाकी के सारे रंग बनावटी ये सारी रश्मियाँ यही सफेद घोड़ा है जो कि सूर्य्य चट्टान से बँधा हुआ है । सूर्य्यं हुई से हैं ही । इन रश्मियों की जो निकलती हैं । ये रश्मियाँ पृथिवी को गर्भ में लिए हुए बड़ी दूर तक फैली सूर्य्य के बीच में रह कर यह भुवन संस्था है - सोलर सिस्टम है उसे ही बृहत्साम कहते हैं । इस प्रकार । प्रातःकाल जो उषा रहती है सफेद प्रकाशमण्डल चारों ओर हाथ - पैर फैला कर वितत है । दिन का जो प्रकाश है, वही सफेद वहाँ से इसका प्रारम्भ होता है एवं सायंकाल तक इसकी समाप्ति है मोर पानी ( सोम ) भरा हुआ है । घोड़ा है । इस सफेदी का वास्तविक कारण पानी ही है । सूर्य्य के चारों घर्षण करती है -सूर्य की रश्मियाँ अग्निमयी हैं प्रग्नि का स्वरूप सुनहरी है । यह - पानी में रंग ही रहता । अतएव ये रश्मियाँ सफेद हो जाती हैं । यदि पानी न होता तो सफेदी न होती हिरण्यमय [ १६३ ]

पृष्ठ 210

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण [ १६४ ] धिष्ण्या ब्राह्मण ? सुपर्णी ने कहा कि तुम बस, यही सफेद घोड़ा है । सुपर्णी को काले बाल नहीं दीखे । इसका अर्थ यही है कि सुपर्णी वाक् है । वाक् सूर्य की वस्तु है । काली रश्मि पृथिवी की वस्तु है । काली रश्मि का पृथिवी से सम्बन्ध है न सूर्य्य वाक् से । इस अश्व में अर्थात् सूर्य्य- रश्मियों में पार्थिव काला प्रारण भी रहता है । रश्मि को गौर से देखने पर इसमें बाल के समान अतिसूक्ष्म काली डोरी भी दिखलाई पड़ती है; यह पृथिवी की ही वस्तु है । इन रश्मियों में अन्तरिक्ष की वस्तु है - वायु - तभी तो रश्मियाँ चमाचम कर रही हैं । गति वायु से ही होती है । जो शुक्ल भाग है वह सूर्य की वस्तु है एवं काली डोरी पृथिवी की वस्तु है । चमाचम प्राण अन्त-रिक्ष की वस्तु है । सूर्य्य - रश्मियों में खाली सूर्य्य की वस्तु नहीं है अपितु त्रिलोकी की वस्तु इसमें शामिल है - यही इस प्राख्यान का रहस्य है । सूर्य्यं सोम को सफेद कर देता है किन्तु पार्थिव काला प्रारण प्रासुर है उसे वह सफेद नहीं कर सकता । वह ज्यों का त्यों रहता है । कृष्ण - रश्मियाँ, सूर्य्य- रश्मियों में अन्तःस्यूत रहती हैं । इसी अभि-प्राय से कहते हैं-" सा यत् सुर्पारण उवाच । अस्य सलिलस्य पार इति । वेदिवै सलि-लम् । वेदिमेव सा तदुवाच । श्रश्वः श्वेतः, स्थारगौ सेवतऽइति । अग्निर्वाऽश्वः श्वेतः । यूपः स्थाणुः । अथ यत् कद्रुरुवाच तस्य वालो न्यषञ्जि - तममुं वातो धूनोति तमहं पश्यामीति रशना हैव सा " ॥५ ॥

जब कद्र ने कहा कि मैं काले बाल भी देख रही हूँ तो इस पर सुपर्णी ने कहा कि हम तुम्हारे कहने पर विश्वास नहीं कर सकतीं । इसके निर्णय का सबसे अच्छा उपाय यही है कि तुम और मैं दोनों सच्ची बात जानने के लिए चलें जिसकी बात सच्ची होगी वही जीत जाएगी । कद्र बड़ी चालाक थी -उसने कह दिया कि हम नहीं चलते । संदेह तुम को है अतएव तुम जाओ, देख ग्राम्रो जैसी स्थिति हो मुझ से कह देना । मुझे तुम पर विश्वास है । वास्तव में बात सच है । कद्र पृथिवी पिण्ड का नाम है । पिण्ड कैसे जा सकता है । सूर्य्यं तक तो पिण्ड से निकलने वाली वाक् हो जाती है --" साह सुर्पारण उवाच- - एहि इदं पताव वेदितुं यतरा नौ- जयतीति ।

साह करुवाच- त्वमेव पत । त्वं वै न श्राख्यास्यसि यतरा नौ जयतीति " ॥६ ॥

सुपर्णी लाचार थी अतएव वहीं श्राकाश की प्रोर उडी । वहाँ पर वह घोड़ा वैसा ही था जैसा कद्रू ने बतलाया था । वास्तव में उसके काले बाल चिपक रहे थे एवं हवा से इधर - उधर हिल रहे थे । जब सुपर्णी वापस लौटी तो कंद्रू ने उससे पूछा कि बतलाओ तुम जीती या मैं ही जीती । तुम्हारा ही कहना सच निकला । यह प्राख्यान वेद से भी प्राचीन है । भगवान् वेदव्यास ने जिन प्राचीन प्राख्यानों का संग्रह कर पुराण संहिता बनाई थी उसी का यह प्राख्यान है । ऋग्वेद प्रतिप्राचीन इन्हीं प्राख्यानों के आधार पर सारी संहिताएँ बनी हुई हैं प्रतएव — से भी