Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 211–220
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण
" पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मरणा स्मृतम् ।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः " ॥
यह कहा जाता है । इसी प्रसिद्धि को बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" एतद् व्याख्यानं सौपर्णीकाद्रवमिति " ॥७ ॥
इस प्रख्यान का विस्तृत विवेचन हमने पूर्व के सोमक्रयण ब्राह्मण में कर दिया है । शर्त के अनुसार सुपर्णी को कद्रू की दासी बनना पड़ा । कद्रू ने एक दिन सुपर्णी से कहा कि हे सुपर्णी! मैने तुम्हें जीत लिया है । इस समय तुम मेरी दासी हो । यदि तुम इस दासीपने से मुक्त होना चाहती हो तो द्युलोक में जो सोम है उसे देवताओं के लिए ले श्राश्रो । सुपर्णी ने इसे स्वीकार कर लिया । के उसने ही गायत्री - त्रिष्टुप् जगती - तीन छन्दों को उत्पन्न किया । ये तीनों छन्द उस समय चार चार अक्षर थे । पृथिवी - प्रन्तरिक्ष - यो- तीनों की वाक् वर्तुल वृत्तता के कारण चतुर्भुज थी । जो भी वर्तुल वृत्त होते हैं उन सब में 20 के हिसाब से चार टुकड़े मान लिए जाते हैं । यही चार छन्द हैं । पृथिवी का छन्द गायत्री था । अन्तरिक्ष का त्रिष्टुप् छन्द था - द्यौ का जगती छन्द था । तीनों में से गायत्री ही सोम ला सकी । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण चन्द्रमा है । चन्द्रमा में जो सोम हैं उसी से पार्थिव देवताओं का सोमयज्ञ होता है । गायत्री ही कैसे लाई- ये छन्द कौन से हैं, वाक् ने इन्हें कैसे पैदा किया- इत्यादि बातों का विस्तृत विवेचन सोमाख्यान ब्राह्मण में हो चुका है— " सा ह करुवाच - श्रात्मानं वै त्वाऽजैषं दिव्यसौ सोमस्तं देवेभ्य श्राहर । तेन देवेभ्य आत्मानं निष्क्रीगोष्व - इति । तथेति । सा छन्दांसि ससृजे । सा गायत्री दिवः सोममाहरत् " ॥८ ॥
द्युलोक में वह सोम सोने की कुशियों के बीच में रक्खा था । वे तीक्ष्ण धारवाली दो सुनहरी धुरियाँ पल - पल में उसकी निगरानी रखती थीं । क्या मजाल, उसके बीच में से कोई दूसरा मनुष्य अयो सोम ले जाए । भाषा में जिसे कुशी कहते हैं - वही यह है । यह कुशी लोह की होती है थी अतएव । सोने ' की विकारश्चेत् कुशी ' कहा जाता है परन्तु द्युलोकस्थ कुशी लोह की नहीं थीं अपितु सुनहरी होती है । क्या मजाल थी । सूर्य्य - रश्मियों का नाम ही सुनहरी कुशियाँ है । इनकी धार बड़ी तीक्ष्ण के इनमें कोई हाथ दे दे | ये कुशियाँ अग्निमयी हैं अतएव सदा प्रज्वलित रहती हैं । इन सुपर्णं रश्मियों है । इसी बीच में पारमेष्ठ्य सोम भरा रहता है । वह सोम इन दोनों के बीच में रह कर जला करता ) यह से सारे संसार में प्रकाश हो रहा है अतएव ' त्वं ज्योतिषावितमो ववर्थ ' ( ऋग्वेद मं ० १२६११२२ हैं - फिर जरा कहा जाता है । ये रश्मियाँ सदा प्राणदपानत करती हुई चला करती हैं । श्रागे लगे रहते जाती हैं, जैसी उनकी पीछे हटती हैं - फिर आगे चलती हैं । इंजिन के नीचे जो लम्बे - चपटे लोह - दण्ड हैं । अतएव ' प्रस्था चाल है - ठीक ऐसी ही चाल सूर्य्य रश्मियों की है । इसे ही प्राणदपानत् क्रिया कहते के लिए ' निमेषं निमेष ' प्राणदपानती ' यह कहा जाता है । बस, इसी प्राणदपानत् क्रिया को बतलाने [ १६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) होता. अध्वर्युः १ प्रति प्रस्थाता २ प्रशस्ता अच्छा are: नेष्ट्रा ३ ग्रावस्तोता उन्नेता ४ ऋग्वेदिनः यजुर्वेदिनः १६. शतपथ ब्राह्मण उद्गाता ब्रह्मा प्रस्तोता प्रतिहर्त्ता आग्नीध्रः पोता सुब्रह्मण्यः सामेविदः त्रयवेदिनः [ १६६ ] धिष्ण्या ब्राह्मण इति प्रथमा: ( १ ) ( ४ ) इति श्रधिनः ( 11 ) २ ) इति तृतीयिनः ( 1-1 ) १1-1 ) इति पादिनः ( 1 ) १ ) दक्षिण दक्षिण ऋत्विजः प्रत्येक चतुष्टय है कहा है । सूर्य की दोनों ओर की रश्मियाँ- दोनों कुशियाँ हैं । इनके बीच में सोम भरा रहता है । इन दोनों के मेल से दोनों रश्मियों के प्रान्त भाग में जो एक परिवर्तित प्रारण है - उसे ही गन्धर्वप्राण कहते हैं । अग्निष को मिलित अवस्था से पैदा होने वाला प्रान्तभागीय प्रारण ही गन्धर्वप्रारण कहलाता है । दोनों ओर रश्मियाँ हैं । रश्मियों के बीच में सोम है । सोम के दोनों ओर प्रान्त भाग में गन्धर्वप्राण है । यही इस सोम को उन रश्मियों में आहुत करते हैं । रश्मियों में जो सोम जाता है - उसके बीच में गन्धर्व - प्राण पड़ता है । उसी के जरिए रश्मियों में सोम पड़ा करता है । चूंकि यही इसमें आहुति -डाला करते हैं अतएव इन्हें होत्र कहा जाता है । सोमयज्ञ में कुल सोलह ऋत्विक् होते हैं । इनमें ४ प्रधान हैं - १२ गौरा हैं । अध्वर्यु - होता - उद्गाता ब्रह्मा ये चार प्रधान हैं । इनको ' चतुर्होतारः ' कहा जाता है । इन चारों के तीन - तीन नायब होते हैं- प्रतिनिधि होते हैं । ये बारहों होत्रका कहलाते हैं । - इस प्रकार प्राकृतिक सोमयज्ञ में यही सोलह ऋत्विक हैं । वायु अध्वर्यु है । अग्नि होता है । आदित्य उद्गाता है । चन्द्रमा ब्रह्मा है अतएव ' ब्रह्मा कृष्णाय नोऽतु ' यह कहा जाता है । इनमें से अवशिष्ट १२ ऋत्विक् होत्रा कहलाते हैं । इनमें भी अच्छावाक्- नेष्ट्रा प्रतिहर्त्ता आग्नीध ये चार छोड़ दिए जाते हैं । अवशिष्ट प्राठ होत्रका रहते हैं । बंस, यही आठों ' धिष्ण्याग्नि और कहलाते हैं । जहाँ पर रश्मियों के बीच सोम रहता है वहाँ अच्छावाक् नाम का गन्धर्वप्राण रहता ' है । प्रकृत में इस सारे प्रपञ्च से यही बतलाना है कि सोम, सूर्य्य रश्मियों के बीच में भरा रहता है । वे रश्मियाँ श्राग्नेयत्वात् हिरण्यमयी हैं । वे प्राणदपानत् क्रिया करती रहती हैं । उनके प्रांतभाग के प्राण का नाम धिष्ण्या है | यही सोमरक्षक कहलाते हैं । यहीं प्रान्तस्थित प्राण सोम को अग्नि में डाला करते हैं, आहुतियाँ दे रहे हैं । गन्धर्वप्राण - अग्निसोम की मिश्रित अवस्था का ही नाम है । बीच में शुद्ध सोम रहता है- दोनों और शुद्ध प्रग्नि रहता है । प्रान्तभाग में अग्नि- सोम मिले रहते हैं - इसी का नाम गन्धर्वप्राण है । यही मध्यस्थ सोम - अग्नि सम्बन्धेन जला करता है उसी का यह प्रकाश है । प्रत्येक
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण विष्ण्या ब्राह्मणे कर्म्म में दीक्षा - व्रत और तप यह तीन सीगे ( विभाग ) होते हैं । अधिकार प्राप्ति को दीक्षा कहते हैं । जो मनुष्य जिस काम में अधिकृत हो जाता है - वह दीक्षित कहलाता है । तुम्हारे जिम्मे आज से यह काम है- यह जो अधिकार प्राप्ति है - इसी का नाम दीक्षा है । इस अधिकार के मिले बाद उसे सुरक्षित रखने के लिए जो नियमाचार सेवन है उसी का नाम ' व्रत ' है । ' यज्ञोपवीत होने से पहले ब्राह्मण अदी-क्षित था अतएव वह चाहे जहाँ जा सकता था - चाहे जो खा सकता था परन्तु यज्ञोपवीत धारण करते ही वह दीक्षित बन जाता है । श्राज से उसे ब्राह्मणत्व का अधिकार मिलता है । यही दीक्षा है । इस अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए उसे नियमपालन करना पड़ता है । न वह चाहे जो खा सकता है - न चाहे जिसका स्पर्श कर सकता है । यदि करेगा तो वह अपने अधिकार से च्युत हो जाएगा । तात्पर्य यही है कि दीक्षा - रक्षार्थ जो नियमादि का परिपालन करना है - वही ' व्रत ' कहलाता है । उस अधिकार की यावज्जन्म स्थिति बनी रहे यही तप है अर्थात् अधिकार सत्ता बनी रहे, इसका नाम हीं तप है । इसकी सत्ता जिससे बनी रहे वही व्रत है । अधिकार स्थिति का नाम तप है । जो व्रतभङ्ग कर देता है - उसका तप अर्थात् अधिकार क्षीण हो जाता है । इस प्रकार यच्चयावत् कम्मों में दीक्षा व्रत - तप तीन भाग रहते हैं । प्रकृति - मण्डल में सोम - दोनों रश्मियों के बीच में रहता है । ये दोनों रश्मियाँ दीक्षा - तप स्थानीय हैं । दीक्षा - तपरूप रश्मियों के बीच में सोम प्रतिष्ठित है । यदि ये दोनों इसके ओर - छोर में न रहें तो सोम उसी समय जमीन पर गिर पड़े । सोम पर दीक्षा और तप का अधिकार है । सोम वह रख सकता है - सोमयाग वह कर सकता है - जो कि दीक्षा और तप को सुरक्षित रक्खे, क्यों कि प्रकृति में दीक्षा - तप से ही सोम सुरक्षित है । बस उसी दीक्षा और तप को आत्मसात् करने के लिए मानुष्य - यज्ञ में दीक्षणीयेष्टि और उपसदिष्टि की जाती है । इस दीक्षरणीयेष्टि और उपसदिष्टि के बीच में सोम खरीदा जाता है, क्योंकि प्रकृति में दोनों के बीच में ही तो सोम है । इस दीक्षा और तप को हमारे पास लाने वाली गायत्री है । पृथिवी से सूर्य्यं तक व्याप्त होने वाली जो श्रग्नि है - वही गायत्री है । दीक्षा - तप से दिव्य भाव को आत्मसात् किया जाता है । दिव्यभाव सूर्य से अर्थात् सूर्य्य रश्मियों से आता है । जब तक हमारे आत्मा में दिव्यभाव प्रविष्ट नहीं होता तब तक हम सोम को रख नहीं सकते । इसके लिए आग्ना वैष्णव एकादशकपाल पुराडाश रूपा दीक्षणीयेष्टि करनी पड़ती है । दीक्षा से श्रात्मा पवित्र हो जाता है । पार्थिव गायत्री वाक् जब सोम लेने के लिए दोनों रश्मियों में प्रविष्ट होती है तो रश्मियाँ विशक-लित हो जाती है । इसी को वैध उपायों से यजमान आत्मसात् करता है । दीक्षा - तप सोमयाग के बिना नहीं हो सकता एवं दीक्षा तप स्वरूप दिव्यभाव सूर्य रश्मियों से आता है एवं उसको लाने वाला पार्थिव गायत्री छन्द है । यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" हिरण्मय्योर्ह कुश्योः ( श्रायुधयोः ) अन्तरवहितः ( प्राच्छन्तः ) आस । ते ( कुश्यौ ) क्षुरपवी ( क्षुरधारे इव तीक्ष्णाने ) निमेषं निमेषं ( सर्वदा ) अभि-सन्धत्तः ( यथा s न्यो नापहरेत् एवं रक्षत इत्यर्थः ) दीक्षातपसौ हैव तेऽप्रासतुः तं ( सोमम् ) एते गन्धर्वाः सोमरक्षा: ( प्रान्तस्था: सौम्य प्रारणाः ) जुगुपुः | - ( तें के इत्युच्यते ) इमे धिष्ण्याः - इमा होत्रा: " ॥ ९ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणे धिष्ण्या ब्राह्मण गायत्री ने झपट्टा मार कर एक कुशी तोड़ डाली एवं उसे पृथिवी की ओर फेंक दिया । देवताओं ने उससे दीक्षा ली ---" तयोरन्यतरां कुशीमाचिच्छेद । तां देवेभ्यः प्रददौ । सा दीक्षा । तया देवा श्रदीक्षन्त " ॥१० ॥
इसके बाद दूसरी कुशी को छेद डाला एवं उसे भी जमीन पर डाल दिया । उससे देवताओं ने तप किया । उपसद ही तप कहलाता है । पार्थिव देवताओं में पहले दीक्षा - तप स्वरूप सौर- प्राण श्रा जाता है-तभी सोम प्रतिष्ठित् होता है । पार्थिव देवता सदा दीक्षित एवं तपोयुक्त रहते हैं । वे कभी अपने सत्य-मार्ग को नहीं छोड़ते हैं प्रतएव इनमें सोम श्राता है । हमें भी सप्तमर्यादा में ही रहना चाहिए तभी हम सोमयज्ञ के अधिकारी बन सकते हैं- यही तात्पर्य है-“ अथ द्वितीयां कुशीमाचिच्छेद । तां देवेभ्यः प्रददौ । तत्तपः । तथा
देवास्तप उपायत् - उपसदः । तपो ह्युपसदः " ॥११ ॥
गायत्री ने सोमाहरण करते समय खदिर को साधन बना कर तद्द्वारा सोमभक्षण किया अत-एव खादन साधनत्वात् यह वृक्ष खदिर ' कहलाया, जो कि लौकिक भाषा में खैर नाम से प्रसिद्ध है । ' खत् - इरा यस्य ' यही खदिर की व्युत्पत्ति है । इरा रस को कहते हैं । चोट करने वाला अति निबिड़ ठोस जो रस है उसी का नाम ' खदिर ' है । सोमाख्यानब्राह्मण में बतलाया गया है कि जगती और त्रिष्टुप् दोनों ही सोम न ला सकीं । केवल गायत्री ही सोम लाने में समर्थ हुई । इसका कारण यही है कि पृथिवी का जो गायत्र अग्नि है - वह खदिर स्वरूप है अर्थात् प्रबल वेग से प्रज्वलित रहता है । गायत्र तेज वस्तु को फाड़ देता है अतएव इससे रश्मियाँ विदीर्ण हो जाती हैं और सोम जमीन पर गिर पड़ता है । चूंकि यह अतिप्रबल है अतएव -" खदिरेण ( खदिर साधनेन ) ह सोममाचखाद " । यह कहा जाता हैं एवं जो खदिर का वृक्ष है उसमें जो कठोरता दीखती है वह इसी सोम की महिमा है । खैर की लकड़ी बहुत ही मजबूत होती है इसका एकमात्र कारण सोम ही है । सोम से ही इसका रस गाढा हो गया प्रतएव ' खत् इरा यस्य ' इस व्युत्पत्ति से इसे खदिर कहा जाने लगा । इसी को साधन बना कर अर्थात् काठिन्य को - तीव्रता को साधन बना कर गायत्री सोम लाई एवं यही गायत्री इसमें रहती है इसीलिए इसे खदिर कहते हैं एवं यह स्वयं ध्रुव है इसलिए भी इसे खदिर कहते हैं । चूँकि प्रकृति - यज्ञ में खदिर से अर्थात् प्रबल ज्वाला युक्त- दृढ़ तेज से सोमापहरण हुआ था एवं उसी सोम का यह खैर वृक्ष बना हुआ है अतएव सोमयज्ञ में उत्तरावेदि के पूर्व २ ९ पर जो यूप गाड़ा जाता है वह भी खैर का ही होना चाहिए एवं स्पय ' भी खदिर ही का बनाना चाहिए-१. ' खदिर की लकड़ी से निर्मित यज्ञीय उपकरण विशेष, जो कि तलवार के आकार का होता है । [ १६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण " खदिरेण ह सोममाचखाद । तस्मात् खदिरो यदेनेनाखिदत् । तस्मात् खादिरो यूपो भवति । खादिर: स्पयः " । मैत्रावरुण- अच्छावाक् एवं ग्रावस्तोता तीनों गन्धर्व यहीं रहते हैं । इनमें सबसे नजदीक अच्छा-वाक् नाम का ही सौम्य प्राण रहता है । पार्थिववाक् यहीं से इसी अच्छावाक् के पास से सोम ले जाती है । यही गन्धर्व सोम की रक्षा करने वाले हैं । इनमें से जिस समय अच्छावाक् नाम के गन्धर्व - प्रारण की सत्ता थी उस समय गायत्री सोम ले गयी । अच्छावाक् के पहरे में से गायत्री सोम ले गई अतएव अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद न रहने के कारण ही प्रच्छावाक् अपने अधिकार से प्रतिष्ठा- पद से च्युत हो गया । यही कारण है कि सोम यज्ञ में जब सदीमण्डप में होत्रक जाने लगते हैं तो अच्छावाक् को सबसे पीछे प्रविष्ट होना पड़ता है- क्योंकि प्रकृति यज्ञ में अच्छावाक् को निकृष्ट समझा जाता है । हमने बतलाया था कि सोम और श्रग्नि के मेल से ही गन्धर्व - प्राण उत्पन्न होता है । जिस स्थान से गायत्री सोम ले आती है उस स्थान का जो अग्निमय सौम्य प्राण है - वह अच्छावाक् कहलाता है । जब यहाँ से सोम निकल जाता है तो गन्धर्व - प्रारण अच्छावाक् की शक्ति जाती रहती है । सोम ही तो इसकी प्रतिष्ठा हैं ।. सोम चूंकि पृथिवी में आ जाता है अतएव अच्छावाक् सार - शून्य हो जाता है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर कहते हैं -" अच्छावाकस्य हैनं गोपनायां ( रक्षायाम् ) जहार । ( अच्छावाकस्यो errer- यदा सोमरक्षकेषु मध्ये रक्षितवान् तदा गायत्री सोमं जहार ) सोऽच्छा-arris हीयत ( निकृष्टोऽभूत ) ” ॥१२ ॥
इस प्रकार यद्यपि अच्छावाक् स्व - प्रतिष्ठा से सर्वथा गिर चुका था किन्तु इन्द्र और श्रग्नि ने उसे सम्भाल लिया । उसी गन्धर्व पङ्क्ति में उसे वापिस प्रविष्ट कर दिया । इसका एकमात्र कारण प्रजान की प्रजाति ही थी । सृष्टिक्रम बन्द न हो जाए, प्रजोत्पत्ति क्रम बन्द न हो जाए, अतएव इन्द्राग्नि ने अच्छावाक् को पुनः अपने उसी पद पर प्रतिष्ठित कर दिया । अग्नि से पार्थिवसोम अभिप्रेत है - इन्द्र से पारमेष्ठ्य सोम अभिप्रेत है । यद्यपि अच्छावाक् नामके गन्धर्व - प्राण में से सोम निकल जाता है किन्तु थोड़े समय के बाद ही वह सोम द्युलोक से आ कर फिर इसमें भर जाता है । पृथिवी में जो सोम चला गया है वह भी सौर - रश्मियों द्वारा चूस लिया जाता है एवं ऊपर से भी सोम आ जाता है इस सोम के आते ही अच्छावाक् फिर प्रतिष्ठित हो जाता है । यदि सोम चला ही जाए, फिर आए ही नहीं तो आगे का सारा सृष्टि - क्रम बन्द हो जाए प्रतएव जितना विसर्ग होता है उतना ही आदान भी होता है इसलिए ' श्रहमन्नमन्नमदन्तममि ' कहा जाता है । अच्छावाक् से सोम जाता श्रवश्य है परन्तु फिर भर जाता है । वापस सोम द्युलोक और पृथिवी- लोक से ही श्राता है एवं दोनों के अधिष्ठाता अग्नि इन्द्र हैं । चूंकि इन्हीं के द्वारा अच्छावाक् की प्रतिष्ठा रहती है अतएव अच्छावाक् को ' ऐन्द्राग्न ' भी कह दिया जाता है । जिस प्रकार प्रशस्ता को मैत्रावरुण कहा जाता है तथैव अच्छावाक् को ' ऐन्द्राग्न ' कहा जाता है । बस इसी प्रकृतिक विज्ञान को अलङ्कार रूप से बतलाते हुए कहते हैं-[ १६६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मणे " तमिन्द्राग्नी - श्रनुमतनुताम् । प्रजानां प्रजात्यै । ( सृष्टिक्रम रक्षरणाय तं प्रतिष्ठायुतं - सोमनृदन्यं अतएव च श्रप्रतिष्ठितमच्छावाकं इन्द्राग्नी सन्तानम-नुप्रवेशमकुरुताम् ) तस्मादैन्द्राग्नोऽच्छावाकः " ॥१३ ॥
प्रसङ्गागत लौकिक व्यवहार बतलाने के अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि प्रकृति - यज्ञ में जैसे दीक्षित गन्धर्व सोम की रक्षा करते हैं एवं मानुष्य यज्ञ में भी दीक्षित ऋत्विक् जैसे सोमवल्ली की रक्षा करते हैं तथैव उसी सोम से जिनका आत्मा बना हुआ है - ऐसे राजाओं की दीक्षित ब्राह्मण रक्षा करते हैं । राजा पर कोई दूसरा मनुष्य हमला न कर बैठे - दीक्षित ब्राह्मण इस बात की निगरानी किया करता है । दीक्षितब्राह्मण से रक्षित होने में ही - राजा का राजत्व सुरक्षित रहता है । सारा संसार मूर्द्धाभि-षिक्त राजा और अनूचान दीक्षित ब्राह्मण- इन दो खम्भों पर ही खड़ा है । ज राष्ट्र मूर्द्धाभिषिक्त राजा है एवं उस राजा की श्राधि - व्याधि - उपाधि से रक्षा करने वाला अनूचान दीक्षितब्राह्मण है वह राष्ट्र कभी कष्ट नहीं पा सकता । यह सब दारोमदार दीक्षित ब्राह्मण पर है । यदि यह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद न रहेगा तो राजा उसी समय प्रतिष्ठा से च्युत हो जाएगा । अतएव दीक्षित को चाहिए कि वह सदा बड़ी सावधानी से राजा की हिफाजत रक्खे । उसे आधि - व्याधि से बचाता रहे । जिसकी रक्षा में से जो वस्तु निकल जाती है वह अपने अधिकार से च्युत हो जाता है - जैसे कि अच्छावाक् हो गया था अतएव जिस दीक्षित को अपना अधिकार सुरक्षित रखना हो एवं साथ ही में राजा को सुरक्षित रखना हो - वह सदा अपने काम पर रहे-" तस्माद् दीक्षिता राजानं गोपायन्ति । नेनोऽपहरानिति तस्मात् तत्र
सुगुप्तं चिकीर्षेत् । यस्य ह गोपनायामपहरन्ति । हीयते ह " ॥ १४ ॥
जिस प्रकार प्रनूचान दीक्षित - ब्राह्मण राजा की रक्षा करता है तथैव ब्रह्मचारी लोग गुरु की रक्षा करते हैं अतएव यह ' धात्र ' कहलाते हैं । गुरुजी सदा पढाने में रहते हैं । ऐसा न हो कि उनके घर को कोई तोड़ जाए या उनके पशु कोई चुरा ले जाए अथवा ऐसा न हो कि गुरुजी किसी तरह बीमार पड़ जाएँ । इन सब बातों से शिष्य लोगों को गुरुजी को बचाते रहना चाहिए । जो विद्यार्थी इस गुरु - सेवा से विमुख होता है - उसकी लोक में निन्दा होती है । वह प्रतिष्ठा से च्युत हो जाता है एवं मूर्ख का मूर्ख रह जाता है-" तस्माद्ब्रह्मचारिण श्राचार्यं गोपायन्ति । गृहान् पशून्नेनोऽपहरानिति तस्मात् तत्र सुगुप्तं चिकीर्षेद् - यस्य ह गोपनायामपहरन्ति । हीयते है " । प्रसङ्गागत लौकिक उपदेश दे कर पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । गायत्री द्वारा अपहृत सोम से सुपर्णी देवताओं के कर्ज से मुक्त हो गई । कद्रू की यही तो शर्त थी । प्रतिज्ञानुसार जब सुपर्णी ने सोम मंगवा कर पार्थिव देवताओं को दे दिया तो वह दासीत्व से मुक्त हो गई । पार्थिव वाक् अग्निमयी [ २०० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं धिष्ण्या ब्राह्मण है | यह २१ ( ग्रहण ) तक इसी सोम की बदौलत जाती है । यदि इसमें सोमाहुति न होती तो यह २१ तक हर्गिज नहीं जा सकती थी । पृथिवी से ऊपर आजाद हो कर घूमना - यह इसी सोमाहुति का प्रताप है । सोमाहुति से ही सप्तदशस्थ अग्नि प्रज्वलित हो कर २१ तक व्याप्त हो जाता है । पिण्ड मृत्युधर्मा है । वामण्डल अमृत है । महिमा कभी नहीं मरती । बस, यही सुपर्णी का दासीपने से छुटकारा पाना है । सोम को आत्मसात् करने से वाक् का बन्धन छूटा था प्रतएव तब से ' पुण्यलोक ईजान ' यह कहा -वत प्रचलित हो गई । जो ईजान है अर्थात् सोमात्मसात् करने वाला है - सोमयज्ञ करने वाला है, वह पुण्यलोक में स्वर्गलोक में चला जाता है-" तेनैतेन ( अपहृतसोमेन ) सुपर्णो देवेभ्य श्रात्मानं निरक्रीणीत । तस्मादाहुः पुण्यलोक ईजान इति " ॥ १५ ॥
पुरुष मृत्यु से कर्ज लेकर ही पैदा होता है, जायमान मृत्यु से ऋण लेकर ही पैदा होता है । श्रात्मा अमृतस्वरूप है । यह प्रातिस्विक रूपेण पृथिवी में तब तक जन्म नहीं ले सकता जब तक कि इसके साथ भूत का सम्बन्ध न हो । पार्थिवभूत को ले कर ही यह जन्म ले सकता है । पार्थिवभूत विनाशी है श्रतएव हम इन्हें मृत्यु कहने के लिए तय्यार हैं । हम जब उत्पन्न होते हैं तो इनका कर्ज श्रवश्य ही लेना पड़ता है । यदि इनसे ऋण न लिया जाएगा तो जन्म ही न होगा अतः हम अपने को मृत्यु का पार्थिव भौतिक पदार्थों का - कर्जदार कहने के लिए तय्यार हैं । हमारा कर्त्तव्य है कि हम इस ऋण को चुकाएँ । इसका एकमात्र उपाय यज्ञ ही है । सौर - पदार्थ पृथिवी में श्री कर कैद हो गए हैं । उन्हें अग्नि द्वारा विश-कलित कर देने से वे सम्बन्ध से हट कर, स्वतन्त्र हो, अपने लोक में जा विराजते हैं । यही उनका ऋण चुकाना है । इस ऋण को चुकाने के लिए अवश्य ही यज्ञ करना चाहिए । इसी ऋण को देवऋण भी कहा करते हैं । जिस प्रकार सोम की पार्थिव देवताओं में आहुति दे कर सुपर्णी कर्ज से मुक्त हो गई तथैव जो ज्योतिष्टोम यज्ञ करता है - वह मृत्यु के मुख से अपने आत्मा को निकाल लेता है उससे ऋण हो जाता है । ज्योतिष्टोम करने वाले का श्रात्मा जन्म - मरण के बन्धन से अलग हो स्वर्ग में चला जाता है । मृत्यु -बन्धन विमोचनार्थ ब्राह्मण को अवश्य ही यज्ञ करना चाहिए । यही इस प्रपञ्च का सारांश है । " ऋणं ह वै पुरुषो जायमान एव मृत्योरात्मना जायते । स यद्यजते यथैव तत्सुपर्णो देवेभ्य आत्मानं निरक्रीणीत - एवमेवैष एतत् मृत्योरात्मानं निष्क्रीणीते ॥१६ ॥
फिर प्रकृत का अनुसरण करते हैं । इस प्रकार गायत्री द्वारा आगत सोम से देवताओं ने यज्ञ किया । गायत्री द्वारा सोम जब पृथिवी लोक में प्राया तो उसके साथ ही सोम की रक्षा करने वाले गन्धर्व भी आ गए । उन्होंने श्रा कर देवताओं से कहा कि हे देवताओ! सोम हमारी वस्तु है अतएव इस सोम यज्ञ में हमारा हिस्सा भी नियत करो । तुम्हारे यज्ञ में हमें भी शामिल करो । आप हमें यज्ञभाग से एकदम दूध में से मक्खी की तरह मत निकालो । आखिर सोम हमारी वस्तु है श्रतएव हम फिर उसी [ २०१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण बात को दोहराते हुए आपसे कहते हैं कि इस यज्ञ में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए । सोम भूत है - बिना प्रारण के' भूत नहीं रहता, जैसा कि हमने ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया है । ऐसी अवस्था में पृथिवी में प्रगत सोम के साथ गन्धर्व - प्रारण का आना सर्वथा अनिवार्य है । " तेन ( प्रागतेन सोमेन ) देवा: ( पार्थिवाः स्तोम्याः यज्ञियाः प्राण-देवा ) अयजन्त । तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा ( गन्धर्वा ) अन्वाजग्मुः । तेऽन्वा-गत्याब्रुवन् अनु नो यज्ञ प्राभजत ( नः श्रस्मिन् यज्ञे श्रन्वाभजत ) मा नो यज्ञा-दन्तर्गात ( अस्मान् यज्ञभागादन्तरितान् मा कार्ष्ट ) अस्त्वेव नोऽपि यज्ञे भाग इति ॥१७ ॥
देवताओं ने कहा कि अच्छा, यदि हम तुम को यज्ञ में शामिल कर लें तो इससे हमारा क्या फायदा होगा? गन्धर्वो ने कहा- जिस प्रकार द्युलोक में हम सोम की रक्षा करते हैं तथैव यहां भी इस गत सोम की रक्षा करेंगे । जो काम हम द्युलोक में करते थे वही यहाँ भी करेंगे । वास्तव में ठीक है । गन्धर्व प्राण से ही तो सोम - स्वरूप प्रतिष्ठित रहता है । यदि गन्धर्व प्राण न हों तो सोम ही उच्छिन्न हो जाए । प्रारण ही भूत का जीवन है-" ते होचुः - कि नस्ततः स्यादिति । यथैवास्यामुत्र गोप्तारोऽभूमैवमे-वास्य ( सोमस्य ) अपि इह गोप्तारो भविष्याम इति ॥ १८ ॥
देवताओं ने गन्धर्वो की इस बात को स्वीकार कर लिया । आप सोमक्रयण हैं - यह कह कर इन गन्धर्वो का अन्वादेश कर लेते हैं अर्थात् ' एते युष्मभ्यं भागः ' यह कह कर उन गन्धर्वों को भी इस यज्ञ में शामिल करते हैं । यद्यपि सोम गायत्री द्वारा खरीदा जाता है - तथापि प्रकृति यज्ञ में प्रागत सोम के रक्षक गन्धर्व प्रारण थे एवं हैं । तथैव इस वल्ली सोम के रक्षक गन्धर्व - प्राणात्मायुक्त मनुष्य गन्धर्व थे । ये मनुष्य गन्धर्व ईरान में रहते थे एवं सारा सोम इन्हीं के अधिकार में था । यही सोम की रक्षा करते थे । जिस किसी को यज्ञ करना होता था वह इन्हीं गन्धर्वों से सोम खरीदता था । अतएव ये मनुष्य- गन्धर्व सोमकरण कहलाते थे । इसी मनुष्येतिवृत्त की प्रोर इशारा करते हुए याज्ञवल्क्य कहते. हैं- ' सोमकरणाव इति । ' आप सोमक्रयण हो । हम आप से ही सोम खरीदेंगे । प्रकृति - देवता इन्हें तृतीय सवन में ' सोमक्रयण: कह कर आहुति दिया करते थे 1 । तथैव प्राजा यह यजमान भी ' सोमयायः-तेभ्यः एते भागाः ' यह कह कर ही आहुति देता है । " तानेभ्य एतत् सोमकरणाननुदिशति । ( सोमः क्रीयते यैर्गन्धर्वादिभिः ते सोमकयरणाः । वः युष्माकं तान् भागान् एतस्मिन् सोमक्रयकाले एभ्यः गन्धर्वे -भ्यः धिष्ण्यरूपेणावस्थितेभ्यः - अनुदिशेत् एते युष्मभ्यं भागा - इति ब्रूयात् ) " । [ २०२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण सोमयाग में, सदोमण्डप में जो धिष्ण्याग्नियाँ है वे ही गन्धर्व - स्थानीय । उन्हें सोमकयरणावः कह कर आहुति देनी चाहिए - यही तात्पर्य है । प्रकृतियज्ञ में प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवन तथा सायं सवन- ये तीन सवन होते हैं । तीनों में से तृतीय सवन में पृथिवी में आगत प्राण- गन्धर्वों में अन्तरिक्ष के घृत की आहुति होती रहती है । सोममय तो वे स्वयं ही हैं अतएव उनमें सोम की आहुति तो क्या होगी-इनमें तो अन्तरिक्ष में रहने वाले घृत की ही आहुति होती है । इसी विज्ञान को बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं-देवताओं ने गन्धर्वों से कहा कि आप लोगों को तृतीय सवन में घृत की आहुति मिलेगी । सोम्या-हुति को नहीं मिल सकती । श्रापका जो सोमपीथ है अर्थात् आपका जो पातव्य सोम है- सोमपान है, वह अपहृत है । आप से सोम छीन लिया गया है अतएव आपको सोमाहुति नहीं दी जा सकती । श्रतः तृतीय सवन में इनको घृताहुति ही प्राप्त होती है - सोमाहुति नहीं । जिस घृताहुति से तृरणसमूहों से युक्त freera का व्याघार किया जाता है - बस तृतीय सवन में यही घृताहुति इनको मिल जाती है । तात्पर्य यही है कि इन गन्धर्वो के लिए घृत मात्र की आहुति दी जाती है, सोमाहुति नहीं दी जाती क्यों कि प्रकृति में भी ऐसा ही होता है एवं भुवन त्रिलोकी के देवता भी गन्धर्वो को सोमपान में शामिल नहीं करते थे--. " प्रथैनान् ( गन्धर्वान् ) अब्रुवन् - तृतीयसवने वो घृत्या s हुतिः । प्राप्स्यति न सौम्बाऽपहृतो हि युष्मत्सोमपीथः । तेन ( कारणेन ) सोमाहुति नार्हथ इति । सैनानेषा तृतीयसवन एव घृत्याहुतिः प्राप्नोति न सौम्या । यच्छालाकै: ( तृरण-समूहैः विहृतान् ) धिष्ण्यान् व्याधारयति " ॥१ ९ ॥ इसीका स्पष्टीकरण करते हैं- अग्नि में जो प्राज्याहुति डालेंगे वह आहुति वास्तव में सच है - यह अग्नि में प्राहुत घृत वायु - रूप में परिणत हो- प्रन्तरिक्षस्थ तृप्त करता है-तुम्हें तृप्त कर देगी । गन्धर्व - प्राण को ही " अथ यदग्नौ होष्यन्ति तद् ( आज्यं ) वः ( युष्मान् ) प्रविष्यति ( तर्प-यिष्यति ) " । तो बस, आज इस सोमयज्ञ में अध्वर्यु श्रग्नि में प्राज्य की आहुति डालता है, उससे गन्धर्वों को ही तृप्त करता है-" स यदग्नौ जुह्वति तदेनान् प्रवति - इति " । परन्तु गन्धर्व इतने से ही प्रसन्न न हुए । गन्धर्व सोमप्रिय थे । आहुति न हो, तो सोम का सम्बन्ध वे अपने साथ अवश्य ही चाहते थे, अतएव देवताओं ने उनसे कहा कि तुम्हारे ऊपर सोम को रखते हुए [ २०३ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मणं ऋत्विक् लोग जो प्रचार करेंगे अर्थात् तुम्हारे ऊपर सोमांशु रख कर जो प्राहुति देने उत्तरावेदि के पास ले जाएँगे - यह सोम - संसर्ग श्रापको तृप्त कर देगा । “ यद्वः सोमं बिभ्राते उपर्युपरि चरिष्यन्ति ( सोमं धार्यमाणाः सन्तो चरिष्यन्ति ऋत्विगः ) तद्वोऽविष्यति ” । देवताओं की आज्ञानुसार प्रकृति यज्ञवत् वह अध्वर्यु इन छहों धिष्ण्याग्नियों के ऊपर सोम रख कर प्राहुति के लिए ले जाता है - ऐसा करता हुआ, सोम से गन्धर्व - स्थानीय धिष्ण्याओं को तृप्त करता है । तात्पर्य यही है कि सदोमण्डप के बीच में जो ६ धिष्ण्याग्नि बनते हैं - वे गन्धर्व - स्थानीय हैं । उपांशु-सवन के लिए श्रध्वर्यु जब सोम की फलियों को सदोमण्डप से पूर्व की ओर हविर्धान में ले जाता है तो उसे चाहिए कि उन फलियों को धिष्ण्यात्रों से सम्बद्ध कर, उन पर थोड़ी देर रख कर, बाद में ले जाए । इससे ये गन्धर्व तृप्त हो जाते हैं-" स यदेतान् सोमं बिभ्रत उपर्युपरि चरन्ति । तदेनान् प्रवति " । व को चाहिए कि वह विष्ण्याओं के समीप जाकर उनका अतिक्रमण न करे । सोम का सारा काम अध्वर्यु ही करता है । अध्वर्यु ही यहाँ से ग्राहवनीय के पास ले जाता है एवं श्रध्वर्यु ही आहुति देता है । इस अध्वर्यु की ओर आशामुखी बन कर ये धिष्ण्या मुँह फाड़े प्रतीक्षा किया करते हैं । ऐसी अवस्था में यदि अध्वर्यु इन पर बिना सोम रक्खे - इनका अतिक्रमण कर जाएगा तो उसे अग्नि जला डालेगा । एकादशकल अग्नि स्वरूप पशुपति रुद्र देवता अभिमान करेगा हर तरह से इसे पीड़ा पहुंचाना चाहेगा अतएव अध्वर्यु को यदि हविर्धान मण्डप में - उत्तरवेदि में जाना हो तो धिष्ण्या से बच कर आग्नीधीय के उत्तर में हो कर ही जाए । तात्पर्य यही है कि वे गन्धर्व सोम - रक्षक हैं अतएव उनका मन प्रारण वाक् सदा सोम की ओर लगा रहता है । ये सदोमण्डपस्थ छहों धिष्ण्या गन्धर्व हैं श्रतः अध्वर्यु जब सोम की फलियों को उपरवों के पास ले जाता है तो पहले इन छहों पर रख देता बाद में ले जाता है परन्तु सोम तो एक ही बार ले जाया जाता है एवं इसे बार - बार सदोमण्डप में आना पड़ता है । यही सोम का का है अतएव गन्धर्वो की दृष्टि इसी पर लगी रहती है । ऐसी अवस्था में यदि बिना सोम के अध्वर्यु इधर हो कर निकल जाएगा तो उसका अनिष्ट हो जाएगा अतः सोम ले जाने के बाद यदि उसे उत्तर-शाला में जाने का काम पड़े तो इधर से न जाए- प्रपितु आग्नीध्रीय से उत्तर में हो कर जाए । " तस्मादध्वर्युः समया ( समीपेन ) धिष्ण्यान्नातीयादध्वर्युहि सोमं बिर्भात । तमेते व्यात्तेन प्रत्यासते ( विवृतेनास्येन प्रतीक्ष्य निवसन्ति ) सः ( धिष्ण्यानति-क्रामन् - अध्वर्युः ) एतेषां व्यात्तमापद्येत तमग्निर्वा भिदहेद्यो वाऽयं देवः पशूना-मीष्टे स वा हैनमभिमन्येत तस्माद्यद्यध्वर्योः शालायामर्थः स्यात् - ( प्राग्वंशे शालायां गमनं प्रयोजनं भवेत् ) उत्तरेणैवाग्नीध्रीयं सञ्चरेत् ॥ २० ॥
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