Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 31–40
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण तदन्तर ऋत्विक् शम्या ( कीला ) तथा स्फ्य ( काष्ठ की बनी हुई तलवार ) हाथ में लेता है । महावेदी के उत्तर भाग में उत्तरवेदी के निर्माण के लिए एक चतुष्कोण गर्त से जिसे " चात्वाल " कहा जाता है, मिट्टी लाई जाती है । उस चात्वाल का स्थान बतलाते हैं । हविवेदी के चारों ओर विभिन्न दूरियों पर शंकु गाड़ जाते हैं । इनमें से जो पूर्वार्ध भाग वाला उत्तरार्ध्य शङ्क है उससे ३ विक्रम पश्चिम की ओर ऋत्विक् ( अध्वर्यु ) आक्रमरण । चक्रमण ) करता है और वहाँ एक चिह्न बना देता है । यही " चात्वाल " का स्थान है एक किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य के अनुसार महावेदी से उत्तर में यज्ञ का कूड़ा डालने जहाँ के ठीक लिए समझें खड्डा बनाया जाता है उससे आगे उत्तरार्ध्य शङ्क से पश्चिम की श्रोर वहीं चात्वाल बना लें ॥२६ ॥
अध्वर्युमहावेदी के दक्षिण श्रोणिरूप प्रान्तभाग से सटा कर उत्तरमुख कर के शम्या को रखता है और वहाँ चात्वाल निर्मारण के लिए परिलेख ( चिह्न ) बना लेता है । चात्वाल के लिए परिलेख करता हुआ ' तप्तायनीमेऽसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् भूमि आप मेरी तप्तायनी हो; दुःखों से संतप्त प्राणियों का आश्रय आप ही हो । दुःख संप्तत प्राणी आप ही का आश्रय ले कर चलता है ॥ २७ ॥
तदनन्तर अध्वर्यु उत्तराभिमुखी शम्यारेखा से पूर्व की ओर उत्तरमुख कर शम्या रखता है । और वहाँ भी चिह्न बनाता हुआ ' वित्तायनी मेऽसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् हे भूमि! सम्पत्तिशाली पुरुषों की आश्रय भी आप ही हैं । इसी भूमि पर धनी पुरुष रहते हैं || २८ || उत्तरमुख वेदी से सटा कर उत्तर की ओर शम्या परिमारण की दो रेखाएँ खींचकर उसी वेद के अन्त में पूर्वाभिमुख कर के शम्या रखता हुआ ' अवतान्मा नाथितात् ' रक्षा मन्त्र करे का । उच्चारण करता हुआ वहाँ चिह्न बना कर कामना करता है कि यह भूमि मेरी मुझे किसी से याचना न करनी पड़े ॥ २६ ॥
तदनन्तर उत्तर भाग में पूर्वाभिमुख कर शम्या को रख देता है और उस स्थान पर ' अवतान्मा व्यथितात् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ चिह्न बनाता हुआ याचना करता है कि धनादि के विषय में लाभ के उपाय को न जानता हुआ मैं दुखी दरिद्र न बनूँ || ३० ॥ अध्वर्यु पूर्वनिर्दिष्ट रीति से शम्या से भू - प्रदेश को नाप कर चात्वाल बना कर, वहाँ से महावेदी में उत्तरवेदी के निर्माण के लिए अग्नि के नाम बोलता हुआ ही चात्वाल से मिट्टी लाता है । क्यों कि होम करने के लिए देवताओं ने जिन अग्नियों का होता रूप से वरण किया था वे रूठ कर इस पृथिवी की ओर ही दौड़ी थीं । उनमें एक तो इस पृथिवी-लोक में ही प्रवेश कर गयी थी और दो अग्नियाँ इस पृथिवी के उस पार चली गयी थीं । इन तीनों का मूल कारण पृथिवी है । अतः मिट्टीरूप पृथिवी के हरण से इन तीनों का [ १३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्मारण ब्राह्मण हरण हो जाता है । तीनों का नाम इसी भावना से लिया जाता है कि हम मिट्टी नहीं ला रहे हैं, आप तीनों अग्नियों को ला रहे हैं । एतत्सम्बन्धी विस्तृत रहस्य का प्रतिपादन हिन्दी विज्ञान - भाष्य में स्पष्ट रूप से कर दिया गया है ॥ ३१ ॥
वह ध्वर्यस्य ( काष्ठनिर्मित तलवार ) से उस मिट्टी को खोदता है । खोदते समय ' विदेदग्निर्नभोनामाग्निङ्गिर युना नाम्ने हि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् हे नभो नाम के अङ्गिरा! आप में नभो नाम का अग्नि सम्मिलित हो तथा श्राप में आयु का अग्निसम्मिलित हो । नभस् अन्तरिक्षलोक की अग्नि का तथा श्रायु द्युलोक की अग्नि का नाम है । द्युलोक की अग्नि सूर्य्य है और वह प्रयुप्रदाता है - जैसा कि " सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " यह ऋङ्मन्त्र बतला रहा है । पृथिवी की अग्नि का नाम अङ्गिरा है । इस अङ्गिरा से ही प्रार्थना की जा रही है कि वह प्रान्तरिक्ष्य अग्नि नभस् तथा दिव्य अग्नि को अपने में सम्मिलित करते हुए आए । मिट्टी को उत्तरवेदी पर रख कर ' यत्त नष्टं नाम यज्ञियंतेन त्वा sss दधे ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् हे तिरोहिताग्नि - विशिष्ट मृत्तिका! तुम्हारा राक्षसादि से अहिंस्य जो यज्ञार्ह नाम है उस नाम तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ । एकतादि तीनों अग्नियाँ देवताओं द्वारा होम के लिए होता रूप से वरण करने पर देवताओं को छोड़ कर चली गई थीं, उन्हीं अग्नियों को सम्मिलित करने के लिए पूर्वनिर्दिष्ट मन्त्र तीन बार बोल कर चात्वाल से तीन बार मिट्टी लाई जाती है | चौथा अग्नि वरुणरूप प्राप्त्याग्नि है । उसे ' अनुत्वा देववीतये ' मन्त्र बोलकर लाते है । मन्त्र का अर्थ है - हे आह्रियमाण अग्नि! पूर्वोक्त तीनों प्राहरणों के साथ ही मैं आपका देव रीति के लिए आहरण करता हूँ । देवता जिस स्थान पर जिस के द्वारा हवि का भक्षण करते हैं वह स्थान ' देवाव्यन्ति हविर्भक्षयन्ति यत्र ' इस व्युत्पत्ति से देव - वीति कहलाता है-और वह यज्ञ ही है । इस अग्नि का आहरण यज्ञ के लिए हो रहा है । चारों अग्नियों को लाने के लिए चात्वाल के चारों कोणों से मिट्टी लाते हैं । चार दिशाएँ हैं । चात्वाल के चारों कोणों से मिट्टी लाता हुआ अध्वर्यु सभी दिशाओं से मिट्टी लाता है ॥ ३२ ॥
उत्तरावेदि के निर्माण के लिए मिट्टी लाने के बाद अध्वर्यु अनुक्रम से मिट्टी को फैलाता है । उसे वेदि के स्वरूप में कर लेता है । मिट्टी को फैलाने के समय ' सिंह्यसि सपत्रसाही देवेभ्यः कल्पस्व ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् यह मिट्टी मिट्टी नहीं है अपितु पृथिवी में से निकलने वाली अङ्गिरारूप वाक् है, जिसने देवासुर संग्राम में क्रुद्ध होकर सिंही बन कर देवताओं और असुरों पर आक्रमण किया था । आज उसी वाक् का व्यूहन किया जाता है । यह उत्तर वेदि स्त्रीरूप है । उसी पर यज्ञ पुरुषरूप ( वेदपुरुष ) रहता है । अतः स्त्रीरूप उत्तरवेदि से कहते हैं कि आप देवताओं की योग - साधन बनो ॥३३ ॥
यह पहले बतला दिया गया है कि उत्तरवेदि का नाप युग से किया जाता है । युग का परिमाण ८६ अङ्गुल का होता है । इस प्रकार उत्तरवेदि चौतरफ ८६-८६ अङ्गुल की [ १४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्मांण ब्राह्मण बनाई जानी चाहिए | सब ओर वेदि ८६-८६ अङ्गुल की क्यों बनाई जाती है, इसका कारण बतलाते हैं । संसार के मानवमात्र पुरुषों का निर्मारण पार्थिवाग्नि से होता है । पार्थिवाग्नि, आप:, फेन, ऊषा, सिकता, शर्करा, अश्मा, अयस, हिरण्य भेद से अष्टावयवा है । इसीलिए पृथिवी को गायत्री ( अष्टाक्षरा ) कहा जाता है । एक - एक अक्षर एक - एक प्रारण है । प्रारण प्रादेशमात्र अर्थात् १० ॥ ( साढे दश श्रङ्गुल ) का होता है । ८ प्राणों का नाप ८४ गुल होता है । अपने अङ्गुल से ८४ अङ्गुल परिमाण का मनुष्य होता है । इस पक्ष के अनुसार वेदि ८६ अंगुल की बनानी चाहिए । क्योंकि ८४ अंगुल की बनाने पर वेदि के अन्त के भाग के खिर जाने से मनुष्य गिर जायगा । अतः चौतरफ वेदि मनुष्य के परिमाण से दो - दो प्रगुल बड़ी बनानी चाहिए ताकि यज्ञपुरुष रूप वेदपुरुष गिरने न पाए । और यदि पुरुष का परिमाण १२० अङ्गुल माना जाए तो उत्तरवेदि यजमान के १०-१० पद का एक हिस्सा बना कर उसके नाप से बनानी चाहिए । क्योंकि पद शुल्वसूत्र के अनुसार १२ अङ्गुल का होता है तो १० पद १२० अङ्गुल के होंगे । इस प्रकार चौतरफ १२० अङ्गुल की उत्तरवेदि बनानी चाहिए- जहाँ तक पुरुष का पुरुषत्व है । ' युगमात्री यजमान - दशपदयां वा ( का. श्रौ. सू. ५/७६ ) में यजमान के दस पदों के बराबर उत्तरवेदि बतलाई है । दशाक्षरत्व प्राप्त हो जाने से विराट् सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है । विराट् वाग्रूप है । और स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, इन पाँचों लोकों की वाक् ५ प्रकार की है-जिनके नाम क्रमशः - सत्या, आम्भृणी, बृहती, अनुष्टुप् व श्रद्धा है । और प्रत्येक वाक् अमृत मर्त्यभेद से दो प्रकार की है । अतः १० भेद हो जाते हैं । अतः वाक् भी दशाक्षरा है । इसी अभिप्राय से कहा है ' वाग् वै विराट् ' इति । उत्तरावेदि के मध्य में उससे ऊँची एक चतुष्कोण छोटी वेद और बनाते हैं । इसीके लिए कहा है- ' मध्ये नाभिकामिव करोति ' इति । यह इसीलिए बनाई जाती है जिससे उत्तरावेदि पर एक स्थान पर बैठे - बैठे ही घृत का आधार किया जा सकता है || ३४ || उस वेदि पर श्रध्वर्यु पानी से सेचन करता है, छिड़काव करता है । देवासुर संग्राम के समय वाक् प्रशान्त होकर सिंही बन कर विचरण कर रही थी । आज वही अशान्त अर्थात् क्रुद्ध कर इस यज्ञ में सम्मिलित हुई है । जल छिड़क कर उसके क्रोध को शान्त करता है क्योंकि जल शान्तिधर्मा है । अथवा यह उत्तरा वेदि वेदपुरुष की स्त्री है । इस पर पानी छिड़कना इसके शरीर को सुन्दर व कोमल बनाना है । उत्तरावैदि पर पानी का सिंचन करता हुआ उसे रमरणीय बना कर देवताओं को तृप्त करना है ॥ ३५ ॥
वह अध्वर्यु ' सिंह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रोक्षण करता है । इसके बाद चमकदार बालू रेत के कणों को इस वेदि पर डालता है । वेदि योषा ( स्त्री ) है | स्त्री का सौन्दर्य अलङ्कार से बढ जाता है और सिकता चमकदार होने [ १५
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण के कारण अलङ्कार स्थानीय है । अपि च यह सिकता वैश्वानर अग्नि का उच्छिष्ट है, मस्य हैं । अतः अग्नि इससे परहेज करता है । धधकते अग्नि पर सिकता की मुट्ठी डाल दी जाय तो अग्नि शान्त हो जाएगी । वागाग्नि को यह सिंही स्वरूप अग्नि हानि न पहुँचा दे, अतः अध्वर्यु इस वेदि पर सिकता ( बालू रेत के करण ) डालता है । चूँकि सिकता से इस प्राधारभूत सिंहरूप अग्नि का विद्युत् शान्त हो जाता है, इसीलिए उत्तर वेदि पर सिकता डाली जाती है । ग्रध्वर्यु - ' सिसी सपत्न साही देवेभ्यः शुम्भस्व ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ सिकता डालता है | मन्त्र में ' शुम्भस्व ' का अर्थ ' सुन्दर बनो ' है । इसके बाद पलाश, देवदारु, विकत आदि यज्ञिय वृक्षों में से किसी एक वृक्ष के पत्ते ला कर इस उत्तरा वेदि को ढक देता है । पत्तों से आच्छादित उत्तर वेदि रात्रि पर आच्छादित रहती है । दूसरे दिन उस में अग्नि का प्रधान होता है ॥ ३६ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] ऋग् यजुः साम वेदत्रयी की जो प्रतिष्ठा है - उसी का नाम वेदि है | वेद बिना वेदी के नहीं रहता अतएव वेदि को वेद की स्त्री मान लिया जाता है । उपलब्धि को ही वेद कहते हैं । यह उपलब्धि वेदि पर ही होती है । संसार में जितने भी पदार्थ उपलब्ध होते हैं - वे सब वेदत्रयी स्वरूप हैं । जिसकी उपलब्धि नहीं है- समझ लो उसका वेद नहीं | सूर्य्य वेदत्रयीघन है । इसका जो बिम्ब दिखलाई पड़ रहा है - जो कि रश्मियों के उक्थ ( प्रभवस्थान ) होने के कारण महदुक्थ कहलाता है— ऋक् हैं एवं सूर्य का जो प्रकाश स्वरूप सोलर सिस्टम है - वही साममण्डल है - इसे ' महाव्रत ' कहा जाता है एवं इस सूर्य बिम्ब के केन्द्र में जो आग्नेय मन - प्राण वाङ्मय प्रजापति है - जिसके लिए " प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते " । ( यजु ० ३१।१ ९ ) यह कहा जाता है - वही आग्नेय प्रजापति पुरुष कहलाता है - इसी का नाम यजु है । यजु में यत् और जू दो भाग हैं । यत् चल प्रकृति का नाम है और जू स्थिर प्रकृति का नाम है । यत् वायु है - जू आकाश है । इस प्रकाश में वह वायु जब संचार करता है तो संसार के यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण होता है । वायु ही यजु पुरुष है । संसार का निर्माण इसी वायु से होता है । वायु न हो तो रसों का प्रेरण न हो प्रर्थात् वृष्टि न हो । वायु ही तो वृष्टि का कारण है अतएव ' वायुर्वेदृष्ट्या ईषे ' कहा जाता है । वर्षा न हो तो - अन्न न हो, अन्न न हो तो वीर्य्य उत्पन्न न हो । वीर्य्य न हो तो सृष्टि - क्रम ही बन्द हो जाए । इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता है? योनि में जिस समय वीर्य्यं डाला जाता है - वह बिन्दु रूप रहता है । वायु ही उसे विशकलित कर हाथ-पैर के लिए अलग - अलग मात्रा बनाता है अपिच वायु ही रक्तादि का संचार कर ' त्वमांसादि ' सप्त धातुओं का चुनाव किया करता है । वह वायु आग्नेय है प्रतएव इसे ही अग्नि भी कहा जाता है । ऋक्साम नपुं-सक है— उनसे सृष्टि नहीं होती, सृष्टि होती है - यजु पुरुष से । इसीलिए इसे अलग रखा जाता है । यह सूर्य वेदत्रयीघन है - इसमें रहने वाले उसी यजु पुरुष से - प्राग्नेय प्रजापति से सारी रोदसी त्रिलोकी का निर्माण होता है, अतएव -[ १६ ]
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= तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता: ' ( ऋग्वेद मं ० ७।६३ | ४ ), ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( ऋग्वेद मं ० १।११५ | १ ) यह कहा जाता है । इसी वेदत्रयीधन सूर्य के ऋक् साम - यजु का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-" यदेतन्मण्डलं तपति । तन्महदुक्थम् । ता ऋचः । स ऋचां लोकः । अथ यदेतदचर्दीप्यते तन्महाव्रतम् । तानि सामानि । स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सोऽग्निः । तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या तपतीति । ( शत ० १० । ५ । २।१-२ ) इस वेद का नाम ' गायत्री मात्रिक ' वेद है । यह वेद सूर्य्य - वेदि पर प्रतिष्ठित है । यदि सूर्य्य-वेदि न होती तो वेदत्रयी कथमपि प्रतिष्ठित नहीं हो सकती थी । वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है । यह सौर गायत्रीमात्रिक वेद पृथिवी में आ कर - पृथिवी की जब अपनी चीज बन जाता है तो ' यज्ञ - मात्रिक ' वेद कहलाने लगता है । यह पृथिवी यज्ञ करती है - जैसा कि आगे बतलाने वाले हैं । चूंकि इस यज्ञ का साधक - यह वेद है, बिना वेद के यज्ञ नहीं हो सकता अतएव पार्थिव वेद को ' यज्ञ - मात्रिक ' वेद कहा जाता है । इस यज्ञ - मात्रिक वेद की प्रतिष्ठा - वेदि यही पृथिवी है । पृथिवी पर ही वेदत्रयी अर्थात् सोम यज्ञ की प्रतिष्ठित रहता है । ऋग्यजु साम का नाम वेदत्रयी है - इसी का नाम यज्ञ है । श्रग्नि तरल में विरल भेद आहुति पड़ने का नाम यज्ञ है अतएव अग्नि को यज्ञं कहा जाता है । यह अग्नि ही घन से तीन स्वरूपों में परिणत होता हुआ अग्नि वायु श्रादित्य कहलाने लगता है । इनमें जो अग्नि है - वही ऋ का अधिष्ठाता है । अधिष्ठाता क्या हैं, अग्नि का ही नाम ऋक् है । संसार में जो कुछ हम देखते हैं - वह सब अग्नि ही अग्नि देखते हैं । अग्नि का ही प्रत्यक्ष होता है । मूर्ति के ही दर्शन होते हैं एवं मूर्ति अग्नि से बनती है | अतएव -" यच्च किञ्चिद्दष्टिविषयिकमग्निकर्मैव तत् " । ( या. नि. दै. का. ७३८।३ ) मूर्ति यह कहा जाता है । इसी मूल पर ' अग्निर्भूस्थानः ' यह कहा जाता है । चूँकि ' ऋमूत्ति अग्नि से: ही ' । इस बनती है— अग्नि को ही ऋक् कहते हैं - प्रतएव इसी को ब्रह्मसमन्वयकर्त्ता कहते हैं - ऋक् पिण्ड मूर्ति के चारों ओर एक गोल मण्डल ही ' महिमा मण्डल ' या ' साम ' कहलाता है एवं इसी है । का प्रत्यक्ष के केन्द्र से वृत्तमूल की दूरी के कारण उत्तरोत्तर छोटी होती जाती त्यों - त्यों वह वस्तु छोटी होता है अतएव वस्तु से हम ज्यों - ज्यों आगे हटते जाते है, दिखलाई देने लगती है । इसका केन्द्र में रख कर जो पर ऋक् बिन्दु समाप्त होता है उस प्रतिम बिन्दु से उस वस्तु को छोटा होता जाता है । मण्डल बनाया जाए वही साम मण्डल कहलाता है । यह मण्डल भीतर रहे हैं । उस स्थान से उस एक स्थान पर खड़े हुए हम किसी वस्तु को देख रहे हैं - हम ऋक् को देख का नाम ही साम है । ये वस्तु को केन्द्र में रख कर एक गोल वृत्त ( सर्किल ) बनाइए । इस गोल सर्किल कारण ऋक् की हृस्वता ही है । अन्त में जा कर जहाँ [ १७ ],
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण मण्डल संख्या में कुल एक हजार होते हैं । इसी साम - रहस्य को बतलाने के लिए ही तो ' सहस्रव सामवेद: ' ( पात. महा. १।१ ) ४ कहा जाता है । इस मण्डल पर जितने मनुष्य खड़े होंगे - उन सबको वह वस्तु एक ही ( समान ) परिमाण की दीखेगी । यदि एक बिन्दु भी इधर - उधर कोई हट जाएगा तो उसके प्रत्यक्ष में अन्तर हो जाएगा । यदि सब एक साम पर होंगे तो ऋक् का स्वरूप एकसा दिखलाई देगा | चूँकि ऋक् की अपेक्षा वह साम- मण्डल सबको समान दृष्टिगत होता है अतएव ' ऋचा समं मेने ' से वह मण्डल साममण्डल कहलाने लगता है । इस ऋक्साम के बीच में जो पदार्थ रहता है- उसी का नाम ' यजु ' है । बस, संसार के यच्चयावत् पदार्थ वेदत्रयीमय हैं । एक तिल भी वेदत्रयीधन है । कहाँ तक कहें - जिसकी भी उपलब्धि होती है - वह सब वेदत्रयीघन है । यही सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष है । अग्नि-वायु आदित्य में अग्नि आदि में है- वायु मध्य में है - आदित्य अन्त में है । अग्नि से ऋकू उत्पन्न होता है - वायु से यजु उत्पन्न होता है— प्रादित्य से साम उत्पन्न होता है । अतएव कहा जाता है— " अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् " ॥ ( मनुस्मृति १।२३ ) इस प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि अग्नि- वायु प्रादित्य से ही वेदत्रयी उत्पन्न होती है एवं अग्नि वायु प्रादित्य तीनों श्रग्नि हैं । श्रग्नि - यज्ञ है अतएव वेदत्रयी को ' यज्ञ ' कहा जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है-" यज्ञो ह देवेभ्योऽपचक्राम XXX । तस्य यानि शुक्लानि च कृष्णानि च लोमानि । तान्यृचां च साम्नां च रूपं यानि शुक्लानि तानि साम्नां रूपम् । यानि कृष्णानि तान्यृचाम् । यदि वेतरथा - यान्येव - कृष्णानि तानि साम्नां रूपम् - यानि शुक्लानि तान्यृचाम् । यान्येव बभ्रूणीव हरीणि तानि यजुषां रूपम् । सैषा त्रयी विद्या यज्ञः " इति । ( शत ० १।१।४।१-२-३ ) इस त्रयीविद्या की प्रतिष्ठा का नाम ही ' वेद ' है । सूय्यं वेदधन है एवं इसकी जो रश्मियाँ हैं-वे भी वेदघन ही हैं । वे सूर्य्य- रश्मियाँ पार्थिव पदार्थों पर प्रतिफलित हो कर तदाकाराकारित बन कर हमारे नेत्रों पर प्राती हैं - तब घट - पट मठ इत्यादि की उपलब्धि होती | वह उपलब्धि प्रतिफलित पदार्थाकाराकारित वेदत्रयीघन सौर- रश्मियाँ ही तो हैं प्रतएव ' उपलब्धिवेद: ' - यहकहा जाता है यदि कोई पदार्थ होगा तो उस पर वेदप्रतिफलित होगा यदि प्रतिफलित होगा तो उसकी उपलब्धि होगी अतएव अवश्य ही हम ' उपलब्धिर्वेद: ' कहने के लिए तैय्यार हैं । इस वेद के लिए जो प्रतिष्ठा होती है उसी का नाम ' वेदि ' ( हिन्दी रूपान्तर वेदी ) है । बिना वेदि के वेद नहीं रहता है । पृथिवी एक स्थिर पदार्थ है - तभी तो इस पर यज्ञस्वरूप गायत्रीमात्रिक वेद प्रतिष्ठित हुआ । यदि पृथिवी न होती तो वेद * साम वै सहस्रवर्त्मनि - ( सहस्रवर्मा सामवेदः ) ( षड्विंश महाब्राह्मण ११४ ) [ १८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०. ५ ) शतपथ ब्राह्मण वैदिनिर्माण ब्राह्मण कहाँ पर प्रतिष्ठित होता? कि इसी सारी पृथिवी पर वह गायत्री मात्रिकवेद प्रतिष्ठित होता है अत-एव " यावतो वै वेदस्तावती पृथिवी " ( शत ० ३।७।२।१ ) यह कहा जाता है । पृथिवी निदर्शन मात्र है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ जो कि उपलब्ध होते हैं- ' वेदि ' हैं । पुस्तक - घट - मठ - दवात कलम- लोटा-थाली - ढेला - चूना - मिट्टी सब ' वेदि ' हैं । पुस्तक तो वेद की वेदि - है । वही वेद ' इदं पुस्तकमस्ति ' इस उपलब्धि का कारण बनता है । यदि वेदि न हो तो वेद न रहें, वेद न रहें तो उपलब्धि न हो । पृथिवी -हम जिस पर बैठे हैं, उसी का नाम नहीं है । वेद प्रतिष्ठा का नाम पृथिवी है । पुस्तक घट - पट -मठ - ग्रह - नक्षत्र-पर्वत - वृक्ष - पशु - पक्षि- मनुष्य कृमि - कीट इत्यादि सारे पदार्थों पर वेद प्रतिष्ठित रहता है अतएव हम उनके वेद की अपेक्षा से सब को पृथिवी कह सकते हैं । हमारे वेद की पृथिवी अर्थात् प्रतिष्ठा हम हैं । यदि हम होता न हों तो वेद न रहें । वेदि के बिना वेद कैसे रह सकता है? वेद से ही यज्ञ होता है । वेद ही से क्या है, वेद ही तो यज्ञ है । यजमान इसी यज्ञ को करना चाहता है । यज्ञ अर्थात् वेद, वेदि के बिना प्रतिष्ठित नहीं होता अतएव यज्ञ करने के लिए वेद को प्रतिष्ठित करने के लिए - वेदि - निर्माण किया जाता है । इस ब्राह्मण में वेदि - निर्माण प्रक्रिया ही बतलाई जाएगी, अतएव इसे ' वेदि ब्राह्मण ' कहा जाता है । पाकयज्ञ, हविर्यज, महायज्ञ, अतियज्ञ, शिरोयज्ञ - भेद से यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं । इनमें जो हविर्यज्ञ है - उसे ही दर्शपूर्णमास कहते हैं, महायज्ञ है -- उसे ही सोमयज्ञ कहते हैं । हमने पूर्व के प्रक-उस प्राकृतिक यज्ञ के अनुकरण पर हुआ है । प्रकृति रणों में बतलाया है कि हमारे यज्ञ का श्राविष्कार, याज्ञिक पदार्थों में जैसा यज्ञ होता है, हूबहू वैसा ही यह मानुष यज्ञ होता है । वेदि की, ऋत्विजों की ओर से की - जैसी स्थिति आधिदैविक मण्डल में है- उसी की अनुकृति यहाँ भी की जाती है । - अपनी यज्ञ के विरुद्ध हम रत्ती मात्र भी मनगढन्त बात का यज्ञ में निवेश नहीं कर सकते । यदि हम प्रकृति इसमें अपना मनमानापन चला देंगे तो यज्ञ भ्रष्ट हो जाएगा । अतएव हमें अपनी भोर से उसमें ' ( कुछ शत०- भी अदल - बदल नहीं करना चाहिए । ब्राह्मण - ग्रन्थों में बार - बार ' व्युद्धं वै तद्यज्ञस्य हैं- यन्मानुषम् प्रकृति की नकल-१ | ४ | १ | ३५ ) यह लिखा रहता है । इससे सिद्ध हो जाता है कि हम जो कुछ करते बतलाने की पर करते हैं - अपनी ओर से हम कुछ नहीं करते । ऐसी अवस्था में प्राकृतिक यज्ञ - है रहस्य - यह जाने बिना श्रावश्यकता पड़ जाती है । प्रकृति में हविर्यज्ञ कैसे होता है - सोम यज्ञ कैसे होता विवेचन प्रकृत में नहीं मानुष यज्ञ की संगति नहीं हो सकती । यद्यपि इस प्राकृतिक यज्ञ का विस्तृत में जो पदार्थ दीख रहे किया जा सकता - तथापि थोड़ा सा निदर्शन करा देना अनुचित न होगा । संसार से हम यहाँ केवल इस हैं - वे सब यज्ञ - स्वरूप हैं । सब में आदान विसर्गात्मक यज्ञ हो रहा है । इनमें । पृथिवी - पिण्ड-पृथिवी यज्ञ का स्वरूप बतलाएँगे । इस पृथिवी यज्ञ का नाम हम ' प्रतिष्ठा एक यज्ञ ' परिक्रमा रखेंगे लगा लेती है । स्वरूप है । यह सूर्य के परिक्रमा लगाया करती है । ३६० दिन में यह पर ) परिभ्रमण करती पृथिवी सूर्य के चारों ओर जो परिक्रमा लगाती है - वह स्वाक्ष ( अपनी धुरी हुई रास्ता तय हुई लगाती है । जैसे रेल का पहिया घूमता हुआ आगे चलता है - बाइसिकिल घूमती लगाती है । पृथिवी करती है । ठीक इसी प्रकार पृथिवी अपनी धुरी पर घूमती हुई सूर्य्यं की परिक्रमा बार अपनी धुरी के का यह स्वाक्ष परिभ्रमण २४ घण्टों में पूरा हो जाता है । २४ घण्टों में पृथिवी एक घण्टे पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूम जाती है । इस स्वाक्ष परिभ्रमण से दिन - रात उत्पन्न होते हैं । १२ नाम दिन है, सूर्य्य -सम्मुख रहती है- १२ घण्टे सूर्य्य से विरुद्ध दिक् में रहती है । बस, सूर्य्य- सामुख्य का [ ε 1-
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण विरुद्ध भाव का नाम रात्रि है । इस प्रकार पृथिवी के स्वाक्ष- परिभ्रमण से अहोरात्र का जन्म होता है । पृथिवी का जो अग्नि है - उसे गार्हपत्य कहते हैं, सूर्य्याग्नि को ग्राहवनीय कहते हैं । दिव्यप्राण का नाम आहवनीय है, पार्थिवप्राण का नाम गार्हपत्य है । पृथिवी प्रातिस्विक रूपेण सर्वथा काली है प्रतएव इसका जो श्राग्नेय प्राण है - वह भी काला ही है एवं सौर प्राण ( श्राहवनीयप्राण, दिव्यप्राण ) शुक्ल है । दिन में दिव्यप्रारण की सत्ता रहती है । रात्रि में पार्थिव गार्हपत्य प्रारण की सत्ता रहती है । दिन में आने वाला पृथिवी से संश्लिष्ट जो दिव्यप्राण है- दिव्याग्नि है उसे हम पृथिवी का आहवनीय अग्नि कहेंगे एवं ठीक इसके विरुद्ध जो रात्रि का भाग है, वह चूंकि पृथिवी का अपना असली स्वरूप है, अतएव उसे प्रतिष्ठायज्ञ - गार्हपत्य - कहेंगे । भू - पृष्ठ पर तपने वाला जो नैसर्गिक पार्थिव प्राण है - वह पृथिवी की अपनी वस्तु है अतएव हम अवश्य ही उसे ' गार्हपत्य ' कहने के लिए तैय्यार हैं, भूपृष्ठ पर तपने वाला जो दैनिक दिव्याग्नि प्राण है— उसे आहवनीय कहने के लिए तैय्यार हैं एवं पृथिवी का जो वैश्वानर अग्नि है-वही इसका दक्षिणाग्नि है । पृथ्वी, अन्तरिक्ष- द्यौ ये तीन विश्व कहलाते हैं । तीनों के अधिष्ठाता क्रमशः अग्नि, वायु एवं सूर्थ्य हैं । ये तीनों भी श्रग्नि ही हैं । अधिष्ठाता को ' नर ' कहते हैं । इन तीनों के मेल से जो अग्नि पैदा होता है - जो कि सूर्य्यं तक व्याप्त रहता है वही ' वैश्वानर अग्नि ' कहलाता 1 यह सूर्य्यं तक व्याप्त रहता है अतएव ' वैश्वानरो यतते सूय्यैरण ' यह कहा जाता है । चूँकि यह विश्व के नरों से उत्पन्न हुआ है अतएव वैश्वानर कहा जाता है । तीनों के मेल से हुआ है - इस बात को बतलाने के लिए ' वैश्वा ' कहा है । बस, पृथिवी में रहने वाला जो यह वैश्वानर अग्नि है - वही इसका दक्षिणाग्नि है - इसी से पृथिवी के यज्ञिय पुरोडाश का अर्थात् पार्थिव पदार्थों का परिपाक होता है । जो पृथिवी - पृष्ठ है - वह वेद है | जैसे पृथिवी सूर्य की परिक्रमा करती है तथैव चन्द्रमा इस पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाता | चन्द्रमा सोममय है । भास्वर सोमपिण्ड का नाम ही चन्द्रमा है । यह चान्द्र सोम पार्थिवाग्नि में - जो कि ग्राहवनीय गार्हपत्याग्नि है - उसमें आहुत होता रहता है एवं आग्नेय प्राण का नाम ही है - देवता । अतएव कहा जाता है ---" एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः " । ( शत ० १२६।४।५ ) बस, यही पृथिवी का दर्श पूर्णमास यज्ञ है । चन्द्रमा एक मास में पृथिवी की परिक्रमा कर लेता है - इसमें कृष्ण तथा शुक्ल - दो पक्ष होते हैं । शुक्लपक्ष की ' पूर्णमासेष्टि ' कहलाता है एवं अमावस्या की इष्टि ' दर्शेष्टि ' दर्शपूर्णमास यज्ञ हुआ करता है । नैशिक पार्श्व में दर्शेष्टि होती हुआ करती है - बस यही प्राकृतिक हविर्यज्ञ है । पूर्णिमा को सोम का आहुत होना ही कहलाती है । इस प्रकार पृथिवी का रहती है- दैनिक पार्श्व में पूर्णमासेष्टि प्राकृतिक हविर्यज्ञ में दैनिक भू - पृष्ठ प्रारण ग्राहवनीय है, नैशिक भू - पृष्ठ प्रारण गार्हपत्य है, वैश्वा-नर दक्षिणाग्नि है; पृथिवी वेदि है । चांद्र सोम इसका हवि है -दर्श और पूर्ण ये दो इस यज्ञ के प्रधान दिन हैं । ठीक इसी की नकल पर मनुष्य - हविर्यज्ञ का वितान किया जाता है । चूँकि प्राकृतिक हवनीयदिव्यप्राण पृथिवी से पूर्व - पृष्ठ पर रहता है प्रतएव यहाँ भी आहवनीय पूर्व भाग में बनाया [ २० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण जाता है -- गार्हपत्य पृष्ठ भाग में अर्थात् पश्चिम भाग में बनाया जाता है । वैश्वानराग्नि प्रकृति में -दक्षिण भाग में रहता है अतएव यहाँ भी दक्षिणाग्नि दक्षिणभाग में बनाई जाती है एवं प्रकृतिवत् आह-बनी गार्हपत्य के बीच में पृथिवी - स्थानीय वेदि बनाई जाती है । यह हविर्यज्ञ अर्थात् दर्शपूर्णमासेष्टि प्रकृतिवत् श्रमावस्या और पूर्णिमा को ही होती है । यही पृथिबी का पहला दर्शपूर्णमास है । पृथिवी - जैसे दर्शपूर्णमास करती है तथैव सोमयाग भी करती है, जिसका कि प्रकृत से सम्बन्ध है । पृथिवी के चारों ओर चन्द्रमा परिभ्रमण करता रहता है - यह अनुपद में ही बतला दिया गया है । इस चन्द्रमा को साथ लिए हुए पृथिवी सूर्य के परिक्रमा देती रहती है, जैसा कि श्रुति कहती है-" सोमः पूषा च चेततुविश्वासां सुक्षितीनाम् । देवत्रारथ्योहिताः " । ( सामवेद पू ० २।६।१० ) इयं ( पृथिवी ) वै पूषा ( तै ० ब्रा ० १।७।२१५ ) श्रुति में पृथिवी को पूषा कहा गया है एवं सोम चन्द्रमा का नाम है । पूषा और सोम - प्रर्थात् पृथिवी और चन्द्रमा देवी रथ पर सवार हो कर - विश्व के जो पदार्थ हैं - उनकी खबर ले रहे हैं अर्थात् सारे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगा रहे हैं । पृथिवी की हवि -दि का जो श्राहवनीय अग्नि हैं - वह इस सोम - यज्ञ की महावेदि का गार्हपत्य बन जाता है । इस पृथिवी से २१ तक अर्थात् सूर्य्यं तक इस महावेदि का वितान है । इस पृथिवी का जो १७ वाँ अग्नि है-वही आहवनीय अग्नि है । इसी में २१ वें अहर्गण से ऊपर रहने वाला सोम प्राहुत होता रहता है । बस, यही ' सोमयज्ञ ' कहलाता है । इसे ही ' ज्योतिष्टोम ' यज्ञ भी कहते हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष तथा द्यौ - तीन लोक माने जाते हैं । इनमें द्यो सूर्य्य- स्थानीय है । इससे नीचे जो प्रन्तरिक्ष है उसमें प्राठ धिष्ण्या-नियाँ अर्थात् नक्षत्राग्नियाँ रहती हैं- इन्हीं का नाम दक्षिणाग्नि है । ये पृथिवी के १५ वें अहर्गण के स्थान में हैं एवं १७ वें पर ग्राहवनीय अग्नि है । इसमें सोम श्रहुत होता रहता है । इसी अग्नीषोमा-त्मक यज्ञ से सारे विश्व का निर्माण होता है । ठीक इसी की नकल पर हमारे मानुष- सोमयाग का वितान होता है । प्राकृतिक सोमयज्ञ में पृथिवी का अर्थात् हविर्वेदि का जो आहवनीय होता है - वह गार्हपत्य बना जाता है अतएव इस मानुष सोमयाग में भी हविर्वेदि के श्राहवनीय को गार्हपत्य बनाया जाता है एवं प्राकृतिक सोमयज्ञ में १७ वें अहर्गण पर ग्राहवनीय होता है । उसी प्रकार यहां भी आहवनीय १७ वें पर ही बनाया जाता है । प्रकृति में अन्तरिक्ष में- दक्षिणाग्नि - स्थानापन्न आठ धिष्ण्याग्नियाँ होती हैं वे प्राठों धिष्ण्याग्नियाँ १ - विभुः २ - वह्निः ३ - प्रचेता, ४ - विश्वे देवा, ५ - कवि, ६ - बम्भारि, ७ - विवस्वान् - शुधुः ये नाम हैं । इसी प्रकार मानुष - सोमयज्ञ में भी प्राठ याग्नियां होती हैं । इस यज्ञ में ये आठों निम्नलिखित नामों से व्यवहृत होती हैं - आग्नीध्र, होता, मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंदसी पौत्रीय, नेष्ट्रीय, अच्छावाक् तथा मार्जालीय । प्रकृति मण्डल के सोमयाग २१ पर सू है । उसी की नकल पर यहाँ भी गार्हपत्य स्वरूप पृथिवी से २१ पूर्व एक काष्ठ का यूप खड़ा किया जाता है प्रकृति में हविर्धात मण्डप होता है । उर्क रस के रहने का जो स्थान है उसी का नाम हविर्धान मण्डप है एवं उसके ऊपर सदोमण्डप होता है । उसी की नकल पर यहाँ भी हविर्मण्डप. और सदोमण्डप बनाया जाता है एवं उर्फ रस जिससे उत्पन्न होता है उस प्रौदुम्बरी वृक्ष को प्रकृतिवत् -L २१
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तृतीय काण्ड ( ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं हविर्धान मण्डप में रखा जाता है । बस, यही महावेदि का स्वरूप है । पृथिवी के चारों ओर वायु रहती है - जिसे कि एमूषवराह भी कहते हैं । इसके श्रागे से प्राकृतिक महावेदि का प्रारम्भ होता है अतएव यहाँ भी मूष के लिए पृथिवी - स्थानीय गार्हपत्य से ३ विक्रम छोड़ कर बाद उत्तरावेदि का निर्माण होता है । जैसी रचना प्रकृति की है, ठीक वैसी ही हमारे मानुष सोमयज्ञ की होती है । हविर्वेदि भी मामूली नहीं बनाई जाती । उसके लिए भी एक बड़ी शाला बनाई जाती है । उस शाला के भीतर श्राहवनीय के पास - श्राहवनीयागार बनाया जाता है एवं गार्हपत्य के पास गार्हपत्यागार बनाया जाता है । वह महा-शाला छप्पर की बनाई जाती है । उसके ऊपर का - बीच का जो महावंश होता है जिसके कि इधर - उधर छप्पर के दोनों पक्ष या भाग रहते हैं - वह पूर्वापर होता है अतएव उसे ' प्राचीन वंश ' कहते हैं । इस प्राचीन वंश के दोनों ओर बड़े - बड़े दो स्थूण लगाए जाते हैं और बीच में छोटी - छोटी स्थूरियाँ लगाई जाती हैं । इस प्रकार हविर्वेदि की शाला का निर्माण होता है । इसका जो पूर्वभाग का स्थूण है वह सबसे बड़ा होता है अतएव उसे ' स्थूणराज ' कहा जाता । ऐसे स्थूणराज दो होते हैं - एक शाला के पूर्वभाग में होता है - जहाँ पर कि हविर्वेदि का आहवनीय है, एक पश्चिम भाग में होता है जहाँ पर कि हर्वेिद का गार्हपत्य । दोनों ही वर्षिष्ठ अर्थात् बहुत बड़े होने से ' स्थूणराज ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इस हविर्यज्ञ की शाला में जो पूर्वार्ध्य बहुत बड़ा प्रतएव स्थूणराज नाम से प्रख्यात स्थूण होता है उससे वह अध्वर्यु तीन विक्रम पूर्व की ओर प्रक्रमण करता है । एक पाँव से दूसरा पाँव उठा कर जहां रखा जाता है - उतना स्थान एक पद कहलाता है । इसी को एक कदम कहते हैं । ऐसे जो दो कदम हैं उनका एक ' विक्रम ' होता है । प्रायः एक कदम १२ अंगुल का होता है परन्तु ध्यान रहे कि १२ अंगुल का कदम वह है - जो कि मामूली तौर से होता है । कोशिश करके जो लम्बी डग भरता है वह पद १२ अंगुल का नहीं होता है । यहाँ पद शब्द से प्राकृतिक पद ही अभिप्रेत है । स्वाभाविक गति का जो एक पद होता है - वह १२ अंगुल का होता है - ऐसे दो पद का एक विक्रम होता है । बाँया पाँव जमीन पर रखा है । श्रब वहाँ से दाँहिना पाँव जहाँ पर रखा जाएगा वह एक पद हुना एवं फिर बाँया पैर जहाँ पर रखा जाएगा वह दूसरा पद हुा । बस, बाँये पैर से बाँए तक अथवा दाहिने पैर से दाँहिने पैर तक के बीच का २४ गुल का जो स्थान है- वही एक विक्रम कहलाता है । वह अध्यर्यु स्थाणुराज के पास से पूर्व की ओर ऐसे तीन विक्रम ( ७२ अंगुल ) आक्रमण करता है ( चल कर आता है ) एवं तीसरे विक्रम का जो बिन्दु है उसमें एक शंकु ( कीला ) गाड़ देता है । बस, यही महावेदि का सौम्यवेदि का अन्तःपात है | यहाँ से-इस शंकु बिन्दु से महावेदि प्रारम्भ होगी । यही मुख्य स्थान है । इसी को स्थिरमान् कर - वेदि - निर्माण किया जाएगा, इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तद् ( तत्र- - हविर्यज्ञशालाम् ) य एष पूर्वार्ध्वो वर्षिष्ठः स्थूणाराजो भवति । तस्मात्प्राप्रक्रामति त्रीन्विक्रमान् तत् ( तत्र तृतीय विक्रमान्ताबिदा )
शकुं निहन्ति । सोऽन्तः पातः " ॥१ ॥
हमने बतलाया है कि वेदि पर वेद रहता । वेदि - वेद - पुरुष की स्त्री है । उसी के श्राकार से इस वेद का निर्माण होगा - इसके अनन्तर वह अध्वर्यु उस मध्यम शंकु से जिसे कि अन्तःपात बतलाया [ २२ ]