Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 221–230
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण प्रकृति - यज्ञ में गन्धर्व ही सोम - रक्षा करते हैं अतएव यहाँ भी इस मनुष्य यज्ञ में भी - केवल सोम-रक्षा के लिए ही धिष्याग्नियों को स्थापित किया जाता है । अन्तःशङ्कु से पूर्व उत्तरावेदि के बीच में श्राहवनीय है । हविर्धान- मण्डप के दक्षिण में मार्जालीय है । उत्तर में आग्नीधीय है एवं हविर्धान के - पश्चिम में ६ धिष्ण्याग्नियाँ और हैं । इस प्रकार १० तो ये हो जाती हैं एवं ११ वाँ गार्हपत्याग्नि है जो कि हविर्वेदि का आहवनीय कहलाता है । यही ११ रुद्र कहलाते हैं । ये अन्तरिक्ष में रहते हैं । सारा सोम इन्हीं ११ हों अग्नियों की रक्षा में सन्नद्ध है --" ते वाऽएते, सोमस्यैव गुप्त्यै न्युप्यन्ते । श्राहवनीयः पुरस्तात् मार्जालीयो दक्षिणतः प्राग्नीध्रीय उत्तरतोऽथ ये सदसि ते पश्चात् " ॥ २१ ॥
यद्यपि सोमरक्षक सारे हों धिष्ण्या हैं किन्तु उन सब में से आधों का केवल नाममात्र ले लिया जाता है । उनके लिए आहुति वगैर नहीं दी जाती । " तेषां वाऽर्द्धानुकरन्ति श्रद्धनिनुदिशन्ति " । इसका कारण बतलाते हैं । इन प्रारण गन्धर्वों ने यही निश्चय किया कि हम में से श्राधों को आहुति दो एवं प्राधों का खाली नाम मात्र ले दो । ऐसा करने से जिस द्युलोक से हम आए हैं उस लोक को अच्छी तरह से जाने रहेंगे एवं प्रजिह्य हो कर अपने स्थान में प्रतिष्ठित हो जाएँगे । तात्पर्य यही है कि यदि सारे गन्धर्व पृथिवी में आहुति लेने या जाएँगे तो इनकी द्युलोक की प्रतिष्ठा उखड़ जाएंगी एवं उसमें दूसरा विजातीय प्राण भर जाएगा । ऐसी अवस्था में, जब यह आहुति ले कर वहाँ जाएँगे तो बड़ी कठिनता से वहाँ प्रवेश पा सकेंगे । ऐसा न हो, वहाँ भी इनकी प्रतिष्ठा बनी रहे, अतएव ये श्रधे ही यहाँ आते हैं । पृथिवी में सारे गन्धर्व - प्रारण नहीं आते अपितु आधे ही आते हैं । इससे द्युलोक में इनकी प्रतिष्ठा बनी रहती है । अतएव हमें आधों के लिए ही आहुति देना उचित है क्योंकि प्रकृति-यज्ञ में आधे ही गन्धर्व पृथिवी में आते हैं-" एत उ हैवैतद्दधिरेऽर्द्धान्न उपकिरन्तु श्रर्द्धाननुदिशन्तु तथा यस्माल्लो-कादागताः स्मो दिवस्तथा तं लोकं प्रतिप्रज्ञास्यामः तथा न जिह्माः एष्याम इति - ( द्युलोकं सर्वथा परित्यज्य भूमौ कृतनिवासानां गन्धर्वाणां पुनर्द्युगम सतिजिह्मता स्यात् - सर्वेषां केवलमनुदेशने भूलोके प्रत्यक्षता न स्यात् । प्रत उभयार्थम् - उभयथा कर्त्तव्यम् ॥ २२ ॥
इसी का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं - वह अध्वर्यु जिनका स्वरूप बनाता है - धिष्ण्या नाम से जिन को सम्पन्न करता है उनसे तो इस हमारे लोक में वे प्रत्यक्षरूपेण सोम - रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं एवं जिनका सिर्फ नाम मात्र ले दिया जाता है उससे उस द्युलोक में उनकी स्थिति बनी रहती है-[ २०५ ] 1
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण " स यानुपकिरन्ति - तेनास्मिल्लोके प्रत्यक्षं भवन्ति । अथ याननुदिशन्ति-तेनामुष्मिल्लोके प्रत्यक्षं भवन्ति " ॥२३ ॥
जिस प्रकार इन गन्धर्वो के दो स्थान हैं तथैव इनके नाम भी दो - दो ही हैं- ते वै द्विनामनो. भवन्ति " | इनके दो - दो नाम क्यों हैं- इसका कारण बतलाते हैं -- इन गन्धवों ने अपने नामान्तर धारण करने का विचार किया । इसका कारण इन्होंने यही बतलाया कि अपन लोग इन पूर्व के नामों से जरा भी समृद्ध नहीं हैं - इन्हीं नामों के कारण ग्राज श्रपता सोम छिन गया है एवं लाज अपनी बदनामी हो गई है कि अरे! गन्धर्वो की रक्षा में से सोम चला गया । इस अपमान से बचने के लिए एवं समृद्धिशाली बनने के लिए हम सब अपने दूसरे नाम रक्खें । यह विचार कर उन्होंने अपने दूसरे नाम रख लिए एवं उनसे समृद्ध हो गए । जो अपहृत सोमपीथ - जिनका सोम छिन गया था वे आज इन्हीं द्वितीय नामों की बदौलत पुनः यज्ञ में शामिल हो गए । दूसरे नामों के कारण हो देवताओं को स्पष्ट शब्दों में तृतीय सवने वो घृत्याहुति: प्राप्स्यति ' कह कर इन्हें यज्ञ में शामिल करना पड़ा । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि पहले नाम से ब्राह्मण की समृद्धि का नाश होता हो तो वह दूसरा नाम रख ले । बस, जो इस प्राकृतिक विज्ञान को जानता हुआ अपना दूसरा नाम रख लेता है - वह वास्तव में समृद्ध हो जाता है । लोक में हम देखते हैं कि यदि किसी के नाम से दिवाला निकल जाता है तो उसकी प्रतिष्ठा उखड़ जाती है - किन्तु वही दूसरे नाम से वापस प्रतिष्ठित हो जाता है - कौन कह सकता है कि इस सिस्टम ( पद्धति ) का इसी श्रुति के आधार पर चलन हुआ हो-" एत s उ हैवैतद्दधिरे - न वाऽएभिर्नामभिररात्स्म - येषां नः सोममपाहा-बुर्हन्त द्वितीयानि नामानि करवामहाऽ इति । ते द्वितीयानि नामान्यकुर्वत । तैरराध्नुवन्यानपहृतसोमपीथान् सतोऽथ यज्ञग्राभजंस्तस्मात् द्विनामान: - तस्माद् ब्राह्मणोऽनृध्यमाने द्वितीयं नाम कुर्वीत राध्नोति हैव य एवं विद्वान् द्वितीयं नाम कुरुते ॥२४ ॥
इसी प्राकृतिक सोम यज्ञ से सारे संसार का जीवन रहता है यह बतलाने के अभिप्राय से कहते हैं-यह प्राकृतिक वायु - अध्वर्यु अग्नि में जो प्राहुति डालता है इससे तो देवता जीवित हैं । जो सदोमण्डप में खाते हैं उससे मनुष्य जिन्दा हैं । हविर्धन के दक्षिण में जो नाराशंस रक्खे जाते हैं - उससे पितर जीवित हैं । प्रकृति में २१ वें स्थान पर स्थित अग्नि में जो पारमेष्ठ्य सोम आहुत होता है उससे सारे सौर देवता जीवित हैं । यदि पारमेष्ठ्य सोम की आहुति न हो तो सूर्य्यं का गोला नेस्तनाबूद हो जाए । पञ्चदश स्तोम के नीचे सदोमण्डप है । उसमें आया हुआ सोम पार्थिव वैश्वानराग्नि में आहुत होता है -• इससे मनुष्य का जीवन रहता है । उत्तर से दक्षिण में जाने वाले सोम से पितर प्राण की स्थिति रहती है । इस प्रकार इसी सोम यज्ञ से सारी प्रजा जीवित है - इसी विज्ञान को परोक्ष भाव से बतलाने के लिए मनुष्य यज्ञ में इसे घटित करते हुए बतलाते हैं— [ २०६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण धिष्ण्या ब्राह्मण " स यदग्नौ जुहोति । तद्देवेषु जुहोति । तस्माद्देवाः सन्त्यथ यत् सदसि भक्षयन्ति तन्मनुष्येषु जुहोति तस्मान्मनुष्याः सन्ति । अथ यद्धविर्धानयोर्नारा-शंसाः सीदन्ति - तत् पितृषु जुहोति तस्मात् पितरः सन्ति " ॥ २५ ॥
हविर्धन शकट के दक्षिण भाग में आहुति और भक्षण से बचा हुआ जो सोम रक्खा रहता है उसे ही नाराशंस कहते हैं । वह वायु में जा कर पितरों की तृप्ति करता है । जो प्रजा इस यज्ञ में शामिल रही वह तो आज तक मौजूद है एवं जो यज्ञ में शामिल नहीं हुई ऐसी असुरादि प्रजा की कहीं भी सत्ता नहीं है । तमोमय प्रासुर प्राण रहते हुए भी नहीं रहने के समान हैं । बस जो यज्ञ में शामिल न हुई थी उसी प्रजा को आज यह यजमान अपने यज्ञ में शामिल करता है । मनुष्यों के द्वारा ग्रहण करने से पशु अन्वाभुंक्त हो जाते हैं । देवताओं की तृप्ति से अन्तरिक्ष में रहने वाले पक्षी आदि तृप्त हो जाते हैं । इतना ही नहीं संसार में जो कुछ है उस सब की तृप्ति इन्हीं देवताओं से होती है - वृक्ष, वनस्पति, चिड़िया इत्यादि सब को इन्हीं प्राण देवताओं से खुराक मिलती है अतएव -" जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एवदेवताभ्यः " 1 यह कहा जाता है | इस प्रकार देवता - मनुष्य पितर तीनों को शामिल कर लेने से सारी प्रजा यज्ञ में शामिल हो जाती है । इनमें देवता - मनुष्य पितर- ये अच्छी तरह प्रत्यक्षरूपेण खाते - पीते हैं । अतएव इनका यह पान ' सम्पा ' कहलाता है । किन्तु चिड़िया वृक्षादि सब उच्छिष्ट - भोजी हैं । ' सम्पबन्ते ' से यही बतलाना है कि पहले किसी समय चन्द्रमा की चांदनी में रहने वाले देवता और मनुष्य साथ रहते थे, परन्तु प्राज देवता अदृश्य हो गए हैं । " या वै प्रजा यज्ञेऽनन्वाभक्ताः - पराभूता वै ताः । एवमेवैतद्- या इमाः प्रजा अपराभूताः - ता यज्ञ ग्राभजति । मनुष्याननु पशवः, देवाननु वयांसि ओषधयः, वनस्पतयो यदिदं किञ्च । एवमु तत्सर्वं यज्ञ प्राभक्तम् । ते ह स्मैत-उभये देवमनुष्याः पितरः सम्पिबन्ते । सैषा सम्पा । ते ह स्म दृश्यमाना एव पुरा सम्पिबन्ते, उतैतर्ह्यदृश्यमानाः " ॥२६ ॥
॥ इति धिष्ण्याब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति षष्ठाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् समाप्तम् ॥ [ २०७ ]
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षष्ठाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' वैसर्जन ब्राह्मणम् ' [ मूल ] सर्वं वाऽएषोऽभिदीक्षते । यो दीक्षते यज्ञं ह्यभिदीक्षते यज्ञं हो-वेदं सर्वमनु तं यज्ञं सम्भृत्य यमिममभिदीक्षते सर्वमिदं विसृजते ॥१ ॥
यद्वैसर्जनानि जुहोति । स यदिदं सर्वं विसृजते तस्माद्वैसर्जनानि नाम तस्माद्योऽपिव्रतः स्यात्सोऽन्वारभेत यद्युग्रन्यत्र चरेन्नाद्रियेत यद्वै जुहोति तदेवेदं सर्व विसृजते || २ || यद्वेव वैसर्जनानि जुहोति । यज्ञो वै विष्णुः, स देवेभ्य इमां विक्रान्ति विचक्रमे - यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयेन दिवमुत्तमेनैतावेवैष एतस्मै विष्णुर्यज्ञो विक्रान्ति विक्रमते यज्जुहोति तस्माद्वैस-जनानि जुहोति || ३ || सोऽपरा वेदि स्तीर्त्वा । अर्धव्रतं प्रदाय सम्प्रपद्यन्तऽइध्ममभ्यादधत्युप-यमनीरुपकल्पयन्त्याज्यमधिश्रयति स्रुचः सम्माष्ट्र्युपस्थे राजानं यजमानः कुरुतेऽथ सोमयण्यै पदं जघनेन गार्हपत्यं परिकिरति पदा वै प्रतितिष्ठति प्रतिष्ठित्या-एव || ४ || तद्वै । चतुर्धा कुर्वन्ति यत्राहवनीयमुद्धरन्ति तासूपयमनीषु चतुर्भागमक्षं चतुर्भागेणोपाञ्जन्त्येता सूपयमनीषु चतुर्भागं जघनेन गार्हपत्यं चतुर्भागं परिकि-रति ॥५ ॥
तदु तथा न कुर्यात् । सार्धमेव परिकिरेज्जघनेन गार्हपत्यमथोत्पूयाज्यं चतुर्गृहीते जुह्वां चोपभृति च गृह्णाति पञ्चगृहीतं पृषदाज्यं ज्योतिरसि विश्व-रूपं विश्वेषां देवानां समिदिति वैश्वदेवं हि पृषदाज्यं धारयन्ति स्रुचो यदा प्रदीप्त इध्मो भवति || ६ || [ २०६ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण बसर्जन ब्राह्मण अथ जुहोति । त्वं सोम तनूकृद्भयो द्वेषोभ्योऽन्यकृतेभ्य ऽउरु यन्ताऽसि वरूथं स्वाहेति तदेतेनैवास्यां पृथिव्यां प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठत्येतेनेमं लोकं स्पृणुते ॥७ ॥
प्राप्त द्वितीयामाहुति जुहोति । जुषाणोऽप्तुराज्यस्य वेतु स्वाहेत्येष उ हैवैतदुवाच रक्षोभ्यो वै बिभेमि यथा मान्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि न हिनसन्नेवं मां कनीयांसमेव वधात्कृत्वाऽतिनयत स्तोकमेव स्तोको ह्यप्तरिति तमेतत्कनीयां-समेव वधात्कृत्वाऽत्यनयन्त्स्तोकमेव स्तोको ह्यप्तू रक्षोभ्यो भीषा तस्मादप्तवे द्वितीयामाहुति जुहोति ॥८ ॥
उद्यछन्तीध्मम् । उपयच्छन्त्युपयमनोरथाहाग्नये प्रहियमाणायानुब्रूहि सोमाय प्ररणीयमानायेति वाऽग्नेय प्रह्रियमाणायानुब्रूहीति त्वेव ब्रूयात् ॥९ ॥
आददते ग्राव्णः । द्रोणकलशं वायव्यानीध्मं कार्यमयान्परिधीनाश्व-वालं प्रस्तरमैक्षव्यौ विधृति तद्द्बहरुपसन्नद्धं भवति वपाश्रपण्यौ रशनेऽअरणी-saf धमन्थनः शकलो वृषणौ तत्समादाय प्राञ्च श्रयन्ति स एष ऊर्ध्वो यज्ञ एति ॥१० ॥
तदायत्सु वाचयति । प्रग्ने नय सुपथा रायेऽस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेमेत्यग्निमेवैतत्पु-रस्तात्करोत्यग्निः पुरस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण हरन्ति तआ-यन्त्यागछन्त्याग्नीध्रं तमाग्नीध्रे निदधाति ॥११ ॥
स निहिते जुहोति । प्रयं नोऽअग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर s एतु प्रभिन्दन् । श्रयं वाजाञ्जयतु वाजसातावयं शत्रूञ्जयतु जर्हृषारणः स्वाहेति तदे -तेनैवेतस्मिन्नन्तरिक्षे प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठत्येतेनैतं लोकं स्पृणुते ॥ १२ ॥
तदेव निदधाति ग्राव्णः । द्रोणकलशं वायव्यान्यथेतरमादायायन्ति तदुत्त-रेणाहवनीयमुपसादयन्ति ॥१३ ॥
प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । स इध्ममेवाग्रे प्रोक्षत्यथ वेदिमथास्मै बहिः प्रयच्छन्ति तत्पुरस्ताद्ग्रन्थ्यासादयति तत्प्रोक्ष्योपनिनीय विस्त्रस्य ग्रन्थिमाश्ववालः [ २१० ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण बॅसर्जन ब्राह्मण प्रस्तरउपसन्नद्धो भवति तं गृह्णाति गृहीत्वा प्रस्तरमेकवृद्बहिस्तृणाति स्ती-af बहिः कार्यमयान्परिधीन्परिदधाति परिधाय परिधीन्त्समिधावस्यादधा-त्यभ्याधाय समिधौ ॥१४ ॥
अथ जुहोति । उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने नैतं पिब प्रत्र यज्ञपति तिर स्वाहेति तदेतेनैवैतस्यां दिवि प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठत्येते लोकं स्पृणुते यदेतया जुहोति ॥ १५ ॥
यद्वेव वैष्णव्यर्चा जुहोति । कनीयांसं वाऽएनमेतद्वधात्कृत्वात्यनैषु यज्ञो स्तो- हि कमेव स्तोको ह्यप्तस्तमेतदभयं प्राप्य य एवैष तं करोति यज्ञमेव विष्णुस्तस्माद्वैष्णव्यचर्चा जुहोति ॥ १६ ॥
अथासाद्य स्रुचः । अप उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति तद्यदासाद्य नेद्वत्रेाज्येन स्रुचोऽप रेतः उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति वज्जो वाऽश्राज्यं रेतः सोमो ॥१७ ॥
सोमं हिनसानीति तस्मादासाद्य स्रुचोऽप उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति स दक्षिणस्य हविर्धानस्य नोडे कृष्णाजिनमास्तृणाति । तदेनमासादयति देवायैव सवित्रे परि-देव सवितरेष ते सोमस्तं रक्षस्व मा त्वा दभन्निति तदेनं ददाति गुप्त्यै ॥ १८ ॥
श्रथानुसृज्योपतिष्ठते । एतत्त्वं देव सोम देवो देवां २ ॥ यो उपागा दीक्षता- इदमहं मनुष्यान्त्सह रायस्पोषेणेत्यग्नीषोमो वाऽएतमन्तर्जम्भ प्रादधाते देवानां वैष्णवं दो दीक्षणीयं हविर्भवति यो वै विष्णुः सोमः स हविर्वाऽएष यदाहैतत्त्वं भवति यो दीक्षते तदेनमन्तर्जम्भऽआदधाते तत्प्रत्यक्षं सोमान्निर्मुच्यते वै देव सोम देवो देवां २॥ उपागा इदमहं मनुष्यान्त्सह रायस्पोषेणेति भूमा रायस्पोषः सह भूम्नेत्येवैतदाह ॥१ ९ ॥ प्रयोपनिष्क्रामति । स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्यऽइति वरुणपाशे वा एषोऽन्तर्भवति योऽन्यस्यासंस्तत्प्रत्यक्षं वरुणपाशान्निर्मुच्यते यदाह स्वाहा निर्वरुरणस्य पाशान्मुच्यइति ॥ २० ॥
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मरण श्रथेत्याहवनीये समिधमभ्यादधाति । अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाइत्यग्निहि देवानां व्रतपतिस्तस्मादाहाग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा इति या तब तनूर्मय्यभूदेषा सा त्वयि यो मम तनुस्त्वयभूदियं सा मयि । यथायथं नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षां दीक्षापतिरमंस्तानु तपस्तपस्पतिरिति तत्प्रत्यक्षमग्नेनिर्मुच्यते स स्वेन सतात्मना यजते तस्मादस्यात्राश्नन्ति मानुषो हिं भवति तस्मादस्यात्र नाम गृह्णन्ति मानुषो " हि भवत्यथ यत्पुरा नाश्नन्ति यथा हविषोऽहुतस्य नाश्नीयादेवं तत्तस्माद्दीक्षितस्य नाश्नीयादथात्राङ्गुलीविसृजते ॥२१ ॥
[ अनुवाद ] दीक्षा लेते समय मेखला, कृष्णविषारण, कृष्णाजिन आदि का ग्रहण किया गया था । आज उन का विसर्जन किया जा रहा है । जैसे मेखलादि ग्रहरण करते समय दीक्षणीयेष्टि की जाती है, वैसे ही उनके विसर्जन के समय भी होम किया जाता है - जिसे वैसर्जन होम कहा जाता है । मनुष्य जो दीक्षा लेता है वह जगत् के सब पदार्थों की दीक्षा है । पृथिवी से २१ वें अहर्गण तक वितत जो सोमयज है, उसे दीक्षणीयेष्टि से आत्मसात् करता है । यज्ञ पर अधिकार होते ही विश्व पर अधिकार हो जाता है, क्यों कि सकल संसार यज्ञरूप है । यजमान वैसर्जन होम के श्राश्रय से ही मेखला, कृष्णाजिन आदि का विसर्जन करता है ॥ १ ॥
जिस प्रकार होम से दीक्षा ग्रहण तथा व्रतधारणादि कर्म किये जाते हैं उसी प्रकार व्रतविसर्जन भी होम से ही करना चाहिए । क्योंकि यह होम विसर्जन सम्बन्धी है अतः यज-मान के प्रपिव्रत ( भाई बन्धुनों ) को भी इस विसर्जन होम में सम्मिलित करना चाहिए । व्रत, न या सम्पत्ति को कहते हैं । यजमान की सम्पत्ति में दायादों का भी भाग रहता है, अतः उन्हें पिव्रत कहा जाता है । अतः व्रतविसर्जन करते समय उनको भी साथ लेना चाहिए । किन्तु वे दायाद कहीं अन्यत्र चले गये हों तो उन को व्रत में सम्मिलित करना आवश्यक नहीं है । वैसर्जन होम करते समय यजमान मेखला, कृष्णाजिन आदि सभी का परित्याग कर देता है || २ || वैसर्जन होम करने का दूसरा प्रयोजन -- ' यद्वै वैसर्जनानि जुहोति ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सिद्ध होता है । वस्तु के केन्द्र में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ये तीन प्रारण रहते हैं । इन में ब्रह्मा आलम्बन है तथा विष्णुप्रारण व इन्द्रप्रारण की प्रतिष्ठा है । विष्णु अशनाया शक्ति द्वारा अन्न ला कर उस अन्न की अग्नि ग्राहुति देता है और इन्द्रप्रारण विक्षेपण शक्ति द्वारा वस्तु-केन्द्र से अन्न को बाहर फेंकता है । इस प्रकार विष्णु इन्द्र की स्पर्धा अनवरत ब्रह्मरूप प्राल-म्बन प्राण पर हुआ करती है । अग्नि में सोमाहुति को यज्ञ कहते हैं । अतः विष्णु को यज्ञ कहा जाता है - ' यज्ञो वै विष्णुः ' । इसी विष्णु ने ३३ आग्नेय देवताओं की लोक- प्रसिद्ध [ २१२. ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्राह्मणे विक्रान्ति की । क्योंकि ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आादित्य तथा द्यावापृथिवी - ये ३३ आग्नेय देवता अग्नि में सोमाहुति - रूप यज्ञ से उत्पन्न होते हैं । अतः इन्हें यज्ञिय अथवा श्राग्नेय देवता कहा ता है । न ही पृथिवी - केन्द्र से निकल कर घन, तरल, विरल भावों में परिणत हो कर उपर्युक्त ३३ देवताओं के रूप में परिणत होती है । इस यज्ञ की रक्षा विष्णु द्वारा आहृत सोम के द्वारा ही होती है । जब तक सोम की प्राहुति होती है तब तक अग्नि प्रज्वलित रहता है और घन - तरल - विरल भाव में परिणत होता हुआ आग्नेय देवताओं की निष्पत्ति करता है । इस प्रकार अग्नि का यह विक्रम सोमाहुति पर निर्भर होने से और सोमाहुति farm की अशनाया शक्ति द्वारा सम्पन्न होने से विष्णु का विक्रम कहलाता है । विष्णु प्रथम विक्रम त्रिवृत् स्तोम तक, द्वितीय विक्रम पञ्चदश स्तोम तक तथा तृतीय विक्रम एक-विश स्तोम तक करता है । त्रिवृत् स्तोम तक पृथिवी लोक, पञ्चदश स्तोम तक अन्तरिक्ष-लोक तथा एकविंश स्तोम तक द्युलोक कहलाता है । इस प्रकार तीनों विक्रमों से विष्णु तीनों लोकों को व्याप्त कर लेते हैं । यह विक्रान्ति देवतानों के लिए है । यदि यह विक्रान्ति न होती तो ३३ यज्ञिय देवताओं का स्वरूप ही नहीं बनता । जिस प्रकार यज्ञरूप विष्णु ने देवताओं के लिए तीन विक्रान्तियाँ कीं; उसी प्रकार सोमयज्ञस्वरूप विष्णु यजमान के लिए भी तीन विक्रम करता है । श्राहवनीय आग्नीध्रीय व उत्तरवेदि इन तीनों में अध्वर्यु को हुति प्रदान करना विष्णु का तीन विक्रम करना है । वैसर्जन होम के लिए आहवनीयादि तीनों अग्नियों में आहुति देना ही यज्ञरूप विष्णु की भूः भुवः स्वः, इन तीनों लोकों में व्याप्ति है । इस प्रकार तीनों लोकों में यजमान की सत्ता कायम हो जाती है ॥ ३ ॥
अध्वर्यु दिन के अपराह्न भाग में सौमिक वेदि पर कुशा बिछा कर यजमान को आधा दूध देकर ( क्योंकि आधा पूर्वाह्न में काम आ चुका है ) हविर्वेदि के आहवनीय के पास आ जाता है और वहाँ आ कर आहवनीय में अग्नि को प्रज्वलित रखने के लिए उसमें काष्ठ डाल देता है । क्योंकि ग्राहवनीय में काष्ठ नहीं डाला जायगा तो उस में अग्नि नहीं रहेगा । जिस समय अध्वर्यु आहवनीय में इध्म ( काष्ठ ) डालता है, उस समय दूसरा ऋत्विक् उपयमनी पात्र ( जिसमें बालू मिट्टी डाल कर अग्नि ले जाई जाती है ) तैयार रखता है । उधर दूसरा ऋत्विक घृत को तपाने के लिए उस आज्य विलापनी को रख देता है । एवं वही ऋत्विक् र ुचि ( जुहू और उपभृत् ) को धो कर साफ कर लेता है । उसके बाद यजमान उस सोम राजा को अपनी गोद में रख लेता है । तदनन्तर सोमक्रयणी गाय के ७ वें पद ( खुर ) की मिट्टी, जिसे कि गाय के ७ वाँ पद रखने के समय सुरक्षित रख लिया गया था, कात्य अर्थात् हविर्वेदि के आहवनीय के पश्चिम भाग में डाल देता है । सोमक्रयणी गाय के ७ वें पद की मिट्टी गार्हपत्य के पश्चिम भाग में रखना पैरों से पृथिवी पर प्रतिष्ठित होना है । यजमान सोमयाग द्वारा स्वर्ग में जाने वाला है किन्तु यावज्जीवन उसे पृथिवी में प्रतिष्ठित रहना है । अतः यजमान यावज्जीवन पृथिवी पर अपनी प्रतिष्ठा के लिए गाय के ७ वें पद की मिट्टीरूप पद को गार्हपत्य के पश्चिम भाग में डालता है ॥४ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्राह्मण कितने ही यज्ञिय उस पदपांसु को चार विभागों में विभक्त करते हैं । जब श्राहवनीय अग्नि को उपयमनी में रख कर आग्नीध्रीय में ले जाते हैं - तब उस पदपांसु के चार विभाग किये जाते हैं और अक्ष के चार भागों को चतुर्भाग पदपांसु द्वारा अक्त करते हैं तथा उपय-मनी पात्रों में चतुर्भाग पदपांसु को गार्हपत्य के पश्चिम भाग में चार भाग कर के डालते हैं ॥५ ॥
भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पदपांसु को चार विभागों में विभक्त कभी नहीं करना चाहिए । गार्हपत्य के पश्चिम भाग में एक साथ ही उस पदपांसु को डाल देना चाहिए । इसके बाद अध्वर्यु उस अग्नि पर रक्खे हुए घृत में से तृण आदि निकाल कर शुद्ध कर चार जुहू और उपभृत् में घृत को भर लेता है । पश्चात् पृषदाज्य अर्थात् दधिमिश्रित प्राज्य को पाँच बार जुहू और उपभृत् में ग्रहण करता है तथा निम्नलिखित मन्त्र बोलता है - ' ज्योति-रसि विश्वरूपं विश्वेषां देवानां समित् ' । अर्थात् हे पृषदाज्य! तुम नाना वर्णयुक्त ज्योति हो तथा सारे देवताओं का समिन्धन करने वाले अर्थात् उन्हें प्रज्वलित करने वाले हो । क्योंकि देवता आग्नेय हैं, घृत से अग्नि प्रज्वलित होता है अतः श्रग्नि का प्रज्वलित होना ही देव -ताों का प्रज्वलित होना है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' वैश्वदेवं हि पृषदाज्यम् ' इति । इस प्रकार मन्त्रोच्चारण के साथ पृषदाज्ययुक्त जुहू और उपभृत् को हाथ में धारण करता है जब कि इध्म ( काष्ठ ) प्रज्वलित हो जाता है ॥ ६ ॥
उस समय — ' त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषोभ्योऽन्य कृतेभ्य उरुयन्तासि वरूथं स्वाहा ', हे सोम! जो शरीर का छेदन करने वाले हैं, चर्म को खींचने वाले हैं जो कि अन्य कृत कृत्या -प्रयोगादि द्वेष कार्य करते हैं उनका नियमन करने वाले आप ही हैं । आप ही हमारे महात् बल हो । ऐसे आप के लिए हम प्राहुति प्रदान करते हैं । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ पृषदाज्य की गार्हपत्य में आहुति दे देता है । वैसर्जन होम में गार्हपत्य, आग्नीधीय व श्राहवनीय इन तीनों जगह प्राहुति दी जाती है । तीनों प्रग्नियों में आहुति देने से तीनों लोकों को अपने अधिकार में कर लेता है । इस तरह गार्हपत्य में हवन करता हुआ यजमान पृथिवीलोक पर अपना अधिकार कर लेता है ॥ ७ ॥
प्रथम पृषदाज्य प्राहुति स्थूल सोम के लिए दी जाती है । किन्तु द्वितीय आहुति वह सोम के सूक्ष्म रूप के लिए देता है । सोम का सूक्ष्म रूप अर्थात् सूक्ष्म सोम ' अप्त ' कहलाता है । पृथिवी पर वल्लीरूप से सोम का प्रत्यक्ष है, जो स्थूल है । अन्तरिक्ष में रहने वाले सूक्ष्म सोम का प्रत्यक्ष नहीं होता । किन्तु यह सोम अन्तरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त है, जैसा कि ' त्वमातनोसर्वन्तरिक्षम् ' यह श्रुति बतला रही है । इस आन्तरिक्ष्य सूक्ष्म सोम को प्रान्तरिक्ष्य वायु में रहने वाले दूषित कीटाणु दूषित करने की चेष्टा किया करते हैं किन्तु अतिसूक्ष्म होने से वे उस पर आक्रमण कैसे कर सकते हैं? किन्तु वैध मानुष यज्ञ में सोम सूक्ष्म नहीं अपितु स्थूल है । इस सोम का अभिषव हविर्धान के दक्षिण में होता है । वहाँ से उसे उत्तरावेदिस्थ [ २१४ ] 1