Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 231–240

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मणं श्राहवनीय में ले जाया जाता है । मध्य में अन्तरिक्ष पड़ता है । उस में दूषित कीटाणु रूप राक्षसों की सत्ता है वे उस सोम को दूषित व नष्ट न कर दें, इसलिए इस वल्लीरूप स्थूल सोम में अन्तरिक्ष्य सूक्ष्म सोम रूप प्रप्तु की भावना की जाती है । अतः अध्वर्यु - ' जुषाणो-राज्यस्य वेतु स्वाहा ' ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अप्तुसोम के लिए ग्राहव-न में दूसरी प्राहुति डालता है । पार्थिव देवता जिस समय सोम को पृथिवी से द्युलोक की ओर ले जाने लगे तब इस सोम ने इन पार्थिव आग्नेय प्राण देवताओं से कहा कि हे देवताओ! मैं राक्षसों से डरता हूँ क्योंकि आप मुझे हविर्वेदि के आहवनीय रूप पृथिवी से, जिसे शालाद्वायें कहा जाता है, हविर्धान रूप उत्तरावेदिस्थ आहवनीय में ले जा रहे हैं । मध्य में अन्तरिक्ष्य असुर स्थान पड़ता है । उनसे मुझे भय लगता है कि वे मुझ पर आक्रमण कर नष्ट न कर दें । अतः मुझे अतिसूक्ष्म बना कर आप द्युलोक रूप ग्राहवनीय में ले चलें जिससे मैं उन असुर राक्षसों की आऊँ । इसी सोम के सूक्ष्म रूप प्रप्तु को यह द्वितीय आहुति दी जाती है ॥ ८ ॥

इस प्रकार शुद्ध सोम के लिए व प्रप्तु सोम के लिए दो ग्राहुतियाँ दे कर आग्नीधीय की ओर जाने के लिए गार्हपत्य में रक्खे हुए प्रज्वलित इध्म को उठाता है तथा दूसरे ऋत्विक् कें हाथ ' में रक्खी हुई उपयमनी पर उस जलते हुए काष्ठ को रख देता है । इसके बाद अध्वर्यु होता - ' अग्नये प्रह्रियमाणाय, सोमाय प्रणीयमानाय अनुब्रूहि ' अर्थात् हे होता! श्राग्नी-की ओर ले जाते हुए अग्नि के लिए तथा सोम के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलो, इत्या-कारक प्रैष करता है । अर्थात् हे होता! प्रारण देवताओं को सुना दो कि हम अग्नि व सोम अन्तरिक्ष ( आग्नीध्रीय ) की ओर ले जा रहे हैं । पार्थिव अग्नि ही तरल - विरल भाव से अन्तरिक्ष लोक व द्युलोक में जाती है । क्योंकि सोमयज्ञ का सम्बन्ध अग्नि से है, पृथिवी - केन्द्र व से निकल कर २१ वें अहर्गण तक वितत रहने वाला पार्थिव अग्नि ही प्रकृति में अन्तरिक्ष लोक में जाता है | अतः इस मनुष्य - यज्ञ में भी पृथिवी - स्थानीय गार्हपत्य से अन्तरिक्ष-स्थानीय आग्नीध्रीय में तथा द्यलोक स्थानीय उत्तरवेदिस्थ आहवनीय में अग्नि ले जाया जाता है । अत: ' अग्नये प्रह्रियमाणाय ' इत्यादि कहा जाता है । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' अग्नये प्रह्रियमाणाय अनुब्रूहि ' इतनी ही अनुवाक्य करनी चाहिए न कि ' सोमाय प्रणीयमानाय अनुब्रूहि ' - यह कहना चाहिए । क्योंकि सोम सूक्ष्मरूप से, गुप्त रूप से, ले जाया जाता है अतः सोम सम्बन्धी अनुवाक्या नहीं करनी चाहिए ॥ ॥ अध्वर्यु आदि ऋत्विक् इस समय द्युलोक ( ग्राहवनीय ) की ओर जा रहे हैं । अतः के जिन - जिन वस्तुओं की वहाँ आवश्यकता होगी उन्हें भी साथ ले जाते हैं । उनमें सोम १. श्राज्य से प्रीति करने वाला यह अप्तुसोम श्राज्य का भक्षण करे । इस प्रप्तु को सम्यक् प्रकार से ज्याहुति प्राप्त हो । [ २१५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मरंग वैसर्जन ब्राह्मण अभि ( कूटने के लिए पाँच प्रस्तर भी हैं जिनके द्वारा दक्षिण हविर्धानशकट के दक्षिण भाग में उपरवों पर रक्खी हुई शिला पर सोम का अभिषव किया जाता है । उन्हीं पत्थरों को ग्रावा कहते हैं । इसीलिए आददते ' ग्राव्णः ' कहा है । इसके अतिरिक्त जिस कलश में अभिषुत सोमरस भरा जाता है, उस द्रोणकलश को भी ले जाते हैं । फिर, द्रोणकलशस्थ सोम को ४० पात्रों में भरा जाता है जो ' ग्रह ' नाम से व्यपदिष्ट हुए हैं । प्रकृति में ग्रह ( गैस ) वायु में रहते हैं अतः वे वायव्य हैं । प्रकृति की नकल पर मनुष्ययज्ञ में ग्रहपात्रों को वायव्य कहा गया है । इन वायव्य ग्रह पात्रों को भी साथ ले जाते हैं । इध्म ( २० काष्ठ ) भी साथ ले जाते हैं । इध्म ' इध्मं विशतिकाष्ठम् ' ( का ० श्री ० सू ० ८।७।५ ) इस श्रौतसूत्र के अनुसार २० काष्ठों का बोधक है । काष्मर्यमयी ( श्रीपर्णी की बनी हुई ) तीन परिधियाँ, वाल प्रस्तर ( घोड़े के पुच्छ की आकृति वाला तृणविशेष ), इक्षु की दो विधृतियों अर्थात् प्रस्तरों के नीचे कुशा बिछाई जाती है । इन विधृतियों पर एक - एक पत्र कुशा का भी बँध रहता है । इसी अभिप्राय से ' तद्द्बहिरुपसन्नद्धं भवति ' कहा है । दो वपा श्रपणियाँ, ( पशुवा को पकाने के लिए दो कार्य शाखाएँ ) दो रस्सियाँ, जिन में एक से पशु बांधा जाता है तथा दूसरी से यूप बांधा जाता है, अग्निमन्थन के लिए उत्तराररिंग व अधारणि रूप दो अरणियाँ, यूपा छोड़ा जिस पर अग्निमन्थन होता है, वह अधिमन्थन शकल, अभि-मत फल के वर्षरण करने वाले दो दर्भ, इस सारी सामग्री को साथ ले कर ऋत्विक् पश्चिम से ( गार्हपत्य से ) पूर्व की ओर आते हैं । अर्थात् अध्वर्यु आदि ऋत्विक् तथा ग्राव आदि सारी सामग्री यज्ञाङ्ग है । इनका पूर्व की ओर जाना यज्ञ का ही ऊपर द्युलोक की ओर जाना है । इसी अभिप्राय से कहा है- ' स एष ऊर्ध्वो यज्ञ एति ' इति ॥ १० ॥

सारी सामग्री के आ जाने पर अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण

करवाता है-' अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेम ' ॥

अर्थात् हे अग्ने! हमें धन के लिए अच्छे मार्ग से ले जाइये । आप सब मार्गों के जान-कार हैं । अपिच हे अग्ने! कुटिलता करने वालों को तथा पाप को हम से अलग कर दो । हम आपको प्रभूत नमस्कार करते हैं । यह मन्त्र बोल कर अग्नि को ही सब से आगे करते हैं । अग्नि ही आगे हो कर विनाशक तमोमय प्राणों का नाश करता हुआ जाता है । इस प्रकार भयरहित, उपद्रवरहित मार्ग से यज्ञ - सामग्री को आग्नीध्र की ओर ले जाते हैं और ऋत्विक् भी, जो अग्नि की रक्षा में हैं, प्राग्नीघ्र के पास आ जाते हैं तथा उस प्रणीत प्रग्नि को श्राग्नीध में रख देते हैं ॥ ११ ॥

आग्नीध में अग्नि के स्थापित कर देने पर अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अग्नि में आहुति देता है -[ २१६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण ' अयं नोऽग्निर्वरिवस्कृणोतु । अयं मृधः पुर एतु प्रभिन्दन् । वैसर्जन ब्राह्मणं अयं वाजान् जयतु वाजसातौ, अयं शत्रून् जयतु ज षाणः स्वाहा ' इति । अर्थात् यह अग्नि हमें सम्पत्ति और उन्नति प्रदान करे । यह अग्नि संग्रामों को छिन्न-भिन्न करता हुआ आगे चले । यह अग्नि हमारे लिए युद्ध में विजय दिलाएँ । यह अग्नि पुनः पुनः प्रसन्न होता हुआ शत्रुनों पर विजय प्राप्त करे । यह श्राज्य उस अग्नि के लिए अच्छी प्रकार से आहुत हो । इस प्रकार प्राग्नीध्रीय अग्नि में आज्य के हवन से यजमान अन्तरिक्ष प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित हो जाता है । क्योंकि आग्नीध्र अन्तरिक्ष- स्थानीय है, आग्नीध्रीय में आज्य की आहुति देना विष्णु का द्वितीय विक्रम है । इससे यजमान अन्तरिक्ष-लोक को अपने अधिकार में कर लेता है ॥१२ ॥

गार्हपत्य से लाई हुई उपर्युक्त वस्तुनों में कुछ प्राग्नीधशाला में रख दी जाती हैं तथा कुछ को उत्तरवेदि में ले जाया जाता है । आग्नीध्रीय के दक्षिण में स्थित हविर्धानशकट के दक्षिण भाग में सोम का अभिषव होता है । अतः पाँचों प्रस्तरों ( गावा ) को वहीं रख देते हैं सोमाभिषव करने के बाद उसे द्रोणकलश में रखा जाता है और फिर ४० वायव्य ग्रह-पात्रों में भरा जाता है । अतः ४० वायव्य ग्रहों को भी वहीं स्थापित कर देते हैं । इन तीन को छोड़कर शेष वस्तुनों को ले कर ऋत्विक् आगे की ओर आते हैं और अवशिष्ट वस्तुओं को उत्तरावेदि में स्थित आहवनीय के उत्तर भाग में रख देते हैं ॥ १३ ॥

हाँ कर अध्वर्यु प्रोक्षणीपात्र को ग्रहण करता है । वह सर्वप्रथम इध्म का ही प्रोक्षण करता है तदनन्तर उत्तरावेदि का प्रोक्षण करता है । इसके बाद प्रतिप्रस्थाता अध्वर्यु को कुश समर्पित करता है । अध्वर्यु उस कुशा का प्रोक्षण करता है । पश्चात् उसकी ग्रन्थि 1 खोल कर पास में विद्यमान अश्व के पुच्छ की प्राकृति वाली कुशमुष्टि को हाथ में ले कर उत्तरावेदि पर एक बार में ही बिछा देता है । कुशा का आस्तरण कर दक्षिरण, उत्तर व पूर्व में तीनों कार्यमयी ( श्रीपर्णी की बनी हुई ) परिधियों को लगा देता है । परिधियों को लगा कर ग्राहवनीयाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए उसमें समिधा डाल कर मन्त्र के साथ हुति दे देता है ॥ १४ ॥

आहुति देते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलता है—

' उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि ।

घृतं घृतयोने पि प्रप्र यज्ञपति तिर स्वाहा ' ॥ इति ॥

हे यज्ञात्मक विष्णो! यजमान की आत्मा के स्वर्ग तक व्याप्त होने के लिए आप द्युलोक तक विक्रमण करें । हे घृतयोनि अग्नि! प्राप घृत का पान कीजिए और यजमान को सम्पत्तिशाली बनाइए । इस तृतीय ग्राहवनीय में आहुति से यजमान द्युलोक में प्रतिष्ठित हो यज्ञात्मक विष्णु के तृतीय विक्रम से उस पर अधिकार कर लेता है ॥१५ ॥

[ २१७ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण अध्वर्यु विष्णुदेवताक ऋचा द्वारा हवन करता है । देवता, सोम को अन्तरिक्ष्य असुरों के वध से बचाने के लिए सूक्ष्म रूप में परिणत कर उसे अन्तरिक्ष के पार ले गए । अन्तरिक्ष में रहने वाला सोम वस्तुतः प्रप्तु ( सूक्ष्म ) है । वह द्युलोक में पहुँच कर अभय बन जाता है । वहाँ वह पुनः स्थूल रूप को प्राप्त कर लेता है । सोम का वह स्थूल रूप यज्ञ ही था । अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । पार्थिव अग्नि में सोम के स्थूल रूप वल्ली के अभिषव से निकाले हुए सोमरस की आहुति होती है । द्युलोक में भी सूर्याग्नि में सोम की आहुति होती है । किन्तु अन्तरिक्ष में सोम की आहुति नहीं होती क्यों कि वहाँ सोम का सूक्ष्मरूप है जिसे कहते हैं । क्योंकि सोम का स्थूल रूप यज्ञ है और यज्ञ विष्णु है इसलिए विष्णु-देवता ऋचा से आहुति दी जाती है ॥ १६ ॥

तृतीय प्राहुति के बाद जुहू तथा उपभृत् को उत्तरवेदि के पश्चिम भाग में बर्हि पर रख कर जल से हाथ धो कर सोम राजा को अध्वर्यु अपने हाथ में उठा कर हविर्धानमण्डप में ले जाता है । हविर्धानमण्डप में ले जाने का कारण यह है कि श्राज्य तेजोमय होने के कारण वज्र है तथा सोम रेत ( शुक्र ) है जिससे यजमान का दिव्यात्मा बनने वाला है । यदि घृतसंसृष्ट हाथ का सोमरूप रेत के साथ स्पर्श होगा तो वह वज्ररूप ग्राज्य सोमरूप रेत को जला देगा और उसकी प्रजननशक्ति नष्ट हो जाएगी । अतः हाथ धो कर ही सोम राजा को वर्धानमण्डप में ले जाया जाता है ॥ १७ ॥

हविर्धानमण्डप में जा कर अध्वर्यु दक्षिण हविर्धानशकट के नीचे ( चौतरफ से अच्छा-दित मध्यप्रदेश में ) कृष्णमृगचर्म बिछा कर उस पर सोम राजा को सविता देव के संरक्षण में रखता हुआ निम्नलिखित मन्त्र बोलता है - ' देव सवितरेष ते सोमः, तं रक्षस्व मा त्वा दभन् ' अर्थात् सविता देव! यह सोम आप का है । आप इसकी रक्षा करें । शत्रु आप पर आक्र-मरण न करें, न आपकी हिंसा करें ॥ १८ ॥

इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सोम को रख कर हाथ जोड़ता हुआ निम्नलिखित मन्त्र से अध्वर्यु सोम की स्तुति करता है-' एतत् त्वं देव सोम देवो देवान् । उपागा इदमहं मनुष्यान्त्सह रायस्पोषेण ' । इति अर्थात् हे सोम देव! आज आप देवताओं के लोक में आ गये हैं । मैं भी अपना कर्म पूरा कर सम्पत्ति के साथ मनुष्यलोक में आ गया हूँ । जो मनुष्य प्रग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश द्वारा दीक्षणीयेष्टि कर दीक्षा लेता है वह अग्नि और सोम के जम्भ ( दंष्ट्रा ) में आ जाता है । दीक्षणीयेष्टि में श्राग्नावैष्णव एकादशकपाल पुरोडाश - रूप दी गयी हवि न एवं विष्णुदेवताक है । दीक्षित को अग्नि व विष्णु की दंष्ट्रा में न बतला कर अग्नि व सोम की दंष्ट्रा में आ जाना कहा है, जिससे पूर्वापर विरोध प्रतीत होता है । पर ऐसी बात नहीं है क्योंकि जो विष्णु है वह सोम है । जो दीक्षा लेता है वह देवताओं का हवि बन जाता है । प्रग्नावैष्णव पद से अग्नि और विष्णु के द्वारा सभी ३३ आग्नेय देवताओं का [ २१८ ]

पृष्ठ 235

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण ग्रहण हो जाता है, जैसा कि ' अग्निर्वै देवानामवमः विष्णुः परमस्तदन्तरेणान्याः सर्वा देवता: ' - इस ऐतरेय श्रुति में बतलाया गया है । नीड में सोम को रखता हुआ यजमान प्रत्यक्ष रूप से सोम की दंष्ट्रा से मुक्त हो जाता है । हविर्धानमण्डप यज्ञ का मस्तक है और वही लोक है | अतः हविर्धानशकट के नीड में सोम को रखना सोम को देवताओं के पास द्युलोक में पहुँचा देना है । सोम को देवताओं के पास पहुँचा कर यजमान सम्पत्ति के साथ मनुष्य-लोक में आ जाता है । यही यजमान का सोम से विमुक्त होना है || १६ || सोम को हविर्धानशकट के नीड में रख कर ' स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु हविर्धानमण्डप से बाहर निकल आता है । अब तक यज-सोम की दाढ में था अतः वरुणपाश के बंधन में था किन्तु आज प्रत्यक्ष रूप से वह वरुणपाश से मुक्त हो गया है- ' स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान् मुच्ये ' इति ॥२० ॥

इसके बाद अध्वर्यु आहवनीय के पास आ कर ' अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः ' - मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उसमें समिधा डालता है । अग्नि देवताओं का व्रतपति है- ' अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः । अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण में कहा गया है कि हे अग्ने! जो आपका तेजो-मय शरीर है वही मेरा हो जाय अर्थात् मेरा शरीर आपके जैसा बन जाय । हे अग्ने! मेरी दीक्षा के साथ प्राप दीक्षा लें और मेरे तप के साथ आप तप करें । किन्तु यहाँ श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण से विपरीत यह कहा जा रहा है कि जो आप का शरीर मेरा हो गया था उसे वापस आप ग्रहण कर लें । तथा जो मेरा शरीर आप का हो गया था उसे वापस मुझे दे दें । हे व्रतपते अग्ने! आज से हमारे व्रत यथायथ हो जाएँ । आप अपने व्रत का पालन करें और मैं अपने व्रत का पालन करू । मेरी दीक्षा का सम्बन्ध मुझ से और आपकी दीक्षा का सम्बन्ध आप से हो । हमारे तप भी भिन्न - भिन्न रहें । इस प्रकार ' या तव तनूर्मय्यभूदेषा सा त्वयि तपस्तपस्पति: ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ ग्रध्वर्यु अग्नि के मुख से भी प्रत्यक्षरूप से निकल जाता है । अब यह यजमान पराधीन नहीं है, क्यों कि यजमान ने अपना शरीर प्राप्त कर लिया है । अब इस यजमान का अन्न खा सकते हैं, क्यों कि अग्नि से उसने अपना मानुष शरीर वापस ले लिया है । इसलिए यजमान का नाम भी ले लिया जाता है । इससे पूर्व यजमान का अन्न नहीं खाते हैं, क्यों कि उसका शरीर अग्नि का शरीर था । अतः हवि की भाँति ही दीक्षित मनुष्य का अन्न खाना भी अनुचित है, क्यों कि दीक्षित मनुष्य देवताओं का हवि बना रहता है ॥ २१ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सदोमण्डप का निर्माण हो चुका; एवं उसमें होने वाले धिष्ण्याग्नियों की इतिकर्तव्यता बतला दी गई । अब - - वैसर्जन - होम की इतिकर्तव्यता बतलाते हैं । दीक्षा लेते समय-मेखला, कृष्णविषारण, कृष्णाजिन इन सबका ग्रहरण किया जाता है । आज उनका परित्याग किया जाता है । जिस प्रकार ग्रहण करते समय - दीक्षणीयेष्टि की जाती है, तथैव छोड़ने के समय भी होम करना पड़ता । श्रतएव यह वैसर्जन होम कहलाता है । [ २१६ ]

पृष्ठ 236

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: तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्राह्मण जो दीक्षा लेता है, वह संसार के यच्चयावत् पदार्थों की दीक्षा लेता है । अर्थात् दीक्षा मनुष्य लेने वाले मनुष्य के अधिकार में संसार के यच्चयावत् पदार्थ आ जाते हैं । सारी रोदसी त्रिलोकी पर उसका प्राधिपत्य हो जाता है । कारण इसका यही है कि दीक्षा लेने वाला यज्ञ की और दीक्षा लेता है । पृथिवी से इक्कीस ( २१ ) तक वितत जो सोमयज्ञ है, दीक्षणीयेष्टि से, उसे आत्मसात् करता है । जब वह यज्ञ पर अपना अधिकार कर लेता है तो विश्व पर अधिकार जमा लेता है । क्यों कि संसार में जो कुछ है, वह यज्ञ ही यज्ञ तो है । सोलह - सतरह ( १६ - १७ ) तक वितत रहने वाले अग्नि में जब सोमाहुति होती है तो वह अग्नि इक्कीस ( २१ ) तक अर्थात् सूर्य्यं तक वितत हो जाता है । इसी को ' सोम यज्ञ ' कहते हैं । इस अग्निसोमात्मक यज्ञ से रोदसी त्रिलोकी के सारे पदार्थ उत्पन्न होते हैं । जो इस यज्ञ को आत्मसात् कर लेता है, त्रिलोकी वस्तु उसके अधिकार में आ जाती है । बस, जिस सर्वभूत यज्ञ को लक्ष्य में रख कर यजमान दीक्षणीयेष्टि द्वारा दीक्षा लेता है, वह उस दीक्षा से यज्ञ का संभरण कर दीक्षा के साधनभूत कृष्णाजिन, मेखलादि का परित्याग करता है । मेखला इत्यादि दीक्षा के साधन हैं एवं दीक्षा से यज्ञ आत्मसात् होता है । जब यज्ञ श्रात्मसात् हो जाता है तो फिर दीक्षा साधनों की कोई श्रावश्यकता नहीं रहती । स्थाली या तवे की आवश्यकता तभी तक रहती है जब तक कि दूध गरम न हो जाय, एवमेव दीक्षा साधनों की आवश्यकता भी तभी तक रहती है, जब तक कि यज्ञ आत्मसात् न हो जाय । दीक्षणीयेष्टि से धिष्ण्या तक सारा यज्ञ श्रात्मसात् हो जाता है । अतएव दीक्षा के साधनों को रखने की अब कोई आवश्यकता नहीं है । अतः आज यह यजमान उन सारे साधनों को छोड़ देता है-" सर्वं वाऽएषोऽभिदीक्षते । यो दीक्षते यज्ञं ह्यभिदीक्षते । यज्ञं ह्येवेदं सर्व-मनु । ( इदं सर्वं यज्ञमनुसृत्य उत्पन्नम् ) तं यज्ञं ( दीक्षया ) संभृत्य यमिममभिदीक्षते सर्वमिदं विसृजते । ( यमिमं सर्वं भूतं यज्ञमभिलक्ष्य दीक्षते तं यज्ञं संभृत्य कृष्णा-जिन मेखलादिकं सर्वं विसृजते ॥१ ॥

सर्जन होम किस लिए किया जाता है, इसका कारण बतलाते हैं-" यत् ( यस्मात् कारणात् ) वैसर्जनानि जुहोति ( तस्य कारणमुच्यते ) " । यह होम विसर्जन का साधन है, अतएव इसे वैसर्जन होम कहते हैं । जिस प्रकार होम से दीक्षा ली जाती है, व्रतग्रहण किया जाता है तथैव व्रत- विसर्जन भी होम से ही करना चाहिए । बस । अतएव आज यह यजमान वैसर्जन होम करता है । यज्ञ के साधनभूत मेखलादि जो भी कुछ थे, उनका आज यह यजमान इस होम द्वारा विसर्जन करता है । प्रतएव विसर्जन साधनत्वात् इस होम को ' वैसर्जन ' होम कहते हैं । चूँकि यह वैसर्जन होम विसर्जन सम्बन्धी है, अतएव इस यजमान का जो प्रपिव्रत हो अर्थात् भाई बन्धु हो - एक वंश का हो, उसे भी इस वैसर्जन होम में शामिल हो जाना चाहिए । व्रत कहते हैं- -अन्न को - संपत्ति को । इस संपत्ति में दायादों का भी हिस्सा रहता है, श्रतएव उन्हें प्रपिव्रत कहा जाता है । अपव्रत का आचार्य लोग भिन्न - भिन्न प्रकार से अर्थ करते हैं । पितृभूति प्राचार्य का कहना है कि जिन [ २२० ]

पृष्ठ 237

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण बैसजैन ब्राह्मण का यजमान के व्रत में ( अन्न में, संपत्ति में ) हिस्सा है, जो दायाद होने के कारण यजमान के व्रत से अलग नहीं होते हैं, वे अपिव्रत कहलाते हैं । कर्काचार्य का कहना है कि जो सगोत्र होते हैं उन्हें ही प्रति कहा जाता है । परन्तु इन अर्थों में परस्पर विरोध नहीं है । आज यजमान व्रत विसर्जन करना चाहता है, एवं इसमें पव्रतों का, बन्धु वर्ग का भी हिस्सा है । अतएव उन्हें भी वैसर्जन होम में शामिल कर लिया जाता है । परन्तु प्रपित्रत यदि कहीं परदेश चला गया हो तो उसकी अधिक अपेक्षा भी न रक्खे । तात्पर्य यही है कि अविव्रत का वैसर्जन होम में शामिल होना अत्यावश्यक ही नहीं है । ' यदि प्रपिव्रत शामिल न हो तो वैसर्जन होम ही न होगा ' - यह बात नहीं है । यदि वह उस समय वहाँ मौजूद हो तो उसे शामिल कर लेना चाहिए । यदि न हो, तो उसकी प्रतीक्षा भी नहीं करनी चाहिए । जिस समय यजमान वैसर्जन होम करता है अर्थात् अग्नि में आहुति डालता है, उसे चाहिए कि वह उसी समय मेखलादि दीक्षा के सारे साधनों का परित्याग कर दे । स यदिदं सर्वं विसृजते तस्माद् वैसर्जनानि नाम ( विसर्जनसाधनत्वात् वैसर्जनानि इति नाम संपन्नमिति भावः ) तस्माद् ( विसर्जन सम्बन्धित्वाद् ) यो s पितः स्यात् ( यजमानेन सह प्राप्तभोजनः स्याद् - बन्धुवर्गः स्यात् ) सोऽन्वा-रभेत । यद्यु अन्यत्र चरेन्नाद्रियेत । ( सर्वथा श्राह्नातव्य एव इति बुद्धिं न कुर्य्यात् ) द्वै ( यस्मिन् समये ) जुहोति तदेव ( तस्मिन्नेव समये ) इदं सर्वं विसृजते ॥२ ॥

विसर्जन के लिए होम करना अत्यन्त आवश्यक है, अतएव व्रत - परित्याग के समय वैसर्जन होम किया जाता है । इस प्रकार वैसर्जन होम करने का एक प्रयोजन तो यही है । अब दूसरा प्रयोजन और बतलाते हैं । " य व वैसर्जननानि जुहोति ' तदुच्यते " | यज्ञ को ही पिण्ड कहते हैं । शरीर के केन्द्र में -ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ये तीन प्राण रहते हैं । ब्रह्मा आलम्बन है - इन्द्र और विष्णु की प्रतिष्ठा है । विष्णु श्रादान करने वाले हैं एवं इन्द्र विक्षेपण करने वाले हैं । बाहर से अन्न ला ला कर शरीराग्नि में आहुति देना- विष्णु की अशनाया शक्ति का काम है, एवं थाए हुए अन्न को विक्षेपण आदि से रोमावलियों द्वारा बाहर फेंक देना- इन्द्र का काम है । इस प्रकार इन्द्र और विष्णु में अनवरत स्पर्धा चलती रहती है । fe में सोम की आहुति डालने को यज्ञ कहते हैं । यह काम विष्णु द्वारा होता है । पृथिवी के केन्द्र में रहने वाले प्रशनाया शक्तिशाली विष्णु ही इक्कीस ( २१ ) तक आक्रमण कर पार्थिवाग्नि में सोमाहुति डाल कर यज्ञ - स्वरूप बनाते हैं । अतएव हम विष्णु को अवश्य ही यज्ञ कह सकते हैं । इसी विष्णु ने पार्थिव आग्नेय यज्ञिय देवतानों के लिए उस विक्रान्ति को सम्पन्न किया है, जो कि श्राज संसार में प्रसिद्ध है । आठ ( ८ ) वसु, एकादश ( ११ ) रुद्र, द्वादश ( १२ ) आदित्य द्यावापृथिवी । ये तेतीस ( ३३ ) देवता हैं | १. पृथिवी देवता एवं अनेक द्यु - देवता - इन दोनों के सम्बन्ध से ३३ देवता हो जाते हैं । इन दोनों देव-ताओं के विषय में विकल्प हैं, कितने ही विद्वान् - ' नासत्य ' व ' दस्र ' नामक अश्विनी कुमारों से ३३ देवतानों की संख्या - पूर्ति करते हैं । ( शत ० ४।५।७।२ ) [ २२१ ]

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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण २.१ २० १८ एकविंशस्तोमः प्रादित्यः १४ १७ ( २१ ) आग्नेयी -देवप्राणरूपा -यज्ञिया-पृथिवी १६ १५. ( अमृत -शुक्रमयी ) १४. १३ पञ्चदशस्तोमः १२ वायुः ११ १० ( १५ ) त्रिवृत्स्तोमः अग्निः ४ ३ ९ वाक्प्राप ग्रामी भूपिण्डः ( मर्त्यशुक्रमयः ) [ २२२ ] वैसर्जन ब्राह्मणं वाकू - शुक्रम् → आपः - शुक्रम → अग्निः शुक्रम् चूँकि ये तेतीस ( ३३ ) देवता हैं तथा अग्नीषोमात्मक यज्ञ से उत्पन्न होते हैं, अतएव ये यज्ञिय देवता कहलाते हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-" इति स्तुतासो अस्था रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " इति । ( ऋग्वेद मं ० ८ । ३० । २ ) पृथिवी - पिण्ड से निकलने वाला जो अग्नि है, वह पृथिवी के इक्कीसवें ( २१ वें ) अहर्गण तक वितत रहना है । इस अग्नि की घन - तरल - विरल ये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । त्रिवृत् तक ग्रग्नि रहता है । इसकी अवान्तर आठ अवस्थाओं को प्राठ वसु कहते हैं । इन आठों में पहले वसु का नाम ' अग्नि '

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 239 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) १. ( ऐ ० ब्रा ० अ ० १।१ ) २. नौवाँ ( 8 ) ग्रहण | ३. पन्द्रहवाँ ( १५ ) हरण । वैसर्जन ब्राह्मण. शतपथ ब्राह्मण ४. इक्कीसवाँ ( २१ ) हरण । ५. डग, कदम । [ २२३ ] है एवं पञ्चदश स्तोम तक तरल अग्नि रहता है । इसे अग्नि न कह कर वायु कहा जाता है । इसकी अवान्तर एकादश ( ११ ) अवस्थाओं को रुद्र कहा जाता है । एवं एकविंश स्तोम तक विरल अग्नि रहता है । इसकी अवान्तर द्वादश ( १२ ) अवस्थाओं को आदित्य कहा जाता है । इनमें बारहवें ( १२ वें ) आदित्य का नाम विष्णु है । बस, इस प्रकार अग्नि से विष्णु तक द्यावा - पृथिवी को मिलाने से तीस ( ३३ ) देवता हो जाते हैं । अग्नि सब के आदि में है, विष्णु सब के अन्त में है । श्रतएव ' अग्निर्वे देवा-नामवम विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: '? यह कहा जाता है । बस, यही यज्ञ का स्वरूप है । इस यज्ञ की रक्षा विष्णु के विक्रम से ही होती है । देवता आग्नेय हैं, अग्नि अन्नाद स्वरूप है । इसमें जब तक अन्नाहुति पड़ती रहती है, तब तक यह प्रज्वलित रहता है । इस अन्न का आहरण करना अंश-नयाधिष्ठाता विष्णु का काम है । पृथिवी के केन्द्र में से निकल कर विष्णु, त्रिवृत् स्तोम? तक पहला विक्रमण करते हैं, पञ्चदश स्तोम तक दूसरा विक्रमण करते हैं एवं एकविंश स्तोम तक तीसरा विक्र मरण करते हैं । त्रिवृत् तक ' पृथिवी - लोक ' कहलाता है - पञ्चदश तक ' अन्तरिक्ष- लोक ' कहलाता है, एकविंश तक - लोक कहलाता है । इस प्रकार तीन विक्रम से विष्णु भगवान् तीनों लोकों में व्याप्त हो जाते हैं । यह विक्रान्ति देवताओं के लिए है । यदि यह विक्रान्ति न होती तो आग्नेय देवताओं के लिए सोमाहुति न होती - सोमाहुति न होती तो अग्नेय देवताओं की ही सत्ता न रहती । बस, इसी प्राकृतिक विज्ञान को बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" यज्ञो वै विष्णुः । स देवेभ्य इमां विक्रान्ति विचक्रमे येषामियं विक्रान्तिः " । अर्थात् वसु रुद्र प्रादित्यों की त्रिवृत् पञ्चदश एवं एकविंश में जो व्याप्ति देख रहे हैं वह असल में, विष्णु की ही व्याप्ति है । इदमेव प्रथमेन पदेन पस्पार । अथेदमन्तरिक्षं द्वितीयेन दिवमुत्तमेन । जिस प्रकार विष्णु ने यज्ञ में देवताओं के लिए विक्रान्ति की थी तथैव सोम यज्ञ - स्वरूप विष्णु यजमान के लिए तीन विक्रम करता है । ग्राहवनीय, अग्निधीय एवं उत्तरावेदि में श्रध्वर्यु जो आहुति डालता है - वह यज्ञविष्णु का ही विक्रमरण ( चलना, कदम रखना ) है । वैसर्जनहोम के लिए तीनों अग्नियों में आहुति देनी पड़ती है । बस, ये ही यज्ञ - विष्णु के तीन विक्रमण है । तात्पर्य यही हैं कि दीक्षणी-येष्टि में यजमान अग्नीवैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश से, अग्नि - विष्णु को आत्मसात् कर लेता है । आज उसकी समाप्ति के लिए अन्तिम सीमा पर पहुँच कर वैसर्जन होम करता है । जिस प्रकार विष्णु ने तीन विक्रम किए थे तथैव तीनों जगह प्राहुति डालना ही तीन विक्रम करना है एवं तीनों लोकों में

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं वैसर्जन ब्राह्मण वैसर्जन करने का दूसरा यजमान सत्ता कायम करता है । बस, इसीलिए वैसर्जन होम किया जाता है । यही कारण हैं । " एता एव एष ( यज्ञाख्यो विष्णुः ) एतस्मै ( यजमानाय ) विष्णुर्यज्ञो विक्रान्तिं विक्रमते यज्जुहोति । ( श्राहवनीयाग्नी प्रीयोत्तरवेदिरूपेषु त्रिषु स्थानेषु होम एवात्र यज्ञाख्यस्य विष्णोर्यजमानार्थ लोकत्रयव्याप्तिरित्यर्थः ) तस्माद् वैसर्जनानि जुहोति " ॥३ ॥

हैं । वैसर्जन होम क्यों करना चाहिए, इसका कारण बतला दिया गया । श्रब पद्धति बतलाते अर्थात् अध्वर्यु अपराह्न काल में दिन के बारह ( १२ ) बजे बाद - सौमिक - बेदिका कुशा से प्रास्तर आ गया करके था ) हवि -उस पर कुशा बिछा कर यजमान को श्राधा दूध दे कर ( क्योंकि प्राधा पूर्वाह्न में काम प्रज्वलित र्वेद के आहवनीय के पास आ जाता है । वहाँ आ कर वह प्रध्वर्यु - उस ग्राहवनीय में अग्नि को अवस्था करने के लिए काष्ठ डाल देता है । यहीं से आग्नीध्रीय ' में अग्नि ले जाया जाएगा । ऐसी पूर्व का नि ' ले जाया जाएगा तो इसमें अग्नि न रहेगा अतएव और इध्म ( समिधा ) तैय्यार डाल दिया जाता है । जिस समय अध्वर्यु इध्म डालता है, उसी समय और दूसरा ऋत्विक् उपयमनी जाई जाती है । रखता है । एक पात्र में बालू मिट्टी रख ली जाती है । इसी पर प्रग्नि रख कर ले इसी को ' उपयमनी ' कहते हैं । इस प्रकार इधर एक ऋत्विक् उपयमनी लिए खड़ा रहता है, उधर दूसरा ऋत्विक् घृत को तपाने के लिए उस पर प्राज्य विलापिनी को रख देता है एवं वही उस ऋत्विक् सोमराजा झटपट को वा और स्र ुचि ( जुहूभृत् ) को, धो - धो कर साफ कर लेता है । तदनन्तर, यजमान जिसे ' अपनी गोद में रख लेता है । इसके अनन्तर सोमक्रयणी गाय के सातवें खुर की जो मिट्टी थी के कि, उसी समय सुरक्षित रखने के लिए कह दिया गया था उसे, इस समय, गार्हपत्य के ( हविर्वेदि आहवनीय के ) पश्चिम भाग में डाल देता है । सोमक्रयणी गाय को सात पैंड ( कदम ) चला कर उसके खुर की मिट्टी को सुरक्षित स्थान में रख दिया जाता है । श्राज उसका काम पड़ता है । श्राज इसे भाग गाई- में पत्य के - पश्चिम भाग में डाल दिया जाता है । ' सातवें पद की मिट्टी गार्हपत्य के पश्चिम क्यों डाली जाती है - इसका कारण बतलाते हैं । यह गार्हपत्य पृथिवी - स्थानीय है एवं गार्हपत्य के पश्चिम • भाग में डाले जाने के कारण यह मिट्टी पैर की प्रतीक है । इस प्रकार गार्हपत्य के पश्चिम भाग में मिट्टी 4 रखना पैरों से पृथिवी पर प्रतिष्ठित होना है । यजमान स्वर्ग - गमन का अभिलाषी है परन्तु यावज्जीवन इसे गार्हपत्य में अर्थात् पृथिवी में प्रतिष्ठित रहना है अतएव यजमान की प्रतिष्ठा के लिए पद की मिट्टी को गार्हपत्य के पश्चिम भाग में डाला जाता है ---" सो s परा वेदि स्तीर्त्वा श्रर्द्धव्रतं प्रदाय सम्प्रपद्यन्ते । इध्ममभ्या-दधति । उपयमनीरुपकल्पयन्ति । आज्यमधिश्रयति । सुचः सम्माष्टि । उपस्थे १. यज्ञाग्नि प्रज्वलित करने का स्थान । [ २२४ ]