Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 241–250

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण राजानं यजमानः कुरुते । श्रथ सोमक्रयण्यै ( सोम क्रयण्याः ) पदं जघनेन गार्हपत्यं परिकिरति । यदा वै प्रतितिष्ठति । प्रतिष्ठित्याएव - ( स क्षेपः- ' प्रतिष्ठित्यै ' सम्पद्यते ) " ॥४ ॥

कितने ही याज्ञिक उस पदपांसु को चार भागों में विभक्त करते हैं । उनका कहना है कि जहाँ श्राहवनीय का उद्धरण करते हैं- श्रर्थात् आहवनीय श्रग्नि को उपयमनी पात्रों में रख कर श्राग्नीध्रीय में ले जाते हैं, वहाँ उस पदपांसु के चार विभाग करते हैं और अक्ष के चार भागों को चतुर्भाग पदपांसु के द्वारा क्त करते हैं ( लीपते हैं ) तथा उपयमनी - पात्रों में चतुर्भाग पदपांसु को गार्हपत्य के पश्चिम भाग में चार भाग करके डालते हैं । " तके चतुर्द्धा कुर्वन्ति यत्राहवनीयमुद्धरन्ति तापयमनीषु चतुर्भाग-मक्षं चतुर्भागेरणोपाञ्जन्ति एतासूपयमनीषु चतुर्भागं जघनेन गार्हपत्यं चतुर्भागं परिकिरति " || ५ || परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । गार्हपत्य के पश्चिम में एक साथ ही उस पदपांसु को डाल देना चाहिए । अलग - अलग करके डालने की कोई आवश्यकता नहीं है । " तदु तथा न कुर्यात् । सार्धमेव परिकिरेत् जघनेन गार्हपत्यम् " । तदनन्तर उस अग्नि पर रक्खे हुए घृत में से तृरण आदि निकाल कर चार बार जुहू और उपभृत् में घृत लेना चाहिए | इस प्रकार चतुर्गृहीत जुहू और उपभृत् में - मन्त्र बोलता हुआ पाँच बार पृषदाज्य श्रौर डालता है । घी में दही मिला कर उसे एकमेक कर दिया जाता है । बस, दधिमिश्रित आज्य को ही पृषदाज्य कहते हैं । पहले जुहूपभृत् में चार बार शुद्ध घृत ले लेना चाहिए बाद में उसी में निम्न-लिखित मन्त्र बोलते हुए पाँच बार पृषदाज्य ले लेना चाहिए । " थोत् पूयाज्यं चतुर्गृहीते जुह्वां चोपभृति च गृह्णाति पञ्चगृहीतं पृष-दाज्यम् | ' ज्योतिरसि विश्वरूपं विश्वेषां देवानां समित् ' इति " । हे पृषदाज्य! आप नाना वर्णयुक्त ज्योति हो । एवं सारे देवताओं का सम्मिधन करने वाले हो । श्राज्य तेजस्वरूप है । इसीलिए तो ' तेजो वै घृतम् ' यह कहा जाता है । एवं देवता सारे आग्नेय हैं । घृत अग्नि को प्रज्वलित कर देता है । श्रतएव " आप सौर देवताओं को प्रज्वलित करने वाले हो " - यह कहा गया है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि " वैश्वदेवं हि पृषदाज्यम् " । प्रर्थात् पृषदाज्य - वैश्वदेव है, अतएव ' विश्वरूपं - और - विश्वेषां देवानां समित् ' ( वा ० सं ० ५।३५ ) यह कहा गया है । इस प्रकार मन्त्र के साथ इध्म प्रज्वलित पृषदाज्य युक्त स्रुविका अर्थात् जुहूपभृत को हाथ में उठा कर तय्यार रखते हैं । जिस समय हो जाता है -[ २२५ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) उसी समय-शतपथ ब्राह्मण

" धारयन्ति स्रुचः । यदा प्रदीप्त इध्मो भवति ॥ ६ ॥

वैसर्जन ब्राह्मण " त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषोभ्यो ऽन्यकृतेभ्य उरु यन्तासि वरूथं स्वाहा " ( वा ० सं ० ५।३५ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस पृषदाज्य की इस गार्हपत्य में आहुति डाल देता है । जो शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाले हैं - खाल खींचने वाले हैं, उन्हें ' तनूकृत् ' कहा जाता है । परन्तु जिसके शरीर में सोम अधिक होता है, वह अधिक बलवान् होता है । उसके शरीर पर सहसा कोई दूसरा हमला नहीं कर सकता । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि हे सोम! आप शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाले राक्षसों के जो द्वेष हैं - जो कि अन्यकृत हैं, उनके नियन्ता हैं । अर्थात् - तनूनकृत- हमारे नहीं हैं, हमारे बगैर हैं । उनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । उन लोगों के जो द्वेष हैं अर्थात् कृत्या प्रयोग हैं- उनको रोकने वाले आप ही हैं । शत्रुओं के आक्रमण से मुझे आप ही बचाने वाले हैं । असुर- प्रेरित कृत्या किस प्रकार हमारा नुकसान नहीं करे, उसी तरह आप हमारी रक्षा करते हैं । आप हमें आफत से बचाते रहते हैं, अतएव एकमात्र आप ही हमारे बहुत बड़े ( उरु ) बल ( वरूथ ) हैं । हमारी ताकत आप ही हैं । ऐसे आपके लिए हम आहुति देते हैं । हमने बतलाया था कि वैसर्जन होम में गार्हपत्य, आग्नीध्रीय और उत्तरावेदिक आहवनीय में तीन जगह- प्राहुति डाली जाती है । ये तीनों - तीनों लोकों के रूप में हैं । तीनों ग्राहुतियों से यजमान तीनों लोकों को अपने कब्जे में कर लेता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि आहवनीय हवन से यह यजमान इस पृथिवी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता है एवं इस हवन से वह इस पृथिवी लोक पर अपना अधिकार जमा लेता है । " तदेतेनैव ( आहवनीय हवनेनैव ) अस्यां पृथिव्यां प्रतिष्ठायां प्रति-तिष्ठति । एतेनेमं लोकं स्पृणुते ॥७ ॥

यह पहली पृषदाज्य प्राहुति स्थूल सोम के लिए दी जाती है एवं दूसरी आहुति ' अस्तु ' --सोम के लिए ( ' सूक्ष्म सोम ' के लिए ) दी जाती है । अत्यन्त सूक्ष्म सोम को अप्तु सोम कहते हैं । यह दो प्रकार की हो सकती है । इसके किरचे- किरचे बना लेना, जरा - जरा से कतरे कर डालना सूक्ष्मता भी सूक्ष्मता है । एवं वल्ली में से भाप बना कर निकाल लेना, यह भी सूक्ष्मता है । दोनों ही अपतु सोम कहलाते हैं । आग्नीध्रीय अन्तरिक्ष - स्थानीय है । अन्तरिक्ष में रहने वाला सोम अन्तर्हित रहता है पर तो वल्लीरूप में सोम का प्रत्यक्ष हो जाता है, किन्तु अन्तरिक्ष में भरा हुआ सोम ( दिक् । पृथिवी गोचर नहीं होता । इसी सोम के लिए " त्व मातनो सर्वान्तरिक्षम् ' यह कहा जाता है । चूँकि अन्तरिक्ष ) दृष्टि-में सोम बहुत ही सूक्ष्म रहता है, अतएव इसे हम ' अस्तु ' कहने के लिए तैयार हैं । वे सोम को दूषित करने की चेष्टा किया करते हैं । इन राक्षसों को दूषित परमाणुओं को अन्तरिक्ष में ही प्राक्रमण [ २२६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्राह्मण करने का मौका मिलता है । जहाँ अग्नि की प्रबलता रहती है, वहाँ इन दूषित परमाणुत्रों की दाल नहीं गलती । अग्नि उसी समय फिल्टर कर देता है । पृथिवी में भी ग्रग्ति है -सूर्य्य में भी अग्नि है, अतएव इन दोनों लोकों पर तो असुर आक्रमण करते हुए घबराते हैं, परन्तु अन्तरिक्ष में चूंकि अग्नि कमजोर हो जाता है, अतएव वहाँ असुरों को मौका मिल जाता है । परन्तु वहाँ सोम ऐसी सूक्ष्म अवस्था में रहता है कि असुरों को उसका पता ही नहीं लगता । पृथिवी में से ऊपर की ओर जाने वाला सोम उसी समय भाप बन कर उड़ जाता है । यह प्राकृतिक परिस्थिति है । हमारे यज्ञ का वितान इसी की अनुकृति पर हुआ है । हविर्वेदिका ग्राहवनीय पृथिवी है । इसी को शालाद्वार्य्यं एवं शालामुखीय भी कहा जाता है । प्राग्नीय अन्तरिक्ष स्थानीय है । एवं उत्तरावेदिस्थ आहवनीय द्युलोक है । हविर्धान के दक्षिण में सोमाभिषव होता है एवं वह इस ग्राहवनीय से ले जाया जाता है । मध्य में अन्तरिक्ष पड़ता है । यह श्रसुर - स्थान है । इसकी रक्षा के लिए इस वल्ली सोम की प्रप्तु अवस्था की, प्रतीक अन्तरिक्ष्य अतु सोम की सूक्ष्म अवस्था की भावना की जाती है । ग्राहवनीय से पूर्व की ओर जो हम सोम ले जा रहे हैं - वह तो अप्तु है । अर्थात् प्रति सूक्ष्म होने से अक्षय है । जब यह असुरों को दीखेगा ही नहीं तो असुर हमला क्यों कर करेंगे? बस, इसी रहस्य को अलङ्कार रूप से बतलाते हुए याज्ञवलय कहते हैं कि इसके अनन्तर अध्वर्यु - अप्तु सोम के लिए निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ ग्राहवनीय में दूसरी ग्राहुति डालता है | वह मन्त्र यह है ---" जुषाणोऽतुराज्यस्य वेतु स्वाहा " । इति ( वा ० सं ० ५।३५ ) वह अप्तु नाम का सूक्ष्म सोम - ग्राज्य को प्रसन्नतापूर्वक, रुचिपूर्वक, खाए । प्राज्याहुति ग्रहण करे । भाज्य से प्रसन्न रहने वाले सोम के लिए स्वाहा है । पूर्वोक्त रहस्य बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-ने पार्थिव देवता जिस समय सोम को पृथिवी से द्युलोक की ओर ले जाने लगे तो आग्नीध्रीय इस सोम अर्थात् ही उन पार्थिव आग्नेय प्राण देवताओं से कहा कि हे देवताओ! मैं राक्षसों से डरता हूँ । राक्षस मुझे न दश स्तोम एवं ग्राहवनीय अर्थात् त्रिवृत् स्तोम के बीच में -अन्तरिक्ष में असुर ऐसे और उपाय से मुझे - शत्रु यार बैठें । बस, मुझे यही डर लग रहा है । जिस विधि से मुझे ये न मार सकें- द्युलोक की ओर मुझे के आक्रमण और वध से बचा कर बहुत छोटा बना कर - सूक्ष्म बना कर - ग्राप मेरे लोग ऊपर हमला कर बैठें-ले चलिए । जिस स्वरूप से असुर लोगों की दृष्टि मुझ पर पड़ जाय - एवं वे हैं उससे छोटा बना कर उसकी अपेक्षा मेरा स्वरूप सूक्ष्म बना दें । जिस स्वरूप में ये मेरा वध कर सकते मुझे यहाँ से निकाल ले चलें । जब मैं उनकी नजर में ही नहीं ग्राऊँगा तो फिर वे हमला किस पर करेंगे? “ कनीयासं वधात् " का यही ताल है । आप मुझे स्तोक बना कर ले चलिए - सोम ने यही कहा । बिन्दु की तीन किस्म होती हैं ---१ - शून्य बिन्दु - ( कुछ नहीं ) २ - स्तोक बिन्दु — ( हिसाब अर्थात् परिमाण वाली ) [ २२७ ]

पृष्ठ 244

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण ३ - द्रप्स बिन्दु - ( पानी की बूंद - ड्राप्स ) यह स्तोम अन्तरिक्ष में बिल्कुल स्तोक रूप में परिणत हो जाता है । सर्जन ब्राह्मण " एष उ हैवैतदुवाच - रक्षोभ्यो वै बिभेमि यथा मा ( माम् ) अन्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि न हिनसन् एवं मा ( माम् ) कनीयांसमेव वधात् कृत्वा प्रतिनयत स्तोकमेव " । रहस्य को और भी स्फुट करने के अभिप्राय से कहते हैं कि अन्तरिक्ष में रहने वाला जो अतु सोम है, वह वास्तव में स्तोक ही है, प्रर्थात् सूक्ष्म ही है । पार्थिव प्राणदेवता इसे शत्रुओं के वध से बचाने के लिए छोटा बना कर ही अन्तरिक्ष में ले गए । राक्षसों के डर से सोम अन्तरिक्ष में जा वास्तव में छोटा हो गया है, सूक्ष्म हो गया है । कर " स्तोको तुरिति । तमेतत् कनीयांसमेव वधात् कृत्वा अत्यनयन् स्तोकमेव । स्तोको ह्यप्तुः । रक्षोभ्यो भीषा " । इस प्रकार प्रकृति - मण्डल में अन्तरिक्ष की ओर जाता हुआ सोम अप्तु कहलाता है । को आज यह अध्वर्यु आग्नीध्रीय स्वरूप अन्तरिक्ष की ओर लेजा रहा है, अतएव इसे हम अप्तु कह इसी सोम सकते

हैं । बस इस अप्तु के लिए ही यह दूसरी प्राहुति दी जाती है ।

" तस्मादप्तवे द्वितीयामाहुति जुहोति ॥८ ॥

कपूर, स्पिरिट, ईथर - ये सब सोम हैं । ये तत्क्षण उड़ जाते हैं । इन्द्र उस समय इसे राक्षसों के आक्रमण से बचा ले जाता है । इस प्रकार गार्हपत्य में - शुद्ध सोम के लिए एवं प्रप्तु सोम के लिए दो प्राहुतियाँ दे कर प्राग्नीधीय की ओर जाने के लिए - गार्हपत्य में रक्खी हुई प्रज्वलित इध्म को उठाता है एवं दूसरे में रखी हुई उपयमनी पर उस जलती हुई लकड़ी को रख देता है । इस प्रकार इध्म रख ऋत्विक् के हाथ होता से प्रैष करता है- कर यह अध्वर्यु " अग्नये प्रह्रियमाणायानुब्रूहि - सोमाय प्ररणीयमानाय - अनुब्रूहि " । हे होतृ! ग्राग्नीधीय की ओर ले जाते हुए अग्नि और सोम के लिए ग्रनुवाक्या प्राणदेवताओं को सुना दो कि अब हम अग्नि और सोम दोनों को अन्तरिक्ष की ओर ले जाते मन्त्र हैं । बोलो पार्थिव । अग्नि ही तरल- विरल रूप से अन्तरिक्ष और द्युलोक में जाता है । सोम यज्ञ का सम्बन्ध है । पृथिवी में से निकल कर २१ एकविंश तक वितत रहने वाला पार्थिव अग्नि ही स्तोम इसी यज्ञाधिष्ठाता अग्नि से [ २२८ ]

पृष्ठ 245

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथं ब्राह्मणं वैतर्जन ब्राह्मणं है । अतएव हमारे इस मनुष्य यज्ञ में भी पृथिवी स्थानीय गार्हपत्य में से ही अन्तरिक्ष- स्थानीय ग्राग्नी-धीय में, स्थानीय उत्तराहवनीय में, अग्नि ले जाया जाता है । आज उपयमनी पर रख कर अग्नि ले जाया जा रहा है, अतएव ' अग्नये ' इत्यादि कहा है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - ' श्रग्नये प्रहि-यमाणायानुब्रूहि ' यही बोलना चाहिए । ' सोमाय प्रतीयमानायानुब्रू हि ' हर्गिज नहीं बोलना चाहिए | कारण इसका यही है कि यह सोम प्रप्तु रूप से, सूक्ष्म रूप से, गुप्त रूप से जा रहा है । प्रकृति - यज्ञ में -यद्यपि अग्नि - सोम दोनों ही अन्तरिक्ष की ओर जा रहे हैं किन्तु अग्नि उल्वण है, सोम अदृश्य है । अत-• एव इसके लिए अनुवाक्या कभी नहीं करनी चाहिए-“ उद्यच्छन्तीध्मम् । उपयच्छन्त्युपयमनीः । अथाह ( अध्वर्युः ) अग्नये प्रह्रियमाणायानुब्रूहि । सोमाय प्ररणीयमानायेति वा । अग्नये हियमारणायानु-ब्रूहि - इति त्वेव ब्रूयात् ॥ ९ ॥

' गार्हपत्य ' के समय अध्वर्यु आदि कायिक लोग द्युलोक की ओर जा रहे हैं । अतएव यहाँ से जिन - जिन चीजों की जरूरत मागे पड़ेगी, उन सब को साथ लेते जाते हैं । दक्षिण हविर्धान् के दक्षिण भाग में - उपरवों पर रक्खी हुई जो शिला है, उस पर सोम का अभिषव होता है । उसके लिए पाँच पत्थर होते हैं । उन्हें ही ग्रावा कहते हैं । उन पाँचों पत्थरों को साथ ले लेते हैं । ' प्रददते ग्राव्ण: ' । एवं जिस घड़े में सोम - रस भरा जाता है, वह द्रोणकलश कहलाता है । यह द्रोणकलश बहुत बड़ा होता है । इसे साथ ले लेते हैं-" द्रोणकलशम् ' ( श्राददते ) " । एवं ४० ( चालीस ) वायव्य पात्र ले लेता है । सोम को चालीस पात्रों में भर दिया जाता है जो चालीस ' ग्रह ' कहलाते । प्रकृति में, वायु में, ४० ( चालीस ) प्रकार के ग्रह रहते । इन्हीं को गैस कहा जाता है । ये चालीस हैं- जैसा कि श्रुति कहती है-" षट् त्रिशांश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम् । यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वर्त्तयन्ति " ॥ ( ऋग्वेद मं ० १० / ११४।६ ) ये चालीसों ग्रह - धारा, सव, पवित्र, अमृत, इन चार जातियों में बँटे हुए हैं । चालीस पात्र बनाए जाते हैं, जिनमें सोम भरा जाता है । ये ग्रह वायव्य हैं - सारे गैस वायु में रहते हैं, अतएव इन ग्रह-पात्रों को वायव्य कहा जाता है । इन को भी साथ ले लेते हैं । ' वायव्यानि ( वायु देवत्यानि सोमपात्राणि ) ( प्रददते ) | एवं बीस लकड़ियाँ भी साथ ले लेता है- जैसा कि महर्षि कात्यायन कहते हैं । " इध्मं १. इन चालीस ग्रहों ( वायु - गैसों ) का विस्तृत विवेचन ( स्व ० ) पं ० मोतीलाल शास्त्री जी कृत ' शतपथ ब्राह्मण हिन्दी विज्ञानभाष्य ' चतुर्थ काण्ड में देखना चाहिए । २. ० सं ० ६/३ २/३ । [ २२६ ]

पृष्ठ 246

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणे सर्जन ब्राह्मण विशति काष्ठम् ' ( इध्मम् प्राददते ) " । एवं कार्यमयी तीन परिधियां साथ ले लेते हैं । श्रीपर्णी को ही कार्य कहते हैं । “ कार्ष्मर्यमयान् परिधीन्: - ( आददते ) " । ( शत ० ३।६।३।१४ ) एवं आश्ववाल प्रस्तर लेते हैं । प्राश्ववाल घोड़े की पुच्छाकृति का तृणविशेष होता है । " प्राश्व-वालः प्रस्तरः ( प्राददते ) २ एवं साँठे की विधृति लेते हैं । प्रस्तर के नीचे कुशा बिछाई जाती है । कुशा के ऊपर उत्तराय दो विधृतियाँ रक्खी जाती हैं । इन पर पूर्वाग्र प्रस्तर रक्खा जाता है । बहि और विधृति दोनों ही कुशा की होंगी तो प्रस्तर घिलमिल हो जायगा । अतएव प्रस्तर स्वरूप को अलग गूंदने के लिए साँठे के पत्ते की विधृति बनाई जाती है । " ऐक्षव्यौ विधूती ( श्राददते ) 13 इस विधृति से एक - एक पत्ता कुशा का भी बँधा रहता है । " तत् ( तत्र ) बहिरुपसन्नद्धं भवति " । एवं दो वपा वपणी ले लेते हैं । पशु की वपा निकाली जाती है, एवं उसकी प्राहुति दी जाती है । परिधियाँ वगैरः की जो लकड़ियाँ होती हैं, उनकी त्वचा उखाड़ ली जाती है किन्तु इनकी त्वचा नहीं उखाड़ी जाती है । यह भी कार्य्यमयी ही होती है-" autraort ( पशुवपायाः श्रपगसाधने कार्यशाखे ) ( प्राददते ) " । फिर दो रस्सियाँ लेता है । एक से पशु बाँधा जाता है, एवं एक से यूप बाँधा जाता है -" रशने ( यूपपश्वर्थे - द्वे ) ( श्राददते ) " । एवं अग्निमन्थन के लिए- उत्तरारणि और अधरारणि ले लेता है । जो " अररणी ( अधरारहित्तरारणिश्चेति ) ( श्राददते ) " । यू.प के छिलके हैं - काष्ठ खण्ड हैं जिन पर अग्नि - मन्थन होता है उन अधिमन्थन शकलों को ( यूप के छोड़ों को ) ले लेते हैं-“ अधिमन्थनः शकलः- ( श्राददते ) " । एवं अभिमत फलवर्षण करने वाले दो दर्भ तरुणक ले लेता है । " वृषणी " - - इस प्रकार इतनी सामग्री को साथ ले कर ऋत्विक् लोग पश्चिम से ' गार्हपत्य ' से, पूर्व की ओर आते हैं । अध्वर्यु आदि ऋत्विक् यज्ञ के अङ्ग हैं । एवं यह सारी सामग्री भी यज्ञाङ्गभूत ही है । इन का पूर्व की ओर जाना-१. का ० श्री ० ८७५ 1, २. शत ० ब्रा ० ३।४।१।१७ १, ३. शत ० ब्रा ० ३।४।१।१८ । [ २३० ]

पृष्ठ 247

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणे सर्जन ब्राह्मण यज्ञ का ही ऊपर की ओर द्युलोक की ओर जाना है । जिस प्रकार प्रकृति में पार्थिव यज्ञ ऊपर की ओर जाता है तथैव प्राज इस यजमान का यज्ञ भी ऊपर की ओर जा रहा है--१. सोमाभिषवार्थ -- पाँच पत्थर । २. सोम भरने के लिए - द्रोण कलश । ३. चालीस वायव्य — ग्रहपात्र । ४. बीस ( २० ) - -- इध्म । ५. ६. ७. श्रीपर्णी की - तीन परिधियाँ । आश्ववाल - प्रस्तर । साँठे के दो पत्ते | द. पा पकाने की— दो लकड़ियाँ । ६. यूप- पशु के लिए - दो रस्सियाँ । १०. अधर- उत्तर- दो अरणियाँ । ११. अग्नि प्रज्वलित करने हेतु -यूप के छोड़े । १२. इन सब को लेकर ऋत्विक लोग पूर्व की ओर आते हैं । द्वादशवैमासाः संवत्सरस्य । संवत्सरो वै यज्ञः इति । इस प्रकार १२ इष्टियों से संवत्सर प्राप्ति हो जाती है । दो कोमल - बहि | इसी अभिप्राय से कहते हैं-" प्राददते ग्राव्णः । द्रोणकलशम् । वायव्यानि । इध्मम् । कामर्यम-यान् परिधीन् । प्राश्ववालं प्रस्तरम् । ऐक्षव्यौ विधृती तद् बहिरुपसन्नद्धं.. भवति । वपाश्रपण्यौ । रशने । अरणी । श्रधिमन्थनः शकलः । वृषरणौ । तत्

समादाय प्राञ्च प्रायन्ति । स एष ऊर्ध्वो यज्ञ एति " ॥१० ॥

इस प्रकार जब सारी सामग्री आ जाती है - सारे पदार्थ आ जाते हैं - तो अध्वर्यु यजमान से निम्न-लिखित मन्त्र बुलवाता है, एवं आप भी बोलता है— " तदायत्सु ( तेषु सर्वेषु पदार्थेषु श्रायत्सु ) वाचयति - ( श्रध्वर्युः ) " । " अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेम " ॥ इति ( वा ० सं ० ५/३६ ) " हे अग्ने! राये ( धनार्थम् ) अस्मान् सुपथा ( शोभनेन मार्गेण ) नय प्रापय । त्वं विश्वानि ( सर्वारिंग ) वयुनानि ( मार्गारिण वितानि च ) विद्वान् ( जानन् ) । किञ्च - जुहुराणं- ( कौटिल्यमाचरतः ) एन: ( पापं ) श्रस्मत् ( श्रस्मत्तः ) युयोधि - ( पृथक् कुरु ) ते ( तुभ्यं ) भूयिष्ठाम् ( अतिप्रभूताम् ) नम-उक्ति - विधेम करवाम " । [ २३१ ]

पृष्ठ 248

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण जब प्राग्नीध्र में अग्नि रख दिया जाता है तो अध्वर्यु-[ २३२ ] सर्जन ब्राह्मण ( वा ० सं ० ५।३७ ) } हे अग्ने! संपत्ति के लिए आप हमें अच्छे रास्ते से ले जाइए । जो - जो मनुष्य बुद्धिमान् होता है - कार्य्यरत होता है, उसे संपत्ति का रास्ता अपने आप सूझ आता है । बुद्धि सूर्य्य की वस्तु है । इसीलिए -' धियो योनः प्रचोदयात् ' यह कहा जाता है । सूर्य्य अग्निमय है । अतएव हम कह सकते हैं कि सम्पत्ति के लिए रास्ता बतलाने वाला अग्नि ही है । अपिच सूर्य से ही हमारी आँखें बनी हैं । एवं इन्हीं से हमें मार्ग दीखता है । इसलिए भी हम अग्नि को रास्ता दिखलाने वाला बतला सकते हैं । यह अग्नि ही सारे मार्गों से परिचित है । पार्थिव संपत्ति का अधिष्ठाता अग्नि ही है । इसीलिए तो " श्रग्निर्भूस्थान " यह कहा जाता है । ऐसा अग्नि हमें रास्ता दिखलाए । एवं हमें मूर्च्छित करने वाले हमारे श्रात्मा का अधः-पतन करने वाले जो पाप हैं उन्हें यह अग्नि हम से दूर कर दे । ऐसे अग्नि के प्रति हम बहुत - बहुत नमस्कार करते हैं । यह मन्त्र बोल कर अग्नि को सबसे आगे करते हैं । वास्तव में अग्नि सब के आगे ही रहने वाला है । अतएव इसे ' अग्नि ' कहा जाता है । प्रकृति में भी अग्नि ही आगे - आगे चलता हुआ राक्षस एवं असुर ( तमोमय प्राण ) को अलग करता जाता है । रास्ता साफ होता जाता है । इस प्रकार ऐसे निरुपद्रव - स्थान में ऋत्विक् लोग यज्ञ - सामग्री को आग्नीध्रीय की ओर ले जाते हैं । इस प्रकार अग्नि की रक्षा में ऋत्विक् लोग आते हैं । कहाँ आते हैं? इसका उत्तर देते हैं - आग्नीध्रीय के पास आते हैं एवं उस प्रणीत अग्नि को प्राग्नीध्र में स्थापित कर देते हैं-" अग्निमेवैतत् पुरस्तात् करोति । श्रग्निः पुरस्तान्नाष्ट्रा - रक्षांस्यपघ्न-नेति । अथाभयेनानाष्ट्रेण हरन्ति । तप्रायन्ति । श्रागच्छन्त्याग्नीध्रम् तमाग्नीध्रे fre धाति । ( प्रणीतमग्निमिति - शेषः ) " ॥११ ॥

" अयं नोऽग्निर्वरिवस्कृरणोतु । प्रयं मृधः पुर एतु प्रभिन्दन् । अयं वाजान् जयतु वाजसातावयं शत्रून् जयतु जर्हृषाणः स्वाहा " । " अयम् - अग्निः नः ( अस्माकम् ) वरिवः ( संपत्तिम् - उन्नति च ) कृणोतु । तथा - प्रयं ( एव ) मृधः - ( सङ्ग्रामान् ) प्रभिन्दन् पुर एतु । तथा श्रयं वाजसातौ ( सङ्ग्रामे ) वाजान् ( उत्साहान् ) जयतु । श्रयं जर्हृषाण: ( पुनः पुनः हृष्यन्-शत्रून् - जयतु " । यह अग्नि हमारे लिए सम्पत्ति और उन्नति प्रदान करे । यह अग्नि संग्रामों को छिन्न - भिन्न करता हुआ आगे चले । एवं यह अग्नि वाजसाति में हमारे लिए उत्साह को जीते, उत्साह दिखलाने वाले शत्रुमों १. ' शत ० ब्रा ० २।२।२ ' |

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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राहाण वैसर्जन ब्राह्मण पर विजय प्राप्त करे । वाज कहते हैं उत्साह को । युद्ध में दोनों ओर से उत्साह की बोली, बोली जाती है । दोनों ही अपना - अपना उत्साह प्रकट करते हैं । " आ जाओ, देखें किसमें ताकत है? " इस प्रकार उत्साहपूर्वक शत्रु का आह्वान किया जाता है । प्रतएव युद्ध को ' वाजसाति ' कहा जाता है । हमने बत-लाया था कि ' अग्नीध्र ' अन्तरिक्ष - स्थानीय है । बस, इसमें हवन कर उस हवन से अन्तरिक्ष की प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता है । अन्तरिक्ष को अपने अधिकार में करता है । यज्ञ विष्णु का दूसरा विक्रम है -" तदेतेनैवेतस्मिन्नन्तरिक्षे प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठति । एतेनैतं लोकं स्पृणुते ॥१२ ॥

गार्हपत्य में से लाई वस्तुओं में से कितनी ही वस्तुएँ तो यहीं आग्नीधशाला में ही रख दी जाती हैं एवं कितनी ही उत्तरावेदि के पास ले जानी पड़ती हैं । इनमें कौन सी यहीं रक्खी जाती हैं, एवं कौनसी, ले जाई जाती हैं - यह बतलाते हैं । श्राग्नीधीय के ठीक दक्षिण में दक्षिण हविर्धान के दक्षिण भाग में सोम का अभिषव होता है । यह अग्नी, हविर्धान मण्डप में जुते शकट के ठीक उत्तर में होता हैं । चूंकि हविर्धान में ही सोमाभिषव होता है, अतएव पांचों पत्थर यहीं रख देते हैं-" तदेव ( तत्रैवाग्नीध्रशालायाम् ) निदधाति ग्राव्णः " । वहीं द्रोणकलश रख दिया जाता है एवं वहीं चालीस वायव्य ग्रहपात्र रख दिए जाते हैं । इस प्रकार पूर्वोक्त बारह ( १२ ) चीजों में से तीन तो यहीं रख दी जाती हैं, एवं अवशिष्ट को साथ ले कर आगे की ओर आते हैं । वहीं आ कर उत्तरावेदि में स्थित श्राहवनीय के उत्तर भाग में अवशिष्ट वस्तुनों को रख देते हैं-" द्रोणकलशं । वायव्यानि । अथेतरमादाय श्रायन्ति । तदुत्तरेणाहवनीय-सुपादयन्ति ॥ १३ ॥

वहाँ पर आ कर अध्वर्यु प्रोक्षणी - पात्र को हाथ में उठाता है । जिस पात्र में प्रोक्षण करने के लिए पानी रहता है, उसे ' प्रोक्षण - पात्र ' कहते हैं, एवं उसमें रक्खे हुए पानी को ' प्रोक्षणीः ' कहते हैं-“ प्रोक्षणीरध्वर्युरादत्ते । वह अध्वर्यु उन सारी वस्तुओं में से सबसे पहले - इध्म का ही प्रोक्षण करता है । इसके अनन्तर उत्तरावेदि का प्रोक्षण करता है । " स इध्ममेवाग्रे प्रोक्षति अथ वेदिम् " । इसके बाद प्रतिप्रस्थाता - अध्वर्यु के लिए कुशा सौंपता है । अध्वर्यु उस कुशा को पुरस्ताद् ग्रन्थि-रूपेण वेदि पर रखता है । कुशा की जड़ में गाँठ सी रहती है । उसका मुँह पूर्व की ओर रहना चाहिए । [ २३३ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्राह्मण एवं भाग ( स्थूलभाग ) पश्चिम की ओर रहना चाहिए, यही तात्पर्य है । इसके अनन्तर उसका भी प्रोक्षरण करता है-" प्रथामै ( श्रध्वर्यवे ) बहिः प्रयच्छन्ति । तत् पुरस्ताद्ग्रन्थ्यासादयति । तत् प्रोक्ष्य " । उसे हाथ में उठा कर उसकी ग्रन्थि खोलने के अनन्तर ही जो प्राश्ववाल प्रस्तर तय्यार रहता है, उसे हाथ में उठा कर उस कुशा को बेदि पर इकहरा ही बिछा देता है । जिस बहि को - ' पुरस्ताद् ग्रन्थि ' पर रखते हैं, वह कुशामुष्टि होती है । उसका मूल भाग मौली से बंधा रहता है । जिस समय वेदि पर कुशास्तरण करना पड़ता है, उस समय उस मौली को खोल दिया जाता है । दर्शपूर्णमासादि में कुशास्तरण के लिए कोई विशेष नियम नहीं है । परन्तु यहाँ पर विशेषता है । वह यही है कि यहाँ एकहरा ही कुशा-स्तरण होना चाहिए | कुशा पर कुशा नहीं होनी चाहिए । प्रतएव -" खरोत्तरार्द्ध एकवृत् स्तरणं पश्चाद्वोत्तरवेदेः " ( का ० श्री ० स् ० ८।१२ ) यह कहा जाता है । " उपनिनीय विस्रंस्य ग्रन्थिं प्राश्ववालः प्रस्तर उपसन्नद्धो भवति । तं गृह्णाति । गृहीत्वा प्रस्तरं ' एकवृत् ' ( एकावृतिः ) बहिस्तृणाति " । बर्हि का श्रास्तरण करके - दक्षिण, उत्तर और पूर्व में तीनों कार्यमयी परिधियाँ लगा देते हैं । परिधियाँ लगा कर श्राहवनीयाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए उसमें समिधा डालता है । समिधा डाल कर जब अग्नि प्रज्वलित हो जाता है-" स्तीर्त्वा बहिः कामयान् परिधीन् परिदधाति । परिधाय परिधीन्

समिधावभ्यादधाति । श्रभ्याधाय समिधौ ” ॥ १४ ॥

तो उसी समय निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ प्राहुति डाल देता है—-" उरु विष्णो विक्रमस्योरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपति तिर स्वाहा " इति ॥ ( वा ० सं ० ५।३८ ) हे यज्ञात्मक विष्णो! ( त्वं ) उरु ( प्रभूतं द्युलोकपर्यन्तम् ) विक्रमस्वं ( विक्रमणं कुरु ) अस्माकं - क्षयाय ( निवासाय ) उरु ( विस्तीर्णम् ) कृधि ( कुरु त ) । हे घृतयोने - श्रग्ने! ( त्वं ) ( हुतं ) घृतं पिब । एवं यज्ञपतिं यजमानं प्रतिर- ( वर्द्धस्व ) " । [ २३४ ]