Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 251–260
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 251–260
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण सर्जन ब्रह्माण ज्ञात्मक farm! हमारे निवास के लिए हमारे ( यजमान के ) श्रात्मा के स्वर्ग तक व्याप्त होने के लिए आप वहाँ तक फैल जाइए । यजमान की सत्ता सर्वत्र हो जाय, ऐसा आशीर्वाद दीजिए । हे घृतयोने अग्नि! आप इस घृत को पीजिए एवं यजमान को संपत्तिशाली बनाइए । इस तीसरे ग्राहवनीय हवन से यह यजमान द्युलोक की प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता है । विष्णु के अर्थात् यज्ञ के तीसरे विक्रम से द्यलोक पर अपना कब्जा कर लेता है-" तदेतेनैवैतस्यां दिवि प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठति एतेनैतं लोकं स्पृणुते -देतया ( वैष्णव्यर्चा ) जुहोति ॥१५ ॥
वैष्णवी ऋचा से यह तीसरी आहुति क्यों दी जाती है? यह प्रश्न बच जाता है । इसका उत्तर देते हैं-“ यद्वेव वैष्णव्यर्चा जुहोति ( तदुच्यते ) " । देवता लोग पृथिवी पर से इस सोम को वध से बचाने हेतु छोटा बना कर अन्तरिक्ष के वासी असुरों की आँखों में धूल झोंक कर ले आए । अन्तरिक्ष में रहने वाला सोम वास्तव में प्रप्तु हो जाता है । जब यह द्युलोक में निरापद स्थान में आ जाता है तो जैसा यह पहले था - पृथिवी लोक में जैसे यह स्थूल स्वरूप से, यज्ञस्वरूप से था, आज इस वैष्णवी ऋचा से उसे वापस उसी यज्ञ स्वरूप में ले आते हैं । for में सोम की आहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । सोम का स्थूल स्वरूप यज्ञ ही है । इसका यह स्वरूप द्युलोक में अर्थात् सूर्य में एवं पृथिवी में ही उल्वरण होता है । पृथिवी की अग्नि में भी यह प्राहुत होता है एवं सूर्य में भी प्राहुत होता है । परन्तु अन्तरिक्ष में यह किसी में आहुत नहीं होता है । अत-एव इसे हम " स्तोकसोम " कहने के लिए तय्यार हैं । आज यह द्युलोक में अपने उसी स्वरूप में आ कर पुनः अपने उसी स्वरूप को प्राप्त हो गया है, अतएव वैष्णवी ऋचा बोली जाती है । विष्णु यज्ञ स्वरूप है, अतएव यह बोलना - सोम के यज्ञ स्वरूप को प्रकट करना है । पृथिवी और द्यु में यह यज्ञ - स्वरूप रहता है एवं अन्तरिक्ष में नाष्ट्रा सम्बन्धात् प्रन्तर्हित रहता | ' हे सोम! अब आप अपने असली यज्ञ - स्वरूप में आ जाइए । अब किसी का भी डर नहीं । " उरु विक्रमस्य " का यही तात्पय्यर्थ है । “ कनीयांसं वा एनमेतद् वधात् कृत्वात्यनैषु स्तोकमेव । स्तोको ह्यप्तुः । तमेतदभयं प्राप्य य एवैष ( पूर्वभासीत् ) तं करोति यज्ञमेव ( एष सोमः पूर्वं याहयज्ञरूपः तं तारूपं करोति ) । यज्ञो हि विष्णुः । वैष्णव्यर्चा जुहोति " इस प्रकार तीसरी आहुति देने के अनन्तर जुहूपभृत् को बहिं पर रख पश्चिम भाग में जो बहि बिछी रहती है - प्राहुत्यनंन्तर जुहूपभृत उसी पर रक्खे ॥१६ ॥
देता है । उत्तरावेदि के जाते हैं । इन्हें जमीन [ २३५ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण पर कभी नहीं रखना चाहिए । इस प्रकार बहि पर उन्हें रख कर पानी से ही धो कर - सोमराजा को अध्वर्यु अपने हाथ उठा कर हविर्धान में ले जाता है-" अथासाद्य स्रुचः - अप उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति " । वि को बह पर रख कर, हाथ धो कर इसलिए राजा को उठाया जाता है । अर्थात् स्रुवि रख कर एवं पानी से हाथ धो कर सोम को उठाने का कारण यही है - उठा कर हविर्धान मण्डप में ले जाने का यही कारण है कि यह श्राज्य तेज स्वरूप होने के कारण वज्र है, एवं सोम रेत है । इसी रेत से यजमान का दिव्यात्मा बनने वाला है । ऐसी अवस्था में यदि घृत के हाथ सोम के लग जाएँगे तो घृत-विद्युत् से सोम की प्रजननशक्ति नष्ट हो जाएगी । धुआँ लगने से जैसे गेहूं की प्रजनन शक्ति मारी जाती है, वही हालत इस सोम की हो जाएगी । ऐसा न हो - यह श्राज्य - वज्र रेत वीर्य की शक्ति को नष्ट न कर डाले, इसलिए हाथ धो कर ही सोम को हविर्धन - मण्डप में ले जाते हैं--" तद्यत् श्रासाद्य स्रुचोऽप उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति । वज्ञो वाऽम्राज्यं, रेतः सोमः । नेद् वत्रेणाज्येन रेतः सोमं हिनसानि - इति । तस्मादासाद्य स्रुचोऽप उपस्पृश्य राजानं प्रपादयति- ( हविर्द्धानि मण्डपे ) " ॥१७ ॥
हविर्धा - मण्डप में जा कर - अध्वर्यु - दक्षिण हविर्धान शकट के ( बैठक में ) पहले कृष्णमृगचर्म बिछाता है । उस पर इस सोमराजा को विराजमान कर देता है । उस समय यह मन्त्र बोलता है-" देव सवितरेष ते सोमस्तं रक्षस्व । मा त्वा दभन् इति " । ( वा ० सं ० ५।३६ ) हे सविता देवता! यह सोम आपका है । इसकी रक्षा का भार आप पर है । हे सोम! आपके ऊपर शत्रु जरा भी आक्रमण न करें । इस प्रकार इस मन्त्र से सोम को सविता देवता के संरक्षण में रखता है-" तदेनं देवायैव सवित्रे परिददाति गुप्त्यै " इति ॥ १८ ॥
इस प्रकार सोम को मन्त्रपूर्वक रख कर वहाँ से हाथ सरकाते ही अध्वर्यु हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है एवं निम्नलिखित मन्त्र से सोम की स्तुति करता है-" श्रथानुसृज्योपतिष्ठते एतत्त्वं देव सोम देवो देवाँ उपागा - इदमहं मनु-व्यासह रायस्पोषेण " इति । " हे सोम देव! त्वं - ( इदानीम् ) देवान् उपागा: ( प्राप्तोऽसि ) एवं-ग्रहमपि मनुष्यः सन् - ( एतत् इदानीं ) मनुष्यात् ( प्रस्मदीयान् ) रायस्पोषेण सह - उपागाः - प्राप्तोऽस्मि " । [ २३६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण हे सोमदेव! आज आप देवताओं के लोक में श्रा पहुंचे हैं । मैं भी अपनी ड्यूटी समझ कर मय सम्पत्ति के, अपने मनुष्य - लोक को प्राप्त हो गया हूँ । ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही हमने बतलाया था कि एक ओर अग्नि है, दूसरी श्रोर सोम है । जो मनुष्य प्रग्नावैष्णव एकादश कपालपुरोडाश द्वारा दीक्षरणीयेष्टि करने की दीक्षा लेता है, वह अग्नि और सोम की दाढ़ में प्रा जाता है । दोनों इसे दाढ़ में ले लेते हैं । इस ब्राह्मण से पूर्व आग्नावैष्णव दीक्षणीय हवि होती है-" अग्नीषोमो वा एतं श्रन्तर्जम्भ प्रदधाते - यो दीक्षते । श्राग्नावैष्णवं दो दीक्षणीयं हविर्भवति " । पूर्व के ब्राह्मण में हमने बतलाया है कि पृथिवी के १७ ( सत्रह ) तक अग्नि रहता है । एवं ३३ तक ( तेतीस तक ) सोम रहता है । यह सोम जब उस अग्नि में प्राहुत होता है तो वह अग्नि प्रज्वलित होकर २१ तक ( इक्कीस तक ) चला जाता है । इस प्रकार इक्कीस तक अग्नि - सोम मिले रहते हैं । अग्नि ही का नाम विष्णु है । चूंकि इसमें सोम भी रहता है, अतएव सोम को भी विष्णु कह दिया जाता है । इसीलिए ' अग्नि विष्णु ' के स्थान में " अग्नीषोमोवा ' यह कह दिया है । दीक्षणीयेष्टि में तो-श्राग्नावैष्णव पुरोडाश होता है एवं यहाँ - " अग्नीषोमो वा अन्तर्जम्भ आदधाते " - यह कहा है । इसमें कोई भी विरोध नहीं हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ यो वै विष्णुः - सोमः सः " । जो दीक्षा लेता है, वह इन देवताओं का हवि बन जाता है । देवता इसे अपनी दाढ़ में रख लेते हैं । बस, नीड में सोम रखता हुआ यजमान आज प्रत्यक्ष रूप से यज्ञ की दाढ़ में से निकलता है । सोम से अपनी मुरादें पूरी कराने के लिए " एतत्त्वं " इत्यादि कहता है । सोम को रखना, सोम की अर्थात् विष्णु की दाढ़ में से निकलना है । हविर्धान यज्ञ का भाग है । यही द्यो है । श्रतएव - " एतत्त्वं देव सोम " इत्यादि कहा है ।
“ हवि aser देवानां भवति यो दीक्षते तदेनमन्तर्जम्भे आदधाते ।
तत्प्रत्यक्षं सोमान्निर्मुच्यते - यदाह - " एतत्वं देव सोम " इत्यादि " ॥१६ ॥
इस प्रकार सोम को नीड पर रख कर " स्वाहानिर्वरुणस्यपाशान् मुच्ये " यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु हविर्धान मण्डप से बाहर निकल आता है । मैं प्राज वरुणपाश से निकल आया हूं - अर्थात् मेरा बन्धन हो गया था । वह मनुष्य - वरुण के पाश में बँधा कहलाता है जो कि दूसरे के मुख में रहता है । बन्धन में रहना - वरुणपाश से बँधा रहना है । अब तक यजमान इस सोम की दाढ़ में था, आज प्रत्यक्ष ही वरुण - पाश में से निकल जाता है-" अथोपनिष्क्रामति - स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये " इति । [ २३७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वैसर्जन ब्राह्मण " वरुणपाशे वा एषोऽन्तर्भवति - योऽन्यस्य श्रासन्- ( मुखे निवसति ) तत्
प्रत्यक्षं वरुणपाशान्निर्मुच्यते । यदाह ' स्वाहा ' इत्यादि " ॥२० ॥
इसके बाद हविर्वेद के आहवनीय के पास श्राकर--" अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः " । ( वा ० सं ० ५ | ४० ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस श्राहवनीय में समिधा डालता है । अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण में कहा गया था कि हे अग्ने! जो श्रापका तेजोमय शरीर है, वही मेरा हो जाय । एवं मेरा शरीर आपका बन जाय । हे अग्ने! आप मेरी दीक्षा के साथ दीक्षा लें और मेरे तप के साथ तप करें । यहाँ ठीक उससे विपरीत बोलते हैं । यहाँ कहते हैं कि जो मेरा शरीर आपका बन गया था उसे वापस मुझे ही दे दें । एवं हे व्रतपते! आज से अपने व्रत यथायथ हो जायें । आप अपना व्रत पालन करें, मैं अपना व्रत पालन करूँ | मेरी दीक्षा का मुझ से सम्बन्ध हो, आपकी दीक्षा का आप ही सम्बन्ध रहे । तप भी अपना भिन्न - भिन्न ही रहे । इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु अग्नि के मुख से भी प्रत्यक्ष-रूपेण निकल जाता है । आज यह यजमान परायत्त नहीं है, अपितु स्वात्मसत्ता से यज्ञ कर रहा है । अतएव आज इसका अन्न खा सकते हैं । क्योंकि आज दोनों की दाढ़ में से निकल कर यह मनुष्य बन जाता है । यही कारण है कि आज इसका नाम भी लिया जा सकता है । इसके पहले नहीं खाते हैं-इसका कारण यही है कि हुतहवि का खाना जैसे अनुचित है वैसे ही दीक्षित मनुष्य का खाना अनुचित है । क्योंकि उस समय दीक्षित हवि बना रहता है । उसकी वस्तु खाना देवताओं की हवि खाना है । यहीं पर अंगुली विसर्जन कर देता है । अवान्तर दीक्षा में जो अंगुलीन्यञ्चन हुआ था, उसे यहाँ छोड़ दिया जाता है || २१ ॥ ॥ इति वैसर्जन ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति षष्ठाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ २३८ ]
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षष्ठाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' यूपमान ब्राह्मणम् ' यूपं व्रक्ष्य वैष्णव्यर्चा जुहोति । वैष्णवो हि यूपस्तस्माद्वैष्णव्यर्चा जुहोति ॥ १ ॥
यद्वेव वैष्णव्या जुहोति । यज्ञो वै विष्णुर्यज्ञेनैवैतद्यपमच्छेति तस्माद्वैष्ण-व्यर्चा जुहोति || २ || स यदि स्रुचा जुहोति । चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति यद्यु स्रुवेण daru हत्य जुहोत्युरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्र प्र यज्ञपति तिर स्वाहेति ॥ ३ ॥
यदाज्यं परिशिष्टं भवति । तदादत्ते यत्तक्ष्णः शस्त्रं भवति तत्तक्षादत्ते-आयन्ति स यं यूपं जोषयन्ते || ४ || तमेव मभिमृश्य जपति । पश्चाद्वैव प्रातिष्ठन्नभिमन्त्रयतेऽत्यन्यांगां नान्यां उपागामित्यति ह्यन्यानेति नान्यानुपैति तस्मादाहात्यन्यां s अगां नान्यां-उपागामिति ॥ ५ ॥
after परेभ्योऽविदं परोऽवरेभ्य इति । श्रर्वाग्ध्येनं परेभ्यो वृश्चति as एतस्मात्पराञ्चो भवन्ति परोऽवरेभ्य इति परो ह्येनमवरेभ्यो वृश्चति यएत-स्मादर्वाञ्च भवन्ति तस्मादाहार्वाक्त्वा परेभ्योऽविदं परोऽवरेभ्य इति ॥ ६ ॥
तं त्वा जुषामहे देव बनस्पते देवयज्यायाऽइति । तद्यथा बहूनां मध्या-Fered कर्म जुषेत स रातमनास्तस्मै कर्मणे स्यादेवमेवैनमेतद् बहूनां मध्या-त्साधवे कर्मणे जुषते स रातर्मना व्रश्चनाय भवति || ७ || देवास्त्वा देवयज्यायै जुषन्तामिति । तद्वै समृद्धं यं देवाः साधवे कर्मणे जुषान्ते तस्मादाह देवास्त्वा देवयज्यायै जुषन्तामिति ॥ ८ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण अथ स्रुवेोपस्पृशति । विष्णवे त्वेति वैष्णवो हि यूपो यज्ञो वै विष्णुर्य-ज्ञाय ह्येनं वृश्चति तस्मादाह विष्णवे त्वेति ॥ ॥ अथ दर्भ रुकमन्तर्द्दधाति । श्रोषधे त्रायस्वेति वज्रो वै परशुस्तथो हैनमेष वज्रः परशुर्न हिनस्त्यथ परशुना प्रहरति स्वधिते मैनं हिसीरिति वज्रो वै परशुस्तथ हैनमेष वज्रः परशुर्न हिनस्ति ॥ १० ॥
स यं प्रथमं शकलमपच्छिनत्ति । तमादत्ते तं वाऽअनक्षस्तम्भं वृश्चेदुत नमनसा वहन्ति तथोऽनो न प्रतिबाधते ॥ ११ ॥
तं प्राञ्चं पातयेत् । प्राची हि देवानां दिगथो उदञ्चमुदीची हि मनु-. व्याणां दिगथो प्रत्यञ्चं दक्षिरणायै त्वेवैनं दिशः परिविबाधिषेतैषा वै दिक् पितृणां तस्मादेनं दक्षिरणायै दिशः परिविबाधिषेत ॥ १२ ॥
तं प्रच्यवमानमनुमन्त्रयते । द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा हिंसीः पृथिव्या सम्भवेति वत्रो वा एष भवति यं यूपाय वृश्चन्ति तस्माद्वात्प्रच्यवमानादिमे लोकाः संरेजन्ते तदेभ्य एवैनमेतल्लोकेभ्यः शमयति तथेमांलोकाञ्छान्तो न हिनस्ति ॥१३ ॥
स यदाह । द्यां मालेखीरिति दिवं मा हिसीरित्येवैतदाहान्तरिक्षं मा हिसीरिति नात्र तिरोहितमिवास्ति पृथिव्या सम्भवेति पृथिव्या सञ्जानीष्वेत्येवैत-दाहायं हित्वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभगायेत्येष ह्येनं स्वधिति-स्तेजमानः प्रणयति ॥ १४ ॥ ।
थाव्रश्चनमभिजुहोति । नेदतो नाष्ट्रा रक्षांस्यनूत्तिष्ठानिति वस्त्रो वा-प्राज्यं तद्वत्रेणैवैतनाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते तथातो नाष्ट्रारक्षांसि नानूत्तिष्ठन्त्यथो तो वाऽआज्यं तद्वनस्पतिष्वेवैततो दधाति तस्मादेतस श्राश्वाद्वनस्पतयोऽनु प्रजायन्ते || १५ || स जुहोति । श्रतस्त्वं देव वनस्पते शतवत्शो विरोह सहस्रवल्शा वि वयं रुमेति नात्र तिरोहितमिवास्ति ॥ १६ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण तं परिवासयति । स यावन्तमेवाग्रे परिवासयेत्तावान्त्स्यात् ॥ १७ ॥
पञ्चानि परिवासयेत् । पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पञ्चर्तवः सम्वत्सरस्य तस्मात्पञ्चानि परिवासयेत् ॥१८ ॥
रत्न परिवासयेत् । षड्वाऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरो वज्रो वज्रो यूपस्तस्मात्डरनि परिवासयेत् ॥ १ ९ ॥ श्रष्टानि परिवासयेत् । अष्टाक्षरा वै गायत्री पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्य गायत्री पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य तस्मादष्टानि परिवासयेत् ॥ २० ॥
नवरत्न परिवासयेत् । त्रिवृद्वै यज्ञो नव वै त्रिवृत्तस्मान्नवानि परिवा-सयेत् ॥२१ ॥
एकादशारत्न परिवासयेत् । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुब्वस्त्रिष्टुब्वज्रो ' यूपस्तस्मादेकादशारनि परिवासयेत् ॥ २२ ॥
द्वादशारनि परिवासयेत् । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य संवत्सरो वज्रो aat यूपस्तस्माद्वादशारत्नि परिवासयेत् ॥२३ ॥
त्रयोदशारत्न परिवासयेत् । त्रयोदश वै मासाः संवत्सरस्य संवत्सरो aat aat यूपस्तस्मात्त्रयोदशारत्नि परिवासयेत् ॥२४ ॥
पञ्चदशारनि परिवासयेत् । पञ्चदशो वै वज्जो वज्रो यूपस्तस्मा-त्पञ्चदशारनि परिवासयेत् || २५ || सप्तदशार निर्वाजपेय यूपः । अपरिमित एव स्यादपरिमितेन वाऽएतेन वज्रेण देवाऽअपरिमितमजयंस्तथोऽए वैषऽएतेन वज्रेणापरिमितेनैवापरिमितं जयति तस्मादपरिमितएव स्यात् ॥ २६ ॥
स वाऽअष्टाश्रिर्भवति । अष्टाक्षरा वै गायत्री पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्य गायत्री पूर्वार्द्धएष यज्ञस्य तस्मादष्टाश्रिर्भवति ॥२७ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) ' शतपथ ब्राह्मण धूपमान ब्राह्मण [ अनुवाद ] भारतीय महर्षियों ने भौमस्वर्गवासी देवताओं कृत देवयज्ञ के आधार पर यज्ञविद्या सीखी तथा भारतवर्ष में उसका प्रसार किया । प्राकृतिक यज्ञ के ऋत्विक्, अग्नि, वायु, आदित्य एवं चन्द्रमा - ये प्राकृतिक प्रारण हैं । इन प्रारणदेवताओं के द्वारा प्रकृति में ओ यज्ञ हो रहा है, उसी की प्रतिकृति पर भौम देवताओं ने यज्ञ की कल्पना की तथा वैसी ही अनुकृति मनुष्य यज्ञ में होती है । यजमान उसी के अनुकरण पर वैध सोमयज्ञ करें अपने आत्मा का सम्बन्ध १७ वें अहर्गण पर स्वर्ग से करना चाहता है । प्रकृति में यूप महावेदि के अन्त में रहता है । पृथिवी - पिण्ड में से चितेनिधेयाग्नि रूप अमृताग्नि निकलता है, जो पृथिवी के २१ वें अहर्गण तक जाता है । २१ वें ग्रहण पर भगवान् सूर्य है । यह सूर्य ही प्राकृतिक यज्ञ का यूप है । २१ वें श्रहरिण तक जाने वाला अमृताग्नि ही विष्णु है । विष्णु ३ वि करता है । त्रिवृत् स्तोम तक इस विष्णु का प्रथम विक्रम है । इसमें घनाग्नि के अवान्तर अवस्थारूप ८ वसु रहते हैं । पञ्चदश स्तोम तक अग्निरूप विष्णु के तृतीय विक्रम में तरलाग्नि के अवस्था भेदस्वरूप ११ रुद्र तथा २१ वें स्तोम तक विष्णु के तृतीय विक्रम में विरलाग्नि के अवान्तर अवस्थारूप १२ आदित्य रहते हैं । दो अश्विनीकुमार सान्ध्य देवता हैं । इस प्रकार २१ वें अहर्गण तक ३३ श्राग्नेय देवताओं की स्थिति है । इनमें ८ वसुत्रों में प्रथम अग्नि है तथा १२ आदित्यों में अन्तिम देवता विष्णु है । अन्य देवता इन दोनों के मध्य में स्थित हैं । जैसा कि ' अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः ' यह श्रुति बतला रही है । २१ वें अहर्गण पर जो सूर्य है वही प्राकृतिक यूप है । २१ वें अहर्गण पर ही विष्णु की सत्ता है । अतः यह सूर्यरूप प्राकृतिक यूप विष्णुदेवताक है । इसीलिए ' वैष्णवो हि यूप ' कहा गया है । चूंकि प्रकृति में वैष्णवयूप - रूप सूर्य स्थित है, अतः इस वैध यज्ञ में भी यजमान वैष्णव यूप स्थापित करता है । इस यूप के लिए ही यजमान ऋत्विजों के साथ वन में काष्ठ लेने जाता है । इससे पहले यजमान का प्रतिनिधि अध्वर्यु वैष्णवी ( विष्णुदेवताक ) ऋचा से आहवनीय अग्नि में आज्याहुति डालता है ॥१ ॥
वैष्णवी ऋचा से आहुति देने की एक उपपत्ति बतला दी कि प्रकृति में यूप विष्णु-देवताक है । इसकी दूसरी उपपत्ति द्वितीय कण्डिका में है । २१ वें अहर्गण पर विद्यमान अग्नि ही विष्णु है । इस अग्नि में २१ वें अहर्गण से ऊपर रहने वाले पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती है । यद्यपि यज्ञ अग्नीषोमात्मक है किन्तु श्रग्नि में सोम की आहुति होने पर अग्नि ही शेष रह जाता है । अतः ' यज्ञो वै विष्णुः ' ' विष्णुर्वै यज्ञः ' इत्यादि ब्राह्मण श्रुतियों के ' अनुसार विष्णु यज्ञस्वरूप है । यह यज्ञरूप विष्णु प्रकृति - यज्ञ में यूप है । उसी प्रकार इस वैयज्ञ में भी यूप लाते समय वैष्णवी ऋचा से आहुति देनी चाहिए ॥ २ ॥
जुहू व उपभृत् दोनों से आहुति दी जा सकती है । इन्हीं जुहू व उपभृत् को स्र ुव, स्र ुक् चि शब्द से व्यवहृत किया जाता है । यदि स्रक् से आहुति दी जाती है तो ध्रुवापात्र से चार बार स्रुक् में घृत ले कर आहुति देनी चाहिए । स्रुव से आहुति देने में ध्रुवापात्र से व में चार बार घृत लेने की आवश्यकता नहीं है । [ २४२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण इस तरह स्र ुक् तथा स्रुव में ध्रुवापात्र से घृत ले कर बहु अध्वर्यु -' उरु विष्णो विक्रमस्व उरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्र प्र यज्ञपति तिर स्वाहा ' ॥ इति वृषमान ब्राह्मणा इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आहवनीय में घृत की आहुति दे देता है ॥ ३ ॥
आहवनीय में आहुति देने से बचे हुए घृत को अध्वर्यु ले लेता है । तथा यूपच्छेदन यूप- का शस्त्र जो वास्म ( वसूला ) है उसे तक्षा ले लेता । तदनन्तर अध्वर्यु, तक्षा आदि सभी स्थान पर आते हैं । अध्वर्यु आदि यूप हेतु काष्ठ काटने के लिए वन के वृक्षों को ढूंढते हैं, उपयुक्त वृक्ष को पसन्द कर लेते हैं ॥ ४ ॥
उसी यूप वृक्ष का स्पर्श करके वृक्ष के पश्चिम भाग में जा कर पूर्वाभिमुख ले कर ध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता है - ' प्रत्यन्यां ॥ गाम् । नान्यां ॥ ऽउपागाम् ' । आये इति अर्थात् हे पुरोवर्ती वृक्ष! हम पूर्वागत नाना वृक्षों का अतिक्रमण कर आप के पास हैं | अब आगे के वृक्षों के पास भी हम नहीं जा रहे हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं देता कि वह अध्वर्यु पहले आने वाले वृक्षों का प्रतिक्रमण कर जाता है, उन पूर्व वृक्षों को छोड़ है तथा आगे वाले अन्य वृक्षों के पास भी नहीं जाता है ॥ ५ ॥
' पश्चात् मन्त्र - शेष का उच्चारण करता है - अर्वाक् त्वा परेभ्योऽविदं परोऽवरेभ्यः के इति । अर्थात् तक्षा ( बढई ) यूप के लिए जिस वृक्ष को काटता है वह दोनों ओर के वृक्षों ) हैं मध्य में है । यह वृक्ष आगे आने वाले वृक्षों से अर्वाक् है तथा जो वृक्ष इससे ( पूर्ववर्ती उन से यह वृक्ष पर है । अतः ऐसे वृक्ष का ही यूप के लिए तक्षण करता है ॥ ६ ॥
फिर " तं त्वा जुषामहे देव वनस्पते देवयज्यायै ” इति । अर्थात् हेवनस्पतिदेव! ऐसे कि आपको हम देवयज्या के लिए अर्थात् देवयाग के लिए पसन्द करते हैं । तात्पर्य यह है में से 1 हम अपने लिए नहीं अपितु देवकार्य के लिए पसन्द कर रहे हैं । जैसे बहुत से मनुष्यों अच्छे कार्य के लिए किसी एक को चुना जाता है और वह इस में अपना गौरव हो समझता जाता उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए प्राणोत्सर्ग करने को भी दत्तचित्त है || ७ || । ' तं त्वा जुषाम हे ' इत्यादि मन्त्र से तो यूपवृक्ष को देवकर्म के करें लिए । अब तैय्यार - ' देवास्त्वा किया था देव-अर्थात् हे यूप वृक्ष! आप इस यज्ञकर्म में नियुक्त होना स्वीकार आप यज्यायै जुषन्ताम् ' -' - इस मन्त्र से देवताओं की ओर से कहते हैं कि हे यूप वृक्ष! देवता को देवयज्या के लिए पसन्द करें । वही कर्म समृद्ध व सुसम्पन्न कहलाता है जिसे देवता पसन्द करते हैं || ८ || इसके पश्चात् ' विष्णवे त्वा ' इस मन्त्र को बोलता हुआ स्रुव से उस वृक्ष का स्पर्श करता है । क्योंकि यूप २१ वें ग्रहण पर है और वहीं यज्ञरूप विष्णु है । यज्ञ के लिए यूप-निर्माण हेतु ही वृक्ष को काटते हैं । अतः ' विष्णवे त्वा ' मन्त्र बोला जाता है || || [ २४३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण इस के बाद वृक्ष के जिस भाग पर तक्षा शस्त्र ( परशु ) प्रहार करता है उस स्थान पर ' प्रोषधे त्रायस्व ' हे प्रोषधि! इसकी रक्षा करो - इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ तरुणकुशा उस यूपवृक्ष के प्रदेश और परशु के बीच रख देता है । जिस परशु से इस वृक्ष को काटा जाता है वह हिंसक होने से वज्ररूप है । वह परशु यूपवृक्ष की हिंसा न करे एतदर्थ ओषधि को मध्य में रखता है । तदनन्तर वृक्ष और परशु के मध्य में प्रोषधि को रखने के बाद ' स्वधितेमैनं हिंसी: ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ वृक्ष पर परशु का प्रहार करता है | वह ' स्वधितेमैनं हिंसी: ' इस मन्त्र का उच्चारण करने से उस वृक्ष की हिंसा नहीं करता ' है ॥१० ॥
परशु - प्रहार से यूपवृक्ष का जो पहला शकल ( छिलका ) कटता है उसको जिस गर्त में यूप को स्थापित करना है उस गर्त में डालने के लिए अध्वर्यु ले लेता है । वह उस यूप को जिस शकट में उसे रख कर ले जाया जाना है, उसके परिमाण से ही काटे जिससे शकट की गति न रुके । अन्यथा शकट के परिमाण से अधिक काटने पर यूप के जमीन पर घिस कर चलने से शकट की गति अवरुद्ध हो जाएगी । शकट का अवरुद्ध होना यज्ञ का ही अवरोध है । ग्रतः अक्ष का स्तम्भन न हो इसी परिमाण से यूपवृक्ष का छेदन करना चाहिए || ११ || काटने के बाद यूप को नीचे पृथिवी में गिराने के समय पूर्व दिशा में गिराना चाहिए, क्यों कि यूप देव कार्य यज्ञ के लिए है और देवताओं की दिशा पूर्व है । यदि पूर्व दिशा में गिराने में कोई बाधा हो तो उत्तर दिशा में गिराना चाहिए, क्यों कि यज्ञ करने वाला यज-मान मनुष्य है और मनुष्यों की दिशा उत्तर है । यदि उत्तर दिशा की ओर गिराने में भी कोई बाधा हो तो पश्चिम दिशा की ओर गिराना चाहिए । किन्तु दक्षिण दिशा की ओर कभी नहीं गिराना चाहिए । ' भूमा वै सुखम्, यदल्पं तद्दुःखम् ' इस छान्दोग्य श्रुति के अनुसार भूमा सुखस्वरूप है और अल्पता दुःखरूप है । अतः दक्षिण दिशा में यूप को गिराना यजमान को सुख सम्पत्ति से वञ्चित करना है । इसलिए दक्षिण दिशा की ओर यूप को कभी नहीं गिराना चाहिए ॥१२ ॥
जिस समय यह यूप कट कर गिरने वाला है, उसी समय अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है - ' द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा हिंसीः पृथिव्या सम्भव ' इति । यह यूप वज्ररूप है जैसा कि ' स्पयस्तृतीयं रथस्तृतीयं, यूपस्तृतीयं ' ( तै ० सं ० २।२।६।२ ) यह तैत्तिरीय श्रुति बतला रही है । यूपनिर्मारणार्थ वृक्ष का कट कर भूमि पर गिरना वज्र का गिरना है । इसलिए वज्ररूप यूप के गिरने से सारे लोक भय से काँप उठते हैं । इस वज्र के भय से सब लोकों की रक्षा के लिए इस वज्र को शान्त करता है । इस तरह मन्त्र शक्ति से उस वज्ररूप यूपार्थ वृक्ष के शान्त हो जाने से वह गिरता हुआ वृक्ष किसी को कुछ पीड़ा नहीं पहुँचाता है || १३ || ' द्यां मा लेखी: ' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह ध्वर्यु जो यह कहता है कि- ' द्यां मा लेखो: ' उससे यही अभिप्राय है कि यूप अपने [ २४४ ]