Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 261–270
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 261–270
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपमानं ब्राह्मण उपरिभाग से द्युलोक को पीड़ा न पहुँचाए । अध्वर्यु जो ' अन्तरिक्षं मा हिंसी: ' यह कहता है-याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' पृथिव्या सम्भव ' इस मन्त्रांश का अर्थ यह है कि हे यूप! आप पृथिवी से संगत हो जाएँ । तदनन्तर अध्वर्यु - ' प्रयं हि त्वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभ-गाय ' अर्थात् हे यूप! शान पर चढा कर तीक्ष्ण किया हुआ यह परशु विपुल सौभाग्य के लिए तुम को वृक्ष से पृथक् करता है ॥ १४ ॥
वैष्णवी ऋचा से आहवनीय में प्राज्य की आहुति देने के बाद जो घृत बच जाता है उसे अध्वर्यु वृक्षस्थान पर ले जाता है और कटे हुए स्थाणु पर घृत की प्राहुति डाल देता है । क्योंकि इस कटे हुए ठूंठ से एक जहरीली वायु ( गैस ) निकलती है । इस जहरीली वायु में रहने वाले नाशक प्रासुर प्रारण वृक्षच्छेदन करने वाले की आत्मा पर किसी प्रकार का आघात न पहुँचाएँ, अतः उस ठूंठ पर घृत की आहुति दी जाती है । प्राज्य वज्ररूप है । इस आज्यरूप वज्र के द्वारा उन नाशक प्रासुर प्राणों का नाश किया जाता है । अथवा यह घृत रेतः स्वरूप है । उस घृतरूप रेत को वनस्पति पर डालने से वनस्पति में अनेक नवीन शाखाएँ उत्पन्न हो जाती हैं- ' अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो विरोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम ' इति ॥ १५ ॥
इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस वृक्ष के ठूंठ पर प्राज्याहुति दे देता है । मन्त्र का अर्थ है कि हे देव वनस्पति! आप इस प्रदेश से अपरिमित अङ्कुर वाली बन कर ऊपर " बढिए । तथा आप की वृद्धि के साथ हम भी अपरिमित प्रजा से युक्त हों ॥१६ ॥
वह तक्षा पहली बार जितना यूप काट लिया जाता है, अन्त तक वह उतना ही रहता है । उसको बाद में काट कर छोटा न करे ॥१७ ॥
वह तक्षा यूपको पाँच अरत्नियों के बराबर का काटे । क्योंकि यज्ञ पञ्चावयव है । पशु भी पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज भेद से पञ्चविध है । संवत्सर में भी वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् तथा हेमन्त अथवा शिशिर भेद से ऋतुएँ पाँच हैं । हेमन्त और शिशिर को एक मान कर पाँच ही ऋतुएँ संवत्सर में होती हैं । ७२-७२ दिनों की एक ऋतु अरत्नियों के परिमाण का ही यूप काटना चाहिए ॥१८ ॥
अथवा ६ अरत्नियों के परिमाण का यूप काटें । क्यों कि संवत्सर में वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर भेद से ६ ऋतुएँ हैं । ६० दिन की एक ऋतु मानने पर संवत्सर में ६ ऋतुएँ होती हैं । संवत्सर वज्ररूप है और यूप भी पूर्वोक्त रीति से वज्ररूप है | इसलिए ६ अरत्नि प्रमाण का यूप काटना चाहिए ॥ १६ ॥
अथवा आठ अरत्नि प्रमाण का यूप काटना चाहिए । क्यों कि गायत्री अष्टाक्षरा है । तथा प्रातः सवन के सम्बन्ध से गायत्री यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । यूप भी यज्ञ के पूर्वभाग में [ २४५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मरंग यूपमान ब्राह्मण स्थापित किये जाने के कारण यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । अतः पूर्वार्ध सादृश्यात् यूप आठ अरत्नि का काटना चाहिए || २० ॥ अथवा & अरत्नि प्रमारण का यूप काटना चाहिए । क्यों कि यज्ञ प्रातः सवन, माध्य-न्दिन सवन, सायंसवन भेद से त्रिवृत् है अर्थात् त्रिवृत् स्तोम रूप है । त्रिवृत्त्व & संख्या पर
जाकर समाप्त होता है । अतः अरत्नि जितना यूप काटना चाहिए ॥ २१ ॥
अथवा ११ अरत्नि प्रमाण जितना यूप काटना चाहिए । क्यों कि त्रिष्टुप् एकादशा-क्षरा है । जैसे गायत्री अग्नि का छन्द है वैसे ही त्रिष्टुप् इन्द्र का छन्द है । त्रिष्टुप् वज्ररूप है । ' वज्र स्त्रिष्टुप् ' ( कौ ० ७।२ ) यह श्रुति त्रिष्टुप् को वज्ररूप बतला रही है । और यूप भी वज्ररूप है । अतः सादृश्यात् ११ अरत्नि प्रमाण का यूप काटना चाहि ॥ २२ ॥
अथवा १२ अरत्नि का यूप काटना चाहिए । क्यों कि संवत्सर में १२ मास होते हैं । संवत्सर वज्ररूप है । यूप भी वज्ररूप है । अतः सादृश्यात् १२ अरत्नि प्रमाण का यूप काटना चाहिए || २३ ॥ अथवा १३ अरत्नि प्रमाण का यूप काटना चाहिए । क्यों कि मलिम्लुच मास अर्थात् अधिक मास को लेकर संवत्सर में १३ मास होते हैं । संवत्सर अग्निमय होने से वज्ररूप है । यूप भी वज्र है । अतः सादृश्यात् १३ अरत्नि का यूप काटना चाहिए ॥ २४ ॥
अथवा १५ अरत्नि प्रमाण का यूप बनाना चाहिए । जैसे त्रिवृत् स्तोम पृथिवीलोक कहलाता है । वैसे पञ्चदश स्तोम अन्तरिक्षलोक है । पृथिवीलोक का अधिष्ठाता अग्नि है वैसे अन्तरिक्षलोक के अधिष्ठाता इन्द्र और वायु हैं । इसीलिए निरुक्तकार यास्क ने दैवत -काण्ड में ' वायुर्वेन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः? यह कहा है । इन्द्र का शस्त्र वज्र है तथा ' पञ्चदशो हि वज्रः ' ( श ० ४ | ३ | ३ | ४ ) इस श्रुति के अनुसार पञ्चदश स्तोम वज्र है और यूप भी वज्र है । अतः सादृश्यात् १५ अरत्नि का यूप काटना चाहिए ॥ २५ ॥
वाजपेय याग में १७ अरत्नि का यूप होता है । अतः ग्रग्निष्टोम याग में १७ अरत्नि का यूप नहीं बनाया जा सकता । अग्निष्टोम याग में यूप कितना बड़ा होना चाहिए, इस विषय में विभिन्न मत बतला कर १५ अरत्नि से अधिक प्रमाण का भी यूप बनाया जा सकता है, यह बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यूप अपरिमित भी बनाया जा सकता है । क्योंकि इस अपरिमित यूप - रूप वज्र से देवताओं ने अपरिमित असुरों को मार र अपरिमित विजय प्राप्त की थी । अतः यह यजमान भी अपरिमित विजय - लाभ के लिए अपरिमित ही यूप बनाता है और अपरिमित विजय प्राप्त करता है ॥ २६ ॥
यह यूप अष्टकोण वाला होता है, क्यों कि गायत्री अष्टाक्षरा है । गायत्री प्रातःसवन के सम्बन्ध से यज्ञ का पूर्वार्द्ध है और यह यूप भी यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । अतः अष्टकोण यूप ही होना चाहिए || २७ | [ २४६ ]
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण [ २४७ ] यूपमान ब्राह्मण अन्या देवताः " ( ऐ ० ब्रा ० अ ० १1१ ) [ विज्ञान भाष्य ] हमने कई बार कहा है कि हमारा जो मनुष्य यज्ञ है - वह भौम स्वर्गवासी देवताओं के यज्ञ की अनुकृति है । भारतीय महर्षियों ने देव - यज्ञ से ही यज्ञ - विद्या सीख कर उसका भारतवर्ष में प्रचार किया था एवं भौम स्वर्गवासी देवताओं ने प्रारण - देवताओं से सीखी थी । जो यज्ञ प्राकृतिक है, जिसके ऋत्विक् अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा हैं, उस प्राकृतिक प्रारण देवता कृत नित्य यज्ञ की प्रतिकृति पर भौम - देवताओं ने यज्ञ - विद्या का आविष्कार किया था । यही कारण है कि जैसा स्वरूप प्राकृत यज्ञ का है, ठीक वैसी ही कल्पना देव यज्ञ में होती थी, एवं वैसी ही आज मनुष्य यज्ञ में होती है । आज यह यजमान प्राकृतिक सोम यज्ञवत् वैध सोम यज्ञ कर तद्द्द्वारा अपने आत्मा का सम्बन्ध सतरहवें त्रिणाचिकेत स्वर्ग से जोड़ना चाहता है । जैसा स्वरूप प्राकृतिक महावेदि का है, ठीक वैसी ही वेदि बनाई जाती है । अब सिर्फ यूप खड़ा करने की आवश्यकता है । प्राकृतिक महावेदि के अन्त में यूप खड़ा रहता है । पृथिवी में से जो चितेनिधेय अमृताग्नि निकलता है, वह पृथिवी के इक्कीसवें ग्रहण तक जाता इसमें जो पृथिवी - पिण्ड है, वह गार्हपत्य है, आन्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि दक्षिणाग्नि है एवं सतरहवें अहर्गण पर रहने वाला श्रग्नि आहवनीयाग्नि कहलाता है । इक्कीसवें पर भगवान् सूर्य्यं हैं । यही इस महा-वेद के " यू " हैं । इसी यूप से यज्ञ - विद्या छुपी हुई है । महर्षियों ने इसी सूर्य्य यूप से यज्ञ का रहस्य जाना था जैसा कि ' दीक्षाव्रत - धर्म ' ब्राह्मण में बतलाया गया है । पृथिवी से निकल कर ( २१ ) इक्कीस तक जाने वाला जो अग्नि है, उसी को " विष्णु " कहते हैं । त्रिवृत् स्तोम तक इस विष्णु का पहला विक्रम हैं, पञ्चदश तक दूसरा विक्रम है । एकविंश तक तीसरा विक्रम है । इस प्रकार पार्थिवाग्नेय विष्णु ने तीन पैंड से सारी रोदसी त्रिलोकी को अपने अधिकार में कर रक्खा है । इसी अग्नि में घनादि अवस्था भेद से ३३ ( तीस ) विभाग मान लिए जाते हैं । ये ही ३३ ( तेतीस ) देवता कहलाते हैं । इन तेतीसों में तेतीस देवता का नाम, जो कि इक्कीस ( २१ ) पर है, विष्णु है, एवं पहले देवता का नाम ' अग्नि ' है । इस ओर अग्नि है, उस ओर विष्णु हैं, बीच में सारे देवता हैं - प्रतएव श्रुति कहती है-" श्रग्निर्वे देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा इक्कीसवें अहर्गण पर ३३ वाँ विष्णु है एवं वही सूर्य्य है । इसी सूर्य्य को " यूप " कहते हैं । चूंकि इस पर विष्णु की सत्ता है, अतएव हम प्राकृतिक सूर्य्य- यूप को ' विष्णु देवताक ' होने से ' वैष्णव ' कहने के लिए तय्यार हैं । इस प्रपञ्च से प्रकृत में यही बतलाना है कि प्रकृति में चूंकि वैष्णव - यूप ( सूर्य ) खड़ा है, अतएव ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या ' इस सिद्धान्त के अनुसार इस यजमान को भी इस यज्ञ में वैष्णव - यूप खड़ा करना चाहिए । बस, इसीलिए यजमान ऋत्विजों सहित जंगल में यूप के लिए काष्ठ काटने जाता । इसके पहले यजमान का प्रतिनिधि अध्वर्यु वैष्णवी ऋचा से ग्राहवनीय अग्नि में आहुति डालता है । जिस समय यूप काटने जाए, उस समय अध्वर्यु को चाहिए कि वह वैष्णवी ऋचा से आहवनीय में हुति डाल दे । उस प्राकृतिक वैष्णव यूप की ओर इशारा करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-चूंकि यह यूप वास्तव में वैष्णव है, अतएव अध्वर्यु वैष्णवी ऋचा से हवन करता है । अर्थात् यू के लिए वैष्णवी ऋचा से हवन करना न्यायप्राप्त ही है-
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) ' शत ० ब्रा ० ३ | ४ | ३ | १६ ' | १. यूपमानं ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ २४८ ] " यूपं व्रक्ष्यन् ( छेत्स्यन् ) वैष्णव्यर्चा ( आहवनीये ) जुहोति । वैष्णवो हि यूपः । तस्माद् वैष्णव्यर्चा जुहोति " इति ॥१ ॥
are किस लिए वैष्णवी ऋचा से हवन करते हैं उसकी एक उपपत्ति और भी है । हमने बतलाया है कि पृथिवी से निकल कर इक्कीस तक वितत होने वाला जो अग्नि है, वही विष्णु कहलाता है । इस अग्नि में पारमेष्ठ्य सोम की प्राहृति होती रहती है । पारमेष्ठ्य सोम इक्कीस के ऊपर है । इसी प्राहुति से यह अग्नीषोमात्मक यज्ञ होता रहता है । चूँकि पार्थिवाग्नि से ही यज्ञ का स्वरूप बनता है, अतएव हम इस अग्नि को ' यज्ञ ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसीलिए ' अग्निर्वै यज्ञः ' ' यह कहा जाता है । चूंकि अग्नि को ही विष्णु कहते हैं एवं ग्रग्नि को ही यज्ञ कहते हैं, अतएव हम इस यज्ञ को ' विष्णु ' कहने के लिए तय्यार हैं । ' यज्ञो वै विष्णु: ' इसीलिए कहा गया है । पृथिवी - पृष्ठ से इक्कीस तक वितत जो श्रग्नि - यज्ञ है, वही विष्णु है । इसी यज्ञ विष्णु से यूप ( सूय्यं ) की प्राप्ति होती है । इक्कीस पर सूर्य है । सूर्य ही यूप है । इस यूप को यदि प्राप्त करना है तो इस यज्ञ विष्णु की ही शरण लेनी पड़ती है । state तक वितत रहने वाले विष्णु को पार किए बिना यूप ( सूर्य्य ) की प्राप्ति नहीं हो सकती । यूप प्राप्ति का साधन यही विष्णु है । एवमेव उसी प्रकृति के अनुरूप वितत जो हमारा यज्ञ - विष्णु है, उसके इक्कीसवें स्थान पर ही सूर्य्य - यूष की प्रतिकृति पर ' काष्ठ का यूप ' खड़ा किया जाता है । इस सूर्य्य स्थानीय यूपको इस यज्ञ - विष्णु से ही प्राप्त किया जा सकता है । अध्वर्यु यूप के सम्मुख जाता है । चूंकि यूप प्राप्ति का ( सौर - स्वर्ग प्राप्ति का ) साधन यज्ञ है तथा यज्ञ को ही विष्णु कहते हैं अतएव यूप लाते समय वैष्णवी ऋचा से ही हवन करना चाहिए । इस प्रकार यूप चूँकि इक्कीस पर है, विष्णु - स्थान में है, श्रतः हम यूप नहीं ला रहे हैं, अपितु ' विष्णु ' को ला रहे हैं । इसलिए भी वैष्णवी ऋचा से ही हवनः करना चाहिए । यूपं प्राप्ति का साधन भी चूंकि यही यज्ञ ( विष्णु ) है, इसलिए भी यूप लाने से पहले वैष्णवी ऋचा से ही हवन करना चाहिए । " यद्वेव वैष्णव्या जुहोति ( तदुच्यते । यज्ञो वै विष्णुः । यज्ञेनैवैतधूप-मच्छेति ( यज्ञमार्गेणैव यूपमभिलक्ष्य गतवान् भवति ) तस्माद् वैष्णव्यर्चा जुहोति ॥२ ॥
जुहू से भी प्राहुति हो सकती है एवं उपभृत् से भी हो सकती है । ये दोनों स्रवा स चि नाम से व्यवहृत होते हैं । स्र ुचि से आहुति देनी हो तब तो ( ध्रुवा में से ) चार बार उस स्रुचि में घृत ले कर उस चतुर्गृहीत आज्य से आहुति देनी चाहिए । यदि स्रवा से आहुति देनी हो तो चार बार लेने की कोई जरूरत नहीं, अपितु ध्रुवा में रक्खे हुए घृत में उस स्रवा को डुबो उसमें घृत ले कर उसकी आहुति दे देनी चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण " स यदि स्रुचा जुहोति चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति । यद्यु ( यत्पुनः ) सुवेर - स्रुवेणैवोपहत्य ( श्राज्यं ) जुहोति " । इस प्रकार त्रवा में अथवा स्रुचि में घृत ले कर वह प्रध्वर्यु -" रु विष्णो विक्रमस्य, उरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्र प्र यज्ञपति तिर स्वाहा " ॥ ( वा ० सं ० ५।४१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ - - श्राहवनीय में उस प्राज्य की प्राहुति डाल देता है । हे यज्ञात्मक विष्णु! आप इस विपुल पृथिवी से द्युलोक पर्य्यन्त विक्रमण कीजिए । ( अर्थात् हमारा यह यज्ञ - विष्णु पृथिवी से द्युलोक तक वितत हो जाय - यही तात्पर्य है ) । क्यों विक्रमण करे, इसका कारण बतलाते हैं-हमारे निवास के लिए ( क्षयाय ) आप विपुल विक्रमण कीजिए । वास्तव में बात सच है । इसी यज्ञ द्वारा तो यजमान स्वर्ग तक अपनी सत्ता स्थापित करता | यदि यज्ञ - विष्णु ही वहाँ तक न पहुँचेगा तो यजमान वहाँ तक किस आधार से जाएगा? विष्णु से प्रार्थना कर अब अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि घृत! ( घृत से ही अग्नि उत्पन्न होता है - प्रदीप्त होता है - स्वरूप - सत्ता रखता है, अतएव अग्नि को घृतयोनि कहा जाता है ) आप इस हुत घृत को पीजिए एवं उस यज्ञ के अधिपति जो यजमान हैं - उन्हें ए, उन्हें सम्पत्तियुक्त कीजिए । इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र से प्राहवनीयाग्नि में आज्याहुति डाल देता है-" स यदि स्रुचा जुहोति XXX इत्यादि ॥३ ॥
आहवनीय में प्राहुति देने के अनन्तरा स्र ुवअथवा स्रुचि में जो घृत बच जाता है, उसका काम यूप वृक्ष के समीप पड़ेगा - प्रतएव उसे अध्वर्यु ले लेता है । एवं जो तक्षण का शस्त्र ( बसौला वगैरह ) होता है, उसे तक्षा ले लेता है । तक्षा ( खाती ) ही तो यूपच्छेदन करेगा । इस प्रकार अध्वर्यु अवशिष्ट घृत ले लेता है - तक्षा शस्त्र ले लेता है । सब तरह तय्यार हो- प्रध्वर्यु - तक्षादि सब मिल कर उस यूप - स्थान पर आते हैं-" यदाज्यं परिशिष्टं भवति तदादत्ते - ( अवशिष्टमाज्यमध्वर्युरादत्ते ) -यत् तक्ष्णः शस्त्रं भवति तत्तक्षादत्ते । त प्रायन्ति - ( यूप वृक्ष समीपे ) " । जिस जंगल में ये लोग यूप काटने जाते हैं, उसमें अनेक वृक्ष होते हैं । उनमें से जो वृक्ष यूप के लिए उपयुक्त होता है - ऋत्विक् लोग उसे ढूंढते हैं । ढूंढ ढांढ कर सारे वृक्षों में से एक वृक्ष को - जो कि यूप के लिए सर्वथा उपयुक्त है - पसन्द कर लेते हैं । बस, वे लोग जिस यूप को पसन्द करते हैं- जिसे यज्ञ के लिए उपयुक्त समझते हैं— “ स ( ते ) यं यूपं जोषयन्ते " ॥ ४ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ०६ ) " प्रत्यन्यां फिर उसी मन्त्र का शेष बोलते हैं-शतपथ ब्राह्मणे यूपमान ब्राह्मण [ २५० ] उसी यूप का स्पर्श कर अध्वर्यु मन्त्र का जप करता है । परन्तु ध्यान रहे, उसे मन्त्र पश्चिम में बैठ कर पूर्वाभिमुख हो कर ही बोलना चाहिए । वृक्ष के पश्चिम भाग में जा कर पूर्वाभिमुख हो वृक्ष का स्पर्श कर अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-गां नान्यांऽ उपागाम् " इति । ( वा ० सं ० ५।४२ ) हे पुरोवति वृक्ष! हम पूर्व के नानाजातीय यूप वृक्षों का प्रतिक्रमण करके आपके पास आए हैं एवं आपका ' हमने आश्रय लिया है । अब आप से जो आगे हैं उन वृक्षों के पास भी नहीं जाते हैं । तात्पर्य यही है कि - श्राप से पहले भी अनेक वृक्ष हैं एवं आपके आगे भी बहुत से वृक्ष हैं जिनको कि यूप कर्म में नियुक्त किया जा सकता था । परन्तु हमने सब का अतिक्रमण कर केवल प्राप ही का आश्रय लिया है । आप ही को मुख्य समझा है । आशा है - आप अपने मुख्यत्व का ध्यान रखते हुए हम प्रश्रितों के यज्ञ को सफल करेंगे । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - यह अध्वर्यु - इस यूप से पूर्ववर्ती जो अन्य वृक्ष हैं उनका अतिक्रमण कर देता है एवं इस वृक्ष से आगे जो वृक्ष हैं, उनके पास भी नहीं जाता है— " तमेवमभिमृश्य जपति । पश्चाद्वैव प्राङ् तिष्ठन्नभिमन्त्रयते " । " प्रत्यन्यां - इत्यादि । प्रति ह्यन्यानेति - ( नानाजातीयान् - पूर्ववृक्षान् श्रतिक्रम्य - एति ) । नान्यानुपैति तस्मादाह- प्रत्यन्याम् - इत्यादि " ॥५ ॥
" अर्वाक् त्वा परेभ्योऽविदं परोऽवरेभ्यः - इति " । ( वा ० सं ० ५।४२ जिस वृक्ष को तक्षा काटता है, उसके आगे भी बहुत से वृक्ष हैं एवं इस प्रोर भी बहुत से वृक्ष हैं । यह वृक्ष- दोनों श्रोर के वृक्षों के मध्य में है । बात असल में यह है कि जंगल के और घाटी के आदि-न्त के जो वृक्ष होते हैं, उनमें अधिक बल नहीं होता । चूंकि उनके श्रागे वृक्ष नहीं हैं, प्रतएव और वृक्षों के स्रोत उनसे नहीं मिलते । केवल एक तरफ के स्रोतों का ही सम्बन्ध होता है । परन्तु जो जंगल के बीच के वृक्ष होते हैं - उनमें चूंकि चारों ओर के वृक्ष स्रोत श्रोतप्रोत रहते हैं अतएव वे अधिक बलिष्ठ होते हैं । उनमें रस मात्रा अधिक रहती है । अतएव जानबूझ कर मध्य के वृक्ष को ही यूप के लिए पसन्द किया जाता है । चूंकि यह मध्य का वृक्ष अपने से आगे वाले वृक्षों से तो अर्वाक् है, इस ओर है, छोटा है, एवं प्रपने से पीछे वाले वृक्षों से पर है- बड़ा है- पीछे वालों से आगे है, आगे वालों से पीछे है, अर्थात् मध्यस्थ है । इस मन्त्र से ही यह भाव मालूम होता है कि ऐसा वृक्ष लेना चाहिए जिसके इधर भी अनेक वृक्ष हों एवं उधर भी अनेक वृक्ष हों । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - इस वृक्ष से जो आगे अनेक वृक्ष हैं, उनसे जो अर्वाक् रहने वाला है, ऐसे को काटता है, एवं जो वृक्ष इससे अर्वाक् होते है उन अवरों से पर रहने वाले को काटता है—
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तृतीय काण्ड ( अ ०६ ) शतपथ ब्राह्मणे यूपमान ब्राह्मण " र्वाग्ध्येनं परेभ्यो वृश्चति यएतस्मात् पराञ्चो भवन्ति । परोऽ-वरेभ्य इति । परो ह्येनमवरेभ्यो वृश्चति - य एतस्मादर्वाञ्च भवति । तस्मा-दाह - अर्वाक् त्वा - इत्यादि " || ६ || " तं त्वा जुषामहे देव वनस्पते देवयज्यायै " - इति । ( वा ० सं ० ५।४२ ) हे देव वनस्पते! ऐसे आपको, हम देवयज्या के लिए अर्थात् देवताओं के लिए पसन्द करते हैं । " देव यज्यायै " से स्वार्थभाव हटाया जाता है । आप हमारे काम में नहीं आएँगे । आपको हम अपने स्वार्थ के लिए नहीं काटते, अपितु देवताओं के लिए आपको ले जाते हैं । मन्त्र का तात्पर्य्यार्थ काम में बतलाते अनेक हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - यदि कोई अच्छा काम किया जाता है और उस अच्छे मनुष्यों में से किसी एक को, उसका अध्यक्ष बना दिया जाता है तो वह इसमें अपनी प्रतिष्ठा समझता उसे भी है - गौरव समझता है । एवं इसी प्रतिष्ठा के कारण यदि उस कार्य में कठिनता भी आती है तो वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है । वास्तव में बात सच है । अमेरिका आदि पाश्चात्य देशों में प्रजा के चुनाव से - प्रजा की पसन्द से - अध्यक्ष का चुनाव होता है । सारे अमेरिका में से किसी एक को वह पद मिलता है । यद्यपि सारे शासन की बागडोर हाथ में लेना अपनी जान पर खेलना है, तथापि चूँकि शुभ वह पद बहुत ऊँचा है - बहुत ही श्रेष्ठ काम है, अतएव उस पद पर आरूढ होने वाला प्रतिष्ठा है और । उसे काम में नियुक्ति के सामने सारे कष्टों को तुच्छ समझ, उस पद को सहर्ष स्वीकार कर लेता इस बात में बड़ी प्रसन्नता होती है कि देखो! इतने मनुष्यों के होते हुए भी इन्होंने मुझे ही योग्य समझा भी है । बस, इसी प्रसन्नता के आवेग में वह सब कुछ स्वीकार कर लेता है । बस, ठीक वही बात यहाँ कर्म " है । यज्ञ, संसार के सारे कम्मों से श्रेष्ठ कर्म है, उत्तम कर्म है । अतएव - " यज्ञो वै श्रेष्ठतमं ही चुना यह कहा जाता है । आज अनेक वृक्षों के होते हुए भी - इस श्रेष्ठ कर्म में - इस मध्य के वृक्ष को गया है । अतएव आज यह इस प्रतिष्ठा से बहुत ही प्रसन्न हो गया है । इसी प्रसन्नता में आज देव- यह वृश्चन के लिए कटने के लिए प्राणोत्सर्ग तक के लिए - दत्तमना - रातमनाः हो जाता है । प्राज यह यज्या जैसे सर्वश्रेष्ठ कर्म में नियुक्त होने वाला है । इस प्रकार " तं त्वा जुषा महे देव वनस्पते देव-यज्यायें " से इसका श्रेष्ठ पद की ओर ध्यान दिलाया जाता है । इससे यह - वृश्चन के लिए रातमना हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तद्यथा बहूनां ( पुरुषाणां ) मध्यात् साधवे कर्मणे जुषेत - स रातमनाः ( दत्तचित्तः ) तस्मै कर्मणे स्यात् - एवमेवैनमेतद् बहूनां ( वृक्षाणां ) मध्यात् साधवे कर्मणे जुषते, स रातमना व्रश्चनाय भवति " ॥७ ॥
" देवास्त्वा देवयज्यायै जुषन्ताम् " - इति । ( वा ० सं ० ५॥४२ ) [ २५१ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमनि ब्राह्मण यह यूप, देवताओं के लिए काटा जाता है । अतएव पूर्व में " तं त्वा जुषामहे " इत्यादि मन्त्र से तो, इस यूप को, इस कर्म के लिए तैय्यार किया था । यूप से प्रार्थना की थी कि आप इस यज्ञ कर्म्म में नियुक्त होना स्वीकार करें । अब देवताओं की ओर से कहते हैं कि हे यूप! देवयज्या के लिए देवता आपको पसन्द करें । अर्थात् जैसे आपने यज्ञ - कर्म में युक्त होना पसन्द किया है तथैव होता श्रापको पसन्द कर लें । सच है - यदि अध्यक्ष को प्रजा न माने - प्रजा न पसन्द करे तो उसका अध्यक्ष पद पर आरूढ़ होना ही व्यर्थ है । वही कार्य्यं समृद्ध एवं सुसम्पन्न कहलाता है, जिसे देवता पसन्द कर लें । बस, इसीलिए " देवास्त्वाः " इत्यादि कहा गया है--" तद्वै समृद्ध - यं देवाः साधवे कर्म्मणे जुषान्तै- तस्मादाह - देवास्त्वा -इत्यादि " || ८ || इस प्रकार --" अत्यन्यां गां नान्यां उपागां प्रर्वाक् त्वा परेभ्योऽविदं परोऽवरेभ्यः । तं त्वा जुषामहे देव वनस्पते देवयज्यायै देवास्त्वा देवयज्यायै जुषन्ताम् " ॥ यह बोलता हुआ, अध्वर्यु उस वृक्ष का स्पर्श करता है ॥ ८ ॥
( वा ० सं ० ५।४२ ) इसके अनन्तर ' विष्णवे त्वा ' ( वा ० सं ० ५।४२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ स्रवा से उस वृक्ष का स्पर्श करता है । चूंकि इक्कीस पर यूप है, इक्कीसवें स्थान पर ही यज्ञ - विष्णु है, अतएव इस यूप को वैष्णव कहा जा सकता है, जैसा कि ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । एवं यज्ञ को ही विष्णु कहते हैं तो ' विष्णवे त्वा ' का अर्थ यही है कि यज्ञ के लिए मैं तुम्हारा स्पर्श करता हूँ । वास्तव में चूंकि इसे यज्ञ के लिए ही काटते हैं - यज्ञ विष्णु को कहते हैं - अतएव ' विष्णवे त्वा ' कह कर स्पर्श करना न्यायप्राप्त ही है--. " वैष्णवो हि यूपः । यज्ञो वै विष्णुः । यज्ञाय ह्येनं वृश्चति । तस्मादाह विष्णवे त्वेति ॥ ॥ इसके अनन्तर वृक्ष के जिस स्थान पर तक्षा शस्त्र प्रहार करेगा उस स्थान पर ' प्रोषधे त्रायस्व ' यह और मन्त्र बोलता ' हुप्रा - शस्त्र यूप ' के बीच में दर्भ तरुणक ( तरुरण कुशा ) की कोमल नवीन बर्हि रख देता है । जिस फरसे से इस वृक्ष को काटा जाएगा वह हिंसकधर्म्मा होने के कारण वज्र है, आग्नेय है । ' प्रोषधे त्रायस्व ' यह कह कर यूप के और इस परशु के बीच में प्रौषधि रखने से हिंसा नहीं होती है --" अथ दर्भ रुकमन्तर्द्दधाति - प्रोषधे त्रायस्वेति ( मन्त्रेणेति शेषः ) । वो वै परशुः । तथो हैनमेष वज्रः परशुर्न हिनस्ति " । [ २५२ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण इस प्रकार " ओषधे त्रायस्व ( हे ओषधे! त्वं एवं वृक्षं प्रहारव्यथातो त्रायस्व ) " । मन्त्र से दर्भतरुणक रखने के अनन्तर ---" स्वधिते मैनं हिंसी: " । ( वा ० सं ० ५।४२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस फरसे से वृक्ष पर प्रहार करता है । परशु वज्र है । " स्वधिते मैनं हिंसी: " । कहने से यह वज्ज्र फ़रसा वृक्ष को चोट नहीं पहुँचाता है । ( वा ० सं ० ५।४२ ) " थ परशुना प्रहरति - स्वधिते मैनं हिंसी: - ( इति मन्त्रेरण ) । तथो हैन-मेष वज्र: - परशुर्न हिनस्ति ॥ १० ॥
परशु के प्रहार से उस यूप का जो सबसे पहले छिलका गिरता है, वह चूँकि यूपावट में ( यूप जिस खड्डे में गाड़ा जाएगा उस खड्डे में ) डाला जाएगा, अतएव उसे श्रध्वर्यु उठा लेता है । " स यं प्रथमं शकलमपच्छिनत्ति तमादत्ते - ( प्रथम च्छित्रं शकलं यूपावटे प्रक्षेपार्थमध्वर्युरादत्ते ) " । इस यूपको गाड़ी में रख कर ले जाया जाता है । यदि गाड़ी में जितना बड़ा लट्ठा आसानी से समा सकता है, उससे बड़ा रख दिया जाता है तो वह हिस्सा जमीन पर घिसटता हुआ चलता है । इससे प्रक्षस्तम्भ हो जाता है । अर्थात् शकट के धुरे की गति रुक जाती है । ऐसा न हो, शकट का प्रक्षस्तम्भ न हो, अतः उस यूप को उस शकट के अन्दाज से ही काटना चाहिए । यदि तुमने अन्दाज से ज्यादा लम्बा काट लिया तो वह जमीन पर घिसटता हुआ चलेगा, जमीन पर घिसटने से अक्षस्तम्भन होगा, गाड़ी रुक जाएगी । यह जो गाड़ी का रुकना है, वह यज्ञ का रुकना है । श्रतएव तक्षा को चाहिए कि वह उस यूप को अनक्षस्तम्भ ही काटे । एक बार काटे बाद फिर काटना अनुचित है नहीं तो फिर भी काट - काट कर उसे अनक्षस्तम्भ बनाया जा सकता था । अतः पहले समय में ही इसका ध्यान रखना चाहिए | इसी का स्पष्टीकरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - इस यूप को गाड़ी से ले जाते | गाड़ी अक्ष के आधार पर चलती हैं । यदि क्षस्तम्भ हो जाए तो गाड़ी ही न चले । अतएव उसे अनक्षस्तम्भ ही काटा जाता है । ऐसा करने से वह यूप गाड़ी की गति का प्रतिबन्धक नहीं बनता । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" तं वाऽग्रनक्षस्तम्भं वृश्चेत्- ( न विद्यते प्रक्षस्य शकटाङ्गस्य स्तम्भो यस्मिन् व्रश्चनकरण तं तथाभूतम् ) उत ह्येनमनसा वहन्ति । तथोनो ( शकट: ) न प्रतिबाधते " ॥११ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण इस प्रकार शक में यूप को रख कर यज्ञ शाला के पास ले जाते हैं । एवं उस यूप को शकट में से गिराते हुए किस दिशा में गिराना चाहिए - यह बतलाते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उस यूप को पूर्व की और ही गिराएँ, क्योंकि ग्रुप देवकार्थ्य के लिए आया है एवं देवताओं की दिक् पूर्वा ही है । " तं प्राञ्चं पातयेत् - प्राची हि देवानां दिक् " । यदि पूर्व की ओर कुछ प्रतिबन्धक हो तो, उत्तर की ओर गिराए, क्यों कि जैसे यज्ञ में देव - भाव शामिल है तथैव यज्ञ का अधिपति मनुष्य है । जैसे देवताओं की पूर्वादिक् है तथैव मनुष्यों की उत्तरा-दिक् है | अतः यजमानापेक्षया यूप को उत्तर में भी डाला जा सकता है—-" प्रथो उदञ्चम् । उदीची हि मनुष्याणां दिक् " । यदि उत्तर में कुछ प्रतिबन्धक हो तो फिर पश्चिम की ओर ही डाल दे । परन्तु दक्षिण दिशा के लिए परिबाध न करने की इच्छा रक्खे । अर्थात् और सब तरफ डाल सकते हो, दक्षिण दिशा की ओर नहीं डाल सकते । दक्षिण में यूप कभी न गिरे इस की पूरी कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिणा दिक् पितरों की दिक् है । दक्षिण दिशा के लोकपाल यमराज हैं । यमराज अवसान के अधिष्ठाता हैं । प्रत-एव - " मो वै श्रवसानं ददाति पृथिव्यै " यह कहा जाता है । अवसान अल्पता करता है, भूमा का बाध करता है । भूमा ही सुख है, अल्पत्व ही दुःख है । " यो वै भूमा तद्वै सुखम् श्रथ दल्पं तद् दुःखम् " यह अटल सिद्धान्त है । ऐसी अवस्था में यम दिशा में यूप को गिराना - सुख - संपत्ति से वञ्चित होना है । अतएव दक्षिण में यूप को कभी न गिरने दे | सारांश यही हुआ कि जिस समय वृक्ष काटा जाए उस समय उसे इस तरह से काटे जिससे वह दक्षिण दिशा में न गिर कर उत्तर - पूर्व - पश्चिम - तीनों में से किसी एक दिशा में गिरे— " थो प्रत्यञ्चम् । दक्षिरणायै त्वेवैनं दिशः परिविबाधिषेत ( परि-बाधकं कारयितुमिच्छेत् ) । एषा वै दिक् पितृणाम् । तस्मादेनं दक्षिरणायै दिशः परिविबाधिषेत " ॥१२ ॥
जिस समय वह यूप कट कर गिरने लगता है - उसी समय अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा हिंसीः पृथिव्या सम्भव " - इति । ( वा ० सं ० ५।४३ ) प्रथम काण्ड में वेदि - संपादन ब्राह्मण में बतलाया गया है कि इन्द्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए जब वज्र चलाया तो उस वज्र के चार टुकड़े हो गए । उनमें से एक टुकड़ा " यूप " कहलाया । चूँकि यूप उसी वज्र का हिस्सा है, अतएव हम इसे ' वज्र ' कहने के लिए तैय्यार हैं । जिस वृक्ष को यूप के लिए काटते हैं, उसे वज्र ही समझना चाहिए । यूषार्थ वृक्ष का कट कर भूमि पर गिरना वृक्ष का गिरना नहीं [ २५४ ]