Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 271–280
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 271–280
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण है, अपितु वस्त्र का गिरना है । जिस समय यह वज्र गिरता है तो इसके गिरने से सारे लोक कॉप उठते हैं, भयभीत हो पड़ते हैं । बस, उनके भय को मिटाने के लिए गिरते हुए धूप - वस्त्र से किसी प्राणी की हिंसा न हो जाए, इसलिए यूँप से ' यां मा लेखी, अन्तरिक्ष मा हिंसी: ' इत्यादि प्रार्थना की जाती है । शान्ति लक्ष्यार्थ इस प्रार्थना से उस वज्र को शान्त करता है । इस प्रकार मन्त्र शक्ति से शान्त हो कर वह यूप - वज्र नीचे गिरता हुआ किसी को कुछ भी पीड़ा नहीं पहुंचाता -" तं प्रच्यवमानमनुमन्त्रयते द्यां मा लेखी: - ( इत्यादि मन्त्रेण ) । वज्त्री वा एष भवति यं यूपाय वृश्चन्ति । तस्माद् वज्त्रात् प्रच्यवमानात् इमे लोकाः संरेजन्ते ( भयभीता भवन्ति ) । तदेभ्य एवैनमेतल्लोकेभ्यः शमयति । तथे-मान् लोकान् शान्तो न हिनस्ति " ॥१३ ॥
वह श्रध्वर्यु जो कि " द्यां मा लेखी: " कहता है, उससे यही अभिप्राय हैं कि हे यूप! अपने ऊपरी भाग से आप द्युलोक को पीड़ा मत पहुँचाइए । " द्यां मा लेखीरिति - दिवं मा हिसीरित्येवैतदाह " - इति । ' अन्तरिक्षं मा हिंसी: ' इसका भी अर्थ स्पष्ट है । इसमें कुछ छुपी हुई बात नहीं है । जो अर्थ ' द्यां मा लेखी ' का है, वही अर्थ ' अन्तरिक्षं मा हिंसी: ' का है । " अन्तरिक्षं मा हिसीरिति - नात्र तिरोहितमिवास्ति " । " पृथिव्या सम्भव " इससे यही कहा है कि आप पृथिवी के साथ संगत हो जाएँ । ऐकमत्य को प्राप्त हो जाएँ । पृथिवी और आप दोनों मित्र बन जाएँ । आपको अपने उदर में पृथिवी स्थान दे दे एवं श्राप उसके उदर में प्रविष्ट हो, उसे पीड़ा न पहुँचाए बस ऐसे बन जाए । " पृथिव्या सज्जानीष्व ( ऐकमत्यं प्राप्नुहि ) इत्येवैतदाह " । इसके बाद फिर मन्त्र का शेष अंश बोलता है -" अयं हि त्वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभगाय " - इति । [ अयं स्वधिति: ( छेदनसाधनपरशुः ) तेतिजान: ( निशितो भवन् ) महते ( विपु-लाय ) सौभगाय ( सुभगत्वाय ) प्रणिनाय ] " । तीक्ष्ण धार वाला - शाण पर चढ़ा हुआ जो छेदन - साधन परशु है- हे यूप! तुम को ऐसे परशु ने बड़े भारी अच्छे कार्य्यं के लिए वृक्ष से पृथक् किया है । वृक्ष में जो यूप है, वह बेडौल है । परन्तु वही फरसे से है तो बड़ा सुन्दर हो जाता है । अतएव “ सौभगाय " कहा है । [ २५५ ] काट कर ' अठपहलू ' बना दिया जाता श्रापका जो छेदन है, वह आपकी सुन्द
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तृतीय काण्ड ( ०६ ) १. वा ० सं ० ५।४३ । शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण " नात्र तिरोहितमिवास्ति " ॥१६ ॥
[ २५६ ] ता बढाने के लिए है, श्रेष्ठ काम में आपको नियुक्त करने के लिए है, यही ताप्पर्य है । " चूंकि शाण-दार स्वधिति ही इस ग्रुप को यज्ञ में ले जाता है, अतएव " श्रयं हित्वा " इत्यादि कहा जाता है । " एष ह्येनं स्वधितिस्तेजमानः प्रणयति ॥ १४ ॥
हमने बतलाया था कि वैष्णवी ऋचा से श्राहवनीय में प्राहुति डालने के अनन्तर जो घृत शेष रह जाता है, उसे ' अध्वर्यु ' इस वृक्ष स्थान पर साथ ले श्राता है । जब वृक्ष कट कर अलग गिर पड़ता है तो उस ठूंठ पर उस घृत की प्राहुति डाल देता है । वृक्ष के कट कर गिरते ही इस ठूंठ में से एक जहरीला रूखा वायु निकलता है जिसे भौतिकी में ' गैस ' कहते हैं । इस गैस में आसुर भाव रहता है । यह निकलते ही यज्ञ के वातावरण को दूषित करने वाला होता है । एवं इस वृक्ष - वायु में रहने वाले नाशक श्रासुर प्राण वृक्षच्छेदन करने वाले के आत्मा पर श्राघात पहुंचाते हैं । इसे रोकने, इस जहरीली गैस को दबाने के लिए उस ठूंठ पर घृत डाला जाता है । घृत स्नेहन है । स्नेहन से रुक्षता दब जाती है । रूखे पदार्थ की रुक्षता को नष्ट करने के लिए घृत वज्र - स्वरूप है । इसके डलते ही वह रुक्ष विषैला वायु जहाँ का तहाँ दब जाता है । बस, इसीलिए उस कटे स्थान पर घृत डाला जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " प्रथाव्रश्चनमभिजुहोति । नेदतो ( प्रस्मात् - प्राव्रश्चन स्थानात् ) नाष्ट्रा रक्षांसि प्रतिष्ठान् - इति । वज्रो वाऽप्राज्यम् । तद् वत्रेणैवैतन्नाष्ट्रा रक्षांसि -अबाधते । तथातो नाष्ट्रा रक्षांसि नानूत्तिष्ठन्ति " | घृत क्यों डाला जाता है? इसकी एक उपपत्ति हो गई । अब दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं । यह घृत, रेतस्त्ररूप है । इस घृतरेत का वनस्पति पर डालना वनस्पति से और और ' शाखा ' उत्पन्न करना है । घृत से अङ्कुरोत्पत्ति भी हो जाती है - यही तात्पर्य है । " रेतो वाऽप्राज्यम् । तद् वनस्पतिष्वेवैतद्रेतो दधाति । तस्माद् - रेतस, आव्रश्चनात् - वनस्पतयोऽनुप्रजायन्ते " ॥ १५ ॥
क्यों घृताहुति डालनी चाहिए? इसकी उपपत्ति बतलादी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह ' अध्वर्यु ' ' प्रतस्त्वं देव वनस्पते शतवत्शो विरोह सहस्रवत्शा वि वयं रुहेम " १ । इस मन्त्र से उस ढूँठ परायाहुति डालता है । हे देव! हे वनस्पते! प्राप इस प्रदेश से अपरिमित अङ्कुर वाली बन कर ऊपर बढिए । आपके साथ ही हम भी अपरिमित प्रजा से युक्त हों - ऊपर बढ़ें -- प्रर्थात् उन्नत हों । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस मन्त्र का अर्थ तिरोहित अर्थात् गूढ़ नहीं है ।
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण यूपमान ब्राह्मण उस यूप को काटते हैं । इसमें एक खास नियम बतलाते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह तक्षा पहली बार जितना बड़ा यूप काट लेता है, फिर सदा के लिए वह यूप उतना ही रहता है । यूप को बार - बार नहीं काटा जाता, अपितु पहली बार जितना लम्बा कट जाता है, अन्त तक उतना ही लम्बा रहता है । इसलिए जितना लम्बा काटना हो, पहले उस स्थान पर निशान बना दो एवं उतना ही काट लो । " तं ( यूपं ) परिवासयति ( श्राच्छिनत्ति ) । स यावन्तमेवाग्रे परिवासयेत्-( प्रथमच्छेदकाले यावत्परिमाणं परिवासयेत् ) तावान् त्स्यात् ( तावतैव भवि-तव्यम् ) | ( स्वापेक्षितप्रमाणाय न पुनश्छिन्द्यात् इत्यर्थः ) " || १७ | जब परिवासन में यह प्रतिबन्ध है कि जितना चाहिए, उतना एक बार ही काट लो तो यह जिज्ञासा होती है कि कितना बड़ा काटें? इसी का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-तक्षा को चाहिए कि वह पाँच अरत्नि ( एक अरत्नि = २४ अंगुल ) जितना काट ले । प्राण - प्राप-वाक् - अन्न - ग्रन्नाद एवं स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी भेदेन यज्ञ पाङ्क्त है अर्थात् पञ्चावयव है एवं संवत्सर यज्ञ की पांच ही ऋतुएँ हैं अतएव उभयथा- पाँच ही अरत्नि के परिमाण से यूप का परि-वासन करना चाहिए-“ पञ्चरत्निं परिवासयेत् । पाङ्क्तो यज्ञः । पाङ्क्तः पशुः ( पुरुषा-दित्यः ) पञ्चर्तवः संवत्सरस्य । तस्मात् पञ्चारत्निं परिवासयेत् ॥ १८ ॥
अथवा ६ अरत्नि परिवासन करना चाहिए । एक संवत्सर में ६ ऋतुएँ होती हैं । संवत्सर ही यज्ञ है । संवत्सर ( सौर संस्था ) असुरों के लिए वज्रस्वरूप एवं यूप भी वज्रस्वरूप है, अत: उस सादृश्यात् उसे ६ अरत्नि लम्बा ही बनाना चाहिए-" बडरत्निं परिवासयेत् । षड्वाऽऋतवः संवत्सरस्य । संवत्सरो वज्रः । aat यूपः । तस्मात् षडरत्निं परिवासयेत् ॥ १ ९ ॥ अथवा आठ अरत्नि पर जा कर परिवासन कर देना चाहिए, क्यों कि गायत्री अष्टाक्षरा है एवं प्रातः सवन - सम्बन्ध से गायत्री यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । यूप भी ग्राहवनीय यज्ञ के पूर्व भाग में खड़े किए जाने के कारण यज्ञ का पूर्वार्द्ध ही है । अतः सादृश्यात् यूप आठ अरत्नि के परिमाण का ही होना चाहिए-" अष्टारत्निं परिवासयेत् । श्रष्टाक्षरा वै गायत्री । पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्थ
गायत्री । पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य । तस्मादष्टारत्निं परिवासयेत् " ॥२० ॥
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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपमान ब्राह्मण अथवा नौ अरत्नि जितना यूप बनाना चाहिए, क्यों कि यज्ञ, प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन एवं सायंसवन भेदेन त्रिवृत् है । त्रिवृतत्व- ६ संख्या पर जा कर समाप्त होता है, अतः नवारनि पर परि-बासन करना चाहिए -" नवारत्निं परिवासयेत् । त्रिवृद्वैः यज्ञः । नव वै त्रिवृत् । तस्मान्नवा -रत्निं परिवासयेत् " ॥२१ ॥
अथवा एकादश ( ११ ) अरत्नि पर होती है तथैव त्रिष्टुप् एकादशाक्षरा होता है । है । इन्द्र विद्युत् स्वरूप है । विद्युत् वज्र है । परिवासन करना चाहिए क्यों कि जैसे गायत्री अष्टाक्षरा जैसे गायत्री अग्नि का छन्द है तथैव त्रिष्टुप् इन्द्र का छन्द अतएव त्रिष्टुप् भी वज्र मान लिया जाता है एवं यूप भी वज्र है | अतः सादृश्यात् यूप एकादश ( ११ ) अरत्नि के परिमाण का ही होना चाहिए -" एकादशारत्निं परिवासयेत् । एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप् वज्रस्त्रिष्टुप् । arat यूपः । तस्मादेकादशारत्निं परिवासयेत् ” ॥२२ ॥
अथवा द्वादश ( १२ वीं ) अरत्नि पर परिवासन करना चाहिए । क्यों कि एक संवत्सर के बारह ( १२ ) मास होते हैं, संवत्सर अग्निमय होने के कारण प्राप्य प्रारणस्वरूप असुरों के लिए वज्र है । एवं यूप भी वज्र है, अतः सादृश्यात् ग्रूप ( १२ ) बारह अरत्नि जितना लम्बा होना चाहिए-" द्वादशारत्निं परिवासयेत् । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य । संवत्सरो
वज्रः । वज्रो यूपः । तस्माद् द्वादशारत्निं परिवासयेत् " ॥ २३ ॥
अथवा त्रयोदश ( १३ ) अरत्नि जितना यूप बनाना चाहिए क्यों कि मलिम्लुच ( लाद का महिना, अधिकमास ) के मिलाने से संवत्सर के ( १३ ) त्रयोदश महिने हो जाते हैं । संवत्सर वज्र है - जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है - अतः यूप तेरह ( १३ ) अरत्नि जितना होना चाहिए-" त्रयोदशारत्निं परिवासयेत् । त्रयोदश वै मासाः संवत्सरस्य 1 । संवत्सरो
वज्रः । वज्रो यूपः । तस्मात् त्रयोदशारत्निं परिवासयेत् " ॥ २४ ॥
अथवा पन्द्रहवीं ( १५ वीं ) अरत्नि पर परिवासन करना चाहिए । जैसे त्रिवृत् स्तोम का नाम पृथिवीलोक है, तथैव पञ्चदश स्तोम का नाम अन्तरिक्ष है । जैसे पृथिवीलोक के अधिष्ठाता अग्नि हैं तथैव अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता - इन्द्र और वायु हैं । जैसा कि भगवान् यास्क कहते हैं— " अग्निः पृथिवीस्थानो वायुर्वेन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः सूर्यो स्थान: " इति । ( या ० नि ० दे ० का ० ७।५ ) [ २५८ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०६ ) शतपथ ब्राह्मण युपमान ब्राह्मण इस-इन्द्र का शस्त्र वज्र है । अतएव पञ्चदश स्तोम को हम ' वज्र ' कहने के लिए तय्यार हैं । लिए यूप पन्द्रह ( १५ ) अरत्नि का होना चाहिए—
" पञ्चदशारत्निं परिवासयेत् । पञ्चदशो वै वज्रः । वज्रो यूपः ।
तस्मात् पञ्चदशारत्निं परिवासयेत् " ॥२५ ॥
चूँकि वाजपेय यज्ञ में सप्तदश ( १७ ) अरत्नि का यूप होता है, अतः इस अग्निष्टोम यज्ञ में सत्तरह ( १७ ) अरत्नि का यूप नहीं बनाया जा सकता ---" सप्तदशा रत्निर्वाजपेय यूप: ( अतोऽत्र स न गृह्यते इति भावः:) " 1 भी ' इस प्रकार यूप कितना बड़ा होना चाहिए ' - इसमें अनेक पक्ष बतला कर अन्त हमारे में खयाल पन्द्रह से से तो अधिक परिमित यूप बनाया जा सकता है, यह बतलाते हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि को मार कर परि-यूप अपरिमित होना चाहिए, क्यों कि देवताओं ने असंख्य वज्रों से असंख्य असुरों प्राप्ति के लिए, अपरिमित मित विजय - लाभ किया था । अतएव इस यजमान को भी अपरिमित विजय अपरिमिता विजयश्री प्राप्त ही यूप बनाने चाहिए । ऐसा करता हुआ यजमान इस अपरिमित वज्र से करता है-" अपरिमित एव स्यात् । श्रपरिमितेन वाऽएतेन वज्ञेण देवा अपरिमित-मजस्तथो s एवैष एतेन वत्रेणापरिमितेनैवापरिमितं जयति । तस्मादपरिमित S एव स्यात् " ॥२६ ॥
गायत्री अष्टाक्षरा है वह यूप अठपहलू होना चाहिए । उसके पाठ पट्टे बनाने चाहिए । चूंकि है । अतः प्रष्टारत्नि एवं प्रातः सवन सम्बन्धेन गायत्री यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । यह यूप भी यज्ञ का पूर्वार्द्ध परिमाण का ही यूप होना चाहिए-" सवाष्टाश्रिर्भवति । अष्टाक्षरा वै गायत्री । पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्य
गायत्री । पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य । तस्मादष्टाश्रिर्भवति ” ॥२७ ॥
॥ इति युपमान ब्राह्मणं समाप्तम् ॥
॥ इति षष्ठाध्याये चतुर्थं ब्राह्मरणम् समाप्तम् ॥
॥ इति तृतीयकाण्डे षष्ठोऽध्यायश्च समाप्तः ॥
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सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' यूपनिधान ब्राह्मणम् ' [ मूल ] अभ्रिमादत्ते । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसीति समान एतस्य यजुषो बन्धुर्योषो वाडएषा यदनिस्त-स्मादाह नार्यसीति ॥१ ॥
अथावढं परिलिखति । इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामीति वज्रो वाऽ-निर्वणैवैतनाष्ट्राणां रक्षसां ग्रीवा अधिकृन्तति || २ || अथ खनति । प्राञ्चमुत्करमुत्किरत्युपरेरण सम्मायावटं खनति तदग्रेरण प्राञ्चं यूपं निदधात्येतावन्मात्रारिण नहींष्युपरिष्टादधिनिदधाति तदेवोपरिष्टाद्यू-पशकलमधिनिदधाति पुरस्तात्पार्श्वतश्चषालमुपनिदधात्यथ यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति सोऽसावेव बन्धुः ॥ ३ ॥
स यवानावपति । यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीरिति नात्र तिरो-हितमिवास्त्यथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षरणस्य बन्धुर्मेध्यमेवैतत्करोति ॥ ४ ॥
स प्रोक्षति । दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वेति वज्ञो वै यूप एषां लोकानामभिगुप्त्या एषां त्वा लोकानामभिगुप्त्यै प्रोक्षामीत्येवैतदाह ॥ ५ ॥
अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्यन्ते । ता अवटेऽवनयति शुन्धन्तां लोकाः पितृषदना इति पितृदेवत्यो वै कूपः खातस्तमेवैतन्मेध्यं करोति ॥ ६ ॥
अथ बहींषि । प्राचीनाग्राणि चोदीचीनाग्राणि चावस्तृणाति पितृषदन-मसीति पितृदेवत्यं वाऽश्रस्यैतद्भवति यन्निखातं स यथानिखात प्रोषधिषु मितः स्यादेवमेतास्वोषधिषु मितो भवति ॥ ७ ॥
अथ यूकलं प्रास्यति । तेजो ह वाडएतद्वनस्पतीनां यद्बाह्या शकल-स्तस्माद्यदा बाह्याशकलमपतक्ष्णुवन्त्यथ शुष्यन्ति तेजो ह्येषा मेतत्तद्यद्यपशकलं [ २६१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण धूपनिधान ब्राह्मणं प्रास्यति सतेजसं मिनवानीति तद्यदेष एव भवति नान्य एष हि यजुष्कृतो मेध्य-स्तस्माद्युपशकलं प्रास्यति || ८ || स प्रास्यति । अग्रेणीरसि स्वावेश उन्नतृ णामिति पुरस्ताद्वाऽअस्मादेषो-पच्छिद्यते तस्मादाहाग्रेगोरसि स्वावेशऽउनेतृ रणामित्येतस्य वित्तादधि त्वा स्था-स्तीत्यधि ह्येनं तिष्ठति तस्मादाहैतस्य वित्तादधि त्वा स्थास्यतीति ॥९ ॥
अथ स्रुवेोपहत्याज्यम् । श्रवटमभिजुहोति नेदधस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्युपो-तिष्ठानिति वज्रो वाऽश्राज्यं तद्वत्रेणैवैतन्नाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते तथाधस्तान्नाष्ट्रा रक्षांसि नोपोत्तिष्ठन्त्यथ पुरस्तात्परीत्योदङ्ङासीनो यूपमनक्ति स आह यूपाया-ज्यमानायानुब्रूहीति ॥१० ॥
सोनक्ति । देवस्त्वा सविता मध्वानवित्वति सविता वै देवानां प्रसविता यजमानो वा ses निदानेन यधूपः सर्वं वाऽइदं मधु यदिदं किञ्च तदेनमनेन सर्वेण संस्पर्शयति तदस्मै सविता प्रसविता प्रसौति तस्मादाह देवस्त्वा सविता मध्वा-नक्विति ॥११ ॥
अथ चषालसुभयतः प्रत्यज्य प्रतिमुञ्चति । सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्य इति पिप्पलं हैवास्यैतत्तद्यन्मध्ये संगृहीतमिव भवति तिर्यग्वाऽइदं वृक्षे पिप्पलमा-हतं स यदेवेदं सम्बन्धनं चान्तरोपेनितमिव तदेवैतत्करोति तस्मान्मध्ये संगृहीत-मिव भवति ॥१२ ॥
श्रान्तमग्निष्ठामनक्ति । यजमानो वाऽग्निष्ठा रस श्राज्यं रसेनैवैतद्य-जमानमनक्ति तस्मादान्तमग्निष्ठामनक्तयथ परिव्ययणं प्रति समन्तं परिमृशत्यथा-होयमाणायानुब्रूहीति ॥१३ ॥
स उच्छ्रयति । द्यामप्रेरणास्पृक्ष प्रान्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेखा-हीरिति वज्रो वै यूप एषां लोकानामभिजित्यै तेन वत्रेणेमांलोकान्त्स्पृणुत-एभ्यो लोकेभ्यः सपत्नान्निर्भजति ॥ १४ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणं अथ मिनोति । या ते धामान्युश्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरि शृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमव भारि भूरीत्येतया त्रिष्टुभा मिनोति वस्त्रिष्टुब्वज्जो यूपस्तस्मात्त्रिष्टुभा मिनोति ॥ १५ ॥
सम्प्रत्यग्निमग्निष्ठां मिनोति । यजमानो वाऽअग्निष्ठाग्निरु वै यज्ञः स यदग्नेरग्निष्ठां ह्वयेद् ह्वलेद्ध यज्ञाद्यजमानस्तस्मात्सम्प्रत्यग्निमग्निष्ठां मिनोत्यथ पर्य हत्यथ पर्युषत्यथाप उपनिनयति ॥ १६ ॥
अथैवमभिपद्य वाचयति । विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखेति वज्रं वाऽएष प्राहार्षीद्यो यूपसुदशिश्रियद्विष्णोविजिति पश्यत्येवैतदाह यदाह विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे | इन्द्रस्य युज्यः सखेतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता वैष्णवो यूपस्तं सेन्द्रं करोति तस्मादाहेन्द्रस्य युज्यः सखेति ॥ १७ ॥।
अथ चषालमुदीक्षते । तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततमिति वज्रं वाऽएष प्राहार्षीद्यो यूपमुदशिश्रियत्तां विष्णोविजिति पश्यत्येवैतदाह यदाह तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षु-राततमिति || १८ || अथ परिव्ययति । अनग्नतायै न्वेव परिव्ययति तस्मादत्रेव परिव्ययत्यत्रेव हीदं वासो भवत्याद्यमेवास्मिन्नेतद्दधात्यत्रेव हीदमन्नं प्रतितिष्ठति तस्मादत्रेव परिव्ययति ॥१ ९ ॥ त्रिवृता परिव्ययति । त्रिवृद्धयनं पशवो ह्यन्नं पिता माता यज्जायते तत्तृतीयं तस्मात्त्रिवृता परिव्ययति ॥ २० ॥
सपरिव्ययति । परिवोरसि परि त्वा देवीविशो व्ययन्तां परमं यजमानं रायो मनुष्याणामिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते यदाह परीमं यजमानं रायो मनुष्याणामिति ॥ २१ ॥
श्रथ यूप कलमवगूहति । दिवः सूनुरसीति प्रजा हैवास्यैषा तस्माद्यदि यूपैकादशिनी स्यात्स्वं - स्वमेवावगूहेदविपर्यासं तस्य हैषा मुग्धानुव्रता प्रजा [ २६३
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणं जायतेऽथ यो विपर्यासवगूहति न स्वं स्वं तस्य हैषा मुग्धाननुव्रता प्रजा जायते तस्मादु स्वं - स्वमेवावगृहेदविपर्यासम् ॥ २२ ॥
स्वर्गस्यो हैष लोकस्य समारोहरणः क्रियते । यधूपशकल इयं रशना रश-नाये यूपको यूपशकलाच्चषालं चषालात्स्वर्ग लोकं समश्नुते || २३ ॥ अथ यस्मात्स्वरुर्नाम । एतस्माद्वा एषोऽपच्छिद्यते तस्यैत्तत्स्वमेवारुर्भवति तस्मात्स्वरुर्नाम ॥ २४ ॥
तस्य यन्निखातम् । तेन पितृलोकं जयत्यथ यदूर्ध्वं निखातादा रशनायै तेन मनुष्यलोकं जयत्यथ यदूर्ध्व रशनाया प्राचषालात्तेन देवलोकं जयत्यथ यदूर्ध्वं चषालाद्व्यङ्गुलं वा त्र्यङ्गुलं वा साध्या इति देवास्तेन तेषां लोकं जयति सलोको ह वै साध्यैर्देवैर्भवति य एवमेतद्वेद ॥ २५ ॥
तं वै पूर्वार्द्ध मिनोति । बज्ञो वै यूपो वज्जो दण्डः पूर्वार्द्ध वै दण्डस्याभि-पद्य प्रहरति पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य तस्मात्पूर्वार्द्ध मिनोति ॥ २६ ॥
यज्ञेन वै देवाः । इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिस्ते होचुः कथं न इदं मनुष्यैरनभ्यारोह्यं स्यादिति ते यज्ञस्य रसं धीत्वा यथा मधु मधुकृतो निर्धयेयु-विदु यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन्नथ यदेनेनायोपयंस्तस्माद्यूपो नाम पुर-स्ताद्वै प्रज्ञा पुरस्तान्मनोजवस्तस्मात्पूर्वाद्धे मिनोति ॥ २७ ॥
स वाऽष्टाश्रिर्भवति । श्रष्टाक्षरा वै गायत्री पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्य गायत्री पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य तस्मादष्टाश्रिर्भवति ॥ २८ ॥
तं हस्तं देवा अनुप्रहरन्ति । यथेदमप्येत केऽनु प्रहरन्तीति देवा कुर्वन्निति ततो रक्षांसि यज्ञमनूदपिबन्त ॥ २ ९ ॥ ते देवा श्रध्वर्युमब्रुवन् । यूपशकलमेव जुहुधि, तदहैष स्वगाकृतो भविष्यति तथो रक्षांसि यज्ञं नानूत्पास्यन्तेऽयं वे वज्ञउद्यत इति ॥ ३० ॥
सोऽध्वर्युः । यूपशकलमेवाजुहोत्तद हैष स्वगाकृत प्रासीत्तथो रक्षांसि यज्ञं नानूदपिबन्तायं वै वस्त्र उद्यत इति ॥ ३१ ॥
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