Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 281–290
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण तो ऐवैष एतत् । यूपशकलमेव जुहोति तदहैष स्वगाकृतो भवति तथो रक्षांसि यज्ञं नानूत्पिबन्तेऽयं वै बज्न उद्यत इति स जुहोति दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवीं भस्मनापूर्ण स्वाहेति ॥ ३२ ॥
[ अनुवाद ] यूप का निर्माण हो चुका है । अब उसे गाड़ने के लिए गर्त खोदता है, जिसमें कि यूप गाड़ा जाएगा । खड्डा खोदने के लिए अध्वर्यु अनि ( कुदाल ) को हाथ में लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है -' देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि ' इति । अर्थात् हे अभ्रि! सविता देवता की प्रेरणा से अश्विनी नक्षत्रों के बाहुनों तथा पूषा देवता के हाथों से मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ । सविता प्रेरणा देने वाला है - ' सविता वै देवानां प्रसविता ' | अश्विनीकुमार चक्षु के अधिष्ठाता देवता हैं । गर्त को खोदते समय नेत्रों की समीचीन दृष्टि की भी आवश्यकता है । बलरूप पुष्टि का प्रदाता पूषा देवता है । अतः गर्त खोदने में सविता, अश्विनीकुमार व पूषा तीनों की आवश्यकता होने से मन्त्र में ' देवस्य सवितुः प्रसवे, अश्विनो-बहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ' यह कहा है । रोदसी, क्रन्दसी, संयती भेद से त्रिविध त्रिलोकी रोदसी त्रिलोकी का वायु मरुत है । वज्र आग्नेय व ऐन्द्र है । ऐन्द्र मारुत को ही नर कहते हैं । मरुतरूप नर की पत्नी है अतः इस अभ्रि को नारी कहा गया है ॥१ ॥
इसके बाद अध्वर्युग्रवट ( गर्त ) के लिए अत्रि से जितना लम्बा चौड़ा गर्त खोदना है, उतनी दूर निशान बनाता है तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है - ' इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि ' इति । अर्थात् यह अनि वज्रस्वरूप है । इस अभिरूप वज्र के द्वारा वह विनाशक असुरों एवं राक्षसों का गला काटता है ॥ २ ॥
तदनन्तर जितनी दूर तक अत्रि से निशान बनाया है उतनी दूर की मिट्टी निकालता है । इस मिट्टी को अन्यत्र नहीं फेंक कर गर्त में यूप को गाड़ कर उसी गर्त में इस मिट्टी को भरता है । अतः इसे गर्त के ही पूर्वभाग में रख देता है । यूप में तीन प्रधान स्थान होते हैं-मूल, मध्य एवं उपर । यूप का जितना भाग जमीन में गाड़ा जाता है, वही मूल भाग उपर कहलाता है । श्रध्वर्यु यूप के उपरभाग को नाप कर उतने ही प्रमाण का गर्त खोदता है । पश्चात् यूप के अग्रभाग को पूर्व की ओर कर के यूप को उसमें रख देता है । मुष्टि परिमित कुशाओं को उस यूप पर रख देता है । तब उस यूप के उन शकलों ( छिलकों ) को रख देता है जो यूप का निर्माण करते समय पहले निकले हैं । यूपशकल के सामने या पार्श्वभाग में चषाल ( यूप में लगी लकड़ी की फिरकी ) को रख देता है । तदनन्तर यवयुक्त प्रोक्षणी जल इन सब का प्रोक्षरण करता है । इस विधि से प्रोक्षण करने का कारण सदोब्राह्मण में बतला दिया गया है || ३ || [ २६५ ]
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण वह अध्वर्यु - ' यवोऽसि यवयास्मद् द्वेषो यवयाराती: ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रोक्षणीपात्र में यवप्रक्षेप कर देता है । मन्त्र का अर्थ है कि - हे यव! श्राप मिश्रण करने वाले ( मिलाने वाले ) हैं | आप हमारे विद्वेषी शत्रुओं को हम से अलग कर दीजिए । इसके बाद यवयुक्त प्रोक्षणी जल से प्रोक्षण कर देता है, ताकि वह स्थान पवित्र तथा सङ्गम योग्य हो जाए || ४ || वह प्रध्वर्यु - ' दिवे त्वाऽन्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ यूप, बर्हि, यूपकल आदि का प्रोक्षण करता है । यह यूप वज्रस्वरूप है । प्रकृति में सूर्य असुरों के लिए वज्र है । वह असुरों से तीनों लोकों की रक्षा करता है । प्रकृति की प्रतिकृति पर यह यूप भी प्राकृतिक खूप सूर्य की तरह वज्र है । तीनों लोकों की रक्षा के लिए ही इस यूप की स्थापना की गई है । हे यूप वज्र! मैं इन तीनों लोकों की रक्षा के लिए आप का प्रोक्षण करता हूँ ॥५ ॥
प्रोक्षण के अनन्तर जो जल बच जाता है उसे ' शुन्धन्तां लोका: पितृषदना: ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ गर्त में डाल देता है । जितने भी कूप तथा गर्त हैं- पितृदेवत्य हैं । छायामय गायत्री प्रारण ही पितृप्रारण है । पितृप्रारण छायामय प्रकाश में ही रहते हैं । गर्त में यवमय प्रोक्षणी जल डालता हुआ गर्त के अन्दर रहने वाले छायामय प्राणों को ही पवित्र बनाता है || ६ || इसके बाद ' पितृषदनमसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ, जिनका प्रभाग पूर्व की ओर तथा उत्तर की ओर हो, ऐसी कुशानों का गर्त के धरातल में प्रास्तरण कर देता है । इस यूप का निखात अर्थात् भूमि में गड़ा हुआ जो उपरभाग है वह पितृदेवत्य है । जिस प्रकार वन में गड़ा हुआ यूप वृक्ष जंगली घास तृण आदि से गुम्फित हो कर ही दृढ़ रहता है उसी प्रकार कुशा डाल देने से यह यूप भी ओषधियों से गुम्फित हो कर दृढ़ हो जाता है || ७ || कुशास्तरण के पश्चात् अध्वर्यु यूपशकल ( वृक्ष के वल्कल ) को गर्त में डालता है । वृक्षों की जो बाहरी वल्कल ( छाल ) है वह इन प्रोषधियों का तेज है, सारभाग है । इसलिए जब वृक्ष के वल्कल को काट देते हैं, छील देते हैं तो वे श्रोषधियाँ ( वनस्पतियाँ ) सूख जाती हैं । वल्कल को यूप के गर्त में जो डालना है वह तेजोयुक्त यूप को ही गर्त में गाड़ना है । यदि यूपशकल को खड्डे में न डाला जाएगा तो यूप तेजरहित हो जाएगा । ' यद्यूपशकलं प्रास्यति सतेजसं मिनवानीति ' । यूप को काटते समय पहले वल्कल को ही गर्त में डाला जाता है, बाद Sharari को नहीं, क्यों कि यूप को काटते समय पहला वल्कल ' स्वधिते मैनं हिंसी: ' इस यजुर्मन्त्र का उच्चारण करके काटा जाने से समन्त्रक है, इसीलिए मेध्य है, पवित्र है || ८ || वह अध्वर्यु - ' अग्रेणीरसि स्वावेश उनेतृ णाम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ इस यूपशकल को गर्त में डाल देता है । मन्त्र का अर्थ है कि यह यपशकल यप से सर्वप्रथम काटे [ २६६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणे अग्रेणी कहा जाता है । हे यूपशकल! आप यूप को ले जाने वाले अध्वर्यु आदि जो ऋत्विक् हैं, उनके द्वारा सम्यक् प्रकार से गर्त में प्रविष्ट किये जाते हैं । पश्चात् - ' एतस्य वित्ताधित्वा स्थास्यति ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् हे यूपशकल! यह यूप आप पर प्रतिष्ठित रहेगा । अतः इस यूप की अवस्थिति के दायित्व को आप ही संभालें ॥६ ॥
इसके बाद व से घृत ले कर उस घृत की आहुति तूष्णीं ( मौन रह कर ) गर्त में दे देता हैं । क्योंकि अभी जो गर्त खोदा गया है उससे भूमि में दबा हुआ वैकारिक वायु जो कि जहरीली गैस है, बाहर निकलता है । वह रुक्ष होने से विनाशक आसुर भाव है । उसका शमन करने के लिए गर्त में प्राज्याहुति दी जाती है । वज्ररूप प्रज्य की आहुति से उस आसुर भाव को नष्ट किया जाता है । इसके बाद गर्त के पूर्व भाग से परिक्रमा कर उत्तरा-भिमुख बैठ कर ध्वर्यु यूप को घृताक्त कर देता है । उस समय वह होता से - ' यूपायाज्यमा -नायानुब्रूहि ' यह प्रैष करता है । अर्थात् हे होता! आज्यमान यूप के लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलो ॥१० ॥
वह अध्वर्यु - ' देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु ' अर्थात् सविता देवता तुम्हारा मधु से प्रञ्जन करें - इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ यूप को घृत से चारों ओर क्त कर देता है अर्थात् चुपड़ देता है । २१ वें अहर्गण पर जो यूप है वह निदानेन यजमान है । ज्योतिष्टोम याग द्वारा शरीर प्रज्ञानात्मा से बद्ध यजमान का दिव्यात्मा २१ वें ग्रहण पर स्थित सूर्य तक वितत रहता है । पृथिवी का घन प्राण दधि, अन्तरिक्ष का तरल प्रारण घृत तथा द्युलोक का विरल प्राण मधु कहलाता है । दधि, घृत, मधु प्राणों में मधुप्रारण द्युलोक की वस्तु है । द्युलोक अर्थात् सूर्य से पृथिव्यादि तीनों लोक उत्पन्न होते हैं, अतः मधु द्युलोक की वस्तु होते हुए भी तीनों लोकों में व्याप्त रहता है- ' सर्वं वा इदं मधु यदिदं किञ्च ' । इस मन्त्र से यूप स्वरूप यजमान का तीनों लोकों से सम्बन्ध कराया जाता है । यह सम्बन्ध प्रेरणा प्रदायक सविता देवता के द्वारा होता है, अत: ' सविता देवस्त्वा मध्वानक्तु ' कहा गया है ॥। ११ ॥ तदनन्तर चाल के दोनों ओर घृत लगा कर रस्सी से बाँध देता है । यूप के उपरि भाग में बाँधा जाने वाला, अष्टकोण वाला, मध्य में संकुचित वलय के आकार का जो स्थान होता है उसे चषाल कहते हैं । चषाल के दोनों श्रोर घृत लगाता हुआ अध्वर्यु निम्न-लिखित मन्त्र बोलता - सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः ' इति । अर्थात् हे चषाल! सुन्दर फल वाली ओषधियों के लिए तुम्हें बाँधता हूँ । चषाल यूप का फल ही है । यह चषाल मध्य में दबा हुआ सङ्कुचित सा होता है । वृक्ष व फल के बीच में दोनों के सम्बन्ध का साधन, वृन्त होता है । वह संकुचित पतला सा होता है । यूप का मूल भाग मोटा होता है, अन्त में फल की तरह की प्रकृति का चषाल होता है । तथा यूप और चषाल के बीच का स्थान वृन्त संकुचित सा होता है ॥१२ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्रह्म यूप के मूल भाग तथा अन्त के चषाल भाग को प्रञ्जन करने के बाद यध्य के अग्निष्ठा भाग का अञ्जन करता है । यद्यपि यूप प्रष्टाश्रि ( अष्टकोण ) होता है तथापि यूप के मध्य का एक प्रादेशमात्र या इस से कुछ अधिक भाग चतुष्कोण बनाया जाता है । इस चतुष्कोण जो पश्चिम का भाग है वह उत्तराग्नि अभिमुख ( सीध में ) रहता है । इसी के ऊपर के प्रदेश में अग्नि का पूजन किया जाता है, जिसे प्रनिष्ठा कहा जाता है । अग्नि के अभिमुख यूप कोण का उपरिभाग पर्यन्त घृत से अञ्जन किया जाता है- ' प्रान्तमग्निष्ठामनक्ति ' इति । निष्ठा का घृत से अञ्जन करने का अभिप्राय बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यूप निदानेन यजमान स्वरूप है और अग्निष्ठा यूप का भाग होने से यूप है, अतः यजमान अग्निष्ठा है । अपि च सर्व शरीर की सत्ता प्रात्मस्था हृदय रूप केन्द्र पर ही आधारित है । यूप यजमान है । यूप का हृदय अग्निष्ठा है । इसी पर यूप का अन्य भाग स्थित है । अतएव यूप हृदयापेक्षया यूप के इस अग्निष्ठा भाग को ही यजमान कहा है- ' यजमानो वा श्रग्निष्ठा: ’ इति । निष्ठा का रस- स्वरूप घृत से प्रञ्जन करना निदानेन यजमान को रसयुक्त बनाना है । घृत से प्रञ्जन करने के बाद ' परिव्ययण ' स्थान को चौतरफ से घृताक्त करता है । यूप के नीचे एक रस्सी को ऊपर चषाल की सन्धि में बाँधा जाता है । रशना ( रस्सी ) बाँधने के स्थान को परिव्ययरग कहते हैं । इसीलिए सायण ने कहा है- ' परिव्ययणो रशना वेष्टन प्रदेशः ' इति । यूप के सब प्रदेशों का घृत से प्रञ्जन करने के बाद यूप को उठाये जाते हुए इस यूप के समय अध्वर्यु होता से प्रैष करता है - ' उच्छीयमाणाय अनुब्रूहि ' इति । अर्थात् उठाये जाते हुए इस यूप के अनुवाक्या करो ॥ १३ ॥
इसके बाद अन्य ऋत्विजों की सहायता से अध्वर्यु उस यूप को भूमि से ऊँचा उठाता हुआ निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-' द्यामप्रेरणास्पृक्षान्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेरगाढं ही ' इति । अर्थात् हे यूप! आपने अग्रभाग से द्युलोक का स्पर्श कर मध्य भाग से अन्तरिक्ष को व्याप्त कर लिया है एवं उपर भाग से भूलोक को दृढ़ बना दिया है । इस उपरभाग से आप पृथिवी में प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार यूप तीनों लोकों में व्याप्त हो रहा है । यह यूप वज्रस्वरूप है । तीनों लोकों को जीतने के लिए यूपरूप वज्र को उठाया जाता है । इस यूपरूप वज्र से यजमान तीनों लोकों पर अधिकार कर शत्रुनों को उनसे बाहर कर देता है ॥ १४ ॥
यूप को उठाने के बाद प्रध्वर्यु उसे गर्त में रखता हुआ, निम्नलिखित मन्त्र का उच्चा-रण करता है-' या ते धामान्युश्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा प्रयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमव भारि भूरि ॥ अर्थात् हे विष्णो! आप के जिन स्थानों को प्राप्त करने की हम कामना कर रहे हैं, जिनमें प्रभूत ऊर्ध्वप्रदेश वाली रश्मियाँ अथवा बड़े - बड़े सींगों वाली गायें रहती हैं । उन स्थानों [ २६८ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण में अर्थात् गो लोक में विशाल कीर्ति वाले अथवा बहुतों से स्तूयमान विष्णु के उत्कृष्ट विशाल. चरण सर्वदा प्रकाशित हो रहे हैं । हम उस विष्णु की प्रार्थना उसी लोक में जाने के लिए कर रहे हैं । सूर्य से ऊपर चतुर्थ प्रापोमय परमेष्ठिलोक है । उसी परमेष्ठी में गोतत्त्व उत्पन्न होता है अतः उसी गोलोक में गोलोकनाथ विष्णु विहार करते हैं । इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु उस यूप को अवट ( गर्त ) में स्थापित कर देता है । इस त्रिष्टुप् छन्दवाली ऋचा से यूप को गाड़ता है । त्रिष्टुप् वज्र है । ' वज्रो वै त्रिष्टुप् ' ( शत ० ७।४।२।२४ ) यूप भी वज्र है । इसलिए वज्ररूप त्रिष्टुप् छन्द ' वज्ररूप यूप को गर्त में गाड़ता है ॥१५ ॥
यूप के मध्य में वर्तमान अग्निष्ठास्थान सर्वथा उत्तरावेदिस्थ अग्नि के प्रभिमुख रहता है । जरा सा भी उसे टेढा ( इधर - उधर ) नहीं रखना चाहिए । यजमान ही अग्निष्ठा है । उत्तरावेदस्थ अग्नि ही यज्ञ है । यदि अध्वर्यु यजमानस्वरूप अग्निष्ठा को अग्निरूप यज्ञ ' जरा भी विचलित कर देगा, तो वह यजमान को अग्नि स्वरूप यज्ञ से विमुख कर देगा । तदनन्तर उस यूप को ठोक कर मिट्टी के साथ उसका एकीभाव कर देता है । इसके बाद मिट्टी को जमाने के लिए उस पर थोड़ा जल छिड़क देता है ॥ १६ ॥
अध्वर्यु उस यूप का स्पर्श करता है और यजमान से निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कराता है - ' विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ' इति अर्थात् ऋत्विज! इस विष्णु के उन कर्मों को देखिए, जिनसे उसने तीन विक्रमों से त्रैलोक्य सम्पत्ति को अपने अधिकार में कर लिया है । यह विष्णु इन्द्र का युज्य ( योग्य ) मित्र है । विष्णु व इन्द्र हृदय ( केन्द्र ) में रहने वाले हैं । विष्णुप्राण शनायाशक्ति द्वारा बाह्य से पदार्थों को लाकर हृदय में रखा करता है और इन्द्रप्रारण विक्षेपणशक्ति द्वारा केन्द्र से चीजों को बाहर फेंका करता है । इस प्रकार इन्द्र और विष्णु में स्पर्धा रहते हुए भी क्योंकि ये दोनों प्राण सहयोगी हैं, अतः विष्णु को इन्द्र का सहयोगी मित्र बतलाया गया है । यूप वज्ररूप है । अध्वर्यु ने जो यूप को उठाया है, वह असुर - रूपी शत्रुओं पर वज्र का ही प्रहार किया है । इस से वह त्रैलोक्य पर विजय प्राप्त कर लेता है । क्यों कि यूप की त्रैलोक्य तक व्याप्ति है, जैसा कि पूर्व में ' द्यामग्रेरणास्पृक्षः ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा बतला दिया गया है, इसलिए वैष्णव यूप द्वारा तीनों लोकों की व्याप्ति विष्णु की तीनों लोकों पर विजय ही है - ' विष्णोः कर्माणि पश्यत ' । इन्द्र यज्ञ का देवता है । क्यों कि इन्द्र ( सूर्य ) २१ वें ग्रहण पर रहता है जैसा कि - ' असौ वा आदित्य एकविंश: ' ( तै ० १।५।१०।६ ) यह श्रुति बतला रही है । और यूप यज्ञ - सम्बन्धेन वैष्णव है । इस वैष्णव यूप को यज्ञदेवता इन्द्र से युक्त करता है । इसीलिए मन्त्र में ' इन्द्रस्य युज्यः सखा ' ऐसा कहा है ॥ १७ ॥
तदनन्तर यजमान किंवा अध्वर्यु यूप के अन्तिम भाग में ऊपर चषाल की ओर देखता है और इस मन्त्र का उच्चारण करता है - ' तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततम् ' इति । अर्थात् विष्णु के परम पद विष्णु - स्थान को महर्षि लोग आकाश में बड़े [ २६६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण ध्यान से देखा करते हैं । क्रान्ति वृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र कदम्ब कहलाता है । यही विष्णु - स्थान है । ध्रुव से २४ अंश पर विष्णु - स्थान कदम्ब है । यह कदम्ब ध्रुव से २४ अंश उत्तर की ओर है । यहाँ कोई नक्षत्र नहीं है, खाली स्थान है । ध्रुव २४ अंश का व्यासार्ध बना कर इस कदम्ब - रूप विष्णु की परिक्रमा करता है । ध्रुव विष्णु का पद है तथा विष्णु जिस स्थान पर रहता है वह कदम्ब, विष्णु का परमपद कहलाता है । यह यूप वज्ररूप है, यूप को उठाना वज्र को उठाना है । यही विष्णु की विजिति है । इसी अभिप्राय से ' तद्विष्णोः परमं पदम् ' इत्यादि मन्त्र कह रहा है ॥ १८ ॥
इसके बाद अग्निष्ठा स्थान से नीचे परिव्ययण ( रशना ) बाँधी जाती है, क्यों कि यूप यज्ञ है और पूर्वोक्त रीति से यज्ञ पुरुषस्वरूप है । लोक में देखा गया है कि पुरुष नग्न नहीं रहता । यूप है, उसे नग्न नहीं रखना है । यज्ञ पुरुष की अनग्नता के लिए ही निष्ठा स्थान से नीचे परिव्ययरणरूप रशना यूप में बाँधी जाती है । पुरुष अनग्नता के लिए नाभि प्रदेश तक प्रधोवस्त्र पहनते हैं । अतः यूप के केन्द्र स्थान में ही रशना बाँधी जाती है । अपि च रशना लपेटते हुए यज्ञ - पुरुष में अन्नादि को ही स्थापित करता है । चूँकि भुक्त अन्न नाभि - में ही रहता है, अतः यज्ञपुरुष के नाभिप्रदेश ( केन्द्र ) में ही रशना बाँधी जाती है ॥ १६ ॥
यूप में जो रशना बाँधी जाती है, तीनलड़ा करके बाँधी जाती है । क्यों कि रशना न है और न माता - पिता तथा उनसे उत्पन्न होने वाले पुत्र के भेद से त्रिवृत् है । तात्पर्य यह है कि संसार में उत्पद्यमान पदार्थ योषावृषात्मक हैं । इन्हीं योषा व वृषा के मेल से सकल पदार्थ उत्पन्न होते हैं । श्रतः योषा ( स्त्री ) वृषा ( पुरुष ) तथा इनके योग ' उत्पन्न होने वाला पदार्थ - ये तीन ही वस्तुएँ संसार में हैं । ये ही तीनों सौरप्राण देवताओं के लिए भोग्य हैं, अन्न हैं । ये तीनों मिल कर त्रिवृत् हैं । अतः अन्न को त्रिवृत् कहा गया है । अन्न का त्रिवृत् रूप अनेक प्रकार से हिन्दी विज्ञान - भाष्य में है । अतः उसका अवलोकन वहीं करना चाहिए || २० ॥ वह अध्वर्यु रशना को तीन बार लपेटता है और निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता है -... ' परिवीरसि परित्वा दैवीविशो व्ययन्तां परमं यजमानं रायो मनुष्याणाम् ' इति । अर्थात् हे यूप! तुम रशना से चौतरफ वेष्टित हो । देव सम्बन्धी प्रजाएँ तुम्हें वेष्टित करें । तथा मनुष्यों में इस यजमान को धन से वेष्टित करें, अर्थात् यजमान को प्रचुर धन की प्राप्ति हो । जिस प्रकार प्रकृतियज्ञ में यूप - रूप सूर्य के चौतरफ सौरप्राण देवता रहते हैं, उसी प्रकार वैध यज्ञ में यजमान के चौतरफ सम्पत्तियाँ निवास करें । उपर्युक्त मन्त्र में ' परमं यजमानं रायो मनुष्याणाम् ' से यजमान के लिए अध्वर्यु रशनावेष्टनरूप कर्म की प्राशी की याचना करता है ॥ २१ ॥
यह पहले बतला दिया गया है कि यूप का निर्माण करते समय जो यूपवृक्ष का प्रथम वल्कल है उसे सुरक्षित रख दिया जाता है । उसे बाद में अग्निष्ठा स्थान में रस्सी से बाँध [ २७० ]
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण दिया जाता है | बाँधने के समय वह श्रध्वर्यु ' दिवः सूनुरसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस स्वरु नामक यूप- शकल को रशना के मध्य में बाँध देता है । अर्थात् यूप शकल! तुम यूप के पुत्र हो । यह यूप- शकल यूप से ही उत्पन्न हुआ है और यूप स्थान है । अतः इसे द्युलोक का पुत्र कहा गया है । यह यूपशकल यूप की सन्तान है । भिन्न - भिन्न यज्ञों में यूप की संख्या भिन्न - भिन्न होती है । किसी यज्ञ में ११, किसी में १५, किसी में १७ और किसी में २१ यूप गाड़े जाते हैं । प्रग्निष्टोम में एक यूप भी होता है । तथा ११ यूप संख्या भी होती है । जहाँ अग्निष्टोम में ११ या इससे अधिक यूप हों, वहाँ प्रत्येक यूप के निर्माण में प्रथम वल्कल रूप यूप- शकल भी अनेक हो जाते हैं । वहाँ जिस क्रम से यूपों का निर्माण करते हैं व उन्हें गाड़ते हैं, उसी क्रम से उन यूप- शकलों को भी यूप में बाँधना चाहिए । अर्थात् १ नं ० के यूप के शकल को एक नं ० यूप में ही तथा २ नं ० के यूप शकल को दो नं ० यूप में ही बाँधना चाहिए । विपर्यास ( वैपरीत्य ) नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से ही यजमान की प्रजा अमुग्धा व यजमान की अनुगामिनी होती है । विपर्यास करने से यजमान की प्रजा मुग्धा व अननुगामिनी होती है ॥ २२ ॥
ज्योतिश्रग्निष्टोम यज्ञ में जो यूप खड़ा किया जाता है उस के मध्य में सर्वप्रथम यूप-शकल रहता है । इसके बाद रशना रहती है । इसके बाद चषाल रहता है । इस ज्योतिष्टोम यज्ञ से यजमान का भूतात्मा स्वर्ग में जाता है । यूपशकल, रशनादि स्वर्ग में उसके जाने के लिए सीढियाँ हैं । प्रथम सोपान यूपशकल, द्वितीय सोपान रशना, तथा तीसरा सोपान चषाल है || २३ || यूपकल को स्वरु नाम से व्यपदिष्ट करने का कारण बतलाते हैं कि यूप से कटा हुआ जो यूपश्कल है वह यूप का भाग होने से स्वकीय रूप यूप को प्राप्त होने वाला है । अतः ' स्वं स्वकीयं रूपमियति- गच्छति ' इस व्युत्पत्ति से स्वरु कहलाता है । अथवा यूप से कटा हुआ यूपशकल यूप का अरु ( प्रारण ) है । जब तक यह यूपशकल यूप को प्राप्त नहीं हो जाता तब तक यूपको शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती । अतः वह छिन्न भाग यूप को ही प्राप्त होता है || २४ || यूप का भूमि में गड़ा हुआ गर्तान्तर्वर्ती प्रदेश पितृदेवत्य है - अर्थात् तमोमय - प्रारण-असुर कहलाता है । ज्योतिर्मय प्रकाशी प्रारणदेवता है तथा छायामय प्राण जिसमें न पूर्णतया अन्धकार है और न पूर्ण रूप से प्रकाश है, वह प्राण पितर कहलाता है । कूप व गर्त आदि में जो छायामय है वह पितरप्रारण होता है । अतः यून का निखात - प्रदेश पितृदेवत्य है । निखात से ऊपर जहाँ रशना बँधी हुई है, वह मनुष्य - लोक है । रशना से ऊपर चषाल तक देवलोक है और चषाल से ऊपर का जो दो या तीन अङ्गुल का यूप का प्रदेश है वह साध्य देवताओं का लोक है । इस प्रकार चारों लोकों की कल्पना की गई है । यजमान यूप के निखात - प्रदेश से पितृलोक को, रशना तक के प्रदेश से मनुष्यलोक को, रशना से ऊपर [ २७१ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण चषाल तक के प्रदेश से देवलोक को तथा चषाल के ऊपर यूप के यंगुल या त्र्यंगुल प्रदेश से साध्य देवताओं के लोक को जीत कर उन पर अधिकार कर लेता है । जो इस चतुर्लोक -. विज्ञान को जानता है, वह साध्य देवताओं के साथ सलोकता को प्राप्त कर लेता है || २५ || गार्हपत्य से यूप ( २१ वें अहर्गण ) पर्यन्त वितत जो यज्ञ है वह पूर्वार्द्ध तथा पश्चि-मार्द्ध दो भागों में विभक्त है । अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । आहुति उत्तरावेदि में स्थित आहवनीय अग्नि में होती है । अतः ग्राहवनीय से पूर्व का भाग यज्ञ का पूर्वार्द्ध भाग है तथा श्राहवनीय से पश्चिम का भाग यज्ञ का पश्चिमार्द्ध है । यूप को यज्ञ के पूर्वार्द्ध में । अत गाड़ते इसे हैं क्योंकि यूप सूर्यस्थानापन्न होने से तमोमय श्रासुर प्राणों का विनाशक होता है वज्र कहते हैं । इसीलिए ' यूपो वै वज्रः ' यह श्रुति यूप की वज्र बतला रही है । वज्र से प्रहार जाता होता है और दण्ड से भी प्रहार होता है । अतः इस यूपरूप वज्र को दण्ड भी कह कर दिया ही किया है । शत्रु पर जब प्रहार किया जाता है तब दण्ड के पूर्वार्द्ध भाग को पकड़ पूर्वार्द्ध 1 जाता है । आहवनीय के पूर्व का भाग ही इस यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । अतः आहवनीय के भाग में ही यूप को गाड़ा जाता है ॥ २६ ॥
यज्ञ के द्वारा प्रारण देवताओं ने तथा भौमस्वर्गवासी देवताओं ने उस विजय को प्राप्त किया जो विजय आज संसार में उनकी दीख रही है । सौर प्रारण - देवताओं ने इसी किया अग्नीषो- । भौम-मात्मक यज्ञ के प्रभाव से सारी रोदसी त्रिलोकी में अपना आधिपत्य स्थापित स्वर्गवासी देवताओं ने सारी भुवन त्रिलोकी को अपने अधिकार में किया और असुरों को इस त्रिलोकी से निकाल दिया । देवताओं ने यज्ञ द्वारा सारी विभूति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर विचार किया कि ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे यज्ञविद्या मनुष्यों को न मालूम हो सकें । इसलिए जैसे मधुमक्षिकाएँ मधु - रस का पान कर जाती हैं उसी तरह देवता यज्ञ प्राण- के सारभाग को चूस कर यूप से उस यज्ञतत्त्व को छिपा कर तिरोहित हो गये । क्यों कि देवताओं ने सूर्यरूप यूप से तथा भौम देवताओं ने काष्ठयूप से इस यज्ञ का योपन किया था, छुपाया था, अतः यज्ञविद्या के योपन का साधन होने से इस का यूप नाम पड़ा । इस यज्ञ-विद्या - रहस्य को महर्षियों ने यूप द्वारा ही मालूम किया था तथा उस को ज्ञात किया तभी कार्य था - । मनुष्य को कार्य करने के लिए मन, प्रारण व वाग् का व्यापार करना पड़ता है, सिद्धि होती है । इन तीनों में मनोव्यापार का, प्रज्ञान का स्थान प्रथम है । 1 इसीलिए - तदेक्षत तपोऽतप्यत सोऽश्राम्यत् ' इस श्रुति द्वारा प्रथम ईक्षणरूप मन व्यापार तदनन्तर मानस- तपरूप प्राणव्यापार तथा उसके बाद श्रमरूप व्यापार का कथन किया गया है । इस प्रज्ञारूप टिप्पणी १ - यूप ही यज्ञविद्या का प्रज्ञापक है । इस का उल्लेख तैत्तिरीय संहिता में भी किया गया है - ' यज्ञेन वै देवाः सुवर्गं लोकमायन् । तेऽमन्यन्त मनुष्या नोऽन्वा-भविष्यन्तीति ते यूपेन योपयित्वा सुवर्गं लोकमायन् । तमृषयो यूपेनैवानु प्राजा-नन्, तद् यूपस्य यूपत्वम् ' ( तै ० सं ० ६।३।४।७ ) इति [ २७२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण धूपनिधान ब्राह्मण व्यापार के सर्वप्रथम होने से यूप की स्थापना यज्ञ के पूर्वार्द्ध में की जाती है । क्यों कि महर्षियों को यज्ञविद्या - रहस्य का ज्ञान इसी यूप के द्वारा हुआ था, अतः यूप यज्ञ - विद्या - सम्बन्धी प्रज्ञा का साधन है । और यह प्रज्ञा ही प्रारण व्यापार तथा वाग् व्यापार से पूर्वव-तिनी है | अतः यूप का यज्ञ के पूर्वार्द्ध में स्थापन किया जाता है ॥ २७ ॥
यह यू अष्टा ( अष्टकोरण व प्रष्ट धार वाला ) होता है । क्यों कि ' अष्टाक्षरा वै गायत्री ' इस ब्राह्मण श्रुति के अनुसार गायत्री अष्टाक्षरा है । सौरतेजोरूप अष्टाक्षरा गायत्री ही यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । क्यों कि सूर्य पूर्व में रहता है, यह यूप भी पूर्वाद्ध में स्थापित होने के कारण यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । यूप मनुष्य यज्ञ है तथा गायत्री प्राकृतिक यज्ञ का पूर्वार्द्ध है । गायत्री अष्टाक्षरा है | अतः तदनन्तर मनुष्ययज्ञ में यज्ञ के पूर्वार्द्ध यूप को भी अष्टकोण ही बनाना चाहिए || २८ ॥ [ विज्ञान भाष्य ] प्राकृतिक सोमयज्ञ में पृथिवी के इक्कीसवें ग्रहण यज्ञ पर की सूर्य प्रतिकृति प्रतिष्ठित से हो रहा है । इसी सूर्य्यं का नाम यूप है । मनुष्य सोमयज्ञ का वितान इसी प्रकृति - । किया जाता है, अतएव उत्तरावेदि से आगे इक्कीसवें स्थान पर सूर्य्य - स्वरूप यूप खड़ा किया जाता ग्रहण है पर यह यूप एकविंशस्थ सूय्यं स्थानापन्न है । पार्थिव अग्नि प्रर्थात् विष्णु तीन विक्रम में इक्कीसवें से इक्कीसवें पहुंच जाते हैं । अग्नि का नाम ही यज्ञ है । यज्ञ को ही विष्णु कहते हैं । प्राकृतिक यज्ञ पृथिवी इक्कीसवें अहर्गण तक वितत रहता है, अतएव यहाँ भी पृथिवी - स्थानीय गार्हपत्य से सूर्य्य स्थानीय बनाना चाहिए? स्थान पर वैष्णव यूप गाड़ा जाता है । यूप किस लकड़ी का बनाना चाहिए? कैसा ब्राह्मण " में कर किसे बनाना चाहिए? कैसे बनाना चाहिए? इत्यादि विषयों का विवेचन " यूपमान पर गाड़ कर दिया गया है । यूप तैय्यार हो गया है । अब उसे उत्तरावेदि के पूर्व में इक्कीसवें स्थान स्थिर किया जाएगा । यूप गाड़ने के लिए चूँकि अध्वर्यु खड्डा खोदेगा, अतएव वह-" देवस्य त्वासवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि । ( वा ० सं ० ६।१ ) पूषा यह मन्त्र बोलता हुआ " अभि " उठाता है । सविता देवता के प्रसव में - अश्विनी है के । सूर्य्य बाहु से से, ऊपर देवता के हाथ से, मैं तुम्हें उठाता हूँ । हे अनि! आप सारी हैं - यह मन्त्र का अर्थ लगाते हैं - ( १ ) वरण, परमेष्ठि- मण्डल है । परमेष्ठि- मण्डल के चारों ओर निम्नलिखित छः ग्रह परिक्रमा ( २ ) हंस, ( ३ ) ब्रह्मणस्पति, ( ४ ) बृहस्पति, ( ५ ) यम ( ६ ) इन्द्र । नाम तो भृगु भृगु और अङ्गिरा - ये परमेष्टि - मण्डल के मनोता हैं । पानी - यम- सोम इन की तीनों ये ही का चीजें प्रधान हैं । है, एवं अग्नि वायु प्रादित्य इन तीनों का नाम अङ्गिरा है । परमेष्टि - मण्डल मण्डल के ऊपर स्वयम्भू-आप् - वायु - सोम - तीनों ऋत हैं । अग्नि यम आदित्य तीनों सत्य हैं । परमेष्ठि- की असली वस्तु है । इसमें जो मण्डल है । उसके ऋक् - यजुः - साम ये तीन मनोता हैं । वेद ही स्वयम्भू जो वायु है वही सृष्टि का यजु है, उसमें यत् और जू अर्थात् आकाश और वायु - ये दो चीज हैं । इनमें [ २७३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण प्रथम प्रवर्तक है । अतएव इस वायु को " ऋषि " कहा जाता है । यह स्वयम्भू की वस्तु है । अतएव प्राणगणना में स्वयम्भू - प्रारण को " ऋषि " बतलाया जाता है । इस प्रकार ऋक्, साम, आकाश, वायु - ये चार चीजें स्वयम्भू में रहती हैं, एवं अपु- वायु- सोम - अग्नि - यम- प्रादित्य ये छः चीजें परमेष्ठी में रहती हैं । दोनों मिला कर कुल दस चीजें हो जाती हैं । यही दशवीं विराट् है । बस, सारे विश्व का निर्माण इसी ' विराट् - पुरुष ' से होता है । परमेष्ठी का जो प्राप् पिण्ड है, उसका नाम ' वरुण ' है । एवं जो वायु - पिण्ड है, वह ' हंस ' कहलाता है । इसी का नाम साम्बसदाशिव है । इसी को सविता कहा जाता है । हम जो भी कुछ काम करते हैं, उसमें हाथ - पैर हिलाने पड़ते । कायिक- वाचिक - मानसिक तीनों व्यापार करने पड़ते हैं । यह व्यापार स्वतः ही नहीं होता । इसका कोई प्रेरक अवश्य ही रहता है । बस, कार्य्यं के लिए प्रेरणा करने वाला यही पारमेष्ठ्य हंस- वायु है । शरीर में रुधिरादि का संचार करना - शरीर कर्म में प्रेरित करना - यह इसी हंस वायु का - सविता देवता का काम है । हमारा चलना, खाना को सोना, उठना बैठना - सब इन्हीं प्राण - देवताओं से होता है । जिसमें जिस देवता की कमी होती, है पीना , वह, उस काम को हर्गिज नहीं कर सकता । हमारे शरीर में जो एक प्रेरणा रहती है- नोदना रहती है, वह सविता नाम के हंस वायु का काम है; एवं परमेष्ठी नाम के सरस्वान् समुद्र की जो सरस्वती देवता है, वह जिसमें रहती है, उसी की वाणी में शक्ति रहती है । वक्तृत्व शक्ति प्रदान करना इसी सरस्वती का काम है । मेरी जो ' शक्ल ' है-शरीर का रूप है - यह त्वष्टा देवता का काम है, एवं मेरे शरीर में जो बल है - हाड़मांस की पुष्टि पूषा देवता का काम है । मेरे आत्मा के अधिष्ठाता इन्द्र हैं, एवं मेरे शरीर में जो ब्रह्मवर्चस है है, - वह वह बृहस्पति का काम है । द्युम्न, तेज, वर्च, प्रोज, भ्राज, भेदेन प्रताप पाँच प्रकार का होता है । द्युम्न सोम देवता से होता है, तेज अग्नि से होता है, वर्च - बृहस्पति से होता है, भ्राज सूर्य्यं से होताहै, श्रतएव ---" विभ्राड् बृहत् पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधत् ( ऋग्वेद मं ० १०।१७०।१ ) यह कहा जाता है । श्रोंज वरुण से होता है, शरीर यज्ञ विष्णु से होते हैं । कहने का तात्पर्य यही है कि मेरे शरीर के अधिष्ठाता यही प्राण - देवता हैं । सारा काम वही करते हैं । उनके ही मैं अपना करना समझता हूं । इन्हीं देवताओं के कारण मैं इधर - उधर विचरता रहता करने को हूं । अतएव श्रुति कहती है-" सवित्रा प्रसवित्रा, सरस्वत्या वाचा, त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभि-रिन्द्रेणास्मे | बृहस्पतिना ब्रह्मणा, वरुणेनौजसा, अग्निना तेजसा, सोमेन राज्ञा, विष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतः प्रसर्पामि । ( वा ० सं ० १०।३० ) हम बतला रहे थे कि पानी को वरुण, वायु को हंस, सोमपिण्ड को ब्रह्मणस्पति तथा अग्नि को बृहस्पति कहते हैं । एवं यमवायु को वरुण कहते हैं । शिव - वायु से जीवन रहता है, वरुण वायु से जकड़ जाता है । गठियावात की बीमारी इसी वरुण पाश से होती है । गठियावात की ही नहीं - शरीर सारी [ २७४ ]