Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 291–300

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 291–300

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण बीमारियाँ वायु के प्रकोप से ही होती हैं । रोगों में वातावरण ही प्रधान है । आदित्य को इन्द्र कहते हैं । इस प्रकार आप वायु- सोम- अग्नि यम श्रादित्य - ये पारमेष्ठ्य मनोता ही क्रमश: वरुण - हंस ब्रह्मणस्पति-बृहस्पति वरुण - इन्द्र इन नामों से व्यवहृत होते हैं । १ - वरुरण - आपः २ - हंस - वायुः - ( शिवः ) - सविता प्रेर को वायुः । ३ - ब्रह्मणस्पति - सोमः ४- बृहस्पतिः - अग्निः ५ -- यम: - वरुणः ( रुद्रः ) - प्रेरणाबाघकोवायुः । ६ - इन्द्रः - प्रादित्यः प्रसङ्गागत इतना और समझ लेना चाहिए - हमारी दोनों श्राँखें - प्रश्विनीकुमार नाम के नक्षत्रों से बनी हुई हैं । जब तक इन नक्षत्रों का प्राण ग्राँखों में रहता है तभी तक आँखों में प्रकाश रहता है । चक्षु के अधिष्ठाता अश्विनीकुमार हैं । अतएव — " यौ ह वाऽइमौ पुरुषाविवाक्ष्योः । एतावेवाश्विनौ " । ( शत ० १२।६।१।१२ ) यह कहा जाता है । बल इन प्रकृत में - यूप गाड़ने के लिए खड्डा खोदना है । इसमें प्रेरणा बल, शरीर बल और दृष्टि यदि दृष्टि तीन बलों की आवश्यकता है । खड्डा खोदने के लिए पहले भीतर से प्रेरणा होनी चाहिए हाथ । - पैर कट इधर - उधर है तो भी काम नहीं चल सकता । उस पर नजर भी रखनी पडती है - प्रन्यथा काम जाने का डर रहता है । प्रेरणा सविता नाम के हंस वायु का काम है । शरीर बल पूषाप्राण का । है, दृष्टि- बल अश्विनीकुमार का काम है । हाथ के बल से खड्डा खोदा जाता है- यह पूषा का काम है ग्राँखों से निकलने वाली जो रश्मि है - कर है - उन्हें बाहु कहा जाता है । एवं प्रेरणा सविता तीन करता देवताओं है । इस समय अध्वर्यु खड्डा खोदना चाहता है । खड्डा खोदने में सविता - पूषा- अश्विनी - इन का काम है । बस, इसी विज्ञान को बतलाने के लिए - ' सवितः प्रसवे ( प्रेरणायाम् ) अश्विनोर्बाहुभ्याम्- उठा रहे हैं-पूष्णोः हस्ताभ्याम् ' - यह कहा गया है । हे अभि! श्रापको मैं नहीं उठाता, अपितु ये त्रिलोकी देवता तीन प्रकार यही तात्पर्य है । पूर्व के ब्राह्मणों में बतलाया है कि रोदसी - कन्दसी - संयती भेदेन के मास्त की है । इन में जो रोदसी त्रिलोकी का वायु है- मरुत् है उसका नाम नर है । क्रन्दसी त्रिलोकी का नाम नियुत और पारावत है । इसमें जो नियुत वायु है. उसे ' द्युतान मारुत ' भी कहा जाता है । इस है, पारावत-प्रकार नर नियुत, पारावत भेदेन तीन मारुत हैं । नर मारुत ऐन्द्र है । नियत मारुत सौम्य नाम चूँकि नर मारुत वरुण है । यह अभ्रि वज्र स्वरूप है । वज्र श्राग्नेय है, ऐन्द्र है । ऐन्द्र मारुत का का है, तत्सम्बन्धेनैव अग्नि के लिए ' नारी प्रसि ' यह कहा गया है । मारुती प्रसि यही ' नारी असि ' तात्पर्य है । [ २७५

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तृतीय काण्ड ( ग्र ० ७ ) १ - नर मारुत - ऐन्द्र - ( रोदसी ) -२ - - नियुत मारुत - सौम्य शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण • + क्रन्दसी ३- पारावत वारुण इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु, खड्डा खोदने के लिए ' अभि ' उठाता है । यह मन्त्र पूर्व में कई जगह है । इसका वही अर्थ समझना चाहिए जो कि पूर्व में बतला दिया है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं ---" अभ्रिमादत्ते - " देवस्य त्वा xxx" इत्यादि " ॥१ ॥

समान एतस्य यजुषोबन्धुः । योषा उ वा एषा यदभिःतस्मादाह - नार्यसीति । योषा स्त्री को कहते हैं । यह अनि स्त्री है - मरुतु पत्नी है - मारुती है, अतएव ' नासि ' यह कहा गया है । इसके अनन्तर अध्वर्यु अवट के लिए अभ्रि से निशान बनाता है । जितना लम्बा - चौड़ा खड्डा खोदना होता है, पहले श्रभ्रि से उतनी दूर निशान कर लिया जाता है । इस परिलेखन का मन्त्र निम्न-लिखित है-" इदमहं रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि " । ( वा ० सं ० ६।१ ) यह अभियन्त्र स्वरूप है । बस इस अभियन्त्र से पार्थिव कृष्णप्राण - स्वरूप असुर और राक्षसों का गला काटता है । देवताओं के लिए असुरों ने जिस कृत्या को ला कर जमीन में गाड़ा था, आज उसी कृत्या को खोद कर यह अध्वर्यु जमीन से बाहर निकल कर श्रभि से उन असुरों का गला काट कर उनसे वह यजमान को निरापद करता है-" वज्रो वाऽ अभ्रिः । वत्रेणैवैतनाष्ट्राणां रक्षसां ग्रीवा कृन्तति ॥२ ॥

अपि-इसके बाद मिट्टी फोड़ता है । जितनी दूर में अभ्रि से निशान बना दिया है, उतनी दूर की मिट्टी निकालता है | इसी मिट्टी से इस खड्डे में यू गाड़ कर, इस खड्डे में भरते हैं, अतएव मिट्टी को अन्यत्र न डाल कर इस खड्डे के पूर्व भाग में ही इसे रख देते हैं । इस यूप में तीन प्रधान स्थान होते हैं । एक स्थान मूल में दूसरा मध्य में और तीसरा ऊपर है । इन तीनों में जितना हिस्सा जमीन में गड़ता है, उसका नाम ' उवट ' है । जो मध्य का चौकोर स्थान है उसका नाम ' निष्ठा ' है । एवं सबसे ऊपर के स्थान का नाम - चर वा है । यहाँ श्रध्वर्यु उस ' उवट ' को नाप कर उतनी ही नाप का खड्डा खोदता है । जितना हिस्सा यूप का गड़ेगा उसे एक डोरी से नाप लेना चाहिए और ठीक उतना ही खड्डा खोदना चाहिए । इतना खड्डा न खोद देना चाहिए जिससे ऊपर से भी अधिक हिस्सा जमीन में चला जाए अथवा उतना भी न जा सके । चूँकि स्थापित किए बाद फिर निकालना यज्ञ को भ्रष्ट करना है, अतएव पहले से ही नाप कर खड्डा खोदना चाहिए । खड्डा खोदने के बाद उस यूप के मुख- भाग [ २७६ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) To वह अध्वर्यु -यूपनिधान ब्राह्मणं शतपथ ब्राह्मण [ २७७ ] को पूर्व की ओर करके और जो हिस्सा गड़ेगा, उसे खड्डे से मिला कर यूप को वहीं रख देते हैं । जहाँ तक यूप है, वहाँ तक न यूप से अधिक न कम - उस ग्रुप पर कुशा डाल देते हैं । इसी यूप के अग्र भाग में - यूप के ऊपर यूप - शकल रख देते हैं । यूप को तय्यार करते समय जो पहले - पहल का छिलका निकलता है, उसी का नाम यूप शकल है । उसे वहाँ रख देते हैं । इसके बाद यवमती प्रोक्षणी के पानी से इन सबका प्रोक्षण करता है । यव ही पानी का रस है । अतएव इन सब पदार्थों को रसयुक्त बनाने के लिए यवमती प्रोक्षणी - आप होती है । पानी में जौ ( यव ) क्यों डाले जाते हैं, इसकी उपपत्ति सदोब्राह्मण में ( शत ० ३।६।१ ) देखनी चाहिए जहाँ इसकी उपपत्ति बतलाई है, वही उपपत्ति यहाँ भी समझनी चाहिए-" थ खनति । प्राञ्चमुत्करमुत्किरति उपरेण सम्याय- अवटं खनति । तदग्रेण प्राञ्चं यूपं निदधाति । एतावन्मात्राणि बहषि उपरिष्टादधिनिदधाति ।

तदेवोपरिष्टाद् यूपकलमधिनिदधाति । पुरस्तात् पार्श्वतश्चषालमुपनिदधाति ।

अथ यवमत्यः प्रोक्षण्यो भवन्ति । सोऽसावेव बन्धुः " ॥३ ॥

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यवमती होने की वही उपपत्ति है, जो कि सदोब्राह्मण में बतला दी गई है । वह अध्वर्यु -" यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीः । ( वा ० सं ० ६।१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस प्रोक्षणी पात्र में - यव डाल देता है । आप यव हैं, अर्थात्, मिलने वाले हैं । ऐसे आप जो हमारे दुश्मन और अराती हैं - उन्हें हम से अलग कर दीजिए । श्राती हुई सम्पत्ति को न आने देने वाला शत्रु ' अराति ' कहलाता है । आई हुई को नष्ट करने वाला ' द्वेषेकर्ता ' कहलाता है | श्राप हम से उभयविध शत्रुओं को अलग कीजिए - यही तात्पर्य है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पानी के प्रोक्षण की एकमात्र यही उपपत्ति है कि यह स्थान मेध्य हो जाए- पवित्र हो जाए । पवित्रता के लिए ही प्रोक्षण किया जाता है— " एको वै प्रोक्षणस्य बन्धुः ( तात्पर्य्यम् ) मेध्यमेवैतत् करोति ” ॥४ ॥

" दिवे त्वा अन्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा " । ( वा ० सं ० ६।१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस यूप का और बर्हि वगैरः का प्रोक्षण करता है । यह ग्रुप असुरों के लिए तमोमय प्राण के लिए वज्र है । प्रकृति यज्ञ में यह जो सूर्य्य है, वह असुरों के लिए वज्र है । इसके सामने अन्धकार एक क्षण भी नहीं रह सकता । इसी यूप से अर्थात् सूर्य्य से पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- यौ - तीनों

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण लोक सुरक्षित हैं, प्रसुराक्रमण से बचे हुए हैं । यदि सूर्य्य न रहे तो उसी समय त्रिलोकी में अन्धकार व्याप्त हो जाए । उसे रोकने वाला यह सूर्य्य ही है । उसी के अनुसार यह यूप बनाया जाता है । सूर्य्य-स्थानीय होने के कारण यह यूप भी अवश्य ही वज्र है । बस, इसे तीनों लोकों की रक्षा के लिए ही खड़ा किया जाता है । हे युग वज्र! यह आपका इन तीनों लोकों की रक्षा के लिए ही प्रोक्षण करता है - यही तात्पर्य है । " वो वै यूपः । एषां लोकानामभिगुप्त्यै । एषां त्वा लोकानामभिगुप्त्यै प्रोक्षामीत्येवैतदाह " ॥५ ॥

प्रोक्षण के अनन्तर जो पानी बाकी बच जाता है, उसे-" शुन्धन्तां लोका: पितृषदना: " । ( वा ० सं ० ६।१ ) यह बोलते हुए उस खड्डे में ही डाल देते हैं । जितने भी यूप और खड्डे हैं, सब पितृदैवत्य हैं । सब में पितरप्राण भरा हुआ है । छायामय गायत्रीप्राण का नाम ही पितर है । पितर सूर्य के प्रकाश में नहीं रह सकते, वे छाया में ही रहते हैं । बस, खड्डे में पानी डालता हुग्रा अध्वर्यु पितरों के स्थान को ही ' पवित्र ' करता है । अतएव उस पानी को खड्डे में डाल दिया जाता है-" पितृदेवत्यो वै कूपः खातः तमेवैतन्मेध्यं करोति " ॥६ ॥

इसके बाद उस खड्डे में प्राचीनाग्र और उत्तराग्र- कुशा का आस्तरण करता है । अर्थात् - " पितृ-बदनमसि " यह बोलता हुआ उस खड्डे के धरातल में उत्तर की ओर एवं पश्चिम - पूर्व की ओर मुख कर कुशा बिछा देता है । इस यूप का जो निखात अर्थात् जमीन में गड़ा हुआ ' उवट ' भाग है वह वटस्थ पितृ प्रारण सम्बन्धेन पितृदेवत्य है । जिस प्रकार अनिखात यूप प्रर्थात् जंगल में गड़ा हुआ यूप - वृक्ष जैसे जंगली घास - फूसों से गुंथा रहता है, अतएव मजबूत रहता है, तथैव इसमें औषधि ( कुशा ) डाल देने से यह यू भी इन प्रौषधियों में मित अतएव दृढ़ हो जाता है । प्रकृति में वृक्षों की जड़ों में अन्यान्य तृण लिपटे रहते हैं । बस, इसी की अनुकृति पर यहाँ भी इस यूत्र की जड़ में कुशा डाल देते हैं-यही तात्पर्य है-" अथ बहषि - प्राचीनाग्रारिण चोदीचीनाग्राणि चावस्तृणाति - पितृष-दनमसीति । पितृदेवत्यं वाऽश्रस्य ( यूपस्य ) एतद् भवति - यन्निखातम् । स यथा निखात ओषधिषु मितः स्यात् - एवमेतासु - ओषधिषु मितो भवति ॥७ ॥

इस प्रकार कुशास्तरण किए बाद, उस यूप शकल को, जो कि यूप के अग्र भाग में रक्खा था, इस खड्डे में डालते हैं । " अथ यूपशकलं ( अवटे ) प्रास्यति - ( अध्वर्यु ) " । [ २७८ ]

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1 = 3 तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधानं ब्राह्मणे यूप शकल को क्यों डालते हैं? इसका कारण बतलाते हैं-वृक्षों के बाहर की जो बक्कल है, वह इन श्रौषधियों का तेज है । यही इन का अंगरक्षक है, सार-भाग है । अतएव जब कभी इनके इस वल्कल को खाती लोग छील डालते हैं तो थोड़े ही दिन में वे औषधियाँ सूख जाती हैं । मनुष्य का जो चमड़ा है, वह मनुष्य के शरीर का तेज है - अर्थात् रुक्ष भाग है, आग्नेय है । भीतर का मांस ही रुक्ष वायु के सम्बन्ध से सूख कर चमड़ा बन गया है । भीतर का मांस गीला है, अतएव वह तेज नहीं कहलाता । बाहर का चमड़ा रुक्ष है, अतएव इसे तेज ' कहा जाता है । यदि इस चमड़े को हटा दिया जाय तो उसी समय शरीर का सार भाग निकल जाय । ठीक यही हाल वनस्पतियों का है । वल्कल ही उनका तेज है । यहाँ पर कि यूप शकल गाड़ा जाता है - इसका कारण यही है कि हम इस यूप को तेजयुक्त ही गाड़ें । यही इसका तेज है । यदि यूपशकल को इसमें न डाला जायगा तो यूप तेज रहित हो जायगा । अतएव इसे अवश्य डालना चाहिए । यहाँ पर एक प्रश्न और बच जाता है, वह यही है कि इस पहले यूप - शकल को ही क्यों डाला जाता है? यूप तय्यार करते समय छोड़े तो बहुत से उतरते हैं - इसका उत्तर देते हुए कहते हैं- पहला यूप शकल ही मन्त्र पूत है । जब इसको पहले - पहले काटा जाता है तो उस समय " स्वधिते! मैनं हिंसी: " यह मन्त्र बोला जाता है । बस, पहली बार जब वल्कल काटा जाता है, तभी मन्त्र बोला जाता है । बाद में और यूप शकल तूष्णीमेव काट लिए जाते हैं । जो मन्त्रपुरस्सर काटा जाता है, वह पवित्र होता है, अतः दूसरे को न डाल कर इस पहले यूप शकल को ही वृक्ष को सतेज बनाने के लिए डाला जाता है-" तेजो ह वाऽएतद्वनस्पतीनां यद् बाह्याशकलः । तस्माद् यदा बाह्या-शकलमपतक्ष्णुवन्ति - श्रथ शुष्यन्ति । तेजो ह्येषामेतत् । तद्यद्युपशकलं प्रास्यति । सतेजसं मिनवानीति । तद्यदेषएव भवति नान्यः - - ( ( तदुच्यते ) - एष हि यजुष्कृतो मेध्यः । तस्माद् यूपशकलं प्रास्यति ' ॥ ८ ॥

यूप शकल क्यों डालना चाहिए इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु-" ग्रेणीरसि स्वावेश उन्नेतृ णामेतस्य - वित्तादधि त्वा स्थास्यति । " वा ० सं ० ६।२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ, इस यूप शकल को उस गर्त्त में डाल देता है । यह यूप - शकल उस यूप से यूप वृक्ष से यही अलग हो कर आता है, अतएव ' अग्रेणी रसि ' पूर्व ही पहले - पहल काटा जाता है । पहले कहा गया है । अपि छिद्यमान जो यूप है, एवं हाथ में उठा कर ले जाने वाले आप चूंकि भली भाँति उस अवट में करते हैं । उससे यह आगे चलता है, इसलिए भी इसे प्रग्रेणी कहते हैं, जो अध्वर्यु आदि ऋत्विक् हैं, उनके आप स्वावेश हैं | उनसे प्रविष्ट किए जाते हैं, अतएव हम स्वावेश कह कर आपकी स्तुति [ २७६ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शकलः ' " शतपथ ब्राह्मणे यूपनिधान ब्राह्मणे " ऊर्ध्व नेतृ णामध्वर्यूरणां यूपावटे सुखेन तैराविश्यत इति स्वावेश: - यूप-ऐसे आप इस यज्ञकर्म्म को जानने वाले बनें । हे यूप- शकल! प्रापके ऊपर ही यह यूप रहेगा । आप ही पर यह प्रतिष्ठित रहेगा, अतएव इसकी रक्षा का भार आप पर है । जो मुखिया होता है, उसी के श्राश्रित सब रहते हैं । मुखिया सबसे आगे रहता है । सब का भार उसी पर रहता है । यह यूप शकल सबसे आगे चलता है, अतएव यह मुखिया है । अतएव पहले इसे रक्खा जाता है - बाद में खड्डे में - इसके ऊपर यूप रक्खा जाता है । " पुरस्ताद् वा अस्मात् ( यूपात् ) एष ( यूपशकलः ) प्रपच्छिद्यते । तस्मादाह - प्रग्रेणीरसि स्वावेश उन्नेतृ णामिति । एतस्य ( यज्ञ कर्म्मरण - कर्म्मरिण षष्ठी ) वित्तात्- ( विद्धि ) - प्रधि त्वा स्थास्यतीति " । पाए-आपके ऊपर यह रक्खा जाएगा । आप अपनी जिम्मेदारी को जान लें । अर्थात् यूप गिरने न " अधि ह्येनं तिष्ठति तस्मादाह - एतस्य वित्तादधि त्वा स्थास्यति -इति ॥ ॥ इसके से बाद वा घृत लेकर प्रवट में उस घृत की प्राहुति डालते हैं । जो छिन्न स्थान होता है, उसमें से एक प्रकार का वैकारिक वायु निकलता है । यह वैकारिक वायु रुक्ष होता है एवं श्रासुर होता है । इसके सम्बन्ध से शरीर के प्राण - देवताओं पर धक्का लगता है । यहाँ पर अभी खड्डा खोदा है, श्रतएव जमीन में से दबा हुआ वैकारिक वायु निकलता है । यह एक प्रकार की गैस है, यह गैस रूखी है । इसके लिए घी वज्र- स्वरूप है । स्नेहन से वायु की रुक्षता दब जाती है । अतएव उसी श्रासुर - वायु के 1 प्रभाव को नष्ट करने के लिए उस खड्डे में घृत की ग्राहुति डाली जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-इस खड्डे में से असुर राक्षस न निकल नाएँ, इसलिए प्राज्याहुति डालते हैं । यह प्राज्य वज्र है । बस, इसी प्राज्य - वज्र से जमीन में से निकलने वाले असुरों और राक्षसों के मार्ग को यह अध्वर्यु रोकता है । खड्डे में से निकलते हुए उस वायु - स्रोत को स्नेहन से दबाता है । इस ग्राज्याहुति से जमीन में से असुर-राक्षसों को वैकारिक वायु को ) ऊपर निकलने का मौका ही नहीं मिलता है-" अथ स्रुवेणोपहत्याज्यं - अवटमभिजुहोति । नेदधस्तात् नाष्ट्रा रक्षांस्यु-पोत्तिष्ठानिति । वज्रो वा ग्राज्यम् तत् वज्ञेणैवैतत् नाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते । तथा - धस्तान्नाष्ट्रा रक्षांसि नोपोत्तिष्ठन्ति " । यह आहुति तूष्णीमेव दी जाती है । जैसा कि महर्षि कात्यायन कहते हैं ---" स्रुवेणावटे जुहोति तुष्णीम् " । ( का ० श्री ० सू ० ६।५३ ) [ २८० ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण इसके बाद अवट के पूर्व भाग में से परिक्रमा करके उत्तराभिमुख बैठ कर अध्वर्यु अथवा यज-मान उस यूप को घृत से अक्त करता है, अर्थात् यू के घृत चुपड़ता है । जिस समय अध्वर्यु यूप को घृत से अक्त करता है, अर्थात् यूप के घृत चुपड़ता है, उस समय वह होता से " धूपायाज्यमानायानु-ब्रूहि " - यह प्रैष करता है । है होता! आज्यमान यूप के लिए अनुवावया मन्त्र बोलो - यही इस प्रैष मन्त्र का तात्पर्य है -" थ पुरस्तात् परीत्योदङ्ङासीनो यूपमनक्ति । स प्राह - यूपायाज्य-मानायानुब्रूहि " - इति ॥१० ॥

वह अध्वर्यु - ' देवत्वा सविता मध्वानक्तु ' ' यह मन्त्र बोलता हुआ यूप के चारों ओर धृत चुपड़ता है । सविता देवता आपको मधु से प्रक्त करें । सविता ही देवताओं के प्रसविता हैं । बिना सविता के कोई भी काम नहीं हो सकता । प्रत्येक कर्म्म में जो एक भीतर से प्रेरणा होती है, उसी का नाम सविता है; जिसका स्वरूप ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । यह यजमान ही निदा-नेन यूप है । निदान प्रतिकृति को कहते हैं । यह जो इक्कीस ( २१ ) पर यूप - यज्ञ किया जाता है, वह निदानेन यजमान है | सोम यज्ञ द्वारा दिव्यात्मस्वरूप यजमान पृथिवी से सूर्य्यं तक द्युलोक तक - वितत रहता है । यजमान का दिव्यात्मा यजमान के शारीर प्रज्ञानात्मा से बद्ध हो कर सूर्य्यं तक वितत रहता है । यूपरूपेण यजमान का दिव्यात्मा इक्कीस ( २१ ) तक स्थित रहता है । इसी दृश्य को दिखलाने के लिए इक्कीस ( २१ ) पर ग्रुप खड़ा किया जाता है । यह यूप नहीं खड़ा है, अपितु, इक्कीस ( २१ ) तक वितत यजमान का दिव्यात्मा, जिसे कि हम यजमान ही कहेंगे, स्थित है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यजमानो वा s एष निदानेन यद्यपः " | पृथिवी का प्राणघन है, अतएव इसे ' दधि ' कहा जाता है । अन्तरिक्ष को घृतस्वरूप माना जाता है एवं द्युलोक को मधुस्वरूप माना जाता है । अतएव -aft हैवास्य लोकस्य रूपम् - वृतमन्तरिक्षस्य - मध्वमुष्य " । ( शत ० ब्रा ० ७।५।१।३ ) यह कहा जाता है । इन तीनों में मधु - रस द्युलोक की वस्तु है, परन्तु यह त्रिलोकी में व्याप्त रहती है । इसी द्यु से अर्थात् द्युलोकाधिष्ठाता सूर्य से पृथिवी आदि लोक उत्पन्न हुए हैं । चूंकि मधु-सूर्य की वस्तु है अतएव हम सारी त्रिलोकी को ' मधु ' कह सकते हैं । ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः २ यह सिद्धान्त है । सूर्य में से ही मधु निकलता है, अतएव रोदसी त्रिलोकी के यच्चयावत् पदार्थों को हम मधु कह सकते हैं । इस प्रकार ' तुम्हारा मधु से अञ्जन करें यह कहना यूप - स्वरूप यमजान का तीनों लोकों से सम्बन्ध करवाना है । यह सम्बन्ध बिना सविता के हो नहीं सकता, अतएव ' देवस्त्वा सविता ' कहा १. ' वा ० सं ० ६।२ ' । २. ऋग्वेद मं ० ७।६३।४ ' । [ २८१ ]

पृष्ठ 298

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणं गया है । इस मन्त्र से निदानेन यूपस्वरूप यजमान का त्रैलोक्य विभूति से एवं तीनों लोकों से सम्बन्ध कराया जाता है - यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" सर्व वा s इदं मधु यदिदं किञ्च । तदेनमनेन सर्वेण संस्पर्शयति । तदस्मै सविता प्रसविता प्रसौति । तस्मादाह - देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु " इति ॥११ ॥

इसके बाद यूप का जो चपाल प्रदेश है, उसके दोनों श्रोर घृत लगा कर उसे डोरी से बाँध देते हैं । यूप के अन्त में - ऊपर की ओर - प्रठपहलू के अन्त में खम्भे की तरह एक गुम्बज सा बनाया जाता है । उसके और अठपहलू के बीच का जो भिचा हुआ वलयाकार स्थान है, यही ' चषाल ' " कहलाता है । मन्दिरों के शिखरबन्ध का जैसा आकार होता है, वैसा ही श्राकार इस यूप के अन्तिम भाग का होता है । इसमें जो बीच का भिचा हुआ वलयाकार स्थान है, उसी का नाम ' चषाल ' है । इसी को दोनों ओर से घृत से चुपड़ा जाता है । जिस समय इस के घृत चुपड़ते हैं. उस समय निम्नलिखित मन्त्र बोलते हैं-" सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः " इति । ( सुफलाभ्यस्त्वा श्रौषधीभ्यः ) ( वा ० सं ० ६१२ ) फलयुक्त जो औषधियाँ हैं, उनके लिए मैं आपको डोरी से बाँधता हूँ । इस यूप - वृक्ष का जो गुम्बजदार चषाल है, वह इसका फल ही है । वृक्ष के अन्त ' फल हुआ करता है । वह फल मोटा होता है, गोल सा होता है; एवं फल और वृक्ष के बीच का जो स्थान है, वह भिचा रहता है- एक नाल सी रहती है । उसमें फल लटका करता है । इस यूप की रचना ठीक इसी प्रकार की जाती है । इसका मूल भाग तो मोटा होता है, एवं ग्रन्त में फल की शकल का चपाल बनाया जाता है । यूप और चषाल के बीच का स्थान संकुचित होता है अर्थात् भिचा हुआ होता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" पिप्पलं हैवास्यैतद् - यन्मध्ये संगृहीतमिव भवति " । लौकिक वृक्ष की इसके साथ तुलना करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - फल वृक्ष से कुछ तिरछा रहता है, झुका रहता है । जरा सा झुक कर यह फल वृक्ष से बद्ध रहता है इस सम्बन्ध का साधन उन दोनों के बीच का वृत्त है । बीच की जो पतली सी नलिका है. उसी से यह फल उस वृक्ष से बद्ध रहता है; एवं इन दोनों के बीच का वह स्थान - उस फल और वृक्ष के आकार से संकुचित रहता है, भिचा हुआ रहता है । प्रकृति में फलवत् वृक्ष का फल और स्थूण का सन्धि - स्थान भिचा हुआ रहता को वैसा ही बनाया जाता । चपाल फल है, नीचे का यूप वृक्ष है । है । अतएव यहाँ भी इस यूप १. ' यज्ञीय स्तम्भ के ऊपर लगाने का काठ का छल्ला ' । [ २८२ ।

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 299 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण सन्धि - स्थान संकुचित होने के कारण मध्य का वृन्त है । एवं जो डोरी बाँधी जाती है, वह तिर्यक् भाव को प्रकट करती है । यह जो यूप - चषाल है, वह ऊपर होता है । वास्तव में यज्ञ वृक्ष का यही फल है । यूप का अन्तिम भाग एकविंशस्थ ( २१ विंशस्थ ) सूर्य है । यज्ञ से इसी स्थान की प्राप्ति होती है, अत-एव इसी फल - संपत्ति के लिए फल स्वरूप चषाल को फल के आकार का ही बनाया जाता है-" तिर्य्यग् वा s इदं वृक्षे पिप्पलं ( फलम् ) आह तम् ( सम्बद्धम् ) स यदेवेदं सम्बन्धनं ( सम्यक् बन्धनसाधनं वृन्तम् ) चान्तरोपेनितमितमिव - ( वृन्तफलयो-मध्याभिर्मध्ये - प्रल्पपरिमाणमिव ) तदेवैतत्करोति । तस्मात् मध्ये संगृहीतमिव भवति ( चषाल: - इति शेषः ) " ॥१२ ॥

यूप के मूल भाग का घृत से प्राञ्जन हो गया, एवं अन्त के चषाल भाग का श्राञ्जन हो गया । अब - मध्य के अग्निष्ठा स्थान का आञ्जन करते हैं । ' यूप निर्माण ' ब्राह्मण में बतलाया गया है कि यह यूप अठपहलू होता है । परन्तु इस यूप के बीचों - बीच एक प्रादेशमात्र अथवा कुछ अधिक यूप को चौकोर बनाया जाता है । इसमें जो पश्चिम का पट्टा है, यह उत्तराग्नि की सीध में रहता है । इस पट्टे के ऊपर के भाग में अग्नि का पूजन किया जाता है, अतएव इस स्थान को अग्निष्ठा कहा जाता है । बस, इस अग्नि के ऊपर तक अर्थात् उपरि भाग तक, उसमें घृत चुपड़ते हैं— " श्रान्तमग्निष्ठामनक्ति - ( अग्नेरभिमुखाश्रिः प: - स अग्निष्ठा - ताम् ) प्रान्तम् ( उपरि प्रदेशपर्य्यन्तम् ) अनक्ति " प्रतिष्ठा में घृत क्यों लगाया जाता है? इसका कारण बतलाते हैं । यह यजमानही अग्निष्ठा है । पूर्व में बतलाया गया है कि यूप निदानेन यजमान स्वरूप है, तथा अग्निष्ठा यूप की वस्तु है, अंत-एव अग्निष्ठा को यजमान कहा जा सकता है । अपिच शरीर की सत्ता केन्द्र बिन्दु पर ही रहती है । आत्म - स्थान हृदय ही माना जाता है, यही असली चीज है । यूप यजमान है । इसका केन्द्र - हृदय अग्निष्ठा है । इसी से यजमान का और भाग स्थित है, अतएव आत्मापेक्षया हम इस सारे यूप को यजमान न कह कर ' अग्निष्ठा ' को ही यजमान कह सकते हैं । ग्राज्य रस- स्वरूप है । इससे अग्निष्ठा को चुपड़ना निदानेन यजमान को रस से युक्त करना है । बस, इसीलिए अग्नि को घृताक्त किया जाता है-" यजमानो वाऽअग्निष्ठा । रस प्राज्यम् । रसेनैवैतद्यजमानमनक्ति । तस्मादान्तमग्निष्ठामनक्ति " । यूप के नीचे एक रस्सी बाँधी जाती है, इस रस्सी को फिर ऊपर चषाल की सन्धि में बाँध दिया जाता है । यूप के अधःस्थान में जो रशना बाँधने का स्थान होता है, उसे ही ' परिव्ययर ' कहते हैं । अग्निष्ठा के प्राञ्जन के अनन्तर इस परिव्ययण स्थान के चारों ओर घृत लपेटते हैं । [ २८३ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 300 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण " थ परिव्ययणं - ( परिव्ययरणो रशनावेष्टनप्रदेश: तं ) प्रतिसमन्तं परिमृशति - ( श्राज्येन ) " । इस प्रकार जहाँ - जहाँ घृत लगाना चाहिए था, वहाँ - वहाँ घृत लगा कर अब यूप को उठाने की तय्यारी की जाती है । जिस समय यूप उठाने का समय आता है, उस समय अध्वर्यु होता से प्रेष करता है-" उच्छ्रीयमाणाय - अनुब्रूहि " - इति ॥१३ ॥

इसके बाद अध्वर्यु और और ऋत्विजों के सहारे से उस यूप को जमीन पर से ऊँचा उठाता है और साथ ही निम्नलिखित मन्त्र बोलता है -" द्यामप्रेरणास्पृक्ष आन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीम् उपरेखा बृंही: " ( वा ० सं ० ६।२ ) हे यूप! आपने अपने अग्रभाग से द्युलोक को छू लिया है, एवं मध्य भाग से अन्तरिक्ष को भर दिया है, एवं अपने उपरिभाग से पृथिवी को इस भूलोक को दृढ कर दिया है । उपर भाग जमीन में गड़ा रहता है - उससे यह भूलोक में प्रतिष्ठित है । बीच का भाग अन्तरिक्ष में फैला हुआ है । अन्तिम भाग से- द्युलोक का स्पर्श कर रक्खा है । इस प्रकार यह यूप तीनों लोकों में व्याप्त हो रहा है । यह यूप वज्र -स्वरूप है शास्त्र से ही लोक जीते जाते हैं । बस, इन तीनों लोकों को जीतने के लिए इनमें यज्ञ से उत्पन्न दिव्यात्मा की सत्ता स्थापित करने के लिए यह यूप - वज्र उठाया जाता है । इस यूप - वज्र से यज-. मान तीनों लोकों को अपने कब्जे में कर लेता है एवं इस वज्र प्रहार से तीनों लोकों में से शत्रुनों को बाहर निकाल देता है । यूप, झण्डा है । झण्डा गाड़ना ही तो विजय का चिह्न है--" वज्रो वै यूपः । एषां लोकानामभिजित्यै । तेन वज्रेणेमांल्लोकान् स्पृणुते । एभ्यो लोकेभ्यः सपत्नान् निर्भजति ” ॥ १४ ॥

इस प्रकार यूप को खड़ा कर उसे उस अवट में रख देते हैं । जिस समय यूप को खड्डे में रखते हैं, उस समय अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता है -" या ते धामान्युरमसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गाऽप्रयासः । अत्राह भूरि- इति " । ( वा ० सं ० ६ ३ ) तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमवभारि हे विष्णो! ' ते ' या ( यानि ) धामानि ( स्थानानि ) गमध्ये - ( गम-नाय - प्राप्तये ) उश्मसि - ( कामयामहे ) यत्र ( येषु धामसु ) भूरिशृङ्गाः प्रभू-तोर्ध्वप्रदेशा: - ) प्रयास: ( गन्तारः ) गावः । श्रत्रा - एषु - स्थानेषु - उरुगायस्य [ २८४ ]