Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 301–310

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण विशालकीर्ते विष्णोः - परमं पदं - भूरि - ( प्रभूतम् ) - श्रवभाति सर्वदा प्रकाशते । ( तं वयं प्रार्थयामह - इति शेषः ) " । farm! आपके जो स्थान हैं वहाँ जाने के लिए हम कामना करते हैं । हम विष्णु - लोक में जो कि सूर्य से भी ऊपर है - जाने के लिए सदा लालायित रहते हैं । जिन विष्णु - स्थानों में बड़े - बड़े सींगवाली गौएँ रहती हैं, उन स्थानों में अर्थात् गो - लोक में विशालकीत्ति भगवान् विष्णु के विराट् चरण विद्यमान हैं । बस उसी में हम जाना चाहते हैं । स्वयम्भू का नाम अक्षरब्रह्म है, श्रापोमया परमेष्ठि-मण्डल के अक्षर का नाम विष्णु है । परमेष्ठिमण्डल सूर्य्य से कई हजार गुणा बड़ा है । इसी परमेष्ठि-मण्डल में मन, प्रारण, वाक् रूप गौएँ उत्पन्न होती हैं, प्रतएव परमेष्ठि- मण्डल को गो - लोक कहा जाता है । इसी गो - लोक में गो- लोकनाथ विष्णु विहार कर रहे हैं । इस मन्त्र से अध्वर्यु उस यूप को उस अवट में गाड़ ' देता है । - यह त्रिष्टुप् छन्द है । इस प्रकार इस त्रिष्टुप् छन्द वाली ऋचा से यूप गाड़ा जाता है । त्रिष्टुप् प्रान्तरिक्ष छन्द है । अन्तरिक्ष के प्रधिष्ठाता इन्द्र हैं । इन्द्र सम्बन्धेनैव त्रिष्टुप् को वज्र कहा जाता है । एवं यूप भी वज्र है । वज्र को वज्र से ही उठाना चाहिए, अतएव वज्र - स्वरूप त्रिष्टुप् से यूप वज्र को गाड़ते हैं— " एतया त्रिष्टुभा मिनोति । वज्रस्त्रिष्टुप् । वज्जो यूपः । तस्मात् त्रिष्टुभा मिनोति ॥ १५ ॥

यूप के मध्य का जो अग्निष्ठा स्थान है, उसे बिल्कुल उस उत्तरावेदि की सीध में रखता है । उस अग्निष्ठा स्थान वाले पटल को एकदम उत्तरावेदिस्थ अग्नि की सीध में रखना चाहिए । वह अग्नि स्थान से जरा भी इधर - उधर टेढा न हो । यजमान ही प्रग्निष्ठा है एवं अग्नि ही यज्ञ है । प्रग्नि ही तो यज्ञ का प्रधान साधन है । अग्नि में सोमाहुति डालने का नाम ही तो यज्ञ है । ऐसी अवस्था में यदि अध्वर्यु यजमान स्वरूप श्रग्निष्ठा को श्रग्नि से टेढा कर देगा, विमुख कर देगा तो ऐसा करता हुआ वह यजमान को अग्निस्वरूप यज्ञ से ही विमुख कर देगा । श्रग्निष्ठा को ग्रग्नि से विमुख करना यजमान को अग्नि - यज्ञ से विमुख करना है । अतएव उस ग्रुप को ऐसी तरह से गाड़ना चाहिए जिससे श्रग्निष्ठा-पटल एकदम अग्नि के सम्मुख रहे -" सम्प्रत्यग्निमग्निष्ठां मिनोति । यजमानो वाऽग्रग्निष्ठा । अग्निरु वै यज्ञः । स यदग्नेरग्निष्ठां हृलयेत् - ह्वलेद्ध - यज्ञाद्यजमानः । तस्मात् सम्प्रत्यग्नि-मग्निष्ठां मिनोति " । इसके बाद इस खड्डे के पूर्व भाग में रक्खी हुई मिट्टी को इस खड्डे में डाल कर, यूप को जमाते हैं- " श्रथ पर्थ्य हति " । [ २८५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण इसके बाद उसे ठीक - ठाक कर मजबूत बनाते हैं । ऊँची नीची मिट्टी को एकसार कर उसे समधरातलयुक्त कर देते हैं- " प्रथपर्यूषति " । इसके बाद मिट्टी के जमाने के लिए वहाँ थोड़ा सा पानी छिड़क देते हैं-" श्रथाप उपनिनयति ॥ १६ ॥

इस प्रकार यूप तय्यार करके अध्वर्यु उस यूप का स्पर्श करता है और यजमान से निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है--" थैवमभिपद्य वाचयति । विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा " । यजमान कहता है कि हे ऋत्विजो! आप सब लोग इस पिण्ड के उन कम्मों को देखिए, जिन कम्मों से कि इसने त्रिलोकी के अन्न को अपने वश में कर लिया है । तीन प्राक्रमणों से भगवान् विष्णु सारी सम्पत्ति को अपने अधिकार में कर लिया है । पृथिवी से निकल कर इक्कीस ( २१ ) तक वितत रहने वाले रोदसी त्रिलोकी में व्याप्त अग्नि का नाम ही ' विष्णु ' है । यह विष्णु अर्थात् यज्ञ इक्कीस ( २१ ) पर जा कर - इक्कीस ( २१ ) के ऊपर रहने वाले सोम को अपने में प्राहुत किया करता है । हमारा जो यह यूप है, वह यज्ञ स्वरूप है, वैष्णव है । प्रतएव इस यूप की प्रोर दृष्टि डाल कर यजमान अपने यज्ञ - विष्णु की विजिति बतला रहा है । यजमान कहता है कि इस यज्ञ की खूबी देखो जो तीनों लोकों में व्याप्त हो रहा है । ये यज्ञ - विष्णु इन्द्र के यूज्य ( योग्य ) मित्र हैं । इन्द्र- विष्णु दोनों साथ रहते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, श्रग्नि, सोम ये पाँच अक्षर हैं । पाँचों में से ब्रह्मा श्रालम्बन है, एकाकी है । एवं श्रग्नि - सोम दोनों मित्र हैं । ये हृदय के बाहर ही रहते हैं एवं इन्द्र विष्णु दोनों सयुज् हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस अध्वर्यु ने यह जो वज्र उठाया है, वह यूप को खड़ा किया है । यूप खड़ा करना, त्रिलोकी पर अधिकार जमाने के लिए वज्र उठाना है । विष्णु की विजिति देखो - " विष्णोः कर्माणि " इसका यही तात्पर्य है । इन्द्र इक्कीस ( २१ ) पर रहता है । इक्कीस ( २१ ) पर यज्ञ - संस्था समाप्त होती है, श्रतएव इन्द्र यज्ञ के देवता माने जाते हैं । यूप यज्ञ सम्बन्धेन वैष्णव है । यज्ञ में यज्ञ - देवता का सम्बन्ध होना ग्राव-श्यक है । इसी यज्ञ देवता का यज्ञ से सम्बन्ध करने के लिए ' इन्द्रस्य ' इत्यादि कहा है | इन्द्रस्य युज्य: कहता हुआ अन्वर्य यज्ञ को सेन्द्र करता है । यज्ञ को यज्ञ के देवता से युक्त करता है || १७ || इसके बाद यजमान किंवा अध्वर्यु - यूप के अन्तिम भाग में प्रतिष्ठित चषाल की ओर झाँकता है । और साथ ही मन्त्र बोलता है— " तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् " । ( वा ० सं ० ६।५ ) [ २८६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण विष्ववृत्तीय पृष्ठि केन्द्र को ' ध्रुव ' कहते हैं एवं क्रान्तिवृत्तीय पृष्ठि - केन्द्र को कदम्बक कहते: हैं । इसी को वैदिक भाषा में नाक कहा करते हैं । यही विष्णु - स्थान कहलाता है । ध्रुव से चौबीस ( २४ ) अंश पर यह नाक है । ध्रुव - चौबीस ( २४ ) अंश के व्यासार्ध से इस कदम्ब - विष्णु की परिक्रमा लगाया करता है । ध्रुव विष्णु का पद है । स्वयम्भू जिस स्थान पर रहता है, वह परमपद है । यह खाली स्थान मात्र है, यहाँ कोई नक्षत्र नहीं है । इसे महर्षि लोग प्राँख फाड़ - फाड़ कर बड़े गौर से देखा करते हैं । मन्त्र का तात्पर्य्यं बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - जिसने यह यूप उठाया है, उसने वज्र उठाया है । यह नीति विष्णु की ही विजिति है -" वज्रं वाऽएष प्राहार्षीत् यो यूपमुदशिश्रियत् । तां विष्णोविजिति पश्यत -इत्येवैतदाह " ॥१८ ॥

अग्निष्ठा स्थान से जरा नीचे परिव्ययण रहता है, अर्थात् रशना- प्रदेश रहता है । यह रशना क्यों बाँधी जाती है? इसका कारण बतलाते हैं । यूप यज्ञ पुरुष स्वरूप है । हम देखते हैं कि पुरुष नङ्ग नहीं रहते, अपितु कटि भाग में वस्त्र पहने रहते हैं । अतएव इसी अनग्नता के लिए ही इस ग्रुप के चारों ओर रशना लपेटी जाती है. " अथ परिव्ययति । अनग्नतायै न्वेव परिव्ययति " । हम देखते हैं कि नग्नता के लिए नाभिप्रदेश के पास तक अधोवस्त्र पहना जाता है । ऊपर का भाग उघाड़ा रहे तब भी कोई परवाह नहीं है । चूंकि केन्द्र स्थान में ही वस्त्र पहनना अनग्नता के लिए वस्त्र पहना कहा जाता है, अतएव यूप के भी इसी स्थान में ही रशना लपेटते हैं --" तस्मादत्रैव ( नाभिप्रदेशे - एव ) भवति " । परिव्ययति । अत्रैव हीदं वासो -अपिच रशना लपेटते हुए इस यज्ञ - पुरुष में अनादि ही स्थापित करते हैं । चूंकि भुक्त अन्ननाभि में ही प्रतिष्ठित रहता है, रशना अन्न स्वरूप है, प्रतएव नाभिप्रदेश में ही रशना को लपेटते हैं ---" श्रन्नाद्यमेवास्मिन्नेतद्दधाति । त्रेव हीदमन्नं प्रतितिष्ठति । तस्माद-व परिव्ययति ॥१ ९ ॥ उसे तीन लड़ा कर के लपेटते हैं, अर्थात् रस्सी के तीन अलबेटे देने चाहिए । चूंकि रशना अन्न है । एवं अन्न त्रिवृत् है । पशु को ही न कहते हैं । माता - पिता और पैदा होने वाली सन्तान - तीनों को प्राण-देवता खाते रहते हैं, प्रतएव इन तीनों को ग्रन्न कहा जाता है । तात्पर्य यही है कि संसार में जितनी भी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं - वे सब योषावृषात्मक हैं । सारे पदार्थ योषावृषा के मेल से ही उत्पन्न होते हैं । तोबस, इसी मूल के श्राधार पर हम कह सकते हैं कि सारे विश्व में योषा वृषा और इन के मेल [ २८७ ।

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण - से उत्पन्न होने वाला योषावृषात्मक पदार्थ - इन तीन के अलावा और चौथी वस्तु है ही नहीं । योषा स्त्री-माता कह सकते हैं, प्राण कहलाता है, वृषा पुरुष प्रारण कहलाता है । अतएव योषा को सृष्ट जगत् की प्रकार सारे एवं वृषा को सृष्ट जगत् का पिता कह सकते हैं, एवं सृष्ट जगत् को पुत्र कह सकते हैं । इस विश्व में पिता ( वृषा ) माता ( योषा ) और पुत्र ( उत्पन्न वस्तुजात ) इन तीन के अलावा और कोई चौथी वस्तु है ही नहीं । ये पूर्वोक्त पदार्थ चूँकि प्रारण देवताओं के उपकरण भोग्य हैं, अतएव इन तीनों को रश्मियों से पशु कहा जाता है । चूँकि प्राण - देवता इन तीनों को चूसा करते हैं - सोर प्राण - देवता अपनी पार्थिव पदार्थों को निरन्तर चूसा करते हैं- श्रतएव इन्हें उन प्राण देवतानों का अन्न कहा जाता है । यह का अन्न अन्न माता, पिता, पुत्र ( योषा - वृषा तदुत्पन्न वस्तु ) भेदेन त्रिवृत् है । प्रकृति में प्राण देवताओं चूँकि त्रिवृत् है एवं " द्वै देवा अकुर्वंस्तत् करवाणि " यह हमारा अटल सिद्धान्त है अतः यह ही लपेटते रशना हैं यूप । का अन्न - स्वरूप है । अतएव प्रकृतिवत् अन्न स्वरूपा रशना को त्रिवृतवत् ( तीनलड़ा ) करके से ' यूप के तीन लड़ा करके रशना क्यों लपेटी जाती है? ' इसका यही उत्तर है । इसी अभिप्राय भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" त्रिवृता परिव्ययति । त्रिवृद्धयन्नम् । पशवो ह्यन्नम् । पिता, माता,

यज्जायते तत् तृतीयम् । तस्मात् त्रिवृता परिव्ययति ॥२० ॥

निगम र अनुगम भेदेन श्रुति दो भागों में विभक्त है । एक ही नियत स्थल पर लागू होने वाली श्रुति ' निगम श्रुति ' कहलाती है, जैसे- " श्रग्नि मीले पुरो ० " -- इत्यादि । यह श्रुति केवल ' अग्नि ' पर ही लागू है । एवं जो श्रुति अनेक स्थलों में चरितार्थ होती है, वह ' श्रनुगम श्रुति ' कहलाती है यह , उदा- भी ' हरणार्थ ' चत्वारिवाक परिमिता पदानि ' इत्यादि । परा पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी - चत्वारि से अभिप्रेत है एवं इसी चत्वारि से सत्या, सरस्वती, बृहती, अनुष्टुप् - यह भी अभिप्रेत है । एक ही ' चत्वारिवाक् परिमिता ' इस मन्त्र के सात अर्थ हो जाते हैं । इन सातों का विस्तृत विवेचन श्री गुरु-प्रणीत " पथ्यास्वस्ति " नाम के वर्णमातृका शिक्षा ग्रन्थ में देखना चाहिए । प्रकृत में इस प्रपञ्च से हमें यह बतलाना है कि पूर्वोक्त " त्रिवृद्वयन्नम् " यह यनुगम श्रुति है । यन्त्र का त्रिवृतत्व तीन प्रकार से - होता है । इनमें एक प्रकार से ( माता - पितादि ) तो स्वयं ग्रन्थकार ने ही बतला दिये हैं । अन्य प्रस-ङ्गागत इसके दो - तीन अर्थ और बतला दिए जाते हैं । संसार में " ग्राप्, वायु औषधि भेदेन अन्न तीन ही प्रकार का है । पानी, हवा और ग्रन्न - ये तीन ही अन्न हैं । इन्हीं तीनों के त्रिवृत्कररण तीनों को के श्रुतियों आधार में " तेज, वायु, अन्न इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । सारे विश्व का जीवन इन्हीं पर अवलम्बित है । प्रतएव अथर्वश्रुति कहती है ---" त्री छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम् । आपो वाता श्रोषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन प्रापितानि ॥ ( अथर्ववेद कां ० १ ८ | १ | १७ ) १. " विद्यावाचस्पति ( स्व ० ) पं ० मधुसूदन प्रोभा कृत " । [ २८८ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) १ - माता - ( योषः ) २ - पिता - ( वृषा ) ३ -- पुत्र - ( योषावृषात्मक पदार्थ ) १ - अन्न ( रोटी - लड्डू ) इत्यादि २ - गव्य ( दधि - दुग्ध घृतादि ) ३ - व्यञ्जन ( शाक - दाल वगैरः ) यूपनिधान ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण ( ऐ ० प्रा ० अ ० ३।४।१६ ) १ - आप ( अप - ग्रापः ) २ – वायु ( तेजः - वायुः ) ३ - प्रौषधि ( ग्रन्न - सोमः ) -सोमः १ - खाद्य - ( रोटी वगैरः ) २ - भक्ष्य - ( चावल वगैरः ) ३ - भोज्य - ( दधि वगैरः ) [ २८६ ] श्राप, वायु, औषधि इन तीनों में जो श्रौषधि है, उसे सोम कहा जाता । इस प्रकार यच्चयावत् प्राणिमात्र की आप, वायु, सोम- ये तीन खुराकें हैं । कहने को तीन हैं, वस्तुत; तीनों एक सोम है । घना-वस्था में परिणत सोम आप कहलाने लगता है । तरलावस्था में परिणत सोम वायु कहलाने लगता है, एवं विरलावस्था में परिणत, सोम ही कहलाता है । सोम ही अग्नि का अन्न है । प्रग्नीषोमात्मक यज्ञ के अलावा और है ही क्या? बस, " त्रिवृद्धयन्नम् " का यह दूसरा अर्थ है । ग्रपि च - अन्न, गव्य, व्यञ्जन ( शाक ) भेदेनापि अन्न त्रिवृत् है । अन्न से रोटी वगैरः संगृहीत है । व्यञ्जन शब्द से शाकादि गृहीत हैं, एवं गव्य शब्द से दधि, दुग्ध, घृत, हैं । मलाई इत्यादि गृहीत अपि च - खाद्य, भक्ष्य और भोज्य - भेदेनापि अन्न त्रिवृत् है । जिसे दाँतों से तोड़ना पड़े, ऐसा जो अन्न ( रोटी - पूड़ी - पापड़ ) है - वह खाद्य कहलाता है, एवं जिसे दाँतों से तोड़ना तो न पड़े किन्तु मुँह में डाले बाद जिन्हें दाँतों से चिकरना पड़े, ऐसे अन्न ( चावल, रबड़ी इत्यादि ) भक्ष्य कहलाते हैं । एवं जिसमें दोनों व्यापारों की ही आवश्यकता न पड़े, ऐसा अन्न ( दूध - हलवा इत्यादि ) भोज्य शब्द से व्यवहृत होता है । इस तरह अन्न त्रिवृत् हो जाता है । इन्हीं तीनों को प्रशन, पान, खाद - इन नामों से भी व्यवहृत किया जाता है । श्रोदनादि प्रशन हैं । जल - क्षीरादि पान हैं, एवं लड्डू आदि खाद हैं । इसी अन्न त्रिवृ-तत्व को बतलाती हुई श्रुति कहती है -" त्रेधा विहितं वा इदमन्नम् - अशनम्, पानम्, खादः - इति " । अपि च - भोज्य, लेह्य, चोष्य भेदेनापि अन्न तीन प्रकार का होता है । खाद्य, भक्ष्य, भोज्य-( रोटी, चावल, दधि वगैरह ) तीनों भोज्य हैं । चटनी आदि लेह्य हैं । यहाँ तक सर्वान्न भक्षण सर्वात्मना प्रक्रिया रहती है । चावल वगैर: और चटनी वगैर: में से कुछ निकाला नहीं जाता श्रपितु उनका । बस, इसी आहार होता है । परन्तु एक अन्न ऐसा है जिसमें से कुछ लेना पड़ता है - कुछ फेंकना पड़ता है अन्न को ' चोष्य ' कहते हैं । चूसने की जितनी भी वस्तु हैं - उन सब में रस चूसा जाता है, भूकस फेंक दिया जाता है । इस प्रकार कई प्रकार से अन्न का त्रिवृतत्व सिद्ध हो जाता है । अन्न चूंकि त्रिवृत् है, अतएव अन्नस्वरूप रशना को तीन अलबेटे दे कर ही यूप के चारों ओर लपेटना चाहिए-

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) १ - प्रशन २- पान ३ -- खाद} यूपनिधान ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण १- भोज्य २ - लेह्य ३- चोष्य इसी प्रनुगम श्रुति की ओर इशारा करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- " त्रिवृत् - हि-अन्नम् ” ॥२० ॥

यूप के चारों ओर तीन बार रस्सी क्यों लपेटनी चाहिए? - इसकी उपपत्ति बतला दी गई प्रब. पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्युप के चषाल भाग को -! ' तद् विष्णोः परमं पदम् १ इत्यादि मन्त्र से देख कर उस यूप के चारों ओर तीन बार उस रशना को लपेटता है और साथ में निम्नलिखित मन्त्र बोलता है -" परिवीरसि परि त्वा देवीविशो व्ययन्तां व्याणाम् " इति । ( वा ० सं ० ६।६ ) परमं यजमानं रायो मनु-हे ग्रूप! त्वं परिवीरसि ( रशनया परितो वेष्टितोऽसि ) । दैवीविशः ( देव - सम्बन्धिन्यः प्रजाः ) त्वा परिव्ययन्ताम् - ( वेष्टयन्तु ) । तथा इमं यजमानं मनुष्याणां मध्ये रायः ( धनानि ) परिव्ययन्तु " । हे यूप! प्राप परिवी हैं अर्थात् इस रशना स्वरूप अन्न- सम्पत्ति से चारों ओर से वेष्टित अर्थात् सम्पत्तियुक्त हैं । ऐसे सम्पत्तियुक्त जो आप हैं, उनको दैवी प्रजा चारों ओर से घेर ले अर्थात् प्राप अधिष्ठाता बनें और प्रारणदेवता प्रापकी प्रजा बने । प्रकृति यज्ञ में सूर्य्यं ही का नाम यूप है । सूर्य्य सौर प्राण ही को देवता कहते हैं । ये देवता सूर्य्य यूप के चारों ओर वेष्टित रहते हैं । प्रतएव " चित्र durge गादनीकम् " " यह कहा जाता है । इसी सूर्य्य यूप की प्रतिकृति पर काष्ठ - यूप बनाया जाता है । सूर्य्य यूप है । इसे यूप साक्षात् इसी अभिप्राय से कहते हैं कि देवी प्रजा आपको चारों ओर से वेष्टित कर ले, एवं मनुष्यों के मध्य में रहने वाला जो यजमान है, उसे सम्पत्ति चारों ओर घेर ले--इस प्रकार पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु उस रशना को यूप के चारों ओर लपेट देता है । प्रत्येक कर्म्म की कुछ आशी ( फलश्रुति ) होती है । पूर्व मन्त्र में जो " परीमं यजमानं रायो मनुष्याणाम् " यह कहा गया है, उससे यह प्रध्वर्यु यजमान के लिए रशना वेष्टन कर्म्म की प्राशी ही माँगता है— " स परिव्ययति । परिवीरसि ( इत्यादि मन्त्रेण ) । तद्यजमानाया-शिषमाशास्ते यदाह - परीमं यजमानं रायो मनुष्याणाम् ” ॥२१ ॥

१. ' वा ० सं ० ६५ ' । २. ' ऋग्वेद मं ० १।११५।१ ' । [ २ ९ ० ]

पृष्ठ 307

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणं. उत्तरावेदि से ठीक पूर्व में जो यूप गाड़ा जाता है, उसका नाम ' अग्निष्ठ ' यूप है । जिस समय है यूप । तय्यार किया जाता है, उस समय यूप का सबसे पहला जो खण्ड है, उसे सुरक्षित रख लिया जाता आगे इस यूप शकल को ' स्वरु ' कहा जाता है । ' स्वरु ' क्यों कहा जाता है? -यह भगवान् याज्ञवल्क्य उस त्वयं बतलाने वाले हैं । यूप के मध्य में उत्तराग्नि के सम्मुख एक अग्निष्ठा स्थान होता है । हो अग्निष्ठा स्थान में उस स्वरु नाम के यूपशकल को उस रस्सी से बाँध दिया जाता है । यूप खड़ा गया है, एवं रशना लपेट दी गई है । अब वह अध्वर्यु “ दिवः सूनुरसि " " यह मन्त्र बोलता हुआ, उस स्वरु नाम के युपशकल को रशना के मध्य में बाँधता है— " यूपशकलमवगूहति दिषः सूनुरसीति " । है, अतएव ' दिवः यह यूप द्युस्थानापन्न है । चूँकि यह यूपशकल यूप के ( द्यु के शरीर से निकला हम इस यूप की सूनुरसि ' यह कहा गया | यह यूपश्कल चूंकि इस यूप से उत्पन्न हुआ है, अतएव इसे प्रजा कहने के लिए तय्यार हैं । यह यूपशकल इस यूप की सन्तान है -" प्रजा हैवास्यैषा " | यज्ञ में एकादश यज्ञ कई प्रकार के होते हैं । उनमें यूप - संख्या भी भिन्न - भिन्न होती है । ) किसी यूप तो किसी में एक ( ११ ) यूप होते हैं, किसी में पञ्चदश ( १५ ) ग्रुप होते हैं, किसी में सप्तदश ( १७ एवं एक यूप भी होता विंशतिः अर्थात् इक्कीस ( २१ ) यूप होते हैं । यज्ञ में ' यूपैकादशिनी ' भी होती है सकता है एवं यूपै-है । अग्निष्टोम में दोनों मत हैं । श्रग्निष्टोम यज्ञ में एक यूप भी स्थापित किया जा हो तब तो कोई झगड़ा ही नहीं । यदि यूपैकाद-कादशिनी भी की जा सकती है । यदि एक ही यूप क्रम से उन एकादश शिनी पक्ष हो तो चूंकि यूपशकल यूप की प्रजा है, अतः यूपैकादशिनी पक्ष में जिस क्रम से उस उस यूप के ( ११ ) यूपों को तय्यार किया जाता है एवं जिस क्रम से गाड़ा जाता है, उसी ( ११ ) यूप किस कल को, उस यूप के ही बाँधना चाहिए । किस क्रम से यूपनिधान होता ब्राह्मण है, एकादश " में किया जाएगा । तरह खड़े किए जाते हैं, इसका विस्तृत विवेचन आगे के " यूपैकादशिनी एवं उन ग्यारहों ( ११ हों ) को जब ग्यारह ( ११ ) यूप होंगे तो उनके ग्यारह ( ११ ही यूप- शकल होंगे के, यूप- शकल बाँधे जाएँ, उस समय उन ग्यारह यूपों में रशना के मध्य में बाँधना पड़ेगा । जिस समय यूपों पूरा ध्यान रखना चाहिए । किसी अन्य यूप का यूप- शकल किसी अन्य यूर से तो नहीं बँध गया - इसका हो, ठीक उसी क्रम से जिसका जिस क्रम से यूप तैय्यार किये गये हों एवं जिस क्रम से उन्हें स्थापित किया प्रजा अमुग्धा होती है, जो यूप शकल हो उसे उसी यूप के बाँधना चाहिए । ऐसा करने से यजमान की के वह बाँधा जाता है एवं अनुव्रता ( मातृपित्र्यनुगामिनी ) होती है । अर्थात् यदि जिसका यूपशकल । तो उसी बस, यजमान चूंकि यूप तो यूप - पिता से उत्पन्न यूपशकल - प्रजा को पिता की अनुगामिनी बनाता है १ - ' वा ० सं ० ६६ ' । [ २ ९ १ ]

पृष्ठ 308

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तृतीय काण्ड श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण शकल - प्रजा है, अतएव यूपैकादशिनी पक्ष में यजमान प्रजा को यजमानाज्ञाकारिणी बनाने के लिए उन-उन यूप शकलों को उन उन यूपों से ही सम्बद्ध करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" प्रजा हैवास्यैषा । तस्माद्यदि यूपैकादशिनी स्यात् स्वं स्वमेवावगूहेत् विपर्यासम् । तस्यै हैषा - प्रमुग्धा - अनुव्रता ( यजमानानुगामिनी ) प्रजा जायते " । यदि ऐसा नहीं किया जाएगा अपितु, किसी के यूप - शकल को किमी के लगा दिया जाएगा तो अनर्थ हो जाएगा । ' अरे बाबा! यूप शकलों को क्रमशः तत् सम्बद्ध यूपों में बाँधने से क्या होता ' है? बाँधने से काम है न कि क्रम क्रम पर ध्यान देना । तत्तद्यूपशकलों को तत्तद्यूपों के ही बाँधना, इस प्रपञ्चमें कुछ भी सार नहीं है ' -जो यजमान ऐसे प्रमाद में पड़ कर विपर्यास क्रम से अर्थात् श्रंट - संट बिना क्रम के ही चाहे जिस यूपशकल को, चाहे जिस यूप के बाँध देता है, उस उस यूपशकल को उसी -उसी यूपकल के नहीं बाँधता है - उस यजमान की प्रजा श्रमुग्धा होती है एवं अननुव्रता होती है । कारण इसका यही है कि यूपशकल यूप की प्रजा है । ऐसी अवस्था में उसका दूसरे यूप से सम्बन्ध करना, जिससे वह यूपशकल उत्पन्न हुआ है, उसे उसका श्रननुगामी बनाना है । यजमान यूप स्वरूप है, अतएव इस विपर्य्यासक्रम का असर इस यजमान पर पड़ता है । यूप शकल में विपर्य्यास से यजमान प्रजा यज-मान से विमुख हो जाती है । ऐसा न हो, अपितु यजमान - प्रजा यजमानानुव्रता ही रहे, एतदर्थ उसे चाहिए कि वह यूपैकादशिनी पक्ष में क्रमानुसार अपने - अपने यूपश्कलों को उन्हीं उन्हीं यूपों से सम्बद्ध करें " अथ यो विपर्यासमवगूहति - न स्वं स्वम् । तस्य हैषा सुग्धा - अननुव्रता प्रजा जायते । तस्मादु स्वं स्वमेवावगूहेत् - अविपर्य्यासम् ॥ २२ ॥

श्रग्निष्टोम यज्ञ में जो यूप खड़ा किया जाता है, उस यूप में मध्य में सबसे पहले तो रशनायामध्य में यूपकल रहता है । इसके बाद रशना रहती है । इसके बाद चषाल रहता है । इस ज्योतिष्टोम यज्ञ से यजमानात्मा का स्वर्ग - गमन होता । यूप में ये यूपशकल, रशना, चषाल नहीं हैं अपितु स्वर्गं को जाने की सीढियाँ हैं । इसी आलङ्कारिक वर्णन को उपन्यस्त करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-यूपशकल, रशना, चषाल युक्त यूप के द्वारा यह यजमान स्वर्गलोक का समारोहण करता है । यूप के मूल में यूपशकल रक्खा गया था, वही पहली सीढ़ी है । उसके बाद रशना होती है - यह दूसरा सोपान है । इसके बाद फिर यूपशकल बँधा रहता है- यह तीसरी सीढी है । इसके बाद चबाल है - यह चौथी सीढ़ी है । इस चषाल स्वरूप अन्तिम सोपान से यह यजमान स्वर्गलोक में जा पहुंचता है | इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स्वर्गस्यो हैष लोकस्य समारोहणः क्रियते यद्यपशकलः- इयं रशना । रश-नाये यूपशकलः । यूपशकलाच्चषालम् । चषालात् स्वर्ग लोकं समश्नुते " ॥ २३ ॥

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तृतीय काण्ड ( ० ७ ) लाते हैं-शतपथ ब्राह्मणं यूपनिधान ब्राह्मण इस यूपशकल को ' स्वरु ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । इसे स्वरु क्यों कहते हैं? - यह बत-1 " अथ यस्मात् स्वरुनीम ( तदुच्यते ) " । शरीर से जो हिस्सा कट कर अलग हो जाता है, वह अरु कहलाता है । चूंकि यह यूपशकल-उस यूप का अपना हिस्सा है, उसी यूप से इसे काटते हैं, अतएव यह यूप - शब्दज इस यूप का अपना अरु ( व्रण- घाव - हिस्सा ) होता है । चूंकि यह यूप का अपना अरु है, अतएव इसे यूप ' स्वरु ' कहा जाता है । यदि शरीर का हिस्सा कट कर अलग हो जाता है तो बड़ी वेदना होती है । वह वेदना तब तक शान्त नहीं होती जब तक कि वह हिस्सा वह धाव वापस भर न जाय । चूंकि यह यूप शकल उस यूप का व्रण है, इसके बिना उस यूप में बैचेनी है, अतएव इसे वहाँ उस यूप से अवश्य ही सम्बन्ध कर देना चाहिए । ' स्वरु ' नाम - निर्वचन से यह भी सिद्ध हो जाता है-" एतस्माद् ( यूपाद् ) वाऽएषोऽपच्छिद्यते । तस्यैतत् स्वमेवारुर्भवति । तस्मात् स्वरुर्नाम " ॥२४ ॥

संसार में जितने भी खड्डे होते हैं, वे सब पितृदैवत्य कहलाते हैं । निबिड अन्धकार में जो तमो-मय प्राण रहता है, उसे असुर कहते हैं एवं एकदम प्रकाश में रहने वाला ज्योतिर्मय प्रारण देवता कह-लाता है । न प्रकाश हो न अन्धकार ऐसे में ऐसा जो छायामय प्राण है, वह पितर कहलाता है । जितने भी खड्डे होते हैं, कुए होते हैं; उन सब में न घोर अन्धकार ही होता है एवं न घोर प्रकाश ही रहता है । एवं इस प्राण को हम पितृप्राण कहने के लिए तय्यार हैं । अतएव पूर्व के ब्राह्मणों में ( इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही ) ' पितृदेवत्यो वै कूपः खातः ' ( शत ० ब्रा ० ३।७।११६ ) यह कहा गया है । चूंकि निखात स्थान में पितृ - प्रारण रहता है, अतएव यूप का जो निखात स्थान है, उसे पितृदेवत्य कहने के लिए तय्यार हैं । यूप का जितना हिस्सा जमीन में गड़ा रहता है, उतना खड्डा पितृ - देवत्य है । उसी स्थान को हम पितृ-लोक कहने के लिए तय्यार हैं । एवं निखात से ऊपर रशना तक मनुष्यलोक है । रशना से ऊपर चषाल तक देवलोक है । एवं चषाल से ऊपर जो दो या तीन अंगुल बाकी बचा हुआ यूप - भाग है, वह साध्य-देवताओं का स्थान है, यही चौथालोक है । तात्पर्य्य यही है कि प्रकृति में पितृलोक, मनुष्यलोक, देवलोक, साध्यलोक ये चार लोक हैं । इन्हीं चारों लोकों को - पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आप: -इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । पृथिवी पितृलोक है, एवं उभयतः श्रमूल मनुष्यों के लिए विचरण का स्थान अन्तरिक्ष है । द्यू - देवलोक है । एवं द्युलोक से ऊपर का प्रपोमय परमेष्ठिमण्डल साध्यलोक है । साध्यदेवतात्रों का निर्गम इसी चौथे आपोलोक से होता है - जैसा कि श्रुति कहती है-" प्रयं वा इदं परमोऽभूत् - इति तत् परमेष्ठिनः परमेष्ठित्वम् । x x x तं देवाः समन्तं पर्य्यविशन् । वसवः पुरस्तात् । रुद्रा दक्षिणतः । श्रादित्याः पश्चात् ।

विश्वे देवा उत्तरतः । श्रङ्गिरसः प्रत्यञ्चम् । साध्याः पराञ्चम् " - इति ॥

( तै ० ब्रा ० २।२1१० ) [ २ ९ ३

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्म इसी चौथे आपोलोक के लिए- ' श्रस्ति वै चतुर्थी देवलोक प्राप: ' ( कौ ० ब्रा ० १८।२ ) यह कहा जाता यूप में रहता है, इसलिए है । बस इस यूप में इन्हीं चारों लोकों की कल्पना की गई है । पितृप्रारण निखात को तो पितृलोक कहा है एवं मनुष्य अन्तरिक्ष में रहते हैं, अतएव निखात से रशना तक के स्थान को मनुष्यलोक कहा है । देवता द्युलोक में रहते हैं श्रतएव रशना से चषाल तक के स्थान को द्युलोक कहा है । साध्यलोक द्युलोक से भी ऊपर है, अतः चषाल से ऊपर अवशिष्ट दो - तीन अंगुल स्थान को साध्यलोक कहा गया है । इस प्रकार चतुर्लोक - सम्पत्ति युक्त यूपनिधान से यह यजमान चारों लोकों की सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है । निखात से पितृलोक को प्राप्त कर लेता है । निखात से रशना -पर्य्यन्त स्थान तक मनुष्यलोक में अपनी सत्ता जमा लेता है । एवं रशना से चषाल तक के स्थान से द्युलोक को जीत लेता है । एवं चषाल से ऊपर बाकी बचे दो - तीन अंगुल स्थान से साध्य देवताओं के लोक पर अपना कब्जा कर लेता है । इस प्रकार निखात, रशना, चषाल, द्व्यङ्गुल स्थान- इन चारों से चारों लोकों को अपने अधिकार में कर लेता है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो यज्ञ करता है, उसे तो पूर्वोक्त फल मिलता ही है, परन्तु जो इस चतुर्लोक - विज्ञान को जानता है वह भी साध्य देवताओं के साथ सलोकता को प्राप्त हो जाता है, प्रर्थात् उसे सालोक्य मुक्ति प्राप्त होती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" ' तस्य ( यूपस्य ) यन्निखातं तेन पितृलोकं जयति । अथ यदूर्ध्व निखा-तात् - आरशनायै ( रशनायाः ) तेन मनुष्यलोकं जयति । अथ यदूर्ध्वं रशनाया श्राचषालात्तेन देवलोकं जयति । अथ यदूर्ध्व चषालाद् द्व्यङ्गुलं वा त्र्यङ्गुलं वा साध्या इति देवा: - तेन ( द्व्यङ्गुलस्थानेन ) तेषां लोकं जयति । सलोको ह वै साध्यैर्देवैर्भवति य एवमेतद् वेद " ॥ २५ ॥

गार्हपत्य से यूप- पर्यन्त वितत जो यह यज्ञ है, उसमें पूर्वार्द्ध और पश्चिमार्द्ध - ये दो भाग हैं । गार्हपत्य से धिय तक पश्चिमार्द्ध है, एवं धिष्ण्य से उत्तरावेदि तक पूर्वार्द्ध है । इस यूप को यज्ञ के इस पूर्वार्द्ध में ही गाड़ते हैं । वस्तुतः देखा जाए तो यज्ञ प्राहुति का नाम है । आहुति होती है उत्तरावेदिस्थ । श्राहवनीय अग्नि में । अतः पूर्वार्द्ध पश्चिमार्द्ध का व्यवस्थापक - ग्राहवनीय को ही समझना चाहिए ग्राहवनीय से पूर्व का हिस्सा यज्ञ का पूर्वार्द्ध है एवं आहवनीय से पश्चिम का हिस्सा यज्ञ का पश्चिमार्द्ध है । इन दोनों स्थानों में से यूप को इस यज्ञ के पूर्वार्द्ध में प्रर्थात् आहवनीय से पूर्व में ही गाड़ना चाहिए । यूप को यज्ञ के पूर्वार्द्ध में ही क्यों गाड़ना चाहिए क्यों न उसे पश्विमार्द्ध में ही गाड़ दिया जाए - इसकी उपपत्ति बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-यह जो यूप है वह वज्र है । यह यूप सूर्य्य स्थानापन्न है । सूर्य्य तमोमय श्रासुरप्राण के विनाश हेतु वास्तव में वज्र है । श्रतएव इस यूप को हम वज्र कहने के लिए तय्यार हैं । वज्र से प्रहार ' होता दण्ड ' है । चूंकि दण्ड से भी प्रहार ही किया जाता है, अतएव प्रहार साधर्म्यात् हम इस यूप - वज्र को कर ही कह सकते हैं । शत्रु पर जिस समय दण्ड प्रहार किया जाता है तो उसके पूर्वार्द्ध भाग को पकड़ [ २६४ ]