Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 311–320
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 311–320
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तृतीय काण्ड ( ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मणै प्रहार किया जाता है । लकड़ी जब भी चलाई जाती है, उसका पूर्व भाग पकड़ कर ही चलाई जाती है । चूंकि यह यूप व दण्ड है, दण्ड प्रहार पूर्वार्द्ध से होता है, एवं आहवनीय के पूर्व का हिस्सा यज्ञ का पूर्वार्द्ध है, प्रतएव वहीं इसे गाड़ा जाता है । यूप- वज्र - रूपी दण्ड को यज्ञ के पूर्वार्द्ध में खड़ा करना दण्ड को पूर्वार्द्ध से पकड़ कर उसे असुरों पर चलाना है । तात्पर्य यही है कि लोक में शत्रु पर जब दण्ड से प्रहार किया जाता है तो दण्ड के पूर्व के हिस्से को पकड़ कर ही किया जाता है । प्रकृत में यह यूप असुरों के लिए वज्र है | चूँकि वज्र को पूर्व की ओर से पकड़ कर चलाया जाता है, अतः श्राहवनीय के पूर्वार्द्ध में ही इसको खड़ा करना उचित है । वहाँ खड़ा करना - यूप- वज्र के पूर्व भाग को पकड़ कर उसका श्रसुरों पर प्रहार करना है । बस, यज्ञ के पूर्वार्द्ध में ही यूप क्यों खड़ा किया जाता है? - इसकी यही लौकिक उपपत्ति है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तं वै पूर्वार्द्ध मिनोति । वज्ञो वै यूपः । वज्जो दण्डः । पूर्वार्द्ध वै दण्ड-स्याभिपद्य प्रहरति । पूर्वार्द्ध एष यज्ञस्य । तस्मात् पूर्वार्द्ध मिनोति " ॥२६ ॥
यज्ञ के पूर्वार्द्ध में ही अर्थात् आहवनीय से पूर्व भाग में ही यूप क्यों खड़ा करना चाहिए? - इसकी एक उपपत्ति बतला दी गई । अब दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं-इस यज्ञ द्वारा देवतानों ने ( प्राण- देवताओं ने और भौमस्वर्गवासी देवताओं ने ) इस जिति ( विजय ) को प्राप्त किया जिससे उनकी जिति आज संसार में दीख रही है । इसी अग्नीषोमात्मक यज्ञ के प्रभाव से सारी रोदसी त्रिलोकी में उन्हीं सौर- देवताओं का अधिपत्य हो रहा है, एवं इसी यज्ञ के प्रभाव से भौम - देवताओं ने सारी भुवनत्रिलोकी को अपने कब्जे में कर रक्खा था । जब देवताओं ने यज्ञ-द्वारा सारी विभूति पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन्होंने परस्पर सलाह की कि यज्ञ मर्यादा की प्रतिष्ठित करने के लिए अपन ऐसा कौन सा उपाय करें, जिससे यह यज्ञ सामान्य मनुष्यों से अध्यारोह्य हो जाय, अर्थात् सामान्य मनुष्य इस यज्ञ - विद्या को न पहचान सकें, कोई ऐसी तरकीब सोचनी चाहिए । यह विचार कर मनुष्यों की दृष्टि से यज्ञ - विद्या को छुपाने के लिए देवताओं ने ( उभयविध देवताओं ने ) यज्ञ के तत्त्व भाग को चूस कर जैसे मधुमक्षिका पुष्पों में से मधु को चूम लेती है, इस प्रकार यज्ञ के सार भाग का दोहन कर लिया एवं यूप से उस यज्ञतत्त्व को छुपा कर स्वयं तिरोहित हो गए । चूंकि इस ( सूर्य्य और काष्ठ यूप ) से देवताओं ने इस यज्ञ का योपन किया - यज्ञ को छुपाया - प्रतएव योपन - साधनत्वात् इसका नाम यूप हो गया । कैसे छुपाया? प्रकृति - यज्ञ का यूप कौन सा है? इत्यादि विषयों की विस्तृत उपपत्ति पूर्व के ब्राह्मणों में बतला दी गई है । इस प्रकार देवता यूप से यज्ञ को छुपा कर स्वयं तिरोहित हो गए । इस सारे रहस्य का वैज्ञानिक महर्षियों को इस यूप द्वारा ही पता चला था । देवताओं ने अन्य यज्ञ-सामग्री तो नष्ट - भ्रष्ट कर दी थी, छोड़ा था तो केवल यही यूप । इसी यूप से ऋषियों ने यज्ञ - रहस्य को पहचाना । यूप ही यज्ञ का प्रज्ञापर्क बना । हम जितने भी काम करते हैं, उनमें मन, प्राण, वाक् तीन ही तत्त्व काम करते हैं । सबसे पहले प्रज्ञा व्यापार होता है अर्थात् मनोव्यापार होता है । बाद में प्रारण व्यापार ( प्रयत्न ) होता है, बाद में वाग् व्यापार ( भूत - व्यापार ) होता है । इन तीनों में सबसे पहला नम्बर [ २६५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण प्रज्ञा का है, मनोजव का है । यदि इच्छा नहीं है, मनोजव नहीं है, तो कोशिश नहीं है । कोशिश नहीं है तो वाग्व्यापार नहीं है । तीनों में अग्रणी प्रज्ञा व्यापार ही है । सबसे पूर्व में, सबसे पहले, प्रज्ञा - व्यापार होता है । महर्षियों ने यूप से ही यज्ञ को पहचाना । यूप ही प्रज्ञापक बना । चूंकि प्रज्ञा - प्रारण वाक् तीनों में पहले प्रज्ञा - व्यापार होता है, एवं यूप यज्ञसम्बन्धिनी प्रज्ञा का साधन बना अर्थात् यूप को देख कर ही मन में - प्रज्ञा में - यज्ञरहस्य जानने की इच्छा हुई प्रतएव इस यूप को यज्ञ के ( श्राहवनीय के ) पूर्वार्द्ध में खड़ा करते हैं । देवताओं से आच्छादित यूप ही यज्ञ का प्रज्ञापक बना, इसीलिए तैत्तिरीय श्रुति कहती है. I " यज्ञेन वै देवाः सुवर्ग लोकमायन् तेऽमन्यन्त - मनुष्या नोऽन्वाभविष्य-न्तीति । ते यूपेन योपयित्वा सुवर्गं लोकमायन् तमृषयो यूपेनैवानु प्राजानन् । तद् यूपस्य यूपत्वम् " । ( तै ० सं ० ६।३।४।७ ) तात्पर्य यही है कि यह यूप ही यज्ञ का प्रज्ञापक बना यज्ञ - विद्या को जानने की प्रज्ञा इसी यप ने उत्पन्न की । प्रज्ञा प्रारण वाक् व्यापार के पूर्व में होती है । इस पूर्वभाविनी प्रज्ञा का साधक यूप था, अतएव इसे पूर्व में ही खड़ा करने की पद्धति चल पड़ी । पूर्वभाविनी प्रज्ञा को उत्पन्न करने के कारण यूप ' को यज्ञ के पूर्वार्द्ध में गाड़ा जाता है । यज्ञ के पूर्वार्द्ध में ही यूप क्यों खड़ा किया जाता है - इसकी यही दूसरी उपपत्ति है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यज्ञेन वै देवा इमां जिति जिग्युर्येषामियं जितिः । ते होचुः - कथं न इदं मनुष्यैरनभ्यारोह्यं स्यात् इति । ते यज्ञस्य रसं धीत्वा - यथा मधु मधुकृतो निर्धयेयुः - विदुद्य यज्ञं यूपेन योपयित्वा तिरोऽभवन् अथ यदेनेनायोपयन् - तस्माद्यूपो
नाम । पुरस्ताद् वै प्रज्ञा । पुरस्तान्मनोजवः । तस्मात् पूर्वार्द्ध मिनोति ॥२७ ॥
यूप को पूर्वार्द्ध में ही क्यों गाड़ना चाहिए? इसकी उपपत्ति बतला दी गई । अब वह यूप कितनी अश्रियों का होना चाहिए - यह बतलाते हैं—-वह यूप प्रष्टाश्री होता है अर्थात् यू ग्रठपहलू होना चाहिए । गायत्री अष्टाक्षरा है एवं प्रकृति यज्ञ का अष्टाक्षरा गायत्री छन्द पूर्वार्द्ध है । चूँकि यह यूप पूर्वार्द्ध में खड़े होने के कारण यज्ञ का पूर्वार्द्ध है - प्रतएव यह अठपहलू ही होना चाहिए । सौर - तेज का नाम गायत्री है, यह अष्टाक्षरा है । पूर्व में रहता है, अतएव हम गायत्री को पूर्वार्द्ध कहने के लिए तय्यार हैं । चूंकि यूप इस मनुष्य यज्ञ का पूर्वार्द्ध है, प्रकृति - यज्ञ का पूर्वार्द्ध गायत्री है - वह अष्टाक्षरा है; प्रतएव प्रकृतिवत् यज्ञ के पूर्वार्द्ध यूप को मठपहलू ही बनाना चाहिए । -" स वा अष्टाश्रिर्भवति । श्रष्टाक्षरा वै गायत्री । पूर्वार्द्धा वै यज्ञस्थ
गायत्री । पूर्वार्द्ध एष ( यूपः ) यज्ञस्य । तस्मादष्टाश्रिर्भवति ॥ २८ ॥
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1 तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपनिधान ब्राह्मण अध्वर्यु द्वारा यज्ञ करने एवं देवताओं का आह्वान करने से देवता प्रसन्न हो जाते हैं । इसके फल-स्वरूप यूप में दैवी शक्तियों का आविर्भाव हो जाता है और यूप की रक्षा का भार देवता वहन कर लेते हैं । यज्ञ में जो अनुप्रहरण किया जाता है, वह देवताओं द्वारा ही किया जाता है । क्योंकि असुर सोम-म अमृत को पीना चाहते हैं, अत: अनुप्रहरण द्वारा उन्हें भगाया जाता है । देवतानों के अनुग्रह से, यूप में दैवी शक्तियों का प्रवेश हो जाता है जिससे यह यूप पुनः प्रकृति - यज्ञ में अपने स्वकीय मूल स्वरूप-वज्रको - जिसका कि यह मानुष यज्ञ में प्रतीक है - पुनः प्राप्त हो जाता है । यूप- शकल की प्राहुति से नाष्ट्रा प्राण नष्ट हो जाते हैं और असुरों को इसमें प्रवेश करने का दुःसाहस नहीं होता ॥ २६-३२ ॥ ॥ इति यूपनिधान ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ २६७ ]
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सप्तमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' यूपैकादशिनी ब्राह्मणम् ' [ मूल ] यावती वै वेदिस्तावती पृथिवी । वज्रा वै यूपास्तदिमामेवैत-पृथिवीमेतैर्वः स्पृणुतेऽस्यै सपत्नान्निर्भजति तस्माद्यूपैकादशिनी भवति द्वादश उपशयो भवति वितष्टस्तं दक्षिणतः उपनिदधाति तद्यद्द्द्वादश उपशयो भवति ॥ १ ॥
देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गाद्विभयाञ्चक्रुस्तद्य-Seas उच्छ्रिता यथेषुरस्ता तया वै स्तृणुते वा न वा स्तृणुते यथा दण्डः प्रहृतस्तेन वै स्तृणुते वा न वा स्तृणुतेऽथ यएष द्वादश उपशयो भवति यथेषुरायतानस्ता प्रहृतमेवमेष वज्र ऽउद्यतो दक्षिणतो नाष्ट्राणां रक्षसामपहत्यै तस्माद्-द्वादश उपशयो भवति || २ || तं निदधाति । एष ते पृथिव्यां लोक प्रारण्यस्ते पशुरिति पशुश्च वै यूपश्च तदस्माऽश्रारण्यमेव पशूनामनुदिशति तेनोऽएष पशुमान्भवति तद् द्वयं पूपै-कादशिन्यै सम्मयनमाहुः श्वः सुत्यायै ह न्वेवैके सम्मिन्वन्ति प्रकुन्द्रतायै ' चैव श्वः: सुत्यायै यूपं मिन्वन्तीत्यु च ॥३ ॥
तदु तथा न कुर्यात् । अग्निष्ठमेवोच्छ्रयेदिदं वै यूपमुच्छ्रित्वाध्वर्युरापरि-व्ययरणान्नान्वर्जत्य परिवीता वाडएतऽएतां रात्रि वसन्ति सा न्वेव परिचक्षा पशवे वै यूपमुच्छ्रयन्ति प्रातर्वे पशूनालभन्ते तस्मादु प्रातरेवोच्छ्रयेत् ॥ ४ ॥
सय उत्तरोग्निष्ठात्स्यात् । तमेवाग्रऽउच्छ्रयेदथ दक्षिणमथोत्तरं दक्षि-णामुत्तमं तथोदीची भवति || ५ || १ - ' ककुब्रतायै ' इति जर्मनी पुस्तके, ' ककुब्व्रतायै ' इति जयपुरीय पुस्तके, ' ककुन्द्रतायै ' इति वैदिकपाठ-पुस्तके पाठः अस्य शब्दस्यार्थस्तु न ज्ञायते । ( उक्त टिप्पणी सायणभाष्य द्वितीय भाग के आधार पर लगाई गई हैं - स ० ) । [ २६६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण थो ss तरथाहुः । दक्षिणमेवाग्रेऽग्निष्ठा दुच्छ्रयेदथोत्तरमथ दक्षिणमुत्तरा-मुत्तमं तथो हास्योदगेव कर्मानुसन्तिष्ठतऽइति ॥ ६ ॥
स यो वषिष्ठः स दक्षिणार्ध्यः स्यात् । प्रथ हसीयानथ हसीयानुत्तरा -र्थ्यो ह्रसिष्ठस्तथोदीची भवति ॥७ ॥
अथ पत्नीभ्यः पत्नी पमुच्छ्रयन्ति । सर्वत्वाय न्वेव पत्नीयूप उच्छ्रीयते तत्वाष्ट्रं पशुमालभते त्वष्टा वै सिक्तं रेतो विकरोति तदेष एवैतत्सिक्तं रेतो विकरोति मुकरो भवत्येष वै प्रजनयिता यन्मुष्करस्तस्मान्मुष्करो भवति तन्न संस्थापयेत्पर्यग्निकृतमेवोत्सृजेत्स यत्संस्थापयेत्प्रजायै हान्तमियात्तत्प्रजामुत्सृजति तस्मान संस्थापयेत्पर्यग्निकृतमेवोत्सृजेत् ॥८ ॥
[ [ अनुवाद ] जिस यज्ञ में पशु का प्रलम्भन होता है, उस यज्ञ में यूप अवश्य गाड़ा जाता है, क्योंकि पशु और यूप दोनों अविनाभूत हैं । एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता । अग्निष्टोम नामक सोमयाग में पशु का आलम्भन होता है । अतः इस याग में यूप गाड़ना आवश्यक है । यज्ञ में यूपों की संख्या पशु संख्या पर निर्भर है । अर्थात् जितने पशुओं का श्रालम्भन यज्ञ में किया जाता है उतने ही यूप गाड़ने पड़ते हैं । इस अग्निष्टोम नामक सोम-यज्ञ में ११ पशुओं का प्रलम्भन किया जाता है अतः इस भाग में ११ यूप गाड़े जाते हैं । इस अग्निष्टोम में जिन पशुओं का प्रलम्भन किया जाता है उन्हें स्तोमायन पशु कहा जाता है । पृथिवी से सूर्य तक अर्थात् २१ वें स्तोम तक प्राकृतिक यज्ञ वितत रहता है । २१ वें स्तोम पर अग्नि यज्ञ की समाप्ति हो जाती है । यज्ञ से यज्ञिय देवता अभिप्रेत हैं । २१ वें स्तोम तक जहाँ पर कि यज्ञ की समाप्ति होती है ३३ यज्ञिय देवताओं की स्थिति है, जिन में वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य तथा २ अश्विनीकुमार रूप साध्य- देवता हैं, जैसा कि निम्नलिखित ऋक् श्रुति बतला रही है-" इति स्तुतासो असा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिंशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " इति । वाल्मीकीय रामायण में भी - ' आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परनाप ' । इस श्लोक के द्वारा ३३ देवताओं की स्थिति बतलाई गई है । इस तरह देवता के विभाग से आग्नेय यज्ञिय देवता ३३ हैं । किन्तु स्तोम के विभाग से सूर्य तक २१ ही स्तोम हैं । पृथिवी से एक-विशस्तोमस्थ सूर्य तक पशु - प्रारण भी वितत रहता है । यह पशु - प्राण ११ संस्थानों में विभक्त है । पृथिवी से सूर्य तक वितत पुरुष - अश्व - गो- अवि - ज भेद से पाँचों पशु - प्रारण ११ स्तोमों विभक्त हैं । पुरुष से वैश्वानराग्नि प्रारण अभिप्रेत है । यह वैश्वानर प्रारण पृथिवी से सूर्य तक व्याप्त रहता है । इसीलिए -[ ३०० ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण " वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः । तो जातो विश्वमिदं विचष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ " ( ऋ. ११६८ । १ ) श्रुतियाँ पृथिवी से सूर्य तक वैश्वानर - प्रारण की व्याप्ति तथा उसका सूर्य से सङ्गम बतला रही हैं । इस वैश्वानरप्राण से मनुष्यों का शरीर बनता है । सोमयाग से यजमान का दिव्यात्मा उत्पन्न किया जाता है । यह दिव्यात्मा १७ वें स्तोम से स्वर्ग - स्थान से बद्ध रहता है । इस दिव्यात्मा के स्वर्ग में जाने के समय पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज, प्रारण उस दिव्यात्मा के मार्ग का अवरोध करते हैं । अतः पाँचों प्राणों से जिन का शरीर बनता है उन पशुओं का आलम्भन कर उन प्राणों को आत्मसात् किया जाता है । वे प्रारण दिव्यात्मा के सजातीय बन कर उसके मार्ग का अवरोध नहीं करते । अतः इन पाँचों प्राणों को आत्मसात् करने के लिए इन प्राणों से निम्मित शरीर - नर, अश्व, गो, अवि, अज इन पाँचों पशुओं का आलम्भन कर उनकी अग्नि में आहुति दी जाती है । इन्हें ही नर-मेघ, अश्वमेध, गोमेध, अविमेध व अजमेध यज्ञ कहते है । इन पाँचों प्राणों में पुरुष, अश्व व गो इन तीनों पशुओंों का सूर्य से साक्षात् सम्बन्ध है । प्रवि और अज दोनों सूर्य के प्रवर्ग्य पशु हैं । सूर्य से साक्षात् अग्नि वाला जो प्रवर्ग्य पशु है उसे अवि कहते हैं । वृक्षों में हरितवर्ण इसी प्रविप्रारण की महिमा है । किन्तु सूर्य का जो पशु - प्रारण प्रवर्ग्य ( पृथक् ) होकर पृथिवी की वस्तु बन जाता है, उससे अज पशु का स्वरूप बनता है । अर्थात् साक्षात् सावित्र अग्नि का नाम अवि है तथा जो सावित्र अग्नि पृथिवी में आ कर पृथिवी की वस्तु बन जाता है उस से पार्थिव प्रारण से सम्पन्न हो कर जो सावित्राग्नि गायत्राग्नि बन जाता है उस से अजं पशु बनता है । अज को इसीलिए अग्निय पशु कहा जाता है कि पार्थिव गायत्राग्नि से अज का निर्माण होता है । अर्थात् पृथिवी से निकलने वाला गायत्र प्रारण अपनी ग्यारह संस्था बना कर पृथिवी से सूर्य तक व्याप्त रहता है । गायत्र प्रारण की ये ग्यारह संस्थाएँ ही ११ रुद्र प्राण हैं । ये एकादशधा विभक्त रुद्र ही पशुओं के देवता हैं । अतः रुद्र को पशुपति कहा जाता है । ये ११ गायत्र प्रारण तथा उस से निर्मित ११ शरीर अजपशु, आग्नेय, सारस्वत, सौम्य, पौष्ण, बार्हस्पत्य, वैश्वदेव, ऐन्द्रमारुत, ऐन्द्राग्न, सावित्र व वारुरण इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन ११ अपशुओं को बाँधने के लिए, जिनका कि सोम याग में श्रालम्भन किया जाने वाला है, ११ यूप सोमयाग में गाड़े जाते हैं । इसी रहस्य का प्रतिपादन इस यूपैकादशिनी ब्राह्मण में किया जा रहा है - क्यों कि पशु, बिना यूप के नहीं रहता । श्रतः प्रत्येक पशु के लिए १ यूप की आवश्यकता है । अतः ११ पशुओं के लिए ११ यूप बनाने और गाड़ने चाहिएँ । भगवान् याज्ञवल्क्य ११ यूप बनाने की अन्य उपपत्तियाँ बतलाने के लिए कहते हैं --' यावती व वेदस्तावती पृथिवी ' इति । श्रर्थात् जितनी यह सोमयाग की महावेदि है उतनी ही पृथिवी है । अर्थात् वेदि ( महावेदि ) का अन्त पृथिवी का अन्त है । इसी अभिप्राय से वेद भगवान् ने कहा है- ' इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या: ' ( ऋ ० १ । १६४ । ३५ ) । [ ३०१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपैकादशिनी ब्राह्मण ' इम् ' पद से इस महावेदि का अगुलि से निर्देश करते हुए वेद भगवान् महावेदि पृथिवी का अन्त बतला रहे हैं । महावेदि का वितान पृथिवी - पिण्ड से सूर्य तक रहता है । प्राकृतिक सोमयाग में पृथिवी - पिण्ड इसका गार्हपत्य है । प्रान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि दक्षिणाग्नि है तथा सप्तदश स्तोमस्थ अग्नि ग्राहवनीय है | एकविंश अहर्गण या स्तोम पर स्थित सूर्य ही यूप है । इस प्रकार महावेदि एकविंश अहर्गण तक है । वहीं तक पृथिवी की सत्ता है । ' यावती व वेदिस्तावती पृथिवी ' इस वचन में पृथिवी शब्द से पृथिवीपिण्ड का ग्रहण नहीं है afi frustrat के केन्द्र से निकल कर एकविंशस्थ सूर्य तक व्याप्त अमृताग्नि रूप पृथिवी का ग्रहण है । प्राकृतिक सोमयाग की महावेदि को लक्ष्य कर ' यावती वै वेदिस्तावती पृथिवी ' यह कहा गया है - जैसे उपासना में दृष्टि मूर्ति पर रहती है किन्तु भावना त्रैलोक्य व्यापक ईश्वर की रहती है । इस पृथिवी पर जो ११ यूप गाड़े जाते हैं वे वज्र - रूप हैं । श्राग्नेय अस्त्र वत्र कहलाता है । यह वज्र आय व तमोमय असुरों को नष्ट करने वाला है । प्रकृति में पृथिवीपिण्ड से एकविंशस्थ सूर्य तक अर्थात् महावेदि तक ११ अग्नि संस्थाएँ हैं । ये अग्नियाँ ही तमोमय असुरों का नाश करती हैं । अन्यथा तमोमय असुर पृथिवी को व्याप्त कर लेते तथा सर्वत्र १ अन्धकार छा जाता । इन ११ अग्नि संस्थानों में १ गार्हपत्याग्नि, ८ धिष्ण्याग्नियाँ, आहवनीयाग्नि तथा ११ वाँ एकविशस्थ सूर्य है । प्राकृतिक यज्ञ में गार्हपत्य - रूप पिण्डपृथिवी से लेकर सूर्य तक जो ११ अग्नियाँ हैं, वे यूप हैं । मनुष्ययज्ञ में इन ११ अग्नियों के स्थान में ११ ग्रुप खड़े किये जाते हैं । ११ यूपों के कारण यह महावेदिरूपा पृथिवी यूपैकादशिनी कह-लाती है । इन ११ यूपों के अतिरिक्त १ बारहवाँ यूप और है जो दक्षिण की ओर भूमि में गड़ा रहता है । इसे इन ११ यूपों के पास भूमि में शयन करने के कारण अर्थात् गड़ा रहने होता के कारण उपशय कहा जाता है । यह यूप भी काष्ठ को छील कर सुपरिष्कृत किया हुआ सोम-है । भूमि में गड़ा हुआ यह बारहवाँ यूप क्यों रखा जाता है, इस का कारण प्राकृतिक याग है । प्राकृतिक सोमयाग में गार्हपत्याग्नि से लेकर १ सूर्य तक ११ जो यूप हैं वे पृथिवी पर तमोमय असुरों के नाश के लिए वज्र हैं । किन्तु पृथिवीपिण्ड से बाहर निकली हुई नयाँ प्रक्षिप्त होकर धीरे - धीरे गतसार हो जाती हैं । अतः बाद में असुरों का नाश नहीं कर सकेंगी और पृथिवी पुनः तमोमय असुरों से व्याप्त हो जाएगी । किन्तु में पिण्डरूप परिणत पृथिवी में जो अमृताग्नि है वह प्रक्षिप्त है और बाहर निकल कर इन ११ अग्नियों हो कर निरन्तर तमोमय असुरों का नाश करती रहती है । प्राकृतिक सोमयाग में पृथिवीपिण्ड के गर्भ में स्थित यह अमृताग्नि ही उपशय एवं १२ वीं अग्नि है । उसी प्रकार इस मानुषयज्ञ में भी ११ यूप पृथिवी - गर्भ से बाहर निकल जाने के कारण प्रक्षिप्त हो चुके हैं । अतः पृथिवी गर्भस्थ पर तमोमय असुरों के निरन्तर नाश के लिए १२ वाँ भूमि में गड़ा हुप्रा यूप पृथिवी -प्राकृतिक अग्नि की प्रतिकृति पर गाड़ा जाता है । यह दक्षिण में इसलिए गाड़ा जाता है कि प्रकृति में अग्नि का स्थान दक्षिण दिशा ही है ॥ १ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण यज्ञ का वितान करते हुए देवता - असुर व राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गए कि कहीं ये असुर यज्ञ का विध्वंस न कर डालें । अतः उन्होंने इन वज्ररूप यूपों को ऊँचा उठाया संभव है कि छोड़ा हुआ बारण निशाने पर लगे या न लगे तथा हाथ से किया हुआ दण्ड- प्रहार निशाने पर लगे या न लगे । अतः बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह एक बार में सारे बाण न फेंके अपितु कुछ बार चढ़ा कर, तीक्ष्ण कर, सुरक्षित रखे; जिससे पहले चलाये हुए बाग के व्यर्थ चले जाने पर दूसरे से काम ले सके । इसलिए देवताओं ने एक वज्र रूप तय्यार व परिष्कृत कर भूमि में गाड़ दिया जिससे समय पर वह काम आए । प्रकृति में जिस प्रकार गार्हपत्यादि ११ अग्नियाँ पृथिव्यादि तीनों लोकों में तमोमय असुरों के विनाश के लिए सदा प्रत्यक्ष रूप से व्याप्त रहती हैं, उसी प्रकार पिण्डपृथिवीस्थ प्राणरूप अमृताग्नि भूमि में सोता रहता है । असुरों का त्रैलोक्य में प्रवेश उत्तरदिक्स्थ सूर्य के मार्ग से तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रज्वलित सूर्य- रश्मियाँ उनको प्रवेश नहीं पाने देती । असुरों के आक्रमण का मार्ग पृथिवी का पृष्ठभाग ही है । अतः प्राणदेवताओं ने उधर से प्राक्रमरण करने वाले असुरों के प्रतिकार के लिए अग्नि को पृथिवी में दक्षिण दिशा में उसके गर्भ में रक्खा है । इसी प्रकार मनुष्ययज्ञ में पृथिवी - पृष्ठ से आक्रमण करने वाले असुरों के विनाश के लिए भूमि में १२ वें यूपरूप वज्र को गाड़ रक्खा है । यही दक्षिण की ओर से प्राक्रमरण करने वाले असुरों का विनाशक है ॥ २ ॥
1 उस उपशयरूप १२ वें यूप को ' एष ते पृथिव्यां लोक आरण्यस्ते पशु: ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए भूमि में स्थापित कर दिया जाता है । अर्थात् हे उपशयरूप यूप 1 पृथिवी में तुम्हारा स्थान है और आरण्य तुम्हारा पशु है । १२ वें यूप के लिए आरण्य पशु का अनुदेश कर दिया गया है । प्रस्तुत वस्तु को आरण्य कहते हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है- ' पशुश्च वै यूपश्च तदस्मा ( उपशयाय ) आरण्यमेव पशूनामनुदिशति । तोष ( उपशयः ) पशुमान् भवति ' इति । इस प्रकार यूपैकादशिनी सम्पन्न हो जाती है । अर्थात् ११ यूप पृथिवी पर खड़े किये जाते हैं । इन ११ यूपों को भूमि में गाड़ने का जो दिन है, उस विषय में दो मत हैं । एक मत के अनुसार जिस दिन पशुओं का प्रलम्भन हो उसी दिन यूप गाड़ने चाहिए । दूसरे मत के अनुसार जिस दिन पशुनों का प्रलम्भन हो उस से एक दिन पूर्व यूप गाड़ने चाहिए । इन मतों में द्वितीय मत में भी याज्ञिकों में मतभेद हैं । कतिपय याज्ञिकों के अनुसार सुत्या से पूर्व दिन ही इन यूपों का भूमि में निखनन करना चाहिए । दूसरे याज्ञिकों का मत है कि सुत्या के दिन से पूर्व दिन ही निखनन किया जाय यह नियम सही नहीं है । सुत्या से पूर्व दो, तीन, चार दिन पूर्व भी सुविधानुसार यूपों का निखनन किया जा सकता है । सुत्या से पूर्व यूपों का निखनन करना चाहिए इतना ही नियम है किन्तु • सुत्या से पूर्व दिन ही निखनन करना यह नियम नहीं है ॥ ३ ॥
भगवान् याज्ञवल्क्य इन दोनों मतों का निराकरण करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । अर्थात् सभी यूपों का सुत्या से पूर्व निखनन नहीं करना चाहिए । किन्तु [ ३०३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण उत्तरावेदि के ठीक पूर्व में जो सर्वप्रधान अग्नीषोमीय पशु - बन्धनार्थ अग्निष्ठा नामक यूप है उसी का सुत्या से पूर्व निखनन करना चाहिए, न कि सभी यूपों का । क्यों कि यूप को खड़ा करके जब तक उस यूप के रस्सी नहीं लपेटी जाती तब तक अध्वर्यु उस यूप के स्पर्श से अलग नहीं हो सकता । श्रग्निष्ठा यूप को छोड़ कर अवशिष्ट यूपों में दूसरे दिन ही अर्थात् सुत्या के दिन ही रस्सी बाँधी जाती है । ऐसी स्थिति में अध्वर्यु उन दस यूपों के साथ अपने हाथ का स्पर्श कैसे रख सकता है? दूसरी बात यह है कि सभी यूपों का सुत्या से पूर्व निखनन किया जाएगा और अग्निष्टा को छोड़कर शेष दश यूपों में सुत्या के दिन रस्सी लपेटी जाएगी तो वे यूप रात्रि भर नग्न रहेंगे । रस्सी का लपेटना ही इन की नग्नता है और यह कार्य दूसरे दिन किया जाएगा तो ये १० यूप रात्रि भर नग्न ही रहेंगे । यह इन की निन्दा है । तीसरी बात यह है कि यूपों में रस्सी का लपेटना यज्ञीय पशुओंों के बाँधने के लिए है । पशु आलम्भन के दिन ही बाँधे जाते हैं । अतः जिस दिन पशुनों का आलम्भन किया जाए उसी दिन प्रातः काल यूपों को भूमि में खड़ा किया जाना चाहिए ॥ ४ ॥
निष्ठा यूप का निखनन व परिव्ययण सुत्या से पूर्व दिन हो चुका है । अब शेष १० हैं कि अग्निष्ठा यूप से यूपों को किस क्रम से खड़ा करना चाहिए इसको बतलाते हुए कहते उत्तर की ओर जो यूप है, पहले उसे खड़ा करना चाहिए; पश्चात् अग्निष्ठा से दक्षिण की ओर का यूप खड़ा करना चाहिए । इस प्रकार ऐसे क्रम से यूप खड़े रहने चाहिएँ जिस से दक्षिण की ओर का यूप सब यूपों के अन्त में आएँ क्यों कि सूर्य से पृथिवी में पशु आते हैं । सूर्य उत्तर में है और पृथिवी दक्षिरण में है । अतः सूर्य से पशुओं का उपक्रम है और पृथिवी में उनका उपसंहार है ॥ ५ ॥
पशु सूर्य ( उत्तर ) से पृथिवी ( दक्षिण ) में आते हैं । अतः पशुसम्बन्धेन उपर्युक्त क्रम समीचीन है कि अग्निष्ठा से दक्षिण में अन्तिम ग्रुप गाड़ा जाए । किन्तु यज्ञ सम्बन्ध से इस से विपरीत क्रम ही समुचित है । क्यों कि सोमयाग से उत्पन्न दिव्यात्मा दक्षिण ( पृथिवी ) से उत्तर ( सूर्य ) की ओर जाता है । अतः श्रग्निष्ठा से दक्षिण की ओर के यूप को खड़ा करे, पश्चात् उत्तर की ओर के यूप को । इस क्रम से अन्त में उत्तर की ओर ही यूप - निखनन का हो उपसंहार होता है । उत्तर की ओर ही स्वर्ग है । अतः दिव्यात्मा स्वर्ग में प्रतिष्ठित जाता है || ६ || ये यूप समान नहीं होते प्रपितु छोटे तथा बड़े होते हैं । अर्थात् उत्तरोत्तर छोटे होते हैं । अतः इन यूपों को सब से बड़े को प्रथम दक्षिण के अन्तिम छोर पर खड़ा करके पश्चात् उत्तरोत्तर छोटे यूपों को दक्षिण से उत्तर की ओर खड़ा करना चाहिए । ऐसा करने से यज्ञ उत्तरवेदि में आ जाता है । दक्षिण दिशा पितृदेवत्या है, उत्तर दिशा देवदेवत्या है । यदि • दक्षिण की ओर यूपों को नीचा रखा जाएगा तो यजमान का आत्मा पितृलोक में चला जाएगा । अर्थात् एक वर्ष के अन्दर यजमान मर जाएगा । एवं उस यजमान का यज्ञ देवदेवत्य [ ३०४ ]