Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 41–50

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण गया है- दक्षिण की ओर १५ विक्रम प्रक्रमण करता है एवं वहाँ पर शकु गाड़ देता है । यह इस वेदि की दक्षिण ( नितम्ब ) है । तात्पर्य्यं यही है कि इस अन्तःपात से दक्षिण दिशा की ओर १५ विक्रम ( ३० पद ) जा कर - १५ वें विक्रमान्त में कीला रोप देना चाहिए । यह वेदि की दक्षिण श्रौणि है— " तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । दक्षिणा ( शङ्कोर्दक्षिणात्ः ) पञ्चदश विक्रमान् प्रक्रामति तच्छङ्कं निहन्ति । सा दक्षिणा श्रोणि: ( शङ्कोर्दक्षिरणतः पञ्चदश विक्रमावसाने शकु स्थापयेत् इति भावः ) " ॥२ ॥

इसी प्रकार मध्य शङ्कु से - अन्तः पात से - उत्तर की ओर १५ विक्रम प्रक्रमण करता है एवं १५ वें विक्रमान्त में शकु गाड़ देता है । वह इस वेदि की उत्तरा श्रोणि ( नितम्बोपरि प्रदेश ) है । इस प्रकार वेदि का पश्चिम भाग दक्षिणोत्तर के मिलाने से ३० विक्रम का ( ६० पैंड का - ७२० अंगुल का ) हो जाता है--" तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । उदपञ्चदश विक्रमान् प्रक्रामति । तच्छ निहन्ति सोत्तरां श्रोणिः " ॥ ३ ॥

यह तो ' हुमा दक्षिणोत्तर विभाग - अब पूर्व की ओर चलिए । इसी मध्यम शङ्कु से पूर्व की ओर ३६ विक्रम ( ७२ पाँवडे ) तक प्रक्रमण करता है और वहाँ पर शकु गाड़ देता है । बस, यही इस वेदि का पूर्वार्द्ध है - मुख भाग है— " तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः प्राङ्क्षत्रिशतं विक्रमान् प्रक्रामति । तच्छकुं निहन्ति । स पूर्वार्द्ध: " ॥४ ॥

तदनन्तर इस ३६ वें विक्रम वाले शङ्कु से दक्षिण भाग की और १२ विक्रम प्रक्रमण करता है । एवं वहाँ पर शकु गाड़ देता है । बस, इस वेदि का यही दाहिना ' प्रंस ' है अर्थात् दाहिना कंधा है— “ तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । दक्षिणा द्वादश विक्रमान् प्रक्रामति । तच्छङ्कं निहन्ति । स दक्षिणोऽसः " ॥५ ॥

इसी मध्यम शकु से उत्तर की ओर १२ विक्रम प्रक्रमरण कर वहाँ शङ्कु गाड़ देता है । यही इस वेदिका बाँया कंधा है । श्रोणि से कन्धा कम होता है प्रतएव विक्रम कम कर दिए जाते हैं । जैसा कि याज्ञवल्क्य स्वयं बतलाएँगे । इस प्रकार श्रोणि ३० विक्रम की होती है - कंधे २४ विक्रम के होते हैं, का धड़ ३६ विक्रम का होता है - बस, वेदि का यही स्वरूप है— " तस्मान्मध्यमाच्छङ्कोः । उदद्वादश विक्रमान् प्रक्रामति । तच्छ

निहन्ति । स उत्तरोंसः । एषा मात्रा वेदे ” ॥६ ॥

" [ २३ ] 1

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उत्तरः महावेदिः अंसः १२ चा आग्नी-श्रीयः यूपावटयूप ( एकविंशः ) ( एषा मात्रा वेदे:) मध्यम शकुः | उत्तरवेदिः आहत-जीय -३६-अंस: १२ आहवनीयः सप्तदशः सदोमण्डप हविधानम् ४४ औदुम्बरी 2013 | दक्षिणाग्जि: माजीलीय अष्टोधिष्ण्या ग्नयः उत्तरा श्रेणिः १५ अन्तःशङ्खः पूर्वाध्यो वर्षिष्ठः १५ दक्षिणश्रेणिः हविवादः उद्‌गाताः आसनम् । ( आहवनीयD महावेदः गर्हिपत्यः आसनेम अजग आसनम् ब्रह्मान हकि होतृ-आसनमा वैदिः भिजमान आसमय गार्हपत्यः पन्ना-आसनय पश्चिमाध्यो पर्विष्ठः स्थूणराजः

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण वेदि के मध्य की जो पूर्वापर रोपा है उसका नाम शुल्व शास्त्रानुसार " पृष्ठ्य ' है । श्रोणि की नाप जिससे होती है उसका नाम - ' तिर्य्यङ्गामी ' है । इस प्रकार इनसे नाप कर वेदि बनाई जाती है । अब यहाँ पर पूर्वपक्ष होता है कि श्रोणि के लिए ३० विक्रम की क्या आवश्यकता है? १५ विक्रम दक्षिण - १५ विक्रम उत्तर- इस प्रकार ३० अंश की ही श्रोणि क्यों निम्मित की जाती है - इस प्रश्न का उत्तर देते हैं-" यत् ( यस्मात् कारणात् ) त्रिंशद् विक्रमा पश्चाद् भवति - ( तस्या कारण वक्ष्यामः इति शेषः ) " । विराट्छन्द ३० अक्षरों का होता है ( ऐत ब्रा. ४।१६ ) एवं इसी विराट्छन्द से देवता इस लोक प्रतिष्ठित हुए हैं । तथैव वेदि के पश्चाद भाग को विराट्छन्द - प्रमाणयुक्त करता हुआ यजमान इसी विराट् से इस लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है अतएव ३० विक्रम का ही पश्चाद् भाग किया जाता है— " अथ यत् त्रिशद् विक्रमा पश्चाद् भवति । त्रिशदक्षरा वे विराट् । विराजा वै देवाऽस्मिंल्लोके प्रत्यतिष्ठस्तथोऽएवैष एतद्विराजैवास्मिल्लोके प्रतितिष्ठति ॥७ ॥

१० अक्षर के छन्द का नाम विराट् है ' दशाक्षरा वै विराट् ' ( शत. १ | १ | १ | २२ ) । विराट् छन्द कुल ४ प्रकार का होता है - दशिनीविराट्, विशिनीविराट्, त्रिशिनीविराट्, चत्वारिंशिनीविराट् । ये चारों क्रमशः एकपदा, द्विपदा, त्रिपदा, चतुष्पदा कहलाती हैं । जो ४० प्रक्षर का विराट् छन्द होता है - उसे परमा विराट् कहते हैं ( ता ० महा ० ब्रा ० २४।१०।२ ) इसी विराट् के लिए ' सैषा चत्वारिंशिनी परमाविराट् ' कहा जाता है | चाहे कितने ही अक्षर का विराट् छन्द हो १० से विराट् का स्वरूप बन जाता है । जहाँ १० प्राणों का सम्बन्ध हुआ कि विराट् का स्वरूप उत्पन्न हुआ । १० प्राणों से विराट् कैसे उत्पन्न हो जाता है? यद्यपि इसका विस्तृत विवेचन प्रकृत में नहीं किया जा सकता, तथापि सूक्ष्मरूपेण इसका अर्थ बतलाना अनुचित न होगा । ' श्रात्मैवेदं सर्वम् ' - श्रुति कहती है- यह जो कुछ भी दृष्यमान् है - सब आत्मा ही आत्मा है । आत्मा-आनन्द - विज्ञान- मन - प्राण वाङ्मय है । इसका जो मन - प्रारण वाङ् यह आधा कर्म भाग है - इसीसे सारे विश्व की उत्पत्ति होती है । सृष्टि - साक्षी आत्मा मन, प्राण और वाङ्मय है । मुक्तिसाक्षी आत्मा श्रानन्द-विज्ञानमनोमय है । ' आत्मैवेदं सर्वम् ' इति ( छा ० उ ० ७।२५।२ ), ' बह्य वेदं सर्वम् ' ( नृसिहोत्तर ० उ०-ख ० ७ ) इत्यादि श्रुतियाँ आत्मा से सारे विश्व को उत्पन्न हुआ बतलाती हैं अतएव ऐसे स्थल में आत्मा और ब्रह्म से मन, प्राण एवं वाङ्मय सृष्टि - साक्षी आत्मा ही अभिप्रेत समझना चाहिए । इसी सृष्टि-रचना को लक्ष्य में रख कर ---" एतन्मयो वा s प्रयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः " | ( शत ० १४ | ४ | ३ | १० ) [ २५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण [ २६ ] वेदिनिर्माण ब्राह्मणं ( मनुस्मृति १/६ ) ( मनुस्मृति १1७ ) यह कहा जाता है । सर्व - बल - विशिष्ट रस का नाम परात्पर है । उसका जो थोड़ा सा प्रदेश महामाया से परिच्छिन्न हो जाता है - वही ' अव्यय ' पुरुष कहलाने लगता है । महामायावच्छिन्न जो शुद्ध रस है - वह निष्कल प्रजापति भी कहलाता है । इस निष्कल प्रजापति में काम - बल के कारण और-और कलाएँ उत्पन्न हो जाती हैं । वे कलाएँ आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण तथा वाक् नाम से व्यवहृत होती हैं । इनके कारण निष्कल पुरुष ' सकल ' हो जाता है । बस, इस सकल में जो मन, प्रारण तथा वाक् भाग हैं - उन्हीं से आगे की सारी सृष्टियाँ होती हैं । मन - प्रारण वाक् तीनों अविनाभूत हैं । जहाँ केवल प्राण का नाम लिया जाए, समझ लो वहां वाक् और मन दोनों मौजूद हैं । जहाँ मन का नाम लिया जाए, समझ लो, वहाँ प्रारण और वाक् दोनों हैं । जहाँ खाली वाक् कहा जाए, समझ लो प्रारण तथा मन दोनों मौजूद हैं । तीनों लाजिम - मलजूम हैं । तीनों अविनाभूत हैं । इस श्रात्म - प्रजापति का नाम ही स्वयंभू प्रजापति है । यह स्वयंभू है क्यों कि अपने आप प्रादुर्भूत हुआ है - इसे किसी ने उत्पन्न नहीं किया है । ' प्रासीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ' अर्थात् तम से ज्योतिरूप में यह स्वयम्भू प्रजापति उस तम को फाड़ता हुआ अपने आप उत्पन्न हुआ है प्रतएव इसे ' स्वयम्भू ' कहते हैं । जैसा कि मनु भगवान्

कहते हैं: -" ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् ।

महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः " ॥

" यो s सावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ।

सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयसुद्बभौ " ॥

इसी स्वयम्भू भगवान् से - जो कि मन, प्राण, तथा वाङ्मय है- सारी सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं । मानसी सृष्टि का नाम - प्राणसृष्टि है । मैथुनी सृष्टि का नाम - दैवत भौतिक सृष्टि है । इस स्वयम्भू प्रजापति से पहले - पहल मैथुनी सृष्टि से पूर्व, मानसी सृष्टि स्वरूप प्रारण उत्पन्न होते हैं । इन्हीं प्राणों को ' प्रक्षत् ' कहा जाता है । मैथुनी सृष्टि संयोग से उत्पन्न होती है अतएव उसे यौगिक कहा जाता है परन्तु प्राण- सृष्टि चूँकि असली है अतएव इस प्राण तत्त्व को मौलिक कहा जाता है । गन्ध - रस - रूप- स्पर्श-शब्द से रहित जो एक नीरूप तत्त्व है - उसी का नाम ' प्राण ' है । इसी प्राण को ' ऋषि ' कहा जाता है । ऋषि प्राण अनन्त हैं श्रतएव ' श्रनन्ता वै वेदा: ' ( तै ० ३।१०।११।३ ) कहा जाता है । इन प्राणों में कई प्राण तो सृष्टि करने वाले हैं, कई ब्रह्मचारी हैं । नारद, पर्वत, सनत् सनातन तथा कपिल इत्यादि अनेक ऋषि ब्रह्मचारी हैं । इनसे सृष्टि नहीं होती । एवं कितने ही ऋषि सृष्टिकर्त्ता हैं । ऐसे सृष्टि-कर्त्ता प्राण भी लाखों । इनमें भारतीय महर्षियों ने १० प्रारणों को पहचाना - प्रासुर महर्षियों ने दो प्राणों को पहचाना । इस प्रकार पृथिवी मण्डल भर में कुल १२ प्राणों को पहचाना गया है । उक्त १२ प्राण निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं- भृगु अङ्गिरा । अत्रि मरीचि । ऋतु दक्ष । वशिष्ठ अगस्त्य । पुलस्त्य - पुलह । कश्यप । विश्वामित्र । इनमें जो पुलस्त्य पुलह हैं - वे आसुर ऋषि हैं एवं ऋतु - दक्ष अध्यात्म से सम्बन्ध रखते हैं । इतना और समझ लेना चाहिए कि कश्यप और विश्वा

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण [ २७ 1 वेदिनिर्माण ब्राह्मण ( मनुस्मृति ( 18 ) और बल दोनों के होने के तत्त्व से उत्पादित पुरुष मित्र तो अलग - अलग रहते हैं - बाकी के १० प्राण जोड़ले ( जुड़वाँ युग्म ) हैं । पाँचों युग्म परस्पर विना-भूत हैं । भृगु - अङ्गिरा दोनों साथ रहते हैं । अत्रि - मरीचि दोनों साथ रहते हैं । ऋतु दक्ष दोनों साथ रहते हैं । पुलस्त्य और पुलह दोनों साथ रहते हैं । पाँचों युग्म संयुक्त हैं । प्राचीन संप्रदाय में यह नियम था कि जो जिस प्राण को पहचानता था एवं पहचान कर उसे प्रयोग में लाता था वह विद्वान् उसी प्राण-नाम से जाना गया है । बस, महर्षियों के जितने भी नाम सुने जाते हैं - वे सब यशोनाम ही समझने चाहिएँ । जिसने कश्यप प्राण को पहचाना, उसका नाम कश्यप हो गया । जिसने भृगु प्राण को पहचाना, वे भृगु हो गए । यह निदर्शनमात्र है - सभी नामों में यही बात समझनी चाहिए । चूँकि सृष्टिकर्त्ता १२ ऋषि - प्रारण पहचाने गए थे, अतएव भारतीय महर्षि भी कुल १२ ही माने जाते हैं । १२में से पुलस्त्य - पुलह दो असुर - दल में चले जाते हैं । इन दोनों के असुर - दल में चले जाने से वेदानुयाइयों के कुल १० प्राण ही रह जाते हैं अतएव " दश ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयंगताः " यह कहा जाता है । बस, इन १० प्राणों को ही भारतीयों ने पहचाना अतएव इस स्वयम्भू से १० प्राण उत्पन्न हुए हैं - हम यह कहने के लिए तैय्यार हैं । भगवान् मनु कहते हैं कि अनेक प्रकार की प्रजानों को उत्पन्न करने की इच्छा रखने वाले उस स्वयंभू ने सर्वप्रथम पानी उत्पन्न किया, तदनन्तर पानी में बीजारोपण किया । तात्पर्य यही है कि मायाबल के अनन्तर अव्यय में अशनायाबल उत्पन्न हुआ उस प्रशनाया बल के अर्क -व्यापार से सर्वप्रथम सौम्य पानी ही उत्पन्न हुआ । वह द्रवीभूत होकर पानी स्वरूप में परिणत हुआ । चूँकि उस अव्यय का स्वरूप रस - स्वरूप ही तो था वही पानी बना प्रतएव ' स्वात् शरीरात् ' कहा है । तदनन्तर उस पानी के पेट में एक वायुमय पिण्ड उत्पन्न हुआ । इसी वायुमय पिण्ड को पानी का बीज समझना चाहिए | उस आपोमण्डल में - वायुमय पिण्ड उत्पन्न हुआ जो कि अङ्गिरस था - यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से मनु कहते हैं-" सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुविविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादा तासु बीजमवासृजत् " ॥ ( मनुस्मृति १८ ) वह वायुमय बीज - रूप अण्ड, सूर्य्यसदृश प्रभायुक्त एवं सुनहरी रंग का हो गया । उस हिरण्य मण्डल के केन्द्र में सारी सृष्टियों के उत्पादक भगवान् ब्रह्मा स्वयं प्रादुर्भूत हुए अर्थात् जब प्रशनाया बल से वायुमय पिण्ड उत्पन्न गया - जो केन्द्र का वायु था वही सृष्टि - कर्तृत्व शक्ति युक्त होने के कारण ब्रह्मा कहलाया । अग्नि- परमाणु को, सुनहरी होने के कारण, हिरण्य कहते हैं । चूँकि यह वायु पिण्ड आग्नेय परमाणु युक्त है, अतएव इसके मण्डल को ' हिरण्य - मण्डल ' कहते हैं । इस हिरण्य - मण्डल के केन्द्रस्थ वायु से ही सारे विश्व की उत्पत्ति होती है - अतएव इसे ' हिरण्य- गर्भ ' ब्रह्मा कहा जाता है— " तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः " । जो कि अखिल विश्व का कारणभूत है - अव्यय है- नित्य है एवं रस कारण सदसदात्मक है - ऐसे इस कारणभूत सदसदात्मक, नित्य तथा अव्यक्त

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) वेदिनिर्माण ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " यत् तत् कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते " । ( मनुस्मृति १।११ )

" तपस्तप्त्वासृजद्यं तु स स्वयं पुरुषो विराट् ।

तं मां वित्तस्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः " ॥

( मनुस्मृति १।३३ ) " प्रशासितारं सर्वेषामरणीयांसमणोरपि । $ 1 [ २८ ] र्व ! : ३ ९ मृ ही इस ब्रह्माण्ड में ' ब्रह्मा ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । तात्पर्य यही है कि सर्वबल - विशिष्ट रस से उत्पन्न पानी के पेट में हिरण्यमय मण्डल का जो केन्द्रीय वायु है - चूँकि उसी से सारी सृष्टि होती है - अतएव उसे ब्रह्मा कहा जाता है-वह सर्वलोक पितामह - वायुमय ब्रह्मा अपने शरीर के दो खण्ड कर अपने आधे भाग से पुरुष -स्वरूप में तथा शेष आधे भाग से स्त्री - स्वरूप में परिणत हो गए । उस उत्पन्न स्त्री में उस पुरुष से -उस भगवान् ब्रह्मा ने विराट् नामक पुरुष को उत्पन्न किया । तात्पर्य यही है कि उस वायुमय ब्रह्मा के शनाया व्यापार से मायावच्छिन्न मण्डलस्थ अप - स्वरूप योषा - प्राण एवं रुक्ष, आग्नेय, हिरण्यमण्डल -स्वरूप वृषा - प्राण के मेल से एक चित्याग्नि पिण्ड पैदा हुआ - जिसे - ' विराट ' कहते हैं--" द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः " ॥ ( मनुस्मृति १/३२ ) उस विराट् पुरुष ने तपश्चर्या द्वारा जिसको पैदा किया उस उत्पन्न हुए मुझको, हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! इस संपूर्ण जगत् का उत्पन्न करने वाला समभो । तात्पय्यं यही है कि उस चित्या पिण्ड के श्रशनाया - व्यापार से जो कि ' चित्य विराट् ' कहलाता है - एक " चितेनिधेय अग्नि " उत्पन्न हुआ । इसी अमृताग्नि से जो कि " मनु " नाम से प्रख्यात है - आगे की सारी सृष्टियाँ होती हैं अतएव इस वैराज मनु को ' सर्वस्य स्रष्टारं ' कहा गया है--जो अखिल विश्व का शासन करने वाला है - जो कि अणु से भी अणु है - ऐसे उस पर - पुरुष को अर्थात् वैराज मनु को सुवर्ण सदृश कान्ति से युक्त मनोमात्रक गोचर ही समझना चाहिए । सूर्य्य का जो अमृताग्नि है - उसे हमने वैराज मनु बतलाया है । चूँकि अमृताग्नि का स्वरूप सुवर्ण के सदृश होता है अतएव वैराजमनु को " रुक्माभम् " कहा है । चूँकि सोर अमृताग्नि प्राणस्वरूप है- निराकार है - प्रनवरोधी है अतएव " स्वप्नधीगम्यम् " कहा है । oaari स्वप्नधगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ ( मनुस्मृति १२।१२२ ) इस " वैराज मनु " को अग्नि, मनु, प्रजापति, इन्द्र तथा नित्यब्रह्म इत्यादि कई नामों से व्यवहृत किया करते हैं । यह मनु प्रमृताग्नि - स्वरूप है इसलिए इसे अग्नि भी कह सकते हैं एवं चूँकि इससे

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण सारी प्रजा - उत्पन्न होती है अतएव इसे ' प्रजापति ' भी कह सकते हैं । द्वादश प्राण - समष्टि का नाम सूर्य्यपिण्ड है । १२ प्राणों में से एक का नाम " इन्द्र प्राण " है । सूर्य में जो ताप का हिस्सा है वह आग्नेय है एवं प्रकाश भाग ऐन्द्र है । इसीलिए तो ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति - इन्द्रो रूपाणि करीद-चरत् ' - यह कहा जाता है । इसी को लक्ष्य में रख कर वैराजमनु को इन्द्र भी कहा जाता है । चूँकि सूर्य्यं प्राणधन है इसीलिए इसे प्रारण भी कहा जाता है । अपिच चूँकि यह प्रमृताग्नि उसी सर्वबल-विशिष्ट रस - स्वरूप नित्य से ही उत्पन्न होता है - इस दृष्टि से हम इसे ' शाश्वत ब्रह्म ' भी कह सकते हैं--" एतमेके वदन्त्यग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् " | ( मनुस्मृति १२/१२३ ) हे ब्राह्मण श्रेष्ठो! प्रजा को उत्पन्न करने की इच्छा से तपश्चर्या कर मैंने प्रजानों के पति १० महर्षियों को उत्पन्न किया । तात्यय्र्य यही है कि उस मनु - प्रग्नि से - जो मन - प्राण वाङ्मय में प्राणस्वरूप है - १० ऋषि - प्राण उत्पन्न हुए-" हं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश " ॥ ( मनुस्मृति १३४ ) इन्हीं १० प्राणों से आगे की सारी मैथुनी सृष्टि होती है इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं-" एते मनूंस्तु सप्तान्यानसृजन्भूरितेजसः । देवान्देवनिकायांश्च महर्षीश्चामितौजसः " ॥ ( मनुस्मृति १।३६ ) पूर्वोक्त १० प्राण वैराज मनु से उत्पन्न हुए एवं इन दसों का केन्द्र वैराज मनु है 1 । वैराज मनु का केन्द्र विराट् है - प्रतएव परम्परा सम्बन्ध से इन १० को हम विराट् कह सकते हैं । बस इसीलिए विराट् छन्द को १० अक्षरों का कहा जाता है । सारे प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि स्वयम्भू - मण्डल में उत्पन्न होने वाली सारी मैथुनी सृष्टि के प्रवर्तक यही १० ऋषिप्रारण हैं । ये चूँकि मौलिक हैं अतएव इन्हें ' असत् ' कहा जाता है । स्वयम्भू - मण्डल में उत्पन्न होने वाले जो शुद्ध मौलिक प्राण हैं उन्हें ही हम ऋषि कहेंगे । इन ऋषि - प्रारणों के पञ्चीकरण से रासायनिक प्रक्रिया से जो प्राण उत्पन्न होते हैं वे पितर-प्रारण कहलाते हैं । १० प्राणों का जब १० प्राणों से मेल हो जाता है - तो पितर प्राण की उत्पत्ति होती है । भृगु में अवशिष्ट & प्राणों के मेल से जो प्रारण उत्पन्न होता है वह भृगु पितर कहलाता है । इसमें आधे भाग में तो भृगु प्रारण हैं तथा शेष प्राधे में 8 प्राण हैं । यही क्रम १० पितरों में समझना चाहिए । इन १० प्राणों के नाम वे ही रहते हैं जो कि ऋषियों के थे । पितर भी उसी नाम से व्यवहृत होते हैं! अतएव श्रुति कहती है--" अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः । तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम " ॥ ( ऋग्वेद मं. १० । १४ । ६ ) [ २६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण शुद्ध प्रारण " ऋषि " कहलाते हैं - पश्वीभूत प्रारण " पितर " कहलाते हैं - यही तात्पर्य है । जैसे ऋषि स्वयंभू - मण्डल की वस्तु है- पितर परमेष्ठि मण्डल की वस्तु है । पितरों के योग से " देवता " उत्पन्न होते हैं । परमेष्ठि से नीचे सूर्य्यमण्डल है । इसका जो केन्द्रीय प्रजापति है वह भी मन - प्राण-वाङ्मय है । इसका ही नहीं - संसार के यच्चयावत् पदार्थों का केन्द्रीय प्रजापति मन प्रारण वाङ्मय है । श्रतएव सौर प्रजापति को हम मन - प्राणवाक् तीनों नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । चूँकि इसमें प्राण भाग उल्बण रहता है, अतएव इसे प्रारण शब्द से भी व्यवहृत कर दिया जाता है । इसलिए " प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्य: " कहा जाता है । इस अव्यय प्रारण की पहली सृष्टि ऋषि थी । वही अव्यय प्राण परमेष्ठि में आकर पितर सृष्टि का कारण बनता है - वही अव्यय प्रारण पितर - संयोग से सूर्य में आकर देह - सृष्टि का कारण बनता है । यह सौरप्राण - प्राण, अपान, व्यान स्वरूप में परिणत हो जाता है । यह सौरप्राण पृथिवी में आता है । पृथिवी में आ कर - पृथिवी की अपनी वस्तु बन कर जब पृथिवी से चारों ओर निकलता है तो " अपान " कहलाने लगता है एवं सूर्य्य और पृथिवी के बीच में रहने वाला-अन्तरिक्ष में रहने वाला जो सौर प्रारण है वह " व्यान " कहलाने लगता है । इस प्रकार अवस्था - भेद से एक ही सौरप्राण - प्राण, अपान और व्यान इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । यद्यपि श्रपान है सूर्य की वस्तु किन्तु पृथिवी में आ कर पृथिवी की वस्तु वन जाती है । पृथिवी स्वरूपतः सर्वथा कृष्णा है अतएव इसमें से निकलने वाला जो प्राण है वह भी सर्वथा काला ही है । इसलिए प्रपान प्राण को तमोमयत्वात् हम असुर कहने के लिए तैय्यार हैं । बस ऊपर से सौर प्राण आता है— नीचे से पार्थिव पानप्राण जाता है- इन दोनों का परस्पर संघर्ष होता है । यही " देवासुर संग्राम " है । देवता सौर-शुक्ल प्राण का नाम हैं - असुर पार्थिव - प्रर्थात् तमोमय प्रपानप्राण का नाम है । दोनों में सदा युद्ध चलता रहता है - अन्त में जीत देवताओं की होती है । पार्थिव अपानप्राण ऊपर की ओर जा कर -प्राण ही बन जाता है । पार्थिव अपानप्राण पृथिवी के चारों ओर निकला रहता है । पृथिवी के आधे हिस्से पर -सौरप्राण का राज्य रहता है, आधे पर प्रपान कृष्णप्रारण का राज्य रहता है । जिस ओर का भाग सूर्य की तरफ होता है उस ओर का प्रपानप्राण अर्थात् अन्धकार नष्ट हो जाता है । सूर्य्य - सामुख्य का पार्थिव काला प्राण ( असुर ) मर जाता है । पृथिवी के सूर्य्य - सामुख्य भाग में प्रकाश ही प्रकाश रहता है । यही देवताओं की विजय है । इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति बार - बार कहती है - ' यज्ञेन वै देवा इमां जितिजिग्युर्ये यमेषां ' । अतएवं उस यज्ञ से यजमान को पूरा फल नहीं मिल सकता क्यों कि उसमें ऋत्विजों का भी हिस्सा रहता है । उनका आत्मसम्बन्ध तब यज्ञ से होता है जब कि उन्हें दक्षिणा दे दी जाए । दक्षिणा से उनका आत्मा यज्ञ में से हट जाता है और उस स्थान पर दक्षिणा यज्ञ बैठ जाता है । तदनन्तर वह -यज्ञ यजमान का प्रतिस्विक बन जाता है । इसी दक्षिणा कर्म को ' दाक्षिण कर्म ' कहते हैं । यह जब तक नहीं होता तब तक ऋत्विजों का आत्मा यज्ञ से मुक्त नहीं होता एवं तब तक यजमान को यज्ञ से फल भी नहीं मिल सकता । प्रकृत में इससे कहना यही है कि जब आङ्गिरसों ने वाक् दक्षिणा को स्वीकार किया तो श्रादित्यों के यज्ञ का वह कर्म न हटा जो कि दाक्षिण कर्म्म था अर्थात् दक्षिणा से ऋत्विजों का जो आत्मसम्बन्ध था - वह यज्ञ से अलग न हुआ अपितु बँधा रहा-[ ३० ] .:

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 49 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण " तदु तद्यज्ञस्य कर्म न व्यमुच्यत; यद्दाक्षिणमासीत् ॥१८ ॥

चूँकि " हत यज्ञमदाक्षिणम् " यह सिद्धान्त है अतएव श्रादित्यों को बाध्य हो कर आङ्गिरसों के लिए ' सूर्य ' की दक्षिणा देनी पड़ी । सूर्य को आङ्गिरसों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ ले लिया । श्रादित्य कुल १२ हैं उनमें से जो विवस्वान् नाम का आदित्य है - उसी का नाम सूयं है । इन १२ प्रादित्यों का काम सर्वथा पृथक् - पृथक् है । इनमें प्रकाश प्रदान करना- इसी विवस्वान् प्रादित्य का काम है । यह प्रकाश ही - इन प्रङ्गिरात्रों में अनवरत आता रहता है । यदि सौर पदार्थ पार्थिव अङ्गिरात्रों में न आते तो पार्थिव पदार्थ थोड़े ही दिनों में नष्ट हो जाते क्योंकि ये हर पल पृथिवी में से खर्च होते रहते हैं परन्तु जितने ही खर्च होते रहते हैं -सूर्य्यं उतने ही पदार्थ देता रहता है । यही सूय्यं का श्रङ्गिराम्रों में दक्षिणा रूप से आना है-" अर्थभ्यः सूय्यं दक्षिणामानयन्- तं प्रत्यगृह्णान् ” । इसी का अलङ्कार - रूप से वर्णन करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि- आङ्गिरस लोग कहा करते हैं कि वास्तव में ऋत्विज बनने लायक हम हैं । ( सच है, अग्नि ही तो ऋत्विज बनता है ) सबसे श्रेष्ठ ऋत्विक् तो हम हैं । वास्तव में दक्षिणा के योग्य तो हम हैं । सही दक्षिणा तो हमने ही पाई है । हमने उसे दक्षिणा में लिया है - जो कि श्राकाश में तप रहा है । वास्तव में सूर्य्य-साम्मुख्य वाला अङ्गिरा प्राण स्वयं ही इस भाव को प्रकट कर रहा है-" तस्मादु ह स्माहुरङ्गिरसो - वयं वाऽआत्विजीनाः स्मो । वयं दक्षिणी-याअपि वास्माभिरेष प्रतिगृहीतो यएष तपतीति " । इस सारे प्रपञ्च से बतलाना यही है कि प्रकृति - यज्ञ में अङ्गिरा ऋत्विक् को सद्यःकी याग की दक्षिणा में सूर्य मिलता है प्रतएव इस मानुष सद्यः की यज्ञ में जो ऋत्विक् बनते हैं उन्हें सूर्य की प्रति-कृतिस्वरूप सफेद घोड़ा ही दक्षिणा में देना चाहिए । पुरुष, ग्रश्व, गो, अवि तथा अज - सूर्य में ये पाँच पशु हैं । पाँचों में से अश्व सूर्य के अत्यन्त समीप की वस्तु है श्रतएव सद्य: की यज्ञ में यही दक्षिणा देनी चाहिए-" तस्मात्सद्यः क्रियोऽश्वः श्वेतो दक्षिणा " ॥१ ९ ॥ • उस अश्व के गले में आगे की ओर सोने का बना हुआ २१ निर्वात् का रुक्म होता है अर्थात् जिसके चारों ओर २१ सोने की किरणें हों और बीच में सूर्य की मूर्ति हो ऐसे रुक्म को घोड़े के गले में बाँध देना चाहिए एवं तत्सहित ही दक्षिणा देनी चाहिए । सूर्य्यं २१ वें अहर्गण पर है एवं सुवर्ण उसी सूर्य्य की वस्तु है अतएव ऐसा रुक्म पहनता हुआ यजमान सूर्य्य का साक्षात् स्वरूप बनता है जो कि आकाश में तप रहा है । यदि सफेद घोड़ा न मिले तो सफेद बैल की दक्षिणा दे दे । [ ३१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण " तस्य रुक्मः पुरस्ताद् भवति । तदेतस्य रूपं क्रियते य एष तपति । यद्यश्वं श्वेतं न विन्देदपि गौरेव श्वेतः स्यात्तस्य रुक्मः पुरस्ताद्भवति । तदेतस्य रूपं क्रियते यएष तपति " ॥२० ॥

श्रङ्गिरात्रों ने आदित्यों की अधसुत्या करवाई उसके बदले में उन्होंने उन्हें वाक् को दक्षिणा में देना चाहा परन्तु वे इसके लिए इन्कार कर गए । अन्त में प्रादित्यों ने सूर्य को दक्षिणा में दिया । सूर्य at ( बृहत वा को ) अङ्गिरात्रों ने सहर्षं ले लिया - यह अब तक बतालाया गया है । जब वाक् को अङ्गिराओं ने लेने से इन्कार कर दिया तो वाक् बड़ी नाराज हो गई । उसने क्रोध में ना कर श्रङ्गि-ओं से कहा कि हे अङ्गिराम्रो! यह सूय्यं मुझ से किस बात में बड़ा है जिससे कि उसका प्रतिग्रह तो तुमने ले लिया और मुझे नहीं लिया । विशेष गुण से एक - दूसरे का सम्बन्ध हो जाता है अतएव ' बनातीति बन्धु ' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध बन्धु का विशेष गुण श्रर्थ मान लिया जाता है । केन बन्धना अर्थात् विशेष गुणेन " एषसूर्य्यः मत् ( मतः सकाशात् ) श्रेयान् ( श्रतिशयेन प्रशस्य ) यत् येन अतिशयेन एतं ( श्रादित्यम् ) प्रत्यग्रहीष्ट न माम् " । तात्पर्य यही है कि जब कि सूर्य में मुझ से कुछ भी विशेषता नहीं है तो फिर आपने मेरा तिरस्कार क्यों किया? बस, यह कह कर वह वाक् देवताओं को छोड़ कर चल दी । " तेभ्यो ह वाक् चुक्रोध । केन मदेष श्रेयान् बन्धुना केना यदेतं प्रत्य-ग्रहीष्ट न मामिति । सा हैभ्योऽपचक्राम " ॥ २१ ॥

देवताओं के ऊपर वाक् ने क्या क्रोध किया - कहाँ और कैसे चली गई इसका वैज्ञानिक रहस्य समझने के लिए पहले वाक् का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है— संसार के यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण - भगवान् प्रजापति से ही होता है-" प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च " । ( शत ० ६ । १ । २ । ११ ) यह कहा जाता है । यह प्रजापति पुरुष प्रजापति नाम से भी व्यवहृत होता है । आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् — इस पुरुष की ये पाँच कलाएँ हैं । इसमें प्रानन्द - विज्ञान मुक्तिसाक्षी हैं- प्राण वाक् सृष्टिसाक्षी हैं । आनन्द - विज्ञान ज्ञान है । इसी को अमृत कहते हैं । ज्ञान नित्य पदार्थ है— इसका कभी विनाश नहीं होता । उधर प्रारण - वाक् कर्म्म - स्वरूप है । यह मृत्यु कहलाता है । इस कर्म्म से अर्थात् प्रारण - वाकू से सृष्टि होती है एवं श्रानन्दविज्ञान स्वरूप ज्ञान से मुक्ति होती है । मन दोनों में रहता है । अतएव ' उभयात्मकं मनः ' यह कहा जाता है । इस प्रकार आनन्द विज्ञान- मन- ज्ञान भाग है - मन, प्राण, वाक् – कर्मभाग है । इस प्रकार एक ही प्रजापति का श्राधा भाग - आधा शरीर - अमृत है, तो आधा मर्त्य है अतएव -[ ३२ ]