Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 321–330

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं यूपैकादशिनी ब्राह्मण न हो कर पितृदेवत्य हो जाएगा । अतः दक्षिण के मार्ग का अवरोध करने के लिए सब से उन्नत यूप दक्षिण में खड़ा करना चाहिए । तथा उत्तर में सब से नीचा अर्थात् छोटा यूप खड़ा करना चाहिए । इस से यजमान सीधा यज्ञ के उत्तर जाता है ॥ ७ ॥

इन ग्यारह यूपों के अतिरिक्त १ पत्नीवत् यूप और खड़ा किया जाता है । ११ यूप तो प्राणदेवताओं के लिए हैं और यह बारहवाँ यूप देवपत्नियों के लिए खड़ा किया जाता है । इसीलिए इस यूपं को पत्नीवान् कहा जाता है । देवता और मनुष्य दोनों अर्धेन्द्र हैं, केवल परमात्मा पूर्णेन्द्र है । परमेश्वर से मिलने के लिए पूर्णेन्द्र बनना श्रावश्यक है । अर्धेन्द्र देवता व मनुष्यों की परिपूर्णता पत्नी के द्वारा होती है । अतः सर्वता के लिए देवपत्नियों हेतु यूं खड़ा करना आवश्यक है । यूप, बिना पशु के नहीं रहता । अतः पत्नीवत् यूप के पशु • जाता है । अन्य ११ यूपों का विभिन्न देवताक पशुओं से मन्त्र द्वारा सम्बन्ध किया जाता है । इस पत्नीवत् यूप का पशु त्वष्टादेवताक है । त्वष्टादेवताक पशु के पत्नीवत् यूप से सम्बन्ध की उपपत्ति बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि योनि में सिक्त वीर्य को त्वष्टा देवता ही हस्तपादादि अवयवों में विभक्त करता है । इसीलिए ' त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ' यह कहा गया है । अतः त्वष्टा देवताक पशु का पत्नीवत् यूप से सम्बन्ध किया जाता है । यहाँ रूप पद से आकार अभिप्रेत है न कि वर्ण । क्यों कि वरूप का अधिष्ठाता मघवा इन्द्र है ' न कि त्वष्टा । इसीलिए ' इन्द्रो रूपारिण करीकृदचरत् ' ऐसा श्रुति कह रही है । अन्य ११ यूपों के रूप पशु बधिया किये जाते हैं, किन्तु पत्नीवत् यूंप का पशु बधिया नहीं किया जाता कर ( डकोशयुक्त ) ही होता है क्यों कि यज्ञ से दिव्यात्मा का प्रजनन करना है प्रजननशक्ति मुष्क में ही होती है । अन्यथा मुष्क फोड़ कर बधिया कर देने पर इस में प्रजनन-" शक्ति नहीं रहेगी । अन्य ११ यूपों के पशुओं का प्रलम्भन कर आहवनीयाग्नि में आहुति दी जाती है । किन्तु पत्नीवत् पशु का प्रलम्भन कर उसकी अग्नि में आहुति नहीं दी जाती पितु इस पशु को अग्नि के चौतरफ घुमा कर उसे छोड़ देना चाहिए । यदि इसकी भी हुति दे दी जाएगी तो यजमान की पुत्र - पौत्रादि प्रजा का अन्त हो जाएगा ॥ ८ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सोम यज्ञ में यूप गाड़ा जाता है । जिस यज्ञ में पश्वालम्भन होता है, उस हैं । न यूप बिना के रह यज्ञ में यूप अवश्य ही होता है; क्यों कि पशु और यूप दोनों अविनाभूत पशु सकता है न पशु, यूप के बिना । सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम के अग्निष्टोम नामक प्रकृत सोमयज्ञ में पश्वा-लम्भन होता है । पशु चूँकि बिना यूप के नहीं रहते प्रतएव इस यज्ञ में भी काष्ठ का यूप खड़ा किया जाता है । इन यूपों की संख्या पशुओं पर निर्भर है । जितने पशुओंों का श्रालम्भन किया जाता है, उतने ही यूप गाड़े जाते हैं । चूँकि इस यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) पशुनों का प्रालम्भन किया जाता है, अतएव इसमें ग्यारह ( ११ ) ही यूप गाड़े जाते हैं । कई यज्ञ ऐसे हैं, जिनमें पशु संख्या के अनुसार पन्द्रह ( १५ ), सत्तरह ( १७ ), इक्कीस ( २१ ) तक यूप गाड़ने पड़ते हैं । जिन पशुत्रों का इस अग्निष्टोम में आलम्भन होता है, वे ' स्तोमानयन सवनीय ' पशु कहलाते हैं । पृथिवी से सूर्य्यं तक प्राकृतिक यज्ञ वितत हो रहा [ ३०५ ]

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काण्ड ( प्र ० ७ ) तृतीय-शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण ह । इसमें इक्कीस ( २१ ) स्तोम हैं । यद्यपि हैं तेतीस ( ३३ ) स्तोम, परन्तु सूर्य्यं इक्कीस ( २१ ) वें पर पड़ता है, एवं इक्कीस ( २१ ) पर ही यज्ञ समाप्ति है, अतएव यज्ञ सम्बन्धेन इक्कीस ( २१ ) स्तोम मान लिए जाते हैं । यज्ञ से स्तौम्य श्रीर यज्ञिय देवता अभिप्रेत हैं । यज्ञिय देवताओं के हिसाब से इतनी दूर में - तेतीस ( ३३ ) विभाग कर दिए जाते हैं, एवं स्तोम्य देवताओं के हिसाब से इक्कीस ( २१ ) विभाग होते हैं । भिन्न - भिन्न प्राणों को संस्था की भिन्नता के अनुसार इस यज्ञमण्डल के भिन्न - भिन्न विभाग किए जाते हैं । पृथिवी से सूर्य्य तक पशु - प्राण वितत रहता है । यह पशु - प्राण ग्यारह ( ११ ) संस्थानों में विभक्त है । पृथिवी से सूर्य्यं तक पाँच ( ५ ) प्रकार के पशु - प्राण ग्यारह ( ११ ) स्तोमों में विभक्त हैं । पशु - प्राणापेक्षया इक्कीस ( २१ ) स्तोमों के ग्यारह ( ११ ) ही विभाग किए जाते हैं । ये पाँचों पशु-' पुरुष - अश्व - गो - अवि - अज ' - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । पुरुष से वैश्वानराग्नि अभिप्रेत है । " वैश्वानरो यतते सूर्येण " - " प्रायोद्यां भात्या पृथिवीम् " यह कहा जाता है । इसी से हम मनुष्यों का शरीर बनता है । वैश्वानर पुरुष से मनुष्य का निर्माण हो, अतः यज्ञ से दिव्यात्मा को उत्पन्न किया जाता है । यह दिव्यात्मा सूर्य से सत्तरहवें ( १७ वें ) स्थान से सम्बद्ध हो जाता है । यह आत्मा आग्नेय होता है । कितने ही यज्ञ ऐसे हैं कि उनसे जो आत्मा बनता है, उसे पुरुष, अश्वादि पशु - प्रारण धक्का पहुंचाया करते हैं । पशुप्राण ऊपर जाते हुए दिव्यात्मा का मार्गावरोध करते हैं । इस आपत्ति को दूर करने के लिए उन पशु - प्रारणों को पहले आत्मसात् किया जाता है । प्राण तो आँखों से दीखता नहीं, अतएव उन - उन प्रारणों से जिनका आत्मा बना हुआ है, उन उन पार्थिव पशुओं की प्राहुति से उन उन प्राणों को आत्मसात् किया जाता है । कितने ही यज्ञों में पुरुष अर्थात् वैश्वानर प्रारण बाधा डालता है, वैश्वानर से हम बने हुए हैं, प्रतएव उस वैश्वानर - पुरुष - प्रारण को आत्मसात् करने के लिए उसी प्राण से बने हुए मनुष्य की आहुति दी जाती है । आहुति द्वारा उस वैश्वानर प्रारण को आत्मसात् किया जाता है । जिस यज्ञ में पुरुष की प्राहुति होती है, वह ' नरमेधं ' यज्ञ कहलाता है । एवमेव कितने ही यज्ञों में गो पशु बाधा पहुँचाता है, उसके निरोध के लिए - ' गोमेध ' करना पड़ता है । इसी प्रकार अश्वमेध समझना चाहिए । पूर्वोक्त पाँचों पशुत्रों में पुरुष - श्रश्व - गो - इन तीन पशुओं का तो सूर्य्य से सम्बन्ध है । तीनों ही सत्य हैं अर्थात् सूर्य से सम्बद्ध हैं । एवं अवि और प्रज- दोनों प्रवर्ग्य पशु हैं । सूर्य से आने वाला जो प्रवर्ग्य पशु है, उसका नाम ' अवि ' है । वृक्षों में जो हरित वर्ग दिखलाई पड़ता है, वह इसी अवि पशु प्रारण का काम है । अतएव श्रुति कहती है-" अविवै नाम देवतर्तेनास्ते परिवृता । तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः || " इति ( प्रथर्ववेद १० | ४ | ८ | ३१ ) सूर्य का जो पशु प्रवर्ग्य हो कर पृथिवी की वस्तु बन जाता है, वह अज पशु कहलाता है । सावित्राग्नि का नाम ' अवि ' है, एवं गायत्राग्नि का नाम ' अज ' है । प्रज आग्नेय पशु कहलाता है. अतएव पशु - वर्ण - व्यवस्था में ' अज ' को ब्राह्मण बतलाया जाता है । श्रवि को क्षत्रिय बतलाया जाता है । गो को बगिया ( वणिक् ) बतलाया जाता है- अश्व को शूद्र बतलाया जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-१. ' ऋग्वेद मं ० १६८।१ ' | २. ' नि ० ७।२३ ' । [ ३०६ ]

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. तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण " अजः पशूनाम् - अविः पशूनाम् - गावः पशूनाम् - अश्वः पशूनाम् - इति । प्रजापति के मुख - भाग से ब्राह्मण पैदा होता है । अतएव ब्रह्मवीर्यं मुख में प्रतिष्ठित रहता है । ब्राह्मण मुख से काम ले सकता है । ब्राह्मण का काम ' उपदेश ' देना है । श्रज चूंकि इसी सीगे की चीज है, अतएव बकरा मुँह से ही अधिक व्यापार किया करता है । बकरा- जब भी कोई काम करेगा पहले मुँह से आवाज करेगा, क्यों कि यह प्रजापति के मुख भाग से उत्पन्न हुआ है । मुख से अग्नि अभिप्रेत है । सृष्टि-प्रक्रिया में सबसे पहले ' अग्नि ' उत्पन्न होता है । चूंकि यह सबसे पहले उत्पन्न होता है, अतएव इसे अग्नि कहा जाता है । परोक्षप्रिय देवता ' अग्नि ' को अनि न कह कर ' अग्नि ' इस नाम से व्यवहृत किया करते हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-" प्रजापतिर्ह वाऽइदमग्रएक एवास । स ऐक्षत कथं नु प्रजायेयेति सोऽ-श्राम्यत् स तपोऽतप्यत । सोऽग्निमेव मुखाज्जनयां चक्रे । XXXX तद्वाएन -तदग्रे देवानामजनयत । तस्मादग्निः । श्रग्निहं वै नामैतद् यदग्निः ” । ( शत ० ब्रा ० २१२ | ४ | १-२ ) ब्रह्म - वीर्य्यं इसी से उत्पन्न होता है, अतएव ' अग्रे श्रग्रे ब्राह्मणाः ' यह कहा जाता है । दूसरा दर्जा है - क्षत्रिय का | क्षत्रिय - प्रजापति के बाहु - भाग से उत्पन्न हुआ है एवं उसी स्थान से अवि पशु उत्पन्न करने हुआ है । बाहु - पराक्रमस्थान है - उपदेश का काम नहीं है । शस्त्र ग्रहण करने का - दूसरे पर हमला शत्रु का का - काम है । यही कारण है कि क्षत्रिय उपदेश नहीं देता, हाथ से काम लेता है; शस्त्र प्रहार कर सामने विनाश करता है । एवमेव मेंढ़ा भी अज की तरह मुख से काम नहीं लेता, अपितु कोई हैं- ' वैश्व यदि ' । उसके वैश्व उदर चला जाए तो पहले टक्कर मारता है । मेंढ़ा अत्यधिक बलिष्ठ होता है । तीसरे का गल्ला - सम्पत्ति का स्थान से उत्पन्न हुए हैं । हम जो अन्न खाते हैं, वह उदर में जमा होता है । अन्न बनना पड़ता खजाना - पेट है । उसी से वैश्व उत्पन्न होते हैं - प्रतएव उन्हें अन्नादि सम्पत्ति का अधिष्ठाता है, वह इसी गो है । इसी प्राण से गौ पशु उत्पन्न होता है, श्रतएव संसार में जितनी भी अन्नादि सम्पत्ति पैरों से ही काम से उत्पन्न होती है । चौथे हैं शूद्र । प्रजापति के पैरों से शूद्र उत्पन्न होते हैं, अतएव इन्हें है, अतएव लेना पड़ता है । भाग दौड़ ही इनका पेशा है । इसी प्रारण से चूँकि अश्व पशु उत्पन्न होता सब पशुओं में से प्रज अश्व ही सवारी के काम में लाया जाता है । प्रकृत में हमें यही कहना है कि इन है, वही ' अज ' पार्थिव गायत्राग्नि से सम्बन्ध रखता है । पृथिवी से निकलने वाला जो गायत्र प्राण पशु ' अर्थात् अज पशु ग्यारह ( ११ ) कहलाता है । इसी से अज पशु की उत्पत्ति होती है । यह ' गायत्राग्नि से सूर्य्यं तक वितत विभागों में परिणत हो कर अर्थात् अपने ग्यारह ( ११ ) संस्थान बना कर पृथिवी हैं । इन ग्यारहों के देवता भी ग्यारह रहता है | ग्यारह ( ११ ) पशु प्रारण भी वहाँ तक अभिव्याप्त रहते के देवता हैं, अतएव इन्हें ( ११ ) ही हैं । यही ग्यारह ( ११ ) देवता ' रुद्र ' कहलाते हैं । चूंकि रुद्र पशुओंों उपासना - काण्ड में रुद्र-' पशुपति ' कहा जाता है । चूंकि भगवान् रुद्र ' अज पशु ' के अधिष्ठाता हैं, अतएव [ ३०७ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनो ब्राह्मण प्रतिमा के सामने पशु - निवेदन करने की भावना के लिए ' बम् - बम् ' इस प्रकार अज शब्द का उच्चारण किया जाता है । दिव्य यजमान का दिव्यात्मा पृथिवी से ऊपर जाने वाला है, बीच में ये ग्यारह ( ११ ) अज पशु रहते हैं, चूंकि ये आत्मा से विजातीय होते हैं; प्रतएव श्रात्मगति में बाधा डालते हैं, इस बाधा को दूर करने के लिए उन्हीं प्राणों से निम्मित ग्यारह ( ११ ) श्रज पशुओं का आलम्भन कर उनको आत्मसात् कर लिया जाता है । जब उस विद्युत् का आधान कर लिया जाता है तो दिव्यात्मा भी पशु-प्राणों का सजातीय बन जाता है । ऐसी हालत में वे रुकावट नहीं डालते; बस, यही श्रालम्भन - रहस्य है । अग्निष्टोम में ग्यारह ( ११ ) पशुओं का श्रालम्भन होता है । वे ग्यारह पशु स्तोमसम्बन्धेन ' स्तोमायन ' कहलाते हैं । इनका सवन किया जाता है- अग्नि में प्राहुति दी जाती है, अतएव ये ' सवनीय ' कहलाते हैं । ग्यारह पशु निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं- ' १ - आग्नेय, २ - सारस्वत, ३ - सौम्य, ४- पौष्ण, ५-बार्हस्पत्य, ६ - वैश्वदेव, ७- ऐन्द्र, मारुत, ε- ऐन्द्राग्न, १० - सावित्र, ११ - वारुण । इन ग्यारह पशुनों को एक ही यूप में बाँधना यह एक मत है एवं ग्यारहों को भिन्न भिन्न यूपों में बाँधना - यह दूसरा मत है । एक ही यूप में ग्यारहों को बाँधना -इसका प्रतिपादन पूर्व के ब्राह्मण में कर दिया गया । परन्तु कितने ही प्राचार्यों का कहना है कि जितने पशु हों, उतने ही यूप होने चाहिए । चूंकि अष्टिोम में ग्यारह ( ११ ) पशु हैं, श्रतएव ग्यारह ( ११ ) ही यूप होने चाहिए । चूंकि इस ब्राह्मण में इसी दूसरे पक्ष का प्रतिपादन किया गया है, अतएव इसे " धूपैकादशिनी " नाम से व्यवहृत किया जाता है । पशु, बिना यूप के नहीं रहते, इसलिए ग्यारह ( ११ ) यूप होते हैं । ग्यारह यूप में यह पहली उपपत्ति है । भगवान् - याज्ञवल्क्य इसकी और उपपत्तियाँ बतलाते हैं-याज्ञवल्क्य कहते हैं ---" यावती वै वेदिस्तावती पृथिवी " - इति । जितनी बड़ी वेदि है, उतनी ही बड़ी पृथिवी है । ' ऋग्यजुःसाम ' का नाम वेद है । जिस पर वेद रहता है, उसका नाम वेदि है । वेद, बिना वेदि के प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है | वेद उपलब्धि को कहते हैं । हम जो घट, पट, मठादि का प्रत्यक्ष कर रहे हैं, वह इसी वेद का काम है | वेद का काम क्या है? वेद ही का प्रत्यक्ष करते हैं । सूर्य्य रश्मियाँ वेदत्रयीघन हैं । इनका जब वस्तु पर प्रतिफलन होता है, तभी वस्तु ज्ञान होता है । पदार्थाकाराकारित प्रतिफलित सौर रश्मियाँ ही पदार्थ - प्रत्यक्ष का कारण हैं । वायु में प्रतिफलन नहीं होता सूर्य्यं रश्मियाँ उस पार निकल जाती हैं, अतएव वायु का प्रत्यक्ष नहीं होता । वेद ही का नाम उपलब्धि है । यह उपलब्धि तभी होती है, जब कि वेदत्रयी - स्वरूप सौर- रश्मियों की कोई प्रतिष्ठा हो, आलम्बन हो, जिससे कि इनका रिफ्लेक्शन हो सके । घट, पट होंगे तभी सूर्य्यं रश्मियाँ प्रतिफलित होंगी । वेद की प्रतिष्ठा वेदि ही है । वेद, बिना वेदि के कभी नहीं रह सकता । हम जितने भी पदार्थ देख रहे हैं, वेद ही वेद हैं । यह वेद उसी पदार्थ पर, वेदि पर, प्रतिष्ठित रहता है । बस, जितनी वह वेदि है, उतनी ही बड़ी पृथिवी है । घट, पट, मठ मनुष्य, पर्वत, तिल, पुस्तक सब पृथिवी है, सब वेदियाँ हैं । अपिच - यह जो सारी पृथिवी है प्रर्थात् पृथिवी का गोला है, वह वेद प्रतिष्ठा के कारण वेदि है । जहाँ तक वेदि है, वहीं तक पृथिवी है । वेदि से वेद-[ ३०८ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण प्रतिष्ठा अभिप्रेत है । जिस स्थान पर वेद प्रतिष्ठा नहीं है, उसे वेदि नहीं कह सकते, एवं उसे पृथिवी नहीं कह सकते । पृथिवी का पृथिवीपन वेदि पर निर्भर है । जहाँ वेद का सम्बन्ध होता है, वह वेदि कहलाती है । जितनी बड़ी वेदि होती है, उतनी ही बड़ी पृथिवी कहलाती है । वेदि का नाम ही पृथिवी है । वेद प्रतिष्ठा ही पृथिवी कहलाती है । जिस पर वेद प्रतिष्ठा नहीं है, वह पृथिवी नहीं कहला सकती । पिण्ड वस्तु पर - आत्रेयप्रारण प्रधान पदार्थ पर ही वेद प्रतिष्ठा होती है, अतएव हम पिण्ड को ही पृथिवी कहेंगे । जिसकी वेदि नहीं, उसका वेद नहीं । जिसका वेद नहीं, उसकी उपलब्धि नहीं । इसी पृथिवी लक्षण को बतलाने के अभिप्राय से वेद भगवान् कहते हैं-" इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या श्रयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः । अयं सोमो वृष्णो प्रश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम " इति । ( ऋग्वेद मं ० १।१६४१३५ ) वेद महर्षि यज्ञ वेदि की प्रोर अंगुलि निर्देश कर कहते हैं कि यही इस पृथिवी का अन्त है । यह जो वेदि देख रहे हो, वही इस पृथिवी का अन्त है । तात्पर्य यही है कि वेद प्रतिष्ठा का ही नाम पृथिवी है । जहाँ तक वेद प्रतिष्ठा रहती है, वहाँ तक वेदि - सत्ता मानी जाती है एवं वही ' पृथिवी ' है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- " यावती व वेदिस्तावती पृथिवी " । अपि च- इससे एक विज्ञान और भी बतलाया जाता है । वेदिब्राह्मण में बतलाया गया है कि प्राकृतिक महावेदि का वितान पृथिवीपिण्ड से सूर्य्य तक होता है । पृथिवीपिण्ड गार्हपत्य है । आन्त रिक्ष विष्ण्याग्नि, दक्षिणाग्नि है एवं सप्तदशस्थ अग्नि, आहवनीय है | एकविंशस्थ सूर्य ' यूप ' है । इस प्रकार यह महावेदि - पृथिवी से सूर्य्यं तक प्रर्थात् इक्कीस ( २१ ) तक वितत है । जहाँ तक यह महा-दि है, वहाँ तक पृथिवी समझनी चाहिए । पृथिवी की सत्ता महावेदि पर्यन्त है । हम जो पृथिवी का पिण्ड देख रहे हैं, सामान्य मनुष्य इसी को पृथिवी समझा करते हैं । परन्तु वस्तुतः पृथिवी की सत्ता सूतक है । पुराणों में जो पृथिवी की नाप लिखी हुई है जिसका कि विज्ञान न जानने के कारण " एतत् सर्वं पुराणाश्रितं बोध्यम् " कह कह उपहास किया जाता है, वह इसी अमृताग्नि के अभिप्राय से बतलाई जाती है । हम जो पिण्ड देखते हैं, वह मर्त्य अग्नि है । एवं इसी में से एक अमृताग्नि निकलता है - वह इक्कीस ( २१ ) तक वितत रहता है । इस अमृताग्नि मण्डल की समाप्ति का नाम ही ' रथन्तर ' साम है । पृथिवी का साम सूर्य्य - रथ के भी ऊपर तक अपनी सत्ता रखता है, अतएव इसे ' रथन्तर ' कहा जाता है । पृथिवी की सत्ता वहाँ तक है, जहाँ तक कि महावेदि है न कि पृथिवी पिण्ड पर ही पृथिवी की सत्ता समाप्त हो जाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है - ' यावती के वेदि-स्तावती पृथिवी ' | अपि च- मनुष्य यज्ञ में जो महावेदि बनाई जाती हैं, उतनी ही बड़ी पृथिवी समझनी चाहिए । पृथिवी की सत्ता कहाँ तक समझें? इसका उत्तर देते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि तुम्हारी जो महावेदि है, जिसमें कि तुम अग्निष्टोम करोगे, यह पृथिवी उतनी ही बड़ी है । हविर्वेदि के प्राहवनीय से [ ३०६ ]

पृष्ठ 326

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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मणं लेकर इक्कीस ( २१ ) सूर्य्य - यूप तक पृथिवी की सत्ता है । वेदि का जो प्रारम्भ है, वह पृथिवी का इस ओर का छोर समझो एवं वेदि का जो यूप स्थानीय अन्तिम छोर है, उसे पृथिवी का अन्तिम छोर समझो । उपासना में दृष्टि रहती है मूर्ति पर अर्थात् भावना रहती है, उस व्यापक ईश्वर पर । ठीक इसी प्रकार यहाँ पर भी - गुल्यन्त निर्देश है - इस मनुष्य वेदि पर और भावना है उस महावेदि पर । जितनी बड़ी तुम्हारी यह महावेदि है अर्थात् प्रकृति की महावेदि जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी पृथिवी है । इसी अभिप्राय से कहते हैं- " यावती व वेदिस्तावती पृथिवी " । इस पृथिवी पर जो ग्यारह यूप गाड़े जाते हैं, वे वज्र हैं । श्राग्नेय अस्त्र का नाम वज्र है । प्राप्य एवं तमोमय प्राण का नाम असुर है । असुरों के लिए अग्नि वज्र है । जहाँ अग्नि पहुँचा कि अन्धकार और प्राप्य प्रारण की सत्ता हटी । प्रकृति में पृथिवी से सूर्य्य तक - महावेदि तक - अग्नि संस्था है । असुरों के लिए यही १ गार्हपत्य है, १ आहवनीय है । अन्तरिक्ष्य की धिष्ण्याग्नि हैं एवं ग्यारहवां-( ११ वाँ ) सूर्थ्य है । ये ही ग्यारह ( ११ ) रुद्र हैं । यह अग्नि असुरों के लिए वज्र है । ये ग्यारहों अग्नि यूपवत् खड़े हुए हैं । इनकी सत्ता में प्रकृति की महावेदि पर असुरकृत श्राक्रमण सर्वथा विफल हो जाता है । इन ग्यारहों में सूर्य्य यूप ही प्रधान है । इस प्रकार प्राकृतिक सोमयज्ञ में पृथिवी की रक्षा के लिए जो कि पृथिवी महावेदि नाम से प्रसिद्ध है, जिसकी सत्ता सूर्य्यं तक है - गार्हपत्य - आहवनीय - धिष्ण्य ( 5 ) सूर्य्यं ये ग्यारह ( ११ ) यूप वज्र खड़े हुए हैं । इन्हीं शस्त्रों को हाथ में ले कर पृथिवी असुरों को अपने में नहीं घुसने देती है । यदि ग्यारहों अग्नि न रहें तो सारे ब्रह्माण्ड में अन्धकार ही का राज्य हो जाय । चूंकि प्रकृति के यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) यूप हैं, एवं " यद्वै देवा अकुवंस्तत् करवाणि " यह हमारा सिद्धान्त है, अतएव इस मनुष्य यज्ञ में भी ग्यारह ( ११ ) यूप स्थापित करने पड़ते हैं । यूप वज्रस्वरूप है । इन ग्यारह यूपों से पृथिवी को बलवती बनाते हैं एवं ऐसा करके इस पृथिवी के जो सपत्न हैं, उन्हें इससे निर्भक्त करते हैं । पृथिवी के जो असुर सपत्न हैं, इन वज्रों के कारण इस पृथिवी में उनकी जरा भी सत्ता नहीं रहती । सूर्य्य - साम्मुख्य का भाग तो देवताओं का ही है । तात्पर्य यही है कि प्रकृति में ग्यारह ( ११ ) यूप हैं । अतएव हमें भी ग्यारह ही यूप करने चाहिए । इस प्रकार ग्यारह ( ११ ) यूपों के कारण पृथिवी " यूपं कादशिनी " हो जाती है । प्रकृति यज्ञ के गार्हपत्य से सूर्य तक ग्यारह ( ११ ) यूप हैं । सूर्य्यं ग्यारहवाँ यूप है । ग्यारहों अलग - अलग हैं । यहाँ पर जो महावेदि बनाई गई है, वह उसी की प्रतिकृति है । प्रतएव ग्यारह यूप होना अत्यन्त ही आवश्यक है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" वज्रा वै यूपाः । तदिमामेवैतत् पृथिवीमेतैर्वस्त्रैः स्पृणुते । श्रस्यै ( प्रस्थाः ) सपत्नान्निर्भजति । तस्माद्यूपैकादशिनी भवति " । हमने बतलाया है कि पृथिवी से सूर्य तक ग्यारह ( ११ ) संस्थानों में विभक्त जो ग्यारह ( ११ ) अग्नि हैं, वही ग्यारह ( ११ ) यूप हैं । पृथिवी से बाहर निकला हुआ गायत्राग्नि पहला यूप है, श्रान्त-रिक्ष्य आठ ( ८ ) धिष्ण्याग्नियाँ - आठ यूप हैं एवं सप्तदशस्थ ग्राहवनीय दसवाँ ( १० वाँ ) यूप है, सूर्य [ ३१० ]

पृष्ठ 327

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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण ग्यारहवाँ ( ११ वाँ ) यूप है । इस प्रकार ग्यारहों ( ११ हों ) वज्र प्रक्षिप्त हो रहे हैं, हाथ से निकल चुके हैं | एक बारहवाँ ( १२ वाँ ) वज्र जमीन में ही गड़ा रहता है । जो श्रग्नि पृथिवी - गर्भ में प्रविष्ट है - जो कि अभी बाहर नहीं निकला है, वही बारहवाँ ( १२ वाँ ) वज्र है । यही गर्भाग्नि बाहर निकलता रहता है । यदि गर्भ में अग्नि न रहे तो पृथिवी पर असुरों का कब्जा हो जाय । क्योंकि जो ग्यारह ( ११ ). afe from गए, वे तो निकल ही गए । जहाँ उनका प्रभाव नष्ट हुआ नहीं कि असुरों को मौका मिला नहीं । परन्तु पृथिवी - गर्भ में इतना अग्नि भरा रहता है, जिसकी कमी होती ही नहीं । यही बारहवाँ ( १२ वाँ ) प्रक्षिप्त वज्र है । पूर्व के ग्यारहों ( ११ हों ) वज्र काम में आ रहे हैं, हाथ से निकल चुके हैं; परन्तु पार्थिव गर्भाग्निप्रभी अप्रक्षिप्त है- जमीन में गड़ा हुआ है । चूंकि प्रकृति में ऐसा है, अतएव यहाँ भी एक बारहवाँ यूप और बनाया जाता है एवं उसे दक्षिण भाग में जमीन के भीतर गाड़ दिया जाता है । और - और यूपों के पास यह गर्भ में सोता रहता है, अतएव इस बारहवें ( १२ वें ) यूप को ' उपशय ' कहा जाता है । जैसे ग्यारह ( ११ ) यूप तैयार होते हैं, वैसे ही बारहवाँ ( १२ वाँ ) यूप भी वितष्ट रहता है, अर्थात् छील छाल कर सुपरिष्कृत बना कर गाड़ा जाता है । बस उपशय की यही उपपत्ति है । इसी उपशय का मनुष्य यज्ञ में विधान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" द्वादश उपशयो भवति वितष्टः । तं दक्षिणत उपनिदधाति " । इसे जमीन में गाड़ना चाहिए । जैसा कि सायणाचार्य कहते हैं-" तं यूपानां दक्षिणदेशे भूमौ निखातं कृत्वा तूष्णीं स्थापयेत् " - इति । यहाँ पर जिसलिए कि बारहवाँ ( १२ वाँ ) उपशय और होता है, उसकी उपपत्ति बतलाते हैं ---" तत् ( तत्र यज्ञे ) यद् द्वादश उपशयो भवति ( तदुच्यते ) " ॥ १ ॥

यज्ञ - वितान करते हुए देवता असुर और राक्षसों के आक्रमण से डरने लगे । उन्हें चिन्ता हुई कि कहीं असुर लोग यज्ञ का विध्वंस न कर डालें । इस डर को मिटाने के लिए देवताओं ने इन ग्यारह ( ११ ) यूपों को ऊँचा उठाया । जिस प्रकार हाथ से प्रक्षिप्त बारण होते हैं तथैव ग्यारह ( ११ ) यूपों को उठाया अर्थात् असुरों पर ग्यारह ( ११ ) वज्र चलाये । हम देखते हैं कि यदि कोई मनुष्य किसी पर तीर चलाता है । है अथवा दण्ड प्रहार करता है तो उसका निशाना ठीक भी हो सकता है और च्युत भी हो सकता तीर निशाने पर लगे न लगे दोनों ही बातें हैं । अतएव बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह एक बार ही सारे शस्त्र न फेंक दे, अपितु कुछ सुरक्षित भी रख ले । वह सुरक्षित ऐसे न हों जिन पर जंग श्रा रही हो - जो काम ही में न आ सकें । श्रपितु शारण देकर सुपरिष्कृत कर तैयार रखने चाहिए, जिससे कि यदि पहले का शस्त्र व्यर्थ भी चला जाए तब भी उस दूसरे से काम कर सके । दूसरा शस्त्र यदि और एक पास में रहता है तो हिम्मत रहती है । बस, इसीलिए देवताओं ने ग्यारह शस्त्र तो फेंक दिए शस्त्र तैयार कर जमीन में गाड़ दिया ताकि समय पड़े पर काम आए । तात्पर्य यही है कि प्रारण- देवता आग्नेय हैं । असुरों के विनाश के लिए ग्यारह ( ११ ) अग्नि- वज्र - पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ - तीनों लोकों [ ३११ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण में सदा व्याप्त रहते हैं, एवं बारहवाँ ( १२ वाँ ) अग्नि पृथिवी के गर्भ में रहता है । ग्यारह ( ११ ) अग्नि काम करते रहते हैं, बारहवाँ ( १२ वाँ ) भीतर तूष्णीं रहता है । नीचे का नाम दक्षिण है, ऊँचे का नाम उत्तर है । पृथिवी नीचे है, यही दक्षिण । जिधर सूर्य्यं है, वह उत्तर है । उधर से तो तमोमय आसुर प्राण का आक्रमण हो ही कैसे सकता है? श्राक्रमण का मार्ग तो पृथिवी के पृष्ठभाग से, दक्षिण से ही, हो सकता है, अतएव उन्हें रोकने के लिए प्रजापति के पुत्र प्रारणदेवताओं ने पृथिवी में अग्नि को प्रविष्ट कर रक्खा है । चूंकि प्रकृति में ग्यारह ( ११ ) से अलग बारहवाँ ( १२ ) अग्नि जमीन में सोता रहता है, अतएव यहाँ भी बारहवाँ ( १२ वाँ ) यूप जमीन में गाड़ना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं --" देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः तेऽसुररक्षसेभ्य श्रासङ्गाद् बिभयाञ्चक्रुः । तद्यए उच्छ्रिता - यथेषुः प्रस्ता ( प्रक्षिप्ताः ) तया वै स्तृणुते वा न वा स्तृणुते । यथा दण्डः प्रहृतः तेन वै स्तृणुते वा न वा स्तृणुते । अथ य एष द्वादश उपशयो भवति- यथेषु:: - - श्रायता ( सन्नद्धाः ) अनस्ता - ( प्रक्षिप्ताः ) - यथोद्यतं प्रप्रहृतं -एवमेष व उद्यतो दक्षिणतो नाष्ट्राणां रक्षसामपहत्ये । तस्माद् द्वादश उपशयो भवति " ॥२ ॥

क्यों बारहवाँ यूप जमीन में गाड़ना चाहिए? - इसका कारण बतला दिया गया । श्रब पद्धति बतलाते हैं । सर्वप्रथम उस उपशय को-" एष ते पृथिव्यां लोकः - प्रारण्यस्ते पशुः " ( वा ० सं ० ६।६ ) यह मन्त्र बोलते हुए उसे जमीन में गाड़ देते हैं । यूप और पशु लाजिम मलजूम हैं । बिना पशु के यूप नहीं रहता । ब्रह्मोदन को श्रात्मा कहते हैं- प्रवर्ग्य भाग को ' पशु ' कहते हैं । सूर्य की रश्मियाँ-दीप की रश्मियाँ- ब्रह्मोदन हैं । ब्रह्मोदन को कोई नहीं खा सकता । एक मक्खी को जब छिपकली खाना चाहती है तो पहले उसके ब्रह्मोदन को उसे हटाना पड़ता है । जब तक मक्खी में श्रात्मा है तब तक क्या मजाल, उसे कोई खा जाय? ब्रह्मोदन को कोई नहीं खा सकता । जब तक शरीर में आत्मा रहता है, तब तक शरीर को कोई नहीं खा सकता । जब श्रात्मा शरीर को छोड़ देता है- शरीर आत्मा से पृथक् हो जाता है - तब उस पर दूसरे का अधिकार हो जाता है । यह प्रवर्ग्य भाग ही अन्न बन सकता है न कि ब्रह्मोदन | रोदसी त्रिलोकी के जितने भी प्रवर्ग्य पदार्थ हैं, सूर्य उन सब को खाता रहता है । सूर्य्यं यच्च-१ - ' प्रजापति का जो केन्द्रस्थ अव्यय भाग, जिससे वह अपने मूल स्वरूप में अविकृत भाव से प्रतिष्ठित रहते हैं, वही ' ब्रह्मोदन ' कहलाता है । ' २ - ' ब्रह्मोदन से कोई सृष्टि नहीं होती है, वह तो जिसका श्रंश है उसी के स्वरूप की रक्षा करता रहता है । ब्रह्मोदन का जो भाग इससे पृथक् हो जाता है, उसे वैदिक भाषा में उच्छिष्ट या प्रवग्यं कहते हैं । [ ३१२ ]

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1 तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण यावत् पदार्थों को चूसा करता है । सारे ' पशु ' अर्थात् प्रवर्य भाग सूर्य से बद्ध हैं । बिना सूर्य के पशु नहीं रह सकते एवं बिना पशु के सूर्य्यं नहीं रह सकता । सूर्य्य ही को यूप कहते हैं । दोनों अविनाभूत हैं-इसी अभिप्राय से कहते हैं-" पशुश्च वै यूपश्च " । जहाँ ऐसी पङ्क्ति आए वहाँ अविनाभाव अपेक्षित समझना चाहिए । चूंकि पशु और यूप अविना भूत हैं एवं इस यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) पशु होते हैं, अतएव ग्यारह ( ११ ) ही यूप स्थापित किए जाते हैं । परन्तु जो बारहवाँ ( १२ वाँ ) उपशय यूप है, उसके पशु नहीं बाँधा जाता । यह सर्वथा अनुचित है, क्योंकि यूप बिना पशु के रह ही नहीं सकता । बारहवाँ ( १२ वाँ ) पशु लाना यज्ञ - पद्धति के विरुद्ध है । इस विरोध को हटाने के लिए प्रारण्य पशु का अनुदेश कर दिया जाता है । अभी पशु बाँधा नहीं जाता है । इस यूप से कह रहे हैं कि आपका स्थान तो पृथिवी है और पशु प्रारण्य है । अप्रस्तुत पशु को प्रारण्य कहते हैं । गैर आदमी का नाम ' रण ' है । उसके अधिकार में जो पशु होता है - उसका नाम ' आरण्य ' है । ग्यारह ( ११ ) पशु तो यजमान की अपनी वस्तु बन जाते हैं, एवं जो अभी खरीदा नहीं गया है, वह दूसरों की वस्तु है । इसी आरण्य के लिए अनुदेश किया जाता है । यूप से कहा जाता है कि जब आपका काम आएगा तब हम उस श्रारण्य को ले आएँगे । ऐसी भावना करने से उपशय यूप के साथ भी पशु का सम्बन्ध हो जाता है । जैसे श्रौर यूप पशुमान् हो जाते हैं - तथैव - यह यूप भी पशुमान् हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तं निदधाति - एष ते पृथिव्यां लोकः, प्रारण्यस्ते पशुः इति । पशुश्च वै यूपश्च । तदस्मै ( उपशयाय ) आरण्यमेव पशूनामनुदिशति । तेनोऽएष पशु-मान् भवति " । इस प्रकार अग्निष्टोम में बारह ( १२ ) यूप होते हैं । ग्यारह ( ११ ) जमीन में खड़े किए जाते हैं, एक दक्षिण भाग में गाड़ा जाता है । इन ग्यारहों ( ११ हों ) यूपों को किस दिन गाड़ना चाहिए? -इसमें दो मत हैं । एक मत तो यह है कि जिस दिन पशु का प्रलम्भन हो, उसी दिन ग्यारहों ( ११ हों ) यूप गाड़ने चाहिए । दूसरा मत है कि जिस दिन आलम्भन हो, उस दिन से पहले गाड़ने चाहिए । यह जो दूसरा मत है, उसमें फिर दो मत हैं । उन्हीं दोनों मतों का उल्लेख किया जाता है - यूपैकादशिनी का जो सम्मयन है - गाड़ना है उसके विषय में विद्वानों के - याज्ञिकों के - दो मत हैं— " तद् ( तत्र ) द्वयं - यूपैकादशिन्यै ( न्याः ) सम्मयनमाहुः- ( श्रभिज्ञा: -सम्म-ने प्रकार द्वयमाहुः ) " । एक सम्प्रदाय वाले तो श्वसुत्या यूप गाड़ते हैं । उनका कहना है कि यदि तुम्हें कल के दिन पशु-सवन करना है तो पहले दिन ग्यारह ( ११ ) यूप गाड़ लो । कल सवन होगा, इसके लिए पहले दिन यूप गाड़ लेना चाहिए -[ ३१३ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण " श्वः सुत्यायै ( श्वः परेद्युः क्रियमाणायाः सुत्यायाः पूर्वस्मिन् दिने अग्निष्ठप्रमुखान् सर्वान् यूपान् ) एके - सम्मिन्वन्ति ( निखनन्ति ) ” । दूसरा मत है - इसमें यह नियम नहीं है कि पहले ही दिन गाड़ें । श्वः सुत्या से एक, दो, तीन दिन पहले जब चाहो तब यूप गाड़ सकते हो । पशु को बाँधने के लिए यूप गाड़ा जाता है । इसके लिए व्रत - पालन की - ' इसी दिन गाड़ना चाहिए ' इस नियम की - कोई आवश्यकता नहीं है । जब देखो कि अभी और काम नहीं है, बस उसी समय यूप गाड़ दो । परन्तु गाड़ो पहले ही । जिस दिन सुत्या हो उस दिन मत गाड़ो । बस, इतनी बात ध्यान में रक्खो । उसके पहले प्रकुब्द्रती बन जाओ । यदि किसी नियत समय पर नहीं गाड़ें तो हमारा व्रत कुत्सित हो जाएगा- इसकी चिन्ता न करो । ऐसा इसमें व्रत भंग का कोई भी दोष नहीं है-" प्रकुन्द्रतायै चैव श्वः सुत्यायै यूपं मिन्वन्ति इत्यु च ॥३ ॥

इस प्रकार खूप गाड़ने के विषय में जो दूसरा मत है - उसमें भी ये दो मत हैं । इन दोनों मतों का खण्डन करते हुए पहले मत का सिद्धान्त रखते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- ऐसा कभी नहीं करना चाहिए | उत्तरावेदि के ठीक पूर्व में जो सर्वप्रधान प्रग्नीषोमीय पशु बाँधने का श्रग्निष्ठा नाम का यूप है- पहले सिर्फ उसे ही खड़ा करना चाहिए । पहले दिन सिर्फ श्रग्निष्ठा यूप को खड़ा किया जा सकता है । कारण इसका यही है कि यूप को खड़ा करके जब तक उसके डोरी नहीं लपेटी जाती, तब तक अध्वर्यु उससे अलग नहीं हो सकता है । तब तक उसे उसका स्पर्श किए रहना पड़ता है । अग्निष्ठा को छोड़ कर बाकी के जितने भी यूप हैं, उन सब के दूसरे दिन ही डोरी बँधती है । ऐसी अवस्था में अध्वर्यु इस ( १० ) का स्पर्श क्यों कर सकता है? अपिच - यदि पहले ही गाड़ दिये जाएँगे तो रात्रि भर इन यूपों को नंगे रहना पड़ेगा । यूप में दो हिस्से होते हैं - ( १ ) एक चषाल और एक स्वयं यूप । चषाल गुम्बज -दार होता है एवं बीच में प्रठपहलू होता है । यह यूप का फल है । यूप इसमें पेच कसे रहते । पहले ' गाड़ ' दिया जाता है - तदनन्तर चषाल को ऊपर से जमाया जाता है एवं उसके डोरी बाँधी जाती है । इसी डोरी से पशु बँधता है । यह डोरी इस यूप का वस्त्र है । चषाल बैठाना और डोरी लगाना उसी दिन होता है जिस दिन पशु - सवन होता । ऐसी अवस्था में पहले दिन यूप गाड़ना - सब यूपों को नग्न रखना है । यूपों को क्या नग्न रखना है - यजमान को और यज्ञ को दोनों को नग्न रखना है । अत-एव अग्निष्ठा के अलावा अन्य यूपों को पहले दिन कभी नहीं गाड़ना चाहिए । सबसे बड़ी भारी बात तो यह है कि पशु के लिए यूप गाड़ा जाता है । प्रातः काल पशुओं का आलम्भन होता है, एवं उसी समय उन्हें बाँधा जाता है, अतः प्रातःकाल ही यूप गाड़ना उचित है । जीमने वाला सुबह आएगा, पत्तल पहले ही रख दी जाए- जिस प्रकार ऐसा करना सर्वथा अनुचित है तथैव कल बँधने वाले पशुओं के लिए पहले ही दिन यूप गाड़ देना अनुचित है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" तदु तथा न कुर्य्यात् । प्रग्निष्ठमेवोच्छ्रयेत्- ( श्रग्नीषोमीयपश्वथं - उत्तर-वेदेः पुरोदेशस्थं अग्निष्ठा नामक एकमेव यूपं पूर्वस्मिन् दिने उच्छ्रयेत् ) । इदं वै [ ३१४ ]