Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 331–340

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण यूपमुच्छ्रित्य - परिव्ययणात् ( रशनापरिव्ययरणपय्र्यन्तम् ) अध्वर्युः - नान्वर्जति-( नैव हस्त स्पर्शं परित्यजति ) । अपरिवीता ( नग्ना ) एतां ( कृत्स्नां ) रात्रि: वसन्ति । सा न्वेव परिचक्षा - ( पूर्वेद्युरुच्छ्रयमारण पक्षस्य निन्दा ) प्रपिच - पशवे में यूपमुच्छ्रयन्ति । प्रातर्वे पशूनालभन्ते तस्मादु प्रातरेव उच्छ्रयेत् " ॥ ४ ॥

पहले दिन यूपनिखनन कर्म नहीं करना चाहिए, अपितु दूसरे दिन ही करना चाहिए । अब प्रश्न यह रह जाता है कि पहले किसे खड़ा करना चाहिए एवं बाद में किसे खड़ा करना चाहिए । इसी का उत्तर देते हैं-उत्तरावेदि के ठीक पूर्व में जो उत्तर का यूप है, पहले उसे खड़ा करना चाहिए | इस प्रकार ऐसे क्रम से यूप खड़े करने चाहिए, जिससे दक्षिण भाग का यूप सबसे अन्त में श्रावे, उसके खड़े होने का नम्बर अन्त में आए । सूर्थ्य ही से पशु श्राते हैं । सूर्य्यं उत्तर में है एवं पृथिवी दक्षिण में है । सूर्य्य में से निकल कर पृथिवी तक पशु व्याप्त रहते हैं । पशुत्रों का उपक्रम उत्तर से है - उपसंहार दक्षिण में है । ये यूप उन्हीं पशुओं के लिए खड़े किए जाते हैं, अतः प्रकृतिवत् इन यूपों को उत्तरावेदि क्रमयुक्त ही खड़े करना चाहिए-उत्तर १० द ६ ४ २ १ ३ ५ ७ ११ इसी अभिप्राय से कहते हैं-अग्निष्ठा दक्षिण " स य उत्तरोऽग्निष्ठात्स्यात् - तमेवाग्रऽउच्छ्रयेत् । अथ दक्षिणम् । प्रथ

उत्तरम् । दक्षिणाद्धर्यमुत्तमम् । तथोदीची भवति " ॥५ ॥

" अग्निष्ठमध्यमवधिं कृत्वा तत उत्तरतः प्रथमं ततो दक्षिणतो द्वितीयं तत उत्तरतस्तृतीयम् - ततो दक्षिणतश्चतुर्थमित्येवमुभयोः पार्श्वयोरुत्तरप्राथम्येन पञ्च पञ्च यूपा उच्छ्रिताः । तथा सति उदीची भवति - उत्तरोपक्रमा भवति " ( इति हि सायणाचार्य्याः ) । पशु - सम्बन्ध से पूर्व का ही क्रम यद्यपि ठीक होता है, परन्तु यज्ञ - सम्बन्धेन यह क्रम विपरीत पड़ता है । यजमान का दिव्यात्मा एवं यज्ञ पृथिवी से सूर्य की ओर अर्थात् दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है । अतएव यज्ञ सम्बन्धेन दक्षिणोपक्रम ही करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-[ ३१५ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण कितने ही वैज्ञानिक पूर्व के मत से ठीक विपरीत चलते हैं । उनका कहना है कि सबसे पहले अग्निष्ठा से दक्षिण के यूप को खड़ा करना चाहिए, बाद में उत्तर भाग के यूप को खड़ा करना चाहिए । जो सबसे उत्तर यूप है, वह सबके अन्त में खड़ा होना चाहिए । ऐसा करने से इस यजमान का यज्ञ और आत्मा उत्तर में प्रतिष्ठित हो जाता है । ११ ७ ५ ३ १ २ ४ ६ ८ १० उत्तर अग्निष्ठा दक्षिण “ प्रथोऽइतरथाहुः- दक्षिरणमेवाग्रे - अग्निष्ठादुच्छ्रयेत् । अथोत्तरम् । अथ

दक्षिणम् । उत्तराद्धर्यमुत्तमम् । तथो हास्योदगेव कर्मानुसन्तिष्ठत " इति ॥ ६ ॥

ग्यारह ( ११ हों ) यूप एकसार नहीं होते- छोटे - बड़े होते हैं । ग्यारहों ( ११ हों ) उत्तरोत्तर ओछे को कहाँ गाड़ना चाहिए, लम्बे सबसे बड़ा यूप हो उसे दक्षिरगार्द्ध में बड़े होते जाते हैं । इनमें किस को किस जगह गाड़ना चाहिए । को कहाँ गाड़ना चाहिए - यह बतलाते हैं । इन यूपों में से जो खड़ा करना चाहिए । इसके बाद उससे छोटा, उसके बाद उससे छोटा - इस प्रकार करते - करते जो उत्तर भाग है उसके अन्त में सबसे छोटा खूप खड़ा करना चाहिए । ऐसा करने से यज्ञ उत्तर दिक् पितृदेवस्था है, उत्तरा देवदेवत्या है । यदि दक्षिण की ओर नीचा रक्खा जाएगा तो यजमान का आत्मा पितृ - लोक में चला जाएगा अर्थात् एक वर्ष के भीतर - भीतर यजमान मर जायगा । एवं उसका यज्ञ देवदेवत्य न रह कर पितृदेवत्य हो जाएगा । प्रतएव उधर के मार्ग को रोकने के लिए दक्षिण भाग में सबसे ऊँचा यूप खड़ा करना चाहिए, एवं उत्तर में सबसे नीचा खड़ा करना चाहिए, ऐसा करने से यजमान सीधा यज्ञ के उत्तर में जाता है— ८ १० ५ 9 ११ ११ १० ६ ५ ७ ६. ५ उत्तर अग्निष्ठा दक्षिण इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स यो वर्षिष्ठः स दक्षिणाद्धर्चः स्यात् । अथ हसीयान् । अथ हसी-यान् उत्तराद्धर्यो ह्रसिष्ठः । तथोदीची भवति ॥७ ॥

[ ३१६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण इन ग्यारह यूपों के अलावा - एक पत्नीवत यूप और खड़ा किया जाता है । ग्यारहों यूप तो प्राप - देवताओं के लिए खड़े किये जाते हैं एवं बारहवाँ ( १२ वाँ ) यूप देवपत्नियों के लिए और खड़ा किया जाता है । चूँकि यह पत्नियों के लिए खड़ा किया जाता है, अतएव इसे पत्नीवत यूप कहा जाता है । यज्ञेश्वर पूर्ण है एवं देवता और मनुष्य आधे हैं । देवता भी अर्धेन्द्र हैं एवं मनुष्य भी अर्धेन्द्र हैं । इनकी पूर्णता पत्नियों से होती है । पत्नी सम्बन्धेन ये भी पूर्णेन्द्र हो जाते हैं । यज्ञेश्वर से मिलने के लिए पूर्ण बनना आवश्यक है । पूर्णता पत्नी से होती है, अतएव देवपत्नियों के लिए भी यूप खड़ा किया जाता है । यूप यजमानस्वरूप है । यह तब तक अधूरा रहता है जब तक कि इसके साथ पत्नी सम्बन्ध न किया जाए । बस, इस सर्वत्व के लिए, पूर्णेन्द्रता के लिए ही, ग्यारहों ( ११ हों ) से अलग पत्नीवत यूप और खड़ा किया जाता है । 13 यूप, बिना पशु के रहता नहीं, अतएव इसके भी पशु बाँधा जाता है । ग्यारह ( ११ ) यूपों में जो पशु बाँधे जाते हैं उनमें मन्त्रशक्ति द्वारा भिन्न - भिन्न देवतानों का सम्बन्ध किया जाता है । इससे कोई ' अग्नीषोमीय ' पशु कहलाने लगता है । कोई ऐन्द्र पशु कहलाने लगता है । इसी प्रकार पत्नीवत खूप का जो ' पशु है उससे त्वष्टा देवता का सम्बन्ध किया जाता है । इस यूप में त्वष्टृदेवताक पशु का आलम्भन किया जाता है । त्वष्टा के सम्बन्ध की क्या आवश्यकता है? इसकी उपपत्ति बतलाते हैं - योनि में सिक्त जो वीर्य्य है, उसको हाथ, पैर, नाक, मुंह - इत्यादि शरीरावयव बनने के लिए अलग - अलग छाँटना-यह त्वष्टा प्रारण का काम है । रूप दो प्रकार का होता है - ( १ ) वर्णरूप ( २ ) आकाररूप । वर्ण रूप के प्रधिष्ठाता मघवा इन्द्र हैं । अतएव ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति " " " इन्द्रो रूपाणि करीकृदचरत २ यह कहा जाता है । एवं श्राकार रूप के अधिष्ठाता त्वष्टा हैं, अतएव " स्वष्टा रूपाणि पिंशातु ' ' 3 यह कहा जाता है । यहाँ पर इस आहुत वीर्य्य से दिव्यात्मा उत्पन्न करना है । वीर्य्यं को हस्तादि अवयव निर्माण के लिए विकलित करना त्वष्टा का काम है । अतएव यहाँ पर त्वष्टा का सम्बन्ध करना अत्यन्त ही श्रावश्यक है । ग्यारहों ( ११ हों ) यूपों के जो ग्यारह ( ११ ) पशु बाँधे जाते हैं वे बधिया होते हैं, उन्हें बण्ड बना दिया जाता है । नपुंसक अज पशु को ही ग्यारहों ( ११ हों ) यूपों में बाँधा जाता है । परन्तु इस पत्नी यूप के मुष्कर ( अण्डकोशयुक्त प्रजनन शक्तिशाली नर अज ) बाँधा जाता है । जो मुष्कर होता है - वही प्रजनयिता होता है । अण्डकोश में वीर्य्यं जमा होता है - इसीसे सन्तानोत्पत्ति होती है । जिसके अण्डकोश नहीं होते, उसके सन्तान नहीं होती । परन्तु, इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो ग्यारह ( ११ ) पशु हैं, उन्हीं का ग्रालम्भन करना चाहिए । जो यह त्वाष्ट्र पशु है. उसकी कभी नहीं मारना चाहिए । उसे तो ग्राहवनीय के परिक्रमा लगवा कर ही छोड़ देना चाहिए । जो इसकी भी आहुति दे दी जाएगी तो यजमान पुत्र - पौत्रादि के अवसान को प्राप्त हो जाएगा । अर्थात् त्वाष्ट्र पशु का आल-म्भन करने वाले यजमान के कमी भी नहीं होगी । क्योंकि त्वाष्ट्र पशु मुष्कर है - प्रजनयिता है । इसे मारना अपनी प्रजननशक्ति को मारना है । जो इसे छोड़ देता है, वह प्रजा को अग्निमुख से छोड़ देता है | अतः - त्वाष्ट्र पशु का संज्ञपन कभी नहीं करना चाहिए । केवल अग्नि की परिक्रमा करवा कर उसे छोड़ देना चाहिए । १ - ' ऋग्वेद मं ० ३।५३३८ ', २ - ' साम संहिता उ ० ६।७।३ ' ३ ' बृहद ० प्रा ० उ ० ६।४।२१ ' । [ ३१७ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण यूपैकादशिनी ब्राह्मण " थ पत्नीभ्यः पत्नीयूपमुच्छ्रयन्ति । सर्वत्वाय न्वेव पत्नीयूप उच्छ्री-यते । तत् त्वाष्ट्रं पशुमालभते । त्वष्टा वै सिक्तं रेतो विकरोति । तदेष एवैतत् सिक्तं रेतो विकरोति मुष्करो भवति । एष वै प्रजनयिता - यन्मुष्करः । तस्मान्मु-करो भवति । तन्न संस्थापयेत् - ( तस्य बधन्न कुर्य्यात् ) पर्य्यग्निकृतमेवोत्सृजेत् । स यत् संस्थापयेत् - प्रजायै हान्तमियात् । तत् प्रजामुत्सृजति । तस्मान्न संस्था-पयेत् पर्य्यग्निकृतमेवोत्सृजेत् " ॥८ ॥

॥ इति यूपैकादशिनी ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति सप्तमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ २१८ ]

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सप्तमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' पशूपाकरण ब्राह्मणम् ' [ मूल ] पशुश्च वै यूपश्च । न वाऋते यूपात्पशुमालभन्ते कदाचन तत्तथा न ह वा s एतस्माऽग्रे पशवश्चक्षमिरे यदन्नमभविष्यन्यथेदमन्नं भूता यथा हैवायं द्विपात्पुरुष उच्छ्रित एवं हैव द्विपाद उच्छ्रिताश्चेरुः ॥१ ॥

ततो देवा एवं वज्रं ददृशुः । यधूपं तमुच्छिश्रियुस्तस्माद्भीषा प्रावली-यन्त ततश्चतुष्पादा अभवंस्ततोऽन्नमभवन्त्यथेदमन्नं भूता एतस्मै हि वाऽएतेऽति-न्त तस्माद्यूपएव पशुमालभन्ते नर्ते यूपात्कदाचन || २ || थोपाकृत्य पशुम् । श्रग्नि मथित्वा नियुनक्ति तद्यत्तथा न ह वाऽएत-स्माअग्रे पशवश्चक्षमिरे यद्धविरभविष्यन्यथैनानिदं हविर्भूतानग्नौ जुह्वति ता-न्द्रेवा उपनिरुरुधुस्तउपनिरुद्धा नोपावेयुः || ३ || ते होचुः । न वा इमेऽस्य यामं विदुर्यदग्नौ हविर्जुह्वति नैतां प्रतिष्ठा-मुपरुध्यैव पशूनग्नि मथित्वाग्नावग्न जुहवाम ते वेदिष्यन्त्येष वै किल हविषो याम एषा प्रतिष्ठाग्नौ वै किल हविर्जुह्वतीति ततोऽभ्यवैष्यन्ति ततो रातमनस आलम्भाय भविष्यन्तीति ॥४ ॥

त उपरुध्यैव पशून् । श्रग्नि मथित्वाग्नावग्निमजुहुवुस्तेऽविदुरेष वै किल हविषो या त एषा प्रतिष्ठाग्नौ वै किल हविर्जुह्वतीति ततोऽभ्यवायंस्ततो रात-मनस आलम्भायाभवन् || ५ || तथो एवैष एतत् । उपरुध्यैव पशुमग्नि मथित्वाग्नावग्न जुहोति स वेदेष वँ किल हविषो याम एषा प्रतिष्ठाग्नौ वै किल हविर्जुह्वतीति ततोऽभ्यवैति ततो तमना आलम्भाय भवति तस्मादुपाकृत्य पशुर्माग्न मथित्वा नियुनक्ति ॥६ ॥

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुपाकरण ब्राह्मण तदाहु: । नोपाकुर्यान्नाग्नि मन्थेद्रशनामेवादायाञ्जसोपपरेत्याभिधाय नियुञ्ज्यादिति तदु तथा न कुर्याद्यथाधर्मं तिरश्चथा चिकीर्षेदेवं तत्तस्मादेतदेवा-नुपरीयात् ॥७ ॥

अथ तृणमादायोपाकरोति । द्वितीयवान्निरुधाऽइति द्वितीयवान् हि वीर्यवान् || ८ || स तृरणमादत्ते । उपावीरसोत्युप हि द्वितीयोऽवति तस्मादाहोपावीरसी-त्युप देवान्देवीविशः प्रागुरिति दैव्यो वाइएता विशो यत्पशवोऽस्थिषत देवेभ्य इत्येवैतदाह यदाहोप देवान्देवीविशः प्रागुरिति ॥९ ॥

उशिजो वह्नितमानिति । विद्वांसो हि देवास्तस्मादाहोशिजो वह्नितमा-निति ॥१० ॥

देव त्वष्टसु रमेति । त्वष्टा वै पशूनामोष्टे पशवो वसु तानेतद्देवा प्रति-ष्ठमानांस्त्वष्टारमब्रुवन्नुपनिमदेति यदाह देव त्वष्टर्वसु रमेति ॥११ ॥

हव्या ते स्वदन्तामिति । यदा वाडएत एतस्मात्प्रधियन्त यद्धविरभविष्यं-स्तस्मादाह हव्या ते स्वदन्तामिति ॥ १२ ॥

रेवती रमध्वमिति । रेवन्तो हि पशवस्तस्मादाह रेवती रमध्वमिति बृह-स्पते धारया वसूनीति ब्रह्म वै बृहस्पतिः पशवो वसु तानेतद्देवा प्रतिष्ठमाना-ब्रह्मणैव परस्तात्पर्यदधुस्तन्नात्यायंस्तथोऽएवैनानेष एतद्ब्रह्मणैव परस्तात्परिद-धाति तन्नातियन्ति तस्मादाह बृहस्पते धारया वसूनीति पाशं कृत्वा प्रतिमुञ्च-त्यथातो नियोजनस्यव ॥ १३ ॥

[ अनुवाद ] यूप और पशु दोनों अविनाभूत हैं । अर्थात् बिना यूप के पशु का कभी आलम्भन नहीं होता । इस कथन की पुष्टि आख्यायिका द्वारा की जा रही है - ' पशुश्चवै-यूपश्च ' इति । भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि पृथिवी में भुवनस्वर्ग व्यवस्था थी तथा देवतानों ने यज्ञविद्या का आविष्कार किया था उस समय पशुओं ने देवताओं का अन्न बनना स्वीकार [ ३२० ] 1

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तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपाकररण ब्राह्मण नहीं किया था । वे इस बात को सहन नहीं कर सके कि हम देवताओं के अन्न बनें । जिस प्रकार वे देवताओं के अन्न अब बने हुए हैं वैसे प्रारंभ में सरलता से देवताओं के अन्न बनने को तय्यार नहीं हुए । जैसे दो पैर वाला मनुष्य मस्तक को ऊँचा कर तना हुआ रख कर खड़ा रहता है उसी प्रकार यह अज पशु भी आगे के दोनों पैर खड़ा कर देवताओं का सामना करने लग जाते थे । वे पराधीनता को स्वीकार न करके आगे के दोनों पैरों को खड़ा करके विचरते थे || १ || तब देवताओं ने इसे अपने वश में करने के लिए इस वज्र को देखा जो कि यूप नाम से प्रसिद्ध है । उन्होंने इस यूप रूप वस्त्र को खड़ा किया । इस यूपरूप वज्र के भय से पशु प्रत्यन्त अवनत हो गए । वे दो पैर वाले पशु, भय से चार पैर वाले बन गए और तब देवतानों के वश में गए तथा उनके अन्न बन गए जिस प्रकार अभी तक बने हुए हैं । इन पशुओंों को वश में करने के लिए देवतानों ने यूप खड़ा किया । इसलिए यूप के बिना कभी पशु का आलम्भन नहीं होता || २ || प्रासङ्गिक यूपैकादशिनी पक्ष का प्रतिपादन कर प्रकृत अग्नीषोमीय पशु का प्रयोग आरम्भ किया जा रहा है- ' अथोपाकृत्य पशुम् ' इस सन्दर्भ से । अर्थात् सर्वप्रथम यूप गाड़ा जाता है । पश्चात् ' उपावर्तध्वम् ' इस प्रैष से पशु का उपाकररण किया जाता है । अर्थात् पशु को के आहवनीय में अर्थात् महावेदि के गार्हपत्य यूप में बाँधा जाता है । तत्पश्चात् हविर्वेदि में अग्निमन्थन किया जाता है । तदनन्तर देवता के साथ पशु का नियोग किया जाता है । ' इस प्रकार वह अध्वर्यु पशु का उपाकरण कर ग्रर्थात् यूप में पशु को बाँध कर, अग्निमन्थन कर बाद में देवता के लिए नियोग करता है । जिस प्रकार से हविभूमि में इन पशुओं की अध्वर्यु अग्नि में प्राहुति देता है उस प्रकार यज्ञविद्या के प्रारंभ में ये पशु हमारे हवि बनेंगे यह जो देवताओं का विचार था उसे पशुओं ने सहन नहीं किया था । देवता इन पशुओं को पकड़ने जाते तो वे सिर उठा कर आगे के दोनों पैरों को उठा कर सामना करने के लिए तय्यार हो जाते थे । इसलिए देवताओं ने उन पशुओं को वश में करने के लिए उन्हें यूप से बाँधा । तब वे सामना नहीं कर सके और न भागने में समर्थ हो सके ॥३ ॥

देवताओं ने कहा कि जब इन पशुओं को यूप में बाँधा तब वे यह नहीं जानते थे कि अग्नि में हमारी आहुति दी जाएगी और अग्नि में आहुति ही हमारी प्रतिष्ठा ( अन्तिम स्थिति ) है । अत: इन्हें यूप में बाँध कर, अग्नि का मन्थन कर आहवनीयाग्नि में इन की आहुति दे | हमारे अग्निमन्थनादि कार्यों से ये पशु जान लेंगे कि यूप में हमें बाँधना, हमारी अग्नि में आहुति देना ही अन्तिम स्थिति है । तब वे ग्रालम्भन के लिए दत्तचित्त हो जाएँगे । अर्थात् १. श्राप अग्नि व सोम के लिए हैं - इस प्रकार देवता नाम का प्रदर्शन कर पशु को देवता का अन्न बनाना ' नियोग ' कहलाता है । [ ३२१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशूपाकर ब्राह्मण उन पशुओं की प्रवणता ( झुकाव ) यज्ञ की तरफ हो जाएगी और वे आलम्भन के लिए तय्यार हो जाएँगे ॥ ४ ॥

यह विचार कर देवताओं ने सर्वप्रथम पशुओं को यूप में बाँध कर, अग्निमन्थन कर, उस अग्नि को उत्तरावेदिस्थ ग्राहवनीय में प्रतिष्ठित कर दिया । इन अग्निमन्थनादि कार्यों को देख कर यूप से बँधे हुए पशु यह जान गये कि हम देवताओं की हवि हैं और हमें यूप में बाँधने का तात्पर्य हमारी अग्नि में प्राहुति देना है । यही हमारी प्रतिष्ठा है । यह विचार कर अपने जीवन की आशा छोड़ कर वे यज्ञ की ओर प्रवरण हो गये एवं आलम्भन के लिए सन्नद्ध हो गये || ५ || यज्ञ के प्रारम्भ में ऐसा किया था अतः उसी प्रकार प्राज इस मनुष्ययज्ञ में यजमान पशुओं में बाँध कर अग्निमन्थन कर, उत्तरावेदिस्थ ग्राहवनीय में प्रतिष्ठित करता को है । इससे पशु यज्ञ में प्रवरण हो जाते है एवं आलम्भन के लिए दत्तचित्त हो जाता है । अतः पहले उपाकरण कर अर्थात् यूप में पशु को बाँध कर, अग्निमन्थन कर, पश्चात् देवता के लिए उस का नियोग करता है । अन्यथा पहले देवता के लिए पशु का नियोग कर देने पर समय पर पशु के भाग जाने पर या बिगड़ जाने पर देवता का अपमान होगा ॥ ६ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि नियोग से पहले उपाकरण तथा अग्निमन्थन की कोई आवश्यकता नहीं है । एक ऋत्विक् पशु को रस्सी से पकड़, यूप के पास ले जा कर बाँध दे और उसी समय देवता का नियोग कर दे । इस प्रकार अग्निमन्थन के बिना देवता का नियोग हो सकता है तो देवतानियोग से पूर्व अग्निमन्थन करने की कोई श्रावश्यकता नहीं । भगवान् याज्ञवल्क्य इस मत का निराकरण करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी न किया जाए क्यों कि ऐसा धर्म को तिर्यक् प्रकार से अर्थात् उपेक्षा बुद्धि से करना है । अतः जैसा बतला दिया

गया है तथा श्राज तक जैसी पद्धति चली आ रही है, उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिए ।

जैसा परम्परा से विधान है उस का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ॥ ७ ॥

वह अध्वर्यु तृण ले कर पशु के सामने डालता है । दूसरे की सहायता से पशु का निरोध करता है । जिसका सहायक दूसरा व्यक्ति हो वह अधिक बलशाली बन जाता है । अतः पशु को रोकने में अध्वर्यु के अतिरिक्त घास भी काम करता है । घास ही पशु को रोकने में

अध्वर्यु का सहायक है । घास को ले कर ही अध्वर्यु द्वितीयवान् है ॥ ८ ॥

वह अध्वर्यु ' उपावीरसि ' अर्थात् प्राप मेरे पास रह कर रक्षा करने वाले हो, इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ तृरण को हाथ में ले लेता है । अध्वर्यु पशु को रोकता है । इस कार्य में घास सहायक होता है । अत: ' उपावीरसि ' ऐसा कहा है । पश्चात् ' उपदेवान् देवीविश: प्रागु: ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् ये जो पशु हैं, वे देवताओं की प्रजा है अतः यह देवी प्रजा देवतानों के लिए उपस्थित है । इसी अभिप्राय से कहा है- ' उप देवान् देवीविश: प्रागु: ' इति ॥६ ॥

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशूपाकररण ब्राह्मण फिर अध्वर्यु ' उशिजो वह्नितमान् ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् जो सदसद्विवेकी त्रिकालज्ञ प्राणदेवता हैं उनका आप वहन करने वाले हैं । हे तृण! आप के द्वारा ही यह पशु देवताओं का भाज्य बनेगा ॥ १० ॥

तदनन्तर ' देव त्वष्टर्वसु रम ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् हे पशु के स्वामी देव त्वष्टा! आप का जो यह पशुधन है उसे इस में नियुक्त कीजिए । त्वष्टा पशुनों का स्वामी है । यदि त्वष्टा की श्राज्ञा के बिना ही पशु का प्रलम्भन कर दिया जाएगा तो ऊपर स्वर्ग में जाते हुए आत्मा का त्वष्टा प्रारण विरोधक हो जायगा । भुवन स्वर्गवासी देव-ताने त्वष्टा के पशुस्वरूप वसु के पास आ जाने पर त्वष्टा से कहा था कि हे त्वष्टा! आप इनको यज्ञ के लिए दीजिए । देवताओं ने त्वष्टा के प्रति जो ' देव त्वष्टर्वसु रम ' यह कहा था उसका तात्पर्य यही था कि देवताओं ने त्वष्टा से प्रार्थना की थी कि हे त्वष्टा! ये पशु आप की वस्तु हैं । अतः हम इन्हें यज्ञ में काम लेने के लिए आप की प्रज्ञा चाहते हैं ॥११ ॥

इसके बाद ' हव्या ते स्वदन्ताम् ' अर्थात् हे पशु! तुम्हारी जो हवि है. उसे देवतालोग स्वाद ले कर खाएँ । यद्यपि यह पशु के उपाकरण का समय है अतः इस समय देवताओं का भोजन अनुपन्न है । क्यों कि देवताओं का भोजन तो पशु के आलम्भन के बाद होता है । तथापि जो पशु पलायन न करके यहाँ प्रतिष्ठित हो गये हैं वे इन देवताओं की गया ही वस्तु हैं । अर्थात् आलम्भन के लिए जब इन पशुओं का देवताओं के लिए नियोजन हो तो वे एक प्रकार से देवताओं के हंवि बन ही चुके हैं । अतः ' हव्या ते स्वदन्ताम् ' ऐसा कहा है ॥१२ ॥

पश्चात् ' रेवती रमध्वम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । अर्थात् जिन पशुओं की आहुति दी जाने वाली है वे पशु रेवती कहलाते हैं । इसीलिए मूल में लिखा है - ' रेवन्तो हि पशवः ' इति । वे पशु दिव्यलोक में रमण करें । पश्चात् ' बृहस्पते धारया वसूनि ' इस मन्त्र -शेष का उच्चारण करता है । अर्थात् है बृहस्पति! इस पशु - लक्षरण सम्पत्ति को सूर्य स्थान में प्रतिष्ठित कीजिए । तात्पर्य यह है कि पशु परमेष्ठी की वस्तु है । परमेष्ठि - लोक सूर्य - लोक से ऊपर है । सूर्य और परमेष्ठी के मध्य में बृहस्पति है । आलम्भन कर अग्नि में पशु की आहुति दी जाती है तब पार्थिव पशुओं का ग्रन्थिबन्धन टूट जाने पर वे पशु अपने परमेष्ठि-लोक में जाना चाहते हैं । यज्ञ - संस्था सूर्य पर समाप्त हो जाती है । अत: सूर्य से ऊपर पर-मेष्ठि - लोक में जाने पर सूर्य - लोक का प्रतिक्रमण कर जाने से यज्ञ भ्रंश हो जायगा । अतः बृहस्पति से प्रार्थना की जाती है कि आप इन पशुओं को परमेष्ठी में मत जाने दीजिए । इन्हें सौर संस्था में ही प्रतिष्ठित रखिए । उपर्युक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञ-वल्क्य कहते हैं - ' ब्रह्म वै बृहस्पतिः पशवावसु, तानेतद्द वा प्रतिष्ठमानात् ब्रह्मणैव परस्ता-त्पर्यदधुः ' इत्यादि । इस के बाद पशु के गले में रस्सी बाँध देता है । इस के बाद उसका नियोग किया जाता है— ' अथातो नियोजनस्यैव ' इति ॥ १३ ॥

[ ३२३ ] "

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तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपाकररण ब्राह्मण [ विज्ञान भाष्य ] यूप खड़े कर दिए गए । पशुपाकरण बिना यूप के नहीं हो सकता । यूप और पशु दोनों प्रविनाभूत हैं । इस पूर्वोक्त कथन की ही आख्यायिका द्वारा पुष्टि की जाती है । पशु और यूप श्रविनाभूत हैं । प्रकृति में सूर्य्य यूप है- रोदसी के पुरुषाश्वादि पश्ञ्च पशु उस यूप अन्न हैं । सूर्य्य यूप न इन पशुओं के बिना रहता है एवं न पशु इनके बिना रहते हैं । एवमेव यहाँ पर इस वैध यज्ञ में भी पशु बिना यूप के नहीं रहते । पशु को जब तक यूप से बाँध नहीं दिया जाता है, तब तक वह संज्ञपन करवाने में प्रवण ही नहीं होता है । बिना यूप के पशु का आलम्भन करना कठिन है । इसी बात की भुवनस्वर्गवासी देवताओं के इतिहास से पुष्टि करते हैं--" पशुश्च वै यूपश्च: । न वाऋते यूपात्पशुमालभन्ते कदाचन । तद्-यत्तथा ( तथोच्यते ) - ( तत्र यथा यूपेन विना कदाचन पशुमालम्भन्ते तथोच्यते ) " । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब पृथिवी पर भुवनस्वर्ग व्यवस्था थी एवं देवताओं ने अपने वैज्ञानिक मस्तिष्क से यज्ञ - विद्या का आविष्कार किया था, उस समय पशुत्रों ने इस वक्ष्यमारण देवान्न-भाव के लिए कि ' हम इनके अन्न होंगे ये हमारी आहुति देंगे ' इसके लिए राजी न हुए जैसे कि आज यह-देवताओं के यज्ञिय मनुष्यों के अन्न हो गए हैं; तब, अर्थात् प्राज जैसे प्रज- पशु आदि का देवताओं ने प्राण देवताओं के अन्न बनने के लिए प्रलम्भन करना चाहा तो पशुओंों ने इस को सहन न किया । ये पशु अन्न होंगे - यह जो मनुष्य देवताओं का खयाल था, उसे पशु न सह सके । उनको अपने कब्जे में करने की बहुत कोशिश की, परन्तु वह सारी कोशिश व्यर्थ गई । मनुष्य - देवता जब भी कभी उन्हें पकड़ने लगते हैं तो जिस प्रकार दो पैर वाला मनुष्य सर को तना हुआ रख कर खड़ा रहता है तथैव यह भी अपने आगे के दोनों पैर खड़े कर लेते और देवताओं के कब्जे में नहीं श्राते । देवता जब सामने प्राते वे अपने प्रागे के दोनों पैर खड़े कर उनका सामना करने लग जाते । इस प्रकार प्रारम्भ में मनुष्यवत् दोनों पाँव ऊँचे कर सामना करते हुए ये पशु विचरते रहते थे । आज अन्न बन गए हैं परन्तु उस समय ये अन्न बनेंगे ' मनुष्य - देवताओं के इस प्रश्न भाव के लिए वे पशु तैयार नहीं थे । वास्तव में बात सच है - यदि आज भी हम खुले बकरे को पकड़ना चाहें तो वह पकड़ में नहीं आएगा, अपितु, दोनों पैर खड़े कर मारने के लिए तय्यार हो जाएगा । उसका जो ग्रात्मा है, वह पराधीनता स्वीकार करना नहीं चाहता । इसी पशु-स्वभाव - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " न ह वाडएतस्मै । ( वक्ष्यमारणाय - श्रन्नभावाय ) अग्रे ( यज्ञ - विद्या प्रारम्भ-काले ) पशवश्चक्षमिरे यदन्नमभविष्यन् - यथेदमन्नं भूता - ( यथा- इदानीं यूपनियुक्ताः सन्तः पशवो - प्रारण देवान्नमभवन् तथा यूपाभाव - काले अन्नाय न चक्षमिरे - क्षम-मारणा न बभूवः ) । यथा हैवायं द्विपात् पुरुष उच्छ्रितः । एवं हैव द्विपाद उच्छ्रिताश्चेरुः " ॥ १ । [ ३२४ ] B