Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 341–350

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 341 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशूपाकरणं ब्राह्मणे देवताओं ने इनकी इस उद्दण्डता को दूर करने के लिए इन्हें अपना अर्थात् प्राण - देवताओं का अन्न बनाने के लिए इस वज्र को देखा जो कि आज ग्रुप नाम से प्रसिद्ध है । उन्होंने सोचा कि यदि पशु किसी तरह वश में आ सकता है तो इसका एकमात्र उपाय यही शस्त्र है । इसी यूप - शस्त्र के खूंटे से इसका औद्धत्य मिटाया जा सकता है । यह विचार कर देवताओं ने यज्ञ में यूप को खड़ा कर दिया । बस, उस यूप - वज्र को देखते ही मारे डर के पशुगण अवनत हो गए । उसी समय मस्तक झुका लिया । मस्तक झुकते ही दो पैर वाले पशु - चार पैर वाले बन गए । कहाँ तो मारे उद्दण्डता के आगे के पैर न समझ कर मनुष्यों के हाथों की तरह उन्हें उठाए ' रखते थे; कहाँ आज मारे डर के वही दोनों पैरों को नीचे करके अपने स्वस्वरूप में प्राए हुए हैं । यज्ञ में जो पशु लाया जाता है, यूप को देखते ही उसकी सारी उद्दण्डता नष्ट हो जाती है । मारे डर के आगे के पैरों को उठाना भूल कर वह नतमस्तक हो कर चार पैर वाला बन जाता है । बलिदान के लिए भगवती के सामने जब पशु को ले जाया जाता है तो वहाँ उस चमकदार तलवार को देखते ही उसका औद्धत्य मारा जाता है एवं वह नतमस्तक खड़ा हो जाता है । यदि तब भी नम्र नहीं होता है - तो समझ लो - इसके श्रात्मा में कोई विकार है- भगवती इसको अन्न बनाना नहीं चाहती । ठीक यही हालत यज्ञीय पशु की हो जाती है । यूप को देखते ही यूप में बाँधते ही - उसकी उच्छृंखलता मारी जाती है । जब देवताओं ने यूप खड़ा कर दिया तो पशु मारे डर के नत-मस्तक हो गए और देवताओं के अन्न बन गए, जैसे कि आज इस मनुष्य - यजमान के अन्न बने हुए हैं । जो पशु अन्न बनने के लिए पैर उठा कर हमला करते थे, वे आज इस अन्न कर्म के लिए चुपचाप शान्त भाव से खड़े हो गए । यही कारण है कि यूप ही में पशु का आलम्भन करते हैं । बिना यूप के पशु का आलम्भन कदापि नहीं करते हैं । बकरे वश में नहीं आते थे, उन्हें अपने वश में करने के लिए देवताओं ने यूप खड़ा किया था । यूप में बाँध देने से उनकी सारी उद्दण्डता जाती रही थी । अतएव तब से यही पद्धति बन गई । बिना यूप खड़ा किए पश्वालम्भन न किया जाय । तभी से ' यूपश्चैव पशुश्च ' यह नियम चला | देवता लोग बलपूर्वक भी प्राहुति दे सकते थे, परन्तु प्रौद्धत्यभावयुक्त पशु की प्राहुति सर्वथा व्यर्थ चली जाती है । जब तक पशु का आत्मा उस कार्य में प्रवरण नहीं होता, तब तक उसे अन्न बनाना सर्वथा व्यर्थ है । अतः उसे प्रवण बनाने के लिए देवताओं ने यूप का आविष्कार किया । यद्यपि कईपशु सीधे भी होते हैं, बिना यूप के भी उनका आलम्भन किया जा सकता है, तथापि, सम्भव है, वह हाथ - पैर मारने लगे । यदि ऐसा हो जाएगा तो उसी समय यज्ञ बिगड़ जाएगा, अतएव उसे यूप के अवश्य ही बाँध देना चाहिए । ऐसा करने से उसकी उद्दण्डता एकान्ततः नष्ट हो जाती है । अतएव यज्ञ-विद्यावेत्ता यूप में बाँध कर ही पशु का आलम्भन करते हैं । बिना यूप के वे कभी भी पश्वालम्भन नहीं करेंगे । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" ततो देवा एतं वज्रं ददृशुः यद्यूपम् । तमुच्छिश्रियः । तस्माद् भीषा ( भयेन ) प्रावलीयन्त - ( अवनता - नतमस्तका बभूवुः ) । ततश्चतुष्पादा प्रभवन् ।

ततोऽन्नमभवन् - यथेदमन्नं भूता । एतस्मै ( अन्नकर्मणे ) हि वा अतिष्ठन्त ।

तस्माद् यूपएव पशुमालभन्ते नर्ते यूपात् कदाचन " ॥ २ ॥

[ ३२५ ]

पृष्ठ 342

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 342 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पाकर ब्राह्म इस प्रकार प्रासङ्गिक यूपैकादशिनी पक्ष का प्रतिपादन करके प्रकृत अग्नीषोमीय प्रयोग प्रारम्भ करते हैं । सबसे पहले यूप गाड़ा जाता है । बाद में ' उपावर्त्तध्वम् ' इस प्रैष से पशु का उपाकरण किया है । पशु को यूप में बाँध दिया जाता है । तदनन्तर हविर्वेदी के ग्राहवनीय में जो कि इस महावेदि गाय है- अग्निमन्थन किया जाता है । बाद में देवता के साथ पशु का नियोग किया जाता है । आप अग्निषोम के लिए हैं - यह कह देवता का नाम प्रदर्शित कर पशु को देवता का अन्न बनाना ही ' नियोग ' कहलाता है । इस प्रकार वह अध्वर्यु उपकरण कर, पशु को यूप के बाँध, श्रग्निमन्थन कर बांद में देवता से उसका नियोग करता है-" अथोपाकृत्य पशुम् - अग्नि मथित्वा नियुनक्ति " । अग्नि - मन्थन के पहले ही पशु को क्यों बाँध दिया जाता है एवं बाँधने से पहले, अग्निमन्थन से पूर्व ही, देवतानियोग क्यों नहीं किया जाता है - इसका कारण बतलाते हैं-" तद्यत् - तथा- ( तदुच्यते - इति शेषः ) " । जिस प्रकार - हविर्भूत इन पशुओं की प्राज- इस अग्नि में अध्वर्यु वगैरह ऋत्विक् प्राहुति देते हैं - उसी प्रकार यज्ञ - विद्या के प्रारम्भ में ही - ' यह हमारे हवि बनेंगे ' - यह जो मनुष्यदेवताओं का खयाल ' था - वह जरा भी बर्दाश्त नहीं था । श्राज जैसे ये हवि बन रहे हैं वैसे पहले न थे । हवि के लिए जब भी देवता इन्हें पकड़ने जाते थे, ये दोनों पैरों पर खड़े हो जाते थे । इस उद्दण्डता को दूर करने के लिए देवताओं ने सबसे पहले उन्हें कब्जे में किया । सब न हो सके । और और काम बाद में किया । पहले-पहले उन्होंने उन पशुओं को ही यूप के बाँध कर उन्हें अपने अधीन किया । यही तात्पय्यं है— " न ह वा एतस्मा ( एतस्मै - हव्य करणे ) अग्रे पशवश्चक्षमिरे । यद्ध-विरभविष्यन् - यथैनानिदं हविर्भूतानग्नौ जुह्वति - ( याज्ञिकाः ) । तान् देवा उप-निरुरुधुः । त s उपनिरुद्धा नोपावेयुः " || ३ || देवताओं ने कहा कि हविस्वरूप हमारे लिए ऋत्विक् लोग इस अग्नि में आहुति देते हैं । यही प्रति हमारी अन्तिम प्रतिष्ठा है- अब हमारा शयन सदा के लिए इसी अग्नि में होगा, नियोजन के इस तात्पर्य को अभी ये पशु सर्वथा नहीं जानते हैं । अभी इनको यह मालूम नहीं हुआ है कि हमें इसीलिए इन्होंने यूप के बाँधा है । अभी इन्हें अपनी इस अग्नि प्रतिष्ठा का पता नहीं है, प्रतएव हमें चाहिए कि पहले इनको यूप से बाँध दें । इस प्रकार इन पशुओं को पहले यूप से बाँध कर, बाद में अग्निमन्थन कर अग्नि में अर्थात् श्राहवनीय में मन्थित अग्नि में आहुति डालें । हमारे इन कार्यों से यूप हुए पशु जान जाएँगे कि बस हविस्वरूप हमें यहाँ पर बाँधने का यही तात्पर्य है । यही अग्नि हमारी अन्तिम प्रतिष्ठा है । ऋत्विक लोग इसी अग्नि में हविर्भूत हमारी प्राहुति डालते हैं । इस प्रकार अपने कम्म से उन्हें इसका निश्चय हो जाएगा कि हम इसलिए यहाँ बाँधे गए हैं तो फिर वे पशु इस यज्ञ की ओर [ ३२६ ]

पृष्ठ 343

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 343 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुपाकरण ब्राह्मण प्रवरण हो जाएँगे । उनका झुकाव इस यज्ञ की ओर हो जाएगा एवं पशु - आलम्भन के लिए वे दत्तमना हो जाएँगे । वास्तव में सच है । वधिक जिस समय बकरे को अपनी वध - शाला में ले जाता है, तब तक उसे पता नहीं रहता कि मेरा यह क्या करेगा? परन्तु जब वहाँ पर जा कर उसे छुरी को पैनाते देखता है - इधर - उधर अज - चर्म्म टँके देखता है - रुधिर बिन्दु देखता है तो उसे विश्वास हो जाता है कि मेरी भी यही गति होने वाली है । यह खयाल आते ही वह वध की ओर प्रवरण हो जाता है - उसे विश्वास हो जाता है कि मैं अब नहीं बच सकता । अतएव उसका आत्मा उधर झुक जाता है । यदि उसे एकाएक पकड़ा जाता है तो वह घबरा जाता है । ठीक यही बात यहाँ पर भी है । पशु को धोखे से मारना अनु-चित है । धोखे से मारने से यदि वह हाथ - पैर हिला देगा तो यज्ञ भ्रष्ट हो जाएगा । अतएव उसे ' क्रतु ' बनाने के लिए उसे पहले यूप के बाँध दिया जाता है । बाद में उसके सामने अग्निमन्थनादिकार्य्यं किए जाते हैं । गार्हपत्यस्थ मन्थनाग्नि को ग्राहवनीय में रक्खा जाता है । यूप के बँधा हुआ पशु इन सब कामों को देखता रहता है । इससे उसे निश्चय हो जाता है कि मेरी यही गति होगी । श्रतएव उसकी आत्मा उसी ओर प्रवण हो जाती है । इसी स्वाभाविक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं--हो:: - - " न वा इमे ( पशवः ) अस्य यामं ( तात्पय्र्यं ) विदुः -- यदग्नौ हविर्जुह्वति । नैतां प्रतिष्ठाम् । ( नियोजनस्य तात्पर्यं न ज्ञातवन्तः ) । अतः -उपरुध्यैव पशूनग्न मथित्वाग्नावग्न जुहवाम - ( एतेन कर्म्मणाः ) । ते वेदिष्य-ति एष वै किल हविषो यामः एषा प्रतिष्ठा - अग्नौ वै किल हविर्जुह्वति इति । ततोऽभ्यवैष्यन्ति - ( यज्ञे प्रवरणा भविष्यान्त ) ततो रातमनस श्रालम्भाय भवि व्यन्ति " - इति ॥४ ॥

यह विचार कर देवताओं ने पहले - पहल पशुओं को बाँध कर बाद में अग्निमन्थनकर, फिर उस अग्नि को - उत्तरावेदिस्थ आहवनीय में प्रतिष्ठित किया - यह कर्म्म देख कर यूप से बँधे हुए पशु जान गए कि बस - ' हम जो हवि है ' - उन्हें बाँधने का अर्थात् हमारे यहाँ बाँधने का यही तात्पर्य है । हमारी प्रतिष्ठा यही अग्नि है । ऋत्विक् लोग अग्नि में हमारी आहुति डालते हैं- पशु यह विचार कर जीने से

नाउम्मीद हो कर यज्ञ की ओर प्रवण हो गए एवं रातमना हो आलम्भन के लिए तय्यार हो गए ।

" ततो रातमानस श्रालम्भायाभवन् " ॥५ ॥

इस प्रकार मनुष्य- देवताओं ने यज्ञ के प्रारम्भ में इसलिए ऐसा किया था । तथैव आज इस यज्ञ में यह यजमान भी पशुओंों को बाँध कर ही श्रग्निमन्थन करता है - प्रग्निमन्थन कर उसे उत्तरावेदिस्थ आहवनीय में प्रतिष्ठित करता है । जब ऋत्विक् यह कर्म्म करता है तो यूप से बँधा हुआ पशु जान जाता है कि “ हविर्भूत मुझे बाँधने का यही तात्पर्य है, मेरी यही प्रतिष्ठा है । ऋत्विक् लोग मुझ हवि की इसा अग्नि में आहुति देते हैं " - यह विचार कर पशु यज्ञ में प्रवण हो जाता है एवं प्रलम्भन के लिए दत्तमना हो जाता है । [ ३२७ ] 1

पृष्ठ 344

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 344 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पशूपाकरैण ब्राह्मण तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मणं [ ३२८ ] 9 1 1 ; 1 i हम यदि पहले ही उसे देवता के लिए निवेदन कर देंगे एवं वक्त पर वह बिगड़ जाएगा तो देवता का अपमान होगा । अतः पहले उसका पूजन कर, उसे बाँध कर, अग्निमन्थन कर, बाद में देवता के साथ उसका सम्बन्ध कराना चाहिए -तथो एवैष एतत् - उपरुध्यै पशुं - श्रग्नि मथित्वा - श्रग्नावग्न जुहोति । स ( पशु ) वेद एष वै किल हविषो यामः एषा प्रतिष्ठा अग्नौ वै किल हवि-जुह्वति इति । ततोऽभ्यवैति । ततो रातमना आलम्भाय भवति । तस्मादुपाकृत्य पशुग्न सथित्वा नियुनक्ति " ॥६ ॥ 1

कितने ही आचार्यों का मत है कि " पशु के उपाकरण की कोई प्रावश्यकता नहीं है । एवं पहले afe मन्थन की भी कोई आवश्यकता नहीं । जब देवता के नियोग का निबन्धन पहले हो जाएगा तो पशु रात मन से प्रलम्भन के लिए तय्यार हो जाएगा; ये फिजूल की बातें हैं । इसलिए अग्निमन्थन के पहले ही उसे रस्सी से बाँध कर यूप से बाँध देना चाहिए । यूप से बाँध कर देवता के लिए निर्देश करना चाहिए । बाद में अग्नि- मन्थन करना चाहिए । करना तो पशु का आलम्भन ही है । इसके लिए यों करो 1 त्यों करो - इन सौ झगड़ों की क्या जरूरत है? " भगवान् याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं- " ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । जिस प्रकार धर्म को तिर्य्यक् प्रकार से उपेक्षा बुद्धि से कोई करने की इच्छा करे- वैसा यह करना है जो कि पद्धति के विपरीत नियोग के बाद अग्नि - मन्थन करना है । हम पूजा भी करते हैं- प्रर और धर्म के कार्य्यं भी करते हैं परन्तु यदि सब में उपेक्षा बुद्धि है तो उनसे कुछ लाभ नहीं हो सकता । व्याज से धर्माचरण करना अपना अधःपतन करना है । ' प्रो बाबा काम करना है - झटपट आफत मिटाओ ' उसी उपेक्षा बुद्धि ने आज ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व का सत्यानाश कर डाला है । ब्राह्मण देवता - यजमान से देवतानों पर अक्षर पुष्पादि चढवाते हैं, उस समय यजमान जो देवता से दो हाथ दूर बैठे ही चावल फेंकते रहते हैं - इसी का नाम है उपेक्षा बुद्धि । ठीक इसी प्रकार रस्सी से यूप- पशु को बाँध लो - देवता- नियोग पहले कर लो अग्निमन्थन बाद में कर लेना- जैसी काम पद्धति करने चली से मतलब है " यह कहना है । अतः हमारे खयाल से- जैसा हमने बतलाया है - आज तक श्रा रही है उसी के अनुसार सारा कर्म्म करना चाहिए— " तदाहु: - नोपाकुर्य्यात् । नाग्नि - मन्थेत् । रशनामेवादाय -अञ्जसा उप-परेत्य अभिधाय नियुञ्ज्यात् इति । तदु तथा न कुर्य्यात् । यथा धर्मं तिरश्चथा

चिकीर्षेत् एवं तत् । तस्मादेतदेवानुपरीयात् " इति ॥७ ॥

इस प्रकार किसके बाद क्या करना चाहिए? - यह क्रम बतला कर अब श्रर्थवाद सहित उपा-करण का विधान करते हैं । वह अध्वर्यु तृण ले कर उसे पशु के सामने डालता है । दूसरे की मदद ले कर मैं पशु का निरोध करता हूं, इसीलिए तृण रखता है । जिसका सहायक दूसरा मनुष्य होता है, वह अधिक बलशाली बन जाता है । दो तो मिट्टी के भी जबर्दस्त होते हैं । जैसे यूप से पशु रुकता है तथैव घास के प्रलोभन से भी पशु रुक जाता है । घास भी पशु के न भागने में सहायक होता है । चूँकि तृण इसका सहा-यक है, यह अध्वर्यु द्वितीयवान् है - प्रतएव इसका कार्य्यं अवश्य ही सिद्ध हो जाता है ।

पृष्ठ 345

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 345 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशूपाकरण ब्राह्मण “ अथ तृणमादायोपाकरोति । द्वितीयवान् निरुरणधे - इति । ( निरोधं करवाणि इति ) । द्वितीयवान् हि वीर्य्यवान् " ॥८ ॥

क्यों तृण रक्खा जाता है? - इसकी उपपत्ति बतला दी गई । श्रब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु ' उपावीरसि ' ' यह मन्त्र बोल कर तृण उठाता है । आप मेरे उपरक्षक हो - यही तात्पर्य है । हे तृरण! आप मेरे समीप रह कर मेरे रक्षक हो । अध्वर्यु कार्य्यं करता है - पशु को रोकता है - इसमें घास मदद पहुंचाता है । जो मनुष्य कार्य करता है - उसके पास का दूसरा मनुष्य उसे मदद पहुँचाता है, अतएव उसे ' उपावी: ' कहा गया है-रसि " । " स तृरणमादत्ते - उपावीरसि । उप हि द्वितीयोऽवति । तस्मादाह - उपावी-फिर मन्त्र - शेष बोलता है-" उप देवान् देवीविशः प्रागुः " ( वा ० स ० ६ । ७ ) यह जो पशु है - वह देवतात्रों की प्रजा है - प्रर्थात् देवताओं की चीज है । इसकी प्राहुति में हमारा स्वार्थ नहीं है । पशु - लक्षण जो देवी प्रजा है- देवताओं के लिए उपस्थित है । तात्पर्य यही है कि हम जो आपसे मदद माँग रहे हैं - वह सत् कार्य के लिए माँग रहे हैं । हम अपने स्वार्थ के लिए आपसे मदद नहीं माँ पितु देवकार्य के लिए आपसे सहायता चाहते हैं ।

" दैव्यो वा se ता विशो यत् पशवः । अस्थिषत देवेभ्य इत्येवैतदाह ।

यदाह उपदेवान् देवीविशः प्रागुरिति " इति ॥९ ॥

फिर शेष मन्त्र बोलते हैं-" उशिजो वह्नितमान् " २ - जो सदसद्विवेकी त्रिकालज्ञ प्राणदेवता हैं, उनका आप वहन करने वाले हैं । हे तृण! आपकी बदौलत ही यह पशु - हवि देवताओं को प्राप्त होगी-" विद्वांसो हि देवाः । तस्मादाह - उशिजो वह्नितमान् " - इति ॥ १० ॥

" देवत्वष्टसुरम " - हे देवत्वष्टः! पशुस्वामिन् - प्रापका जो यह पशु धन है - उसे इस यज्ञ में नियुक्त कीजिए | त्वष्टा ही पशुओं के स्वामी हैं । यदि इनकी प्राज्ञा बिना ही पशु - प्रालम्भन कर दिया जाएगा तो ऊपर जाते हुए आत्मा त्वष्टाप्राण विरोधक है । भुवनस्वर्ग निवासियों ने त्वष्टा के पशु-स्वरूप पशु के पास आ जाने पर त्वष्टा से कहा था कि हे त्वष्टा श्राप इनको यज्ञ के लिए दीजिए । उनका त्वष्टा के प्रति जो ' देव त्वष्टर्वसु रम् ' 3 यह कहना था वह त्वष्टा से प्रार्थना करना था कि हे त्वष्टा! आपकी यह वस्तु है, अतएव इसे यज्ञ में काम में लेने के लिए हम आपकी श्राज्ञा चाहते हैं-१ - वा ० स ० ६।७ ।

२ - वा ० सं ० ६१७ ।

३- वा ० सं ० ६।७ ॥

[ ३२६ ]

पृष्ठ 346

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 346 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुपाकरण ब्राह्मण " त्वष्टा वै पशूनामीष्टे । पशवो वसु । तानेतद्वेवा प्रतिष्ठमानांस्त्वष्टा-रमब्रुवन् - उपनिमदेति - ( अस्मत् समीपे नितरामादय ) यदाह - देव त्वष्टर्वसु रमेति " ॥११ ॥

' हव्या ते स्वदन्ताम् ' ' हव्या ते तुम्हारी जो हवि है - उन्हें देवता लोग स्वाद ले ले कर खाएँ । यद्यपि उपाकरण काल ही में देवताओं को भोजन अनुपपन्न है, तथापि न भाग कर जो पशु यहाँ प्रति-ष्ठित हो गये हैं - वे इन्हीं की वस्तु हैं । इस कर्म के लिए जब कि इनका नियोग हो गया तो ये एक प्रकार से इनके हवि हो ही चुके- प्रतएव ' हव्या ते स्वदन्ताम् ' यह कहा है ॥ १२ ॥

' रेवती रमध्वम् पशुगरण उस दिव्य स्थान में रमण करें । जिन पशुओं की आहुति दी जाती हैं, वे दिव्यलोक में चले जाते हैं । पशु रेवन्त हैं- रेवती नक्षत्र से उत्पन्न होते हैं, अतएव -" रेवन्तो हि पशवः " I यह कहा गया है । " बृहस्पते धारया वसूनि " । हे बृहस्पते! पशु - लक्षण जो सम्पत्ति है उसे आप इसी सूर्य्य - स्थान में प्रतिष्ठित कीजिए । पशु परमेष्ठी की वस्तु है । परमेष्ठी सूय्यं से ऊपर है । सूर्य्य और परमेष्ठी के बीच में बृहस्पति है । अतएव यह कहा जाता है ---" बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ” । पार्थिव पशुश्नों का जब ग्रन्थिबन्धन टूट जाता है तो वे अपने प्रभु परमेष्ठी में जाना चाहते हैं । यज्ञसंस्था सूर्य पर ही समाप्त हो जाती है । ऐसी अवस्था में यदि पशु बाहर निकल जाएँगे तो यज्ञ ही भ्रष्ट हो जाएगा । श्रतएव बृहस्पति से प्रार्थना की जाती है कि आप ऊपर परमेष्ठी में मत जाने दीजिए अपितु इसी सौर यज्ञसंस्था में ही प्रतिष्ठित रखिए । इसी प्रभिप्राय से कहते हैं- पशु ही वसु । यज्ञ-मण्डलस्थ पशु का देवताओं ने इस बृहस्पति से उस ओर से अर्थात् परमेष्ठी की ओर से अवरोध किया । ऐसा करने से पशु उस ओर अपने प्रभव - स्थान में अतिक्रमण न कर सके ऐसी ही व्यवस्था यजमान भी करता है । उपकरण समाप्त हो चुका । अध्वर्यु अब पशु के गले में रस्सी डाल देता है । इसके बाद उसका नियोग किया जाता है-" अथातो नियोजनस्यैव ( मीमांसाक्रियते ) " ॥१३ ॥

॥ इति पशूपाकरण ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति सप्तमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ १ - वा ० सं ० ६।७ । २- वा ० सं ० ६८ । [ ३३० ] 8 1

पृष्ठ 347

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 347 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' पशुसंज्ञपन ब्राह्मणम् ' [ मूल ] पाशं कृत्वा प्रतिमुञ्चति । ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रति-मुञ्चामीति वरुण्या वाडएषा यद्रज्जुस्तदेनमेतदृतस्यैव पाशेन प्रतिमुञ्चति तथ हैनमेषा वरुण्या रज्जुर्न हिनस्ति ॥ १ ॥

धर्षा मानुष इति । न वा एतमग्रे मनुष्योऽधृष्णोत्स यदेवर्त्तस्य पाशेने -तद्देवहविः प्रतिमुञ्चत्यथैनं मनुष्यो धृष्णोति तस्मादाह धर्षा मानुष इति ॥ २ ॥

अथ नियुनक्ति । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ता-भ्यामग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मोति तद्यथैवादौ देवतायै हविर्गृह्णन्नादिशत्येव-मेवैतद्देवताभ्यामादिशत्यथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षरणस्य बन्धुर्मेध्यमेवैतत्करोति || ३ || स प्रोक्षति । श्रस्त्वौषधीभ्य इति तद्यत एव सम्भवति तत एवैत-मेध्यं करोतीदं हि यदा वर्षत्यथौषधयो जायन्त श्रोषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति रसादेतो रेतसः पशवस्तद्यत एव सम्भवति यतश्च जायते तत एवैतन्मेध्यं करोति ॥ ४ ॥

अनु त्वा माता मन्यतामनु पितेति स हि मातुश्चाधि पितुश्च जायते तद्यत एव जायते तत एवैतन्मेध्यं करोत्यनु भ्राता सगर्भ्योऽनुसखा सयूथ्य इति स यत्ते जन्म तेन त्वानुमतमारभऽइत्येवैतदाहाग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामीति तद्याभ्यां देवताभ्यामारभते ताभ्यां मेध्यं करोति ॥ ५ ॥

प्रोपगृह्णाति । श्रपाम्पेरुरसीति तदेनमन्तरतों मेध्यं करोत्यथाधस्तादु-पोक्षत्यापो देवी: स्वदन्तु स्वात्तं चित्सद्देवहविरिति तदेनं सर्वतो मेध्यं करोति ॥ ६ ॥

[ ३३१ ] 8

पृष्ठ 348

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 348 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण थाहाग्नये समिध्यमानायानुब्रूहीति । स उत्तरमाधारमाघार्यासंस्पर्शय-gat पर्येत्य जुह्वा पशुं समनक्ति शिरो वै यज्ञस्योत्तर आधार एष वाऽत्र यज्ञो भवति यत्पस्तद्यज्ञ एवैतच्छिरः प्रतिदधाति तस्माज्जुह्वा पशुं समनक्ति ॥७ ॥

स ललाटे समनक्ति । सन्ते प्रारणो वातेन गच्छतामिति समङ्गानि यज-त्रैरित्यंसयोः सं यज्ञपतिराशिषेति श्रोण्योः स यस्मै कामाय पशुमालभन्ते तत्प्राप्तु-हत्येवैतदाह || ८ || इदं वै पशोः संज्ञप्यमानस्य । प्राणो वातमपिपद्यते तत्प्राप्नुहि यत्ते प्राणो वातमपिपद्याताऽइत्येवैतदाह समङ्गानि यजत्रैरित्यङ्गेर्वाऽस्य यजन्ते तत्प्राप्नुहि यत्तेऽङ्गजान्ताऽइत्येवैतदाह सं यज्ञपतिराशिषेति यजमानाय वाऽएते-नाशिषमाशासते तत्प्राप्नुहि यत्त्वया यजमानायाशिषमाशासान्ताऽइत्येवैतदाह सादयति चावथ प्रवरायाश्रावयति सोऽसावेव बन्धुः ॥ ९ ॥

अथ द्वितीयमाश्रावयति । द्वौ ह्यत्र होतारौ भवतः स मैत्रावरुणायाहैवा-श्रावयति यजमानं त्वेव प्रवृणीतेऽग्निर्ह देवीनां विशां पुर एतेत्यग्निहि देवतानां मुखं तस्मादाहाग्निर्ह देवीनां विशां पुर एतेत्ययं यजमानो मनुष्याणामिति तं हि Hisar भवति यस्मिन्नर्थे यजते तस्मादाहायं यजमानो मनुष्याणामिति तयोर-स्थूरि गार्हपत्यं ददयच्छतं हिमाद्वायू इति तयोरनार्त्तानि गार्हपत्यानि शतं वर्षारिण सन्त्वित्येवैतदाह ॥ १० ॥

राधां सीत्सम्पृञ्चानावसम्पुञ्चानौ तत्व इति । राधांस्येव सम्पृञ्चाथां मापि तनूरित्येवैतदाह तौ ह यत्तनूरपि सम्पृञ्चीयातां प्राग्निर्यजमानं दहेत्स यदग्नौ जुहोति तदेषोऽग्नये प्रयच्छत्यथ यामेवात्रत्विजो यजमानायाशिषमाशासते तामस्मै सर्वामग्निः समर्धयति तद्वाधांस्येव सम्पृञ्चाते नापि तनूस्तस्मादाह राधां सीत्सम्पुञ्चानावसम्पृञ्चानौ तत्व इति ॥ ११ ॥

[ अनुवाद ] सोमयाग में अग्नीषोमीय पशु को रज्जु से पाश बना कर बाँधता है । पाश के अग्रभाग की ग्रन्थि से छिद्र बना कर उस छिद्र में दूसरे अग्रभाग को बाहर फैला कर बाहर के पाश को खींच कर पशु को बाँधा जाता है जिससे पशु का गला भिचे नहीं, कसा नहीं जाए । [ ३३२ ] "

पृष्ठ 349

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 349 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण अध्वर्यु पशु को रज्जु का पाश बना कर बाँधता हुआ - ' ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि ' अर्थात् हे देवताओं के हविरूप पशु! मैं आप को ऋत ( वरुण ) के पाश से बाँधता हूँ । संसार में यावन्मात्र बन्धन वरुणदेवताक होते हैं । पारमेष्ठ्य जल संकोचधर्मा होता है । संकोच को ही बन्धन कहते हैं । संकोचधर्मा यद्यपि पानी है, किन्तु वह भूत है और भूत, बिना प्रारण के नहीं रहता । संकोचधर्मा पानी का प्रारण वरुण है । अतः वरुरण पाश से तुम्हें बाँधता हूँ - यह कथन सर्वथा संगत है । पशु के गले में जो रज्जु डाली जाती

है वह भी पशु का बन्धन करने वाली है । अतः वह रज्जु पशु को कष्ट नहीं देती है ॥१ ॥

तदनन्तर ' धर्षा मानुषः ' इस मन्त्रभाग का उच्चारण करता है । पशु का धर्षरण करने वाला अर्थात् उसे वश में करने वाला यह अध्वर्यु यूप में पाश द्वारा बाँधने से पूर्व इस पशु को वश में करने में समर्थ नहीं था । किन्तु जब वह मनुष्यदेवताओं की तरह मन्त्र का उच्चारण करता हुआ देवहवि- -रूप इस पशु को ऋत के पाश से बाँध देता है तब वह इस पशु को अपने वश में कर लेता है || २ || तदनन्तर पशु का देवता के साथ नियोग करता है । अर्थात् अमुक पशु का अमुक देवता से सम्बन्ध है, ऐसा प्रकट करता है । पशु का देवता के साथ नियोग करता हुआ निम्न-लिखित मन्त्र का उच्चारण करता है -' देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेंऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियु-नज्मि ' इति । अर्थात् सविता देवता की अनुज्ञा में अश्विनीकुमारों के बाहुनों से पूषा देवता ( रेवती ) के हाथों से अग्नि व सोम देवता से सेवित अर्थात् पसन्द किये गये आपका मैं अग्नि व सोम देवता के लिए नियोग करता हूँ । आप अग्नीषोम के पशु हैं, यह तात्पर्य है । जैसे दर्शपूर्णमासादि यागों में हवि का तत्तत् देवता के नाम से अलग - अलग विभाग किया जाता है उसी प्रकार यहाँ भी जिन - जिन देवताओं के लिए जो - जो पशु दिया जाता है, उसका नाम-निर्देश किया जाता है । तदनन्तर पशु का प्रोक्षरण करता है । प्रोक्षरण के द्वारा पशु को मेध्य बनाता है || ३ || अध्वर्यु पशु का प्रोक्षण करता हुआ निम्न मन्त्र का उच्चारण करता है - ' अदुभ्य-स्त्वौषधीभ्यः ' इति । प्रोक्षणी जल में जो यव पड़े हुए हैं, वे प्रोषधि हैं । जल तथा औषधि से उत्पन्न जो आप पशु हैं उनका मैं जल तथा ओषधियों से प्रोक्षण करता हूँ । जिससे पशु उत्पन्न होता है उसी से उसे मेध्य बनाता है । आकाशमण्डल जब बरसता है अर्थात् वृष्टि होती है तब प्रोषधियाँ उत्पन्न होती हैं । ओषधियाँ खा कर व पानी पी कर यह रस उत्पन्न होता है । इसी रस से सातवें स्थान पर वीर्य उत्पन्न होता है । रेत से ही पशु उत्पन्न होते हैं । रस से रेत ( वीर्य ) उत्पन्न होता है और वीर्य से पशु उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार जिस अन्न व पानी से परम्परया पशु उत्पन्न होते हैं उसी पानी व ओषधि ( अन्न ) से इन पशुओं का प्रोक्षण करते हैं ॥ ४ ॥

[ ३३३ ]

पृष्ठ 350

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 350 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण पश्चात् उपर्युक्त मन्त्र के शेष भाग का उच्चारण करता है— ' अनु त्वा माता मन्यतामनु पिता ' इति । अर्थात् हे पशो! तुम्हारी माता व पिता देवान्न बनने के लिए तुम्हें अनुमति प्रदान करें । यह पशु माता व पिता से उत्पन्न हुआ है । उन्हीं से इसको मेध्य बनाता है । पश्चात् - ' अनुभ्राता सगर्योऽनुसखा स यूथ्य: ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् जो सहोदर भ्राता है, मित्र है, एक व्यवसाय वाला तथा एक थोक का मित्र है, वे सब श्राप को देवान्न बनने की अनुमति प्रदान करें । अर्थात् जहाँ आप की जन्मभूमि है, उस समाज के सभी साथ इस कार्य के लिए आपको अनुमति प्रदान करें । जिन अग्नि व सोम के लिए आपको यज्ञ में सम्मिलित किया है उन्हीं अग्नि व सोम के द्वारा आपको पवित्र करते हैं ॥ ५ ॥

इसके बाद ' अपां पेरुरसि ' इस मन्त्र को बोलता हुआ प्रोक्षणकर्म से अवशिष्ट जल को पशु के पीने के लिए उसके मुख के सामने रख देता है । पेरु का अर्थ पीने के स्वभाव वाला है । इस पानी से भी पशु को मेध्य बनाता है । इसके पीने से पशु का श्रान्तरिक भाग भी मेध्य हो जाता है । इसके बाद ' आपो देवी: स्वदन्तु स्वात्तं चित्सद्द वहविः ' अर्थात् हे आपो देवियो! आप इस पशु का आस्वादन करें जिससे देवहविःस्वरूप यह पशु सम्यक् प्रकार से स्वीकृत हो । अर्थात् आप इस की सम्पूर्ण अपवित्रता को दूर कर दें जिस से देवता लोग इसे स्वीकार कर लें । इस प्रकार प्रोक्षण द्वारा पशु को सर्वात्मना पवित्र कर लिया जाता है ॥ ६ ॥

तदनन्तर अध्वर्यु होता के प्रति ' अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि ' यह प्रैष करता है । प्रोक्षणानन्तर पूर्वाधार और उत्तराधार रूप दो आधार किये जाते हैं । इसके लिए अग्नि प्रज्वलित करता है । पश्चात् जुहू में घृत ले कर उस घृत से पूर्वाधार व उत्तराधार करता है । उत्तराधार करने के बाद जुहू और उपभृत् दोनों को संस्पृष्ट न करता हुआ अर्थात् दोनों को पृथक् - पृथक् रख कर अध्वर्यु स्वयं उत्तर की ओर घूम कर यूप से बँधे हुए पशु को घृताक्त जुहू सेक्त ( स्निग्ध ) कर देता है । यह उत्तराधार यज्ञ का मस्तक है । यहाँ पर जो पशु है वही प्राधान्यात् यज्ञ कहलाता है । क्यों कि आहुति से यज्ञ उत्पन्न होता है, अतः जिस द्रव्य की अग्नि में आहुति होती है, उसे ही यज्ञ कहा जाता है । यज्ञ सब च्छिन्नशीर्ष होते हैं उनका मस्तक कटा रहता है । ऐसी स्थिति में उत्तराधार द्वारा पशु में घृत लगाना उसके मस्तक को स्थापित करना है । इसीलिए जुहू में घृत ले कर पशु को स्निग्ध किया जाता है ॥ ७ ॥

वह ध्वर्यु - ' सं ते प्राणो वातेन गच्छताम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ पशु के ललाट में घृत लगाता है एवं ' समङ्गानि यजत्रैः ' इस मन्त्रांश का उच्चारण करता हुआ पशु के स्कंध - प्रदेशों पर घृत लगाता है तथा ' सं यज्ञपतिराशिषा ' इस मन्त्र भाग का उच्चारण करता हुआ दोनों श्रोणियों में घृत लगाता है । इस प्रकार जिस कामना के लिए [ ३३४ ]