Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 351–360

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 351 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण पशु का आलम्भन किया जाता है, उस कामना को आप पूर्ण करें । जिस समय पशु का प्राल-म्भन होता है, उस समय पशु का प्रारण, वायु में चला जाता है । इस के शरीरावयवों की आहुति देवताओं को मिल जाती है और इसका फल यजमान को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥

इसी तथ्य का प्रतिपादन अगली कण्डिका में किया जा रहा है-संज्ञप्यमान ( आलभ्यमान ) पशु के प्रारण वायु में चले जाते हैं । तुम उसी स्थिति को प्राप्त हो जाओ! तुम्हारे प्रारण वायु में मिल जाएँ । इस पशु के प्रङ्गों से यजन करते हैं अतः अङ्ग देवता को प्राप्त हो जाएँ । इस के फल से यज्ञपति यजमान युक्त हो जाए । यही उपर्युक्त मन्त्र भागों से बतलाया है । इसके बाद अध्वर्यु जुहू और उपभृत् को नीचे कुशास्तरण-युक्त वेद पर रख देता है । तदनन्तर प्रवर के लिए श्राश्रावरण कर्म करता है । आश्रावरण

कर्म सविस्तार दर्शपूर्णमास में बतला दिया गया है । वही यहाँ करना चाहिए ॥ १ ॥

यहाँ दो बार श्राश्रावण कर्म होता है । सामान्य होता तथा दूसरा मैत्रावरुण होता । होता है । क्यों कि इस सोमयाग में दो होता होते हैं- एक दूसरा आश्रावण कर्म मैत्रावरुण होता के लिए प्रकृतियज्ञ में यजमान के साथ होता का भी प्रवररण होता है । ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या ' इस नियम के अनुसार यहाँ भी होता का प्रवरण प्राप्त होता है । उसका निरा-करण करते हुए भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यहाँ केवल यजमान का ही प्रवरण किया जाता है । वह अध्वर्यु - ' अग्निर्ह दैवीनां विशां पुर एता यजमानो मनुष्याणाम् ' इस निगद - मन्त्र का उच्चारण करता है और यजमान के हाथ में लच्छा बाँधता है । लच्छा बाँधना ही प्रवरण कहलाता है । मन्त्र की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अग्नि, देवताओं का मुख है । सारे देवता आग्नेय हैं । अतः सब देवताओं के लिए अग्नि में ही आहुति दी जाती है । यह देवताओं का मुख है । अतः वह सारे प्रारणदेवता रूप प्रजा के श्रागे चलने वाला है, जिस प्रकार अग्नि सारी देवी प्रजा के आगे चलने वाला । जिधर अग्नि जाता है उसी और सारे देवतानों को जाना पड़ता है । उसी प्रकार यह यजमान अध्वर्यु आदि मनुष्यों के आगे चलने वाला है । जिधर यजमान जाता है उधर ही अध्वर्यु आदि जाते हैं । जिस प्रदेश में यजमान यजन करता है, वह प्रदेश अन्वर्द्ध कहलाता है । इसी अभिप्राय से मन्त्र में ' यज-मानो मनुष्याणाम् ( पुरता ) ' कहा गया है । अध्वर्यु पुनः ' तयोरस्थरि गार्हपत्यं दीदयच्छतं हिमाद्वाय ' इस निगदशेष का उच्चारण करता है । अर्थात् देवताओं के आगे चलने वाले अग्नि का तथा मनुष्यों के आगे चलने वाले यजमान का गार्हपत्य सौ हेमन्त तक कभी उच्छिन्न नहीं होता । यजमान का गार्हपत्य १०० वर्ष तक प्रति रहित बना रहे यह तात्पर्य है ॥ १० ॥

अध्वर्यु पुनः निम्नलिखित निगदमन्त्र का उच्चारण करता है— ‘ राधांसीत् सम्पृञ्चानावसम्पृञ्चानौ तन्व ' इति । अर्थात् अग्नि और यजमान की सम्पत्ति व अन्न परस्पर मिल जाएँ । अर्थात् अग्नि का अन्न यजमान का हो जाए तथा यज़-[ ३३५ ]

पृष्ठ 352

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 352 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण मान का अन्न अग्नि का हो जाए । परन्तु शरीर दोनों का पृथक् - पृथक् ही रहे । अर्थात् ग्रग्नि के शरीर का सम्बन्ध यजमान से न हो तथा यजमान के शरीर का सम्बन्ध अग्नि से न हो । यदि श्रग्नि और यजमान के शरीरों का परस्पर सम्बन्ध हो जाएगा तो अग्नि से यजमान का शरीर जल जाएगा । यह यजमान जो अपने अन्नभूत हवि की अग्नि में आहुति देता है उससे वह अपना अन्न अग्नि को समर्पित कर देता है तथा ऋत्विक् अग्नि से यजमान के लिए जो प्राशी ( कामना ) माँगते हैं उस आशी: को अग्नि यजमान के लिए प्रदान कर देता है । यही अग्नि के अन्न को यजमान के लिए प्रदान करना है । अर्थात् यज्ञफल अग्नि की वस्तु है । वह यजमान की बन जाती है तथा हवि यजमान की वस्तु है वह अग्नि में डाल देने से अग्नि की बन जाती है । इस प्रकार यजमान का अन अग्नि का तथा अग्नि का अन्न यज्ञफल यजमान का अन्न बन जाता है । इस तरह दोनों के अन्न परस्पर मिल जाते हैं परन्तु दोनों के शरीर पृथक् ही रहते हैं ॥ ११ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] सोम यज्ञ में लाया गया जो अग्नीषोमीय पशु है, उसे रस्सी से बांधा जाता है । बाद में अग्नि- मन्थन किया जाता है । पूर्व के उपकरण ब्राह्मण के अन्त में बतलाया गया है कि एक रस्सी का पासावना कर उसे पशु के गले में डालते हैं । जिस रस्सी से पशु को बाँधा जाता है, उसके पासा लगा दिया जाता है । रस्सी पशु के गले में डाली जाती है । लोक में पशु बाँधने की रस्सी में जैसा पासा लगाया जाता है, ठीक वैसा ही पासा इस रज्जु में लगाया जाता है । गाय बैलों के गले में जो रस्सी होती है, उसका पासा इस तरह का होता है जिससे उनका गला जरा भी नहीं भिचने पाता । बन्धन का तो बन्धन रहता है और पशुओं को तकलीफ नहीं होती है । इस पाश को ग्रन्थि कहते हैं । ऐसी गाँठ लगाई जाती है जिससे वह अपने स्थान से न हटे । यदि हटने वाली गाँठ लगादी जाएगी तो जिस रज्जु से बाँधा जाता । उसके वैसा ही पासा पशुओं का गला भिच जाएगा । बस, यहाँ भी पशु की लगाना चाहिए, जो जरा भी न सरके । ऐसा पासा बना कर उसको निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए पशु के गले में डालते हैं-" ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि धर्षा मानुषः - इति " । ( वा ० सं ० ६८ ) हे देवहविः! पशो! त्वां प्रपमहं धर्षण धर्म्मा अध्वर्यु नाम ऋत्विजः - ऋतस्य पाशेन प्रतिमु-श्वामि । हे देवभक्ष्य पशी! इस यज्ञ के लिए देवताओं के लिए आपका यूप से घर्षण करने वाला जो मैं मनुष्य ऋत्विक हूं - वह मैं प्रापको ऋतु के पाश से वरुण के बन्धन से छोड़ता हूं । संसार में जितना भी बन्धन होता है - सब वरुण देवताक है । अग्नि - विशंकलन करता है - बन्धन को तोड़ता है एवं पारमेष्ठ्य पानी जो कि सोम भी कहलाता है, संकोचधर्म्मा है । संकोच सिकुड़ने को कहते हैं, इसी को बन्धन कहते हैं । परमेष्ठी के देवता वरुण हैं । भूत बिना प्रारण के नहीं रहता है । [ ३३६ ]

पृष्ठ 353

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 353 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण मैटर, फोर्स के बिना रद्दी चीज है । पारमेष्ठ्य संकोचधर्म्मा पानी भूत है । इसका जो अधिष्ठाता प्राण है, वह वरुण कहलाता है । संसार में जहाँ भी कोई बन्धन होता है, वह इसी वरुणप्राण की महिमा है । बन्धन करने वाला संकोच करने वाला - यद्यपि पानी परन्तु पानी का प्रारण वरुण है । प्राण ही प्रधान वस्तु है, अतएव वरुण को ही बन्धनकर्ता बतलाया जाता है । पशु के गले में जो रज्जु डाली जाती है, वह भी बन्धन है; अतएव रज्जु को ' वरुण्या ' कहा जाता है । इस पशु को मन्त्र शक्ति द्वारा इसी वरुण-पाश से छोड़ते हैं । तात्पर्य यही है कि यदि पासा न लगा कर खाली रज्जु ही बाँध दी जाती तो पशु का गला भिच जाता । परन्तु पासा लगने से वरुण्या रज्जु - बन्धन धर्मा रज्जु इसे पीड़ा नहीं पहुंचाती है । अपि च मन्त्र से वरुण की स्तुति भी हो जाती है । इससे भी वरुण इसे अपने पाश से विमुक्त कर देते हैं । यद्यपि गले में पाश डाला जाता है, तथापि उससे तकलीफ नहीं होती, अतएव उसका डालना न डालने के बराबर है । इसी भाव को बतलाने के लिए ' प्रतिमुच्यामि ' कहा है । यदि उसे जरा भी तकलीफ होती - रस्सी से गला भिचता- तो ' प्रतिबध्नाति ' यह कहते । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" पाशं कृत्वा प्रतिमुञ्चति । ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रति मुञ्चामि

इति । वरुण्या वाडएषा यद् रज्जुः । तदेनमेतद् ऋतस्यैव पाशेन प्रतिमुञ्चति ।

तथो हैनमेषा वरुण्या रज्जुनं हिनस्ति " ॥१ ॥

" धर्षा मानुषः " - इति ' पूर्व के मन्त्र के इस हिस्से का अर्थ बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब पाश और यूप व्यवस्था न थी, उस समय मनुष्य इस पशु का घर्षण करने में सर्वथा श्रसमर्थ था । मनुष्य अपने यज्ञ के लिए जब भी इसे पकड़ने जाते, यह दोनों पैर खड़े करके उनका सामना कर लेता था एवं उनसे जरा भी नहीं दबता था । परन्तु जब वह मनुष्य मानुष देवताओं की तरह मन्त्र बोलता हुम्रा ऋत के पाश से इसे छोड़ देता है, अर्थात् देवहवि इस पशु को जब रस्सी से बाँध दिया जाता है तो मनुष्य इसका घर्षण करने वाला बन जाता है । वास्तव में बात सच है । जब तक पशु को रस्सी से बांधा नहीं जाता है, तब तक वह वश में नहीं आता है । रस्सी गले में डाली नहीं कि पशु मनुष्य के कब्जे में आया नहीं । जो मनुष्य वरुण्या रज्जु डालने से - पशु का घर्षण करने में असमर्थ था, वही प्राज इस वरुण्या रज्जु को इसके गले में डालता हुआ - इस पशु का घर्षण करने वाला बना हुआ है । अतएव ' घर्षामानुषः ' यह कहा गया है । " न वा एतमग्रे मनुष्योऽधृष्णोत् । स यदैवर्त्तस्य पाशेनैतद्देवहविः प्रतिमु-ञ्चति । अथैनं मनुष्यो धृष्णोति तस्मादाह धर्षा मानुष - इति " ॥२ ॥

इसके अनन्तर पशु का देवता के साथ नियोग करता है । आप फलाने ( अमुक ) देवता के हवि हैं-इस बात को प्रकट करने का नाम ही इस पशु का देवता के साथ सम्बन्ध जोड़ने का नाम ही - नियोग है । निम्नलिखित मन्त्र से इस पशु का नियोग किया जाता है -१ ' वा ० सं ० ६१८ ' । [ ३३७ ]

पृष्ठ 354

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 354 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) जाता ' वा ० सं ० ६ | ' | १ शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण [ ३३८ ' ] " देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि " । ( वा ० सं ० ६।६ ) सविता देवता के प्रसव में - अश्विनीकुमार के बाहु से - पूषा के हाथों से अग्नषोम देवता से पसन्द किये गए जो आप हैं - उनका मैं उन देवताओं के लिए - प्रग्नीषोम के लिए नियोग करता हूँ । अर्थात् श्राप श्रग्नीषोमीय पशु हैं, अग्निषोम के हवि हैं । जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि प्रकृति - यज्ञों में हवि का देवता नाम से अलग - अलग विभाग किया जाता है - यह ऐन्द्राग्न हवि है - यह पौष्णचरु है-इत्यादिरूपेण देवता से नियोग किया जाता है; इसी प्रकार यहाँ भी जिन - जिन देवताओं को जो - जो पशु दिए जाते हैं, उन उन का नाम ले दिया जाता है । उनका अनुदेश कर दिया जाता है- यह पशु उनके लिए है - यह उनके लिए है - यह विभाग कर दिया जाता है-" तद् यथैवादो ( दर्शपूर्णमासयागे ) देवतायै हविर्गृह्णन् आदिशति-एवमेवैतद्देवताभ्यां ( श्रग्नीषोमाभ्याम् ) श्रादिशति " । इस प्रकार मन्त्रपूर्वक देवता नियोग करके यवमती - प्रोक्षणी के श्राप ( जल ) से पशु का प्रोक्षण करते हैं । प्रोक्षण की एकमात्र उपपत्ति है - पवित्रता । बस प्रोक्षरण से इस पशु को पवित्र ही बनाया " अथ प्रोक्षति । एको वै प्रोक्षणस्य बन्धुः - मेध्यमेवैतत् करोति " ॥३ ॥

" प्रद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः " " यह मन्त्र बोलता हुआ श्रध्वर्यु पशु का प्रोक्षण करता है । पानी में जो यव पड़े हुए हैं वे श्रौषधि हैं- पानी पानी है । इस प्रकार यवमयी आप से प्रोक्षण करने से - श्रौषधि श्रीर पानी दोनों से प्रोक्षरण हो जाता है । पानी और प्रौषधि से उत्पन्न होने वाले जो आप ( पशु ) हैं, उनका पानी और औषधि से ही प्रोक्षण करता हूं । " प्रद्द्भ्यस्त्वोषधीभ्यः " इसका यही तात्पर्य है । जिससे यह पशु उत्पन्न होता है, उसी से इसको मेध्य बनाते हैं जो कि पानी और औषधि से इसका प्रोक्षण करते हैं । श्राकाश- मण्डल जब बरसता है अर्थात् वृष्टि होती है, तब श्रौषधियाँ उत्पन्न होती हैं । औषधि खाकर, पानी पी कर यह रस उत्पन्न होता है । अन्न से पहले पहल रस ही उत्पन्न होता है । इसी रस से सातवें दर्जे पर रेत ( वीर्य्य ) बनता है । इसी रेत से पशु उत्पन्न होते हैं । पशु रेत से उत्पन्न होते हैं । रेत रस से उत्पन्न होता है । रस, अन्न से उत्पन्न होता है । अन्न, पानी से उत्पन्न होता है; अतएव हम कह सकते हैं कि यह पशु श्रौषधि और पानी से ही उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में प्रौषधि पानी से प्रोक्षण करता हुआ यह ग्रध्वर्यु, जिससे यह उत्पन्न होता है एवं जिसके खाने - पीने से इसकी स्थिति रहती है, उसी से इसे मेध्य बनाते हैं । तात्पर्य यही है कि औषधि पानी से प्रोक्षण करना - पश को अधिक पुष्ट करना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं—

पृष्ठ 355

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 355 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण " इदं हि यदा वर्षति - प्रथ श्रौषधयो जायन्ते । श्रौषधीर्जग्ध्वा अपः पीत्वा तत एवं रसः सम्भवति । रसाद् रेतः । रेतसः पशवः । तद्यत एव

सम्भवति यतश्च जायते । तत एवैतन्मेध्यं करोति " ॥४ ॥

फिर उसी मन्त्र का शेष बोलता है-" अनु त्वा माता मन्यतामनुपिता " - इति ( वा ० सं ० ६।१ ) हे पो! आपके जो माता और पिता हैं वे आपके अन्न भाव को स्वीकार कर लें । इस यज्ञ में देवान्न बनने के लिए आपके माता - पिता आज्ञा दे दें । यदि इनकी आज्ञा बिना ही पशु यज्ञ में आ जाएगा शक्ति द्वारा भावना करके पशु के तो इन्हें दुःख होगा । बस, इससे यज्ञ बिगड़ जाएगा । ग्रतः मन्त्र माता - पिता से भी आज्ञा ले ली जाती है । " श्रनुत्वा माता " - यह बोलता हुआ अध्वर्यु- जिनसे यह उत्पन्न हुआ है, उनके सहित इसे मेध्य बना देता है । माता - पिता के अंश से पुत्र उत्पन्न होता है । उनका नाम लेना उनका भी - इसमें सम्बन्ध करना है-" स हि मातुश्चाधि पितुश्च जायते । तद्यत एव जायते तत एवैतन्मेध्यं करोति " । " नु भ्राता सगर्योऽनुसखा सयूथ्यः " - इति । ( वा ० सं ० ६।९ ) जो सहोदर भ्राता है एवं मित्र है, एवं हमपेशा है या पक्का दोस्त है - वे सब आपको इस कार्य्यं में शामिल होने की आज्ञा दे दें । तात्पर्य यही है कि जहाँ आपका जन्म स्थान है, जन्म भूमि है; उस समाज के जितने भी साथी हैं, उनसे अनुमति ले कर आपको इस यज्ञ में शामिल किया जाता है । इससे श्रुति उपदेश देती है कि तुम जो भी कुछ काम करो - पहले इतनों की आज्ञा ले लो । यदि ये सब प्राज्ञा दे दें तो उस काम को करो । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" स यत्ते जन्म तेन त्वानुमतमारभे - इत्येवैतदाह । अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि " । अग्नीषोम से पसन्द किए गए जो आप हैं, उनका औषधि और पानी से हम प्रोक्षण करते हैं । जिन देवताओं के लिए इसे यज्ञ में शामिल किया जाता है, उन्हीं से इसे मेध्य बनाते हैं । इस प्रकार -" प्रद्द्भ्यस्त्वौषधीभ्यः अनु त्वा माता मन्यतामनुपिता । श्रनु भ्राता सग-सखा सथ्यः । अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि " । ( वा ० सं ० ६॥६ ) इस मन्त्र से सबसे अनुमत इस पशु का यवमती प्राप ( जल ) से प्रोक्षण करते हैं || ५ || [ ३३६ ]

पृष्ठ 356

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 356 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( प्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मण इसके बाद जो पानी प्रोक्षणकर्म से अवशिष्ट बच गया है, उसे- ' अपां पेरुरसि ' ' यह बोलता हुमा पशु के मुख के सामने उसके पीने के लिए रख देता है । हे पशो! आप पानी के ' पेरु ' हो अर्थात् पानशील हो । मनुष्य की अपेक्षा पशु पानी अधिक पीया करते हैं, जिसे भाषा में ' पेरु ' कहा जाता है । इस पानी से इस पशु ७ को भीतर से मेध्य बनाते हैं । इस पानी के पीने से पशु के भीतर का हिस्सा भी पवित्र हो जाता है-इसके अनन्तर -" तदेनमन्तरतो मेध्यं करोति " । प्रापो देवीः स्वदन्तु स्वात्तं चित् सद्देवहविः " । ( वा ० सं ० ६।१० ) यह मन्त्र बोलते हुए पशु के अधोभाग का ( छाती का ) प्रोक्षण करते हैं । इस प्रकार ऊपर से, नीचे से, भीतर से चारों ओर से मेध्य बना देते हैं । हे आपोदेवि! प्राप इस पशु का आस्वादन करें जिससे कि देव हवि - स्वरूप यह पशु स्वात्त हो जाय - प्रर्थात् आप इसकी सारी अपवित्रता दूर कर दीजिए, जिससे देवता लोग इसे पसन्द कर लें । तात्पर्य इस सारे प्रपश्च का यह है कि पशु को पानी से सर्वात्मना पवित्र कर दिया जाता है || ६ || जब पशु बिलकुल पवित्र हो जाता है तो अध्वर्यु ----" अग्नये समिध्यमानाय - अनुब्रूहि " । होता के प्रति यह प्रैष करता है । प्रोक्षरण कर्मानन्तर अब पूर्वाधार और उत्तराधार - दो आधार किए जाते हैं । इसके लिए श्रग्नि को प्रज्वलित करते हैं । बाद में जुहू में घृत लेकर उससे पूर्वाधार र उत्तराधार करते हैं । उत्तराधार करने के बाद जुहू और उपभृत् - दोनों को अलग - अलग ही रख कर श्रध्वर्यु उत्तर की ओर घूम कर यूप से बँधे हुए पशु को उस घृताक्त जुहू से भक्त कर देता है । उत्तराधार किए बाद जुहू में जो घृत बच जाता है, उससे - पशु को श्रार्द्र कर देना चाहिए - यही तात्पर्य है -" थाहाग्नये - अनुब्रूहि - इति.। स उत्तरमाधारमाघार्य - प्रसंस्पर्शय-चौपत्य ( उत्तरतः पर्येत्य ) जुह्वा पशुं समनक्ति " । पशुको घृताक्त क्यों किया जाता? - इसका कारण बतलाते हैं यह उत्तराधार यज्ञ का मस्तक माना जाता । यहाँ पर जो पशु है, वही इस अग्नीषोम में यज्ञ कहलाता है, अतएव जिस द्रव्य की प्राहुति होती है उसे हम ' यज्ञ ' कहने के लिए तय्यार हैं । यहाँ १ ' वा ० सं ० ६।१० ' । [ ३४० ]

पृष्ठ 357

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 357 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपने ब्राह्मण पर चूँकि इस पशु की आहुति होगी, अतएव यहाँ यह पशु ही यज्ञ होता है । जितने भी यज्ञ हैं, उन सब का मस्तक कटा रहता है, जिसका रहस्य " धर्म्मयाग " में बतलाया जाएगा । इसी विज्ञान के अनुसार इस यज्ञ को भी च्छिन्न शीर्षा माना जाता है । ऐसी अवस्था में उत्तराघार का घृत लगाना इसके मस्तक जोड़ना है, क्यों कि उत्तराधार पशु का शिरोभाग है । बस, उत्तराधार घृत से पशु को अक्त करता हुआ यह अध्वर्यु इसमें मस्तक जोड़ता है । अतएव जुहू पशु को घृताक्त करता है--" शिरो वै यज्ञस्य - उत्तर श्राधारः । एष वाऽअत्र यज्ञो भवति यत् पशुः ।

तद्यज्ञ एवैतच्छिरः प्रतिदधाति । तस्माज्जुह्वा पशुं समनक्ति " ॥७ ॥

किस स्थान पर घृत लगाना चाहिए? - यह बतलाते हैं । वह अध्वर्यु -" सन्ते प्राणो वातेन गच्छताम् " । ( बा ० सं ० ६।१० ) के दोनों कन्धों पर इस मन्त्र से ललाट में घृत लगाता है । एवं ' समङ्गानि यजत्रैः " १ इससे पशु घृत लगाता है, एवं ' सं यज्ञपतिराशिषा ' इस मन्त्र से दोनों श्रोणियों में घृत लगाता है । इस पशु की तीन अवस्थाएँ होती हैं । जिस समय इसका आलम्भन होता है तो इसका प्रारण तो निकल कर वायु में चला जाता है एवं इसके शरीरावयवों की आहुति देवतानों को मिल जाती है, तथा इससे जो फल अतिशय उत्पन्न होता है वह यजमान को मिलता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - हे पशो! तुम्हारा जो प्राण है, वह वायु साथ मिल जाए-“ सन्ते प्राणो वातेन गच्छताम् ( ते प्रारणा: वातेन सह संगच्छन्ताम् ) " । जो तुम्हारे शरीर के श्रङ्ग - प्रत्यङ्ग हैं वे यजत्रों से अर्थात् देवताओं से मिल जाएँ अर्थात् अङ्ग-प्रत्यङ्ग देवताओं के पेट में चले जाएँ-" समङ्गानि - यजत्रैः ( देव:) सह संगच्छन्ताम् " । एवं इससे जो फल हो उससे यज्ञपति यजमान युक्त हो जाए-" यज्ञपतिः - श्राशिषा संगच्छताम् " । जिस काम के लिए आपका आलम्भन किया जाता है, उस काम को आप पूरा करें - यही तात्पर्य्यं है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स ललाटे समनक्ति - सन्ते प्रारणो वातेन गच्छताम् - इति । समङ्गानि यजत्रैः - इति - अंसयोः । सं यज्ञपतिराशिषेति श्रोण्योः । स यस्मै कामाय पशु-मालभन्ते तत् प्राप्नुहि इत्येवैतदाह " || ८ || १ ' वा ० सं ० ६ | १० ' । [ ३४१ ]

पृष्ठ 358

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 358 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( अ ० ७ ) शतपथ ब्राह्मण पशुसंज्ञपन ब्राह्मणे इस पशु की तीन स्थितियाँ होती हैं - इसी का स्पष्टीकरण करते हैं - संज्ञप्यमान पशु के जो प्राण हैं वे तो वायु में चले जाते हैं । प्राप उसी स्थिति को प्राप्त हो जाएँ अर्थात् आपके प्राण वायु में मिल जाएँ । इस पशु के अंगों से यजन करते हैं । आपके अंगों से देवता युक्त हो जाएँ- यही तात्पर्य है । एवं यजमान के लिए जो फल है - प्राशी है उसे आप देवताओं से माँगिए । -इसके बाद प्रध्वर्यु - जुहू और उपभृंत दोनों को नीचे कुशास्तरणयुक्त वेदि पर रख देता है । -इसके बाद आश्रावण कर्म्म करता है । यह सारा कर्म्म विस्तारपूर्वक दर्शपूर्णमास में बतला दिया गया

है - वही यहाँ करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" सो s सावेव बन्धुः " ॥९ ॥

अन्तर इतना ही है कि वहाँ एक ही बार आश्रावरण कर्म होता है परन्तु यहाँ दो आश्रावण कर्म्म होते हैं । कारण इसका यही है कि इसमें होता दो होते हैं । एक तो होता सामरूप होता - होता है एवं एक मैत्रावरुण होता होता है । बस इस दूसरे श्राश्रावण से मैत्रावरुण होता के लिए ही आश्रावण क किया जाता है-" अथ द्वितीयमाश्रावयति । द्वौ ह्यत्र होतारौ भवतः । स मैत्रावरुणाया-हैवाश्रावयति " | प्रकृति - यज्ञ में यजमान के साथ होता का भी प्रवरण होता है । ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या ' से वह यहाँ भी प्राप्त होता है, इसका निषेध करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि केवल यजमान का ही प्रव-रण करता है । वह अध्वर्यु -" अग्नि देवीनां विशां पुर एता - अयं यजमानो मनुष्याणाम् " । यह निगद मन्त्र बोलता हुआ यजमान के हाथ में लच्छा बाँधता है । लच्छे बाँधने को ही प्रवरण कहते हैं । अग्नि देवतायों का मुख है । सारे देवता श्राग्नेय हैं । अतएव सब देवताओं के लिए केवल अग्नि में ही दे दिया जाता है । चूंकि अग्नि देवताओं का सुख है, अतएव सारे प्राण - देवता प्रजा को पुरता कहने के लिए तैयार । वास्तव में यह अग्नि सब देव प्रजा के आगे चलता है । जिस प्रकार अग्नि देवी प्रजा के आगे - आगे चलने वाला है - जिधर अग्नि चलता है, उसी ओर सारे देवताओं को जाना पड़ता है; एवमेव यह यजमान - प्रध्वर्यु श्रादि मनुष्यों के पुर एता हैं । जिस ओर यजमान जाता है, जिसराष्ट्र में यजमान यजन करता है वह श्रन्वर्द्ध कहलाता है । बस, उसी की ओर सब ऋत्विक् रहते हैं - अर्थात् - जिस ओर यजमान जाता है, उसी ओर सब ऋत्विज्ञों को जाना पड़ता है; अतएव हम यज-मान को अवश्य ही मनुष्यों को पुर एता कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय से ' यजमानो मनुष्याणां ' यह कहा गया है [ ३४२ ] 1

पृष्ठ 359

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 359 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( ०७ ) फिर निगदमन्त्र बोलता है— अध्वर्यु फिर निगदमन्त्र बोलता है-8 पशुसंज्ञपन ब्राह्मणे शतपथ ब्राह्मण [ ३४३ ] " अग्निहि देवतानां मुखम् - तस्मादाह - श्रग्निर्ह देवीनां दिशां पुर एतेति । अयं यजमानो मनुष्याणाम् - इति । तं हि सोऽन्वर्द्धा भवति यस्मिन्नद्धे यजते-( यस्मिन् भागे यजमानो यजते - सोऽन्वधः । तं हि सर्वे मनुष्या - तमनु एव गच्छन्ति ) । तस्मादाह - प्रयं यजमानो मनुष्याणाम् " - इति । " तयोरस्थरि गार्हपत्यं दीदयच्छतं हिमाद्वायू " - इति । देवताओं के पुर एता अग्नि का एवं मनुष्यों के पुर एता यजमान का दोनों का गर्हपत्य सद अक्षय्य बना रहे | सौ ( १०० ) हेमन्त तक दोनों का घर चमकता रहे । तात्पर्य यही है कि यजमान के घर का जो गार्हपत्याग्नि है, वह भी सौ वर्ष तक उच्छिन्न न हो एवं यजमान का जो घर है वह भी उच्छिन्न न हो, एवं स्वयं यजमान भी सौ ( १०० ) वर्ष तक जीता रहे । ' इन दोनों का गार्हपत्य सौ ( १०० ) वर्ष तक ना बने रहे । इन पर किसी प्रकार की बाधा न आए - यही तात्पर्य है -" तयोरनार्तानि गार्हपत्यानि शतं वर्षाणि सन्तु " - इत्येवैतदाह ॥ १० ॥

" राधां सीत् सम्पृञ्चानावसम्पुञ्चानौ तन्व - इति " । " राधांसि ( अन्नानि ) इत्- ( एव ) सम्पृञ्चानौ - ( मिश्रयन्तौ ) तत्व: तनूः - असम्पृञ्चानौ - इति ” । अग्नि और यजमान के जो अन्न हैं - वे तो परस्पर मिल जाएँ - जो यजमान का अन्न है, वह अग्नि का प्रश्न हो जाए - जो अग्नि का अन्न है - वह यजमान का अन्न बन जाए; परन्तु शरीर दोनों का अलग-अलग ही रहे । अग्नि शरीर का सम्बन्ध यजमान शरीर से न हो - यजमान शरीर का सम्बन्ध अग्नि से न हो । यदि अन्नवत् दोनों के शरीर भी मिल जाएँगे तो वह अग्नि यजमान को जला डालेगा । अतएव शरीर नहीं मिलें - यह प्रार्थना की जाती है-" राधांस्येव सम्पृञ्चाथां मापि तनूः - इत्येवैतदाह । तौह यत् तनूरपि सम्पुञ्चीयातां प्राग्निर्यजमानं दहेत् । ( श्रग्निः - यजमानं प्रदहेत् ) " । अग्नि का अन्न यजमान का अन्न बन जाए एवं यजमान का अन्न अग्नि का अन्न बन जाए - यह कैसे हो सकता है? यह बतलाते हैं-

पृष्ठ 360

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 360 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय काण्ड ( श्र ० ७ ) शतपथ ब्राह्मरंग पशुसंज्ञपन ब्राह्मण यह यजमान जो कि अपने अन्नभूत हवि की अग्नि में आहुति डालता है उससे तो यह अपना अग्नि के लिए सौंप देता है, एवं यजमान के लिए ऋत्विक् लोग अग्नि से जो आशी माँगते हैं, अग्नि उस आशी को यजमान के लिए प्रदान कर देते हैं । यज्ञ - फल अग्नि की वस्तु है - यह यजमान की वस्तु बन जाती है एवं हवि यजमान की वस्तु है - वह - अग्नि की वस्तु बन जाती है । इस प्रकार इसका अन्न उसका बन जाता है - उसका अन्न इसका बन जाता है--" स यदग्नौ जुहोति - तदेषोऽग्नये प्रयच्छति । अथ यामेवात्रत्विजो यजमानायाशिषमाशासते तामस्मै सर्वामग्निः समर्धयति । तद् राधांस्येव सम्पू-ञ्चाते - नापि तनूः - तस्मादाह - राधांसीत् " ॥११ ॥

॥ इति पशुसंज्ञपनब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति सप्तमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति तृतीयकाण्डे सप्तमोऽध्यायश्च समाप्तः ॥ [ ३४४ ] 8