Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 361–370

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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अष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' आप्रीब्राह्मणम् ' [ मूल ] तद्यत्रैतत्प्रवृतो होता होतृषदनऽउपविशति । तदुपविश्य प्रसौति प्रसूतोऽध्वर्युः स्रुचावादत्ते ॥१ ॥

श्रथाप्रीभिश्चरन्ति । तद्यदाप्रीभिश्चरन्ति सर्वेणेव वाडएष मनसा सर्वेणे-वात्मना यज्ञं सम्भरति सञ्च जिहीर्षति यो दीक्षते तस्य रिरिचान इवात्मा भवति तमेताभिराप्रीभिराप्याययन्ति तद्यदाप्याययन्ति तस्मादाप्रियो नाम तस्मादाप्री-भिश्चरन्ति || २ || ते वा seas एकादश प्रयाजा भवन्ति । दश वाऽइमे पुरुषे प्राणा श्रात्म-कादशो यस्मिन्नेते प्राणाः प्रतिष्ठिता एतावान्वै पुरुषस्तदस्य सर्वमात्मानमाप्या-ययन्ति तस्मादेकादश प्रयाजा भवन्ति ॥३ ॥

स श्राश्राव्याह । समिधः प्रेष्येति प्रेष्य प्रेष्येति चतुर्थे चतुर्थे प्रयाजे समायमानो दशभिः प्रयाजैश्चरति दश प्रयाजानिष्ट्वाह शासमाहरेत्यांस वै शास इत्याचक्षते ॥४ ॥

अथ यूपकलमादत्ते । तावग्रे जुह्वा अक्ता पशोर्ललाटमुपस्पृशति घृते-नाक्तौ पशूंस्त्रायेथामिति वज्ञो वै यूपशकलो वज्रः शासो वज्र श्राज्यं तमेवैत-स्कृत्स्नं वज्रं सम्भृत्य तमस्याभिगोप्तारं करोति नेदेनं नाष्ट्रा रुक्षांसि हिनसन्निति पुनर्युपशकलमवगूहत्येषा ते प्रज्ञाताविरस्त्वित्याह शासं प्रयच्छन्त्सादयति || ५ || अथाह पर्यग्नयेऽनुब्रूहीति । उल्मुकमादायाग्नीत्पर्यग्न करोति तद्यत्पर्य-f ग्न करोत्यच्छिद्रमेवैनमेतदग्निना परिगृह्णाति नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृशानित्य-[ ३४५ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण हि रक्षसामपहन्ता तस्मात्पर्यग्न करोति तद्यत्रेनं श्रपयन्ति तदभि परिह-रति ॥ ६ ॥

तदाहुः । पुनरेतदुल्मुकं हरेदयात्रान्यमेवाग्नि निर्मथ्य तस्मिन्त्रेनं श्रपयेयु-राहवनीयो वाऽएष न वा एष तस्मै यदस्मिन्नशृतं अपयेयुस्तस्मै वाडएष यदस्मि ञ्च्छतं जुहुयुरिति ॥७ ॥

तदु तथा न कुर्यात् । यथा वै ग्रसितमेवमस्यैतद्भवति यदेनेन पर्यग्नि करोति स यथा ग्रसितमनुहायाच्छिद्य तदन्यस्मै प्रयच्छेदेवं तत्तस्मादेतस्यैवोल्मुक-स्याङ्गारान्निमृद्य तस्मिन्नं श्रपयेयुः || ८ || श्रथोल्मुकमादायाग्नीत्पुरस्तात्प्रतिपद्यते । अग्निमेवैतत्पुरस्तात्करोत्यग्निः पुरस्तानाष्ट्रा रक्षांस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण पशुं नयन्ति तं वपाश्रपरणीभ्यां प्रतिप्रस्थातान्वारभते प्रतिप्रस्थातारमध्वर्युरध्वर्युं यजमानः ॥ ॥ तदाहु: । नैष यजमानेनान्वारभ्यो मृत्यवे ह्येतं नयन्ति तस्मान्नान्वारभे-तेति तदन्वेवारभेत न वा एतं मृत्यवे नयन्ति यं यज्ञाय नयन्ति तस्मादन्वेवारभेत यज्ञादु हैवात्मानमन्तरियाद्यन्नान्वारभेत तस्मादन्वेवारभेत तत्परोक्षमन्वारब्धं भवति वपापणीभ्यां प्रतिप्रस्थाता प्रतिप्रस्थातारमध्वर्युध्वर्युं यजमान एतदु.. परोक्षमन्वारब्धं भवति ॥ १० ॥

अथ स्तर वेदेः । द्वे तृणेऽध्वर्युरादत्ते स श्राश्राव्याहोपप्रेष्य होत-व्या देवेभ्य इत्येतदु वैश्वदेवं पशौ ॥११ ॥

अथ वाचयति । रेवति यजमानऽइति वाग्वै रेवती सा यद्वाग्बहु वदति तेन वाग्रेवती प्रियं धा श्राविशेत्यनार्तिमाविशेत्येवैतदाहोरोरन्तरिक्षात्सजूर्देवेन वातेनेत्यन्तरिक्षं वाऽग्रनु रक्षश्चरत्यमूलमुभयतः परिच्छिन्नं यथायं पुरुषोऽमूल-उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति तद्वातेनैनं संविदानान्तरिक्षाद्गोपायेत्येव-तदाह यदाहोरोरन्तरिक्षात्सजूर्देवेन वातेनेति ॥१२ ॥

[ ३४६ ] 1

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मण अस्य हविषस्त्मना यजेति । वाचमेवैतदाहानार्त्तस्यास्य हविष आत्मना यजेति समस्य तन्वा भवेति वाचमेवैतदाहानार्त्तस्यास्य हविषस्तत्वा सम्भ वेति ॥१३ ॥

तद्यत्रेनं विशसन्ति । तत्पुरस्तात्तृणमुपास्यति वर्षो वर्षीयसि यज्ञे यज्ञपत ET इति बहरेवामा तत्स्तृणात्यस्कन्नं हविरसदिति तद्यदेवास्यात्र विशस्यमा ata fafarna ति तदेतस्मिन्प्रतितिष्ठति तथा नामुया भवति ॥ १४ ॥

अथ पुनरेत्याहवनीयमभ्यावृत्यासते । नेदस्य संज्ञप्यमानस्याध्यक्षा श्रसा-मेति तस्य न कूटेन प्रघ्नन्ति मानुषं हि तन्नोऽएव पश्चात्कर्णं पितृदेवत्यं हि तदपि गृह्य वैव मुखं तमयन्ति वेष्कं वा कुर्वन्ति तन्नाह जहि मारयेति मानुषं हि तत्संज्ञपयान्वन्निति तद्धि देवत्रा स यदाहान्वगन्नित्येतहि ह्येष देवाननुगच्छति तस्मादाहान्वगन्निति ॥१५ ॥

तद्यचैनं निविध्यन्ति तत्पुरा संज्ञपनाज्जुहोति स्वाहा देवेभ्य इत्यथ यदा प्राह संज्ञप्तः पशुरित्यथ जुहोति देवेभ्यः स्वाहेति पुरस्तात्स्वाहा कृतयो वा अन्ये देवा उपरिष्टात्स्वाहाकृतयोऽन्ये तानेवैतत्प्रीणाति तऽएनमुभये देवाः प्रीताः स्वर्ग लोकमभिवहन्ति ते वाडएते परिपशव्येऽइत्याहुती स यदि कामयेत जुहुया-देते यद्यु कामयेतापि नाद्रियेत ॥ १६ ॥

[ अनुवाद ] होतृप्रवरणादि कर्म करने के बाद के कर्मों का वर्णन किया जा रहा है-वेद की उत्तरश्रेणि में होतृषदन होता है । प्रवरण के बाद होता होतृषदन में अपने स्थान में जा कर बैठ जाता है । वहाँ बैठ कर वह होता ' अग्निर्होता वेतु ' इत्यादि मन्त्र से स्रुगादापन करने के लिए ' घृतवतीमध्वर्यो स्र ुचमास्यस्व ' इस निगद मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु को अनुज्ञा प्रदान करता है । अध्वर्यु होता से प्रसूत हो कर जुहू तथा उपभृत् को हाथ में लेता है || १ || तदनन्तर अध्वर्यु आदि ऋत्विक् प्रियों का यजन करते हैं । ऋतु और छन्द ही प्रियों का स्वरूप है । ऋतु और छन्द ही देवप्राण के पशु कहलाते हैं । पृथिवी से द्युलोक-पर्यन्त व्याप्त जो देवप्रारण हैं वे पार्थिव भूतों को उत्पन्न करने में खर्च होते रहते हैं । जितना देवप्राण भूतों के निर्माण के उपयोग में आ जाता है, उतने प्रारण की कमी देवप्राणों में प्रा जाती है । उसकी पूर्ति इन ऋतुछन्दोमय, पशुप्राणों से होती है । इन्हीं पशुप्राणों को 1 [ ३४७ |

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मणं परिकर प्रारण भी कहा जाता है । अतः ' रिक्त स्थानमाप्याययन्ति ' इस व्युत्पत्ति से इन्हें श्री कहा जाता है । जो मनुष्य दीक्षाग्रहण करता है, वह मनसा, वाचा, कर्मणा उस दीक्षाव्रत में नियुक्त हो जाता है । यज्ञ में दीक्षित यजमान भी सारे मन, प्राण व वाक् से यज्ञ के संभरण में अर्थात् यज्ञय वस्तुओं के संभरण ( जुटाने ) में तथा समाप्ति पर उनको वहाँ से हटाने ( संहार ) में लगा रहता है । इस कार्य में उसकी प्रज्ञामात्रा ( मन ) प्राणमात्रा ( प्राण ) भूतमात्रा ( वाक् ) खर्च हो जाती है अतः उसकी आत्मा रिक्त हो जाती है । उन रिक्त प्रज्ञामात्रा, प्रारणमात्रा व भूतमात्रा की पूर्ति इन प्रीरूप पशुप्राणों के द्वारा की जाती है ॥ २ ॥

यज्ञ में प्रयाज, अनुयाज, अवयाज और उपयाज ये चार कर्म होते हैं । मुख्य कर्म से पूर्व जिनका यजन होता है वे प्रयाज कहलाते हैं । मुख्यकर्म के पश्चात् जिन का यजन होता है उन्हें अनुयाज कहते हैं । प्रयाज के बाद मुख्यकर्म से पूर्व जिन का यजन होता है उन्हें अवयाज तथा अनुयाज से पूर्व मुख्यकर्म के पश्चात् जिन का यजन होता है उन्हें उपयाज कहते हैं । प्रयाज को अमृतोपस्तरण तथा अनुयाज को अमृतापिधान कहते हैं । ऋतुप्रारण तथा छन्दप्राण को प्रयाज तथा अनुयाज कहते हैं । ये दोनों ही पशुप्राण कहलाते हैं । क्यों कि प्रकृति में पृथिवीलोक से द्युलोक तक ११ पशुप्राण रहते हैं । अतः प्रमाण व अनुयाज भी ११-११ ही होते हैं । इन प्राणों के द्वारा देवप्राण का श्राप्यामन होता है अतः इन्हें श्राप्री कहा जाता है । जो देवता अधिदैवत में हैं वे ही अध्यात्म में हैं । हमारे शरीर में ११ प्रारण हैं । २ श्रोत्र, २ चक्षु, २ घारण १ मुख ये सात साकञ्ज प्रारण हैं ऊर्ध्वप्रारण हैं । पायु व उपस्थ ये २ अवाप्राण हैं । नाभि दसवाँ प्रारण है, आत्मा ११ वाँ प्राण हैं । प्रकारान्तर से पृथिवी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक के प्रारणों से मानव का निर्माण होता है । इन में से द्युलोक से हमारे आने वाली वस्तु प्रारण कहलाती है । इस की स्थिति मस्तक में है । यही इन्द्रप्रारण व प्रज्ञा-प्राण कहलाता है । जैसा कि ऊपर बतलाया गया है, यह श्रोत्रादि भेद से ७ भागों में विभक्त है । पृथिवी से आने वाला प्राण प्रपान है । यह पायु तथा उपस्थ भेद से द्विविध है । नाभि दशम प्राण है । हमारे शरीर में आने वाला अन्तरिक्ष प्रारण व्यान कहलाता है । यही व्यान प्राण तथा पान की प्रतिष्ठा है । उपर्युक्त दसों प्राणों की सत्ता इस व्यान पर ही निर्भर है । व्यान हृदयाकाश में प्रतिष्ठित रहता हुआ सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । इन ११ प्राणों में नाभि अनिरुक्त प्राण तथा श्रोत्रादि & प्रारण निरुक्तप्रारण हैं । ११ वाँ व्यानप्रारण आत्मा है । चूंकि त्रैलोक्य के उपर्युक्त प्रारणों से ही शरीर का निर्माण होता है । इन ११ की समष्टि ही पुरुष है । ये ११ प्रारण सर्वात्मना आत्मा का श्राप्यायन करते हैं । अतः ११ हों प्राण प्रयाज हैं ॥३ ॥

११ प्री प्राणों में से प्रथम प्राप्रीप्राण का नाम समिध है । सर्वप्रथम अध्वर्यु ' प्रोश्रा-वय ' यह कहता है । यजन में प्रथम प्रैष होता है । बाद में अनुवाक्या तथा तदनन्तर याज्या [ ३४८. ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मण होती है । सर्वप्रथम अध्वर्यु ' श्रावय ' इस प्रकार श्राश्रावरण करता है । पश्चात् अध्वर्यु होता कोष करता हुआ ' समिधः प्रेष्य ' यह कहता है । पश्चात् होता अनुवाक्यामन्त्र बोलता है । अनुवाक्यामन्त्र का उच्चारण कर होता ग्रध्वर्यु से ' समिधो यज ' यह कहता है । तदनन्तर ध्वनि में घृत की प्राहुति डालता है । ११ श्री देवताओं में सर्वप्रथम ' समिध् ' आत्री का ही नाम लिया जाता है । अवशिष्ट १० आप्रीयों के लिए ‘ प्रेष्य ' ' प्रेष्य ' यही कहा जाता है । जब जुहू से प्राहुति दी जाती है उस समय कुछ घृत उपभृत् पात्र में आ जाता है । उस घृत को चतुर्थं प्रयाज में वापस जुहू में ले लिया जाता है । चतुर्थ आहुति देते समय पूर्व की तीन प्राहुतियों में जुहू से जो घृत ' उपभृत् ' ा गया है उसे जुहू में डाल लेना चाहिए । इसी प्रकार सप्तम आहुति के समय उस घृत को चाहिए । इसी प्रकार सातवीं, पुनः जुहू में ले लेना चाहिए और उसकी आहुति दे देनी आठवीं व नवमी आहुति के बाद दसवीं प्राहुति देते समय पुनः जुहू से उपभृत् में गिरे हुए घृतको जुहू डाल देना चाहिए । दशम प्रयाज के बाद अध्वर्यु को अपने प्रतिनिधि प्रति-प्रस्थाता को ' शासमाहर ' ऐसा कहना चाहिए । तलवार को ' शास ' कहते हैं । क्यों कि प्रया-जयजन के बाद शामित्रशाला में पश्वालम्भन करना है । अतः तलवार लाने के लिए अध्वर्यु प्रतिप्रस्थाता से कहता है ॥ ४ ॥

उत्तरावेदि के पूर्व में जो यूप गाड़ा जाता है उस के केन्द्र में यूपशकल रखने का जो एक स्थान है उसे अग्निष्ठा कहा जाता है । इसी के कारण सारा यूप ही अग्निष्ठा कहलाता है । जिस समय श्रग्निष्ठा यूप का निर्माण किया जाता है उस समय यूपकाष्ठ से सर्वप्रथम उतरने वाले जो यूपश्कल हैं उन्हें वस्त्र से परिवेष्टित कर एक डोरी से बाँध कर यूप के केन्द्र अग्निष्ठा स्थान में रख देते हैं । उन दोनों यूपश्कलों के स्वरु व स्वधिति ये नाम हैं । प्रया-जयजन के बाद अध्वर्यु अग्निष्ठा स्थान में रखे हुए उन दोनों यूपशकलों को ले लेता है तथा प्रयाजयजन के बाद जुहू में बचे हुए घृत से दोनों यूपशकलों को घृताक्त करने के बाद ' घृते-नाक्तौ पशूंस्त्रायेथाम् ' ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उन दोनों यूपश्कलों से पशु के ललाट का स्पर्श कर देता है । इस का कारण यह है कि यूप वज्र है । यूपशकल भी यूप से उत्पन्न होने के कारण वज्ररूप हैं । तथा घृत भी वज्र है । वज्र असुरों व राक्षसों का विना-शक है | अतः यूपश्कलों के स्पर्श से एवं शास ( असि ), व प्राज्यरूप वज्र के संमरण से उन्हें इस पशु का रक्षक बनाता है जिससे कि विनाशक राक्षस प्रारण इस पशु की हिंसा न कर सकें । इसके बाद दोनों यूपशकलों को अग्निष्ठास्थानस्थित वस्त्र में वेष्टित कर देता है । अथवा अध्वर्यु ' प्रज्ञातास्त्रिरस्तु ' यह कह कर शमिता ( पशु आलम्भन करने वाले पुरुष ) को ' हे शमिता यह तलवार आप के लिए प्रज्ञात बने ' यह कहता हुआ तलवार शमिता के हाथ : देता है । पश्चात् अध्वर्यु जुहू तथा उपभृत् को रख देता है ॥ ५ ॥

१ हे घृताक्त यूपशकलो! आप इस पशु की प्रसुरराक्षसों के आक्रमण से रक्षा कीजिए । [ ३४६ ]

पृष्ठ 366

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण तदनन्तर आग्नीध्र होता के प्रति ' पर्यग्नमेऽनुब्रूहि ' यह प्रैष कर एक जलता हुआ पूला ले कर पशु के चारों ओर घुमाता है ताकि प्रान्तरिक्ष्य आसुर प्रारण पशु में प्रवेश न कर सकें । इस अभिप्राय से कहा है- ' अच्छिद्र मेवैनमेतदग्निना परिगृह्णाति नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृशा-निति ' । इसी उल्मुकाग्नि से पशु- माँस पकाते हैं । अतः पश्वालम्भन स्थान पर शामित्र - शाला में इस उल्मुकाग्नि को ले जाता है जिस के द्वारा पशु की वपा को पकाना है ॥ ६ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि उल्मुक को जिस स्थान से लाया गया था, पर्यग्नि-करण के बाद उसे उसी स्थान में ले जाना चाहिए । उत्तरावेदिस्थ आहवनीयाग्नि से यह उल्मुकाग्नि लाया जाता है । अतः पर्यग्निकरण के बाद इसे ग्राहवनीयाग्नि में ले जाना चाहिए । यह उल्मुकाग्नि आहवनीय से लाई जाने के कारण आहवनीयाग्नि है । इस में परि-पक्व मांस की आहुति दी जाती है न कि श्रपक्व मांस पकाया जाता है । अपक्व का परिपाक श्रपणाग्नि में होता है न कि आहवनीय में ॥ ७ । । किन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ऐसा नहीं करना चाहिए । उल्मुकाग्नि से भिन्न अग्निमन्थन कर उस में पशु - वपा का परिपाक करना किसी के मुख में दिये हुए ग्रास को निकाल कर दूसरे के मुख में दे देना है । अतः उस उल्मुकाग्नि से कोयले तय्यार कर उसी में पशु- वपा का परिपाक करना चाहिए ॥ 5 ॥

पर्यग्निकरण के बाद प्राग्नीध्र उल्मुक ले कर शामित्रशाला की तरफ सब से आगे चलता है । प्राग्नीध्र उल्मुक को आगे ले जाता हुआ अग्नि को अग्रणी बनाता है । उस मार्ग से अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता तथा यजमान पशु को ले जाते हैं । आग्नीध्र के पीछे प्रतिप्रस्थाता पापणी ( वपा पकाने का ) पात्र लेकर चलता है । उसके पीछे अध्वर्यु चलता है । श्रध्वर्यु के पीछे यजमान चलता है ॥ ६ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि अध्वर्यु के पीछे यजमान का गमन अनुचित है । क्योंकि आग्नीधादि ऋत्विक् इस पशु को मारने के लिए शामित्रशाला की ओर ले जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में उनके साथ यजमान को शामित्रशाला की ओर ले जाना यजमान को मृत्यु का अनुयायी बनाना है । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य का कथन है कि पशु के साथ यज-मान का अन्वारम्भरण अवश्य होना चाहिए । क्यों कि पशु को मारने के लिए नहीं ले जा रहे हैं अपितु पशु के द्वारा यज्ञसम्पादन कर उसे दिव्यभाव में परिणत कर रहे हैं । यदि यजमान का प्रन्वारम्भरण नहीं कराया जाएगा तो यजमान यज्ञ से बहिर्भूत हो जाएगा । पशु के साथ यजमान का अन्वारम्भण होने पर पशु की तरह यजमान भी मृत्युदोष से श्राक्रान्त हो जाएगा-यह कथन भी संगत नहीं हैं । क्यों कि यजमान का अन्वारम्भरण प्रतिप्रस्थाता तथा प्रध्वर्यु के अन्वारम्भरण से व्यवहित हो जाने कारण परोक्षरूप से है । अतः पशुरूपमृत्यु के साथ यजमान का सम्बन्ध नहीं है ॥१० ॥

[ ३५० ]

पृष्ठ 367

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण तदनन्तर उत्तरावेदि पर जो कुश बिछे रहते हैं उनमें से अध्वर्यु दो कुशतृरण ले कर उन्हें हाथ में लिए ही शामित्रशाला की ओर जाता है और देवताओं को आश्रावण करा कर होता के प्रति ' उपप्रेष्य होतर्हव्या देवेभ्यः ' अर्थात् देवताओं के लिए हव्य पहुँचा दो, यह प्रेष करता है । प्रत्येक कर्म में वैश्वदेव का सम्बन्ध होना आवश्यक है । उस के बिना कर्म अधूरा रहता है | परन्तु यहाँ स्वातन्त्र्येण वैश्वदेव के अभाव में वैश्वदेव सम्पत्ति प्राप्ति के लिए ' देवेभ्यः ' यह कह दिया गया है । यह पशु अग्नीषोमीय है । किन्तु ' अग्नीषोमाभ्यां ' न कह कर जो ' देवेभ्यः ' कहा गया है, वह कर्म में वैश्वदेव के सम्बन्ध के लिए ही है ॥ ११ ॥

इसके बाद अध्वर्यु यजमान से निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करवाता है - ' रेवति यजमाने प्रियं धा प्रविश । उरोरन्तरिक्षात् सजूंर्देवेन वातेनास्य हविषस्त्मना यज समस्य तन्वा भवं - इति । यज्ञ में मन, प्रारण व वाक् तीनों की आवश्यकता होती है । वाक् शब्द से यहाँ सर्वत्र व्यापक ऋतवाक् का ग्रहण नहीं है । किन्तु सत्यात्मिका मन्त्ररूपा वाक् का ग्रहण है । मन प्रारण व वाक् तीनों अविनाभूत हैं, अतः वाक् से मन व प्रारण भी गृहीत हैं । मन्त्र अर्थ है, हे रश्मिमती अथवा धनवती वाग्देवता! आप यजमान में प्रिय ( अभिमत अनार्तिलक्षण फल ) को धारण करें । यजमान शब्द से यहाँ यज्ञ अभिप्रेत है । वाक् चूँकि मन व प्राण से अविनाभूत है । अतः मन, प्रारण व वाक् तीनों यजमान में अर्थात् यज्ञ में प्रवेश करें । ' प्रियं धा प्रविश ' कहने से यही आशय है कि मधुर दैवी मन्त्रात्मक वाक् ही यज्ञ में बोली जाए, न कि कटु आसुरी वाक् । वायु ही वाक् को गतिमान् बनाता है तथा शब्दरूप में परिणत करता है । वायु का स्थान अन्तरिक्ष है । अन्तरिक्ष में ही वायु में उभयतः परिच्छिन्न एवं अमूल राक्षस व असुर विचरण करते हैं । प्रान्तरिक्ष्य असुर एक ओर पृथिवी से तथा दूसरी ओर द्युलोक से परिच्छिन्न ( ससीम ) हैं तथा वे अमूल भी हैं । क्यों कि जैसे पार्थिव वृक्षादि भूमि से बद्ध रहते हैं, नक्षत्रादि द्युलोक से बद्ध रहते हैं, वैसे असुर न भूमि से तथा बद्ध हैं । वायवीय शरीर वाले ये वायु में अमूल ( प्रतिष्ठारहित ) इतस्ततः विचरण करते रहते हैं । अतः वायु के साथ आन्तरिक्ष्य वायव्य असुरों के प्रवेश से आप हमारी रक्षा करें तथा पशुरूप हवि के स्वरूप से यज्ञ को सम्पन्न करें ॥ १२ ॥

१३ वीं कण्डिका में भगवान् याज्ञवल्क्य ' अस्य हविषस्त्मना यज समस्य तन्वा भव ' इस मन्त्रांश की व्याख्या कर रहे हैं । अनार्त जो पशुरूप हवि हैं उनका श्राप अपने स्वरूप से यजन करें और अनार्त जो पशु - रूप हवि है उसके साथ अपने स्वरूप से संगत हो कर आप यज्ञ को सम्पन्न करें || १३ || जिस स्थान पर इस पशु का आलम्भन करते हैं उस स्थान पर तृरण बिछा देते हैं । पशु को मारते समय जो रक्त का और मांस का खण्ड उछल जाता है वह उस तृण पर ही प्रतिष्ठित हो जाता है, बाहर भूमि पर नहीं गिरता । पशु को मारने के स्थान पर तृणं छाता हुआ अध्वर्यु ' वर्षो वर्षीयसि यज्ञे यज्ञपति धाः ' इस मन्त्र का उच्चारण करता है । [ ३५१ ]

पृष्ठ 368

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण अर्थात् हे प्रवृद्ध तृण! प्रवृद्ध यज्ञ में यज्ञपति ( यजमान ) को प्रतिष्ठित करो । पशुमाररण-स्थान पर कुशा का तृण बिछाना चाहिए, क्यों कि कुशा की उत्पत्ति अग्नि व सोम से होती है । अग्नि व सोम ही यज्ञ है । अतः इस कुशामय तृरण पर गिरा हुआ पशु का रक्त व मांस यज्ञ में ही प्रतिष्ठित रहता है, उससे बाहर नहीं जाता ॥ १४ ॥

इस प्रकार शामित्रशाला के जिस प्रदेश में पशु को मारना है, उस स्थान पर कुशा-स्तरण कर, अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता व यजमान उस स्थान से वापस लौट आते हैं तथा उत्तरा-वेद में श्राहवनीय के पास बैठ जाते हैं जिस से कि मारे जाते हुए पशु के प्रत्यक्ष ( द्रष्टा ) न रहें । क्यों कि पशु के वध को देख कर उनके मन में ग्लानि पैदा होगी और उससे यज्ञ भ्रष्ट हो जाएगा । उस पशु का वध उसके सींग पकड़ कर नहीं करना चाहिए । ऐसा करना मानुष-भाव है । और मानुषभाव के प्रवेश से यज्ञ की दिव्यता नष्ट हो जाएगी । इसी प्रकार पीछे से दोनों कान पकड़ कर वध करने से पशु पितृदेवत्य हो जाएगा । क्यों कि कानों के छिद्र में पितृप्रारण रहता है, यह कर्म देवकर्म न हो कर पितृकर्म हो जाएगा । अतः दोनों हाथों से उसका मुख बन्द कर उसको मारते हैं अथवा रज्जु की मोहरी पशु के मुख के नाप की बना कर उसके मुँह पर बाँध देते हैं । पशु को मारते समय ' जहि ' ' मारय ' इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । क्यों कि इन शब्दों का प्रयोग मानुष - कर्म में होता है, जो देवकर्म सर्वथा निषिद्ध है । ' संज्ञपय ' ' अन्वगन् ' शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । इस प्रकार बोलने से वह पशु देवताओं में चला जाता है तथा वह कर्म देवाधीन हो जाता है ॥१५ ॥

जिस स्थान पर जिस समय उस पशु को मारते हैं उससे पूर्व ' स्वाहा देवेभ्यः ' इसका उच्चारण कर श्रध्वर्यु अग्नि में घृताहुति देता है एवं प्रालम्भन के पश्चात् ' संज्ञप्तः पशुः ' ऐसा मारने वाला बोलता है तब ' देवेभ्यः स्वाहा ' इसका उच्चारण करता हुआ दूसरी प्राहुति देता है । कितने ही देवताओं के लिए आहुति देते समय स्वाहा शब्द का प्रयोग पूर्व तथा कितनों ही के लिए ' स्वाहा ' शब्द का बाद में उच्चारण किया जाता है । ' स्वाहा देवेभ्यः ', ' देवेभ्यः स्वाहा ' इन दोनों मन्त्रों द्वारा दोनों प्रकार के देवताओं को तृप्त कर दिया जाता है । ये दोनों आहुतियाँ पशु सम्बन्धी होने से पशव्य कहलाती हैं । इन दोनों आहुतियों में कामचार है । चाहें तो इन्हें करें और न चाहें तो न करें ॥ १६ ॥

[ विज्ञान भाष्य ] होतृ प्रवरणादि कर्म्म हो चुका - अब उसके आगे का कर्म बतलाते हैं-वेद की उत्तर श्रोणि में होतृषदन बना रहता है । सारे ऋत्विकों के स्थान नियत रहते हैं । वे अपने उन नियत स्थानों में ही बैठ सकते हैं - अन्यत्र नहीं । जब वहाँ पर इस प्रकार पूर्वोक्त विधि से होता का प्रव-रण हो जाता है तो प्रवृत्त होता उत्तर श्रोणिस्थ होतृषदन नाम के अपने स्थान में जा कर बैठ जाता है । वहाँ पर बैठ कर वह होता " श्रग्निर्होता वेत्तु " - इत्यादि मन्त्र से स्रुगादापन के लिए आज्ञा देता है । एवं " घृतवतीमध्व स्र ुचमास्यस्व " यह बोलता हुआ - प्रध्वर्यु को प्रसूत करता है । इस प्रकार होता से प्रसूत होकर अध्वर्यु जुहू और उपभृत् को हाथ में उठाता है— [ ३५२ ]

पृष्ठ 369

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मरण ब्राह्मण " तत् ( तत्र ) यत् ( यदा ) एतत् - ( इत्थं ) होता होतृषदनऽउपविशति । तत् ( तत्र ) उपविश्य प्रसौति । प्रसूतोऽध्वर्युः स्रुचौ ( जुहुपभृतौ ) प्रादत्ते " ॥१ ॥

इसके अनन्तर अध्वर्यु प्रमुखादि - ऋत्विक् लोग प्राप्री का यजन करते हैं - " श्रथाप्रीभिश्चरन्ति " -यूपैकादशिनी ब्राह्मण में बतलाया गया है कि पृथिवी से द्योतक अर्थात् सूर्य्यं तक ग्यारह ( ११ ) पशु रहते हैं जो कि स्तोमायन नाम से प्रसिद्ध हैं । इन ग्यारह ( ११ ) पशुओं का नाम ही ग्यारह ( ११ ) आती है । ये ग्यारह ( ११ ) पशु प्रारण रूप हैं । इनका स्वरूप क्या है? इसका उत्तर है - ऋतु और छन्द । ऋतु और छन्द ही देवप्राण के पशु कहलाते हैं । देवता ऋतु और छन्द पर ही सवार रहते हैं । पृथिवी से द्यौ तक व्याप्त जो देवप्राण है, वह प्रवर्ग्य बन कर खर्च होता रहता है । इन्हीं देवप्रारणों से पार्थिव भूत-जात उत्पन्न होते हैं । जितना प्राण पार्थिव भूतजातों के निर्माण में काम आ जाता है, उतने प्राण की उन देवताओं में कमी हो जाती । उस कमी को ये ही ऋतु और छन्द पूरी किया करते हैं । ऋतु और छन्द, देवतात्रों के प्राण को पूर्ण करने वाले हैं । ऋतु और छन्द भी एक प्रकार के प्राण ही हैं, ये ही पशु कहलाते हैं । पशु प्राण का नाम ही ऋतु और छन्द है । इन्हीं को ' परिकर ' - प्राण भी कहा जाता है । चूंकि ये ग्यारह ( ११ ) प्राण देवताओं की क्षति को पूरी कर देते हैं उनसे निकले हुए प्राण को फिर भर देते हैं, अतएव " रिक्त स्थानमाप्याययन्ति " इस व्युत्पत्ति से इन्हें ' आप्री ' कहा जाता है । देवप्राण को श्राप्यायित करने के कारण ही इन्हें ' आनी ' कहा जाता है । ' आप्यायी वृद्धों ' से भी ' आनी ' बनाया जा सकता है, एवं ' प्रापूरणे ' से भी प्री बनाया जा सकता है । अर्थ दोनों का एक ही है । ये प्राप्री कर कुल लेते बारह ( १२ ) हैं । निरुक्तकार तेरह ( १३ ) आप्री मानते हैं । वे द्यावा - पृथिवी को भी शामिल हैं । उनके मतानुसार निम्नलिखित तेरह ( १३ ) प्रात्री देवता हैं-१ - इध्म: ( समिधः ) २ - तनूनपात् ३- नराशंस ४- इळ: ५- बहिः ६ - द्वार: ७- उषासानक्ता ८ - देव्या होतारः ६- तिस्रो देवी: १०- त्वष्टा ११- द्यावापृथिवी १२- वनस्पतिः १३ - स्वाहाकृतयः । परन्तु वस्तुतः श्री कुल बारह ( १२ ) ही हैं । द्यावापृथिवी के बीच में ये बारह ( १२ ) रहते हैं । इस विज्ञान को बतलाने के लिए निरुक्तकार ने द्यावापृथिवी का भी निवेश कर दिया है । इन बारह ( १२ ) प्रियों में से जो तनूनपात् और नराशंस है, उसमें विकल्प है । जो तनूनपात् को मानते हैं, वे नरा-शंस को नहीं मानते । जो नराशंस मानते हैं वे तनूनपात् नहीं मानते । इस प्रकार कुल ग्यारह ( ११ ) प्री रह जाते हैं । बस, ये ही ग्यारह ( ११ ) श्रात्री ग्यारह ( ११ ) पशु हैं । इन्हीं के लिए ग्यारह ( ११ ) यूप खड़े किए जाते हैं । इन्हीं ग्यारह ( ११ ) प्राप्रियों से देवताओं के प्राण की पूर्ति होती है । इन ग्यारहों ( ११ हों ) में जो इध्म नाम की आत्री है उसे समिध भी कहा करते हैं । आज यह यजमान इन्हीं ग्यारह ( ११ ) आप्रियों का यजन करता है । प्राप्री से तो अधिदैवत प्राण की पूर्ति होती है, फिर यह यजमान क्यों प्राप्रीयजन करता है - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं--[ ३५३ ] 1

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण आब्राह्मण " तत् ( तत्र ) यदाप्रीभिश्चरन्ति ( तन्मीमांस्यते ) " । जो मनुष्य दीक्षा लेता है, वह मनसा वाचा कर्मणा - सर्वथा उस दीक्षाव्रत में नियुक्त हो जाता हैं । प्रारण व्यापार को तप कहते हैं । हाथ - पैर हिलाने को वाख्यापार को भूत - व्यापार को श्रम कहते हैं । प्राण और वाक् ही आत्मा हैं । जब तक प्रारण रहता है, तभी तक श्रात्मसत्ता रहती है; अतएव हम प्राणवाक् को ' आत्मा ' कह सकते हैं । ' तादर्थ्यात्ताच्छन्दम् ' इस न्याय से प्रारणसंघात को भी प्रात्मा कहा जा सकता है । यह प्राण और वाग्व्यापार बिना मनोनियोग के नहीं हो सकते । मन के बिना प्राण नहीं रहता प्राण के बिना मन नहीं रहता । मनो- नियोग से ही तप और श्रम होता है | अधिकार-प्राप्ति का नाम दीक्षा है । दीक्षा एक अधिकार प्राप्ति है । मैं आज से यही करूँगा - यही खाऊँगा - इन्हीं से ' बोलूंगा - इस मर्य्यादा के लिए यो यह प्रतिज्ञा की जाती है; ' यज्ञसिद्धि ' के लिए जो यह प्रतिज्ञा की जाती ' है, इसी का नाम ' दीक्षा ' है । आज से मैं यज्ञ का अधिकारी बनता हूं - इसके लिए जो अधिकार की युजा है, वही दीक्षा है । जब मनुष्य दीक्षित बन जाता है- प्राप्ताधिकार हो जाता है तो उसे मनसा वाचा कर्मणा - उसी काम में जुट जाना पड़ता है तभी अधिकार पद की रक्षा होती है । जिस पद पर जिसे नियुक्त कर दिया जाता है, वह उस पद की रक्षा के लिए अपने सारे मन को - सारे आत्मा को अर्थात् प्राणवाक् को - उसी में लगाए रहता है । खाते - पीते - सोते उठते - बैठते हर पल उधर ही ध्यान लगा रहता है । ठीक इसी प्रकार यज्ञ के लिए जो यजमान दीक्षा लेता है, उसकी भी यही हालत रहती है । वह सारे मन से -सारे आत्मा से यज्ञ के ही संभार और संहार में लगा रहता है । संभार कहते हैं - वस्तुनों को इकटा करना, संहार कहते हैं - उन्हें वहाँ से हटा लेना । सोमयाग बहुत बड़ा यज्ञ है । कभी - आहवनीय कुण्ड पर कर्म करना पड़ता है - कभी धिष्ण्याग्नि पर करना पड़ता है; कभी गार्हपत्य में करना पड़ता है, कभी शामित्रशाला में करना पड़ता है । जहाँ पर कर्म करना पड़ता है, वहाँ पर जुहूपभृत् श्राज्य कुशा-इत्यादि इत्यादि सामग्री का संभार करना पड़ता है । जब यहाँ का कर्म समाप्त हो जाता है तो यहाँ की सामग्री का संहार कर दिया जाता है अर्थात् यहाँ से सारी सामग्री उठा ली जाती है । फिर दूसरी जगह संभार कर देता है । इस प्रकार कभी सामग्री रखना कभी उठाना -कभी यह करता, कभी वह करना-इत्यादि प्रपञ्चों में यजमान मनसा वाचा कर्मणा यज्ञ में अभिव्याप्त रहता है । खाना - पीना सोना सब भूल जाता है । सारा मन लगा देता है अर्थात् सिवाय यज्ञ के और तरफ मन जाए, ऐसा मौका ही उसे नहीं मिलता । इस प्रकार यज्ञकर्त्ता यजमान को अपने बूते से बाहर परिश्रम करना है । अतएव इसकी प्राणमात्र प्रज्ञामात्रा- भूतमात्रा अधिक खर्च हो जाती है एवं इसका आत्मा खाली सा हो जाता है । लोक में हम देखते हैं कि जो बूते से बाहर काम कर डालता है - वह थक जाता है । एक मनुष्य चार कोस तक तो आसानी से जा सकता है । परन्तु यदि वह इससे अधिक चलेगा तो थक जाएगा । कारण इसका यही है कि आमद का सीगा ( विभाग ) नियत है । जितनी प्राणमात्रा खर्च होती है उतनी प्राती रहती है । श्राने की मात्रा और जाने की मात्रा नियत है । यदि आमद से अधिक खर्च हो जाता है तो थकान हो जाती है । जब चलते - चलते हम थक जाते हैं तो एक स्थान पर बैठ जाते हैं । वहाँ पर बैठने से सर्वत्र व्यापक प्रारण फिर भर जाता है एवं हम फिर चलने लगते हैं । इस प्रकार प्रकृति स्वयं उस कमी को पूरा कर देती है । आज इस दीक्षित - यजमान का आत्मा सूना - सा हो रहा है । अधिक मात्रा खर्च [ ३५४ ]