Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 371–380

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण आब्राह्मण होने के कारण यह शिथिल हो जाता है । यद्यपि प्रकृति स्वयं इसकी थकान दूर कर सकती है परन्तु अभी इसे आगे परिश्रम का काम और करना है, अतः वैध उपायों से इसे इस कमी को पूरा करना पड़ता है । कमी को पूरी करने वाले जो ग्यारह ( ११ ) आश्री देवता हैं, उनके यजन से एक प्राण उत्पन्न होता है, वह प्राण इसकी इस कमी को पूरा कर देता । चूंकि इनके यजन से ऋत्विक् लोग यज-मानात्मा को श्राप्यायित कर देता है, अतएव इन्हें ' आप्रिय ' कहा जाता है । यजमान अधिक परिश्रम से थक गया है, आत्मा खाली हो गया है, उसमें बलाधान करने के लिए ही आप्री देवता का यजन किया जाता है । बस, पशुयाग के भीतर ही पशु सम्बन्धी आत्री देवता यजन का यही कारण है । इसी अभि-प्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं " सर्वेरणव वाडएव मनसा, सर्वेणैवात्मना ( प्रारणादिसंघातेन ) यज्ञं सम्भ-रति सञ्च जिहीर्षति । यो दीक्षते । तस्य रिरिचान इवात्मा भवति । तमेताभि-रात्रीभिराप्याययन्ति - ( ऋत्विजः ) । तद्यदाप्याययन्ति तस्मादाप्रियो नाम । तस्मा-दाप्रीभिश्चरन्ति " ॥२ ॥

यज्ञ में प्रयाज- अनुयाज - श्रवयाज और उपयाज- ये चार कर्म्म होते हैं । मुख्य कर्म्म से पहले जिनका जन होता है वे प्रयाज कहलाते हैं । एवं मुख्य यज्ञ से पश्चात् जिनका यजन होता है वे अनुयाज कह. लाते हैं । एवं प्रयाज से बाद में मुख्य यज्ञ से पहले जिनका यजन होता है, वे श्रवयाज कहलाते हैं । एवं जिनका यजन होता है, वे उपयाज कहलाते । प्रयाज को प्रमृ-अनुयाज से पहले मुख्य कर्म से बाद में तोपस्तरण कहते हैं, एवं अनुयाज को अमृतापिधान कहते हैं । दोनों से मुख्य देवता का स्वरूप बना को रहता ही है । प्रयाज और अनुयाज ऋतु और छन्दप्राण का नाम है । यही पूरयिता है । ऋतु और छन्द ११ ) ही पशु कहते हैं । पशु ग्यारह ( ११ ) हैं, अतएव ग्यारह ( ११ ) ही प्रयाज करने । इन्हीं पड़ते का हैं-- यजन ग्यारह किया ( जाता अनुयाज करने पड़ते हैं । ग्यारह ( ११ ) प्रयाज ही ग्यारह ( ११ ) आत्री हैं । भगवान् कहते हैं— " अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर " । ( गीता ८ । ४ ) में हैं । श्रात्मा यज्ञरूप है - यही इसका तात्पर्य है । जो देवता श्रधिदैवत में हैं, वे ही अध्यात्म है, जिस हमारे शरीर में ग्यारह ( ११ ) प्रारण हैं । दस ( १० ) तो प्राण हैं, ग्यारहवाँ ( ११ वाँ ) श्रात्मा आत्मा में कि दसों ( १० सों ) प्राण प्रतिष्ठित होते हैं । पृथिवी अन्तरिक्ष - द्यो - इन तीनों के प्रारणों से हमारा निर्माण होता है । तीनों में जो द्यो की - प्रज्ञा- वस्तु हमारे पास आती है, उसी का नाम प्राण है । इसकी स्थिति शिरोभाग में रहती है । यह इन्द्रप्राण प्राण - सात भागों में विभक्त हो जाता है । दो कान, दो प्राँख, दो नाक, एक मुँह - इस प्रकार एक ही प्रारण सात अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । इन्हीं प्राणों के लिए श्रुति कहती है-[ ३५५ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण

" साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति ।

तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजते विकृतानि रूपशः " ॥

( ऋग्वेद मं ० १।१६४।१५ ) पृथिवी से जो प्रारण आता है, उसका नाम प्रपान है । इसके पायु और उपस्थ - दो स्वरूप हो जाते हैं । नाभि दसवां प्राण है । ग्यारहवां है - अन्तरिक्ष प्राण । अन्तरिक्ष का जो प्राण हमारे में आता है- उसका नाम ' व्यान ' पड़ता है । यही व्यान प्राण और प्रपान की प्रतिष्ठा है । अपान की, प्राण की एवं नाभि की - दस प्राणों की सत्ता इसी व्यान पर रहती है । व्यान हृदयाकाश में प्रतिष्ठित रहता हुआ-सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । इसी के लिए " स भूमि सर्वतः स्पृष्ट्वाऽत्य तिष्ठद्दशाङ्गुलम् " यह . कहा जाता है । इसी व्यान से जीवन - सत्ता रहती है । सारे प्राण इसी व्यान में प्रतिष्ठित रहते हैं । प्रत-एव श्रुति कहती है-- ~ श्रपिच " मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते " । ( कठो ० उ ० २।२।३ ) " न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ” ॥ इति ( कठो ० उ ० २।२।५ ) है? श्रतएव हम इस व्यान को ' आत्मा ' कहने के लिए तय्यार हैं । इन ग्यारहों में जो मिताक प्राण हैं, उन्हें स्पृतं प्राण भी कहा जाता है । एवं- नाभि को और व्यान को छोड़ कर अवशिष्ट नौ ( 8 ) प्राणों को निरुक्त प्रारण कहा जाता है । एवं नाभि को ' अनिरुक्त प्राण ' कहा जाता है । कहना यही है कि इन ग्यारहों की समष्टि का नाम ही ' पुरुष ' है । पुरुष के पुरुषत्व का संपादन करने वाली यही ग्यारह ( ११ ) ' वस्तुएँ हैं । यही ग्यारह ( ११ ) चीजें खर्च होती हैं । चूँकि शरीर में से इन ग्यारहों ( ११ हों ) का व्यय होता है, अतएव ग्यारह ( ११ ) ही प्रयाज होते हैं । ग्यारह ( ११ ) प्रयाजों से इन ग्यारहों ( ११ हों ) की क्षति को पूरा किया जाता है । ग्यारह ( ११ ) से सर्वात्मना सारे श्रात्मा का आप्यायन हो जाता है, श्रतएव ग्यारह ( ११ ) प्रयाज होते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " ते वा seas एकादश प्रयाजा भवन्ति । दश वाऽइमे पुरुषे प्रारणाः - आत्म-कादश: यस्मिन् ( व्याने ) एते प्रारणाः प्रतिष्ठिताः । एतावान् वै पुरुषः । तदस्य

सर्वमात्मानमाध्याययन्ति । तस्मादेकादश प्रयाजा भवन्ति ॥३ ॥

श्री यजन क्यों किया जाता है? उसमें भी ग्यारह ( ११ ) ही प्रयाज क्यों किए जाते हैं? -इसकी उपपत्ति बतला दी गई । श्रब पद्धति बतलाते हैं-प्रयाज ग्यारह ( ११ ) हैं । यही ग्यारह ( ११ ) श्री हैं । इन सब में से पहले आप्री का नाम ' समिध ' है । यजन में पहले ' प्रेष ' होता है । बाद में अनुवाक्या होती है । बाद में याज्या होती है । अध्वर्यु [ ३५६ }

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं श्रीब्राह्म होता को प्रैष करता हुआ " समिधः प्रष्यः " यह कहता है । होता अनुवाक्या मन्त्र बोलता है एवं अनु-वाक्या बोल कर होता अध्वर्यु को ' समिधो यज ' यह कहता है । तदनन्तर अध्वर्यु प्राहुति डालता है । इतना और समझ लेना चाहिए कि प्रयाज और अनुयाज में आज्याहुति ही होती है । सबसे पहले अध्वर्यु " प्रश्रावय " इस प्रकार आश्रवण करता है । तदनन्तर होता से ' समिधोयज ' यह कहता है । अध्वर्यु जुहू में घृत ले कर आहुति देता है । आत्री देवता ग्यारह ( ११ ) हैं । इनमें पहले - पहल समिध प्राश्री का ही नाम लिया जाता है । बाकी और दस ( १० ) के लिए ' प्रेष्य - प्रेष्य यज - यज- यही कहा जाता है । समिध के अलावा औरों का नाम ग्रहण नहीं होता । जिससे प्राहुति दी जाती है, उसे ' जुहू ' कहते हैं जुहू में घृत भरा रहता है । उस घृत के जमीन पर गिर जाने का डर रहता है अतएव जुहू के नीचे एक उप-भृत् लगा रहता है । जिस समय जुहू से आहुति दी जाती है, उस समय कुछ घृत उस उपभृत् में आ जाता है । उस घृत को चौथे प्रयाज में वापस जुहू में ले लेना चाहिए । पहली आहुति दो दूसरी दो- तीसरी दो । जब चौथी आहुति देने लगो तो आहुति से पहले जुहू में से जो घृत उपभृत् में आ गया है, उसे उस जुहू में डाल लो । डाल कर चौथी आहुति दो - पाँचवीं दो - छठी दो । जब सातवीं प्राहुति देने लगो तो फिर उस उपभृत् के घृत को जुहू में डाल लो । डाल कर सातवीं प्राहुति दो, ग्राठवीं दो, नौवीं दो । जब दसवीं ( १० वीं ) प्राहुति देने लगो तो उस घृत को फिर जुहू में डाल लो । फिर दशवीं ( १० वीं ) प्राहुति दो । इस प्रकार चौथे चौथे प्रयाज़ में घृत का समानयन करके आहुति डालनी चाहिए । ४-७ - १० चौथे-सातवें - दसवें - इस क्रम से तीन बार समानयन हो जाता है । जब दसवाँ प्रयाज हो चुके तो अध्वर्यु को ' शासमाहर ' - यह कहना चाहिए ॥ इसी अभिप्राय से कहते हैं-अध्वर्यु - आश्रावण प्रत्याश्रवणादि करके ' समिधः प्रेष्य ' यह बोलता है । एवं अवशिष्ट दस के नाम न ले कर खाली ' प्रेष्य - प्रेष्य ' यही बोलता है । एवं चौथे चौथे प्रयाज में घृत का समानयन करता हुआ दस प्रयाज करता है । इस प्रकार दस प्रयाजों का यजन करके अपने प्रतिनिधि प्रतिप्रस्थाता को ' शासमाहर ' यह आज्ञा देता है । जिससे हिंसा की जाए उस शस्त्र का नाम शास है । प्रयाज के अनन्तर शामित्रशाला में पश्वालम्भन होने वाला है । उसके लिए तलवार मंगवा कर तय्यार कर लेते हैं । शास को तलवार कहते हैं - यह शास लोक - प्रसिद्ध नहीं है । अतएव याज्ञवल्क्य कहते हैं - तलवार को ही ' शास ' कहते हैं-" स श्राश्राव्य - प्राह- समिधः प्रेष्य इति । प्रेष्य प्रेष्येति ( तनूनपात् प्रभू:. तीनां प्रेष्य - प्रेष्य इत्येवमेव नाम निर्दिशेत् ) । चतुर्थे चतुर्थे प्रयाजे समानयमानो दशभिः प्रयाजैश्चरति । दश प्रयाजानिष्ट्वाह शासमाहर - इति । असि वै शास ..इत्याचक्षते " ॥४ ॥।

उत्तरावेदि के ठीक पूर्व में जो यूप गाड़ा जाता है, उसे ' प्रग्निष्ठा ' कहते हैं । उस सारे यूप का नाम भी अग्निष्ठा है, एवं यूप के केन्द्र में जो एक यूपशकल रखने का छोटा सा स्थान है, उसका नाम [ ३५७

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मणं भी- ' श्रग्निष्ठा ' है । वस्तुतस्तु - इसी स्थान का नाम अग्निष्ठा है । इसी की वजह से सारे यूप को ' अग्निष्ठा ' कहा जाता है । जिस समय ' अग्निष्ठा ' यूप तय्यार किया जाता है, उस समय जो उससे पहले - पहल उतरने वाले दो यूपशकल होते हैं, उन्हें एक छोटे से कपड़े में लपेट कर एक डोरी से बाँध कर उस ग्रुप के ठीक केन्द्र में छाती में उन दोनों को उसी अग्निष्ठा स्थान में रख देते हैं । यह यूप शकल -यूप का आत्मा है - पुत्र है । यदि पुत्र अपनी गोदी में रहता है तो इससे बड़ी शान्ति मिलती है । इसीलिए उन यूप- शकलों को यूप की गोदी- स्वरूप - यूप मध्यस्थ श्रग्निष्ठा स्थान में दोनों यूप-शकलों को एक कपड़े में लपेट कर वहीं रख दिया जाता है । उन दोनों यूप- शकलों के ( १ ) स्वरु और २. प्रदिति ये नाम हैं । प्रयाज यजनानन्तर अध्वर्यु - अग्निष्ठास्थान में रक्खे हुए उन दोनों यूपश्कलों को उठा लेता है । एवं प्रयाज यजनानन्तर जुहू में जो घृत शेष रह गया है, उससे उन दोनों को अक्त कर लेता है । इस प्रकार दोनों यूपशकलों को घृताक्त करके— " घृतेनात्तौ पशूंस्त्रायेथाम् " । ( वा ० सं ० ६।११ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उन दोनों शकलों से पशु के ललाट को स्पर्श करता है - घृत में यूपकल की चुपड़ कर - हे घृताक्त यूपशकलो! प्राप असुर और राक्षसों के प्राक्रमण से इस यज्ञ पशु की रक्षा कीजिए । घृताक्त यूपशकल का स्पर्श क्यों कराया जाता है? इसका कारण बतलाते हैं । यूष चूंकि व 1 है, अतएव " आत्मा वै जायते पुत्रः " के अनुसार हम ग्रुप के शकल को ' वज्र ' कह सकते हैं, एवं घृत भी है । असुर के लिए जितने भी आग्नेय पदार्थ हैं, सब वज्र हैं । यूप खैर की लकड़ी का बनाया जाता है । खैर ( खदिर ) शुद्ध अग्नि है, घृत भी आग्नेय है; प्रतएव हम दोनों को वज्र कह सकते हैं । इन दोनों में से एक प्रकार का विद्युत् निकला करता है । इनकी विद्युत् के प्रभाव से सर्वत्र व्याप्त असुर प्राण हमला नहीं कर सकते । यदि इनका आक्रमण हो जाता है, जिसमें श्रासुर भाव घुस जाता है, वह वस्तु अयज्ञिय हो जाती है । इसीलिए यज्ञ में जो - जो वज्र काम में आते हैं, उन सब को इकट्ठा करके उस व को इस पशु की रक्षा में सुरक्षित कर दिया जाता है । पशु में प्रासुर भाव न घुस जाए इसके लिए ही वज्र स्वरूप यूपशकल को वज्रघृत से युक्त कर ललाट से स्पर्श किया जाता है । इस विद्युत् सम्बन्ध से इस पशु में प्रासुर भाव नहीं घुस सकता । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " अथ यूपकलमादत्ते । तावग्रे जुह्वा श्रक्त्वा पशोर्ललाटमुपस्पृशति । घृतेनाक्तौ पशूंस्त्रायेथाम् ( इति मन्त्रेण ) । वज्ञो वै यूपशकलः । वज्ञः शासः । वज्र प्राज्यम् । तमेवैतत् कृत्स्नं वज्रं संभृत्य तं ( वज्रम् ) अस्य ( पशोः ) अभि-गोप्तारं करोति । नेदेनं ( पशुं ) नाष्ट्रा रक्षांसि हिनसन् - इति " । इसके बाद उन दोनों यूपशकलों को " एषा ते प्रज्ञाताभिः " ' - यह मन्त्र बोलता हुआ वापस उसी यूप के अग्निष्ठास्थान स्थित कपड़े लपेट देता है । है यूपशकल -यह अश्रि ( यूप की कोर ) श्रापकी प्रज्ञाता संपत्ति । अर्थात् जिस स्थान पर श्राप पहले प्रतिष्ठित थे, उसी परिचित स्थान पर हम आपको पुनः [ ३५८ ]

पृष्ठ 375

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) ११ १. ' यज्ञस्यकर्त्ता ( यजमान ) ' । २. श्रीब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ ३५६ ] प्रतिष्ठित करते हैं । आपको अपने ही स्थान में प्रतिष्ठित किया जाता है - " पुनर्यु पशकलमवगृहति । एषा ते प्रज्ञाताविरस्तु । इत्याह " - प्रथवा ' पुनर्यु पशकलमवगूहति ' को अलग समझना चाहिए -एवं- ' एषा प्रज्ञाताविरस्तु ' - यह शमिता के प्रति कहा हुआ समझना चाहिए । जो इस पशु का आलम्भन करता है, वह शमिता ' कहलाता है । अध्वर्यु ' एषा ते प्रज्ञाताविरस्तु ' यह बोलता हुआ उस असि को शमिता के हाथ में दे देता है ----हे शमि! यह अष्टाश्रि- तलवार आपके लिए प्रज्ञाता बने- अर्थात् आप इस तलवार से अच्छी तरह काम ले सकें- ऐसी बने । यह कह कर अध्वर्यु शुद्ध घृत को रख देता है--" एषा ते प्रज्ञाताविरस्तु - इत्याह - शासं प्रयच्छन् -सादयति स्रुचौ " ॥५ ॥

इसके बाद प्राग्नीघ्र होता के प्रति पर्य्यग्नययेनुन हि " यह प्रेष करता है । यह प्रैष कर स्वयं एक जलता पूला ले कर उसे पशु के चारों ओर घुमाता है । पशु के चारों ओर अग्नि की दीवार खड़ा करता है । पशु के, अग्नि को चारों ओर करना ही ' पर्य्यग्निकरण ' कहलाता है । पशु को पर्य्यग्नि बनाने की क्या आवश्यकता? - इसका कारण बतलाते हैं । हमने बतलाया है कि अन्तरिक्ष में ग्रासुर प्रारण भरा रहता है । जिसमें यह प्रासुर प्रारण प्रविष्ट हो जाता है, वह प्रयज्ञिय हो जाता है । अग्नि असुरों के लिए वज्र है । बस, इस पशु के चारों ओर से किधर से भी असुर न घुस जाय - आसुर भाव का पशु से स्पर्श न हो जाय - इसलिए चारों ओर अग्नि का सम्बन्ध कर देते हैं । यदि चारों ओर न किया जाएगा तो बीच में सन्धि रह जायगी । उस सन्धि में हो कर - प्रासुर भाव को घुसने का मौका मिल जाएगा । श्रतः अच्छिद्र अग्नि से ही इसको सुरक्षित करते हैं । अग्नि राक्षस असुरों का मारने वाला है । जहाँ अग्नि का राज्य है, वहाँ आप्य प्राण एक सेकण्ड भी नहीं ठहर सकता । बस, असुर विनाश के लिए ही पशु को पर्य्यग्न बनाया जाता है । चारों ओर उल्मुक फिराया जाता है— " प्रवाह - पग्नयेऽनुब्रूहि इति । ( उक्त्वा ) उल्मुकमादायाग्नीत् पर्य्यग्नि करोति - ( पशोः परितः अग्नि करोति उल्मुकेनाग्नीध्रः ) । तद्यत् पर्य्यग्नि करोति - ( तदुच्यते ) । अच्छिद्रमेवैनमेतदग्निना परिगृह्णाति । नेदेनं नाष्ट्रा रक्षांसि प्रमृशानिति । अग्निहि रक्षसामपहन्ता । तस्मात् पर्य्यग्नि करोति " । इसी उल्मुकाग्नि से पशु का मांस पकाया जाता है । उत्कर से उत्तर की तरफ शामित्रशाला र होती है । उसी में पशु का श्रालम्भन किया जाता है । एवं उसी शाला में पशु की वपा को पकाया जाता है । तो बस जिस शामित्रशाला में पशु - मांस पकाया जाता है, उसी जगह इस उल्मुक को ले जाया " जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - " जिस जगह इस पशु को पकाते हैं, उसी ओर अर्थात् शामित्र-' यज्ञ के लिए बलि पशु बाँधने का स्थान ' | ३. ' चर्बी, वसा ' ।

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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) जायगा ---१. आब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ ३६० ] शाला में आग्नीध ' उस उल्मुक को ले जाता है एवं वही रख देता है । इसी उल्मुकाग्नि से मांस पकाया " तद्यत्रेनं ( पशु ) श्रपयन्ति तदभि परिहरति ॥६ ॥

कितने ही याज्ञिकों का मत है कि इस उल्मुकाग्नि से मांस - परिपाक नहीं करना चाहिए । इसके लिए मन्थन द्वारा नया अग्नि उत्पन्न करना चाहिए । इसी प्राचीन मत का उल्लेख करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-कितने ही याज्ञिकों का कहना है कि उल्मुक को जिस स्थान से लाया गया था - पय्र्यग्नि कर्मा-नन्तर उसे उसी स्थान में ले जाना चाहिए । उत्तरावेदिस्थ आहवनीय श्रग्नि में से यह उल्मुक लाया जाता है । उनका कहना है कि कार्य्यं हुए बाद उसे उसी श्राहवनीय में डाल देना चाहिए । इसके बाद दूसरा अग्नि मथ कर उसमें मांस पकाना चाहिए न कि उल्मुकाग्नि में । कारण इसका यही है कि उत्तरा-वेद का प्रति श्राहवनीय ' है । इसमें पके हुए हवि की आहुति दी जाती है, न कि इसमें पकाया जाता है । इसीलिए इसे प्रहवतीय कहते हैं न कि श्रपणाग्नि । इसमें तो आहुति दी जाती है । जो कच्चा मांस है, उसे इसमें पकाया जाय इस काम के लिए यह प्राहवनीय नहीं है अपितु पके हुए हवि की इसमें आहुति डाली जाय इस काम के लिए यह श्राहवानीय, ग्राहवनीय है न कि श्रपणाग्नि । पकाने का काम पण में होता है न कि आहवनीय में । यह उल्मुकारित श्राहवनीयाग्नि है । अतः इसे वापस आह-वनीय में ही डाल देना चाहिए । मांस पकाने के लिए श्रग्निमन्थन द्वारा तया श्रग्नि उत्पन्न करना चाहिए-" तदाहुः - पुनरेतदुल्मुकं हरेत् । अथात्रान्यमेवाग्नि निर्मथ्य तस्मिन्नेनं

श्रपयेयुः । श्राहवनीयो वाऽएषः । नवाऽएष तस्मै यदस्मिन्नभृतं श्रपयेयुः ।

अपितु तस्मै वा s एष यदस्मिन् शृतं जुहुयुरिति ॥७ ॥

भगवान् याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । उल्मुकाग्नि से ही पशुपण करना चाहिए । कारण इसका यही है कि जिस प्रकार ग्रसित प्रन्न होता है उसी प्रकार से इस अग्नि का यह पशु ग्रास बन जाता है । पशु के चारों ओर जो इस ग्राहवनीय अग्नि को फिराया जाता है, उससे यह पशु इस अग्नि के मुख में आ जाने के कारण इसका ग्रास बन जाता है । ऐसी अवस्था में जिस प्रकार किसी के मुंह के ग्रास को निकाल कर किसी दूसरे को दे दिया जाय, ठीक वैसा ही यह होगा यदि उल्मुकाग्नि से मांस - परिपाक न कर अन्य अग्नि से किया जाएगा । हम जो इस उल्मु-काग्नि से मांस पकाते हैं, उसमें श्रपणभाव नहीं है, अपितु आहुति का भाव है । पका नहीं रहे अपितु आहवनीय में प्राहुति ही दे रहे हैं । इस पशु पर इस उल्मुकाग्नि की सत्ता हो चुकी है । यह पशु इसका ' यज्ञाग्नि प्रज्वलित करने वाला पुरोहित ' । २. ' जलती लकड़ी ' ।

पृष्ठ 377

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मण ग्रास बन चुका है, ऐसी अवस्था में इसमें परिपाक न कर अन्य में परिपाक करना इसके मुंह में से ग्रास निकालना है । श्रतः हमारे खयाल से इसी उल्मुकाग्नि में मांस पण क्रिया होनी चाहिए-" तदु तथा न कुर्य्यात् । यथा वै ग्रसितमेवमस्यैतद् भवति यदेनेन पर्य्यग्नि करोति । स यथा ग्रसितमनुहाय - ( मुखस्यग्रासमपकृष्य ) श्रच्छिद्य तदन्यस्मै प्रय-च्छेत् - एवं तत् । तस्मादेतस्यैवोल्मुकस्याङ्गारान्निमृद्य तस्मिन्नेनं श्रपयेयुः " || ८ || उसी उल्मुक ' से कोयले तय्यार कर उसी श्रङ्गाराग्नि में उसे पकाना चाहिए । पर्य्यग्निकरणानन्तर- प्राग्नीध्र, उल्मुक ले कर शामित्रशाला की ओर सबसे आगे चलता है । उल्मुक को आगे ले जाता हुआ - अग्नि ही को अग्रगामी बनाता है । श्रग्नि आगे - आगे नाष्ट्रा और आसुर भावों को मारता हुआ चलता है । प्रकृति में भी अग्नि ही सबसे आगे चलता है । जिस प्रोर अग्नि जाता है, उस ओर का स्थान आसुर भाव रहित प्रतएव निरुपद्रव एवं शान्त हो जाता है । इसी निरुपद्रवता के लिए अबसे आगे उल्मुक लिए हुए श्राग्नीघ्र चलता है । श्रग्निकृत जो अभय अनाष्ट्र निरुपद्रव मार्ग है-उससे पशु को पशुहर्त्ता ले जाता है । पशु के पीछे वपा पकाने का वपाश्रपरणी नाम का पात्र ले कर प्रति-प्रस्थाता जाता है । प्रतिप्रस्थाता के पीछे अध्वर्यु चलता है । अध्वर्यु के पीछे यजमान चलता है । इस प्रकार सब के आगे उल्मुक लिए हुए आग्नीध्र चलता है । उसके पीछे पशुहर्त्ता ऋत्विक् पशु लिए चलता हैं । उसके पीछे वपाश्रपणी पात्र लिए प्रति प्रस्थाता चलता है । उसके पीछे अध्वर्यु रहता है । प्रध्वर्यु के पीछे यजमान रहता है । इस तरह - १ - प्राग्नीध्र, २- पशुहर्त्ता, ३ - प्रतिप्रस्थाता, ४ - प्रध्वर्यु - ५ - यजमान-यह पञ्चावयव पाङ्क्त यज्ञ शामित्रशाला की ओर जाता है । ये पाँचों नहीं जा रहे हैं अपितु पञ्चावयव यज्ञ जा रहा है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" थोल्मुकमादाय अग्नीत् पुरस्तात् प्रतिपद्यते । अग्निमेवैतत् पुरस्तात् करोति । श्रग्निः पुरस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्यपघ्नन्नेति । अथाभयेनाष्ट्रेण पशुं नयन्ति । तं वपापणीभ्यां प्रतिप्रस्थातान्वारभते । प्रतिप्रस्थातारमध्वर्युः । श्रध्वर्यु यजमानः " ॥९ ॥

कितने ही याज्ञिकों का कहना है कि इसमें जो अध्वर्यु के पीछे यजमान का अन्वारम्भण है, वह सर्वथा अनुचित है । यजमान को इस पशु के साथ हंगिज प्रन्वारम्भण नहीं करना चाहिए, अर्थात् यज-मान को इस थोक के साथ शामित्रशाला की ओर नहीं जाना चाहिए । कारण इसका यही है कि इस पशु को ऋत्विक् लोग मृत्यु के लिए मारने के लिए शामित्रशाला की ओर ले जाते हैं । ऐसी अवस्था में यजमान को पशु के साथ ले जाना मृत्यु के पीछे ले जाना है । यजमान को मुत्यु का अनुयायी बनाना है । इससे यजमान का घोर अनिष्ट होने की सम्भावना है । अतः हमारे खयाल से यजमान का अन्वारम्भण नहीं करना चाहिए -[ ३६१ ]

पृष्ठ 378

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण " तदाहुः - नैष यजमानेनान्वारभ्यः ( युक्तः ) -मृत्यवे ह्येतं नयन्ति । तस्मा-नान्वारभेत - इति " । परन्तु भगवान् याज्ञवल्क्य इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि नहीं, यजमान का अन्वा-रम्भरण अवश्य ही होना चाहिए । पशु को मृत्यु के जिए नहीं ले जाते हैं, अपितु यज्ञ के लिए ले जाते हैं । यहाँ पर जो पशु का प्रालम्भन होगा, उससे यज्ञात्मा बनेगा । यज्ञ - स्वरूप सम्पादन के लिए पशु कालम्भन होता है, न कि उसकी मृत्यु की जाती है । उसको दिव्य भाव में परिणत किया जाता है । तात्पर्य यही है कि तुम जो इसे लोकवत् मृत्यु समझ रहे हो - प्रशुभ कार्य समझ रहे हो - यह तुम्हारी भूल है | यज्ञ में पश्वालम्भन मौत नहीं कहलाती - यह तो बडा ही दिव्य कर्म है । अतः यजमान का ' अन्वारम्भरण अवश्य ही होना ही चाहिए-कदाचित् इसी प्रमाद में पड़ कर यजमान का अन्वारम्भण न कराया जाएगा तो यजमान को यज्ञ से अलग निकाल दिया जाएगा । पशु नहीं जा रहा है । इसके साथ यजमान को न ले जाना यज-मान को यज्ञ से पृथक् करना है । अतः - अवश्य ही अन्वारम्भण होना चाहिए । श्रपिच तुम जो मृत्यु प्रयुक्त दोष बतलाते हो वह भी यहाँ नहीं होता है । यजमान का अन्वार-म्भरण तो मृत्यु से सर्वथा मोक्ष में होता है । पशु का अन्वारम्भरण - वपाश्रपणी लिए प्रतिप्रस्थाता करता है । प्रतिप्रस्थाता का अन्वारम्भरण अध्वर्यु करता है । अध्वर्यु का अन्वारम्भण यजमान करता है । इस प्रकार तुम्हारे हिसाब से यदि - ' अभ्युपगमवादेन ' पशु की मृत्यु भी मान ली जाए तब भी प्रतिप्रस्थाता मृत्यु का अन्वारम्भरण करता है न कि मृत्यु का । अतः यजमान का प्रत्वारम्भण प्रवश्य ही होना चाहिए-" तदन्वेवारभेत । न वाऽएतं मृत्यवे नयन्ति यं यज्ञाय नयन्ति । तस्माद-वेवारभेत । यज्ञादु हैवात्मानमन्तरियात् - यन्नान्वारभेत । तस्मादन्वेवारभेत । अपिच - तत् परोक्षमन्वारब्धं भवति । वपाश्रपरणीभ्यां प्रतिप्रस्थाता । प्रतिप्रस्था-तारमध्वर्युः । श्रध्वर्युं यजमानः । एतदु परोक्षमन्वारब्धं भवति ॥ १० ॥

यजमान का अन्वारम्भण प्रवश्य ही करना चाहिए, अन्यथा वह पशुरूप यज्ञ से पृथक् हो जाएगा । इस प्रकार चारों शामित्रशाला की ओर जाते हैं । उत्तरावेदि पर कुशा का प्रस्तरण रहता है अर्थात् कुशा बिछी रहती है । जिस समय ये लोग अन्वारम्भरण करते हैं, उस समय वेदि के ऊपर स्तीर्ण जो बहि है, उसमें से, अध्वर्यु, दो तृण उठा लेता है । अर्थात् उत्तरावेदि से दो तृण उठा कर उन्हें हाथ में लिए ही शामित्रशाला की ओर आते हुए पशु का अन्वारम्भण करना चाहिए । वह वृरणग्रहीता अध्वर्यु " श्रश्रावय " इस प्रकार आश्रवण बोल कर उस शामित्रशाला में पहुंच कर वहाँ पर जा कर - होता के प्रति-[ ३६२ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) गो ० उ ० १२० । १ शतपथ ब्राह्मण " उपप्रेष्य होतर्हव्या देवेभ्यः ” । [ ३६३ ] यह प्रैष करता है । हे होतः! देवताओं के लिए हव्य पहुंचा दो - अर्थात् देवताओं को सुनवा दो कि आपके पास हवि ( पशु ) आ पहुंचा । प्रत्येक कर्म में वैश्वदेव का सम्बन्ध होना आवश्यक है । बिना श्वदेव के कर्म्म अधूरा ही रहता है । परन्तु यहाँ वैश्वदेव स्वातन्त्र्येण होता नहीं है, ऐसी अवस्था में वैश्वदेव- सम्पत्ति प्राप्ति के लिए ' देवेभ्यः ' कह दिया जाता है । यह पशु अग्नीषोमीय है, अतः देवाभ्यां यह कहना चाहिए था । परन्तु यह न कह कर जो देवेभ्यः कहा है, इसका तात्पर्य केवल इस कर्म में वैश्वदेव का सम्बन्ध करना है । " एते वै विश्वेदेवा यत्सर्वे देवा: " १ से जो सारे देव हैं, वे ही विश्वेदेव कहे जाते हैं । ऐसी अवस्था में ' देवेभ्यः ' से उन वैश्वदेवों का भी हमारे यज्ञ में सम्बन्ध हो जाता है -" अथ स्तीर्गायै वेदेः ( अन्वारम्भसमये वेद्यास्तीर्णे बहिषि ) द्वे तृणे अध्वर्युरादत्ते । स ( तृरणग्रहीता श्रध्वर्युः ) श्राश्राव्य - श्राह उपप्रेष्य होतर्हव्या ( हव्यानि ) देवेभ्य इति । एतदुवैश्वदेवं पशौ - ( पशुयागे देवेभ्यः इति कथनेन asardar सम्बन्धो जायते इति भावः ) " ॥११ ॥

इसके बाद - मध्वर्यु यजमान से भी निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है और प्राप भी बोलता है ---" रेवति यजमाने प्रियं धा प्राविश । उरोरन्तरिक्षात् सजूर्देवेन वातेनास्य. . हविषस्त्मना यज- समस्य तन्वा भव- इति " । ( वा ० सं ० ६।११ ) " हे रेवति! ( रश्मिवति - रयिमति धनवति वा ) यजमाने प्रियं ( श्रभिमतं नातिलक्षणं ) - धाः- ( धेहि ) प्राविश " । " अनार्त्तस्य स्य पशोर्हविषः-: - त्मना - ( श्रात्मना ) यज । हे वाग् देवि! उरोः अन्तरिक्षात् विस्तीर्णादन्तरिक्षात् वातेन देवेन सजूः ( समानप्रीतिः सती ) -यजमानं - गोपाय | पशुलक्षणस्य हविषः- त्मना ( आत्मना - स्वरूपेण ) यज । अस्य यजमानस्य पशोर्वा - तन्वा सह सम्भव ' इति । रोदसी त्रिलोकी में व्याप्त जो वाक् है उससे यह प्रार्थना की जाती है । यज्ञ में मन प्रारण वाक्-तीनों के नियोग की आवश्यकता होती है । यद्यपि सब ऋत्विक् तीनों से ही काम लेते हैं, परन्तु ब्रह्मा मन के अधिष्ठाता हैं । ब्रह्मा मन से ही ज्यादा काम लेते हैं । अध्वर्यु प्रारण से ज्यादा काम लेता है । उसे ही प्राण- व्यापार करना पड़ता है । होता को वाक् से काम लेना पड़ता है । तीनों अविनाभूत हैं । इन

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्म तीनों में प्रधानता वाक् की है । वाक् - मन्त्र के बिना यज्ञ नहीं हो सकता । अतएव वाक् से प्रार्थना की जाती है कि आप यजमान में घुस जाइए । वाक् चूँकि बिना प्रारण के नहीं रहती - प्राण बिना मन के नहीं रहता-अतएव वाक् कें ग्रहरण से मन - प्राण स्वतः गृहीत हो जाते हैं । वाक् का यजमान में प्रवेश हो अर्थात् मन-प्रारण वाक्- तीनों यजमान में प्रविष्ट हों । यजमान से यज्ञ ही श्रभिप्रेत है । इस यज्ञ में तीनों होंगे, तभी यज्ञ सुसम्पन्न होगा प्रतएव वाक् से प्रार्थना की जाती है कि हे रेवति! रश्मिवति वाक्! प्राप यजमान में अभिमत जो फल है, उसे धारण करो । इस प्रकार अभिमत फल धारण करते हुए यजमान में प्रवेश करो " । वाक् को रेवति बतलाया है । रेवति का अर्थ है किरणवति । यह बात वाक् में सर्वथा अनुपपत है । संसार में ऋत और सत्य दो प्रकार के पदार्थ होते हैं । अशरीर - श्रहृदय पदार्थों की ऋत कहा जाता है जैसे - पानी, हवा, सोम । सशरीर, सहृदय पदार्थों को सत्य कहा जाता है, जैसे - सूर्य का गोला-पृथिवीपिण्ड - चन्द्र पिण्ड । ऋत पदार्थ सब जगह भरा रहता है - इसमें से किरणें नहीं निकलतीं । किरणें सत्य पदार्थ में से निकलती हैं । हमारी जो यह वाक् है, वह ऋतरूपा है । इससे कोई भी स्थान खाली नहीं है - ऐसी अवस्था में इसमें से रश्मियाँ क्यों कर निकल सकती हैं? रश्मियाँ तो सत्य वस्तु में से निकलती हैं । फिर जो यहाँ पर वाक् के लिए ' रेवति ' प्रयोग किया गया है, उससे शब्दात्मिका ( मन्त्रा-मिका ) वाक् ही अभिप्रेत समझनी चाहिए । ऋत वाक् नीरूप है- सर्वत्र व्याप्त है । उसी से हमारी शब्द-वाकू उत्पन्न होती है । हम जो मुँह से शब्द बोलते हैं- उसमें से चारों ओर किरणें निकलती हैं, एवं उन किरणों का एक मण्डल बनता है । इस प्रकार मन्त्रवाक् - शब्दवाक् रश्मिमयी हो जाती हैं । यह वाक् उसी व्यापक वाक् से उत्पन्न होती है । प्रकृत में ' रेवति ' विशेषरण दिया है । रेवति वह व्यापक ऋत - वाक् नहीं हो सकती, अतएव यहाँ मन्त्रवाक् का ग्रहण समझना चाहिए एवं यज्ञ में उपयोग भी इसी मन्त्रवाक्... का है | मन्त्रवाक् से चूंकि रश्मियाँ निकालती हैं, अतएव हम इसे अवश्य ही ' रेवति ' कह सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" वाग्वै रेवती । सा यद्वाग् बहु वदति - तेन वाग्रेवती " । वह वाक् बहुत बोलती है, बोलने से रश्मियाँ निकलती हैं, अतएव यह वाक् रश्मिवति कह-लाती है-. " प्रियं घा प्राविश " किसी - किसी की बोली ऐसी कडुवी होती है, जिसको सुनते ही उद्वेग हो जाता है । ऐसी वाक् को प्रासुरी वाक् कहा जाता है । इस यजमान में जो वाकू आए वह आसुरी न आए, श्रपितु दैवी वाक् ही आए । मधुर वाक् का ही इसमें प्रवेश हो । प्रापका जो अनार्त्त स्वरूप है, मधुर स्वरूप है - उसे ही यजमान में धारण करो । मधुर रूपेणैव यजमान प्रवेश करो । यजमान ऐसा मन्त्र • बोले, जिससे देवता प्रसन्न हो जाए । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" अनातिमाविश- इत्येवैतदाह - उरोरन्तरिक्षात् सजूर्देवेन वातेन " । १ ' वा ० सं ० ६।११ ' । [ ३६४ ]