Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 381–390

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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-तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) ' वा ० सं ० ६।११ ' । १ शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मण [ ३६५ ] जो वाक् रश्मिवति नहीं है सर्वत्र व्यापक है - वह सर्वथा स्थिर है । उसमें जरा भी गति नहीं है । इससे जो शब्द उत्पन्न होता है, वह वीचि तरंग से होता है । जब वायु का धक्का लगता है तो इस वाक् समुद्र में वीचि - लहर उत्पन्न होती है । वह वीचि - लहर करणं- शष्कुली पर जा कर जब पहुँचती है तो वहाँ पर बैठा हुआ प्रज्ञा - क - च - ट - त - प- का ग्रहण करता है । कहना यही है कि वाक् में गति नहीं है । वायु ही वाक् को शब्दरूप में परिणत करता है । ' वाक् यजमान में प्रविष्ट हो ' - यह कहना है । परन्तु वाक् वायु के बिना शब्द - स्वरूप में परिणत नहीं होती, अतएव कहा जाता है कि यह जो विशाल अन्तरिक्ष है, उससे वायु - देवता के साथ मिल कर हमारी रक्षा करो । वायु में प्रसुर और राक्षस हुआ करते हैं । वायु ही आसुरप्राण की प्रतिष्ठा है । असुरों का शरीर वायुमय ही होता है । यह जो विशाल अन्तरिक्ष “ दिखलाई पड़ रहा है, इसमें - उभयतः - परिच्छिन्न एवं अमूल असुर विचरते रहते हैं । इस ओर पृथिवी है - उस र ध्रुव है । दोनों से अन्तरिक्ष्य असुर परिच्छिन्न ( ससीम ) हो रहे हैं । एवं साथ ही में अमूल भी हैं । जैसे वृक्ष जमीन में बद्ध रहते हैं - नक्षत्रादि द्युलोक में बद्ध रहते हैं वैसे ये असुर जमीन और दोनों में ही में बद्ध नहीं हैं । दोनों के बीच में रहते हुए भी अमूल हैं । जैसे- उभयतः परिच्छिन्न एवं अमूल मनुष्य लोग - चाहे जहाँ विचरते रहते हैं - उनकी कोई नियत प्रतिष्ठा नहीं है तथैव ये असुर भी अमूल होते हुए अन्तरिक्ष में वायु में विचरा करते हैं । वाक् बिना वायु के आ नहीं सकती । वायु में ' असुर रहते हैं । ऐसी अवस्था में वायु के साथ ही आसुर भाव के प्रविष्ट हो जाने का भी डर है । इससे कहा जाता है कि हे वाक्! श्राप वायु - देवता से मिल कर अन्तरिक्ष के असुरों से यजमान की रक्षा कीजिए । ऐसा न हो कि आपके साथ आने वाले वायु के साथ असुर भी इसमें घुस जाएँ । इसी अभि प्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं-" अन्तरिक्षं वाऽननु रक्षश्चरति - श्रमूलं - उभयतः परिच्छिन्नम् - यथायं पुरु-षोऽमूलं उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति । तद् वातेनैनं संविदानान्तरिक्षाद् गोपाय इत्येवैतदाह - यदाह - उरोरन्तरिक्षात् सजूर्देवेन वातेनेति ॥ १२ ॥

हे वाक्! त्वं वातेन सह संविदाना - ( संजानाना सती ) एनं यजमानं • अन्तरिक्षस्य सुरेभ्यः गोपाय " इत्यै- इति भावः " । ' स्य हविषस्त्मना यजेति १ अनार्त्त जो पशु है उसका जो हवि है - प्रर्थात् देवतात्रों के हवि-बनने के लिए प्रसन्न जो पशु है, उसके जो हविरूप शरीरावयव हैं - उनका अपने रूप से यजन कीजिए-अर्थात् - पशु का यजन मन्त्र ही से होता है । मन्त्र - वाक् से इसका यजन अच्छी तरह हो जाए - यही तात्पर्य है । हम यजन नहीं कर रहे, अपितु श्राप ही इसका यजन कर रहे हैं - यही इस वाक् से प्रार्थना की जाती " वाचमेवैतदाह- अनार्तस्यास्य ( पशो:) हविष - श्रात्मना यजेति " ।

पृष्ठ 382

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तृतीय काण्ड ( श्र ० शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण अर्थात् अनार्त्त पशु - हवि का श्राप ही यजन करें - यह वाक् ही को कहा जाता है । " अस्य तन्वा भव " इति । अनार्त्त जो हवि है - उसका जो शरीर है - उसके साथ प्राप अपने रूप . से संगत हो जाइए, अर्थात् पशु के शरीर में भी श्राप प्रविष्ट हो जाइए । इस पशु की प्राहुति से ही दिव्यात्मा बनेगा | श्राहुति में उच्चावचस्वरयुक्ता ऋत्विक् वाक् शामिल रहती है । यह ऋत्विक वाक् असल में वही वाक् है । वाक् से मन प्रारण वाक् - तीनों मिले रहते हैं, तो ' यह वाक् - पशु में संगत हो जाए'-इसका तात्पय्यं यही है कि- पशु के मन - प्राण वाक् श्रौर इस यजमान के मन - प्रारण वाक् एक हो जाएँ । पशु की आहुति से उत्पन्न होने वाली दिव्यात्मा के मन - प्राण वाक् के साथ यजमानात्मा के मन - प्राण-वाक् की कड़ी जुड़ जाए, जिससे यजमान शरीर छोड़ते ही सीधा स्वर्ग में चला जाए । इसी श्रभिप्राय से कहते हैं--" वाचमेवैतदाह - अनार्तस्यास्य हविषस्तन्वा सम्भव " - इति । बीच - बीच में अनार्तस्य कहा जाता है । इसका तात्पर्य यही है कि यदि पशु की तबीयत पर दुःख होगा तो यज्ञ सुफल नहीं होगा । अतएव साथ ही वाक् से अनार्त्तस्य कहते हुए परोक्षरूपेण यह भी प्रार्थना की जाती है कि पशु श्रनात रहे इसे कष्ट न हो । ' हे रेवति वाक्! आप यजमान और पशु में मिल कर यजमान के यज्ञ को सुसम्पन्न करो ' सारे मन्त्र का यही तात्पर्य है ॥ १३ ॥

जिस स्थान पर शामिल लोग इस पशु का श्रालम्भन करते हैं, उस स्थान पर पहले अध्वर्यु तृण बिछा देता है । वेदि से उत्तर भाग में शामित्रशाला होती है, वहीं पर इस पशु का संज्ञपन होता है । उस स्थान पर प्रालम्भन से पहले घास बिछा देना चाहिए । पशु को मारते समय जो खुन का अथवा मांस का टुकड़ा गिर पड़ता है, वह जमीन पर न गिर कर इसी पर प्रतिष्ठित हो जाता है । मारते समय जो खून वगैर: उछलता है, वह जमीन पर न गिर जाए इसलिए जितनी दूर तक उसके उछल कर जाने का अंदेशा हो उतनी दूर तक तृरण बिछा देना चाहिए, परन्तु वह तृरण कुशा का ही होना चाहिए । चाहे जैसे घास का प्रस्तरण नहीं हो सकता, अपितु बहि का ही प्रास्तरण करना चाहिए । बहि - अग्नि सोम से बना हुआ है । बहि में श्राग और सोम - दो ही वस्तु हैं । दोनों की समष्टि का नाम ही यज्ञ है । इस पर जो हवि पड़ेगा, वह बहि पर ही प्रतिष्ठित रहेगा । यदि बहि न बिछाई जाएगी तो हवि उछल कर जमीन पर गिर जाएगा एवं गिरते ही यज्ञ से बाहर निकल जाएगा बस यह हवि यज्ञ से बाहर निकल जाएगा । बस, यह हवि यज्ञ से बाहर न निकल जाय, इसलिए बहि का मास्तरण करना चाहिए । भिप्राय से कहते हैं-" जिस स्थान पर इस पशु को मारते हैं - मारने से पहले उस स्थान पर श्रध्वर्यु -" वर्षो वर्षोयसि यज्ञे यज्ञपति धा: " । ( वा ० सं ० ६।११ ) [ ३६६ ]

पृष्ठ 383

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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण यह मन्त्र बोलता हुआ तृण बिछा देता है-श्रीब्राह्मण " हे तृण । वर्ष: ( वर्षीयः - प्रवृद्ध त्वं ) - वर्षीयसि यज्ञे ( प्रवृद्धे यज्ञे ) यज्ञपति ( यजमानं ) धा: - धारय - स्थापय " । हे वृद्ध तृण! प्रवृद्ध इस यज्ञ में श्राप यज्ञपति यजमान को प्रतिष्ठित कीजिए । ' यजमान का यज्ञ पूरा हो जाए ' - यही तात्पर्य है । ' इस पशु के लिए बहि का ही आस्तरण होना चाहिए । हवि यज्ञ से बाहर न निकल जाए-अतएव हि का प्रस्तरण करते हैं । " इस यज्ञ में विशस्यमान पशु का जो हिस्सा उछट कर गिर जाता है, वह इस बहि पर प्रतिष्ठित हो जाता है | बहि पर प्रतिष्ठित हो जाने से वह यातयाम नहीं होता है । यह यज्ञ पर प्रतिष्ठित रहे-अतएव आस्तरण किया जाता है । " " तद्यत्रैनं विशसन्ति - तत् ( तत्र ) पुरस्तात् तृरणमुपास्यति वर्षो वर्षीयसि यज्ञे यज्ञपति धाः ( इतिमन्त्रेण ) । बहिरेवास्मै ( पशवे ) एतत् स्तृणाति । श्रस्कन्नं ( प्रच्युतं ) हविरसत् - इति । तद्यदेवास्यात्र विशस्यमानस्य किञ्चित् स्कन्दति-तदेतस्मिन् प्रतितिष्ठति - तथा नामुया भवति " ॥१४ ॥

इस प्रकार कुशास्तरण कर - अध्वर्यु - प्रतिप्रस्थाता एवं यजमान उस शामित्रशाला से - जहाँ पर कि पशु का श्रालम्भन होगा- वापस उसी ग्राहवनीय पर लौट आते हैं एवं श्राहवनीय के पास उत्तरावेदि पर बैठ जाते हैं । संज्ञप्यमान पशु के अध्यक्ष हम न बनें - इसको अपनी आंखों से मरता न देखें - इसी खयाल से ये वापस लौट आते हैं । कारण इसका यही है कि यदि शामित्रशाला में ये खड़े रहें एवं इनकी आँखो के सामने पशु मारा जाएगा तो इनके मन में ग्लानि हो जाएगी । बस, जहाँ ग्लानि हुई कि यज्ञ भ्रष्ट हुआ । इनके अन्तरात्मा में ग्लानि होना, यज्ञ में ग्लानि होना है । अतः इन्हें वहाँ पर कभी खड़े नहीं रहना चाहिए, अपितु उत्तरावेदि पर आ कर बैठ जाना चाहिए-" अथ पुनरेत्य - श्राहवनीयमभ्यावृत्य - प्रासते नेदस्य संज्ञप्यमानस्याध्यक्षाः . ( दर्शकाः ) असाम " - इति - ( अभिप्रायेणेति शेषः ) । उस पशु को - शृङ्गसाधन से कभी नहीं मारना चाहिए - अर्थात् - दोनों सींग पकड़ कर उस पर असि का प्रहार नहीं करना चाहिए । ऐसा करना मानुषभाव है । मनुष्य लोग जब अपने खाने के लिए श्रज को मारते हैं तो वे उसके दोनों सींग पकड़ लेते हैं । परन्तु यहाँ तो दैवकर्म्म है । दैवकर्म में मनुष्य -कम्मं का प्रवेश नहीं करना चाहिए-[ ३६७ ]

पृष्ठ 384

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण आब्राह्मण " तस्य न कूटेन प्रघ्नन्ति - ( शृङ्गं गृहीत्वा पशु न हन्यात् ) - मानुषं हि तत् - कर्म्म ” । पीछे से दोनों कान पकड़ कर भी इसका आलम्भन नहीं करना चाहिए । कान पकड़ कर वध कर्णछिद्र विकसित हो करने से यह पशु पितृदैवत्य हो जाएगा । क्यों कि जब कानों को खींचा जाएगा तो पूर्व के ब्राह्मणों जाएँगे । छिद्र में पितृ प्राण सत्ता रहती है । खड़े हुए - यह सब पितृदैवत्य है - जैसा कि करना है । अतः-में बतला दिया गया है । ऐसी अवस्था में कान पकड़ कर ग्रालम्भन करना पितृकर्म ऐसा भी नहीं करना चाहिए-" नो एव पश्चात्कर्ण - ( कर्णस्य पश्चाद् भागमग्रभागं वा गृहीत्वाऽपि न हन्यात् ) । पितृदेवत्यं हि तत् " । भींच तो फिर किस तरह मारना चाहिए? इसका उत्तर देते हैं- उस पशु का दोनों हाथों से मुँह कि वह कर ही उसका आलम्भन करते हैं । दोनों हाथों से पशु के मुख को पकड़ लिया जाता है जिससे चाहिए । एक बोल न सके और फिर श्रालम्भन करते हैं । यदि ऐसा नहीं कर सकते तो वेष्ट्य करना होती रस्सी की मोहरी ( जाली ) बना कर पशु के मुँह पर बाँध देते हैं । वह मोहरी ठीक मुँह के नाप की है । उसके लगा देने से भी पशु नहीं बोल सकता— " अपिगृह्य वैव मुखं तमयन्ति ( म्लानं कुर्वन्ति ) " वेष्कं वा कुर्वन्ति । इसी अभिप्राय से कात्यायन कहते हैं-" वेष्को गलावेष्टकः । गलं वा वेष्ट्य तमयन्ति - संज्ञपयन्ति, इति । मारयन्ति " । इस पशु के मस्तक को तो पूर्व की तरफ करना चाहिए एवं पैर उत्तर की तरफ करने चाहिए से खींच एवं जिस तरह से उसका श्वास रुक जाए इस तरह मजबूती से मुख को हाथ से अथवा वेष्टय का कर उसका आलम्भन करना चाहिए । तमयन्ति ' तम आकाङ्क्षायाम् ' धातु से बना हुआ है । जव पशु मुख भींच लिया जाता है तो उसका श्वास रुक जाता है । उस समय यह निरुद्ध प्राण होता हुआ ' श्वास ' लेने की इच्छा करता है । चूँकि श्वास लेने की इच्छा करते हुए पशु को मारा जाता है अतएव तमयन्ति कहा है । जिस प्रकार लोक में - ' अब मारो - श्रब इसकी हिंसा करो ' कहा जाता है, वैसे मानुषवधवत् क्रूर ! अब शब्द उस समय नहीं बोलने चाहिए, अपितु, ' संज्ञपय ' अन्वगन् ' यह बोलना चाहिए । हे शमिता झुक गया आप इसका संज्ञपन कीजिए । यह पशु देवताग्रों में चला गया है । आज यह देवताओं की यह ओर ऋत्विक जो 4 है, अतः इसका संज्ञपन कीजिए । इस प्रकार परोक्षभाव से बोलना - दैवकर्म हो जाता है । हैं--कि " अन्वगन् " कहता है - वास्तव में इस समय इस के प्राण - देवताओं की ओर ही अनुगत हो जाते [ ३६८ ]

पृष्ठ 385

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण श्रीब्राह्मण " तन्नाह जहि मारय - इति । मानुषं हि तत् । संज्ञपयान्वगन् इति -( इत्येवाह ) । तद्धि देवत्रा । स यदाह अन्वगन्निति । एतहि ह्येष देवाननुगच्छति । तस्मादाह - श्रन्वगन्निति " ॥ १५ ॥

जिस स्थान पर - जिस समय उस पशु को मारते हैं, उसके ठीक पहले श्राहवनीय के समीप बैठा हुआ ' अध्वर्यु ' ' स्वाहा देवेभ्यः ' कहता हुआ अग्नि में घृत की आहुति डालता है । जिस समय शामित्र-शाला में खड़ा हुआ ऋत्विक्- ' संज्ञपय - प्रन्वगन् " यह बोलेगा, उसी समय संज्ञपन से पहले " स्वाहा देवेभ्यः " १ यह बोलता हुप्रा अग्नि में आहुति देगा । एवं जब आलम्भन हो जाता है, तो वह ' संज्ञप्तः पशुः ' यह बोलता है । जिस समय वह - संज्ञप्तः पशुः - यह बोलता है, उसी समय अध्वर्यु ' देवेभ्यः स्वाहा ' " यह बोलता हुआ दूसरी ग्राहुति देता है । कितने ही देवता तो ऐसे होते हैं, जिनके लिए पहले स्वाहा बोला जाता है - कितने ही ऐसे होते हैं, जिनके लिए बाद में स्वाहा बोला जाता है । ऐसे दोनों मन्त्रों से इन दोनों देवताओं को तृप्त कर दिया जाता है । स्वर्ग जाते हुए पशु के इधर - उधर दोनों ओर देवता का सम्बन्ध कर दिया जाता है । इस आहुति से दोनों देवता प्रसन्न हो कर इस पशु को स्वर्ग में ले जाते हैं । ये प्राहुतियाँ - पशु - सम्बन्धी होने से पशव्य कहलाती हैं - एवं पशु के दोनों श्रोर होती हैं. अतएव इन्हें ' परिपशव्य ' - कहा जाता है । इन दोनों आहुतियों में कामचार है । चाहे तो कर सकता है एवं नहीं चाहे तो नहीं भी कर सकता है -" तद्यत्रेनं निविध्यन्ति तत्पुरा सञ्ज्ञपनात् जुहोति - स्वाहा देवेभ्यः इति । अथ यदा प्राह - संज्ञप्तः पशुरिति - श्रथ जुहोति - देवेभ्यः स्वाहेति । पुरस्तात् स्वाहाकृतयो वाऽन्ये देवाः । उपरिष्टात् स्वाहाकृतयोऽन्ये । तानेवैतत् प्रीणाति ।

त एनमुभये देवाः प्रीताः स्वर्गं लोकमभिवहन्ति । ते वाऽएते परिपशव्येऽइत्याहुती ।

स यदि कामयेत जुहुयात् एते । यद्यु कामयेत - श्रपि नाद्रियेत " ॥ १६ ॥

॥ इति श्रीब्राह्मणं समाप्तम् ॥

॥ इति श्रष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥

१. वा ० सं ० ६।११ । २. वा ० सं ० ६।११ | [ ३६६ ]

पृष्ठ 386

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येत्यु यज्ञ न्भव नमर पथ्य विष्ट जीवं प्रा ताना तदेन चक्षुस् निरुत प्रारण तिष्ठा

पृष्ठ 387

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अष्टमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' पशुवपा - ब्राह्मणम् ' [ मूल ] यदा प्राह संज्ञप्तः पशुरिति । अथाध्वर्युराह नेष्टः पत्नीमुदान-येत्युदानयति नेष्टा पत्नीं पान्नेजनं बिभ्रतीम् ॥१ ॥

तां वाचयति । नमस्तऽप्रातानेति यज्ञो वाडनातानो यज्ञं हि तन्वते तेन यज्ञ प्रतानो जघनार्थो वाइएष यज्ञस्य यत्पत्नी तामेतत्प्राचीं यज्ञं प्रसादयिष्य-भवति तस्माऽएवैतद्यज्ञाय निह्नुते तथो हैनामेष यज्ञो न हिनस्ति तस्मादाह नमस्तानेति ॥२ ॥

नव प्रेहीति । सपत्नेन प्रेहोत्येवैतदाह घृतस्य कुल्या उपऋतस्य पथ्या अन्विति साधूपेत्येवैतदाह देवीरापः शुद्धा वोढ्वं सुपरिविष्टा देवेषु सुपरि-विष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्मेत्यप एवैतत्पावयति || ३ || अथ पशोः प्राणानद्भिः पत्न्युपस्पृशति । तद्यदद्भिः प्राणानुपस्पृशति । जीवं वै देवानां हविरमृतममृतानामथैतत्पशुं घ्नन्ति यत्संज्ञपयन्ति यद्विशासत्यापो वै प्राणास्तदस्मिन्नेतान्प्रारणान्दधाति तथैतज्जीवमेव देवानां हविर्भवत्यमृतममृ-तानाम् || ४ || यत्पत्न्युपस्पृशति । योषा वै पत्नी योषायै वाइमाः प्रजाः प्रजायन्ते तदेनमेतस्यै योषायै प्रजनयति तस्मात्पत्त्युपस्पृशति ॥५ ॥

सोपस्पृशति । वाचं ते शुन्धामीति मुखं प्राणं ते शुन्धामीति नासिके चक्षुस्ते शुन्धामीत्यक्ष्यौ श्रोत्रं ते शुन्धामीति करण नाभि ते शुन्धामीति योऽयम-निरुक्तः प्राणो मेढ़ ते शुन्धामीति वा पायुं ते शुन्धामीति योऽयं पश्चात्प्राणस्त-प्राणान्दधाति तत्समीरयत्यथ संहृत्य पदचरित्रांस्ते शुन्धामीति पद्भिर्वै प्रति-तिष्ठति प्रतिष्ठित्याएव तदेनं प्रतिष्ठापयति || ६ || [ ३७१ ]

पृष्ठ 388

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मण अथ या श्रापः परिशिष्यन्ते । श्रर्धा वा यावत्यो वा ताभिरेनं यजमानश्व शीर्षतोऽग्रेऽनुषिञ्चतस्तत्प्रारणांश्चैवास्मिस्तत्तौ धत्तस्तच्चैनमतः समीरयतः || ७ || तद्यत्क्रूरीकुर्वन्ति । यदास्थापयन्ति शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयत-स्तदद्भिः संधत्तः ॥ ८ ॥

तावनुषिञ्चतः । मनस्तत्प्राप्यायतां वाक्तप्राप्यायतां प्राणस्तप्राप्या-यतां चक्षुस्तप्राप्यायतां श्रोत्रं तत्प्राप्यायतामिति तत्प्राणान्धत्तस्तत्समीरयतो यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्तप्राप्यायतां निष्टचायतामिति ॥९ ॥

तद्यत्क्रूरीकुर्वन्ति । यदास्थापयन्ति शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयत-स्तदद्भिः संधत्तस्तत्ते शुध्यत्विति तन्मेध्यं कुरुतः शमहोभ्य इति जघनेन पशुं निनयतः ॥ १० ॥

तद्यत्क्रूरीकुर्वन्ति । यदास्थापयन्ति नेदेतदन्वशान्तान्यहोरात्राण्यसन्निति तस्माच्छमहोभ्य इति जघनेन पशुं निनयतः ॥ ११ ॥

प्रयोत्तानं पशुं पर्यस्यन्ति । स तृरणमन्तर्द्दधात्योषधे त्रायस्वेति वज्रो arsafe स्तथ हैनमेष वज्ञोऽसिर्न हिनस्त्यथासिनाभिनिदधाति स्वधिते मैनं हिंसी-रिति वज्रो वासिस्तथो हैनमेष वनोऽसि हिनस्ति || १२ || सा या प्रज्ञाताभिः । तयाभिनिदधाति सा हि यजुष्कृता मेध्या तद्यदग्रं तृपस्य तत्सव्ये पारणौ कुरुतेऽथ यद्बुध्नं तद्दक्षिणेनादत्ते ॥ १३ ॥

स यत्राच्छ्यति । यत एतल्लोहितमुत्पतति तदुभयतोऽनक्ति रक्षसां भागो-ऽसीति रक्षसां ह्येष भागो यदसृक् || १४ || तदुपास्याभितिष्ठति । इदमहं रक्षोऽभितिष्ठामीदमहं रक्षोऽवबाधइदमहं रक्षो s धमन्तमो नयामीति तद्यज्ञेनैवैतन्नाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते तद्यदमूलमुभयतः परिच्छिन्नं भवत्यमूलं वाऽइदमुभयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति यथायं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति तस्मादमूलमुभयतः परिच्छिन्नं भवति ॥१५ ॥

[ ३७२ ]

पृष्ठ 389

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्म r वपामुत्विदन्ति । तया वपाश्रपण्यौ प्रोणौति घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथामिति तदिमे द्यावापृथिवोऽऊर्जा रसेन भाजयत्यनयोरूर्जं रसं दधाति ते रसवत्या उपजीवनीयेऽइमाः प्रजा उपजीवन्ति ॥ १६ ॥

aritra auto पण्यौ भवतः । यत्र वै देवा अग्रे पशुमालेभिरे तदु-दीचः कृष्यमाणस्यावाङ्मेधः पपात स एष वनस्पतिरजायत तद्यत्कृष्यमाणस्या-वाङ्पतत्तस्मात्काय्र्यस्तेनैवैनमेतन्मेधेन समर्धयति कृत्स्नं करोति तस्मात्का-मय्यौ वपाश्रपथ्यौ भवतः ॥ १७ ॥

तां परिवासयति । तां पशुश्रपणे प्रतपति तथो हास्यात्रापि शृता भवति पुनरुल्मुकमग्नीदादत्ते ते जघनेन चात्वालं यन्ति तप्रायन्त्यागच्छन्त्याहवनीयं स एतत्तृरणमध्वर्यु राहवनीये प्रास्यति वायो वेः स्तोकानामिति स्तोकानां हैषा समित् ॥ १८ ॥

अथोत्तरतस्तिष्ठन्वपां प्रतपति । प्रत्येष्यन्वाऽएषोऽग्नि भवति दक्षिणतः परीत्य श्रपयिष्यंस्तस्मा एवैतन्निनुते तथो हैनमेषोऽतियन्तमग्निर्न हिनस्ति तस्मादुत्तरतस्तिष्ठत्वां प्रतति ॥१ ९ ॥ तामन्तरेण यूपं चाग्नि च हरन्ति । तद्यत्समया न हरन्ति येनान्यानि हवींषि हरन्ति नेदभृतया समया यज्ञं प्रसजामेति यदु बाह्येन न हरन्त्यग्रेण यूपं बहिर्धा ह यज्ञात्कुर्युस्तस्मादन्तरेण यूपं चाग्नि च हरन्ति दक्षिणतः परीत्य प्रति-प्रस्थाता श्रपयति ॥२० ॥

अथ स्रुवेोपहत्याज्यम् । प्रध्वर्युर्वपामभिजुहोत्यग्निराज्यस्य वेतु स्वाहेति तथा हास्यैते स्तोकाः शृताः स्वाहाकृता आहुतयो भूत्वाग्नि प्राप्नुवन्ति ॥२१ ॥

थाह स्तोभ्योऽनुब्रूहीति । स श्राग्नेयी स्तोकेभ्योऽन्वाह तद्यदाग्नेयी स्तकेभ्योऽन्वातः प्रदाना वै वृष्टिरितो ह्यग्निर्वृष्टि वनुते स एतैः स्तोकंरेता-तोकान्ते तते स्तोका वर्षन्ति तस्मादाग्नेयी स्तोकेभ्योऽन्वाह यदा ता भवति || २२ || | ३७३ ]

पृष्ठ 390

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण अथाह प्रतिप्रस्थाता शृता प्रचरेति । स्रुचावादायाध्वर्युरतिक्रम्याश्रा-व्याह स्वाहाकृतिभ्यः प्रेष्येति वषट्कृते जुहोति ॥२३ ॥

हुत्वा वपामेवाग्रेऽभिघारयति । अथ पृषदाज्यं तदु ह चरकाध्वर्यवः पृष-दाज्यमेवाग्रेऽभिघारयन्ति प्राणः पृषदाज्यमिति वदन्तस्तदु ह याज्ञवल्क्यं चरका-ध्वर्युरनुव्याजहारैवं कुर्वन्तं प्राणं वाऽप्रयमन्तरगादध्वर्युः प्रारण एनं हास्यतीति ॥।२४ ॥ स ह स्म बाहूऽन्ववेक्ष्याह । इमौ पलितौ बाहू क्व स्विद्ब्राह्मणस्य वचो बभूवेति न तदाद्रियेतोत्तमो वा एष प्रयाजो भवतीदं वै हविर्यज्ञ उत्तम प्रयाजे ध्रुवमेवाग्रेऽभिघारयति तस्यै हि प्रथमावाज्यभागौ होष्यन्भवति वपां वाऽग्रत्र प्रथमां होष्यन्भवति तस्माद्वपामेवाग्रेऽभिघारयेदथ पृषदाज्यमथ यत्पशुं नाभिघा-रति नेदमभिघारयाणीत्येतदेवास्य सर्वः पशुरभिघारितो भवति यद्वपाम-भिघारयति तस्माद्वपामेवाग्रेऽभिघारयेदथ पृषदाज्यम् || २५ || श्रथाज्यमुपस्तृणीते । अथ हिरण्यशकलमवदधात्यथ वपामवद्यन्नाहाग्नी-षोमाभ्यां छागस्य वपायें मेदसोऽनुब्रूहीत्यथ हिरण्यशकलमवदधात्यथोपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिघारयति ॥ २६ ॥

तद्यद्धिरण्यशकलावभितो भवतः । घ्नन्ति वाडएतत्पशुं यदग्नौ जुह्वत्य-मृतमायुहिरण्यं तदमृत आयुषि प्रतितिष्ठति तथात उदेति तथा सञ्जीवति तस्माद्धिरण्यशकलावभितो भवत श्राश्राव्याहाग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपां मेदः प्रेष्येति न प्रस्थितमित्याह प्रसुते प्रस्थितमिति वषट्कृते जुहोति ॥ २७ ॥

gar ai समीच्यौ । वपाश्रपण्यौ कृत्वानुप्रास्यति स्वाहाकृतेऽऊर्ध्वन-भसम्मारुतं गच्छतमिति नेदिमेऽप्रमुया सतो याभ्यां वपामशिश्रपामेति ॥ २८ ॥

तद्यद्वपया चरन्ति । यस्यै वै देवतायै पशुमालभन्ते तामेवैतद्देवतामेतेन - मेधेन प्रीणाति सैषा देवतैतेन मेधेन प्रीता शान्तोत्तराणि हवींषि श्रप्यमाणान्यु-परमति तस्माद्वपया चरन्ति || २६ || [ ३७४ ]