Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 391–400
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पेशवा ब्राह्मणं अथ चात्वाले मार्जयन्ते । क्रूरी वाऽएतत्कुर्वन्ति यत्संज्ञपयन्ति यद्विशासति. शान्तिरापस्तदद्भिः शान्त्या शमयन्ते तदद्भिः सन्दधते तस्माच्चात्वाले मार्जयन्ते || ३० || [ अनुवाद ] पशु का आलम्भन ( संज्ञपन ) करने के बाद जब शमिता शामित्रशाला से ' संज्ञप्तः पशुः ' अर्थात् पशु को मार दिया गया है- यह कहता है तब अध्वर्यु नेष्टा नामक ऋत्विक् को आज्ञा देता है कि नेष्टा यजमान - पत्नी को इस स्थान पर ले आए । हविर्वेदि के गार्हपत्य के पश्चिमश्रोणि में पत्नीशाला होती है । वहीं पत्नी बैठती है । नेष्टा वहाँ से पत्नी को उत्तरावेदि में लाता है । पत्नी पैर धोने के लिए साथ आए और जल भी साथ में लाए ॥१ ॥
पत्नी के उत्तरावेदि के पास आ जाने पर अध्वर्यु उससे निम्नलिखित मन्त्र बुलवाता है: - ' नमस्ते आतान अनर्वा प्रेहि ' इति । हे श्रातान ( वितानयज्ञ )! आपको नमस्कार है । आप सपत्न होते हुए आगे पूर्व की ओर जाएँ । तानयज्ञ या वितानयज्ञ पृथिवीपिण्ड से २१. वें अहर्गण पर विद्यमान सूर्य तक वितत रहता है । तनन या प्रथन के कारण इसे आतान या वितान यज्ञ कहा जाता है । वैधयज्ञ प्रकृतियज्ञ की प्रतिकृति पर किया जाता है । प्रकृति में पृथिवीपिण्ड से २१ वें अहर्गण पर विद्यमान सूर्य तक अमृताग्नि का समन्तात् तनन ( फैलाव ) रहता है । अतएव इसे आतान व वितान यज्ञ कहते हैं । इसका पूर्वभाग ग्राहवनीय तथा पश्चिम भाग गार्हपत्य है । गार्हपत्य इस यज्ञपुरुष के पाद हैं तथा ग्राहवनीय मुख है । सूर्यरूप यूपशिखा है । प्रकृतियज्ञ की प्रतिकृति पर होने वाले इस वैधयज्ञ में गार्हपत्य पृथिवी तथा श्राहवनीय मुख है तथा काष्ठयूप शिखा है । तात्पर्य यह है कि गार्हपत्य इस यज्ञ का पश्चि-मार्ध भाग है । गार्हपत्य के पास ही पत्नीशाला होती है । अतः पत्नी को इस यज्ञ का पश्चि-कहा जाता है । पृथिवीमण्डल के दृश्य ( सूर्य - सम्मुख ) भाग से पुरुष का आत्मा तथा पृथिवीमण्डल के अदृश्य ( सूर्य - विमुख ) भाग से स्त्री का आत्मा बनता है । अर्ध- अर्धभाग से निर्माण होने के कारण पुरुष व स्त्री दोनों के मिलने पर ही पूर्णेन्द्र की निष्पत्ति होती है । अतः यज्ञ, बिना पत्नी के नहीं हो सकता । पत्नी के बिना यज्ञ अधूरा रहता है । यज्ञ आहव नीय में होता है । अतः नेष्टा पत्नीशाला से पत्नी को यज्ञ के पश्चिमार्ध भाग के आहवनीय में लाता है और यज्ञ के पूर्वार्ध को प्रसन्न करता है । यज्ञ पश्चिम से सूर्य की ओर अर्थात् पूर्वभाग की ओर जाया करता है । अतः पत्नी को पश्चिम से पूर्व की ओर ले जाना, यज्ञ को ही पश्चिम से पूर्व की ओर ले जाना है । यज्ञ सूर्य की वस्तु है अतः सूर्य की ओर जाने से यज्ञ: प्रसन्न होता है । मनुष्य के अनृतसंहित होने से उससे यज्ञकर्म में दोष होना स्वाभाविक है । ज्ञातदोष का तत्काल प्रायश्चित कर लिया जाए, किन्तु अज्ञात दोष का प्रायश्चित संभव नहीं । अतः पश्वालम्भन कर्म में कोई खोट हो जाय तो उससे यज्ञ म्लान हो जाता है । यही यज्ञ की अप्रसन्नता है । इसे दूर करने के लिए यज्ञ के पश्चिमार्ध से पत्नी को पूर्व की ओर ले जाया [ ३७५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) To शतपथ ब्राह्मण जाता है । इससे उसकी म्लानता नष्ट हो जाती है । प्रसन्न यज्ञ उस पर कोई प्राघात नहीं पहुँचाता । अपि च पत्नी यज्ञ ( पुरुष यजमान ) का पश्चिमार्ध भाग है । ऐसी स्थिति में केवल यजमान यज्ञकर्म में सम्मिलित रहेगा तो पत्नी को इससे आघात पहुँचेगा । अतः पत्नी को भी यज्ञ में सम्मिलित करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहा है- ' तस्मा वा एतद् यज्ञाय
निह्नुते तथो हैनामेष यज्ञो न हिनस्ति । तस्मादाह नमस्त आतानेति ॥ २ ॥
पूर्वमन्त्रोक्त ' अनर्वाह ' की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - प्राप शत्रु-रहित हो कर स्वर्ग की ओर जाइए । आगे जिस पर घृत बह रहा है ऐसी जो ऋत की पगडण्डी है उसकी ओर आप सीधे सुपरिचित मार्ग से जाइए । इसके अनन्तर - ' देवीरापः शुद्धा वोढुं ' इस मन्त्र से पत्नी द्वारा लाए हुए पानी को पवित्र करते हैं तथा मन्त्र से विशुद्ध किए हुए जौ आप ( देवीरापः ) हैं वे इस पशु को ले जाएँ ॥ ३ ॥
इसके बाद पत्नी पशु के आँख, कान, नासा आदि इन्द्रियों को पानी से धो देती है । प्रत्येक वस्तु में भूत व प्रारण ये दो भाग होते हैं । प्रारण अमृत है तथा भूतभाग मर्त्य है । देवता प्रारूप हैं । वे अमृत होने से प्रारणरूप अमृत - भाग को ही ग्रहण करते हैं न कि मर्त्य -भूत भाग को । पशु को मार कर उस की वसा आदि की आहुति देवतानों को दी जाती है, किन्तु संज्ञपन व विशासन के बाद पशु में प्रारणभाग नहीं रहता । अतः उस निर्जीव भूतभाग की आहुति देवताओं को कैसे दी जा सकती है, क्यों कि पशु का भूतभाग विजातीय है । प्राकृतिक प्रारणदेवता अग्नि, वायु आदि ही हमारे शरीर में आ कर वागादि इन्द्रियाँ बनी हैं जैसा कि ' अग्निवा भूत्वा मुखं प्राविशत्, प्रारणो वायुभूत्वा नासिके प्राविशत् ' इत्यादि ऐत-रेयोपनिषद् श्रुति बतला रही है । इन्हीं प्राध्यात्मिक प्राणों की आहुति सजातीय होने से आधिदैविक देवताओं में पहुँचती है किन्तु पशु के पूर्णरूप से मर जाने पर इन प्रारणों में सजी-वता नहीं रही है । जल - स्पर्श से इन में सजीवता आ जाती है । क्यों कि अप् तत्त्व पारमेष्ठ्य है । परमेष्ठी का रस ही अमृत है । इसीलिए ' आपोमयः प्राणः ' यह श्रुति जल से प्राण की उत्पत्ति बतला रही है । अतः पशु के प्रारण, चक्षु आदि से प्रारण का स्पर्श करती हुई पत्नी उस मृत पशु के प्राणों में प्राणवत्ता, अमृतवत्ता, सजीवता का प्राधान करती है और सजीव होने से वह देवताओं का भोग्य बन जाता है । वह अमृत रस के आधान से अमृत बन कर अमृतमय आधिदैविक देवताओं का अन्न बन जाता है ॥ ४ ॥
पत्नी ही पशु के प्राणों का जल से स्पर्श क्यों करती है, इस का कारण यह है कि पत्नी योषा प्रारण है । योषा से ही प्रजा उत्पन्न होती है । पत्नी ही प्रजा को उत्पन्न करती है । अतः पत्नी पशु के प्राणों के साथ जल - स्पर्श कर उस जीवित पशु को उत्पन्न करती है जो जीवनशक्ति से युक्त हो कर देवताओं का अन्न ( हवि ) बन जाए ॥ ५ । । ' वाचं ते शुन्धामि ' - हे पशो! मैं तुम्हारी वाक् को जलस्पर्श से विशुद्ध करती हूँ । यह कहती हुई पत्नी मुख का, तथा ' प्राणं ते शुन्धामि ' यह मन्त्र बोल कर नासिका छिद्रों का जल [ ३७६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण से स्पर्श करती है । ' चक्षुस्ते शुन्धामि ' मन्त्र से नेत्रों का, ' श्रोत्रं ते शुन्धामि ' से कर्ण - छिद्रों का, ' नाभि ते शुन्धामि ' मन्त्र से नाभि में रहने वाले प्रशनायाशक्तिमान् विष्णु - प्राण को प्रतिष्ठित करती है । नासिका, कर्ण, नेत्र, मुख आदि प्रारणों का कार्य तो प्रत्यक्ष है किन्तु नाभिप्राण का कार्य प्रत्यक्ष नहीं है, प्रच्छन्न है, अत: इसे अनिरुक्त कहते हैं । ' मेढ्रं ते शुन्धामि ' यह कह कर मेढ्र का जल से स्पर्श करती है । ' वायुं ते शुन्धामि ' कह कर नीचे का जो प्रपान प्राण है उसे जल - स्पर्श कर पवित्र करती है । इस प्रकार पशु में सब प्रारणों का आधान कर, पश्चात् पशु के पैरों को इकट्ठा कर, ' चरित्रांस्ते शुन्धामि ' कह कर पशु के विचरणशील पैरों को पवित्र कर उन में प्रतिष्ठाबल का आधान करती है । प्रतिष्ठा बल का प्राधान करने के लिए पैरों से जल- स्पर्श किया जाता है ॥ ६ ॥
इसके बाद पात्र में बचे जल से यजमान और यजमानपत्नी दोनों पशु के मस्तक के अग्रभाग से प्रारम्भ कर पृष्ठ तक उस पशु को सींच देते हैं । पशु यज्ञ - स्वरूप है । यज्ञ पूर्णेन्द्र है । पुरुष अर्धेन्द्र है | उसकी पूर्ति पत्नी के द्वारा होती है । अतः यजमान व यजमानपत्नी दोनों मिलकर पशु का जल से सेचन करते हैं तो पूर्णेन्द्र के द्वारा पूर्णेन्द्र में प्राणाधान हो जाता है । और यजमान एवं उसकी पत्नी दोनों पशु में प्रारणाधान कर इसे पृथिवीलोक से स्वर्ग की ओर भेजते हैं ॥ ७ ॥
पशुवध के क्रूर कर्म से पशु के च्छिन्न अंगों से निकली क्रूर विद्यत् की शान्ति के लिए
पशु पर पानी डालते हैं । इससे पशु के विच्छिन्न अंग संहित हो जाते हैं ॥ ८ ॥
वे यजमान तथा यजमानपत्नी दोनों ' मनस्तप्राप्यायताम् ' मन्त्र का उच्चारण करते हुए मस्तक की ओर से उस पशु का पानी से सेचन करते हुए इसमें प्राणों का प्रधान करते हैं तथा स्वर्ग में भेजते हैं । तदनन्तर ' यत्ते क्रूरं यदास्थितं ' अर्थात् तुम्हारा जो क्रूर भाग है वह इस प्रपोमय प्रारण से पुनः संहत हो जाए ऐसा कहता है ॥६ ॥
इसके बाद ' तत्ते शुध्यतु ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करते हुए पशु के निष्ठित ( पवित्र ) भाग को मेध्य ( पवित्र ) बनाते हैं । तत्पश्चात् ' शमहोभ्यः ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करते हुए पशु के पश्चिमार्ध भाग का सेचन करते हैं । जैसा कि सूत्रकार ने कहा है - ' महोभ्य इति पश्चात् पशोर्निषिञ्चतः ' ( का ० श्रौ ० सू ० १२७ ) इति ॥ १० ॥
ऋत्विक् पशु का आलम्भन कर तथा. उसका चर्म उखाड़ कर जो क्रूर कर्म करते हैं उससे अहोरात्र अशान्त हो जाते हैं । उसको दूर करने के लिए ' शमहोभ्य: ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करते हुए पशु के जघनार्ध का जल से सेचन करते हैं ॥ ११ ॥
इसके बाद मृत पशु के चारों पैर ऊपर की ओर कर देते हैं । लिए प्रहार - स्थान और तलवार के बीच में एक तृण रख देता है उसका चर्म काटने के और ' ओषधे त्रायस्व ' [ ३७७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण इस मन्त्र का उच्चारण करता है - अर्थात् हे ओषधि! इस पशु की रक्षा करो । तृण को बीच में रख देने से वज्ररूप असि उस पशु की हिंसा नहीं करती है । जब असिप्रहार द्वारा उस का चर्मच्छेदन करते हैं तब पुनः प्रारणवियोग का भय है । अतः तृरण को बीच में रख कर यह भावना की जाती है कि तलवार तृरण को काट रही है न कि पशु को । तदनन्तर ' स्वधिते मैनं हिंसी: ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए पशु के नियत स्थान पर तलवार को रखता है । असि वज्ररूप है । ' स्वधिते मैनं हिंसी: ' इस मन्त्र के द्वारा उस तलवार में पशु के प्रति अहिंसा की भावना की जाती है ॥१२ ॥
' स्वधिते मैनं हिंसी: ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए असि से पशु के शरीर के जिस भाग पर चिह्न बनाया गया है वहीं सर्वप्रथम छुरे से काटना चाहिए, क्यों कि वह जगह यजु-ष्कृता अतएव पवित्र है । असि के प्रहार से उस तृण के दो खण्ड हो जाते हैं । उन खण्डों में सेतृण ' के अग्रभाग को अध्वर्यु वाम हाथ से उठा लेता है तथा तृण के मूल भाग को दक्षिण हाथ में उठा लेता है ॥ १३ ॥
वह अध्वर्यु तलवार का प्रहार कर चर्म का छेदन करता है तो उससे रुधिर निकल पड़ता है | अध्वर्यु दाहिने हाथ में रखे हुए तृणखण्ड के दोनों भागों को ' रक्षसां भागोऽसि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ रुधिर से सिक्त कर देता है । ' जब तक रुधिर शरीर में रहता है तब तक वैश्वानराग्नि की प्रबलता से उसमें आसुर भाव का प्रवेश नहीं होता, किन्तु शरीर अलग हो जाने पर प्रान्तरिक्ष्य नाष्ट्रा वायु का प्रवेश उसमें हो जाता है जो कि तमो-• मय है । उस तमोमय वायु के प्रवेश से वह आसुर बन जाता है । आसुर शुष्कवायु के प्रवेश से वह रुधिर आसुरभावापन्न है । अत: बाल व रोम अपवित्र कहलाते हैं । आसुरभाव के प्रवेश के कारण शरीर से बाहर निकले हुए रुधिर को राक्षसों का भाग बतलाया है ॥ १४ ॥
तृण के दोनों भागों को रुधिर से अक्त करने के बाद यजमान ' इदमहं रक्षोऽभिति-ष्ठामि ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ एवं इस तृण को लाँघता हुआ निदान द्वारा असुर का ही प्रतिक्रमण कर जाता है । पश्चात् ' इदमहं रक्षोऽवबाधे इदमहं रक्षोऽधर्म तमो-नयामि ' इस मन्त्रशेष का उच्चारण करता हुआ यज्ञविनाशक राक्षसों को यज्ञ में आने से रोक देता है । यह छिन्न तृणखण्ड मूलरहित ( पकड़रहित ) है तथा एक और पृथिवीलोक से व दूसरी ओर द्युलोक से परिच्छिन्न है । जिस प्रकार अमूल व उभयतः परिच्छिन्न पुरुष इधर-उधर विचरण किया करता है, उसी प्रकार अमूल व उभयतः परिच्छिन्न आसुर प्राण का यजमान उल्लंघन ( अतिक्रमण ) कर उसे यज्ञ में आने से रोकता है तथा उसके तमोमय लोक में भेज देता है ॥१५ ॥
तदनन्तर मन्त्रोच्चारणपूर्वक पशु के चर्म को उतार कर पशु की वपा को, जो कि पशु के हृदय का मेदो भाग ( चर्बी ) है, उसे निकालते हैं । पश्चात् ' घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथाम् ' [ ३७८ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) पशुवपा ब्राह्मणं अर्थात् हे द्यावापृथिवी! आप घृत ( वपापदार्थ ) से वपाश्रपणियों ( वपा को पकाने के लिए श्रीपर्ण वृक्ष की दो लकड़ियों ) को आच्छादित करें, ये दोनों वपा श्रपणियाँ द्यावापृथिवी-स्थानापन्न हैं तथा वपा साक्षात् घृतस्वरूप है । घृत प्रान्तरिक्ष्य रस है । यह ऊ रूप है, बलप्रद रस है । वपाश्रपणीरूप लकड़ियों को वपा से आच्छादित करता हुआ अध्वर्यु द्यावा-पृथिवी में ही ऊर्ग रस का आधान करता है । प्रकृति में जिस प्रकार बलप्रद घृतप्रद ऊर्क, रस अन्तरिक्ष में रहता है उसी प्रकार शरीर में भी घृतस्थानापन्न यह वपा हृदय नामक दहरा-काश में अर्थात् अन्तरिक्ष में ही रहती है । उर्क रस के प्रधान से द्यावापृथिवी ऊर्क, रस वाली बन जाती है । तात्पर्य यह है कि सांसारिक प्रजा का निर्माण द्यावापृथिवी के रस से होता है । किन्तु प्रजा - निर्माण करने से द्यावापृथिवी का ऊर्क रस समाप्त हो जाता है । उन में ऊर्क रस वैध उपायों से वपा आदि की आहुति से पहुँचा कर द्यावापृथिवी के खर्च हुए ऊर्क रस की पूर्ति करनी होती है ॥ १६ ॥
ये वपापरिणयाँ कार्यमयी होती हैं अर्थात् श्रीपर्णी वृक्ष की लकड़ियों से बनाई जाती हैं । क्योंकि यावन्मात्र वनस्पतियाँ प्रधानतया सूर्यरस से उत्पन्न होती हैं । बीज को जब भूमि में गाड़ते हैं और उसे पानी से सींचते हैं तो पार्थिव भाग जल में घुल - मिल जाता है । वह पार्थिव भाग ही मेध कहलाता है । मेध शब्द ' मेघृसङ्गमे ' धातु से बनता है । उसमें जल से सङ्गम करने की मिलने की योग्यता है । अतः उसे ' मेघ ' कहा जाता है । बीज को तोड़ने पर बीज के दोनों भागों के बीच पतली नलिका सी रहती है । यही उस बीज का मेरुदण्ड है । इसमें सूर्यरश्मियाँ प्रविष्ट हो कर जल को ऊपर खींचती है । इस प्रकार बार - बार पानी डालने से सूर्य रश्मियों द्वारा पानी के आकर्षण के साथ धीरे - धीरे पार्थिव मृद्भाग भी ऊपर चला जाता है तथा वृक्षरूप में परिणत हो जाता है । किन्तु मृद्भाग सजातीय पार्थिव आकर्षण के कारण अधिक दूर नहीं जा कर पृथिवी से बद्ध ही रह जाता है, और पानी ऊपर चला जाता है । सूर्य - रश्मियाँ ही देवता हैं । पार्थिव मृदुभाग पशु है, क्यों कि पशु प्रारण का नाम पूषा है । पृथिवी - प्रारण भी ' इयं वै पृथिवी पूषा ' इस श्रुति के अनुसार पूषा कहलाता है । सूर्य-रश्मिरूप देवता अन्नाद है । पशव्य पूषा प्राण अन्न है । पशु भी पूषा होने से देवताओं का भोग्य है । पृथिवी भी पूषा प्रारण होने से पशु है । पृथिवी के सभी पदार्थ पूषा होने से पशु अर्थात् भोग्य हैं । इन्हें सौरप्राण देवता प्रतिक्षरण चूस कर भोग्य बनाते हैं अर्थात् पार्थिव पदार्थों का आलम्भन कर पृथिवी से इनका अस्तित्व उखाड़ कर दिव्यलोक में ले जाना पार्थिव चाहते हैं । पार्थिव मृदुभाग ही जल में मिलने के कारण मेध है । यही वनस्पति बनता है, जो मृदुभाग ऊपर न जा कर सजातीयाकर्षण से नीचे रह जाता है, कार्य कहलाता है । यद्यपि कठिन इस रीति से सारी ही वनस्पतियाँ कार्ष्म हैं तथापि श्रीपर्णी नाम की वनस्पति अधिक होती है । इस श्रीपर्णी वक्ष की वपाश्रपणी बनाने से तथा उस पर वपा का आच्छादन करने [ ३७६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवर्षा ब्राह्मणे पर पशुवा अत्यन्त समृद्ध हो जाती है । वषा की इस समृद्धता के लिए ही कार्यमयी वपा -श्रपणियाँ बनाई जाती हैं ॥ १७ ॥
पशु के हृदय से वपा को निकाल कर दोनों वपाश्रीरूप लकड़ियों पर लगा दिया IT है । लकड़ियों पर लपेटी हुई उस वपा को छुरे द्वारा चीर कर दो भाग कर लिये जाते हैं । वपा का एक भाग एक लकड़ी पर तथा दूसरा भाग दूसरी लकड़ी पर लगा रहता हैं । पशु को शामित्रशाला ( पशु को मारने की शाला ) में ले जाया गया था । उसके आगे उल्मु-काग्नि को शामित्रशाला में ले जाया गया था । उसी उल्मुकाग्नि में इस वपा को तपाता है । यद्यपि वपा को आगे पकाया जाएगा, किन्तु यहाँ भी उल्मुकाग्नि में तपाने से उस का कुछ परिपाक हो जाता है । पश्चात् प्राग्नीध्र ऋत्विक् उल्मुक को ग्रहण करता है । आग्नीध्र, अध्वर्यु, होता, यजमान, प्रतिप्रस्थाता सब मिल कर चात्वाल के पश्चिम भाग से चल कर उत्तरावेदस्थ ग्राहवनीय के पास आते हैं । वहाँ अध्वर्यु वामहस्त में घृत तृणखण्ड को ' वायो वेः स्तोकानाम् ' अर्थात् हे वायो! वपा के ऊपर प्राज्यसेचन काल में नीचे गिरे हुए घृत-बिन्दुनों के आधार इस समित्स्थानीय तृरणाग्रभाग को अग्नि में पहुँचा दो - इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ ग्राहवनीय में डाल देता है । आहवनीय में वपा डाली जाएगी । इस में प्राहुत हो कर वाघृत वायु में चला जाएगा क्यों कि घृत प्रान्तरिक्ष्य रस है, अन्तरिक्ष का धिष्ठाता है, इसलिए वायु से प्रार्थना की जाती है कि हे वायो! आप इस तृरण को घृत-बिन्दु का आधार समझें । इस तृरण को घृतबिन्दुनों का समित् इसलिए बतलाया गया है कि यह अग्नि को प्रज्वलित करता है । अग्नि को प्रज्वलित करने वाले काष्ठ के दो भेद हैं-इम व समित् । इन में इध्म का पार्थिवाग्नि से तथा समित् का दिव्याग्नि से सम्बन्ध है । इम को मन्त्र द्वारा दिव्यभाव का प्रधान कर समित बनाया जाता है । यहाँ तृण को घृत-बिन्दुओं को स्वर्ग में ले जाने के लिए ग्राहवनीयाग्नि का समिन्धन करने वाला कहा है ॥ १८ ॥
यद्यपि अध्वर्यु उत्तर से दक्षिण में आ कर उस वपा को आहवनीयाग्नि में पकाता है । तथा उसकी आहुति भी ग्राहवनीयाग्नि में देता है तथापि अध्वर्यु के शामित्रशाला से चात्वाल के पश्चिम से ग्राहवनीय के उत्तर में आने पर आहवनीयाग्नि की दृष्टि अपने भोज्य वपा पर पड़ जाती है । अब यदि श्राहवनीय में वपा को न तपा कर अध्वर्यु उस श्राहवनीय का प्रति-क्रमण कर जाएगा तो श्राहवनीयाग्नि में क्षोभ उत्पन्न हो कर उस में शान्ति उत्पन्न होगी । उस शान्ति को दूर करने के लिए ही, उत्तर में खड़े - खड़े ही अध्वर्यु उस वपा को ग्राहवनीय में तपा कर आहवनीयाग्नि का सत्कार कर देता है । इससे आहवनीयाग्नि का अतिक्रमण नहीं होता । इससे आहवनीयाग्नि अध्वर्यु की तथा तद् द्वारा यजमान की हिंसा नहीं करती || १६ || उस वपा को ऋत्विक आहवनीय अग्नि और यूप दोनों के मध्य की ओर से दक्षिण में जाते हैं जहाँ वपा को पका कर उसकी आहवनीय में आहुति दी जाती है । ऋत्विक् लोग [ ३८० ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मणं अन्य हवियों की तरह प्राहवनीयाग्नि से पश्चिम में हो कर इस वपाहवि को दक्षिण में इस लिए नहीं ले जाते कि वपाहवि अभी अपरिपक्व है, और ग्राहवनीय यज्ञ का मुख है । श्राहव-नीय से पश्चिम में सदोमण्डप यज्ञ का उदर है । ऐसी स्थिति में आहवनीय के पश्चिम में हो कर वपा हवि को ले जाना अपरिपक्व हवि का यज्ञ के उदर में प्रधान करना है जो कि उचित नहीं रहता है । किन्तु आहवनीयाग्नि और यूप के मध्य से वपा के ले जाने पर यूप तक यज्ञ की सत्ता होने से यज्ञपुरुष में अपरिपक्व हवि डालने का दोष रह ही जाता है । यूप के बाहर की ओर से वपाहवि को ले जाना भी उचित नहीं क्यों कि ऐसा करने से हवि यज्ञ-बहिर्भूत हो जाएगी, प्रयज्ञिया बन जाएगी । अतः इन दोषों के परिहार के लिए आहवनीय व यूप के मध्य में प्राहवनीय के पूर्वभाग की ओर से हवि को ले जाना चाहिए । इस से यज्ञ -पुरुष के उदर- रूप सदोमण्डप में अपरिपक्व हवि का प्रवेश नहीं होता तथा यूप से बहिर्भूत न होने से यज्ञियतारूप दोष भी प्राप्त नहीं होता । अतः यह पक्ष ही उचित है । इस प्रकार यूप और ग्राहवनीयाग्नि के मध्य में हो कर प्रतिप्रस्थाता आहवनीय के दक्षिण की ओर आ कर कार्यमयी श्रपणियों पर लपेटी हुई वपा को ग्राहवनीय में पकाता है ॥ २० ॥
तत्पश्चात् उत्तरावेदि पर स्थित ध्रुवा नामक घृत- पात्र से स्रवा द्वारा घृत कर ' अग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा ' - इस प्रज्याहुति को अग्निदेवता स्वीकार करें - इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ अध्वर्यु वपा पर उस घृत की आहुति देता है । देवताओं को आहुति देते समय स्वाहा का उच्चारण किया जाता है, जैसा कि ' स्वाहाकारेण वा वषट्कारेण देवेभ्योऽन्नं हूयते ' ( ऐ ० ब्रा ० २।२।३ ) से सिद्ध है । वपा पर घृत की आहुति दी जाती है, वह आग्नेय है । इससे वपा के स्तोक ( परमाणु ) बिन्दु परिपक्व हो जाते हैं और स्वाहाकृत होकर आहुतियाँ बन कर, आहवनीय अग्नि को प्राप्त हो जाते हैं । अग्नि के द्वारा आहुति सारे देवताओं को प्राप्त हो जाती है, क्यों कि ' अग्निमुखा वै देवा: ' इस वचन के अनुसार ही देवताओं का मुख है जिससे वे हवि का भक्षण करते हैं ॥२१ ॥
इसके बाद अध्वर्यु होता के प्रति - ' स्तो केभ्योऽनुब्रूहि ( हे होता! स्तोकों अर्थात् वपापर-माओं के लिए अनुवाक्या बोलो ) यह प्रैष करता है । पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज, भेद वाले भूमिस्थ पाँच पशुओं की वर्षा के सारभूत स्तोकों को अग्नि ऊपर ले जाता है । इन पार्थिव घृतस्तोकों को ग्राकाश में पहुँचा कर वृष्टि कराता है । अतः इन घृतस्तोकों के लिए ग्राग्नेयी अनुवाक्या की जाती है । प्रतिप्रस्थाता वपा को पका लेता है तब अध्वर्यु से कहता है कि हे अध्वर्यु! वपा तय्यार है, अब आप वपा कर्म प्रारम्भ कीजिए ॥ २२ ॥
प्रतिप्रस्थाता के कहने के बाद अध्वर्यु वपा- होम के लिए जुहू व उपभृत् को हाथ में ले कर ' ओश्रावय ' अस्तु श्रौषट् रूप से प्राश्रावण कर्म करा स्वाहाकृतिभ्यः प्रेष्य ' ऐसा कह कर होता के द्वारा वषट्कार करते ही स्रुव से घृत की प्राहुति प्राहवनीय में दे देता है । इध्म, तनूनपात्, नराशंस आदि ११ प्रयाजों में स्वाहाकृति अन्तिम प्रयाज है । इस अन्तिम प्रयाज देवताओं के लिए घृत की आहुति दे दी जाती है ॥ २३ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण अन्तिम प्रयाज स्वाहाकृति के लिए आहुति देकर प्रथम वपा का अभिघारण अर्थात् घृत से सेचन करना चाहिए । तत्पश्चात् पृषदाज्य का अभिघारण करे । दधिमिश्रित श्राज्य पृषदाज्य कहलाता है । किन्तु वैशम्पायन के अनुयायी कृष्णयजुर्वेदीय चरकाध्वर्यु अन्तिम प्रयाज में स्वाहाकृति की प्राहुति के बाद पृषदाज्य का अभिघारण ( घृत से सेचन ) करते हैं । उनका तात्पर्य यह है कि प्रकृतियज्ञ में पृषदाज्य प्राणस्वरूप है । इस प्रारण उत्पन्न होता है | अतः प्रकृतियज्ञवत् इस वैधयज्ञ में भी मृतपशु में प्राणाधान के लिए पृषदाज्य का अभिधारण प्रथम करना चाहिए | क्यों कि देवता अमृतरूप हैं, वे अमृत की आहुति ही लेते हैं । यदि पृषदाज्य से पूर्व वपाभिधारण कर उसकी आहुति दी जाएगी तो उसे देवता ग्रहण नहीं करेंगे । अतः पृषदाज्याभिघारण करना चाहिए । इस के द्वारा मृतपशु में प्राणाधान हो जाएगा । तब उस जीवित वपा की आहुति देवता ग्रहण कर सकेंगे । चरकाध्वर्यु लोगों ने पृषदाज्या-भिघार को वपाभिघार से पूर्व करने में यह तर्क देकर पृषदाज्याभिचार से पूर्व वपाभिघार करने वाले याज्ञवल्क्य पर कटाक्ष किया है कि अरे देखो! पृषदाज्याभिधार से पूर्व वपाभि-धार करके यह याज्ञवल्क्य प्राण का प्रतिक्रमण कर रहा है । अतः इसका हाथ निष्प्राण हो कर सूख जाएगा || २४ || इस प्रकार आक्षेप करने पर भगवान् याज्ञवल्क्य ने अपने हाथों पर दृष्टि डालते हुए अपने दोनों हाथ उठा कर कहा कि हे ऋत्विजो! जरा के कारण श्वेतरोमयुक्त मेरे दोनों हाथ वैसे ही विद्यमान हैं जैसे वपाघार से पूर्व थे । अतः उन ब्राह्मणों का वचन कहाँ गया जिन्होंने पूर्व वपाभिघार करने पर हाथों का निष्प्राण होना कहा था । अतः इन चरकाध्वर्यु ब्राह्मणों के वचन को नहीं मानना चाहिए और पृषदाज्याघार से पूर्व वपाभिघार करना चाहिए | अपि च पहले वपाघार करने पर ' प्रकृतिवद् विकृति: कर्तव्या ' इस सिद्धान्त का परि-पालन हो जाता है । क्योंकि प्रकृतियाग दर्शपूर्णमास में पञ्चम अन्तिम प्रयाज करने के बाद अन्य कर्मों से पूर्व ध्रुवाभिघार किया जाता है । तथैव दर्शपूर्णमास याग के विकृतिभूत इस याग में पहले पाहवन किया जाएगा, अतः पहले वपाभिघार ही करना चाहिए, पश्चात् पृषदाज्याभिघार करना चाहिए । वपा का अभिघार किया जाता है पशु का क्यों नहीं! इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पशु अपरिपक्व है । अपरिपक्व वस्तु में आसुरभाव का समावेश होने से देवता ग्रहण नहीं करते । वपा का परिपाक कर दिया गया है । उसमें अग्नि-सम्बन्ध से दिव्यता आ गयी है । अतः वह देवग्राह्य हो गई है । पशुयज्ञ में पशु का अभिघार न करना संगत प्रतीत नहीं होता तथापि वपा पशु के आन्तरिक हृदय का मेद है, पशु का सारभाग है । अतः उसके अभिचार से सारा पशु ही [ ३८२ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुचपा ब्राह्मण अभिघारित हो जाता है । इसलिए पृषदाज्य से पूर्व वपा का अभिघार पहले करना चाहिए || २५ || इसके बाद वपापणी पर घृतास्तरण करता है । तदन्तर उस पर सोने की टिकिया रखता है । तदनन्तर अध्वर्यु वपा का अवदान ( विभाग ) करता हुआ ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदोऽनुब्रूहि ' अर्थात् अग्नि व सोम देवता के लिए अग्नीषोमीय अग्निष्ठा पशु की वपा के लिए अनुवाक्या करो, ऐसा होता से कहता है । प्रैष के अनन्तर आज्यस्तरण पर रखे हुए हिरण्यशकल पर उस वपा को रख कर उस पर एक सुवर्ण की टिकिया और रखता है । पश्चात् उस सुवर्ण शकल में दो बार घृत डालता है । वपा के दोनों ओर सुवर्णशकल अप्रारण पशु में प्रारणता सम्पादनार्थ रखा जाता है ॥२६ ॥
aur के दोनों ओर हिरण्यशकल रखने का कारण बतला रहे हैं कि सुवर्ण सौर तेजोमय होने से अमृतरूप है । सौर तेज ही जड़ व चेतन का आत्मा है । अत: सौरतेज: स्वरूप प्रायु-रूप सुवर्णशकल को पशुरूप वपा के दोनों ओर रख कर पशु को अमृतरूप आयु में प्रतिष्ठित करता है । इससे पशु ऊर्ध्वलोक की ओर चला जाता है और सप्राण हो कर देवभोग्य बन जाता है । तत्पश्चात् आश्रावण प्रत्याश्रवण कर अध्वर्यु ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपां मेदः प्रेष्य ' यह प्रेष करता है । इस प्रैष में ' प्रस्थितम् ' का प्रयोग नहीं करना चाहिए । क्यों कि श्रभिषव करने पर जो वपायाग होता है उसके प्रैष में ' प्रस्थितम् ' प्रयोग होता है, यहाँ नहीं । तत्पश्चात् वषट्कार का उच्चारण कर वपा की आहुति दे देता है ॥ २७ ॥
वपा का हवन करने के बाद दोनों वपाश्रपणियों को परस्पर अभिमुख कर, अध्वर्यु स्वाहा का उच्चारण करने पर ' ऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए हवनीयाग्नि में डाल देता है । जिन वपाश्रपणी लकड़ियों के द्वारा वपा को पकाया गया है, वे पवित्र लकड़ियाँ कहीं अपवित्र स्थान में न डाल दी जाएँ - अतः मन्त्रपूर्वक उनका ग्राहव-में प्रक्षेप कर दिया जाता है || २८ ॥ वपा की आहुति देने का कारण बतलाते हैं । जिस देवता के उद्देश्य से पशु का आलम्भन किया गया है उस देवता को शान्त करने के लिए ही मेध ( वपा ) की आहुति दी जाती है । क्योंकि पशु का प्रलम्भन तथा उसकी आहुति के मध्य में कितने ही अङ्गकर्म करने पड़ते हैं । तब तक आमन्त्रित भूखा रहने से क्षुब्ध हो जाएगा, अतः उसके क्षोभ की शान्ति के लिए पश्वाहुतिरूप भोजन से पूर्व जलपान के रूप यह पाहुति दी जाती है || २६ || पाहोम करने के बाद अध्वर्यु आदि ऋत्विक् चात्वाल में जा कर जल से अपने हाथ धो लेते हैं, क्योंकि वे पशु के प्रालम्भन का क्रूर कर्म करते हैं, जिससे क्रूर विद्युत् उत्पन्न हो कर वातावरण को क्षुब्ध करती है । उसका प्रभाव पशु को मारने वाले ऋत्विजों के हाथों पर भी पड़ता है । उसी की शान्ति के लिए वे जल से हाथों का प्रक्षालन करते हैं, क्योंकि जल शान्तिरूप है ॥ ३० ॥
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) लेती आए-१ पशुवधशाला । २ शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मणं काष्ठ निर्मित स्फय । [ ३८४ ] [ विज्ञान भाष्य ] इस सोमयज्ञ में अग्निष्ठायूप से बँधा हुआ जो ' ग्रग्नीषोमीय " पशु था, उसका वेदि से उत्तर भाग में बनी हुई शामित्रशाला में शमिता द्वारा शास से आलम्भन ( वध ) कर दिया है । आलम्भन का नाम ही संज्ञपन 1 इस आलम्भन के अनन्तर जो कृत्यकर्म होते हैं - वे बत-लाते हैं । जिस समय शमिता पशु का संज्ञपन करता है, उसी समय शामित्रशाला में बैठा हुआ शमिता वहीं से संज्ञप्तः पशुः यह बोलेगा । ग्राहवनीय के पास बैठे हुए अध्वर्यु को सूचित करेगा कि हे अध्वर्यु! पशु संज्ञप्त हो गया है - प्रालम्भित हो गया है अर्थात् पशु का प्रलम्भन कर दिया गया है । जिस समय शामित्रशाला में बैठा हुआ शमिता " संज्ञप्तः पशुः " यह कहता है, उसी समय अध्वर्यु नेष्टा नाम के ऋत्विक् कोटः पत्नमुदानय " यह प्रैष करता है । ' पशु मारा गया ' यह सुनते ही श्रध्वर्यु नेष्टा को प्राज्ञा देता है कि हे नेष्ट! तुम यजमान पत्नी को इस स्थान में ले श्राश्रो । प्रसूत ( आज्ञप्तः ) नेष्टा पाँव धोने के पानी के पात्र को अपने हाथ में रखने वाली यजमान पत्नी को इस उत्तर वेदि के पास ले आता है । हवि-वैदि के गार्हपत्य के पार्श्वश्रोणि में पत्नीशाला होती है । यहाँ पर यजमान पत्नी रहती है । वहाँ से इसे यहाँ लाया जाता है । जिस समय पत्नी यहाँ आने लगे, उसे चाहिए कि वह पाँव धोने के पानी को साथ ' यदा प्राह - " सञ्ज्ञप्तः पशुरिति । प्रथाध्वर्युराह - नेष्ट: पत्नी मुदानय इति । उदानयति नेष्टा पत्नीपान्नेजनं बिभ्रतीम् ॥१ ॥
जब पत्नी उत्तरावेदि के पास आ जाती है तो अध्वर्यु उससे -" नमस्तऽश्रातान - अनर्वा प्रेहि " । ( वा ० सं ० ६।१२ ) यह मन्त्र बुलवाता है । यज्ञपाक - वितान भेदेन दो प्रकार का होता है । पाकयज्ञ कोगृह्ययज्ञ कहते हैं । इन्हीं को ' हविर्यज्ञ ' कहते हैं । श्रग्निहोत्र दर्शपूर्णमासादि सब पाक यज्ञ हैं । ये घर में ही हो जाते हैं । परन्तु जो घर से बाहर बड़ी दूर तक वितत होने वाले यज्ञ हैं, उन्हें वितानयज्ञ कहा जाता है । इन्हीं को प्रातान - यज्ञ भी कहते हैं, जैसे- ज्योतिष्टोम, श्रश्वमेध - वाजपेय, राजसूय - इत्यादि यज्ञ ' आतान-यज्ञ ' कहलाते । इनके लिए लम्बी - चौड़ी भूमि रोकनी पड़ती है । इसका मूल कारण यही प्रकृति - यज्ञ है । प्रकृति - यज्ञ भी पाक और वितान भेदेन दो प्रकार का है । प्रकृति यज्ञ ही दो प्रकार का नहीं है अपितु मानुष यज्ञ भी दो प्रकार का है । उसकी नकल पर ही मनुष्य - यज्ञ दो प्रकार का होता है । चन्द्रसम्बन्धेन पृथिवी - पिण्ड पर होने वाले दर्शपूर्णमासादि पाक यज्ञ हैं । एवं पृथिवीपिण्ड से सूर्य्यं तक इक्कीस ( २१ ) तक वितत महावेदि में पारमेष्ठ्य सोम से होने वाले यज्ञ " वितान " यज्ञ हैं । श्राज यह यजमान उस वितान यज्ञ की नकल पर सोम नाम का वितान यज्ञ कर रहा है । यज्ञ ही का वितान किया जाता है । पृथिवी से इक्कीस ( २१ ) तक यूपपर्य्यन्त यज्ञ ही को फैलाया जाता है । चूंकि यज्ञ ( अग्नि ) ही इक्कीस ( २१ )