Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 401–410

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मण तक वितत होता है, अतएव इस यज्ञ को हम श्रातान कहने के लिए तय्यार हैं चारों । जिसका ओर आसमन्तात् तनाव होता तनाव हो, वही आतान कहलाता है । इस यज्ञ का पृथिवी से इक्कीस ( २१ ) तक तन्यते ' - आतान शब्द की है, अतएव हम इस यज्ञ को प्रतान कहने के लिए तय्यार हैं । ' प्रासमन्तात् यही व्युपत्ति है-" तां वाचयति । नमस्ते - श्रातानेति । यज्ञो तन्वते - तेन यज्ञ श्रतानः " - इति । वातानेति । यज्ञं हि गार्हपत्य से - उत्तरावेदि तक यूप तक- वितत जो यज्ञ है उसका पूर्वभाग तो आहवनीय है एवं पश्चिमभाग गार्हपत्य है । गार्हपत्य पैर हैं - प्राहवनीय मुख है - यूप - शिखा है । इस में प्रकार पृथिवीपिण्ड प्रकृति पर में और उस इस मनुष्य यज्ञ में वह यज्ञपुरुष - पृथिवी से सूर्य्यं तक खड़ा हुआ है । प्रकृति - यज्ञ ग्राहवनीय है । इक्कीस यज्ञपुरुष के पैर हैं । सतरहवें ( १७ वें स्थान पर रहने वाला वैश्वानर नामक शिखा है । बत-( २१ ) पर सूर्य्यं यूप है । एवं यहाँ पर गार्हपत्य पृथिवी है, आहवनीय मुख है - काष्ठयूप पास पत्नी- शाला लाना इस प्रपञ्च से यही है कि गार्हपत्य - इस यज्ञ का पश्चिम भाग है । गार्हपत्य के की पश्चि होती है, अतएव पत्नी को यज्ञ का पश्चिमार्ध माना जाता है । श्रपिच - पत्नी मनुष्य यज्ञपुरुष मा होती है । पुरुष, पूर्वभाग है । पृथिवी से सूर्य की ओर का जो समसाम्मुख्यभाग है ', पूर्वार्द्ध वही पूर्व ' बतलाया कहलाता है । इसी से पुरुष का आत्मा बनता है अतएव पुरुष को सौरप्रग्नीषोमात्मक यज्ञ का कहते हैं । जाता । पुरुष में दृश्यमण्डल का आधा प्राण ही आता है अतएव इसे अर्धेन्द्र कहते हैं, पूर्ण है । स्त्री का जो सौर प्रारण पृथिवी की वस्तु बन कर बाहर निकलता है, उससे स्त्री का आत्मा से बनता बनता है । पूर्व क्षितिज आत्मा साक्षात् - प्रकाश से नहीं बनता, अपितु पृथिवी के पश्चिम भाग के प्राण से पुरुष से पश्चिम क्षितिज तक के दृश्य मण्डल में जो प्रारण रहता है - वह पूर्व मण्डल कहलाता प्राधा है । श्रदृश्य इसी मण्डल है का आत्मा बनता है एवं पूर्व क्षितिज से नीचे की ओर जो १८० अंश का तमोमय श्रात्मा बनता है । जिसे कि दिति - मण्डल कहते हैं, वही यज्ञ का पश्चिमार्ध कहलाता है । इससे स्त्री का । स्त्री यज्ञपुरुष अतएव स्त्री को यज्ञ का पश्चिमार्द्ध कहा जाता है । जैसे पुरुष प्राधा है, स्त्री भी प्राधी है बिना पत्नी का पश्चिमार्द्ध है । यज्ञ पूर्णेन्द्र है । पुरुष अर्धेन्द्र है । स्त्री के मेल से पूर्णेन्द्र होता है, है यज्ञ । का श्रतएव पश्चिमार्द्ध पत्नी के यज्ञ सर्वथा नहीं हो सकता । आज आहवनीय में यजमान यज्ञ करने वाला यज्ञ के पश्चिमार्द्ध भाग है । बिना पत्नी के यज्ञ अधूरा रहता है । अतएव नेष्टा उस पत्नी को नहीं बल्कि प्रसन्न करता है, अर्थात् परिपूर्ण बनाता है । अपिच - वह यज्ञ ओर -जाया करता है । को यज्ञ के पास लाता है, एवं यज्ञ को पश्चिम से सूर्य की ओर - पूर्व भाग की पूर्व की ओर ले जाना - यज्ञ को पश्चिम से है । यज्ञ सूर्य की वस्तु है- प्रतएव वह उधर जाने में ही ओर - पूर्व की ओर ले जाना यज्ञ को प्रसन्न करना है याज्ञवल्क्य कहते हैं-ऐसी अवस्था में पत्नी को पश्चिम से पूर्व की ओर ले जाना है क्यों कि पत्नी भी यज्ञ का आधा भाग प्रसन्न होता है । अतः पत्नी को ग्राहवनीय की इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् " जघनार्दो ( पश्चिमार्द्धा ) वा एष यज्ञस्य यत्पत्नी । तामेतत् प्राचीं यज्ञं प्रसादप्रिष्यन् भवति ( नेष्टा ) " । [ ३८५ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) वा ० सं ० ६।१२ । १ शतपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण [ ३८६ ] यज्ञ नाराज कब हुआ था कि जिससे उसे प्रसन्न करने की आवश्यकता पड़ी? इसका उत्तर यही है किइस यज्ञ सारे मनुष्य हैं । मनुष्य अनृतसंहिल हैं । दोष हो जाना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है । काम करते समय कितने ही दोष तो ऐसे होते हैं, जिनका पता चल जाता है । उनके लिए तो उसी समय प्रायश्चित कर लिया जाता है, परन्तु कितने ही दोष ऐसे हैं, जिनका हमें पता नहीं रहता । संभव है - इस पशु - प्रलम्भनक में अध्वर्यु आदि से श्रज्ञात दोष हो गए हैं, इनसे यज्ञ विकृत हो जाता है । यज्ञ - स्वरूप म्लान हो जाता है - इस यज्ञ की यही अप्रसन्नता । इसको पाने के लिए प्रज्ञात दोषोत्पन्न यज्ञ की लानता दूर करने के लिए ही पत्नीस्वरूप यज्ञ के पश्चिमार्द्ध भाग को पूर्व की ओर ले जाया जाता है । इससे यज्ञ प्रसन्न हो जाता है एवं म्लानताप्रयुक्त जो बुरा असर था, वह जाता रहता है । प्रसन्नता के कारण वह यज्ञ यजमानात्मा पर कुछ भी प्राघात नही पहुँचाता है, अतएव पत्नी को पश्चिम से आहवनीय के पास ले जाया जाता है । भगवान् याज्ञवल्क्य इसकी दूसरी उपपत्ति बतलाते हुए कहते हैं - पत्नी यज्ञ का अर्थात् यजमान पुरुष का पश्चिमार्द्ध है । ऐसी अवस्था में यदि केवल यजमान यज्ञकर्म में शामिल हो, तो इससे पत्नी की आत्मा पर धक्का लगेगा । अतः उसे भी इस यज्ञ में अवश्य ही शामिल होना चाहिए । जब पत्नी भी इस यज्ञ में शामिल हो जाती है तो यज्ञ का बुरा असर पत्नी के आत्मा पर नहीं पड़ता है । यजमान और यजमानपत्नी दोनों के मिल जाने मे पूणेन्द्र यज्ञभगवान् प्रसन्न हो जाते हैं । इसीलिए पत्नी को यहाँ लाया जाता है --" तस्मा एवैतद्यज्ञाय निह्नुते । तथो हैनामेष यज्ञो न हिनस्ति । तस्मा-दाह - नमस्ते श्रातान - इति । पत्नी आते ही बोलती है - हे आतान नाम के यज्ञ! आपके लिए नमस्कार है । आप अपन हो कर पूर्व में पधारिए ॥ २ ॥

नव प्रेहि ' का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - " प्रसपत्नेन त्वं प्रेहीत्येवैतदाह " । श्राप निःशत्रु हो कर स्वर्ग की ओर अपने प्रभव की ओर - पधारिए । आपके प्रति नमस्कार । इसी मन्त्र का शेष भाग बतलाते हैं-" घृतस्य कुल्याउपऋतस्य पथ्याऽनु - इति " । ( वा ० सं ० ६।१२ ) जिस मार्ग में घृत का बहाव हो रहा है - ऐसी जो ऋत की पगडण्डी है उसकी ओर पधारिए । यह यज्ञ सतरह ( १७ ) तक जाता है । सतरहवें ( १७ वें ) स्थान का नाम ग्रन्तरिक्ष हैं एवं अन्तरिक्ष को शरीर होने के कारण ऋत कहते हैं । जैसे दधि, पृथिवी लोक की वस्तु है; मधु, सूर्य्य लोक की तथा प्रमृत परमेष्ठी की वस्तु है; तथैव घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है । घृत तरल पदार्थ है, तरल वस्तु अन्त रिक्ष में रहती है, घन पृथिवी में रहती है, एवं विरल द्युलोक में रहती है । यह यज्ञ उसी घृत का बहाव

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) इस प्रकार वह अध्वर्यु -पत्नी से यह मन्त्र बुलवाता है । इसके बाद-पशुचपा ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण " साधूपेत्येवैतदाह " । [ ३८७ ] होने वाले अन्तरिक्ष ( घृ ) की ओर जा रहा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर घृतस्य कुल्बा इत्यादि कहा है । पिच श्राहवनीय में जो जुहू से घृत डाला जाता है, उसी में हो कर तो यज्ञ जाता है । सोमा-हुति से यज्ञात्मा बनता है । वह घृत बहने वाले आहवनीय के द्वारा ही अन्तरिक्ष में जाता है । यव के स्वप्रभव की ओर जाने का सीधा रास्ता यही है । आप सीधे सुपरिचित मार्ग से जाइए । ' घृतस्य ' इत्यादि का यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" नमस्ते - आतान नर्वा प्रेहि - द्युतस्य कुल्या उपऋतस्य पथ्याननु " । ( वा ० सं ० ६।१२ ) " हे यज्ञ! आपके लिए नमस्कार है । जिस ओर घृत का बहाव है, उस तरफ की पगडण्डी से हो कर, निःशत्रु हो कर, आप स्वर्ग की ओर पधारिए " - यही इसका अर्थ है । आपको ऊपर जाते हुए अन्तरिक्ष के नाष्ट्रा असुर लोग न रोकें, श्राप क्षेमकुशलपूर्वक वहां पहुंच जाएँ " । " देवीरापः शुद्धा वोवं सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म " । ( वा ० सं ० ६।१३ ) इस मन्त्र से उस पत्नी द्वारा लाए हुए पानी को पवित्र करते हैं । सुपरिविष्ट अर्थात् पात्रों को में परिपूरित स्वभावतः शुद्ध एवं मन्त्र से विशुद्धीकृत जो आप ( देवीराप ) हैं वे देवताओं में इस पशु प्रारण ले जाएँ - अर्थात् मन्त्र द्वारा पवित्रीकृत आप इस पशु को देवताओं के लिए वहन कीजिए । पशु पवित्र के है, निकल गए हैं, अतएव वह अपवित्र गया है । अपवित्र वस्तु को देवता नहीं लेते । पानी एवं उसे मन्त्र से परिपवित्र कर दिया जाता है । इसके सम्बन्ध से पशु पवित्र हो जाता है करने एवं के देवता लिए इसकी हवि को ग्रहण कर लेते हैं । पानी यद्यपि पवित्र है तथापि कुशादि से और पवित्र " देवीरापः शुद्धा " यह कहा जाता है । " देवीरापः शुद्धा वोढ्वं सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म [ सुपरिविष्टाः - पात्रेषु परिपूरिताः - देवीरापः स्वभावतः शुद्धाः - ( संस्का-रेणापि शुद्धा ) सत्यः यूयं देवेषु पशुं वोढ्वम् - ( वहनं कृरुत ) - वयं च देवेषु ( देवकाय्यैमध्ये ) सुपरिविष्टाः ( परिवेष्टार ) भूयास्म ] अप एवैतत् पावयति " || ३ ||

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण इसके बाद पत्नी, उस पशु के जो प्रारण हैं अर्थात् श्राँख, नाक, मुँह, कान, हाथ, पैर इत्यादि इन्द्रियाँ हैं, उनको पानी से स्पर्श करती है, उन्हें पानी से धो देती है । मृत पशु के इन्द्रियों के पानी लगाने का क्या कारण है? क्यों पानी लगाया जाता है? - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं--" अथ पशोः प्राणानद्भिः पत्न्युपस्पृशति । तत् ( तत्र ) यदद्भिः प्राणा-नुपस्पृशति - ( तदुच्यते ) " । भूत और प्रारण - संसार में दो ही वस्तु हैं । प्रारण को ही देवता कहते हैं । देवताओं का जो अन्न है, वह जीव है । श्रर्थात् देवता के लिए मृत पशु की आहुति नहीं दी जाती, क्यों कि देवता अमृत हैं । अमृत के लिए अमृत की आहुति देना उचित है । परन्तु श्राज यह पशु मर गया है, एवं इसकी खाल खींच ली है । ' पशु का जो संज्ञपन करते हैं एवं उसकी खाल खींचते हैं'- इन दोनों कम्मों से उसे एकान्ततः मार डालते हैं । मस्तक कटने के बाद भी पशु में प्राण रहता है, अमृत भाग रहता है, परन्तु जब उसकी खाल भी उतार ली जाती है तो वह सर्वथा मुर्दा बन जाता । उसमें से अमृत तत्व ( प्राण ) एकदम एकान्ततः निकल जाता है - इस सर्वभाव को बतलाने के लिए ही ----1 " तत् पशुं घ्नन्ति यत् सञ्ज्ञपयन्ति यद् विशासति " । यह कहा है । संज्ञपन प्रलम्भन का नाम है, विशासन खाल खींचने का नाम है- दोनों कम्मों से वह पशु एकदम अमृत - शून्य हो जाता है । देवता लोग अमृत स्वरूप हैं, अतएव इसे तब तक ग्रहण नहीं कर सकते जब तक कि इसमें प्रारण न डाला जाए । सजातीय पदार्थों का मेल होता है । अपनी जाति की वस्तु अपनी जाति की वस्तु को खींचती है, विजातीय को नहीं । मिट्टी के ढेले को ऊपर उछालिए, वह वापस नीचे आ जाएगा क्यों कि पृथिवी उसे अपनी ओर खींचती है । ढेला पृथिवी की ही वस्तु है । अग्नि को कितना ही नीचे दबाने की कोशिश कीजिए वह ऊपर ही जाएगा क्यों कि वह द्युलोक की वस्तु है । सूर्य में ज्योतिः - गौ- प्रायु- ये तीन चीजें रहती हैं । ज्योतिर्भाग का नाम देवता है । यह देवता अध्यात्म में श्राकर प्राण कहलाने लगाते हैं । देवता, देवता को अपनी तरफ खींचता है । प्राण, प्राण को खींचेगा न कि भूत । प्राण के सहारे से प्रारण रूप बन कर खिच प्राता है परन्तु बिना प्रारण के प्रारणदेवता भूत को नहीं ले सकते । शरीरस्थ प्रारण ही प्राणदेवताओं का अन्न है । चूँकि आज पशु के प्राण निकल गए हैं, अतएव देवता इसे नहीं लेंगे । इस विप्रतिपत्ति को हटाने के लिए देवता इस पशु - हवि को ग्रहण कर लें -इसीलिए इससे पानी का सम्बन्ध कराया जाता है । हम जो अन्न खाते हैं, उसमें पृथिवी, अन्तरिक्ष द्यौ, परमेष्ठी - चार लोकों का रस मौजूद है । इनमें ये ही चारों रस - दधि, घृत, रस, अमृत ( सोम ) नाम से प्रसिद्ध हैं । चारों में दधि पार्थिव घन रस का उपलक्षण है, एवं अमृत पारमेष्ठ्य सोम का वाचक है । हम जो न खाते हैं, उससे रस सृङ्मेदोमांसादि शुक्र पर्य्यन्त सात ( ७ ) धातु बनते हैं । सातों धातु पृथिवी की वस्तु हैं । इसके बाद अन्तरिक्ष और द्यु का रस रहता है - इसका नाम प्रोज है । प्रोज में १२-मेष्ठी - र अन्तरिक्ष तीनों शामिल नहीं हैं, एवं अन्तरिक्ष से वायु के निकल जाने पर द्यौ का सौर-प्राण और पारमेष्ठ्य सोम रह जाता है । इसका नाम प्रज्ञानात्मा है । जब सौर प्राण हट जाता है एवं [ ३८८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मणे तो सोम रह जाता है - यही मन कहलाता है । अन्नस्थ अमृत भाग से ही चूंकि मन बनता है, अतएव शुद्ध ' अन्नमयं हि सोम्य मनः " यहे कहा जाता है । जैसे अन्न से मन, उसी प्रकार पानी से प्रारण बनता | आप पन्द्रह ( १५ ) दिन तक अन्न न पाए बिना जी सकते हैं, परन्तु पानी बिना पीए नहीं जी सकते, क्यों कि पानी से ही प्रारण बनता है । प्राण से ही जीवन - सत्ता रहती है, अतएव ' आपोमय प्राणा: ' यह कहा जाता है | चूँकि पानी से प्रारण उत्पन्न हो जाता है, ऐसी अवस्था में पशु की इन्द्रियों पर पानी लगाना - उसमें प्राणाधान करना है । एवं ऐसा करते हुए उसे अमृतमय बनाना है । ऐसा करने से यह पशु प्राणयुक्त हो जाता है, एवं देवताओं का हवि जीव ही बन जाता है । अमृत देवताओं का अमृत ही हवि बन जाता है । प्रायः किंवदन्ती है कि यज्ञ में जो पशु मारा जाता है, उसे वापस जिला देते हैं-इसका यही मूल है । जिलाने का अर्थ यह नहीं है कि वह दौड़ने - फिरने लगे । अपितु - प्राणाधान करना ही जिलाना है । पानी से एक प्राण उत्पन्न हो जाता है, उससे इसे जीवित मान लिया जाता है । पशु प्राण - रहित होने से मर्त्य है । देवता प्रमृत है । अमृत, अमृत को लेता है । पानी से प्रारण उत्पन्न होता है, अतएव पशु के पानी लगा देते हैं । इससे यह अमृतस्वरूप बन जाता है एवं देवता इसे स्वीकार कर लेते हैं । बस, इसीलिए पानी लगाया जाता है -" जीवं वै देवानां हविः श्रमृतं अमृतानाम् । प्रथैतत् पशुं घ्नन्ति यत् संज्ञ-पयन्तिः यद् विशासति । आपो वै प्राणाः । तदस्मिन्नेतान् प्राणान् दधाति । तथैतज्जीवमेव देवानां हविर्भवति - प्रमृतं प्रमृतानाम् " ॥ ४ ॥

पानी क्यों लगाना चाहिए? - इसकी उपपत्ति तो बतला दी । श्रब पत्नी ही क्यों लगाती है? हे जो ही ऋत्विक् पानी लगा देता? इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-" अथ यत् ( यस्मात् ) पत्न्युपस्पृशति - ( तदुच्यते ) " । इस पानी से पशु में प्राणाधान करना है, पशु को जीवित करना है - इसे उत्पन्न करना है । उत्पत्ति योषा प्राण के अधीन है । संसार में योषा, उत्पन्न करने वाली होती है, वृषा रेत सिञ्चन करने वाला होता है । योषा से ही प्रजा उत्पन्न होती है । यह यजमान पत्नी योषा है अर्थात् स्त्री है । योषा से ही प्रजा उत्पन्न होती है । यहाँ पर पशु से पानी का पत्नी द्वारा स्पर्श कराते हुए, योषा से ही इस पशु को उत्पन्न करते हैं; अर्थात् प्राकृतिक प्रजनन में स्त्री ही- योषा ही प्रधान है । चूंकि इस पशु का नया प्रज-नन करना है, प्रजनन स्त्री का धर्म है, अतएव इसी के हाथ से पानी का स्पर्श करवाते हैं । ऐसा करते हुए योषा से ही पशु को उत्पन्न करवाते हैं— " योषा वै पत्नी । योषायै वाइमाः प्रजाः प्रजायन्ते । तदेनं ( पशुं )

एतस्यै ( एतस्या योषाया ) प्रजनयति । तस्मात् पत्न्युपस्पृशति " ॥५ ॥

१. ' छा ० उ ० ६।६।५ ' । [ ३६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण क्यों स्पर्श करना चाहिए? एवं किसे करना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर दे दिया गया । अब पद्धति बतलाते हैं । वह पत्नी निम्नलिखित मन्त्र बोलती हुई - पशु के इन्द्रियों के पानी लगाती है । " वाचं ते शुन्धामि " १ ( हे पशो! मैं तुम्हारी वाक् को अर्थात् बोली को पानी से विशुद्ध करती हूँ- बोलने लायक बनाती हूँ ) इससे उसके मुख का स्पर्श करती है -" वाचं ते शुन्धामीति मुखम् । प्राणं ते शुन्धामि " । ( हे पशोनासिका! मैं उत्पद्यमान जो प्राणवायु है - उसे विशुद्ध करती हूँ अर्थात् श्वासाधान करती हूँ ) इस मन्त्र से नासिका का स्पर्श करती है-" प्राणं ते शुन्धामीति नासिके " । " चक्षुस्ते शुन्धामि " हे पशो! तुम्हारे नेत्रों को पवित्र करती हूँ अर्थात् उनमें देखने का प्राण ( ज्योतिसामर्थ्य ) प्रदान करती हूँ । इस मन्त्र से चक्षु का स्पर्श करती है— " चक्षुस्ते शुन्धामीत्यक्ष्यौ ” । श्रोत्रं ते शुन्धामि ( हे पशो! तुम्हारे कानों को पवित्र करती हूँ - अर्थात् सुनने वाले प्राण का अपस्पर्श से प्रधान करती हूँ ) इस मन्त्र से श्रोत्र - स्पर्श करती है— " श्रोत्रं ते शुन्धामीति करणो " " नाभिं ते शुन्धामि ४ ( हे पशु! मैं तुम्हारी नाभि को पवित्र करती हूँ प्रर्थात् नाभि में रहने वाले प्रशनाय शक्तिमान् विष्णुप्राण को प्रतिष्ठित करती हूँ ) इस मन्त्र से नाभि का स्पर्श करती है । कान नाक - मुँह - इनसे प्राणों का तो काम हमें प्रत्यक्ष हो जाता है, परन्तु नाभि - प्राण किस तरह से क्या काम करता है? - उसका पता नहीं लगता । यह प्राण छुपा हुआ है, अतएव इसे " अनिरुक्त प्राण " कहते हैं । ' नाभिं ते शुन्धामि ' से इस नाभिरूप अनिरुक्त - प्राण को ही पवित्र करती हूँ । एवं " मेढ ते शुन्धामि मैं तुम्हारे मेढ़ को पवित्र करती हूं । इस मन्त्र से मेढ़ का स्पर्श करती है नाभि अनिरुक्तप्राण है, अतएव इसे स्पर्श न भी कराया जाए तो कोई हर्ज नहीं है । इसके एवज ' मेढ़ ' ते ' से मेढ़ का ही स्पर्श करा देना चाहिए-" नाभिं ते शुन्धामीति - योऽयमनिरुक्तः प्राणः - मेद्र ते शुन्धामीति । वा पायुं ते शुन्धामि " । १ वा ० सं ० ६।१४ । २ वा ० सं ० ६।१४ । ३ वा ० सं ० ६।१४ । ४ वा ० सं ० ६।१४ । ५ वा ० सं ० ६।१४ । [ ३६० ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणे पशुवा ब्राह्म ( नीचे की ओर रहने वाला जो अपान प्राण है, उसे पवित्र करती हूँ घर्थात् अपान प्राणाधान करती हूँ ) इस मन्त्र से अपान स्थान का स्पर्श करती हैं-" पायुं ते शुन्धामीति योऽयं पश्चात् प्रारण: - ( प्रपान प्राणः ) " । इस प्रकार उस पशु में सब प्रारणों का आधान कर देती है । प्राणाधान से जब वह जीवित जाता है तो प्राहुति द्वारा उसे स्वर्ग में भेजते हैं । अर्थात् - पानी का सम्बन्ध करना, प्राण डालना है । प्राण डाल कर आहुति देना, अमृत की - जीवित की - प्राहुति देना है-" तत् प्राणान् दधाति ।तत् ( तत्र स्वर्गे तं पशु ) समीरयति " । इसके बाद पशु के फैले हुए चारों पैरों को इकट्ठा कर - " चरित्रांस्ते शुन्धामि १ ( चरणशील-विचरणशील- जो तुम्हारे चरित्र हैं - चलने के साधन पैर हैं- चलने की पीड़ा से त्राण करने वाले पैर हैं, उनको पवित्र करती हूँ - अर्थात् - उनमें अपने बल पर प्रतिष्ठित रहने का प्रारणाधान करती हूं - इस मन्त्र से उन पर पानी डाल देती है । क्या पशु - क्या पक्षी - क्या मनुष्य, पैरों से ही प्रतिष्ठित रहता है । पशु को प्रतिष्ठित करने के लिए ही पैरों में पानी लगाया जाता है । इस प्रकार पानी लगा कर इसे प्रतिष्ठित करते हैं-" अथ संहृत्य पदः ( पादानेको कृत्य ) - चरित्रांस्ते शुन्धामि इति । पद्भिर्वै प्रतिष्ठिति । प्रतिष्ठित्या ( त्यै ) एव - ( चरित्राण्युपस्पृशति ) - तदेनं प्रतिष्ठा-पयति || ६ || इस कर्म्म के करने के बाद पात्र में जो पानी बच जाता है, वह यदि श्राधा हो अथवा जितना हो अर्थात् - स्पर्श - कर्म करने से पहले इस पात्र में जितना पानी था, स्पर्शकम्मनिन्तर आधा बच गया है अथवा जितना बचा हो उस उपविष्ट पानी से यजमान और यजमान पत्नी दोनों पशु के मस्तक के अग्रभाग से प्रारम्भ कर पृष्ठ तक सब उसे सींच देते हैं । यजमान सींचता है, पत्नी उसके दक्षिण हाथ में अपना हाथ डाले रहती है । तात्पर्य यही है कि पहले तो पत्नी इन्द्रियों के ही पानी लगाती है । इसके अनन्तर सारे शरीर में प्राण डालने के लिए बाकी बचे हुए पानी को दोनों मिल कर मस्तक से प्रारम्भ कर सारे शरीर पर डाल देते हैं । पशु यज्ञस्वरूप है, यज्ञ बनेगा । यज्ञ भगवान् पूर्णेन्द्र हैं । श्राज यजमान इस सारे यज्ञ में ( पशु में ) प्राण डालना चाहता है, अतएव इसे पत्नी को भी साथ ले लेना चाहिए | इससे यह पूर्ण हो जाता है । पूर्ण से पूर्ण में प्राणाधान हो जाता है । इस प्रकार पतिपत्नी दोनों इसके सारे शरीर में प्राण डाल कर इसे स्वर्ग में पहुँचाते हैं । इसे पृथिवीलोक से आहुति द्वारा दिव्यलोक में भेजते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं -१ वा ० सं ० ६।१४ । [ ३६१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवंपा ब्राह्मणं " अथ या श्रापः परिशिष्यन्ते - अर्द्धा वा, यावत्यो वा । ताभिरेनं यज-मानव ( यकारात् यजमान पत्नीच ) शीर्षतोऽग्रेऽनुषिञ्चतः । तत् प्रारणांश्चे-वास्मिंस्तत्तौ धत्तः । तच्चैनमतः ( पृथिवी लोकात् ) समीरयतः ॥७ ॥

इस पशु को जब संस्थापित करते हैं - गति शून्य करते हैं - प्रतिष्ठित करते हैं - अर्थात् आलम्भन ( वध ) करके उसे सदा के लिए समाप्त करते हैं । ऐसा करते हुए ये ऋत्विक् लोग क्रूर कर्म्म करते हैं । पशु का असे प्रलम्भन करना क्रूर कर्म्म करना है । जिस समय पशु पर शस्त्रप्रहार किया जाता है, उस समय उसके सारे प्रारण विशकलित हो जाते हैं । सब का जोड़ खुल जाता है, एवं उस पशु के छिन्न-मस्तक शरीर में से एक क्रूर विद्युत् निकलता है । पानी शान्त करने वाला है । विद्युत् की उग्रता का दमन कर देता है । यदि प्रापका शरीर मारे क्रोध के थरथर काँप रहा है तो एक गिलास पानी पीजिए-अभी शांति हो जाएगी । इस प्रकार एक तो इसमें यह गुण है । दूसरा गुण सबसे बड़ा भारी यह है कि पानी बिखरी चीज को मिला देता है । जो बालूरेत हाथ में लेते ही बिखर जाती थी, प्राज पानी के मिश्रण के कारण वही पिण्ड रूप में परिणत हो रही है । होंठ में पानी डाला नहीं कि उसके विशकलित परमाणु मिले नहीं । इस प्रकार क्रूर भाव को शान्त करना एवं बिखरे को मिलाना - पानी के ये दो काम हैं । यहाँ पर मारने से क्रूर भाव उत्पन्न हो गया है एवं प्रारण अलग हो गया है, अतएव पानी डाला जाता है । पानी डाल कर पानी की शान्ति से इस पशु के क्रूर भाव को भी शान्त कर देते हैं, एवं मारने से जो प्राण अलग हो गए थे, उन्हे भी जोड़ देते हैं-" तद्यत् क्रूरीकुर्वन्ति - यदास्थापयन्ति । शान्तिरापः । तदद्भिः शान्त्या शमयतः । तदद्भिः, संधत्तः ॥८ ॥

क्यों पानी सींचना चाहिए? इसकी उत्पत्ति बतला दी गई, अब पद्धति बतलाते हैं-वे दोनों ( यजमान - यजमानपत्नी ) -" मनस्त प्राप्यायतां, वाक्त आप्यायतां, प्राणस्तऽश्राप्यायतां, चक्षुस्त s श्राप्यायतां, श्रोत्रं त आप्यायताम् " । ( वा ० सं ० ६।१५ ) यह मन्त्र बोलते हुए मस्तक की ओर से उस पानी से पशु को सींच देते हैं । १- मन, २- प्राण, ३- वाक्, ४ चक्षु, ५ श्रोत्र - मस्तक - ये पाँच प्राण रहते हैं । प्रतएव मन्त्र में इन्हीं पाँचों का ग्रहण है । इस प्रकार मन्त्रपूर्वक पानी सींचते हुए दोनों इसमें प्राणाधान करते हैं । प्राणाधान कर इसे स्वर्ग में भेजते हैं । पानी डाल कर अन्त में दोनों ही बोलते हैं-" यत्ते क्रूरं तत्त प्राप्यायताम् " । ( वा ० सं ० ६।१५ ) [ ३६२ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 409 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण तुम्हाराजो ' क्रूर भाग है अर्थात् प्रस्थित भाग है - मारने से तुम्हारा जो हिस्सा खतम हो गया है - प्रर्थात् निकल गया है, वह इस प्रापोमय प्रारण से फिर भर जाए- प्रर्थात् विशकलित प्राण संहत हो जाए-" तत् प्रारणात् धत्तः । तत् समीरयतः " । " यत्ते क्रूरं तत्ते श्राप्यायताम् " का साथ ही में अर्थ बतलाते हुए कहते है- " यत्ते क्रूरं तत्ते प्राप्या-यताम् ' का साथ ही में अर्थ बतलाते हैं— " यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्ते - आप्यायताम् निष्ट्यायताम् - ( संहतं भवतु ) " ॥ ॥ पूर्वोक्त मन्त्र का शेष भाग बतलाते हैं - ' तत्ते शुध्यतु ' । तुम्हारा जो निष्ठित अपवित्र भाग है, वह शुद्ध हो जाय । ऋत्विक् लोग जो इसका प्रलम्भन करते हैं, वह क्रूर कर्म करते हैं । पानी क्रूरता को शान्त कर देता है । बस उसी पानी की शान्ति से उस क्रूरता का शमन करते हैं; एवं जो उसके प्रारण निकल गए थे उनका संधान करते हैं— सबसे बड़ा भारी प्रयोजन तो यही है कि इसे मेध्य बनाते हैं । पानी मेध्य है, इसके सम्बन्ध से यह पशु भी मेध्य बन जाता है-" तद्यत् क्रूरीकुर्वन्ति - यदा स्थापयन्ति । शान्तिरापः । तदद्भिः शान्त्या शमयतः । तदद्भिः सन्धत्तः । तत्ते शुध्यतु । तन्मेध्यं कुरुतः " । इसके बाद उसी मन्त्र का शेष भाग बोलते हैं - ' शमहोभ्यः ' इति । दोनों के लिए इस पशु का आलम्भन कल्याणकारी हो । यह कह कर उस पशु को श्राहवनीय के पश्चिम भाग से उत्तर की ओर ले

श्राते हैं-" शमहोभ्यः - इति । जघनेन पशुं निनयतः ॥१० ॥

" शमहोभ्यः " का अर्थ बतलाते हैं । यहाँ पर जो इसका आलम्भन करते हैं - वह क्रूर कर्म्म करते हैं । मारने से उस मृत पशु के शरीर में से एक ऐसा क्रूर विद्युत् निकलता है जिससे सारा वाता-वरण क्षुब्ध हो जाता है । इस क्षोभ का असर यजमान के आत्मा पर पड़ता है । उस असर को ही ' शमहोभ्यः ' इस मन्त्रशक्ति से हटाते हैं । यजमान के जो अहोरात्र हैं, वे शान्त उसके दिन अच्छे बीतें । उसका जीवन इस क्रूर विद्युत् से प्रशान्त न हो जाय, ' शमहोभ्यः ' कहा गया है । इस प्रकार -" मनस्त श्राप्यायतां - वाक्त आप्यायतां, प्रारणस्त आप्यायतां चक्षुस्त आप्यायतां श्रोत्रं तत्प्राप्यायताम् । यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्तत्प्राप्यायतां निष्ट्या-यताम् । ( निःशेषेण श्राप्यायताम् ) - तत्ते शुध्यतु - शमहोभ्यः " । ( वा ० सं ० ६।१५ ) [ ३६३ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुवा ब्राह्मण इस मन्त्र से यजमान श्रौर यजमान पत्नी दोनों उस पशु के मस्तक का सिञ्चन कर देते हैं । एवं उसको वेदि के पश्चिम भाग से हो कर उत्तर में ले जाते हैं-" तद्यत् क्रूरीकुर्वन्ति - यदास्थापयन्ति । नेदेतदनु- ( पशुमनु ) प्रशान्तान्य-होरात्राण्यसन इति । तस्माच्छमहोभ्य इति । जघनेन पशुं निनयतः ॥११ ॥

अभी तक पशु का प्रलम्भन मात्र किया है, चर्म नहीं खींचा है । अब चर्म्म खींचते हैं । इसके लिए उस पशु को सीधा कर देते हैं । उसे चित कर देते हैं । चारों पाँव ऊपर कर उसके चर्म को काटते हैं--" अथोत्तानं पशुं पर्य्यस्यन्ति " - इति । जिस जगह इस पशु के चर्म को उतारने के लिए पहले - पहल छुरा लगाया जाएगा, उस स्थान पर ' श्रोषधे त्रायस्व ' " यह बोलते हुए उस जगह एक तृरण रख देते हैं । जिस जगह तलवार का प्रहार करेंगे, उस जगह तलवार और पशु के बीच में तृरण रख देते हैं । यह जो तलवार है - यह वज्र है- अर्थात् चोट करने वाली है, पीड़ा पहुंचाने वाली है, आग्नेयी है! ' ओषधेत्रायस्व ' कह कर बीच में तृण रख देने से यह वज्ररूप असि पशु की हिंसा नहीं करती है । बात असल में यह हैं कि देवता लोग अमृत भाग को खाते हैं, मर्त्यभाग को नहीं खाते । श्रतएव इस पर पानी डाल कर प्रारणाधान किया गया है । अब खाल खींचने के लिए इसे फिर काटा जाएगा । ऐसी अवस्था में - इसके प्रारण के फिर निकल जाने का भय रहेगा । इस दोष को हटाने के लिए बीच में तृण रख कर ऐसी भावना कर ली जाती है कि यह तलवार तो तृण को काटती है न कि पशु को । ऐसी भावना से पशु में प्राहित प्राण फिर उत्क्रान्त नहीं होते — " स तृणमन्तर्द्दधाति - श्रोषधे त्रायस्वेति । मेष वो s सि हिनस्ति " । वज्ञो वाऽप्रसिः । तथो हैन-इसके बाद उस पशु के एक नियत स्थान पर उस छुरे को " स्वाधिते मैनं हिंसी: " बोलते हुए रखते हैं । ' हे छुरे! तुम इस पशु को मत मारो - यही इसका अर्थ है । यह असि वज्र है । ' स्वधिते! मैनं हिंसी: ' इस मन्त्र शक्ति से एवं प्रहिंसा की भावना से है । जिस जगह से पशु को काटा जाएगा, उस जगह पहले अभिनिदधाति " का यही तात्पर्य है -यह वज्र उस पशु के प्राणापहरण नहीं करता छुरे से निशान बना लिया जाता है - " असिना " असिनाभिनिदधाति - स्वधिते मैनं हिसीरिति ( मन्त्रेणेति शेषः ) वज्रो-वासिः । तथो हैनमेष वज्रोऽसिर्न हिनस्ति " ॥१२ ॥

१ ' वा ० सं ० ६।१५ ' । २ ' वा ० सं ० ६।१५ ' | [ ३६४ ]