Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 411–420
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 411–420
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) वा ० सं ० ६।१६ | १ शतपथ ब्राह्मण पशुपा ब्राह्मण [ ३६५ ] जिस जगह छुरे से निशान बना लेते हैं, उसी प्रज्ञात श्राश्री: ( कोर ) में छुरा प्रविष्ट करते हैं-अर्थात् " स्वधिते! मैनं हिंसी: " इस मन्त्र से प्रारी से पशु के शरीर के जिस भाग पर निशान कर लिया जाता है- पहले - पहल उसी स्थान को काटना चाहिए । क्यों कि निशान की हुई जो कोर है, वही यजुष्कृता है - अतएव मेध्या है | अर्थात् यह निशान ' स्वधि ' मन्त्र से किया गया है, अतएव वह अत्यन्त पवित्र है । अतः पहले वहीं से काटना प्रारम्भ करना चाहिए । " सा या प्रज्ञाताश्रिः - तयाभिनिदधाति । सा हि यजुष्कृता मेध्या " । हमने बतलाया था कि पशु और असि के बीच में एक तृण रख दिया जाता है । जिस समय उस स्थान पर असि प्रहार किया जाता है, उस समय उस तृण के भी दो खण्ड हो जाते । इन दोनों खण्डों में से वह श्रध्वर्यु - उस बहितृण के अग्र भाग को तो बाएँ हाथ में उठा लेता है, एवं जो मूल का ग्रन्थि-भाग होता है, उसे दाहिने हाथ में उठा लेता है— " तद्यदग्रं तृणस्य - तत् सव्ये पारणौ कुरुते । अथ यद् बुध्नं तद्दक्षिणेना-दत्ते " - इति ॥१३ ॥
वह अध्वर्यु जिस समय प्रज्ञाताश्रिः ( निशान की हुई कोर ) पर तलवार का प्रहार करता है - च का छेदन करता है - उस समय उस स्थान से रुधिर निकल पड़ता है । दाहिने हाथ में रक्खा हुआ जो तृण है - उसे उस निकले हुए रुधिर में दोनों ओर से डुबो देता है । खून निकलते ही दाहिने हाथ वाले तृण के • भाग को और मूल भाग को " रक्षसां भागोऽसीति " १ यह मन्त्र बोलते हुए उसे खून से सराबोर कर लेना चाहिए - यही तात्पर्य है । " स- यत्राच्छ्यति - ( श्राच्छिनत्ति तत्र प्रदेशे ) यत लोहितमुत्पतति - तत् ( तत्र ) ( मूल तृरणस्य - दक्षिणस्थ तृरणस्य ) उभयतः ( मूलमग्राँच ) अनक्ति । रक्ष भागोऽसीति ( मन्त्रेण ) " । अन्तरिक्ष की वायु में नाष्ट्रा राक्षस घूमा करते हैं । एक प्रकार का ऐसा तमोमय प्रारण होता है जो अग्नि का विरोधी होता है । वह सारे आकाश में भरा रहता है । जहाँ अग्नि की प्रबलता नहीं रहती, वहाँ पर यह आसुर राक्षस प्राण अपनी सत्ता जमा लेता है । रुधिर जब तक शरीर के भीतर रहता है, तब तक तो उसमें वैश्वानराग्नि की प्रबलता रहती | अतएव जब वह रुधिर शरीर से बाहर निकल जाता है तो उसमें आसुर भाव घुस पड़ता | हमारे माथे में जो बाल है - माथा ही नहीं अपितु सारे शरीर ही को लीजिए - शरीर के सारे बाल गला हुआ खून ही है । रोमावलियों द्वारा खून बाहर निकलता है | निकलते हुए खून पर बाहर का आसुर - भावमय सूखा वायु धक्का मारता है । उससे उतना
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण खून जम कर काला पड़ जाता है, वही बाल एवं रोमावलियाँ कहलाती हैं । चूंकि यह प्रासुर प्रारण प्रविष्ट. रुधिर है, अतएव बाल अत्यन्त अपवित्र वस्तु मानी जाती है । प्रकृत में हमें यही कहना है कि पशु का बाहर निकला हुआ जो रुधिर है, वह श्रासुर प्रारण संसर्गात् उन्हीं की वस्तु बन जाता है । अतएव ' रक्षसां भागोऽसि ' कहा है | बाहर निकला हुआ खून राक्षसों का हिस्सा है । देवता खून की आहुति नहीं लेते । असुर - पृथिवी की चीज है, देवता सूर्य्यं की वस्तु है । पृथिवी दक्षिण में है । अतएव दोनों तृणों में से जो दाहिना तृण था उसे ही दोनों प्रोर से रुधिर में डुबोते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" रक्षासां ह्येष भागो - यदसृक् " ॥ १४ ॥
जब उस दक्षिण तृण को रुधिर से डुबो दिया जाता है तो तदनन्तर - यजमान " इदमहं रक्षोऽभि-तिष्ठामि " यह मन्त्र बोलता हुआ उसे लांघ जाता । इस समय मैं निदान द्वारा तृणव्याज से इस असुर का अतिक्रमण करता हूं । प्रसृङ्मय तृण वास्तव में असुर है । उसे उलांघना असुर को ही उलां-धना है । फिर उसी मन्त्र का शेष बतलाते हैं-" इदमहं रक्षोऽवबाधे - इदमहं रक्षोऽधमन्तमो नयामि - इति " । ( वा ० सं ० ६।१७ ) इस आक्रमण से मैं असुर को दोनों ओर से परिच्छिन्न ( ससीम ) बनाता हुआ इसे यज्ञ में आने से रोकता हूं । एवं इसका जो अपना तमोमय- घोर अन्धकारमय तमोलोक है - उसमें भेजता हूं । यजमान जिस समय तृण को उलांघता है, उस समय उस तृरण पर यजमान की छाया पड़ती है । छाया में तमोमय श्रासुर प्राण रहता है । छाया श्रासुर पुरुष है । छाया में उसे करना - गोया असुर को दिव्यलोक से हटा कर अन्धकार में भेजना है । छाया - सुर पुरुष है - प्रतएव श्रुति कहती है-" छाययेव वाऽयं पुरुषः पाप्मनानुषक्तः " - इति । ( शत ० ब्रा ० २२ | ३ | १० ) छाया से अन्धकार ही उपलक्षित है । इस प्रकार इस मन्त्र से वह यजमान असुर राक्षसों को यज्ञ से बाहर निकालता है । यह तृण दोनों ओर से अमूल रहता है- अर्थात् वृक्षवत् इस कटे हुए दक्षिण तृण में दोनों ओर पकड़ नहीं रहती । तृण दोनों ओर से अमूल रहता है - इसका कारण बतलाते हैं-" तद्यदमूलमुभयतः परिच्छिन्नं- ( तस्य कारणमुच्यते ) " । प्रकृति - मण्डल में इधर पृथिवी से - उधर द्यु से - उभयतः परिच्छिन- परन्तु श्रमूल ( बेजड़ - ऋत ) सुर- प्राण आकाश में विचरा करता है जैसे कि यह मनुष्य दोनों ओर से परिच्छिन्न किन्तु अमूल इधर-उधर विचरता रहता है । प्रकृति में असुर की स्थिति इस प्रकार है । वह श्रमल है एवं उभयतः परिच्छिन्न [ ३६६ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुवपां ब्राह्मण है, अतएव असुर स्थानापन्न वृरण को अमूल ही रखते हैं । एवं इधर से उधर उलांघ कर प्रकृतिवत् इसे उभयतः परिच्छिन्न कर दिया जाता है --" तदुपास्याभितिष्ठति इदमहं रक्षोऽभितिष्ठामि इदमहं रक्षोऽवबाधे, इदमहं रक्षो s धमन्तमो नयामि --- इति । तद्यज्ञेनैवैतद् नाष्ट्रा रक्षांस्यवबाधते । तद्यदमूलमुभयतः परिच्छिन्नं ( तदुच्यते इति शेषः ) । प्रमूलं वाऽइदमुभयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति - यथायं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्त-रिक्षमनुचरति । तस्मादमूलमुभयतः परिच्छिन्नं भवति " ॥१५ ॥
इस प्रकार मन्त्रपूर्वक पशु के चम्म को उतार कर सबसे पहले पशु की वपा को खींचते हैं-निकालते हैं, जिसे चर्बी कहते हैं - जो कि हृदय का मेद कहलाता है - उसे ही ' वपा ' कहते । इसे ही ' वसा ' कहते हैं । व्यवहार में इसे घी भी कहा करते हैं । यह वपा बिलकुल सफेद झिल्ली होती है । शरीर में सबसे ज्यादा बलिष्ठ ताकतवर यही वपा है । वपां हृदय का मेद है । प्रतएव कोशकार कहते हैं- " हृन्मेदस्तु वपा वशा " - इति । सबसे पहले इस वपा की ही आहुति दी जाएगी - प्रतएव पहले उसे ही निकालते हैं-" थ वपामुत् खिदन्ति " । दो पापणी लकड़ियाँ उत्तरावेदि के पास ला कर रख देते हैं । एक - एक प्रादेश की श्रीपर्ण वृक्ष की दो लकड़ियाँ होती हैं । श्रीप को " कार्य " भी कहते हैं । जैसे काष्ठ के चक्र पर चर्म मंढ कर ढोल बनाया जाता है, तथैव इन दोनों लकड़ियों पर इस वपा को मंढ दिया जाता है और फिर लकड़ियों को हाथ में रख कर शामित्रशालास्थ उल्मुकाग्नि से तय्यार किए गए कोयलों में इसे पकाया जाता है । चूंकि इन दो लकड़ियों से वपा को पकाया जाता है, अतएव इन्हें " वपाश्रपणी " कहा जाता है । श्राज उन वपाश्रपणियों का काम पड़ता है । वपा को निकाल कर अध्वर्यु उस वपा से उन दोनों पारियों को मंढ देता है, एवं साथ ही मन्त्र बोलता है-" घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथाम् " । ( वा ० सं ० ६।१६ ) ये दोनों पापणियाँ पृथिवी और द्युलोक - स्थानीय हैं, एवं यह वपा साक्षात् घृत है । इसी अभिप्राय से कहते हैं - हे द्यावापृथिवी! प्राप इस वपाघृत से पूर्ण हो जाइए । जैसे उपासना -- काण्ड में दृष्टि रहती है प्रतिमा पर भावना रहती है व्यापक सच्चिदानन्द पर, ठीक इसी प्रकार यहाँ पर भी दृष्टि रहती है इन पदार्थों पर, भावना रहती है प्रकृति पर दोनों लक-१ ' उक्त प्रसंग का विस्तार से विवेचन इसी ग्रन्थ के ' वैसर्जन ब्राह्मण ' नामक प्रकरण में देखना चाहिए । [ ३६७ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं पशुत्रा ब्राह्मण ड़ियों से द्यावापृथिवी की ओर इशारा है । इस मन्त्र से द्यावापृथिवी को ऊ रस से युक्त करते हैं । जैसे दधि, पृथिवी लोक की वस्तु है, मधु - द्युलोक की वस्तु है - तथैव घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है । इसी की नकल यहाँ पर है । एक लकड़ी पृथिवी है, दूसरी द्यौ है । बीच के खाली अन्तरिक्ष में वपा है अर्थात् घृत है । इस वपा का असली स्वरूप पूछना चाहो तो यह ' ऊ ' रस ही है । ऊ एक बलप्रद रस होता है । जिससे शरीर में स्फूर्ति रहती है । यह अन्तरिक्ष की वस्तु है । अतएव शरीर- त्रिलोकी का जो हृदयाकाश है - प्रन्तरिक्ष है, उसी में यह ऊ रस प्रतिष्ठित होता है । इस मन्त्र से - इस वपा से द्यावापृथिवी को, पूरा करना - ऊ रस से भरना है । जब द्यावापृथिवी ऊ रस से भर जाती है तो इससे सारी प्रजा उत्पन्न होती है । परन्तु उनमें ऊ रस होगा तब न वह हमारे पास आएगा? श्रतएव पहले उसमें ऊ रस भर दिया जाता है । इससे वे रसवती - उपजीवनीया बन कर सारी प्रजा का जीवन रखती हैं । देवता परोक्षप्रिय होते हैं, वे छुपे पर्दे से बात करते हैं । इस प्रपश्व में भाव यह छुपा हुआ है कि संसार के जितने भी मनुष्य हैं, उन सब का निर्माण द्यावापृथिवी के रस से होता है । यदि नीचे से वह रस न जाएगा और न ऊपर से ही आएगा तो एक दिन सारी द्यावापृथिवी रस - शून्य हो जाएगी । अतएव यज्ञ द्वारा वैध उपायों से हमें वपादि की आहुति देकर उसे पूरा करना चाहिए । प्रतएव श्रुति में बार-बार " इतः प्रदानाद्धिदेवा उपजीवन्ति " यह लिखा रहता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अथ वपामुत्खिदन्ति । तया वपाश्रपण्यौ प्रोणौति - घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथाम् इति । तदिमे द्यावापृथिवी s ऊर्जारसेन भाजयति । अनयोरूर्जं रसं दधाति । ते रसवत्या उपजीवनीये - इमाः प्रजाः उपजीवन्ति ॥ १६ ॥
हमने बतलाया था कि यह वपाश्रपणी " काय्र्यमयो " होती है । अर्थात् भद्रपर्णी - ( श्रीपर्णी-कुम्भी ) की लकड़ी की वपाश्रपणी होती है । और किसी लकड़ी की न बना कर इसी की वपाश्रपणी क्यों बनाई जाती है? - इसका कारण बतलाते हैं-संसार में जितनी भी वनस्पतियाँ हैं, वे सूर्य से उत्पन्न होती हैं एवं जितनी भी औषधियाँ हैं, वे चन्द्ररस से उत्पन्न होती हैं । यद्यपि दोनों का रस शामिल रहता है, परन्तु वनस्पतियों में सौर- रस प्रधान है, श्रौषधियों में चन्द्र - रस प्रधान है । आप किसी एक श्रौषधि के बीज को हटा लीजिए, आपको उसमें दो हिस्से दो टुकड़े मिलेंगे । उन दोनों टुकड़ों के बीच में एक बिलकुल पतली सी नलिका होती है, यही मेरुदण्ड कहलाता है । इसी द्विदलयुक्त बीज को ' स्तम्ब ' कहा करते हैं । ' ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त में इसीका ग्रहण है । पीपल के पत्ते के बीच में जो श्राप एक सीधा डंठल देखते हैं, वही यह मेरुदण्ड है । बीजावस्था में वह बिल्कुल सूक्ष्मातिसूक्ष्म होता है एवं पोला होता है । एक छोटी सी लट को लीजिए | उसके बीच में भी आप को एक पतली सी रेखा मिलेगी - वह उसी का मेरुदण्ड है । मनुष्य के पृष्ठ - भाग ' में ग्रीवा से गुदापर्य्यन्त जो दण्ड है, वही मेरुदण्ड है । संसार में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं जिसमें मेरु - दण्ड न हो । क्यों कि प्राणिमात्र की सृष्टि मेरुदण्ड से ही होती है । पृथिवी के बीच का जो पूर्वापरवृत्त है, वही मेरुदण्ड है । इक्वेटर को ही मेरुदण्ड कहते हैं । इसी से सब उत्पन्न होते हैं । अस्तु, [ ३६८ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) १ शत ० ब्रा ० ६।३।२८ | 1 शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण [ ३६ ] कहना हमें यही है कि उस बीज में दो पत्ते रहते हैं - एक दण्ड रहता है । वह नलिका बिल्कुल पोली होती है । बीज का स्वरूप प्रापने समझ लिया होगा । अब आप इसे जमीन में गाड़ दीजिए और पानी से सींच दीजिए । वह सिंचा हुआ पानी और उस स्थान की मिट्टी दोनों घिलमिल हो जाएँगे । सूर्य्य अपनी किरणों से हर वक्त पानी खींचा करता है । बीज के बीच में जो पोली नलिका है उसमें वह सूर्य-रश्मि प्रविष्ट होती है एवं उस पानी को ऊपर खींचती है । पानी मिट्टी के साथ घुला रहता है अतएव पानी के साथ मिट्टी भी ऊपर चढ़ती है । परन्तु चूंकि मिट्टी पृथिवी की चीज है, अतएव वह अधिक दूर नहीं जा पाती । पृथिवी के आकर्षण से वह बीच में ही रह जाती है और पानी ऊपर निकल जाता है । बस, बीज से बाहर निकली हुई जो मिट्टी है, वही अंकुर कहलाता है । श्राप उसमें फिर पानी डालिए, फिर सूर्य्य उसे खींचेगा, फिर मिट्टी ऊपर चढेगी, वही एक पत्ता हो जाएगा । बस, इस प्रकार पानी डालते जाइए, मिट्टी ऊपर चढती जाएगी, वही एक वृक्ष बन जाएगा । सौर प्रारण का नाम देवता हैं । सूर्य उत्तर में अभिजित् के पास माना जाता है । उत्तरस्थ सौरप्रारण इस पानी को ऊपर खींचते हैं । यद्यपि खींचते वे पानी और मिट्टी दोनों को ही हैं, परन्तु पानी खिंच आता है और ठोस मिट्टी का हिस्सा नीचे गिर पड़ता है । पार्थिव आकर्षण के कारण वह ऊपर नहीं जाता है । सूर्य्य रश्मियाँ पानी मात्र को ले जाती हैं - मेध भाग यहीं रह जाता है । वही मेध यह वृक्ष बना हुआ है । संसार की जितनी भी औषधि वनस्पति हैं, वे सब देवताओं की पकड़ से गिरा हुआ मेध है, अर्थात् मिट्टी है । चूँकि -देवतानों के खिंचाव से गिरा हुआ जो मेध ( मिट्टी ) है, उससे ये श्रौषधियाँ बनी हैं । ऋत और सत्य - ये दो ही प्रधान तत्त्व माने जाते हैं । सत्य, देवता को कहते हैं, ऋत पशु को कहते हैं । सत्य अन्नाद है, ऋत अन्न है । भोग्य वस्तु का नाम ही पशु है । पशु - प्राण का नाम पूषा - प्राण है । पृथिवी का जो प्राण है, वह पूषा है । अतएव " इयं ( पृथिवी ) वे पूषा १ यह कहा जाता है । पशव्य प्राण का नाम पूषा है । यच्चयावत् पार्थिव पदार्थों को उत्तर में रहने वाले सौर प्रारणदेवता चूसा करते हैं । पार्थिव पदार्थ उन देवताओं के भोग्य हैं, अतएव पार्थिव पदार्थों को हम ' पशु ' कहने के लिए तय्यार हैं । श्रौषधि वनस्पति भी इसी पशु की गणना में श्रा जाती हैं । औषधि वनस्पति भी प्रारण देवताओं की पशु हैं । देवता- लोग ( सौर रश्मि ) जब इनका प्रालम्भन करते हैं अर्थात् इनकी सत्ता पृथिवी पर से उखा ड़ना चाहते हैं - इन्हें दिव्य - लोक में ले जाना चाहते हैं तो इनका सार भाग यहीं रह जाता है । पानी चला जाता है, मिट्टी रह जाती है । यही वृक्ष वनस्पति बने हुए हैं । चूँकि खिंचाव करते समय जो बाकी बच गया था, उनसे ये बने हैं, अतएव इन्हें ' कामर्थ्य ' कहा जा सकता है । यद्यपि संसार के यच्चयावत् वृक्ष ' काय ' हैं, परन्तु यह ' भद्रपर्णी ' सबसे मजबूत है - सबसे कठिन है, अतएव इसी का नाम ' कार्य ' हो गया है । प्राण - देवता पशु का प्रालम्भन करते हैं - प्रर्थात् सौर - रश्मियाँ औषधियों को ऊपर खींचती हैं । औषधि वनस्पति प्राणिमात्र का उपलक्षण है । अतएव ' पशुमाभिरे ' कहा है । खींचने से जो पार्थिव भाग है, वह नीचे रह जाता है । इसी को ' मेघ ' कहते हैं । मेध का अर्थ है - मिलने वाला घुलने वाला ।
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण यह मिट्टी पानी से मिल जाती है, अतएव इसे मेघ कह सकते हैं । वपा भी मेध है । क्योंकि वपा पार्थिव भाग है, वपा भी मेध है । ऐसी अवस्था में इसके साथ कार्ष्म का सम्बन्ध करना - वपा को समृद्ध करना है । दो सजातीय वस्तुओं को यदि मिला दिया जाता है तो उनमें अधिक बल आ जाता है । मेघ - बहुत ही कठिन उनका अधूरापन हट जाता है, एवं वह पूरी हो जाती है । चूँकि भद्रपर्णी नाम का ही वपा-है, अतएव इसे मिला देने से पशु - वपा सर्वात्मना समृद्ध हो जाती है । बस, कार्यमयी याज्ञवल्क्य श्रपणी क्यों होती है? - इसकी यही उपपत्ति है - इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् कहते हैं—" कामय्यौ वपाश्रपण्यौ भवतः । यत्र वै देवाः ( सौर रश्मिरूपाः प्राण देवा: ) अग्रे ( वनस्पति- मनुष्य पशु पक्ष्यादि स्वरूप निर्माणात् प्राक् -बीजावस्थायाम् - अङ्कुरोत्पत्ति काले वा ) पशुमालेभिरे - तत् ( तत्र ) उदीचः कृष्यमाणस्य ( पशोः ) श्रवाङ्मेधः पपात । स एष वनस्पतिरजायत ॥ कृत्स्नं तद्यत् कृष्यमाणस्यावाङपतत् तस्मात् कार्ष्मर्थ्यः । तेनैवैनमेतन्मेधेन समर्धयति करोति । तस्मात् कार्य्यमय्यौ वपाश्रपण्यौ भवत इति ॥ १७ ॥
काम ही पाश्रपणी क्यों होनी चाहिए? इसकी उपपत्ति बतला दी गई । वपा एक झिल्ली होती है, जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है । वह हृत् प्रदेश में गुथी रहती है । पहले उसे वपा वहाँ को से कुरेदा जाता है - जब वह ऊपर आ जाती है तो उसे पशु से चीर कर निकाल लेते हैं । उस में मढी हुई उस वपा को चीरता | वपा के दोनों लकड़ियों पर मढ दिया गया । श्रब दोनों लकड़ियों बीच में छुरी डाल कर उसके दो हिस्से कर डालते हैं । वपा का श्राधा हिस्सा एक लकड़ी के लगा रहता है, आधा दूसरी लकड़ी के लगा रहता है-" तां ( तयो वपाश्रपण्योरुपसृतां वपां ) परिवासयति ( छिनत्ति ) । " इस प्रकार उसके दो हिस्से कर के पशु अर्पण करने की जो अग्नि है, उसमें उस छिन्न वपा को पकाते हैं । पशु को जिस समय शामित्रशाला में ले जाया गया था, उसके आगे उल्मुक गया था । उस तपाता है । " व्रतपति ' उल्मुकाग्नि से ही पशु श्रपणाग्नि तय्यार की गई थी । उसी में इस छिन्न वपा को आगे किया जाने कहा है । इसका अर्थ यही है कि उसे दूर से तपा देना चाहिए । इस वपा का परिपाक वाला है, परन्तु जरा तपा देने से इस पशु की वपा यहाँ भी पक जाती है--" तां ( छिन्नां वां ) पशुश्रपणे प्रतपति । तयो हास्य ( पशोर्वपया ) अत्रापि शृता भवति " । उत्तरावेदि से ठीक सीध में उत्तर में शामित्र शाला होती है । एवं उत्तरावेदि से उत्तर किन्तु , उस पश्चिमभाग की ओर नीचे की ओर चात्वाल होता है । वेदि बनाने के लिए मिट्टी खोदी जाती है [ ४०० ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) वा ० सं ० ६।१६ । १ शतपथ ब्राह्मण पशुवपा ब्राह्मण [ ४० १ ] खड्डे को चात्वाल कहते हैं । शामित्रशाला में ही पश्वालम्भन होता है । वहीं वपा निकाली जाती है । वहीं पशुपाग्नि रहता है, एवं वहीं उसे तपाया जाता है । वपा की इस उत्तरावेदि के बीच वाले श्राहवनीय में आहुति दी जाती है । प्रतएव शामित्रशाला में बैठे हुए अध्वर्यु आदि ऋत्विकों को वपा ले कर उत्तरावेदि पर आना पड़ता है । भाने के लिए दो मार्ग हैं । शामित्रशाला से एकदम सीधे मार्ग से भी उत्तरावेदि के पास आया जा सकता है एवं चात्वाल से पश्चिम में हो कर भी आया जा सकता है । दोनों में सिद्धान्त - पक्ष चात्वाल से पश्चिम सश्वर के द्वारा हो कर ही माना है । जैसे पशु ले जाते समय आग्नीध्र आगे - आगे उल्मुक ले गया था तथैव शामित्रशाला से वपा को लाने पर भी आगे - आगे उल्मुक रखना पड़ेगा । इसी अभिप्राय से कहते हैं- श्राग्नीध्र उल्मुक उठाता है, एवं श्राग्नीध्र - अध्वर्यु - होता - यज-मान प्रतिप्रस्थाता - ये सब मिल कर चात्वाल के पश्चिम भाग से उत्तरावेदि के पास आने के लिए चलते हैं ( यन्ति ) । इस प्रकार वहाँ से चल कर चात्वाल से पश्चिम हो कर उस मार्ग से आते हैं - तडप्रायान्ति उस मार्ग को खतम करके वे सब उत्तरावेदिस्थ आहवनीय के पास आ जाते हैं--" पुनरुल्मुकमग्नीवादत्ते । ते जघनेन चात्वालं यन्ति । तत्प्रायन्ति । श्रागच्छन्त्याहवनीयम् " । इसके बाद वहाँ आते ही और - और सब कामों से पहले - अध्वर्यु - बाँए हाथ में रक्खा हुआ जो शुद्ध ( चूंकि दक्षिण हाथ वाला ही प्रसृक् में डुबोया गया था न कि बाएँ हाथ वाला; अतएव हम इसे शुद्ध कह सकते हैं ) तृरण है उसे " वायो वेः स्तोकनाम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ श्राहवनीय में डाल देता है । हे वायो! वपा के ऊपर नाज्याभिघार करते समय उछट कर नीचे गिरे हुए जो घृतबिन्दु हैं - उनका आधारभूत यह तृण हैं, इस तृण को आप उनका आधार समझ लें आहवनीय में तृण डाला जाता है । इसी में aur डाली जाएगी । अतएव वपा पर रहने वाले घृत - बिन्दुनों का यह तृरण आधार बनेगा । अथवा इसका दूसरा अर्थ समझना चाहिए । वपा पर जो घृत - बिन्दु हैं - उनका आधार ग्राहवनीयस्थ तृण है । इसमें आहुत हो कर वह वपाघृत वायु में चला जाएगा क्यों कि घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है; अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता वायु हैं । अतएव वायु से ही प्रार्थना की जाती है कि आप इस तृण को घृतबिन्दुओं का आधार समझें । अथवा विद्धि का अग्निंगमय यह अर्थ समझना चाहिए । हे वायो! आप ही तृण हैं धार जिनका ऐसे स्तोकों को अग्नि के पास पहुँचा दीजिए । अथवा - हे वायो! आप ही इन्हें खा | तत् यही है कि यह तृरण इन स्तोक - बिन्दुओं की समित् है । स्तोकों को वायु में पहुंचाने वाला जो अग्नि है - उसे समिन्धन करने वाला काष्ठ है । इध्म और समित् काष्ठ के दो भेद होते हैं । इध्म पार्थिवाग्नि से सम्बन्ध रखता है । समित् दिव्याग्नि से सम्बन्ध रखता है । इध्म को ही मन्त्र द्वारा दिव्य भाव डाल कर समित् बनवाया जाता है । यह तृण इन स्तोकों का समित् है । तृण डालना - स्तोक के दिव्यलोक में जाने के लिए आहवनीय को प्रज्वलित करना है -
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण " स एतत् तृणं ( सव्ये धृतं तृणाग्रम् ) अध्वर्युराहवनीये प्रास्यति वायो वेः स्तोकानाम् । स्तोकानां हैषा समित् ” ॥ १८ ॥
पा को ले कर आहवनीय से दक्षिण जा कर बैठता है । एवं वहाँ जा कर उत्तराभिमुख हो कर ar की आहुति देनी है । जिस समय यह अध्वर्यु वपा ले कर चात्वाल से पश्चिम हो कर आहवनीय के उत्तर की ओर भाता है, उस समय वहीं से उत्तर भाग से ही खड़ा खड़ा उस वपा को श्राहवनीय में जरा सी तपा देता है-" थोत्तरतस्तिष्ठन् वपां प्रतपति " । उत्तर से दक्षिण में जा कर उत्तराभिमुख हो कर बैठना पड़ता है और वहाँ से बैठे - बैठे ग्राहवनीय में उस वपा की आहुति दी जाती है । यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि जब वपा को शामित्र - शाला में तपा लिया है एवं अब ग्राहवनीय में ही इसकी प्राहुति दी जाएगी तो फिर चात्वाल से उत्तरभाग में आ कर वहीं खड़े - खड़े वपा तपाने की क्या आवश्यकता है? इसी का उत्तर देते हैं--हमने बतलाया है कि चात्वाल से पश्चिम हो कर उत्तरदिक् से श्रा कर आहवनीय के दक्षिण में आता है और वहाँ पर उत्तराभिमुख हो कर, बैठ कर, बाद में उस आहवनीय में वपा को पकाता है । चूँकि प्रतिप्रस्थाता उत्तर से दक्षिण भाग में आ कर आहवनीय में वपा को पकाएगा, ऐसी स्थिति में वह अध्वर्यु अग्नि का प्रतिक्रमण करने वाला हो जाता है । श्राहवनीय अग्नि से उत्तर में हो कर इसे आहव-नीय से दक्षिण में जाना पड़ता है । ऐसा करने से श्राहवनीय का प्रतिक्रमण हो जाता है । कल्पना कर लीजिए, आपने किसी को निमन्त्रण दिया । वह श्रापके घर नियत समय पर श्रा पहुंचा I । परन्तु रसोई में अभी थोड़ी देर है । तो उस समय श्रापका कर्तव्य होगा कि श्राप उसके सामने इलायची, पान किंवा थोड़े से फल वगैर: रक्खें, जिस से कि उसे वहाँ बैठना अखरे नहीं । यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो उसका मन उसी भोजन की प्रोर लगा रहेगा और देर हो जाने से उसके चित्त में क्षोभ हो जाएगा । क्षोभ ही का नाम अशान्ति है । उस प्रशान्ति से भोजन कराने वाले का सारा वायुमण्डल अशान्त हो जाएगा । ऐसा न हो, प्रतएव भोजन से पहले उसका सत्कार करना परम आवश्यक है । इस से उस निमन्त्रित मनुष्य का चित्त सर्वथा शान्त रहता है एवं वह प्रसन्न रहता है । अतिथि की प्रसन्नता में ही यजमान-कुल की प्रसन्नता है । बस, ठीक यही स्थिति यहाँ समझनी चाहिए । इस वपा का परिपाक यद्यपि इसी आहवनीय में किया जाएगा, एवं इसी में वपा की प्राहुति दी जाएगी; परन्तु चूंकि ग्राहवनीयाग्नि प्राण-देवता को मालूम है कि वपा मेरा श्रन्न है, अतएव जिस समय वपा ले कर अध्वर्यु उत्तर भाग से आता है । तो उसे श्राता देख उस प्राण देवता का रुख उसी वपा की ओर हो जाता है । ऐसी अवस्था में यदि वह अध्वर्यु चुपचाप उस वपा को ग्राहवनीय का अतिक्रमण कर सीधा दक्षिण में चला जाएगा तो ग्राह-वनी प्राणाग्नि में अपमानजनक क्षोभ उत्पन्न हो जाएगा । वास्तव में ऐसा होना भी चाहिए, क्यों कि माहवनीय प्राणाग्नि की उस ओर दृष्टि थी कि अध्वर्यु मेरे लिए इस वपा को ला रहा है । परन्तु श्रध्वर्यु उसके सामने से उस का जरा भी सत्कार न कर दक्षिण में चला जाएगा तो इस से उस प्राणाग्नि में क्षोभ [ ४०२ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वपा ब्राह्मण उत्पन्न होगा । इस क्षोभ का असर अध्वर्यु पर पड़ेगा, अध्वर्यु द्वारा यजमान पर पड़ेगा । ऐसा न हो - प्रग्नि का प्रतिक्रमण करते हुए भी अग्नि प्रसन्न न हो इसलिए वपा ले कर उत्तर से प्राता हुआ अध्वर्यु पहले वहीं उत्तर में खड़ा खड़ा उस वपा को जरा सा तपा लेता है । वपा का आहवनीय से सम्बन्ध कर अपने इस भाव को कि " यद्यपि पद्धयत्यनुसार परिपाक दक्षिण भाग में जा कर ही करूंगा परन्तु है यह प्राप ही की वस्तु- मैं प्रापका प्रतिक्रमण सर्वथा नहीं कर रहा हूं " प्रकट कर देता है । अपने अतिक्रमणजन्य अपराध का इस वपा - प्रतापन - कर्म से निहृत्व कर देता है, छुपा देता है - अर्थात् अपराध क्षमा करवा लेता है । ऐसा करने से अतिक्रमण करके जाने वाले मध्वर्यु के श्रात्मा को यह अग्नि पीड़ा नहीं पहुचाता है । वास्तव में वपा - प्रतपन से उसका क्षोभ हट जाता है । बस, चात्वाल से प्रा कर आहवनीय से उत्तर में खड़े - खड़े ही वषा -- प्रतपन इसीलिए किया जाता है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं ---" थोत्तरस्तिष्ठन् वपां प्रतपति । प्रत्येष्यन् वाडएषो ( अध्वर्यु ) ऽग्निं भवति ( श्रग्निमत्येष्यन् भवति ) - दक्षिरणतः परीत्य श्रपयिष्यन् । तस्मा - ( तस्मै -अग्नये ) एवैतन्निनुते । तथो हैनं ( अध्वर्यु ) एषोऽतियन्तमग्निर्न हिनस्ति । तस्मादुत्तरतस्तिष्ठन् वषां प्रतपति " ॥१ ९ ॥ वपा को आहवनीय से दक्षिण में ले जाता है । इसे दक्षिण में ले जाने के दो मार्ग हैं । आहवनीय से पश्चिम में हो कर भी वपा को उत्तर से दक्षिण में ले जाया जा सकता है एवं आहवनीय से पूर्व ( यूप और आहवनीय के बीच ) की ओर से भी वपा को दक्षिण में ले जाया जा सकता है । इन दोनों मार्गों में से पश्चिम की ओर हो कर ले जाना - वेदि के सम्मुख हो कर ( समया ) ले जाना है और आहवनीय से पूर्व में हो कर ले जाना तिरछा ले जाना है, वेदि से बाहर हो कर ले जाना है । इन दोनों में से किस मार्ग में कर वपा को दक्षिण में ले जाना चाहिए इसका निर्णय करते हुए भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं —--“ तामन्तरेण यूपञ्चाग्निं च हरन्ति " | उस वपा को ऋत्विक लोग ग्राहवनीय अग्नि और यूप दोनों के बीच में ( आहवनीय से पूर्व भाग ) से ले जाते है । " प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या " यह सिद्धान्त है । दर्शपूर्णमासप्रकृति है एवं वपादिहोम विकृति है । प्रकृति - यज्ञ में जितनी भी हवियाँ होती हैं उन्हें भी आहवनीय से पश्चिम में कर ही ले जाया जाता है । ' अतएव यहाँ भी उन अन्य हवियों की तरह वपा हवि को भी आहवनीय से पश्चिम वेदि के सम्मुख हो कर ही ले जाना अभीष्ट होता - इसके लिए “ तामन्तरेण यूपञ्चाग्निं च हरन्ति " यह विशेष कहना पड़ा । प्रश्न यहाँ पर एकमात्र रह जाता है, वह यही है कि जैसे ऋत्विक् लोग और और हवियों को आहवनीय से पश्चिम हो कर वेदि से सम्मुख हो कर दक्षिण में ले जाते हैं तथैव यहाँ भी ऐसा ही क्यों न किया जाता है? यहाँ विपरीत करने का क्या कारण है । इसी का उत्तर देते हैं--[ ४०३ ]
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1. तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुवा ब्राह्मण " तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) समया ( साम्मुख्येन यज्ञ सामीप्येन ) न हरन्ति येनान्यानि हवींषि हरन्ति ( तदुच्यते - इतिशेषः ) " । यह वपा अभी कच्ची है । दक्षिण में आ कर वहाँ पर उत्तराभिमुख बैठ कर बाद में पकाई जाएगी । आहवनीय यज्ञ का मुख है । इस आहवनीय के पश्चिम भाग में ही हविर्धानमण्डप है । एवं इस श्राहवनीय के पश्चिम में सदोमण्डप है । सदोमण्डप - यज्ञपुरुष का उदर है । ऐसी अवस्था में श्राहवनीय से पश्चिम में हो कर आना - यज्ञपुरुष के उदर में - कच्चे हवि का प्राधान करना है । यज्ञपुरुष अर्थात् यज्ञ प्राण- देवता आपके हवि को नहीं लेंगे । अपक्व हवि में अग्नि अनुत्वण रहता है । कच्चे हवि में प्रासुर भाव ज्यादा रहता है । अतएव प्राग्नेय देवता उसे कभी नहीं खाते । ऐसी अवस्था में हम इस कच्ची वपा को आहवनीय से पश्चिम में हो कर ( जो कि इस यज्ञ का उदर है ) ले जाएँगे तो हमारी यह वपा व्यर्थ जाएगी, देवता रुष्ट हो जाएँगे । ऐसा न हो - हम कच्ची हवि से यज्ञ को सीधे श्रोर से - उदरं भाग की ओर से युक्त न कर दें, यज्ञ - पुरुष को कच्चे हवि से प्रसक्त न कर दें अतएव श्राहवनीय से पश्चिम मैं हो कर वपा को हर्गिज नहीं ले जाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " नेदभृतया ( वपया ) समया यज्ञं प्रसजामेति " । यहाँ पर प्रश्न हो सकता है कि साहब - यज्ञपुरुष की सत्ता तो यूप तक है । अतः यदि यज्ञपुरुष में कच्चे हवि डालने में कुछ दोष ही समझा जाता है तो फिर यूप से बाहर हो कर हवि को ( वपा को ) जाना चाहिए । आहवनीय और यूप के बीच में हो कर ले जाना भी तो यज्ञ को अपक्व हवि से युक्त करना है । परन्तु ऐसा करते नहीं - यूप के बाहर से नहीं ले जाते । यूप के बाहर से क्यों नहीं ले जाते? जब कि वहाँ तक यज्ञ - सत्ता है - इसका उत्तर देते हैं-" यदु बाह्येन न हरन्ति - प्रग्रेण यूपम् ( तदुच्यते ) " । हमने बतलाया है कि यूप तक यज्ञ सत्ता है । यदि यूप से बाहर उस वपा को निकाल दिया जागा तो वह वपा ' यज्ञिया ' हो जाएगी । यज्ञ से बाहर निकलने के कारण यज्ञिय देवता - उसका स्पर्श भी न करेंगे । अतएव यूप और अग्नि के बीच में हो कर ही वपा लानी चाहि । कदाचित कहो कि फिर तो पूर्वोक्त दोष बना ही रहता है, परन्तु जरा सोचने से यह संशय हट जाता है । आहवनीय, यज्ञ का मुख है । यूप यज्ञपुरुष की शिखा है । ग्राहवनीय का पश्चिम भाग यज्ञ - पुरुष का उदर है । ऐसी स्थिति में आहवनीय के पूर्व से यूप के पश्चिम से ले जाना यज्ञपुरुष के मुख से सामने किन्तु बाहर ही ले जाना है । श्राहवनीय के धागे से ले जाना मुख के सामने से ले जाना है न कि उसके भीतर प्रविष्ट कराना है । एवं पश्चिम भाग की ओर ले जाना तो हवि को उसके पेट में हीं प्रविष्ट करना है । अतः पश्चिम से नहीं ले जाना चाहिए, श्रपितु पूर्व की ओर से ले जाना चाहिए । यूप और अग्नि के बीच में से ले जाने पर यज्ञातिक्रमण भी नहीं होता है एवं कच्चा हवि भी देवता के उदर में नहीं जाता है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-[ ४०४ ]