Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 51–60

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३३ 1 वेदिनिर्माण ब्राह्मण 1 ( ऋग्वेद मं ३ | ३०/२२ ) " तस्य ह प्रजापतेः । अर्धमेव मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ” । ( शत ० १० १।३।२ ) यह कहा जाता है । हमें सृष्टि का विवेचन करना है अतएवं मन, प्राण, वाक् - मय सृष्टि - प्रजा-पति का ही विवेचन करेंगे । इसी सृष्टिसाक्षी प्रजापति के अभिप्राय से ही " अयमात्मा वाङ्मय प्राणमयो मनोमय: " ( वृहद् ० उ ० १, ५, ३ ) - यह कहा जाता है । मन, रूप का जनक है, प्राण, वाक् हैं - वे भी अमृत ही हैं । नाम - रूप - कर्म - मत्यं हैं । इन दोनों से ही संसार का स्वरूप बना हुआ है प्रतएव विश्व को ' बाट कौशिक ' बतलाया जाता है - मन प्रारण वाक् में जो वाक् है वह स्थूल है । यह वाक् प्रारण के आधार पर रहती है । प्राण, वाक् की अपेक्षा सूक्ष्म है । प्राण भी मन पर रहता है । मन अतिसूक्ष्म है । तीनों भिन्न वस्तु हैं । परन्तु तीनों ही अविनाभूत हैं । जहाँ केवल वाक् कहा जाता हो वहाँ मन - प्रारण वाक् समझना चाहिए । बस इसी वाक् से सारी सृष्टियाँ होती हैं । चूंकि अमृत एवं मर्त्य दोनों अविनाभूत रहते हैं अतएव मानना पड़ता है कि इस वाक् में भी दोनों ही हैं । बस, वाक् में जो अमृत - भाग है, उसे अमृतवाक् एवं दिव्या-वाक् कहते हैं एवं मर्त्य - भाग को मर्त्यवाक् - भौतिक- वाक् कहते हैं । अमृतावाक् से दैवतसृष्टि होती है-आकाश ' भी कहा जाता है । चूँकि वाक् दो हैं त • मर्त्यवाक् से भौतिकसृष्टि होती है । इसी वाक् को ' एव आकाश भी मर्त्य - प्रमृत भेदेन दो प्रकार के हो जाते हैं । जो अमृताकाश है, उसी का नाम ' इन्द्र ' है अतएव ' वागिन्द्राः ' ' कहा जाता है । इसी अमृताकाश को - जो कि सारे विश्व में व्याप्त हो रहा है - प्राधु-निक वैज्ञानिक ' ईथर ' कहा करते हैं । इन्द्र ही ईथर है - ईथर से अर्थात् इन्द्र से - अमृतावाक् से-स्थान खाली नहीं है अतएव " नेन्द्राहते पवते धाम किञ्चन " ( ऋग्वेद मं. ६/६ ) – यह कहा जाता जो है । इन्द्र गति - विद्युत - प्रज्ञ - सत्य - श्रात्मा ज्योति - आप- बल रूप हव्यादि भेदेन १४ प्रकार का है । इसमें इन्द्र है वही हमारा वाक् इन्द्र है । इस सारे स्थान में यह श्वा इन्द्र अर्थात् ईथर भरा हुआ अपितु है - सर्वत्र अत-एव ' शुने हित ' व्युत्पत्ति से इस स्थान को शून्य कहा जाता है । शून्य का अर्थ खाली नहीं है - के लिए कहा श्वा इन्द्र भरा हुआ है यही शून्य का अर्थ है । इसी श्वाइन्द्र के लिए - " श्रमृताकाशो " जाता है--" शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ " । सर्वा देवता ' इसी इन्द्र द्वारा अमृता वाक् से दैवत - सृष्टि होती है अतएव ' इन्द्रश्रेष्ठा देवा: -इन्द्रः उत्पन्न होते ( शत ० ३ । ४ । २२ ) - यह कहा जाता है । दूसरा है - मर्त्याकाश- मर्त्यवाक् । इससे मृत्यु की सारे प्रतिष्ठा भूत है - प्रत-। यह भर्त्यावाक् चूँकि उस अमृता वाक् के आधार पर रहती है- अमृत ही हैं परन्तु एव इस मर्त्यवाक् को - भौतिकवाक् को - ' इन्द्र पत्नी ' कहा जाता है । यद्यपि इसके । आधार देवता देवता भूत बिना नहीं साथ ही में यह भी समझ लेना चाहिए कि बिना भूत के देवता भी नहीं रहते हैं रह सकते हैं अतएव कहा जाता है-" वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।

वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता । सानो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी " ॥

( तै ० ब्रा ० २८८४ -५ )

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण सारे प्रपञ्च से हमें यही कहना है कि मन - प्रारण मिश्रित वाक् से ही सारी सृष्टि होती है एवं वह वाक् श्रमृत मर्त्य भेदेन दो प्रकार की होती है । मर्त्यावाक् से भूत उत्पन्न होते हैं - अमृता वाक् से - देवता उत्पन्न होते हैं । बस, देवता और भूत उस प्रजापति की ये दो ही प्रजाएँ हैं । पिण्ड का निर्माण भूत से होता है, बिना भूत के पिण्ड नहीं बनता एवं भूत वाक् ( मर्त्यवाक् ) के बिना नहीं बनते । स्वयंभू-परमेष्ठी सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँचों पिण्ड हैं अतएव इनमें अवश्य ही मर्त्यवाक् की सत्ता माननी, पड़ती है । इसीलिए इन पाँचों मण्डलों को यज्ञ ' क्षर ' बतलाया जाता है । देवता निराकार हैं- प्राण-स्वरूप हैं । इनसे संघटन नहीं होता; संघटन - शक्ति भूत में है श्रतएव मानना पड़ता है कि पिण्ड सृष्टि का उत्पादक ये भूत ही हैं । इन भूतों की जननी वही मर्त्यावाक् है जिसे कि हम ' मर्त्याकाश ' भी कह सकते हैं । वाक्- भूतों की पहली अवस्था है । इस वाक् से अर्थात् मर्त्याकाश से वायु उत्पन्न होता यह श्राकाश ही ग्रन्थियों के कारण वायु बन जाता | जब और बन्धन होता है तो वह वायु अग्नि है बन । जाता है । यदि और अधिक बन्धन होता है तो अग्नि पानी बन जाता है और फिर अधिक बन्धन होता है । तो पानी मिट्टी अर्थात् पिण्ड बन जाता है । इस प्रकार वही आकाश संचार - क्रम से मिट्टी है । प्रत्येक पिण्ड में ये पाँचों चीजें समझनी चाहिए । पिण्ड का जो केन्द्र भाग है - वह मिट्टी है बन जाता चारों ओर अग्नि का मण्डल रहता है । अग्नि मण्डल के चारों ओर वायु रहता है । इसी । उसके " वराह " कहते हैं । इसके ऊपर आकाश का स्तर रहता है । इस प्रकार एक तिल में भी यह वाक् वायु को मौजूद है | एक पहाड़ में भी ये पाँचों संस्थाएँ मौजूद हैं । अतएव ' पाङ्क्तो वै यज्ञः ' ( ऐ ० ब्रा ० १।५ संस्था ) कहा जाता है । प्राजापत्य पञ्च पुण्डीराबशा में स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथिवो ये पाँच यह पिण्ड हैं । पिण्ड - बिना भूत के बन नहीं सकते । भूत की जननी मर्त्यवाक् है अतएव पाँचों की सत्ता माननी पड़ती है । उन पाँचों की वाक् का नाम " सत्या वाक् " है । इसे ही " में मर्त्यावाक् कहते हैं । परमेष्ठिमण्डल की वाक् का नाम " श्रम्भृणी वाक् " है । सूर्य्य वेदवाक् ” भी " बृहती वाक् " है । इसे ही " गोरिवीता " ( यजुः ) कहते । सामवेद में इसे ही गोरिवीता कहा है । पार्थिव वाक् को " असुर वाक् " कहते हैं । इसे ही गायत्री भी कहा जाता है । चन्द्र वाक् को " अमृता याक् " कहते हैं । इन पाँचों से ही पाँचों मण्डल बनते हैं । स्वयम्भू का जो प्रकार है- अग्नि से पानी बनता है । पानी स्वयम्भू पिण्ड बनता है । इस प्रकार स्वयम्भू पिण्ड में पाँचों मौजूद हैं मेष्ठि पिण्ड इसी क्रम से आम्भृणी वाक् से मर्त्याकाश बना हुआ | सूर्य्य पिण्ड । एवमेव पर-बृहती वाक् से बना हुआ है । पृथिवी पिण्ड अनुष्टुपवाक् से बना हुआ है । चन्द्र पिण्ड " अमृतावाक् " से बना हुआ है । पाँचों पिण्डवाङ्मय है । इसी सृष्टि क्रम को बतलाती हुई श्रुति कहती है-मण्डल की वाक् का नाम " तस्माद्वा एतस्मादात्मन प्राकाशः संभूतः । आकाशाद् वायुः । वायो-रग्निः । श्रग्नेरापः । प्राद्द्भ्यः पृथिवी " । ( तै ० उ ० २1१ ) प्रत्येक मण्डल में पाँचों समझने चाहिए । सबसे पहले यही सत्या वाक्थी । स्वयम्भू का आकाश था -- उसीसेवायु, अग्नि, पानी, मिट्टी के क्रम से स्वयम्भू पिण्ड बना एवं श्राम्भृणी आकाश से परमेष्ठि बना । - इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिए । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए किजहाँ पर [ ३४ ]

पृष्ठ 53

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण जो भाग उल्वण होता है — उस पिण्ड का उसी नाम से व्यवहार होता है । स्वयंभू में वाक् - भाग उल्वरण रहता है अतएव उसे " वाक् लोक " कहा जाता है एवं परमेष्ठि में पानी का भाग उल्वण रहता है त -एव उसे ' अपोलोकः " कहा जाता है । सूर्य में ज्योतिर्भाग उत्वण रहता है अतएव इसे " ज्योतिर्लोक " कहा जाता है । चन्द्रमा में सोम भाग उत्वरण रहता है अतएव इसे " सौम्य लोक " कहा जाता है । पृथिवी को " लोक कहा जाता है परन्तु ध्यान रहे, वास्तव में सब में सब रहते हैं । पाँचों मण्डल पश्वीकरण से ही बने हुए हैं । पृथिवी भूतों का रस है अतएव कहा जाता है— " एषां वै भूतानां पृथिवी रसः । पुष्पाणि पुष्पारणां फलानि फलानां पुरुषः पृथिव्या श्रापोऽपामोषधय ओषधीनां पुरुषस्य रेतः " । ( शत ० १४ | ६ | ४ | १ ) पृथिवी को रसलोक भी कह दिया जाता है एवं सोम अमृत है प्रतएव चन्द्रमा को " अमृतलोक " भी कह दिया जाता है । पारमेष्ठ्य आपोलोक वायुमय है अतएव इसे " अपालोकः " भी कह दिया जाता है । अस्तु, कहना हमें यही है कि पांचों पिण्डों में पांचों रहते । इन पाँचों के नाम ये हैं— नाड़ी, भूत, मनोता और प्राण पाँचों मण्डलों का स्वरूप पृथक्-प्रत्येक मण्डल के जो महिमा - मण्डल हैं उनमें वेद, लोक, अर्थात् देवता ये ६६ विशेषक रहा करते हैं । इन्हीं की विभिन्नता से पृथक् हो जाता है । नीचे लिखी तालिका से सारा विभाग स्पष्ट समझ में आ जाता है-१ २ ३ ४ ५ ६ वेद लोक भूत मनोता प्रारण ( पञ्चीकृत ) ब्रह्मनिश्व- वाचालोक ऋतसत्ये आकाश नियति सूत्र ऋषयः १ स्वयम्भू सितवेद वेद २ परमेष्ठी ब्रह्मस्वेद वायुलोक ऊर्जस्वती भृगु वायु पितर वेद ( पांया ) (ौदुम्बरी ) अङ्गिरा, अत्रि असुर गायत्री-ज्योतिर्लोक इडा पिङ्गला तेज ज्योतिर्गौ-देवाः ३ | सूर्य मात्रिक वेद वायु ब्रह्मस्वेद अमृतलोक श्रद्धा जल रेतः श्रद्धा गंधर्व ४ चन्द्रमा वेद यश रसलोक यज्ञमात्रिक ५ पृथिवी ( आपोज्योति सुषुम्णा मिटटी वाग् गौद्यौ ( यानि मनुष्य वेद सोऽमृतम् ) पञ्चधा ) [ ३५ ]

पृष्ठ 54

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण इस सारे प्रपञ्च से हमें यही कहना है कि वाक् से ही सारा ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है एवं वाक् मर्त्य - अमृत भेदेन दो प्रकार की है । अमृतावाक् से देवता उत्पन्न होते हैं, मर्त्यवाक् से भूत उत्पन्न होते हैं । प्रत्येक पिण्ड में पाँचों रहते हैं अतएव " प्रथो वागेवेदं सर्वम् " ( नृसिंह उत्तर उ ० ८ ) - " सर्वमापोमयं जगत् " -यह कहा जाता है । इस प्रकार श्रुति में नाना भाव से विश्व का वर्णन आता है - इससे विरोध नहीं समझना चाहिए | पूर्व प्रकरण से वाक् पाँच प्रकार की सिद्ध होती है । इन पाँचों में से यहाँ पार्थिक वाक् ही अभिप्रेत है । श्रङ्गिरा अग्नि है । यह अङ्गिरा पृथिवी से चारों ओर निकलता रहता है अतएव अङ्गिरा सम्बन्धे हम अनुष्टुप वाक् का ही - गायत्री का ही ग्रहण करेंगे । पृथिवी - पिण्ड वाक् से बना है पार्थिव एवं इसमें रहने वाला जो अग्नि है, वह " प्रङ्गिरा " कहलाता है । वास्तव में अग्नि वायु श्रादि तत्त्व तीनों अङ्गिरा । इनमें अग्नि अङ्गिरा आठ प्रकार का है जो कि पृथिवी की वस्तु है । यही " आठ वसु " कह-लाते हैं । अन्तरिक्ष्य वायु अङ्गिरा ११ प्रकार का है - इन्हीं को " रुद्र " कहते हैं । दिव्याङ्गिरा १२ प्रकार का है - इन्हीं को " द्वादश आदित्य " कहते हैं । परमेष्ठि से नीचे - सूर्य्य से पृथिवी तक - रोदसी त्रिलोकी में अङ्गिरा का ही राज्य है । सोम विभागेन प्रङ्गिरा २१ प्रकार के हो जाते हैं अतएव ' एकविशिनोऽङ्गि -. रसः ' यह कहा गया है । इन तीनों श्रङ्गिरात्रों में से प्रकृत में पार्थिव अङ्गिरा का ग्रहण है । वह पार्थिव अङ्गिरा इसी पृथिवी - पिण्ड पर प्रतिष्ठित रहते हैं । पार्थिव अनुष्टुप् वाक् ही इनका आधार है । यह पृथिवी - सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती रहती है । हमने बतलाया है कि इसमें से अङ्गिरा निक-लता रहता है । ज्यों - ज्यों पृथिवी प्रागे बढ़ती जाती है त्यों - त्यों चारों ओर के अङ्गिरा पृथिवी से प्रवर्ग्य होते जाते हैं । कल्पना कर लीजिए कि एक स्थान से पृथिवी चली - इस समय का जो श्रङ्गिरा है वह यहीं रह जाता है - पृथिवी प्रागे निकल जाती है । अङ्गिरा उस आगे जाने वाली पृथिवी के साथ नहीं रहता । बिना श्रङ्गिरा के यद्यपि पृथिवी एक सैकिण्ड भी नहीं रहती परन्तु एक ही अङ्गिरा उसमें सदा बद्ध रहे यह बात नहीं है । प्रतिक्षण अङ्गिरा बदलते रहते हैं, ज्यों - ज्यों उससे प्रवर्ग्य होते जाते हैं । पृथिवी - प्रङ्गिरा को छोड़ कर आगे चल देती है । वह अङ्गिराम्रों का जरा भी ख्याल नहीं करती । बस यही वाक् का- अर्थात् पृथिवी का - पृथिवी से चारों ओर निकलने वाले - प्रङ्गिरात्रों पर क्रोध है - इसी प्राकृतिक विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" तेभ्यो ह वाक् चुक्रोध | सा हैभ्योऽपचक्राम " ॥२१ ॥

वह वाक् परस्पर युद्ध करते हुए जो देवता और असुर हैं उन दोनों के बीच में सिंही ( सिंहनी ) बन कर व्याघ्र - मुखाकृति बन कर विचरने लगी । दोनों को खाती हुई - दोनों की हिंसा करती हुई-दोनों के बीच में विचरने लगी । पृथिवी को एक स्थान पर समझिए । सूर्य को दूसरे स्थान झिए । सूर्य का प्रकाश पृथिवी पर पड़ता है परन्तु पिण्ड के अग्रभाग पर ही पड़ता है । पृथिवी का पर - आधा सम-भाग सदा उज्ज्वल रहता है - शेष प्राधा काला रहता है । जिस ओर प्रकाश अर्थात् सूर्य्यं रश्मियाँ पड़ती हैं - चूंकि उन्हें आगे जाने के लिए मौका नहीं मिलता प्रतएव वे वहाँ से प्रतिफलित होती हैं । फलित जो सौर तेज है इसी का नाम " देवता " है । इसे ही " प्रश्व " भी कहते हैं । सूर्य बस प्रति-का प्रकाश पृथिवी को काटता हुआ आगे निकल जाता है । उतनी दूर में एक तिरछा - दोनों ओर से कटा हुआ -[ ३६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मरण अंधकार रहता है । इसी का नाम भूमा है । जितनी दूर में भूमा रहती है - ठीक उतना ही उसी भूमा के आकार का प्रकाश मण्डल प्रतिफलित हो कर वापिस सूर्य की ओर ही चला जाता है । चूँकि वह प्रकाश - स्वरूप है एवं सूर्य्य प्रकाश की ओर रहता है अतएव उसका प्रत्यक्ष नहीं होता परन्तु यह सिद्धान्त समझना चाहिए कि जितने आकार की भूमा होती है - भूच्छाया होती है ठीक उसके विरुद्ध सूर्य्यं की ओर उसी प्रकार का उतना ही बड़ा प्रकाश होता है - इसी को अश्व कहते हैं । हम जिस समय धूप में चलते हैं उस समय एक ओर हमारे शरीर की छाया पड़ती है- जो कि छाया पुरुष कहलाता है । उतनी दूर तक सूर्य्य - प्रकाश रुक जाता है । वही छाया कहलाने लगती है । परन्तु इस सिद्धान्त को भली भाँति समझ लीजिए आपकी उस छाया के विरुद्ध भाग में - प्रकाश -भाग की ओर उतना ही मण्डल है - जितना fa छाया - मण्डल है जो कि प्रकाश साजात्येन प्रत्यक्ष का विषय नहीं बनता है । इस प्रकार पृथिवी के एक ओर अर्थात् सूर्य की ओर पृथिवी से सटा हुआ बड़ी दूर तक व्याप्त प्रतिफलित प्रकाश - मण्डल रहता है - इसी का नाम ' अश्व ' है । सारे देवता इसी पर सवार रहते हैं । यह अश्व अग्निमय है- प्रकाश-मय है - प्रतएव कहा जाता है-" अश्वो ह वा ser भूत्वा देवेभ्यो यज्ञं वहति " । ( शत ० १।४३ | ३० ) ठीक सूर्य के प्रतिदिक् में प्रकाश जितनी ही भूमा रहती है । प्रकाशी प्रारण को " देवता " कहते हैं - तमोमय प्राण को " असुर " कहते हैं - यह हमने कई बार बतलाया है । पृथिवी के एक और अग्नि-स्वरूप प्रकाशी प्राण रहता है उसे हम देवता कहेंगे एवं भूमा भाग को असुर कहेंगे । इन दोनों के बीच में पृथिवी व्याघ्रमुखी होकर चलती रहती है । वास्तव में पृथिवी एक क्षण भी स्थिर नहीं रहती अपितु नवरत भूमा और अश्व के बीच में रह कर चारों ओर परिक्रमा लगाती रहती है अतएव ' चचार ' कहा है । यह पृथिवी दोनों प्राणों को चूसती रहती है- इधर प्रासुर प्राण को - काले प्राणों को चूसती है, उधर देव प्राण को चूसती रहती है । यह उभयात्मिका है । देवता अग्नि से सम्बन्ध रखते हैं । ग्रग्निका स्वरूप शुक्ल है - असुर परमेष्ठि की वस्तु है । परमेष्ठि सोममय है- सोम सर्वथा काला है श्रतएव हम असुरों को सोमसम्बन्धी कहने के लिए तैय्यार हैं । अग्नि अर्थात् देवता उष्ण हैं- सोम अर्थात् असुर शीत हैं । बस इस उष्ण - शीत से - श्रग्नि - सोम से - प्रर्थात् देवासुर से सारे विश्व का निर्माण होता है । यदि पृथिवी खाली अग्नि से ही बनी होती तो बिल्कुल गरम होती और प्रकाश - युक्त होती । यदि खाली सोम से ही बनी होती तो सर्वथा ठण्डी होती और काली होती - परन्तु यह न ठंडी है न गरम, अनुष्णशीत है । न काली है न गोरी दोनों की मिश्रणावस्था अतएव हम कह सकते हैं कि पृथिवी में दोनों ( देवासुर ) समावस्था में हैं । पृथिवी दोनों को अपने मुख में सिंहिनी अर्थात् हिंसिनी बन कर खाती रहती है । दोनों प्राणों को चूसती रहती है; दोनों के बीच में से हो कर सूर्य्य के चारों ओर परिक्रमा लगाया करती है एवं साथ ही देवताओं को अर्थात् सूर्य की रश्मियों को धक्का दे कर वापस फेंक देती है । सूय्यं - रश्मियाँ पृथिवी पर आ कर प्रतिफलित हो जाती हैं, एवमेव पृष्ठभाग का काला प्रारण भी पृथिवी -पिण्ड से विरुद्ध दिक् में ही जा रहा । इस प्रकार वह न असुरों के पास आना चाहती है - न देवताओं के पास जाना चाहती है-[ ३७ }

पृष्ठ 56

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण असुराः अश्वः 18 पृथिवी सूर्यः ध्यात्मिकों कृष्णा-- परिभ्रमण-पृथिवी बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-“ सा ( पृथिवी - गायत्री किंवा अनुष्टुप् वाक् ) उभयानन्तरेण देवासुरान् संयत्तान् ( अभियुक्तान् ) सिंही भूत्वा ( हिंसन्तीसती ) श्राददाना ( व्यात्तमु सा ) चचार " । इस प्रकार उस पृथिवी को अपने से अलग देख कर देवता और असुरों ने विचार किया कि कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे यह अपनी तरफ लौट आए । यह विचार कर देवताओं ने भी उसे अपनी ओर आने के लिए आह्वान किया । सारे देवता और सारे प्रसुर बुलाने नहीं गए अपितु देवताओं अग्नि गए । अग्नि ही देवताओं के दूत थे । सहरक्षा असुरों के दूत थे । यह पृथिवी - देवताओं की ओर ही लौट आई । पृथिवी का आधा भाग सूर्य्यं की ओर रहता है - यह हमने अनुपद में ही बतला दिया | 1 सूर्य, अग्नि वायु आदित्य की समष्टि है । अग्नि प्राठ हैं - वायु ग्यारह हैं- आदित्य बारह हैं । प्रादित्य द्युलोक में रह जाते हैं । वायु अन्तरिक्ष में रह जाता है । पृथिवी तक अग्नि ही आता है । प्रत्येक पिण्ड-केन्द्र में प्रजापति रहता है । इस मन प्रारण वाङ्मय अव्यय प्रजापति की अक्षर और क्षर ये दो प्रकृतियाँ हैं | ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम- ये अक्षर की पाँच कलाएँ हैं एवं यही पाँच कलाएँ श्रात्मक्षर की हैं । वह प्रजापति इन अक्षर - क्षर प्रकृतियों से श्रविनाभूत है । इसमें जो ब्रह्मा है, यह प्रतिष्ठाता है । विष्णु प्रश-नाया है । बाहर से अन्न ला लाकर जमा करना श्रशनाया का काम । इसी को वैज्ञानिक भाषा [ ३८ ]

पृष्ठ 57

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण में केन्द्रापकर्षिणी शक्ति कहते हैं एवं इन्द्र इसके ठीक विरुद्ध है । इन्द्र विक्षेपण धर्मा है । इसी को केन्द्रा-पसारिणी शक्ति कहते हैं । इन्द्र और विष्णु में अनवरत झगड़ा हुआ करता है । केन्द्रापसारिणी श्रासुर शक्ति है । केन्द्रापकर्षिणी दिव्य शक्ति है । यह केन्द्रापकर्षिणी शक्ति सूर्य में है । यही पृथिवी को अपने आकर्षण में लिए हुए है परन्तु जितना ही सूर्य्यं इसे अपने श्राकर्षण में खींचे हुए है - केन्द्रापकर्षिणी शक्ति ठीक इससे विरुद्ध खींच रही है । यदि विरुद्धाकर्षण न होता एवं सूर्य्यं का ही खिंचाव होता तो पृथिवी सूर्य में समा जाती परन्तु जितना ही सूर्य अपनी ओर इस पृथिवी को खींचता है, केन्द्रापक-f र्षण शक्ति उसे अपनी ओर ही खींचती है । इस प्रकार देवता और असुर दोनों पृथिवी को अपनी - अपनी प्रोर खींच रहे हैं । देवताओं के दूत शुद्ध अग्नि हैं परन्तु असुरों का दूत सहरक्षा है । तमोमय भाग का नाम असुर है । पृथिवी के पृष्ठ भाग में जहाँ पर कि सौर प्रकाश नहीं आता अङ्गिरा अग्नि अवश्य रहता है किन्तु वह तमोमय होता है । राख की - भोभल की जो अग्नि है उसी का नाम सहरक्षा है - यही असुरों का दूत है परन्तु पृथिवी असुरों की ओर नया कर देवताओं की ओर लौट आती है । असुर हार जाते हैं - देवता जीत जाते हैं । तात्पर्य यही है कि सूर्य्यं का आकर्षण इस प्रासुर आकर्षण से प्रबल है, अतएव पृथिवी सूर्य की ओर झुक जाती है । सूर्य्य अपनी रश्मि स्वरूप डोरी से पृथिवी स्वरूप लट्टू को फिरा रहा है । यदि यह लट्टू हाथ में से छूट जाए तो पृथिवी सूर्य से विरुद्ध एकदम सीधी चली जाए एवं ऐसा होने से असुरों की विजय हो जाए । यदि केन्द्रापकर्षिरणी शक्ति और केन्द्रापसारिणी शक्ति दोनों समान ही होतीं तो पृथिवी स्थिर हो जाती । समान बल की स्पर्द्धा में वस्तु स्तब्ध हो जाती है । उदाहरणार्थ - एक रस्से पर दृष्टि डालिए - जिसे दो पहलवान खींच रहे हैं । यदि दोनों में समान बल होगा तो वह रस्सा स्थिर हो जाएगा । यदि दोनों में से एक कमजोर हुआ तो वह अधिक बल वाला पहलवान - कमजोर आदमी को रस्से सहित अपनी ओर खींच लेगा । बस, ठीक यही स्थिति यहाँ भी समझनी चाहिए | देव-ताओं का अधिक बल है - इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि पृथिवी सूर्य्य की ओर घूम गई । यदि दोनों के बल समान होते तो पृथिवी स्थिर हो जाती । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" तामुपैव देवा s प्रमन्त्रयन्तोपासुरा अग्निरेव देवानां दूत प्रास सह-रक्षाऽइत्यसुररक्षसामसुराणाम् " ॥२१ ॥

इसी का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि जब दोनों ने उसे अपनी ओर बुलाना चाहा तो वह देवताओं की ओर ही लौटना चाहती हुई बोली - " हे देवताश्रो! यदि मैं आपकी तरफ लौट भाऊंगी तो इससे मुझे क्या फायदा होगा? ब्रह्मा की तरफ लौटने से हमें क्या मिलेगा? " देवताओं ने कहा कि - " हे पृथिवी हे वाक्! अग्नि की जो पहली प्राहुति है - वही तुम्हें प्राप्त होगी । " तात्पर्थ्य इसका यही है कि पृथिवी जब संवत्सर की परिक्रमा लगाती है तब ' विजितिः ' कहा जाता है । जिधर सौर प्रकाश रहता है वहाँ उस ओर का पार्थिव काला प्राण नष्ट हो जाता है - यही देवताओं की जिति है - असुरों की पराजय है एवं पृथिवी का जो पृष्ठ भाग है वहां देवता अर्थात् सौर प्रकाश नहीं जाता श्रतएव वहां असुरों का ही राज्य रहता है । श्रुति में एक कथा है - एक समय इन्द्र ने विचार किया कि दिन में से तो प्रपन ने असुरों को निकाल दिया अब कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे [ ३६ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं रात्रि में भी असुर न रहें । वह भी अपने कब्जे में श्रा जाएँ । उन्होंने देवताओं से कहा कि हे देवताओ! हम रात्रि के असुरों के साथ युद्ध कर उन्हें निकाल देना चाहते हैं । बतलाइए कौन- हमारा साथ देगा? हमारे साथ चलने के लिए कौन तैय्यार है? आखिर सब देवता नट ( इन्कार हो ) गए, केवल छन्दों ने साथ जाने की हामी भरी । इन्द्र छन्दों को साथ ले कर रात्रि में रहने वाले असुरों पर आक्रमण कर बैठे और सबको मार भगाया एवं वहां पर अपना राज्य कायम कर लिया । छन्द कहते हैं छिपाने को अवच्छेद को । चन्द्रमा सोममय है - सोमपिण्ड का नाम ही चन्द्रमा है । यह छन्द - स्वरूप है अर्थात् श्रवच्छेदयुक्त है-ससीम है । इसी की मदद से इन्द्र रात्रि में अपना राज्य जमा लेता है । सौर प्रकाश का नाम इन्द्र है । चन्द्रमा जिस मार्ग पर हो कर जाता है - उसे छन्द समझना चाहिए । इसी छन्द से इन्द्र रात्रि को अपने कब्जे में कर लेता है अर्थात् पूर्णिमा को दिन - रात दोनों में प्रकाश रहता है । अहोरात्र में देवताओं का राज्य हो जाता है । चन्द्रमा में जो प्रकाश है वह सौर प्रकाश है । सोम तो सर्वथा काला है अतएव प्रकाश होता इन्द्र के सौर प्रमृत प्रकाशी प्राण की विजय है । इस इन्द्र वृत्रासुर का विस्तृत वैज्ञानिक रहस्य ' प्रथम काण्ड ' में बतला दिया गया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-" हवै देवा श्रयन्त । रात्रीमसुराः । तेऽसुराः समावद् वीर्य्या एवा-सन् | नो व्यावर्त्तन्त । सोऽब्रवीत् इन्द्रः कश्चाहं चेमानसुरान् रात्री मन्ववैष्या-महा इति । स देवेषु न प्रत्यविन्दत् - तद्यच्छन्दास्येवान्ववायन्, तस्मादिन्द्रस्य छन्दांसि च रात्रि वहन्ति " । ( गोपथ ब्रा ० उत्तर भा ० ५।१ ) प्रकृत में हमें इस सारे प्रपञ्च से केवल इतना ही बतलाना है कि ऊपर से आने वाले सौर प्रारण ही देवता कहलाते हैं । पृथिवी में प्रवर्ग्य बन कर आये हुए तमोमय प्राण, अपान प्राण हैं; इन्हें ही असुर कहते हैं । इन दोनों में जो सौर प्राण है, वह चान्द्र संवत्सर - भोग के कारण १२ भागों में विभक्त हो जाता है । एक संवत्सर के जो १२ महीने हैं वही १२ आदित्य कहलाते हैं । इन प्राणों में प्रत्येक से जब पञ्चीकृत प्रारण का सम्बन्ध होता है तो देव - प्राण उत्पन्न होता है । पारमेष्ठ्य पञ्चीकृत ऋषि - प्राण का नाम ही पितर है । यह पितर- प्रारण सौम्य है । सौर प्रारण प्राग्नेय हैं | सोम - प्राण दाह्य पदार्थ है । अग्नि के साथ सम्बद्ध होते ही यह प्रारण चमक जाता है । बस इस प्रकाशी प्रारण को ही देवता कहते हैं । इस प्रकाश का जनक पारमेष्ठ्य अर्थात् सौम्य पश्वीकृत पितर प्राण है । प्राण विराट् स्वरूप है अर्थात् पञ्चीकृत होने से प्रत्येक पितर प्राण १० प्राण युक्त है । ऐसे दसों भृगु अङ्गिरादि पितर प्राणों का जब सौर प्रारण के सम्बन्ध होता है तो उसका नाम देवता हो जाता है । सौर प्रारण एक है उस पर जब दसों यद्यपि प्रारण एक ही है तथापि चन्द्र-पितर प्राण बैठ जाते हैं तो वह प्राण देवता कहलाने लगता है । भोग सम्बन्धेन वह १२ स्वरूपों में परिणत हो जाता है । यही द्वादश आदित्य हैं । एवमेव अन्तरिक्ष में रहने वाला जो व्यान नाम का सौर प्रारण है उससे भी इन १० पितर प्राणों का सम्बन्ध होता है । बस, यही अन्तरिक्ष के देवता कहलाते हैं । व्यान वायु अवस्था - विशेष के कारण ११ स्वरूपों में परिणत हो जाता है | यही ११ रुद्र देवता हैं । एवमेव पृथिवी का जो सूर्य के सम्मुख रहने वाला आग्नेय प्रपान [ ४० 1

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण प्राण है - वह भी उन्हीं १० पितर प्रारणों के सम्बन्ध से सम्बन्ध से देवता कहलाने लगता है । जैसे चन्द्र भोग - सम्बन्धेन श्रादित्य प्राण १२ हो जाते हैं एवमेव श्रापः, फेन, उषा, सिकता, शर्करा, श्रपः श्रश्मा, हिरण्य -- इन आठ व्याहृतियों के कारण यह पार्थिव अपान आठ स्वरूपों में परिणत हो जाता है । यही श्राठ वसु कहलाते हैं । इस प्रकार वही सौर प्रारण देवता पञ्चीकृत १० पितर प्राणों से जो कि विराट् स्वरूप हैं - द्यौ प्रन्तरिक्ष और पृथिवी तीनों लोकों में प्रतिष्ठित हो रहे हैं । एक - एक प्राण पर जब १० पितरों की आहुति होती है तभी देवता का स्वरूप बनता है । विराट् से ही प्राण - देवता तीनों लोकों में प्रतिष्ठित होते हैं । वास्तव में बात सच है । यदि विराट् का अर्थात् पञ्चीकृत सौम्य पितर प्राण का इस सौर प्रारण से सम्बन्ध न हो तो देवता का स्वरूप ही नहीं बन सकता है । प्रकाश का नाम देवता है । प्रकाश - सौम्य प्राण- १० पितरों से उत्पन्न होता हैं । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" विराज वै देवा अस्मिन् लोके ( द्युलोके - अन्तरिक्षे पृथिव्यां च प्रर्थात् प्रारण प्रधाने द्युलोके- - व्यान प्रधानेऽन्तरिक्षलोके - प्रपान प्रधाने पृथिवीलोके ) प्रत्यतिष्ठन् " । यही एक वैज्ञानिक अर्थ है । इसी का दूसरी तरह से भी प्रतिपादन किया जा सकता है । पृथिवी का जो वषट्कारमण्डल है - उसमें ३३ अहर्गण होते हैं । ३३ में - २१ तक अग्नि रहता है और ३३ तक सोमरहता । इसमें भी २७ तक भास्वर सोम रहता है - ३३ तक दिक् सोम रहता है प्रतएव पृथिवी के इस रथन्तर साम के रथन्तर- वै राज शाक्वर तीन भेद हो जाते हैं । २१ तक का जो आग्नेय साम है-उसे " रथन्तर साम " कहते हैं । २७ तक जो " भास्वर साम " है उसे " वैराज साम " कहते हैं । " दिक् साम " को " शाक्वर साम " कहते हैं । इनका नाम वैराज - शाक्वर क्यों पड़ा इसकी उपपत्ति ' तानूनप्त्र-ब्राह्मण ' में देखनी चाहिए । " दिक् सोम " का नाम " ब्राह्मणस्पत्य सोम " है । इससे सौर देवताओं की स्थिति होती है एवं " भास्वर साम " से जो कि चन्द्रमा है पार्थिव देवताओं की स्थिति होती है । पृथिवी में भास्वर सोम आता है । इसी चन्द्र - सोम से पार्थिव आग्नेयप्रारण स्वरूप देवताओं की स्थिति रहती है । ब्राह्मणस्पत्य सोम को तो सूर्य्य ही ऊपर - ऊपर चूस लेता है । गायत्री द्वारा भास्वर सोम ही पृथिवी में आ पाता है । भास्वर सोम चूँकि वैराज साम में रहता है अतएव स्थान सम्बन्धेन इसे विराट् कह दिया जाता है । अपिच सोम से ही प्रकाश होता है । प्रकाश का अधिष्ठाता सोम ही तो है श्रतएव त्वं-ज्योतिषा वितमो ववर्थ ' ( ऋग्वेद मं. १।१।२२ ) यह कहा जाता है इसलिए भी इसे विराट् कहते हैं । चमकीले होने के कारण ही इसका नाम विराट् है अतएव इसे भास्वर कहा जाता है । इसी से सौर देवता पृथिवी में प्रतिष्ठित हुए हैं । " विराजा वै देवा अस्मिन् लोके प्रत्यतिष्ठन् " । उक्त कथन का यही दूसरा वैज्ञानिक अर्थ है । अग्नि की १० कलाएँ होती हैं । जिसमें से एक पार्थिवाग्नि है । इसे ही गार्हपत्याग्नि भी कहते हैं । दूसरा दिव्याग्नि है ( सौराग्नि है ) इसे ग्राहवनीयाग्नि कहते हैं । [ ४१ ]

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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मणं एवं धिष्ण्याग्नि है जो कि अन्तरिक्ष में रहती है । इस प्रकार द्युलोक तक अर्थात् २१ तक ' गार्हपत्य ' आह-वनीय - धिष्ण्य ( पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ ) भेदेन घन - तरल - विरलावस्था में परिणत हो- एक ही अग्नि १० कलाओं में परिणत हो रहा है । तीनों लोकों में इस दर्शिनी विराट् से ही आग्नेय प्राण- देवता प्रतिष्ठित हो रहे हैं । यदि १० कलाएँ न होतीं प्रग्नि की घन - तरल - विरलावस्था न होती तो यह कथमपि तीनों लोकों में प्रतिष्ठित नहीं हो सकते थे । १० की अर्थात् विराट् की महिमा से ही देवता लोग तीनों लोकों में प्रतिष्ठित हो रहे हैं । बस ' विराजा वै देवा श्रस्मिन् लोके प्रत्यतिष्ठत् ' का यही तीसरा अर्थ है । प्रक-र के प्रारम्भ में ही हमने बतलाया है कि दर्शिनी विशिनी - त्रिशिनी चत्वारिंशिनी भेदेन विराट् चार प्रकार का होता है । इसमें रोदसी - क्रन्दसी संयती भेदेन त्रैलोक्य त्रिलोकी तीन हैं । इनमें पृथिवी से सूर्य्य तक की जो त्रिलोकी है उसे " रोदसी त्रिलोकी " कहते हैं । सोमयज्ञ का सम्बन्ध - इसी रोदसी त्रिलोकी से है । कहने को तीन लोक हैं - वास्तव में सोम को मिल कर एक चौथा प्रापोलोक और होता है अत-एव ' श्रस्ति वै चतुर्थी देवलोक श्रापः ' ( कौ ० १८।२ ) यह कहा जाता है । इन चारों लोकों में ये चारों विराट् रहते हैं । इसी को परमा विराट् कहते हैं । एक - एक विराट् १०-१० का होता है । चूँकि इन चारों में निम्नलिखित ४० चीजें रहती हैं अतएव हम इसे परमाविराट् कहने के लिए तैय्यार हैं । वे ४० पदार्थ निम्नलिखित हैं-( १ ) अग्नि, वायुः श्रादित्यः, चन्द्रमाः इति चत्वारो देवाः । ( २ ) वरुणः, रुद्राः, श्रदित्याः, विश्वेदेवाः इति चत्वारो गणदेवाः । ( ३ ) पृथिवी, अन्तरिक्षम्, भौः आपः इति चत्वारो लोकाः । ( ४ ) ऋग्वेद, यजुर्वेदः, सामवेदः, ब्रह्मवेदः इति चत्वारो वेदाः । ( ५ ) वसन्तः, ग्रीष्मः, वर्षाः, शरत् इति चत्वार ऋतवः । ( ६ ) गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप् इति चत्वारि छन्दांसि । ( ७ ) प्राची, प्रतीची, उदीची, दक्षिण इति चतस्रो दिशाः । ( 5 ) त्रिवृत् पञ्चदश: सप्तदशः, एकविंश: इति चत्वारो स्तोमाः । ( e ) वाक्, प्राण, चक्षु, मनः इति इन्द्रियाणि । ( १० ) होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा इति चतस्रो होतृकाः । " सैषा चत्वारिंशिनी परमा विराट् " ( ता ० ब्रा ० १४।१०।२ ) “ अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् " ( वाजसनेय श्रुति ) । मानना पड़ता है कि उस अव्यय प्रजापति का आधा भाग अमृत है - प्रर आधा मर्त्य है । श्रानन्द- विज्ञान मन यह अमृत भाग है तथा मन - प्रारण वाक् मर्त्य भाग है । इस प्रजापति आत्मा के प्रजा पशु - वित्त यह सहकारी होते हैं । इनमें गणदेवता देवता- लोक और वेद ये चार प्रजापति की प्रजा हैं । चारों ही चार - चार प्रकार की हैं इस प्रकार प्रजाएँ १६ हो जाती हैं । ऋतु, छन्द, दिशा और स्तोम ये चार पशु हैं । चारों ही चार - चार के हिसाब से १६ पशु हो जाते हैं । वाक्, प्राण, चक्षु और मन ये [ ४२ ]