Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 471–480

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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तृतीय काण्ड ( अ ० 5 ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण करते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि पशु अपने स्वरूप से अक्ष्णया क्रम से ही चलता है । पशु की चाल की ओर दृष्टि डालिए । यदि पशु का बायाँ हाथ आगे होगा तो उसका दाहिना पैर पीछे की ओर होगा । यदि दाहिना हाथ आगे होगा तो उसका बायाँ पैर पीछे होगा । पशु जब भी चलेगा, प्रक्ष्णया क्रम से ही चलेगा । आप यदि उसे बाएँ पैर और बाएँ हाथ से एवं दाहिने पैर एवं दाहिने हाथ से चलाना चाहेंगे तो वह धड़ाम से गिर पड़ेगा । यदि सम्यक् ही अवदान होता तो पशु अक्ष्णया से न चल कर सीधी भोर से ही चलते । परन्तु ऐसा नहीं होता, प्रतएव मानना पड़ता है कि पशु का अवदान प्रकृति - यज्ञ में प्रणया ही होता है । तभी तो पशु प्रक्ष्णया चलता है । चूंकि हमें इस पशु को स्वर्ग में देवताओं के पास भेजना है - एवं पशु चलता है लक्ष्णया, अतः अक्ष्णया ही अवदान करना चाहिए । बस प्रक्ष्या अवदान करने का यही कारण है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अथ यदक्षरयावद्यति - सव्यस्य च दोष्णो - दक्षिणायाश्च श्रोणः । दक्षिणस्य च दोष्णः सव्यायाश्च श्रोणेः । तस्मादयं पशुरक्ष्णया पदो हरति अथ यत् सम्यगवद्येत् - समीचो हैवायं पशुः पदो हरेत् । तस्मादक्ष्णयावद्यति " । इस यज्ञ में पशु का मस्तक नहीं लिया जाता, एवं कन्धों के मांस का अवदान नहीं होता । अनूक का ( आयत पृष्ठास्थि विशेष - मेरुदण्ड ) एवं अपर सक्थि का अवदान नहीं होता । अन्य सब अवयवों का अवदान होता है । प्रश्न होता है कि इतने अवयवों का अवदान क्यों नहीं होता? - इसी प्रश्न का

उत्तर देते हैं-" थ यन्न शी sensa द्यति । नांसयोः । नानूकस्य । नापरसक्थयोः ।

( तदुच्यते - इति शेषः ) " ॥२७ ॥

इस यज्ञ - विद्या का आविष्कार साध्य देवों ने किया था एवं साध्यों से देवताओं ने सीखा था । इसी यज्ञबल के आधार पर भौमस्वर्ग निवासी देवता असुरों को परास्त किया करते थे । असुर बड़े ही चालाक होते थे । उन लोगों ने देवताओं के द्वारा प्रति गुप्त रखने पर भी यज्ञ - विद्या का कुछ - कुछ आभास पालिया । बस फिर क्या था? उन्होंने भी अग्निष्टोम यज्ञ किया, पशु का श्रालम्भन किया एवं साथ ही असुरों ने ऐसा कड़ा इन्तजाम कर दिया कि वहाँ एक मच्छर भी प्रविष्ट नहीं हो सके । जब देव-तानों ने सुना कि असुर भी पश्वालम्भन कर रहे हैं तो देवता बड़े घबराए । उन्होंने सोचा कि यदि यज्ञ-बल भी असुरों के हाथ में चला गया तो फिर सब तरह से सर्वनाश है । देवताओं ने विचार किया कि जरा चल कर देखें तो सही । देखें कि वे विधिपूर्वक यज्ञ करते हैं या यों ही । यदि यों ही करते हैं तब तो उनका उलटा सर्वनाश ही हो जाएगा । परन्तु देवता असुरों से बहुत डरते थे, अतः मारे डर के वे उस १. " गवादयः शयनकाले अङ्गानि पादान् अक्ष्णया वक्रत्वेनावस्थापयन्ति " इति ( तै ० सं ० १।३।१० श्री सायणभाष्यम् ) । [ ४५७ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण जगह भी न जा पाए । उनका वहाँ जाने का साहस न हुआ जहाँ पर कि असुर दल यज्ञ की तय्यारियां कर रहा था । इस प्रकार की विकट समस्या देख कर देवता बहुत ही व्याकुल एवं भयभीत हो गए । जब उन्हें बहुत ही व्याकुल देखा तो पृथिवी की अभिमानिनी पृथिवी देवता प्रकट हुई और उसने उन देवताओं को आश्वासन देते हुए कहा कि हे देवताओ! यह जो श्रासुर भय है - तुम लोग उसकी जरा भी परवाह न करो । तुम्हारे कल्याण के लिए असुरकृत पश्वालम्भन की अध्यक्षा मैं बनूँगी । जिस तरीके से, जिस पद्धति से असुर यज्ञ करेंगे, उन सब को उपदृष्ट रूप से मैं देख लूंगी एवं जैसा वे करेंगे, वैसा तुम्हें कह दूँगी । तुम जरा सी भी चिन्ता न करो — " सुरा ह वा पशुमालेभिरे । तद्देवा भीषा नोपावेयुः । तान् हेयं पृथिव्युवाच - मा - एतत् - प्रादृद्वम् । ( एतत् - श्रासुरभयं प्रादरं मा कुरुत ) - श्रहं

व: ( युष्मदर्थम् ) एतस्य ( पश्वालम्भस्य ) अध्यक्षा ( उपद्रष्टा ) भविष्यामि ।

यथा यथैत एतेन ( पशुना ) चरिष्यन्ति " इति ॥२८ ॥

आखिर जैसा पृथिवी ने प्रण किया था, उसने वैसा ही किया । वह असुरदल में पहुँची और वहाँ जा कर उनकी सारी इतिकर्त्तव्यता देख ली । देख कर वापस देवताओं के पास श्राई एवं देवतानों के पास ना कर उसने देवताओं से कहा कि - हे देवताओ! उन असुरों ने प्रधान श्राहुति का ही हवन किया है और जो स्विष्टकृत् आहुति थी, उसे सर्वथा छोड़ दिया है-“ सा होवाच अन्यतरामेवाहुतिमहौषुः - ( प्रधानमेव हुतवन्तः ) । अन्य-तरां ( स्विष्टकृतं ) पर्य्यशिषन् ( परित्यक्तवन्तः ) । स्विष्टकृत् में होने वाली जिन आहुतियों को असुरों ने छोड़ दिया- वे स्विष्टकृत् में होने वाले तीन अवदान हैं । हमने बतलाया था कि स्विष्टकृद्याग में दक्षिण बाहु का मांस होता है, बायीं श्रोणि का मांस होता है एवं तीन खण्डों में विभक्त गुदा का तीसरा सबसे छोटा खण्ड होता है । बस - स्विष्टकृत् में ये ही तीन अवदान होते हैं । असुरों ने इन्हीं तीन प्रवदानों की आहुति को अर्थात् स्विष्टकृत् को छोड़ दिया-" स ( ते ) यां ( श्राहुति ) पर्य्यशिषन् तानीमानि - श्रवदानानि ( दक्षिणं दो: - सव्या श्रोणिः गुदं तृतीयं चेति त्रीणि ) " । देवताओं ने जब इस प्रकार असुरों द्वारा - त्र्यङ्ग का ( स्विष्टकृत् का ) पृथिवी से परित्याग सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए एवं उन्होंने - प्रसुरों द्वारा छोड़े हुए पूर्वोक्त तीनों अङ्गों को अपने यज्ञ में होने वाले " स्विष्टकृत् " में शामिल कर लिया । चूंकि स्विष्टकृत् में होने वाले तीन अङ्गों की ओर असुरों का लक्ष्य नहीं गया था - प्रतएव ये तीनों प्रङ्ग प्रासुरभाव से शून्य थे । तभी तो तीनों को देवताओं ने स्विष्टः [ ४५८

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण कृत् में शामिल कर लिया । चूँकि स्विष्टकृत् में तीन अंग शामिल हुए, अतएव स्विष्टकृत्याग का नाम ही " व्यङ्गी " हो गया-" ततो देवाः स्विष्टकृते त्र्यङ्गाण्यपाभजन् । तस्मात् त्र्यङ्गाणि " । असुर कला में यद्यपि बड़े प्रवीण थे परन्तु बुद्धि में ठस ही थे । उन्होंने देखा कि पशु में प्रधान-भाग मस्तक है । अनूक ( मेरु - दण्ड ) है । क्यों कि मस्तक में पाँचों ज्ञानेंन्द्रियाँ हैं एवं मेरु दण्ड के बल पर ही पशु और मनुष्य - पशु खड़ा हुआ है तथा अपर सक्थि भी प्रधान ही है, अतः इनका अवदान अवश्य ही करना चाहिए | इन्हीं के अवदान से देवता हमें पराजित करते होंगे - यह विचार कर उन मन्दबुद्धि असुरों ने शिर, अनूक और अपर सक्थि तीनों का अवदान कर दिया । चूंकि तीनों का असुरों ने अवदान किया था एवं प्राणात्मक असुर अब भी कर रहे हैं, अतएव श्रासुरभावयुक्तत्वात् इस दिव्य कर्म में असुर कृत शिर, अंस, अनूक, अपर सक्थि - इन चारों का अवदान कभी नहीं करना चाहिए । तात्पर्य्यं यही है कि शिर, अंस, अनूक, अपरसक्थि - चारों में प्रासुरभाव उल्वरण रहता है, प्रत-एव इस यज्ञ में तीनों अवयवों का अवदान नहीं करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" प्रथासुरा अवाद्यन् - शीर्ष्णः - श्रंसयोः, अनूकस्य, अपरसक्थ्योः । तस्मा-तेषां नावद्येत् । ( यस्मात् शिर श्रादीनि असुरा - प्रवाद्यन् - प्रतः तैरवत्तत्वेन दुष्ट-त्वात् तानि नावद्येत् - इत्यर्थः ) ” । शिरोभाग त्वष्टा का वमन है, इसलिए भी शिर का अवदान नहीं करना चाहिए, जैसे कि पूर्व में इसी ब्राह्मण में बतला आए हैं । यह वमन अनूक द्वारा होती है । मेरुदण्ड ही वमन का रास्ता है, अतएव शिरवत् मेरुदण्ड भी दूषित ही है । अतः उसका भी अवदान नहीं करना चाहिए-" त्वष्टानूकमभ्यवमत् - तस्मादनूकस्य नावद्येत् " । ब्राह्मण के प्रारम्भ से अब तक अवदान - क्रम का विवेचन कर दिया गया । पशु के किन - किन Marat का अवदान होता है? कितने अवदान होते हैं? पशु को कितनी बार में आहुति बनाया जाता है? - इत्यादि विषयों का निर्णय हो चुका । अब सामग्री सम्पन्न हो गई । जुहू में प्रधानयागार्थ अवदान तय्यार कर लिया गया । उपभृत् में- स्विष्टकृद्यागार्थ तय्यार कर लिया गया । समवत्तधानी नाम की इडापात्री में इडाप्राशनार्थ अवदान तय्यार कर लिया गया । इस प्रकार सारे संभारों का संभरण हो चुका । अब प्रदान का प्रकार बतलाते हैं-जिस पशु के अवदान किए गए हैं, वह पशु अग्नीषोमीय है । प्राज इस प्रग्नीषोमीय छाग को ही आहुति देनी है । प्रत्येक कर्म में अनुवाक्या और याज्या दो कर्म होते हैं । प्राहुति की देवता को खबर देना - अनुवाक्या कहलाता है । यह काम होता करता है एवं आहुति द्रव्य को देवता के लिए [ ४५६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मएँ अग्नि में डाल देना ' याज्या ' कहलाता है । यह काम अध्वर्यु करता है । पहिले अनुवाक्या होती है बाद याज्या होती है । जब अध्वर्यु सामग्री तय्यार कर लेता है तो अनुवाक्या करने के लिए होता को-" हे होता! अग्नीषोमीय छाग ( पशु ) की जो हवि है - उसकी अनुवाक्या करो " यह आज्ञा देता है । अर्थात् अब इस पशु - स्वरूप हवि का प्रदान किया जाएगा, अतएव तुम अनुवाक्या मन्त्र बोलो -यह प्राज्ञा देता है-" अथाह - ( अध्वर्युः ) - श्रग्नीषोमाभ्यां द्यागस्य हविषोऽनुब्रूहीति " । उक्त मन्त्र के बाद अध्वर्यु देवताओं के लिए अग्नि में हवि की आहुति देता है । यही याज्यां कर्म है | यह कर्म्म सिर्फ अध्वर्यु ही सम्पन्न करता है । होता जब अनुवाक्या द्वारा अग्नीषोमीय पशु की जो हवि है उसकी सूचना दे देता है तब आश्रावण के बाद " अग्नीषोमाभ्यां द्वागस्य हविः प्रेष्य " यह कहता है । वपा प्रष की तरह - प्रग्निषोमीय होम के प्रेष में भी ' प्रस्थितम् ' का प्रयोग नहीं

करना चाहिए-" न प्रस्थितमित्याह । प्रसुते प्रस्थितमिति ॥ २ ९ ॥

प्रधानयाग, स्विष्टकृद्याग और वसाहोम - ये तीन ही कर्म होते हैं । तीनों में से सबसे पहले होम होता है । बाद में प्रधानयाग होता है, बाद में स्विष्टकृतयाग होता | अतः सबसे पहले वसा होम की ही इतिकर्तव्यता बतलाते हैं । सर्वप्रथम वसाहोम किस समय करना चाहिए - यही बतलाते हैं - हमने बतलाया है कि प्रत्येक भाग में - याज्या और अनुवाक्या - दो मन्त्र बोले जाते हैं । पहले अनुवाक्या मन्त्र बोला जाता है, बाद में याज्या - मन्त्र बोला जाता है - वह गायत्री मन्त्र होता है । अर्थात्-त्रिपदा गायत्री छन्दवाली ऋचा से याज्या की जाती है । इस त्रिपदा गायत्री ऋचा के दो विभाग किए जाते हैं । दो पद का एक विभाग किया जाता है एवं एक पद का एक विभाग किया जाता है । इन दोनों को ' अर्धर्च ' कहा जाता है । पहले की दोनों पदों की समष्टि एक अर्धर्च ( आधी ऋचा - प्राधा मन्त्र ) है एवं उत्तर का एक पद दूसरी अर्धर्च ( प्राधी ऋचा ) है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ - तीनों लोकों में त्रिपदा गायत्री के तीन पद बंटे हुए हैं । चूंकि अन्तरिक्ष पृथिवी की वस्तु मान ली जाती है, अतएव एक अर्धर्च- दो पदों की मान ली जाती है और दूसरी अर्धर्च एक ही पद की होती है । यह ऋचा अध्वर्यु बोलता है एवं वसा-होम ' प्रतिप्रस्थाता ' करता है । इस याज्या के अर्धर्च के बीच में ही प्रतिप्रस्थाता वसाहोमाहुति डाल देता है । तात्पर्य यही है कि जिस समय अध्वर्यु याज्या - मन्त्र बोले- उस समय प्रतिप्रस्थाता उधर ध्यान दिए रहे । जब अध्वर्यु अर्धचं बोल चुके अर्थात् त्रिपदा गायत्री के दो पद बोल चुके; बस, उसी समय वह प्रति-प्रस्थाता प्राहवनीय में वसाहुति डाल दे । पूरी याज्या के अनन्तर वसाहोम नहीं होना चाहिए, अपितु ' अर्धर्च ' के बीच में ही होना चाहिए । बस, यही वसाहोम का समय है । " श्रन्तरेणार्धच्चों याज्यायै ( याज्यायाः ) वसा होमं जुहोति ( प्रतिप्रस्थाता ) " । वसाहोम क्यों किया जाता है - यह बतलाते हैं । पृथिवी से उत्पन्न होने वाला जो मेध है - रस है-वह पृथिवी से ऊपर उठता है । वही रस - प्रन्न स्वरूप में परिणत होता है । पृथिवी पर जो अन्न उगा [ ४६० ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) लोक का जो रस हमारे जीवन शत ० ब्रा ० ३१८।२।२२ । १. पशुपुरोडाश ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ ४६१ ] रहता है, वह उसी पृथिवी का ऊंचा उठा हुआ मेध है - रस है सार भाग है । ऊपर उठा हुआ यह पृथिवी का मेघ वह रस है जिसको कि खा कर मनुष्य - प्रजा जीवित रहती है । अर्थात् पृथिवी से ऊपर उठे रस भाग को ( जो कि अन्न में अभिव्याप्त हो रहा है ) खा कर मनुष्य जीवित रहते हैं । पृथिवी से ऊपर उठने वाला अन्न स्वरूप में परिणत पृथिवी रस ही मनुष्यों का जीवन है । जिस प्रकार पृथिवी के ऊपर उठते हुए रस से मनुष्यों का जीवन रहता है तथैव द्युरस से भी जीवन - सत्ता रहती है । पृथिवी और द्यु - दोनों के रस से ही जीवन रहता है । अन्तर केवल श्रागमन में है । पृथिवी का रस ऊपर जाता हुआ हमें मिलता है, का रस ( वृष्टि ) नीचे आता हुआ मिलता है । यदि द्युलोक से वर्षा न हो तो कभी हमारा जीवन नहीं रह सकता । यदि पृथिवी का रस ( अन्न ) न हो, तब भी जीवन नहीं रह सकता । अतएव " मनुष्य दोनों रसों को खा कर जीवित रहता है " यह अवश्य ही कहा जा सकता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" इतो वा ( पृथिव्याः सकाशात् ) प्रयमूर्ध्वो मेध उत्थितः यमस्या इमं सं प्रजा उपजीवन्ति । ( पृथिव्याः सकाशादूर्ध्व विनिर्गतं श्रन्नादिकं मनुष्य प्रजाः उपभुञ्जते ) । अर्वाचीनं दिवः - ( दिवः सकाशादुत्थितमुदकात्मकमधी निर्गतमुपभुञ्जते ) " । यह जो वसा है - यह रस है घृत है । यदि द्युलोक से वृष्टि हो जाए और पृथिवी से वापस न जाए तो थोड़े दिनों में द्युलोक का सारा खजाना खाली हो जाए । श्रतएव मानना पड़ता है कि जो पानी पृथिवी में श्राता है वह वापस भी जाता है । यहाँ से गया हुआ पानी ही तो द्युलोक से बरसता है - प्रतएव श्रुति कहती है- ' इतः प्रदाना वै वृष्टिः १ । का कारण बनता है - वह इस " इतः प्रदानः " पर अवलम्बित है एवं जिस पार्थिव रस को ( अन्न को ) हम खाते हैं, वह वृष्टि पर निर्भर है । यदि वृष्टि होगी तो अन्न उत्पन्न होगा एवं अन्तरिक्ष का घृत द्यु से जाएगा तो वृष्टि होगी । अन्तरिक्ष में रहने वाला घृत ही सारस ही - वृष्टि का कारण बनता है । यही कारण है कि कई अर्ब मनुष्य इस भूमण्डल पर रहते हैं और वे अपरिमित अन्न खा जाते हैं - तब भी अन्न कम नहीं होता । इसका एकमात्र कारण वसाहोम है । सारे प्राणियों की जो वसा है- घृत है - वह सूर्थ्य रश्मियों द्वारा ऊपर जाया करता है । वही पानी बन कर बरसता है । उसी से अन्न उत्पन्न होता है । इसी आदान- विसर्गात्मक यज्ञ के कारण अन्न की कमी नहीं हो पाती । चूंकि प्रकृति यज्ञ में वसा - होम से रस ( पार्थिव - धु ) तीव्र होता रहता है, अतएव उसी की नकल पर वितत होने वाले इस यज्ञ में भी यजमानात्मा का भोग्य जो पार्थिव और द्यु. रस है, वह अक्षय्य रहे- इसलिए वसाहोम किया जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" रसो वै वसाहोमः । रसो मेधः । रसेनैवैतद् रसं ( पार्थिवं- दिव्यं च )

तीव्रीकरोति ( समर्धयति ) । तस्मादयं रसोऽवद्यमानो न क्षीयते " ॥३० ॥

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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण वसा - होम में एक प्रश्न और बच जाता है - वह यही है कि - वसा - होम अर्धर्च के बीच में क्यों किया जाता है? इसी का उत्तर देते हैं-" तत् ( तंत्र ) यत् ( यस्मात् ) अन्तरेणार्धचौं याज्यायै वसाहोमं जुहोति ( तदुच्यते ) " । हमने बतलाया था कि यह याज्या - ऋक् त्रिपदा है । इसमें दो पद की प्राधी ऋचा है - वह पृथिवी-स्थानीया है एवं एक पद की प्राधी ऋचा है - वह द्युस्थानीया है । अर्धर्च- पृथिवी लोक है, अर्धर्च द्युलोक है । और पृथिवी के बीच में अन्तरिक्षलोक होता है । इस वसा की आहुति अन्तरिक्ष के लिए होती है । वसा घृत है, अन्तरिक्ष घृत का लोक है । अतः अग्नि में आहुत वसा अन्तरिक्ष में ही जाती है । अन्तरिक्ष चूंकि द्यावापृथिवी के बीच में है एवं अर्धर्च पृथिवी है - अर्धर्च द्यौ है - अतएव अर्धर्च के बीच में से प्राधी ऋचा बोल कर ही प्रान्तरिक्ष्य वसाहोम किया जाता है । वसा - होम अन्तरिक्ष के लिए ही होता है । अन्तरिक्ष - याज्या ऋक् के ( द्यावापृथिवी के ) बीच में है, अतएव, प्राधी ऋचा बोल कर ही - वसा-होम करना उचित है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ---" इयं वाऽअर्द्धर्चः । असौ द्यौरर्द्धर्चः । अन्तरा वै द्यावापृथिवोऽअन्तरि-क्षम् । अन्तरिक्षाय वै जुहोति । तस्मादन्तरेणार्द्धच्चों याज्यायै वसाहोमं जुहोति ॥३१ ॥

वसा होम क्यों किया जाता है? - क्यों करना चाहिए? किस समय करना चाहिए? - इत्यादि प्रश्नों का सोपपत्तिक, उत्तर हो चुका, अब पद्धति बतलाते हैं । वह प्रतिप्रस्थाता-" घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबत | अन्तरिक्षस्य हवि-रसि स्वाहा " । ( वा ० सं ० ६।१६ ) इस यजुः मन्त्र से वसा की आहुति दे देता है । घृत पीने वाले देवता घृत पान करें एवं वसा - पान करने वाले देवता वसा पान करें । हे वसा! आप अन्तरिक्ष की हवि हो । अन्तरिक्ष में रहने वाले सारे देवताओं के लिए यह प्राहुति दी जाती हैं । उन प्रारण देवताओं में कितने ही घृत का ही ग्रहण करते हैं, कितने ही वसा से तृप्त होते हैं । जैसे मनुष्यों में सामिष निरामिष - ये दो भेद हैं, तथैव प्राण देवताओं में भी " सामिष और निरामिष " ये दो भेद हैं । चूंकि वसाहुति में दोनों और घृतोपस्तरण एवं घृतापि धान रहता है, अतएव " घृतं घृत ० " - इत्यादि कहा जाता है । यह वसाहुति किसी खास देवता का नाम ले कर नहीं दी जाती, अपितु सामान्य रूप से दी जाती है, प्रतपत्र " इस आहुति " को सारे देवताओं की वस्तु बतलाई जाती है । अपिच - मन्त्र के उत्तरार्द्ध में - ' अन्तरिक्षस्य हविरसि ' कहा जाता है - इससे तो स्पष्ट ही वैश्वदेवत्व सिद्ध हो जाता है । क्यों कि अन्तरिक्ष वैश्वदेव है - प्रर्थात् अन्तरिक्ष में पार्थिव और सौर- दोनों देवता रहते हैं । एक प्राणत्य प्रजा है - एक उदानत्य प्रजा है । सूर्य से पृथिवी की ओर आने [ ४६२ ]

पृष्ठ 477

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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण वाली जो सौर प्रजा है, वह ' प्राणत्य ' प्रजा कहलाती है, एवं पृथिवी से निकल कर ऊपर की ओर जाने वाली पार्थिव - प्रजा - उदानत्यं प्रजा कहलाती । यद्यपि पार्थिव प्राण उदानत्य नहीं कहलाता - अपान कह-लाता है । परन्तु पृथिवी की अपनी हालत की अपेक्षा से पृथिवी से ऊपर निकलने वाला प्राण उदान भी कहा जा सकता है । अतएव यहाँ पार्थिव देव प्रजा के लिए " उदानत्यः " कह दिया गया है । प्रकृत में बतलाना यही है कि इधर से पार्थिव देवता ऊपर जाते हैं, उधर से सौर देवता पृथिवी की ओर प्रा हैं । अन्तरिक्ष में- दोनों का ( पार्थिव एवं सौर देवताओं का ) मेल हो जाता है, अतएव हम अन्तरिक्ष को वैश्वदेव कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-.. " स जुहोति - घृतं घृत XXX एतेन वैश्वदेवेन यजुषा जुहोति । वैश्वदेवं वान्तरिक्षम् । तद्यदेनेन ( वैश्वदेवेन ) इमाः प्रजाः प्राणत्यश्च ( सौर देवताः ) उदनत्यश्च ( पार्थिव देवताः ) अन्तरिक्षमनुचरन्ति तेन ( अन्तरिक्षं ) वैश्वदेवम् " । तात्पर्य कहने का यही है कि चूंकि वसाहुति अन्तरिक्ष के लिए दी जाती है एवं अन्तरिक्ष वैश्वदेव है, अतएव भूयसी दक्षिणावत् - इस घृत मिश्रित वसाहुति का सम्बन्ध सारे देवताओं से हो जाता है | वसाहोम के बाद प्रधानयाग होता है । वसा - होमानन्तर " वोषट् " इस प्रकार से वषट्कार करने पर जुहू में जो हृदयादि अवदान होते हैं उनकी आहुति डाल देता है--" वषट्कृते जुहोति - यानि जुह्वामवदानानि भवन्ति " || ३२ || इसके अनन्तर जुहू द्वारा दधिमिश्रित श्राज्य के एक देश में से आज्य का अवदान करते हुए अध्वर्यु होता के प्रति " वनस्पतयेऽनुब्रूहि " यह प्रैष करता है । प्रधान होमानन्तर वनस्पति याग और होता है । यह पृषदाज्य से किया जाता है । अतएव उसके लिए अनुवाक्यार्थ होता को आज्ञा दी जाती है । जब होता अनुवाक्या मन्त्र बोल चुकता है - तो अध्वर्यु " श्रश्रावय " यह कह कर दूसरे ऋत्विक् के प्रति कहता है - " वनस्पतये प्रेष्य " इति । तदनन्तर प्रतिप्रस्थातां अध्वर्यु के वषट्कार करने पर उसकी आहुति दे देता है -" थ जुह्वा ( जुहूद्वारा ) पृषदाज्यस्य - ( एकदेशम् ) उपघ्नन् अव-द्यन् ) ग्रह - वनस्पतयेऽनुब्रूहि - इति । श्राश्राव्याह- वनस्पतये प्रेष्येति - वषट्कृते जुहोति " । यहाँ पर प्रश्न होता है कि जब अभी तक वनस्पति- होम की चर्चा ही नहीं थी तो फिर अक-स्मात् ही यह बीच में कैसे आ घुसा? यहाँ पर वनस्पति के लिए प्राहुति देने की क्या श्रावश्यकता थी? इसी का उत्तर देते हैं—-[ ४६३ ]

पृष्ठ 478

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण " तद्यत् वनस्पतये जुहोति - ( तस्य कारणमुच्यते ) ” । पशुपुरोडाश ब्राह्मण • श्रतएव जिस यूप - वस्त्र को इस यज्ञ में खड़ा किया जाता है - इस वनस्पत्याहुति से वह यूप भी अर्थात् वनस्पति भी इस पशु - यज्ञ में शामिल हो जाता है । यह यूप ही नहीं, संसार के यच्चयावत् वृक्ष भी वनस्पति कहलाते हैं । कारण इसका यही है कि सोम की अनेक जातियाँ हैं । उनमें से एक सोम ' वनस्पति ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इसी से वृक्षों को परिपुष्टि होती है, अतएव वृक्षों को ' वनस्पति ' कहा जाता है । यूप भी उसी वनस्पति सोम से बना है, अतएव इस यूप को भी हम " वनस्पति " कहने के लिए तय्यार हैं । ऐसी अवस्था में वनस्पति के लिए प्राहुति देना ग्रुप को इस पशु - यज्ञ में शामिल करना है, क्योंकि यूप वनस्पति ही है | चूँकि वनस्पति सोमस्वरूप है, अतएव यूप - वनस्पति को इस यज्ञ में शामिलकरना, पशु को सोमयुक्त करना है, क्यों कि सोम ही का तो नाम वनस्पति है । इष्टि- पशु - सोम-तीनों अविनाभूत रहते हैं । ऐसी अवस्था में चूं कि इस पशु - यज्ञ में सोम का सम्बन्ध करना अत्यावश्यक था श्रतएव प्रधानयाग और स्विष्टकृत् के बीच में पशु के साथ सोम सम्बन्ध करने के लिए - पशु - यज्ञ को सोम - यज्ञ बनाने के लिए - वनस्पति के लिए पृषदाज्याहुति दी जाती है । तात्पर्य यही है कि यूप - वनस्पति सोममय होने के कारण वनस्पति कहलाता है । ऐसी अवस्था में ' वनस्पतये ' से पशु - यज्ञ में यूप भी हिस्सेदार बन जाता है । वनस्पति चूंकि सोम है, अतः इसका शामिल होना पशु में सोम का शामिल होना है । बस, हमारा पशु - यज्ञ सोम - युक्त हो जाए, अतएव प्रधान याग और स्विष्टकृत् के बीच में वनस्पति ( यूप ) सोम के लिए पृषदाज्याहुति दी जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" एतमेवैतद् वज्रं यूपं भागिनं करोति । सोमो वै वनस्पतिः - पशुमेवैतत् सोमं करोति " । यहाँ पर एक प्रश्न और बच जाता है । वह यही है कि पशु में सोम - सम्बन्ध आवश्यक था, प्रत एव वनस्पति सोम के लिए पृषदाज्याहुति देना तो उचित है, परन्तु यह श्राहुति प्रधानयाग और स्विष्ट-कृत् के बीच में क्यों दी जाती है? - यह समझ में नहीं आता । इसी का उत्तर देते हैं-" तद्यदन्तरेणोभे ( प्रधान स्विष्टकृतयोर्मध्ये ) प्राहुती जुहोति ( तदु-च्यते ) " । चूँकि पशु का हिस्सा प्रधानयाग में भी है, स्विष्टकृत् में भी है एवं सोम का सम्बन्ध पशु से करना है । ऐसी अवस्था में देहली- दीपक न्याय से प्रधान और स्विष्टकृत् दोनों के बीच में वनस्पति के लिए आहुति देने से यह सोम दोनों और व्याप्त हो जाता है-" तथोभयं व्याप्नोति । तस्मादन्तरेणोभेऽप्राहुती जुहोति ॥३३ ॥

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण १ - दिश: स्वाहा - से पूर्वदिक् अभिप्रेत है । २ - प्रदिश: स्वाहा - से दक्षिणादिक् अभिप्रेत है । ३ - प्रादिशः स्वाहा - से पश्चिमादिक अभिप्रेत है । ४ - विदिश: स्वाहा से उत्तरादिक अभिप्रेत है । ५ - उद्दिश: स्वाहा से ऊर्ध्वादि अभिप्रेत है । ६ - दिग्भ्यः स्वाहा से सारी दिशाएँ अभिप्रेत हैं । [ ४६५ ] पशुपुरोडाश ब्राह्मण ( वा ० सं ० ६।१६ ) १ - दिशाः- पूर्वादिक् । २ - प्रदिश: - दक्षिणा दिक् । ३ - आदिशः - पश्चिमदिक् । ४ - विदिशः - उत्तरादिक् । ५ - उद्दिश: - ऊर्ध्वादिक् । ६- दिग्भ्यः - सर्वादिशः । प्रधानयाग के ग्रनन्तर स्विष्टकृत्याग होता है । स्विष्टकृत्याग के लिए जो अवदान होते हैं, वे उपभृत् में रक्खे रहते हैं । प्रधानयागानन्तर जो अवदान ( दक्षिणबाहु, वामश्रोणि, गुद का सूक्ष्म भाग ) रक्खे थे, उन्हें आहुति के लिए उठाता हुआ प्रतिप्रस्थाता द्वारा होता के प्रति - " स्विष्टकृते ऽनुब्रूहि " यह प्रेष करने के अनन्तर अध्वर्यु श्राश्रावरण कर्म्म करता है । श्राश्रावणानन्तर अध्वर्यु " अग्नये स्विष्टकृते प्रेष्य " यह कहता है । इसके बाद जब अध्वर्यु वषट्कार करता है तो वषट्कार के हो जाने पर उसके साथ प्रतिप्रस्थाता उन अवदानों की आहुति दे देता है-" अथ यान्युपभृत्यवदानानि भवन्ति तानि समानयमान ग्रह " अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि " इति । श्राश्राव्याह- अग्नये स्विष्टकृते प्रेष्येति । वषट्कृते जुहोति 19 ॥३४ ॥

साहोमानन्तर वसाहोमहवनी में जो वसा द्रव्य ( मांस- रस ) बाकी बच जाता है उससे " दिग्-व्याघार " करता है । एवं साथ ही निम्नलिखित मन्त्र बोलता है-" दिशः प्रदिशमादिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा " - इति । तात्पर्य यही है कि जो वसा द्रव्य शेष रह गया है, उसे पूर्वोक्त मन्त्र बोलते हुए सब ओर उछाल देना चाहिए | चूँकि श्रुति में " दिशो व्याघारयति " यह कहा है । प्रत: एक - एक मन्त्र को एक - एक के लिए समझना चाहिए । दिशः स्वाहा - प्रदिशः स्वाहा - इत्यादि क्रम से सब के आगे स्वाहा लगाना चाहिए-इस प्रकार भाष्यकार ' दिशः प्रदिशः का अर्थ पूर्व - पश्चिम लगाते हैं । परन्तु हम इसका अर्थ और पश्चिम ही अभिप्रेत होते तो खाली दिश: ग्रहण हो जाता है । फिर जो प्रदिशः ही कुछ समझते हैं । हमारा खयाल है कि यदि श्रुति को पूर्व स्वाहा कहने से भी काम चल जाता क्यों कि दिशः से सब का आदि कहा है, उसका और ही तात्पर्य समझना चाहिए । दिशः से पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण- इन चार दिशाओं का ग्रहण है । एवं सीमाबद्ध जो पदार्थ होते हैं अर्थात् जो ससीम पदार्थ होते हैं, उनकी जो एक सीमा है - वयोनाध है घेरा है - जिसने कि उन

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण पृथिवी - पुस्तक - ढेला आदि पदार्थों को ससीम बना रक्खा है, वही " प्रदिश " कहलाती हैं । वयोनाध अन्तिम दिक् होने के कारण " प्रकृष्ट दिशा " कहलाने लगती है । एवं अन्तरिक्ष में- खाली जगह में - जो इधर - उधर व्यवहार होता है - इसका नाम " आदिशा " है । इधर - उधर यह दिशा है - प्रतएव इस दिक् को दिशा कहते हैं । अग्निकोण, वायव्यकोण, ईशानकोण, नैर्ऋतकोरण - इनके लिए ' विदिशः ' कहा गया है एवं ऊर्ध्वादि के लिए " उद्दिशा " कहा गया है । दिग्भ्यः से सब का ग्रहण है-१ - दिश: - पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण । २ - प्रदिश: - ( सीमाबद्ध प्रदेशः । वयोनाधः । घेरा ) । ३ - श्रादिश: - ( अन्तरिक्ष में होने वाला - इधर - उधर व्यवहार ) । ४ - विदिश: - ( ईशानकोण, श्रग्निकोण, नैर्ऋतकोण, वायव्यकोण । ५ - उद्दिश: - ( ऊर्ध्वा दिक् ) । ६ - दिग्भ्यः - सब दिशाएँ । कहना प्रकृत में यही है कि अवशिष्ट वसा को पूर्व मन्त्र से सब ओर छिड़क देना चाहिए | क्यों छिड़कना चाहिए - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं— यह वसा द्रव्य रस है । यजमान का यज्ञात्मा इन्हीं दिशाओं में जाएगा, अतएव इन दिशाओं को रस युक्त बना देना चाहिए जिससे कि वह यज्ञात्मा सबल बन जाए । प्रकृति यज्ञ की ओर इशारा करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यज्ञ में ( प्रकृति यज्ञ में ) वास्तव में वसा से दिग्व्याधार होता रहता है, अतएव सारी दिशाओं में रस - स्थिति दिखलाई पड़ती है । अतः प्रकृतिवत् हमें भी अवश्य ही वसा से दिव्याधार करना चाहिए-" अथ यद् वसाहोमस्य परिशिष्यते तेन दिशो व्याधारयति - दिशः

प्रदिशो ( इत्यादिमन्त्रेण ) - रसो वै वसाहोमः । सर्वास्ववैतद्दिक्षु रसं दधाति ।

तस्मादयं दिशि दिशि रसोऽभिगम्यते " ॥३५ ॥

इस प्रकार जब पशु के अवयव स्वर्ग में चले जाते हैं तो तदनन्तर अवशिष्ट पशु का स्पर्श करते हैं, क्योंकि सम्मर्शन का यही समय है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि तुम्हें " बिल्ली - गीध और हिंसक जन्तु मेरे यज्ञ में प्रविष्ट हो कर पशु को दूषित कर डालेंगे " यह शंका हो तो इससे पहले ही पशु संमर्शन कर लेना चाहिए । अर्थात् - तुम्हें वहाँ का वातावरण देख लेना चाहिए । यदि हिंस्रकों का भय समझो और यह समझो कि दिग्व्याघार तक पशु इन हिंस्रकों के प्राक्रमण से नहीं बच सकता तो ऐसी स्थिति में पहले भी संमर्शन कर सकते हो और यदि स्थिति श्रनुकूल देखो - यदि " यहाँ पर कोई विघ्न नहीं हो सकता " यह समझो, तब दिग्व्याधारानन्तर ही संमर्शन करना चाहिए, क्यों कि संमर्शन का वास्तविक समय यही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--[ ४६६ ]