Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 481–490
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 481–490
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " थ पशुं सम्मृशति । एतहि संमर्शनस्य कालः । अथ यत् पुरा संमृ-शति इम उपतिष्ठन्ते ते विमथिष्यन्ते - इति शङ्कमानः । यद्यु विमाथान्नशङ्केत-श्रत्रैव संसृशेत् " ॥३६ ॥
वह श्रध्वर्यु - निम्नलिखित मन्त्र से पशु का सम्मर्शन करता है— " ऐन्द्रः प्रापोऽङ्गेऽङ्गे निदीध्यत् । ऐन्द्र उदानोऽङ्गेऽङ्गे निधीतः ” । ( वा ० सं ० ६।२० ) हे पो! तुम्हारे अङ्ग - प्रङ्ग में - सर्वाङ्ग में - ऐन्द्र प्रारण नितरां दीप्त हो जाए | तुम ऐन्द्रप्राणयुक्त हो जाओ एवं ऐन्द्र उदान भी तुम्हारे श्रङ्ग प्रङ्ग में समा जाए । सूर्य से पृथिवी की ओर आने वाला जो प्राण है - वह " प्राण " कहलाता है । वही जब पृथिवी की वस्तु बन कर पृथिवीं में से निकल कर ऊपर जाता है तो उदान कहलाता है । शरीर में श्राकर यह पार्थिव उदान ' अपान ' कहलाने लगता है । शतपथ में भगवान् याज्ञवल्क्य प्रपान को, पृथिवी के प्राति-स्विक सम्बन्ध को लक्ष्य में रख कर, ' उदान ' ही कहा करते हैं । यह पशु अङ्ग - प्रत्यङ्गों से क्षतविक्षत हो जाता है | इसके कितने ही श्रवयवों की आहुति दे दी जाती है । सारे शरीर का निर्माण प्रारण और उदान - ( पार्थिवरस - धुरस ) से ही होता है । अतएव मन्त्र द्वारा पशु के विकृत श्रङ्गों का पुनः सन्धान करते हैं-" यदङ्गशो विकृत्तो भवति तत् प्राणोदानाभ्यां संदधाति । देवत्वष्टर्भूरि ते समेतु सलक्ष्मा यद्विषुरूपं भवाति " इति । " हे पशु रूप निर्मातृ त्वष्ट! देव! ते ( तव पशोः ) यत् ( अङ्ग छेदनेन ) सलक्ष्म- प्रत एव विष्णुरूपं भवाति - ( भवति ) तत् - ते ( तव पशोः ) सम ( सम्यक् ) पूर्वस्मादपि भूरि ( प्रभूतं ) समेतु ( संगतो भवतु ) । पूर्वं यादृश-संवेशेनाविशिष्टम् - तादृशसंवेशेन विशिष्टं भवेत् ” । पशुओं के निर्माण करने वाले हे त्वष्टा देवता! यज्ञार्थ प्रङ्गच्छेदन से जो आपके पशु के अव-यव - लक्ष्म हो गए हैं - अर्थात् - तत्तत्स्थानों के प्रवयवों के प्राणों के निकल जाने से उसके हाथ - पैर मुँह- बन पसली सब अलग - अलग प्रतीत हो रहे हैं, श्रतएव यह पिण्डरूप मालूम हो रहा है- बेडौल उद्वेगकर रहा है - उसकी यह पिण्डरूपता बिल्कुल मिट जाए । एवं वह जैसा सुडौल आलम्भन से पहले था, वैसा ही अब हो जाए,, बल्कि पहले से भी अधिक सुडौल हो जाए । मन्त्र का तात्यर्थ बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-[ ४६७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " पशु में जो कमी हो गई थी, उसे पूरा कर उस पशु को फिर कृत्स्न बनाते हैं " --" कृत्स्नवृतमेवैतत् करोति " इति । " देवत्रा यन्तमवसे सखायोऽनु त्वा मातापितरो मदन्तु " इति । ( वा ० सं ० ६।२० ) देवतात्रों के मध्य में जाते हुए- किंवा देवताओं की प्रसन्नता के लिए तथा हमारी रक्षा के लिए-तुम्हारे मित्र तुम्हारे मातापिता सब - देवलोक में तुम्हारे गमन का अनुमोदन करें । यदि तुम्हारे माता - पिता तुम्हारे स्वर्ग जाने से दुःखी होंगे तो इसमें हमारा अनिष्ट होगा । अतः वे लोग " वाह! क्या बात है? आज हमारा पुत्र देवकार्य के लिए स्वर्ग में जा रहा है, हमारा बड़ा सौभाग्य है कि हमारे पुत्र ने देवकार्य्यं में काम आ कर हमारे वंश को उज्ज्वल किया " - यही कहते रहें । भेजा गया था, आज इस संमर्शन से परन्तु इस संमर्शन से यह सर्वात्मना जिस स्थान में इस पशु का आलम्भन कर इसके आत्मा को उसे कृत्स्न बना देते हैं । देवताओं को तो केवल आत्मा गया था । स्वर्ग में चला जाता है एवं इसका श्रात्मा भी स्वर्ग में चला जाता है -" तद्यत्रैनमहौषीत् - तदेनं कृत्स्नं कृत्वानुसमस्यति । सोऽस्य कृत्स्नो-s मुष्मिल्लोकात्मा भवति " || ३७ || ॥ इति पशुपुरोडाशब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रष्टमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ४६८ ]
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अष्टमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' प्रयाजानुयाज - ब्राह्मणम् ' [ मूल ] त्रीरिण ह वै पशोरेकादशानि । एकादश प्रयाजा एकादशानु-याजा एकादशोपयजो दश पाण्या गुलयो दश पाद्या दश प्रारणाः प्रारण उदानो व्यान इत्येतावान्वै पुरुषो यः परार्ध्यः पशूनां यं सर्वेऽनु पशवः ॥१ ॥
तदाहुः । किं तद्यज्ञे क्रियते येन प्राणः सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः शिव इति ॥ २ ॥
देव गुदं त्रेधा करोति । प्राणो वै गुदः सोऽयं प्राङाततस्तमयं प्राणो-S नुसंचरति ॥३ ॥
स यदेव गुदं त्रेधा करोति । तृतीयमुपयभ्यस्तृतीयं जुह्वां तृतीयमुपभृति तेन प्रारणः सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः शिवः ॥ ४ ॥
स ह त्वेव पशुमालभेत एनं मेधमुपनयेद्यदि कृशः स्याद्यदुदर्यस्य मेद-सः परिशिष्येत तद्गुदे न्यषेत्प्राणो वै गुदः सोऽयं प्राङाततस्तमयं प्राणोऽनुसं-चरति प्राणो वै पशुर्यावध्येव प्राणेन प्राणिति तावत्पशुरथ यदास्मात्प्राणोऽ पक्रामति दावेव तहि भूतोऽनर्थ्यः शेते ॥ ५ ॥
गुदो वै पशुः । मेदो वै मेधस्तदेनं मेधमुपनयति यद्युनंसलो भवति स्वय-मुपेत एव हि मेधं भवति || ६ || अथ पृषदाज्यं गृह्णाति । द्वयं वाऽइदं सपिश्चैव दधि च द्वन्द्वं वै मिथुनं प्रजननं मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते ॥ ७ ॥
तेनानुयाजेषु चरति । पशवो वाऽअनुयाजाः पयः पृषदाज्यं तत्पशुष्वेवैत-स्वयो दधाति तदिदं पशुषु पयो हितं प्राणो हि पृषदाज्यमन्नं हि पृषदाज्यमन्नं हि प्राणः || ८ || [ ४६६ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रयाजानुयाज ब्राह्मणं तेन पुरस्तादनुयाजेषु चरति । स योऽयं पुरस्तात्प्राणस्तमेवैतद्दधाति तेन पश्चादुपयजति स योऽयं पश्चात्प्राणस्तमेवैतद्दधाति ताविमा ऽउभयतः प्राणौ हितौ यश्चायमुपरिष्टाद्यश्चाधस्तात् ॥९ ॥
तद्वा एतदेको द्वाभ्यां वषट्करोति । श्रध्वर्यवे च यश्चैष उपयजत्यथ यद्यजन्तमुपयजति तस्मादुपयजो नामाथ यदुपयजति प्रवैतज्जनयति पश्चाद्ध्युप-यजति पश्चाद्धि योषायै प्रजाः प्रजायन्ते ॥१० ॥
स उपयजति । समुद्रं गच्छ स्वाहेत्यापो वै समुद्र प्रापो रेतो रेत एवै-तत्सिञ्चति ॥ ११ ॥
अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहेति । अन्तरिक्षं वाऽननु प्रजाः प्रजायन्तेऽन्तरिक्षमे -वैतदनु प्रजनयति ॥ १२ ॥।
देवं सवितारं गच्छ स्वाहेति । सविता वै देवानां प्रसविता सवितृप्रसूत एवैतत्प्रजनयति ॥ १३ ॥
मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहेति । प्रारणोदानौ वै मित्रावरुणौ प्रारणोदानावे-वैतत्प्रजासु दधाति ॥ १४ ॥
अहोरात्रे गच्छ स्वाहेति । श्रहोरात्रे वाऽननु प्रजाः प्रजायन्तेऽहोरात्रेऽ-एवैतदनुप्रजनयति ॥१५ ॥
छन्दांसि गच्छ स्वाहेति । सप्त वै छन्दांसि सप्त ग्राम्याः पशवः सप्ता-रण्यास्तानेवैतदुभयान्प्रजनयति ॥ १६ ॥
द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहेति । प्रजापतिर्वै प्रजाः सृष्ट्वा ता द्यावा-पृथिवीभ्यां पर्यगृह्णात्ता इमा द्यावापृथिवीभ्यां परिगृहीतास्तथोऽएवैष एतत्प्रजाः सृष्ट्वा ता द्यावापृथिवीभ्यां परिगृह्णाति ॥ १७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण प्रत्युपयजति । स यन्नात्युपयजेद्यावत्यो हैवाग्रे प्रजाः सृष्टास्तावत्यो हैव स्युर्न प्रजायेरन्नथ यदत्युपयजति प्रैवैतज्जनयति तस्मादिमाः प्रजाः पुनरभ्या-वर्तं प्रजायन्ते || १८ ॥ [ अनुवाद ] ' अग्निष्टोम ' - अपरपर्याय- अग्नीषोमीय याग में उदात्तानुदात्त आदि स्वरयुक्त मन्त्रों द्वारा अग्नि में सोमाहुति दे कर मानुष प्रज्ञानात्मा की स्वर्गप्राप्ति के लिए, नवीन देवात्मा परपर्याय ' यज्ञात्मा ' को उत्पन्न किया जाता है । देहयागानन्तर प्रज्ञानात्मा दैवात्मा के आकर्षण से आकृष्ट हो कर स्वर्ग प्राणदेवताओं स्थान प्राप्त कर लेता है । इसीलिए ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' यह श्रुति स्वर्गप्राप्त्यर्थ अग्निष्टोम पर पर्याय ज्योतिष्टोम का विधान बतला रही है । यज्ञ का वितान पुरुषाकार के अनुरूप किया जाता है । आधिदैविक यज्ञपुरुष जैसी ही स्थिति प्राध्यात्मिक यज्ञपुरुष की भी है । आधिदैविक प्राणों से जिस प्रकार अध्यात्म पुरुष उत्पन्न होता है, उसी प्रक्रिया के द्वारा वैधयज्ञ से दैवात्मा को उत्पन्न किया जाता है | मनुष्य में प्रज्ञानात्मा या भूतात्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक तीनों के रसों से उत्पन्न होता है । यही देहत्यागानन्तर कर्मफल भोगने के लिए लोकान्तर में जाया करता है । दूसरा ' शरीरात्मा ' अथवा ' हंसात्मा ' प्रज्ञानात्मा के उच्छिन्न हो जाने पर भी शरीर में रहता है । किन्तु शव दाह के बाद यह भी चला जाता है और वायु में इतस्ततः घूमता रहता है । तीसरा स्वयं शरीर है जो कि रस, असृक्, मांस, मेदस्, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र से युक्त है । इन तीनों ही आत्मानों की सत्ता पशु पर प्राश्रित है । ये तीनों आत्मा भोक्ता हैं और पशु इनके भोग्य हैं, अन्न हैं । किन्तु तीनों आत्माओं के पशु भिन्न हैं । पशु शब्द भोग्य अन्न का बोधक है । इन तीनों आत्माओं में प्रज्ञानात्मा प्रधान है, प्रधानात्मा के अनुगत पशुओं को अनुयाज एवं शरीरानुगत पशुनों को उपयाज कहा जाता है । इस प्रकार अध्यात्म-यज्ञ में श्रात्मा के प्रज्ञानात्मा, शरीर श्रात्मा व शरीर- इन भेदों से त्रिधा विभक्त होने से तथा प्रत्येक आत्मा के सत्ता - संस्थापक ११ पशु होने से ३३ पशु हो जाते हैं, अर्थात् तीन आत्मानों के लिए तीन पशु - एकादशिनी हो जाती हैं । अध्यात्मयज्ञ की तरह इस वैधयज्ञ में भी ११ प्रयाज, ११ अनुयाज व ११ उपयाज किये जाते हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि- ' त्रीणि हवा पशोरेकादशानि - एकादश प्रयाजा:, एकादश अनुयाजा:, एकादशो-पयाजा: ' इति । वे ३३ पशु - प्राण अध्यात्म में १० हाथों की अंगुलियाँ, १० पैरों की गु-लियाँ - दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र एवं मुख ये ७ शीर्षण्य प्रारण- उपस्थ व गुद भेद से २ अवाङ्प्राण, १ नाभि - इस रूप से १० प्रारण - कुल ये ३० प्रारण हैं । इनसे अतिरिक्त हमारे शरीर में पृथिवीलोक, द्युलोक व अन्तरिक्ष से भी ३ प्रारण प्राते हैं । सूर्य से हमारे शरीर में आने वाला प्रारण, पृथिवी से आने वाला प्रारण उदान तथा अन्तरिक्ष से आने वाला प्रारण व्यान है । ये ३ प्रारण ही अध्यात्म का निर्माण करते हैं । जो ३३ प्रारण इस पुरुष - पशु में हैं, ही प्राण मध्यम एवं अवर पशुओं में भी हैं ॥ १ ॥
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथं ब्राह्मणं प्रयाजानुयोज ब्राह्मण शरीरावयवभूत ३३ अवयवों में प्रारण ' की श्रेष्ठता का क्या कारण है? उसके द्वारा यज्ञ में क्या कार्य होता है जिसके कारण प्राण को श्रेष्ठ बतलाया? ॥ २ ॥
पशुपुरोडाश ब्राह्मण में यह बतला दिया गया है कि पशु के गुदभाग के स्थूल, मध्यम तनु ( सूक्ष्म, सबसे छोटा ) भेद से तीन विभाग किये जाते हैं । गुद का स्थूलभाग उपयड्याग में, मध्यमभाग प्रधानयाग में तथा प्रस्तरभाग स्विष्टकृयाग में काम आता है । मनुष्य 1. के शरीर का निर्माण पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्यौ: इन तीनों लोकों के रसों से होता है । किन्तु यह त्रिलोकी सौम्य त्रिलोकी है, न कि रोदसी त्रिलोकी । रोदसी त्रिलोकी की पृथिवी मर्त्य-अमृतभेद से दो प्रकार की है । मर्त्य पृथिवी पिण्डरूप पृथिवी है । पृथिवी के अग्निरूप प्राण का त्रिवृत् स्तोम पृथिवी कहलाता है, पञ्चदश स्तोम अन्तरिक्ष कहलाता है तथा एकविंश-स्तोम द्युलोक कहलाता है । इससे आगे भी त्रिरणव व त्रयस्त्रिश स्तोम तक पृथिवी का वाग्-भाग जाता है और अपना मण्डल बनाता है । यह वाग् भी अमृता अग्नि ही है - ' तस्यवा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ' । इससे ऊपर वागुरूपा अमृता के त्रयस्त्रिश स्तोम तक चतुर्थ आपो-लोक है । तात्पर्य यह है कि पृथिवी का अपना प्रारण ही ३३ प्रहरणों में वितत हो जाता है । स्तौम्य त्रिलोकी के समान शरीर - त्रिलोकी की स्थिति है । शरीर में गुदा से नाभि तक पृथिवी -लोक, नाभि से हृदय तक अन्तरिक्ष - लोक, हृदय से कण्ठ तक द्युलोक और कण्ड से ब्रह्मरन्ध्र तक चतुर्थ लोक है । स्तौम्य त्रिलोकी या चतुर्लोकी में पार्थिव प्राण ३३ विभागों में विभक्त हो कर चतुर्थ अपोलोक तक स्थित हैं, उसी प्रकार शारीर- त्रिलोकी या चतुर्लोकी में पार्थिव प्राण पूर्व की ओर वितत हो कर ३३ प्राणों में विभक्त हो कर शिर तक वितत हो रहा है । ३३ प्राणदेवताओं का जैसे पार्थिव अग्निप्रारण श्रालम्भन है, वैसे ही यह पार्थिव गुद प्राण शिरः प्रदेश तक ३३ शरीर- प्राणों का आलम्भन है । यही गुद- प्रारण सब प्राणों का मूल है-' प्राणो वै गुद: ' इति ॥३ ॥
वह अध्वर्यु इस गुद के एक - तृतीय भाग को उपयड्याग के लिए, एक तृतीय भाग को प्रधानयागार्थ जुहू में, तथा एक तिहाई भाग को स्विष्टकृयाग के लिए उपभृत् में रखता है । अतः तीनों भागों में सम्बन्ध होने से यह गुद- प्रारण सब अंगों से श्रेष्ठ है || ४ || अग्नीषोमीय पशु का गुद ही सर्वश्रेष्ठ अंग है । अत: वह अध्वर्यु मेधार्ह पुष्ट पशु को आलम्भन के लिए प्राप्त करे । यदि पुष्ट पशु न मिले और कृश पशु ही मिले तो उस गुदभाग में ब्रह्मादि ६ ऋत्विजों के खाने से बचे हुए उदर के मेद का मिश्रण कर उसके तीन भाग १ हिन्दी विज्ञानभाष्यकार स्वर्गीय पं ० मोतीलाल जी शास्त्री ने यहाँ प्राणशब्द से भाष्य-काराभिमत मुख्य प्राण का ग्रहण न कर सम्पूर्ण शरीर में प्रज्ञामात्रा, प्राणामात्रा, भूत-मात्रारूप से विद्यमान तत्त्वों में प्राणमात्रा का ग्रहण किया है क्यों कि सब का संचालक जो क्रियाशील प्रारण भाग है उसी का प्रारण शब्द में ग्रहण मानना उचित है । [ ४७२ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण करे । यह गुद प्राणस्वरूप है । पशु का पशुत्व इस गुदप्रारण पर ही आधारित है । जब तक प्राण से प्राणन- व्यापार होता है तब तक पशु का जीवन है । उसके न रहने पर वह शुष्क काष्ठ की तरह निर्जीव हो कर पड़ा रहता है ॥ ५ ॥
गुदप्राण पर ही पशु की सत्ता होने से गुदप्राण ही पशु है, वह मेधरूप अर्थात् दिव्यात्मा के साथ संगमनीय है । यदि पशु मांसल अर्थात् पुष्ट हो तो उदर्य मेद को गुदा में मिलाने की आवश्यकता नहीं । स्वयं गुदा में ही मेध - सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है ॥६ ॥
अग्निष्टोम याग में ११ प्रयाज, ११ अनुयाज तथा ११ उपयाज होते हैं । इस याग में आलब्ध पशु से प्रधानयाग, स्विष्टकृद्याग व उपयड्याग ये तीन याग किये जाते हैं । उनमें प्रधानयाग प्रयाजस्थानापन्न, स्विष्टकृयाग अनुयाजस्थानापन्न तथा उपयड्याग उपयाज-स्थानापन्न है । प्रधानयाग तीनों यागों में प्रथम होता है उसे प्रयाज कहते हैं । स्विष्टकृद्-याग प्रधानयाग के बाद होता है अतः उसे अनुयाज कहा जाता है । इस अनुयाजयाग में, उपभृत् में रक्खे हुए आहुतिद्रव्य से पृषदाज्य का सम्बन्ध किया जाता है । अग्नीषोमीय याग से नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न करना है, जिसके लिए योषावृषारूप मिथुन की आवश्यकता है । श्राज्य ( घृत ) - ' तेजो वै घृतम् ' के अनुसार तेजोद्रव्य होने से प्राग्नेय है, अग्नि ही वृषा है तथा दधि सौम्य होने से योषारूप हैं । इस प्रकार पृषदाज्य के द्वारा प्रजनन क्रिया के साधक वृषारूप मिथुन की सम्पत्ति बन जाती है ॥७ ॥
अनुयाज में पशुओं का पृषदाज्य स्थापित करता हुआ अध्वर्यु पशुओं में दूध का ही धान करता है । प्रकृति याग में पशु में पृषदाज्य है, अतः उसकी प्रतिकृति रूप से होने वाले वैध पशुयाग में अनुयाज- रूप पशुत्रों में पृषदाज्य किया जाता है । यह पृषदाज्य प्रारण-रूप है । यद्यपि पृषदाज्य स्थूलरूप है, उसे प्रारण कैसे कहा जा सकता है तथापि पृषदाज्य अन्न तो है ही । और अन्न का परिणाम ऊ रस होता है और ऊ प्राणरूप में परिणत हो जाता है | अतः पृषदाज्य प्रारणरूप है, यह सिद्ध हो जाता है । अतः अनुयाजों में पृषदाज्य का सम्बन्ध करता हुआ अध्वर्यु दिव्यात्मा के पशुओं में प्रारण का ही प्रधान करता है || ८ || बिना प्राणाधान के पशु में पशुत्व ही नहीं रहता, वह तो शुष्क काष्ठ के समान होता है । अनुयाज, पशु का पूर्वार्द्ध भाग है, हृदय से ऊपर का भाग है और उपयाज, पशु का पश्चि-मार्द्ध हृदय से गुदा तक का भाग है । दोनों से पशु का पूर्ण स्वरूप बनता है । चूँकि अनुयाज पशु का पूर्वार्द्ध भाग है, अतः अध्वर्यु पहले पृषदाज्य से अनुयाज करता है, पश्चात् उपयाज करते हुए पशु के पश्चिमार्द्ध भाग में प्राण का आधान करता है । इस प्रकार दोनों भागों में प्राण व उदान दोनों प्राणों का प्राधान हो जाता है ॥ ६ ॥
अनुयाज ( स्विष्टकृद् ) याग को अध्वर्यु तथा उपयाज को प्रतिप्रस्थाता सम्पन्न करता है । होता अनुवाक्या करता है । याज्या अध्वर्यु करता है । अनुयाज ( स्विष्टकृद् ) याग में [ ४७३ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मरण व आहुति देता है तथा उपयाज में प्रतिप्रस्थाता । होता एक ही है - वही दोनों के लिए वषट्कार करता है । होता द्वारा वषट्कार करने पर अध्वर्यु स्विष्टकृद् याग के आहुति द्रव्यों हुति दे देता है तथा प्रतिप्रस्थाता उपयाज के आहुति - द्रव्यों की आहुति दे देता है । यह है अनुयाज में पृषदाज्य द्वारा मिथुन सम्पादन करना अर्थात् प्रजनन क्रिया करना अनुयाज याग से होता है । पश्चात् प्रजनन क्रिया के - फलस्वरूप दिव्यात्मा का उत्पादन उपयाज से होता है, क्यों कि प्रजनन क्रिया के बाद ही योषा से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ १० ॥
प्रयाज एवं अनुयाज की तरह उपयाज भी ११ होते हैं । इन उपयाजों को ७ व ४ भेद से दो भागों में विभक्त किया जाता है । प्रजोत्पत्ति ७ उपयाजों की ही आवश्यकता होती है । वीर्याधान से ले कर माता के गर्भाशय से शिशु के बाहर निकलने तक के ७ व्यापार ही ७ उपयाज कहलाते हैं । प्रजोत्पत्ति के वीर्याधान से प्रारम्भ कर जो ७ व्यापार हैं उनमें प्रथम व्यापार रेतः सेचन है । हम जो अन्न खाते हैं वह सोममय होता है । अन्नस्थ सोम ही अग्नि द्वारा भुक्त हो कर रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र इस क्रम से अन्त में शुक्र रूप में. परिणत होता है । मैथुनी सृष्टि का उपक्रम प्रापः ( पानी ) से ही होता है । इसीलिए भग-वान् मनु ने ' अप एव ससर्जादी ' इस वचन के द्वारा सर्वप्रथम श्राप की सृष्टि बतलाई है । ऊपर तत्त्व ही पाँचवीं आहुति में जा कर पुरुष ( प्रजा ) रूप में परिणत हो जाता है । जैसा कि ' पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' - यह छान्दोग्य श्रुति बतला रही है । अप् तत्त्व ही समुद्र है, अप् - तत्त्व ही शुक्र है, अतः पत्नी की योनि में रेतः सेचन किया जाता है । ' समुद्र ' गच्छ स्वाहा ' मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रतिप्रस्थाता जो प्रथम प्राहुति देता है, वह रेतः सेचन ही करता है ॥ ११ ॥
वीर्य का गर्भ में प्रधान गर्भाशय के रिक्त होने पर अर्थात् अन्तरिक्ष में ही हो सकता है । इसीलिए प्रतिप्रस्थाता ' अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ दिव्यात्मरूप प्रजोत्पत्ति को अन्तरिक्षानुगत बनाता है ॥ १२ ॥
जब वीर्य स्त्री के गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है और ह मास तक परिपक्व हो जाता है तब उसे गर्भाशय से बाहर निकालने के लिए प्रेरणा- प्रदाता वायु गर्भाशय में हो कर धक्का मार कर प्रजा को गर्भ से बाहर निकालता है । गर्भ से शिशु को बाहर निकालने वाला प्रेरक वायु ही सविता है, इसीलिए ' सविता वै देवानां प्रसविता ' कहा है । यही उपयाज का तीसरा व्यापार है, अतः प्रतिप्रस्थाता ' देवं सवितारं गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ तीसरी आहुति प्रदान करता है ॥ १३ ॥
जब तक बच्चा ( प्रजा ) माता के गर्भ में रहता है, तब तक उसका श्वास - प्रश्वासादि सारा व्यापार माता पर प्राश्रित है । किन्तु गर्भ से बाहर निकलने पर उसका श्वास - प्रश्वास-रूप स्वतन्त्र हो जाता है । सूर्य से आने वाला श्वास मित्र कहलाता है तथा शरीर से बाहर [ ४७४ ] 1
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रयाजानुयाज ब्राह्मण निकलने वाला प्रश्वास हमारे शरीर से अलग होता है, अतः उसे वरुण कहते हैं । सूर्य से आने वाला श्वास - रूप व्यापार प्रारण कहलाता है । शरीर से निकल कर बाहर सूर्य की ओर जाने वाला प्रश्वास उदान कहलाता है, क्यों कि ऊर्ध्वगमन करता है । इसीलिए प्राण एवं उदान को मित्र व वरुण कहते हैं । अतः ' मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रतिप्रस्थाता चतुर्थ उपयाज के लिए आहुति प्रदान करता हुआ उत्पन्न शिशु प्रारण व उदान का अर्थात् श्वास व प्रश्वास का ही प्रधान करता है ॥ १४ ॥
गर्भस्थ शिशु को स्वतन्त्र रूप से न दिन का रस आग्नेय प्राण मिलता है और न रात्रि का रस सौम्यप्राण प्राप्त होता है । किन्तु गर्भ के बाहर निकलने पर उसे स्वतन्त्र रूप से वे रस प्राप्त होते हैं । अग्नि में सोमाहुति रूप संवत्सर यज्ञ से सारी प्रजा की उत्पत्ति, स्थिति एवं पुष्टि होती है । अहोरात्र समष्टि रूप संवत्सरात्मक यज्ञ द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रजा अहोरात्र का रस प्राप्त होता है । तदनुसार इस वैध यज्ञ के द्वारा उत्पन्न होने वाले दैवात्मा में अहोरात्र रस का आधान करने के लिए ' अहोरात्रे गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रतिप्रस्थाता चतुर्थ प्रयाज से यजन करता है ॥ १५ ॥
छन्द, वस्तु के अवच्छेद अर्थात् सीमा का नाम है । छन्द शब्दच्छन्द अर्थच्छन्द भेद से द्विविध है । शब्दछन्द अक्षर संख्या पर आधारित होता है । जैसे ' अष्टाक्षरा वै गायत्री ' यह श्रुति वचन है । किन्तु अर्थछन्द शब्दच्छन्द जितने ही तत्त्वों से अर्थछन्द कहलाता है - जैसे गायत्री - रूप अर्थ - छन्द में आठ तत्त्व होते हैं । पृथिवी को गायत्री कहा जाता है क्यों कि उसमें , फेन, मृत्, सिकता, शर्करा, अश्मा, अय:, हिरण्य भेद से आठ अवयव होते हैं । अग्नि को गायत्र छन्दा माना जाता है, क्योंकि अग्नि ८ वसुनों के कारण अष्टावयव है । इसी प्रकार उष्ण, अनुष्टुप् बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती ये छन्द भी अर्थछन्द तथा शब्दच्छन्द भेद से द्विविध हैं । वस्तु को सीमित करने वाले गायत्री आदि ७ छन्द हैं । इसी प्रकार सिंह, व्याघ्र, वराह, महिष, वारण, ऋक्ष, वानर भेद से ७ आरण्यक पशु हैं । तथा गौः, अज, श्रवि मनुष्य, अश्व, अश्वतर, गर्दभ ये ७ ही ग्राम्य- पशु हैं । जब तक शिशु माता के गर्भ में रहता है तब तक माता के छन्द से छन्दित होता हुआ परच्छन्दा कहलाता है । किन्तु गर्भ से निक -लने पर स्वच्छन्दा बन जाता है । इसलिए प्रतिप्रस्थाता ' छन्दांसि गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ षष्ठ प्रयाज कर शिशु को छन्दः सम्पत्ति से युक्त करता है ॥ १६ ॥
. जब शिशु सर्वाङ्गसम्पन्न हो कर अन्त में द्यावापृथिवी की गोद में अर्थात् गर्भ से बाहर निकलने के बाद पृथिवी और आकाश के बीच में आ जाता है । पृथिवी इसकी माता होती है । लोक उसका पिता । जैसे सप्तपुरुषात्मक पुरुष प्रजापति ने वीर्यनिधान से छन्दपर्यन्त प्रजा को सम्पन्न कर उसे द्यावापृथिवी से बद्ध कर दिया है, उसी प्रकार यह प्रतिप्रस्थाता वैध-यज्ञ द्वारा उत्पादित दिव्यात्मा एवं प्रजा को - ' द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चा-रण कर सप्तम प्रयाज करता हुआ द्यावापृथिवी से परिगृहीत कर लेता है ॥१७ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) ' शत ० ब्रा ० ३।५।३ ' । १. शतपथ ब्राह्मणे प्रयाजानुयाज ब्राह्मण प्रकरणों में बतला चुके है, अतएव में पशु का प्रलम्भन किया जाता इसका यही है कि इस यज्ञ द्वारा २. ' को ० ब्रा ० १७।७ ' । [ ४७६ ] ७ उपयाजों के बाद ४ प्रत्युपयाज और किये जाते हैं । ये चारों उपयाज पूर्वोक्त ७ उपयाजों का अतिक्रमण कर किये जाते हैं अतः इन्हें प्रत्युपयाज कहते हैं । ७ उपयाजों के यजन के बाद प्रतिप्रस्थाता चार प्रत्युपयाजों का यजन करता है । यदि इन ४ प्रत्युपयाजों का यजन न किया जाएगा तो दिव्यात्मा की उत्पत्ति के बाद प्रजोत्पत्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा । अतः प्रजोत्पत्ति चक्र के नैरन्तर्य के लिए ७ उपयाजों के बाद ४ प्रत्युपयाजों का यजन किया जाता है ॥ १८ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] उच्चावच लहरयुक्त प्राधिदैविक प्राण - देवताओं की गतिविधि के अनुसार उच्चावच लहरयुक्त ( उदात्तानुदात्तस्वरितयुक्त ) मन्त्रों द्वारा अग्नि में सोम की आहुति डाल कर मानुष प्रज्ञानात्मा के स्वर्ग प्राप्ति के लिए नए यज्ञात्मा को उत्पन्न किया जाता है एवं उत्पन्न कर उसका सम्बन्ध प्रज्ञानात्मा के साथ किया जाता है । इस बन्धन के कारण यज्ञकर्त्ता यजमान मानुषायु भोगान-तर सीधा स्वर्ग में चला जाता है । इस अग्निष्टोम याग का यही फल है । अतएव " ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग कामो यजेत " यह कहा जाता है । इस अग्निष्टोम द्वारा वैध उपायों से केवल एक नया " देवात्मा " उत्पन्न किया जाता है । यज्ञ द्वारा उत्पन्न होने के कारण इस देवात्मा को यज्ञात्मा भी कहा जाता है । यज्ञ - पुरुष ब्राह्मण ' में हमने बतला दिया है कि इस यज्ञ का विताने पुरुषाकार पर किया जाता है । जैसी स्थिति आधिदैविक यज्ञ - पुरुष की है, ठीक वैसी स्थिति प्राध्यात्मिक यज्ञ - पुरुष की है । आप मनुष्य के शरीर की बनावट को ध्यान से अन्तःकरण में चित्रित कर लीजिए । बस, यही यज्ञ का स्वरूप है । वैज्ञानिक महर्षियों ने यज्ञ विद्या का श्राविष्कार इसी अध्यात्म - यज्ञ के आधार पर किया है । हाथ - पैर - कान - नाक - मुँह - छाती - इत्यादि कैसे बन गए? इनकी बनगट ( बनावट ) में ऐसा वैचित्र्य क्यों है? अंगुलियाँ पाँच - पाँच ही क्यों हैं? कान दो ही क्यों है? आँख दो ही क्यों है? इत्यादि बातों की खोज ही यज्ञ - विद्या के श्राविष्कार का प्रधान साधन बनी थी । वैज्ञानिक महर्षियों ने इसी अध्यात्म-विज्ञान के द्वारा यज्ञ का वितान किया था । श्रतएव ब्राह्मणग्रन्थों में बार - बार " पुरुषों वै यज्ञः " २ " यज्ञो वै पुरुषः " इसका घण्टाघोष रहता है । अध्यात्मयज्ञ द्वारा ही महर्षियों ने प्राधिदैविक यज्ञ का पता चलाया एवं इस विज्ञान के द्वारा उन्होंने इस यज्ञ - विद्या का आविष्कार कर डाला जो कि नए श्रात्मा पैदा करने वाली साबित हुई । प्राधिदैविक के मुख्तलिफ ( गिने - चुने प्राणों से अध्यात्म का निर्माण होता है । महर्षियों ने उन प्राणों को पहचान लिया एवं किस तरह प्राण परस्पर मिलित हो कर अध्यात्मजगत् का निर्माण करते हैं, उन सारी क्रियाओं का पता लगा लिया । बस इसी भित्ति पर - इसी प्रलम्भन पर उन्होंने नए प्रात्मा को पैदा करने का द्वार खोल लिया, जो कि आज यज्ञविद्या के नाम से प्रसिद्ध है । अस्तु, इस विषय को हम पूर्व के यहाँ अधिक न कह कर केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि इस यज्ञ है । पशु के अंग - प्रत्यङ्गों की मन्त्रों द्वारा आहुति दी जाती है । कारण नया यज्ञात्मा पैदा करना । प्राकृतिक सृष्टि रचना में श्रात्मा की पैदाइश पशुप्राण पर निर्भर है ।