Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 491–500

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 491–500

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) १. ' ऋग्वेद मं ० ७।६३ | ४ | २. ' प्रश्नोपनिषद् ११८ ' । शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ( सामवेद पू ० ६ | १ | ३. ' ऋग्वेद मं ० १।११५।१ ' । [ ४७७ ] पशु - प्राण ही अध्यात्म - सृष्टि का आलम्बन है । बिना पशु - प्रारण के मनुष्य का जन्म हो ही नहीं सकता एवं न पशु - प्राण के बिना उसकी जीवन - सत्ता ही रह सकती है । चूंकि आज हमें यज्ञात्मा पैदा करना है. एवं आत्मा की पैदाइश पशु - प्राण पर अवलम्बित है, अतएव उस पशु - प्राण को उस दिव्यात्मा में आहित करने के लिए ही इस अग्निष्टोम यज्ञ में अग्नीषोमीय पशु का आलम्भन किया जाता है । पशु का प्रालम्भन क्यों किया जाता है? - इसकी यही उपपत्ति है । अब एक प्रश्न बच जाता है, वह यही कि अध्यात्म में पशु -प्राण कौन से हैं- एवं वही अध्यात्म सत्ता के अधिष्ठाता कैसे हैं? बस इस " प्रयाजानुयाज ब्राह्मण " में इसी प्रश्न का उत्तर दिया जाएगा । अध्यात्म की स्थिति पशु - प्राण पर ही अवलम्बित रहती है । इसके भी पहले पशु क्या चीज है? - यह समझ लेना आवश्यक होगा । संसार में भोग्य और भोक्ता इन दो के अलावा कोई तीसरी वस्तु है ही नहीं । वास्तव में देखा जाए तो खाने वाले और खाद्य पदार्थों के अलावा और है ही क्या? बस - जो खाद्य पदार्थ हैं - उन्हीं को ' पशु ' कहा जाता है, एवं खाने वाले को देवता कहा जाता है । खाद्य को, भोग्य मात्र को, उपकरण मात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । यह पशु देवभाव आपेक्षिक सम-झना चाहिए | उदाहरणार्थ- जौ, गेहूं इत्यादि खाद्य पदार्थ एवं अश्वगजादि भोग्य पदार्थ हमारी खुराक एवं उपभोग के रूप में काम में आने के कारण हमारे ( मनुष्यों के ) पशु हैं एवं हम इनके देवता हैं । परन्तु सौर प्राणदेवता चूँकि अस्मदादि पार्थिव जड़ - चेतनों को हर वक्त चूसा करते हैं, सौर- रश्मियाँ प्रतिक्षण पार्थिव पदार्थो को खींचा करती हैं, यच्चयावत् पार्थिव पदार्थ सौर प्राणदेवताओं की खुराक बनते रहते हैं अतएव ये पार्थिव पदार्थ उन सौर प्रारणों के पशु कहलाते हैं एवं ये सौर प्राण इन पार्थिव पशु के देवता कहलाते हैं । पार्थिव पशुओं का ये प्राणदेवता हर वक्त आलम्भन किया करते हैं । इस आलम्भन से सारा सृष्टि क्रम चलता रहता है । " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता: १ " प्राणः प्रजाना-सुदयत्येष सूर्य्य: " इत्यादि श्रुति वाक्यों से सिद्ध होता है कि पार्थिव सृष्टि के उत्पादक एवं प्रतिष्ठापक यही भगवान सूर्य्य हैं । जड़ - चेतन दोनों को उत्पन्न करने वाले प्रतएव दोनों के आत्मा यही सूर्य्यं हैं । अतएव - " सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च 3 यह कहा जाता है । ऐसी अवस्था में यदि सूर्य पैदा ही करता जाता एवं प्रतिसंचरक्रिया द्वारा उन्हें वापस न लेता तो थोड़े दिन में सृष्टि - क्रम ही बन्द हो जाता-परन्तु ऐसा नहीं होता, अतएव मानना पड़ता है कि वह जिस प्रकार विसर्ग करता है, उसी प्रकार प्रदान भी करता रहता है | आदान- विसर्ग क्रिया से ही विश्व की सत्ता प्रतिष्ठित रहती रही है । सूर्य ही नहीं - अपितु संसार के यच्चयावत् पदार्थ कुछ लेते हैं - कुछ देते हैं । सब भोक्ता हैं - सब भोग्य हैं । सब अन्न हैं - सब अन्नाद हैं । अपेक्षया सब देवता हैं - सब पशु हैं । प्रतएव श्रुति कहती है-" हमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इदेवमावत् श्रहमन्नमन्नमदन्तमद्भि " ॥

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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण यहाँ पर प्रकृत में हमें सौर प्राणदेवताओं का और पार्थिव प्रयाजानुयाज ब्राह्मण पशुओं का विवेचन करना है । पार्थिव पशु पर - प्रवर - और मध्यम- इन तीन विभागों में बँटे हुए हैं । स्तम्ब - वृक्षादि को भी सौर प्राण हर वक्त चूसा करते हैं अतएव हम इन्हें भी ( दूर्वा - लता - गुल्म - वृक्षादि को भी ) पशु कहने को लिए तय्यार हैं । चूँकि ये जड़ पदार्थ हैं, अतएव हम इन्हें ' अवर ' कोटि के पशु कहने के लिए तय्यार हैं । दूसरे हैं - अश्वादि पशु । इन्हें चेतना के कारण मध्यम कहने के लिए तय्यार हैं । एवं तीसरे पशु हैं - मनुष्य । इनमें चेतना अधिक मात्रा में उल्वण है एवं इनके प्राणों को भी सौर देवता हर वक़्त चूसा करते हैं, अतएव इन्हें ' पर ' पशु कहा जाता है । पशु से मनुष्यादि स्थूल शरीर ही विवक्षित नहीं समझने चाहिए, अपितु पशु - प्राण ही अभिप्रेत समझने चाहिए । चेतन सृष्टि के समस्त पशु - प्राणों को प्रधानतया -' पुरुष प्रश्व - गो- श्रवि श्रज ' - इन पाँच भागों में विभक्त माना जाता है । ये पाँचों ही पशु प्राणरूप हैं सौर- देवता इन प्रारण - पशुत्रों को ही चूसा करते हैं । प्राण चूंकि निराकार हैं, अतएव सौर देवताओं की प्रदान क्रिया का स्थूल दृष्टि से प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता । -पशु उपकरण का अन्न का नाम है, देवता भोक्ता का नाम है । देवता और पशु की यही सामान्य परिभाषा है । अभी और किसी पशु का विचार न कर हम केवल मनुष्य पशु पर ही थोड़ी सी दृष्टि डालते हैं । मनुष्य शरीर में आत्मा भी है और पशु भी है । अव्यय, अक्षर, क्षर एवं परात्पर नामक fron तत्त्व की समष्टि का नाम ही ' आत्मा ' है । अव्ययादि तीनों धातु पञ्च पञ्च कलोपेत हैं, प्रत एव इस आत्मा को " षोडशी प्रजापति " कहा जाता है । मनुष्य शरीर में यह आत्मा मौजूद है । मनुष्य में ही नहीं - यह षोडशी ग्रात्मा तो जड़ - चेतन सब में मौजूद है । दूसरी आत्मा है - प्रज्ञानात्मा । पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ - इन तीनों लोकों के रसों से हमारा निर्माण होता है । इन तीनों के मेल से एक नया भूतात्मा और उत्पन्न होता है, वही प्रज्ञानात्मा कहलाता है । यही प्रज्ञानात्मा - अन्न का भोक्ता है । खाने की इच्छा इसी प्रज्ञानात्मा को होती है । प्रज्ञानात्मा में जो प्रज्ञा है - वह मन ( अनिन्द्रियमन ) कहलाता है । यही इच्छा का अधिष्ठाता है । जो षोडशी श्रात्मा है, वह तो सर्वधारक है, अतएव वह प्रकृत में आत्म शब्द से अभिप्रेत नहीं है । यहाँ पर यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाली आदान विसर्गात्मिका क्रिया का अधिष्ठाता प्रज्ञानात्मा ही अभिप्रेत । इस प्रकार मनुष्य शरीर में एक तो यह आत्मा है, एवं दूसरा है - शरीर आत्मा | अस्थिमांसादि की रक्षा करने वाले प्रज्ञानात्मा से अतिरिक्त एक आत्मा और है, जो केवल शरीर से ही सम्बन्ध रखता है । प्रज्ञानात्मा के निकल जाने पर भी शरीर आत्मा रहता है । इसका प्रत्यक्ष - प्रमाण यही है कि आत्मा के निकल जाने पर ( मर जाने पर ) शरीर ज्यों का त्यों रहता है । वह शरीर आत्मा शरीर के दाहानन्तर ही शरीर से अलग होता है । इसी शरीर श्रात्मा को - " हंसात्मा " नाम से व्यवहृत किया जाता है । इस प्रकार दो तो आत्मा हैं एवं तीसरा सामेदोमांसादि सप्तधातुयुक्त शरीर है । इन तीनों की सत्ता पशु - प्राण पर प्रवलम्बित है । प्रज्ञानात्मा भी हर वक्त प्राणियों को खाया करता है- शरीर श्रात्मा भी प्राणाहुति ग्राहृत करता रहता है एवं शरीर भी धातु रक्षार्थ अन्न के द्वारा पशु - प्राण को खाया करता है । इन तीनों में जो पशु - प्रारण प्रज्ञानात्मा द्वारा अशनाया सूर्य से उस आत्मा की वस्तु बन जाता है- प्रात्मा ही बन जाता है - वह पशु-" जो आता है, वह " बहिर्याम " शरीरमात्मा के काम में प्राण " अन्तर्य्याम कहलाता है । पशु - प्रारण [ ४७८ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण कहलाता है एवं जो पशु - प्रारण शरीर - सत्ता रखता है, उसे " उपयाम " कहते हैं । ग्रात्मोपयोगी अन्न " अन्तर्य्याम " है, शरीरात्मोपयोगी अन्न बहिर्याम है, एवं शरीरोपयोगी अन्न ' उपयाम ' है । बस, जो पशु-प्राण आत्मानुगत हो कर आत्मा के अन्न बनते हैं, उन्हें " प्रयाज पशु " कहा जाता है एवं जो पशु-प्राण शरीरात्मानुगत हो कर शरीरात्मा के अन्न बनते हैं उन्हें ' अनुयाज ' कहते हैं, एवं जो पशु - प्रारण शरीरानुगत हो कर शरीर के अन्न बनते हैं, उन्हें " उपयट् " पशु कहते हैं । ये तीनों ही पशु - प्रारण ग्यारह ( ११ ), ग्यारह ( ११ ) हैं । इस प्रकार कुल तेतीस ( ३३ ) पशु - प्रारण हो जाते हैं । बस इन तेतीस ( ३३ ) पशु - प्राणों से ही मनुष्य पशु की - शरीर की सत्ता है, एवं इन सभी से आत्मा की सत्ता है । यदि इन प्राणों की आहुति न हो तो शरीर, शरीर आत्मा एवं प्रधान आत्मा ( अधिष्ठाता ) तीनों एक क्षण में नष्ट हो जाएँ । तीनों में आत्मा प्रधान है, अतएव इस पूर्व भावित्व को बतलाने के लिए इन श्रात्म - पशुनों को " प्रयाज पशु " कहा जाता है । शरीर आत्मा प्रधानात्मा के अनुगत है, अतएव इन पशुओं को " अनुयाज " पशु कहा जाता है एवं शरीरानुगत पशुओं को उपयाज पशु कहा जाता है । कहना - इस सारे प्रपञ्च से यही है कि अध्यात्म में पशु के एकादश परिमित मण्डल तीन हैं । तीन ( ३ ) पशु एकादशिनी हैं । ग्यारह ग्यारह पशुनों के तीन योग हैं । इस प्रकार अध्यात्म में कुल तेतीस ( ३३ ) पशु हो जाते हैं । अध्यात्म - सृष्टि में - प्रात्मा, शरीरात्मा, शरीर ये तीन विभाग हैं । एवं तीनों ही-• अन्तर्थ्याम, बहिर्य्याम, उपयाम- इन तीनों नामों से व्यवहृत होते हैं । एवं तीनों के जो स्थिति - संस्थापक भोग्य प्राण हैं, वे भी अन्तर्य्याम श्रादि नाम से ही व्यवहृत होते हैं । इन तीनों पशुत्रों को जो कि प्रत्येक ग्यारह ग्यारह हैं, प्रयाज- अनुयाज उपयाज - इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । चूंकि अध्यात्म-- पुरुष - यज्ञ में तेतीस ( ३३ ) पशु हैं एवं आज यह यजमान वैध उपायों द्वारा नया आत्मा उत्पन्न करना चाहता है एवं आत्मोत्पत्ति में अध्यात्मवत् पशु - प्राण की आवश्यकता है, अतएव दैवात्मा उत्पन्न करने वाले इस अग्निष्टोम यज्ञ में पश्वालम्भन कर प्रयाजानुयाज किए जाते हैं । पशु के अङ्गों की देना - देवात्मा की स्थिति के लिए उसमें पशु - प्रारण का प्राधान करना है । चूंकि प्रात्मा प्रधान है, अतएव पहले तदनुगत प्रयाज करने पड़ते हैं, बाद में अनुयाज करने पड़ते हैं, बाद में उपयट् करने पड़ते हैं । सारे कथन का निष्कर्ष यही हुआ कि यज्ञ द्वारा नया आत्मा पैदा करना है, एवं अध्यात्म में तीन पशु एकादशिनी रहती हैं एवं इसी अध्यात्मवत् वैध यज्ञ का वितान किया जाता है - श्रतएव इस अग्नीषोमीय यज्ञ में अध्यात्म एवं प्रधिदेवतवत् ग्यारह प्रयाज किए जाते हैं- ग्यारह ही अनुयाज किए जाते हैं - ग्यारह उपयाज किये जाते हैं । इस अग्निषोम यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) प्रयाज, ग्यारह ( ११ ) अनुयाज, ग्यारह ( ११ ) उपयाज करने का कारण एकमात्र यही आधिदैविक और प्राध्यात्मिक यज्ञ । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं—-" त्रीणि ह वै पशोरेकादशानि - एकादश प्रयाजा: एकादशानुयाजाः, एकादशोपयजः " | आधिदैविक मण्डल की अपेक्षा - आध्यात्मिक संस्था नजदीक पड़ती है - अतएव उसी के प्रयाजादि तेतीस ( ३३ ) पशु बतलाते हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वास्तव में अध्यात्म में तीन ही पशु एका-[ ४७६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शत ० ब्रा ० ६।३।२८ | १. प्रयाजानुयाज ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ ४८० ] दर्शिनी हैं । श्रात्मा शरीर श्रात्मा, शरीर भेदेन प्रयाज ( अन्तर्य्याम ), अनुयाज ( बहिर्याम ) उपयाज ( उपयाम ) - ये तीन ही पशु - एकादशिनी है । वास्तव में अध्यात्म का स्वरूप बनाने वाले कुल तैंतीस ( ३३ ) ही पशु - प्राण हैं | हाथ - पैरों की अंगुलियों पर दृष्टि डालिए । दस ( १० ) हाथों की अंगुलियाँ हैं, दस ( १० ) पैरों की अंगुलियाँ हैं । ये अंगुलियाँ भिन्न - भिन्न प्राणों की द्योतिका हैं । भिन्नता का एकमात्र कारण यही, प्राण - भेद है | पशु - प्रारण कि - स्वरूप है? इसका उत्तर है- अग्नि स्वरूप । परोरजा, सौम्य, प्राप्य, वायव्य श्राग्नेयादिभेदेन प्रारण अनन्त प्रकार के होते । इनमें जो पशव्य प्राण हैं, वे पार्थिव सम्बन्धेन आग्नेय प्राण कहलाते हैं । ' प्राण, आप, वाक्, अन्नाद, अन्न ' - इन पाँच पञ्चीकृत यज्ञक्षरों - ' ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ' - इन पाँच आत्मक्षरों के विकार हैं । ये ही पाँचों यज्ञक्षर - " स्वयम्भू " परमेष्ठी सूर्य्य - चन्द्रमा-पृथिवी - इन नामों से व्यवहृत होते हैं । इस क्रम में पृथिवी - अग्नि का विकार होती है । चूँकि पृथिवी है-पूषा कहलाती है- " इयं वे पूषा " १ । पूषा ही पशु - प्राण का अधिष्ठाता है - एवं पृथिवी प्राग्नेयी श्रतएव हम इन पार्थिव पशव्य प्राणों को आग्नेय कहने के लिए तय्यार हैं । शरीरस्थ आग्नेय पशु - प्राण जिधर - जिधर से निकलता है - उसी श्रोर बाल नहीं उग पाते । रोमावलियों में हो कर खराब खून बाहर निकला करता है एवं उसके बाहर निकलते ही रुद्र वायु ( रूखा वायु ) उसे सुखा देता है, वही लोम बन जाते हैं । परन्तु जिन - जिन रास्तों में हो कर वह आग्नेय पशु - प्रारण निकलता रहता है, उन उन स्थानों में अग्नि के प्रबल वेग से निकलने के कारण वहाँ खराब खून जम ही नहीं पाता । यह श्राग्नेय प्राण हाथ - पैर गुदा उपस्थ - मुँह - नाक - कान- आँख - इनमें से हो कर अनवरत निकला करता है, अतएव इतने स्थानों में बाल नहीं जम पाते । हम देखते हैं कि हाथ में और पैर में पाँच - पाँच अंगुलियाँ हैं, अतएव मानना पड़ता है कि वह पशु - प्राण अवश्य ही इतनी तरह का होता है । यदि एक ही पशु - प्रारण होता एवं पैरों तो जैसे बाहु - एकाकार होता है तथैव हस्त भी तदाकार ही होता, परन्तु ऐसा नहीं होता । हाथों में में भिन्न - भिन्न स्वरूपों वाली जो बीस ( २० ) शाखाएँ ( अंगुलियाँ ) निकल जाती हैं, ये ही बीस पशव्य प्राणों के कारण हैं । इनके प्रतिरिक्त हमारे शरीर में सूर्य्य, पृथिवी और अन्तरिक्ष- इन तीनों के भी प्राण आते हैं । सूर्य्य में जो प्राण आत्मा है, वह प्राण ही कहलाता है । यह कण्ठ से हृदय तक व्याप्त रहता है । अन्तरिक्ष में जो प्राण आत्मा है, वह व्यान कहलाता है । यह सारे शरीर का संचालन करता हुआ हृदय । पृथिवी से आने वाला प्राण ' उदान ' कहलाता पशु - प्राण ही कहलाते हैं । ये तीनों ही प्राण से नाभि तक प्रादेश मात्र प्रदेश में अभिव्याप्त रहता है है - यह नाभि से गुदा तक अभिव्याप्त रहता है ये तीनों भी " स्तौम्य " त्रिलोकी से सम्बन्ध रखते हैं । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि तेतीस ( ३३ ) प्राणों में ये प्राण उदान - व्यान मुख्य प्राण कहलाते हैं एवं इन तीनों में भी द्युलोक का प्राण तो सबसे ( दो मुख्य आँख होता , दो । इसी प्रकार मस्तक में कुल सात प्रारण हैं । इन सातों प्रारणों में छः ( ६ ) प्राण नाक, दो कान ) यम हैं अर्थात् जोड़ले हैं एवं एक ( १ ) मुख इकल्ला ( केला ) है । इन्हीं सात शीर्षण्य प्राणों के लिए श्रुति कहती है-" साकंजानां सप्तथं आहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति " । तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः " । ( ऋग्वेद मं ० १।१६४।१५ )

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रयाजानुयाज ब्राह्मरण एक उपस्थ प्राण है एवं एक गुद प्रारण है । इस प्रकार कुल तेतीस ( ३३ ) प्राण हो जाते हैं । २० - अंगुलि प्राण | ३- १. प्राण- २ व्यान- ३ उदान । ७- ( सप्त शीर्षण्य प्राण ) २ - ( १ - उपस्थ - २ - गुद ) १- ( नाभि ) शीर्षण्याः प्राणः सप्त अवाच द्वौ नाभिर्दशमी पार्थिव अग्नि को वैश्वानर कहा जाता है, प्रान्तरिक्ष्याग्नि को - तैजस एवं दिव्याग्नि को प्राज्ञ कहा जाता है | चूँकि पार्थिवाग्नि को वैश्वानर कहा जाता है, एवं यही पशव्य प्रारण है, अतएव उप-निषदों में वैश्वानरात्मा को षडङ्ग बतलाया जाता है । शरीर में से निकलने के लिए इस अग्नि वैश्वानर निकला के वास्तव में छः ही द्वार हैं । दोनों हाथ दोनों पैर - मुख और गुदा- बस इन्हीं में से वैश्वानर पश्चि करता है । पशु की ओर ध्यान दीजिए । चारों पर दिखलाई देंगे - पूर्वार्द्ध में मुख दिखलाई देगा, मार्द्ध में गुदा दिखलाई देगी । बस, ये ही छः रास्ते हैं । अस्तु, प्रकृत में हमें यही कहना है कि अध्यात्म में कुल तेतीस ( ३३ ) प्राण हैं । बीस ( २० ) हाथ पैरों की अंगुलियाँ हैं । दस प्रारण हैं - ( सप्त शीर्षण्य- सारे प्राण ( ७ ), गुदा ( ८ ) वाँ, उपस्थ ( 8 ) वाँ, नाभि - ( १० ) वाँ, एवं प्रारण व्यान - उदान- तीन त्रैलोक्य प्रारण हैं । ये चूँकि ' स्तौम्य ' त्रिलोकी से सम्बन्ध रखते हैं, अतएव हम इन्हें पशु - प्राण कहने के लिए तय्यार हैं । बस - पुरुष की यही मात्रा है । पुरुष का पुरुषपना यदि पूछना चाहते हो तो वह इतना ही भेदेन है । तेतीस ( ३३ ) प्राण ही पुरुष का पुरुषपता है । हम ने बतलाया था कि पशु पर अवर, मध्यम यच्च-तीन प्रकार के होते हैं । इन तीनों में से यह ' पुरुष ' पशु परार्ध्य है - अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है । संसार के पुरुष यावत् पशु इसी परार्ध्य ( सर्वश्रेष्ठ ) पशु के श्रनुगत रहते हैं - अर्थात् - जो तेतीस ( ३३ ) प्राण इस ( ३३ ) परार्ध्य पशु में हैं, वे ही तेतीस ( ३३ ) प्राण मध्यम गो- श्रश्वादि पशुओं में हैं एवं वे ही में तेतीस इन्द्रियों के न प्राण स्तम्बादि अपरार्ध्यं पशुओं में हैं । अन्तर केवल इतना है कि प्रवरार्ध्य पशुयों के कारण रहने के कारण तेतीस ( ३३ ) प्रारण अनुत्वरण रहते हैं एवं पुरुषाश्वगवादि में इन्द्रियों के होने, इसी उल्वण रहते हैं, परन्तु तेतीस ( ३३ ) हैं सब में । ये सारे पशु परार्ध्यं - पुरुष पशु के अनुगत हैं । बस विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" दश पाण्या गुलयः दश पाद्याः । दश प्रारणा: ( सप्त शौर्षण्याः - द्वौ श्रवाञ्चौ नाभिर्दशमि ) प्रारण उदानो व्यानः । एतावान् वै पुरुषो यः परार्यः पशूनाम् । यं सर्वेऽनु पशवः ( य मनु सर्वे पशवो भवन्ति ) " । चूंकि पुरुष - यज्ञ में तेतीस ( ३३ ) हैं एवं उसी की नकल पर हमारा यह वैध यज्ञ है, अतएव सृष्टि प्रक्रिया के अनुसार इस अग्निष्टोम यज्ञ में भी दैवात्मा में तेतीस ( ३३ ) पशु- प्राणाधान ( करने ११ ) के लिए ग्यारह ( ११ ) प्रयाज किए जाते हैं - ग्यारह ( ११ ) श्रनुयाज किए जाते हैं एवं अब ग्यारह उपयाज उपयाज किए जाते हैं । इनमें से प्रयाजानुयाज की इति कर्त्तव्यता बतला दी गई । [ ४८१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण बतलाए जाएँगे । बस – अग्निष्टोमीय यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) प्रयाजादि क्यों किए जाते हैं? - इसकी यही उपपत्ति है । " त्रीणि ह वै पशोरेकादशानि । एकादश प्रयाजाः एकादशानुयाजाः एकादशोपयजः । दश पाण्या अंगुलयः, दश पाद्याः, दश प्राणाः, प्रारण उदानो

व्याः इत्येतावान् वै पुरुषो यः पराः पशूनाम् । यं सर्वेऽनु पशवः ” ॥१ ॥

पूर्व के प्रकरण से सिद्ध हो जाता है कि यज्ञ - पुरुष में यदि कोई सारभूत तत्त्व है, तो वह यही त्रिशत्कल वैश्वानर प्रारण है । बिना इस त्रिशत्कल वैश्वानर प्राण के न आत्मसत्ता रह सकती है और न शरीरात्मसत्ता रह सकती है एवं न शरीर सत्ता ही रह सकती है । अन्तर्य्याम बन कर यह पशु - प्रारण ( वैश्वानर - प्राण ) आत्मसत्ता रखता है, बहिर्याम बन कर शरीरात्म सत्ता रखता हैं एवं उपयाम बन कर रसासृङ्मांसादि सप्तधातुयुक्त शरीर - सत्ता रखता है । इस प्रकार पशु - प्राण का सर्वश्रेष्ठ होता सर्वात्मना सिद्ध हो जाता है । परन्तु चूंकि यहाँ पर प्रारण के विषय में एक विज्ञान और बतलाना है अत-एव भगवान् याज्ञवल्क्य प्राण के श्रेष्ठत्व के विषय में फिर पूर्वपक्ष कहते हैं - वैदिक परिभाषानुसार ' तदाहुः ' पदको पूर्वपक्षपरक समझना चाहिए । वादी पूर्वपक्ष कहते हैं कि प्रारण से इस यज्ञ में ऐसा कौन सा काम किया जाता है जिससे कि यह त्रिंशत्कल प्राण श्रात्मादि की अपेक्षा भी श्रेष्ठ माना जाता है । प्रारण को श्रेष्ठ मानने की क्या उपपत्ति है? वस्तुतः देखा जाए तो श्रात्मा ही प्रधान है । पुरुष यज्ञ में भी श्रात्मा ही ( प्रज्ञानात्मा ही ) प्रधान है एवं वैध यज्ञ में भी आत्मा ही ( दैवात्मा ही ) प्रधान है, फिर प्रारण को क्यों प्रधान माना जाता है? काम हाथ - पैरों से होता है । मन्त्र का काम मुँह से होता है, निरीक्षण प्राँखों से होता है । इस प्रकार यज्ञ का सारा काम तो शरीरावयवों से होता है, परन्तु श्रेष्ठ माना जाता है प्राण को । हमें तो यज्ञ में सिवाय शरीराङ्गों के और किसी की प्रधानता मालूम नहीं होती । हमारे खयाल से प्राण से यज्ञ में कोई भी काम ऐसा नहीं किया जाता जिससे कि काम करने वाले और और शरीराङ्गों से प्राण ही को श्रेष्ठ माना जाए । भाष्यकार लोग--" येन प्राणः सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः शिव - इति " । इस उक्ति में पठित प्रारण का अर्थ मुख्यप्रारण परक लगाते हैं । हमने बतलाया था कि इन ३३ प्राणों में प्राण, अपान, व्यान, उदान- ये तीन प्राण मुख्य हैं एवं तीनों में से भी प्राण नाम का प्रारण मुख्यतम है । बस यहाँ पर प्राण से भाष्यकार यह मुख्यतम प्रारण ही प्रभिप्रेत समझते हैं । वे इस पूर्वपक्ष - परक श्रुति का अर्थ इस प्रकार लगाते हैं- " जैसे पुरुष के और प्रौर प्रारण हैं तथैव प्राणत्वेन यह मुख्य प्रारण भी साधारण ही है, फिर यज्ञ में और प्राणों की अपेक्षा इसे सर्वश्रेष्ठ क्यों माना जाता है? " । परन्तु हमारे खयाल से पूर्वपक्ष प्रतिपादिका श्रुत्युक्त प्रारण से मुख्यप्राण ही अर्थ लेना न कि तेतीस ( ३३ ) - इसमें क्या विनिग मक है? अतएव विनिगमना विरहात् - प्राणत्वेन प्रारण से तेतीस ( ३३ ) प्रारण ही अभिप्रेत समझने [ ४८२ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण चाहिए | सर्वेभ्यः अङ्गेभ्यः का ' अङ्गुल्यादि प्राणेभ्यः यह अर्थ नहीं है, अपितु इसका ' सर्वेभ्यः शरीश-वयवेभ्यः ' यही अर्थ है । क्यों कि प्रकरण से ऐसा ही मालूम होता है । शरीर के प्रज्ञामात्रा, प्राणमात्रा और भूतमात्रा - ये तीन विभाग हैं । इन तीनों में प्रज्ञा और भूत- दोनों प्रपङ्ग हैं- इन दोनों में ही क्रिया नहीं है । दोनों ही अकर्मण्य हैं । न इन दोनों में आदान - धर्म है - न विसर्ग - धर्म है, क्यों कि आदान-विसर्ग क्रियाएँ हैं । प्राण, क्रिया का धर्म है न कि प्रज्ञा एवं भूत का । प्राण ही कर्मण्य हैं । जब तक प्राण - व्यापार ( तेतीस - ३३ प्राणों का व्यापार ) होता रहता है तभी तक प्रज्ञा की ( प्रज्ञानात्मा की ) भूत की ( शरीर की ) स्थिति रहती है । रसासृङ्मांसादि स्वतः जड हैं, उनमें क्रिया नहीं है । यदि इनमें प्राण न हों तो ये धातु उसी समय नष्ट हो जाएँ । चूँकि यह प्राण- प्रज्ञामात्रा, भूतमात्रादि का संरक्षक है - बिना इस क्रिया - प्रधान वैश्वानर परार्ध्य - प्रारण के, जो कि तेतीस ( ३३ ) कलाओं में विभक्त है, प्रज्ञादि की स्थिति नहीं रहती, अतएव हम सब अङ्गों की अपेक्षा प्राण को ही प्रधान कहने के लिए तय्यार हैं । वास्तव में काम और और अवयवों से ही होता है- हाथ - पैर काम करते हैं, मुँह मन्त्र बोलता है; इतना होने पर भी यज्ञ में इस प्राण को प्रधान मानने का एकमात्र कारण यही है कि बिना क्रियाशील प्राण के हाथ, पैर, आँख, नाक - सब बेकार हैं । अस्तु, प्रारण क्यों श्रेष्ठ हैं? - इसका उत्तर भगवान् याज्ञवल्क्य आगे स्वयं देने वाले हैं । हमें यहाँ सिर्फ इतना ही कहना है कि पूर्वपक्षोक्त ' प्राण ' से मुख्य प्राण का ग्रहण करना सर्वथा अशुद्ध है । प्राण से - त्रिशत्कलोपेत प्रारण ही अभिप्रेत समझना चाहिए । यह प्राण क्यों प्रज्ञामात्रादि से श्रेष्ठ माना जाता है जब कि चर्म्मचक्षु से प्रज्ञामात्रा एवं भूत-मात्रा की ही प्रधानता दिखलाई पड़ती है, यही इस श्रुति का सीधा अर्थ है । इसी पूर्व पक्ष का उद्धरण करते ' हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" तदाहु: - किं तत् - यज्ञे क्रियते येन प्राणः ( त्रिशत्कलः पशु प्राण: ) सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः ( प्रारण भूतमात्राभ्यः ) शिवः ( श्रेष्ठ ) इति " ॥२ ॥

पशु - पुरोडाश ब्राह्मण में बतलाया गया है कि इस पशु के तीन विभाग किए जाते हैं । इन तीनों से प्रधानयाग - स्विष्टकृद्याग एवं उपयट् - ये तीन कर्म्म होते हैं एवं चौथा इडाप्राशन होता है । चारों के लिए चार ( ४ ) पात्र होते हैं । प्रधान याग जुहू से किया जाता है, स्विष्टकृद्याग उपभृत् से इडापात्री किया जाता से किया है-उपयट्याग वसाहोमहवनी से किया जाता है एवं - इडाप्राशन- " समवत्तधानी " नाम की तीन ही जाता है । इस प्रकार इन चारों कम्र्म्मो के लिए पशु के चार विभाग किए जाते हैं । चारों में से प्रत प्रधान होते हैं । इडाप्राशन के लिए उन तीनों में से ही जरा जरा - सा हिस्सा ले लिया जाता कौन है - कौन । से एव इडाप्राशन का इन तीन में ही अन्तर्भाव कर लिया जाता है । इन तीनों में पशु के अवयव होते हैं? - इसका विवेचन पूर्व के ' पशु पुरोडाश ' ब्राह्मण में कर दिया गया है । वहाँ पर हमने बतलाया है कि पशु गुदा के तीन विभाग किए जाते हैं । एक स्थूल विभाग किया जाता है, एक सूक्ष्म किया जाता है - एक मध्यम किया जाता है । इस प्रकार एक ही गुदा के तीन विभाग कर मध्य जो गुदा का का स्थूल हिस्सा है - उसे तो उपभृत् में रक्खा जाता है एवं उससे उपयट् याग होता है, जो [ ४८३ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण हिस्सा है - उसे जुहू में रक्खा जाता है - उससे प्रधान याग होता है, जो सबसे छोटा है उसे वसा होम-हवनी में रक्खा जाता है एवं उससे स्विष्टकृद्याग होता है । इस प्रकार एक ही गुदा के तीन विभाग किए जाते हैं एवं तीनों को तीनों में ( जुहू - उपभृत् - वसा होमहवनी में ) रक्खा जाता है । श्रीर और अव-यवों के हिस्से न करके केवल गुदा के ही तीन विभाग क्यों किए जाते हैं? गुदा का तीनों आहुतियों से सम्बन्ध करने की क्या आवश्यकता है? यह प्रश्न बच जाता है । बस इसी का उत्तर देते हैं-“ यदेव - ( यस्मात् कारणात् ) गुदं त्रेधा करोति - ( तदुच्यते - इति शेषः ) " । जिस तेतीस ( ३३ ) कलोपेत पशु - प्रारण का हमने पूर्व में विवेचन किया है - वह पशु - प्रारण गुदा यही है । हमने बतलाया है कि हमारे शरीर का निर्माण- पार्थिव, आन्तरिक्ष्य एवं दिव्य- इन तीनों लोकों के रस से होता है । त्रैलोक्य - रस ही हमारा निर्माता है । यह त्रैलोक्य कई तरह का है । पृथिवी अन्त-रिक्ष- द्यौ - इन तीनों की समष्टि को ' त्रिलोकी ' कहा जाता है । ऐसी त्रिलोकी प्राठ हैं - जिनका विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । उन त्रिलोकियों में प्रकृत में हमारा स्तोम्य त्रिलोकी से सम्बन्ध है । जिसे हम सूर्य्य - लोक कहते हैं - वह द्यौ है वही स्वर्गलोक कहलाता है; जिस पर हम बैठे हैं, वह पृथिवीलोक है एवं सूर्य और पृथिवी के बीच का स्थान " अन्तरिक्षलोक " कहलाता है । इस त्रिलोकी को ' रोदसी त्रिलोकी ' कहा जाता है । इस रोदसी त्रिलोकी की जो पृथिवी है, उसकी प्रातिस्विक जो एक नई त्रिलोकी श्रौर बनती है - वही ' स्तोम्य ' त्रिलोकी कहलाती है । उसी का प्रकृत से सम्बन्ध है । पृथिवी के प्रत्येक पदार्थ में - अमृत और मर्त्य दो प्रकार का श्रग्नि रहता है । ' मर्त्य ' श्रग्नि पिण्ड तक रहता है, अमृताग्नि पिण्ड से बाहर तेतीस ( ३३ ) तक अपना मण्डल बनाता है । इस अमृताग्नि को ही ' वाक् ' कहते हैं, श्रतएव - " तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् " यह कहा जाता 1 चूंकि इसी का यह मण्डल बनता है, प्रतएव इसे " वाङ्मण्डल " भी कहा जाता है । इस वाङ्मण्डल में किसी खास विज्ञान के कारण तेतीस ( ३३ ) विभाग मान लिए जाते हैं एवं छः स्तोम मान लिए जाते हैं । वे स्तोम त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश-त्रिणव एवं त्रयस्त्रिंश - इन नामों से व्यवहृत होते हैं । चूंकि ये ६ विभाग उस वाक् के हैं, श्रतएव इस मण्डल को " वाक् षट्कार " कहते हैं । निरुक्तानुसार वाक् षट्कार - " वषट्कार " स्वरूप में परिणत हो जाता है । इस वषट्कार के त्रिवृत् स्तोम तक पृथिवी लोक माना जाता है, पञ्चदश तक अन्तरिक्षलोक माना जाता है - एकविंश ( २१ ) तक द्युलोक माना जाता है, इक्कीस ( २१ ) के ऊपर तेतीस ( ३३ ) तक बौथा श्रापोलोक माना जाता है । इसी चौथे लोक के लिए " अस्ति वै चतुर्थो देवलोक श्रापः " १ यह कहा जाता है । इस प्रकार केवल पृथिवी के अमृताग्नि से त्रिलोकी का - कौषीतकि मतानुसार चतुर्लोकी का -वितान होता है । पृथिवी का जो अपना प्राण है, वही रथन्तर साम कहलाता है । वही पूर्व की ओर वितत हो कर तेतीस ( ३३ ) अहर्गणों में परिणत हो जाता है । पृथिवी ही क्या, यच्चयावत् पार्थिव १. को ० ब्रा ० १८।२ । [ ४८४ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजांनुयाज ब्राह्मण पदार्थों में चाहे वह छोटा हो या बड़ा, यह स्तौम्य त्रिलोकी - वितान रहता है । एक तिल में भी चारों लोक मौजूद हैं । एक पहाड़ में भी ये चारों लोक मौजूद हैं । इसी प्रातिस्विक त्रिलोकी को " स्तौम्य " त्रिलोकी कहते हैं । कहने को पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ - तीन लोक हैं, वस्तुतः पार्थिव प्राण ही तीनों में व्याप्त है । अतएव तौम्य त्रिलोकी के अभिप्राय से पृथिवी की सत्ता सूर्य से भी ऊपर तक बतलाई जाती है । तीनों लोकों के रस से ही मनुष्य का निर्माण होता है, वह यही स्तोम्यलोक है । रोदसी से निर्माण नहीं होता अपितु स्तोम्य त्रिलोकी से होता है । जैसी स्थिति स्तोम्य त्रिलोकी की है, ठीक वैसी ही स्थिति इस मनुष्य - त्रिलोकी की है । स्तौम्य त्रिलोकी का पार्थिव प्राण गुदा से नाभि तक रहता है, यही उदान कहलाता है । प्रान्तरिक्ष्य प्राण नाभि से हृदय तक रहता है, यही व्यान कहलाता है । दिव्यप्राण हृदय से कण्ठ तक रहता है, यही प्रारण कहलाता है । चतुर्थ लोक का प्राण कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र पर्य्यन्त रहता है । गुदा से नाभि तक पृथिवीलोक है - नाभि से हृदय तक अन्तरिक्षलोक है- हृदय से कण्ठ तक द्युलोक है - कण्ठ से ब्रह्म- रन्ध्र तक चतुर्थ लोक है । जैसी स्थिति पार्थिव स्तोम्य त्रिलोकी की है - ठीक वैसी स्थिति त्रिलोकी से बनने वाली शारीर- त्रिलोकी की है । पार्थिव प्रारण ही जैसे तेतीस ( ३३ ) विभागों में परिणत हो कर चार लोकों में व्याप्त हो रहा है तथैव पार्थिव गुद - प्राण ही पूर्व की ओर -शिर- प्रदेश की ओर - वितत हो कर तेतीस ( ३३ ) विभागों में परिणत हो रहा है । तेतीस ( ३३ ) प्राण वही गुद - प्राण है । गुद - प्रारण ही तो तेतीस ( ३३ ) बना हुआ है । जैसा स्तोम्य त्रिलोकी के तेतीस ( ३३ ) प्राण - देवताओं का श्रालम्बन पृथिवी का केन्द्रस्थ पार्थिव प्रारण है- वही सर्वालम्बन है, ठीक इसी प्रकार यह गुद - प्राण ही तेतीस ( ३३ ) प्राणों का आलम्बन है । यह गुद प्रारण ही सर्वालम्बन है । यही, जैसे-पार्थिव प्राण सारी तौम्य त्रिलोकी का आधार है तथैव पार्थिव स्थानीय गुद प्रारण सारी शरीर त्रिलोकी का आलम्बन है । यही मल स्थान है । इस मल का आलम्बन यही गुद- प्रारण है । यदि गुदच्छेदन हो जाता है तो उसी समय मल हट जाता है एवं मल हटते ही वह मनुष्य मृत्यु के मुख में चला जाता | यही गुद- प्रारण सब का मूल है - यही तेतीस ( ३३ ) बना हुआ है, अतएव योग- शास्त्र की परिभाषा में - इसे " मूलाधार " कहा जाता है एवं वैदिक परिभाषा में " पुच्छ प्रतिष्ठा " कहा जाता है । चूंकि यह सर्वालम्बन प्राण गुदा में रहता है, अतएव " तात्स्थ्यात्ताच्छन्द्यम् " इस न्याय के अनुसार इस गुदा को ही ' प्रारण ' कहने लगते हैं । प्राण का आश्रय यही गुदा है । यह गुदा ऊपर की र अर्थात् शिरोभाग की ओर उठी हुई है । गुदा का रुख ऊपर की ओर है । ऊपर की ओर रुख रखने वाली गुदा का यह प्रारण अनुगमन करता है । अर्थात् गुदा द्वारा यह प्राण तेतीस ( ३३ ) भागों में परिणत हो कर मस्तक तक व्याप्त हो रहा है । सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि स्तोम्य त्रिलोकी-वत् गुद - प्राण ही मुख्य है । यही तेतीस ( ३३ ) में परिणत हो रहा है । उसका मूल स्थान मूलद्वार है, अतएव उस मूलद्वार को ही ' प्राण ' कह दिया जाता है । मूल द्वार का रुख ऊपर की ओर है एवं प्राण उसी के अनुगत हो कर तेतीस ( ३३ ) विभागों में परिणत हो रहा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं—-" प्राणो वै गुदः । सोऽयं प्राङाततः । तमयं प्राणोऽनु संचरति " ॥३ ॥

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण इस प्रकार शरीर त्रिलोकी का अधिष्ठातृ उस गुदा का ( प्राण ), वह अध्वर्यु, उसके तीन विभाग करें - एक तिहाई हिस्से को उपयट् के लिए एक तिहाई हिस्से को प्रधान यागार्थ जुहू में एवं एक - तिहाई हिस्सेको में रखता है, अतएव यह प्राण सारे अंगों से श्रेष्ठ | और अवयवों को तीनों कम्म उपभृत् में शामिल नहीं किया जाता, अपितु गुदा को ही तीनों कम्मों में शामिल किया जाता है - यह यज्ञ - पद्धति ही इस प्राण श्रेष्ठत्व में दृढ़ प्रमाण है । बात वास्तव में सच है । गुद - प्राण ही तो तेतीस ( ३३ ) बना हुआ है । वही तो परार्ध्य पुरुष का स्वरूप है । आज यज्ञात्मा में पशु - प्राणाधान करना है । तीनों लोकों के पशु - प्राणों को आहित करना है । यह काम गुदा से हो जाता है । गुदा ही तीनों लोक बना हुआ है । श्रतएव उसका सम्बन्ध करना तेतीस ( ३३ ) प्राणों का सम्बन्ध कर देना है । पृथिवी मूल है - प्रन्तरिक्ष मध्यम है एवं द्यौ प्रणिष्ठ है । अतएव गुदा के भी इसी क्रम से तीन विभाग किए जाते हैं । गुद के सम्बन्ध से दिव्यात्मा अध्यात्मवत् त्रिलोकी-संपत् से युक्त हो जाता है प्रतएव उसका तीनों कम्मों से सम्बन्ध किया जाता है । भला प्रारण ( त्रिंशत्कल ) और शरीरावयवों से श्रेष्ठ है, इसमें इससे अधिक और क्या प्रमाण हो सकता है? इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— " स यदैव गुदं त्रेधा करोति । तृतीयमुपयभ्यः तृतीयं जुह्वां तृतीय-मुपभृति - तेन प्राणः सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः शिवः " ॥४ ॥

ही सर्वश्रेष्ठत्व सिद्ध होता है । यदि गुदा के अग्निषोमीय पशु में पूर्वोक्त कथनानुसार गुद का तीन विभागों का तीनों आहुतियों के साथ सम्यक् सम्बन्ध कर दिया जाता है तो दिव्यात्मा सर्वावयव सम्पन्न हो जाता है । इसी अभिप्राय को ध्यान में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— वही अग्नीषोमीय पशु का प्रलम्भन करे जो कि मेध योग्य पशु को प्राप्त कर सके अर्थात् श्रग्नी-षोमीय यज्ञ में गुदा ही करामात है । श्रतएव यज्ञ करने वाले यजमान को चाहिए कि वह ऐसे मोटे - ताजे तीन विभाग आसानी से हो सकें । तात्पर्य यही है कि पशु पशु का आलम्भन करे जिसकी कि गुदा के खरीदते समय कृपणता नहीं करनी चाहिए । यदि दो सौ ( २०० ) रुपये भी लगें तो भी मांसल पशु ही खरीदना चाहिए । यदि दो सौ ( २०० ) रुपय्ये खर्च करने एवं बहुत तलाश करने पर भी मोटा - ताजा पशु न मिले अपितु दुबला - पतला ही पशु मिले तो पशु के उदर का बचा हुआ जो मांस है, उसे उस गुदा में शामिल कर दे । उदर का जो मांस है एवं और - और जो पशु अवयव हैं, उन्हें ६ ऋत्विक् खाते हैं | ब्रह्मा होता उद्गाता, अध्वर्यु, यजमान एवं आग्नीध्र - ये ६ ऋत्विक् इडाप्राशन करते हैं । इनके प्राशन से बचा हुआ जो उदर्थ्य मांस है, उसे उस गुदा में मिला देना चाहिए एवं बाद में उसके तीन विभाग करने चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" स ह त्वेव पशुमालभेत - य ( उपगच्छेत्, प्राप्नुयात् ) यदि कृशः एनं मेधं ( मेधार्ह प्रवृद्धं पशुं ) - उपनयेत् स्यात् - यदुदर्य्यस्य मेदसः परिशिष्येत तद् गुदे ( अल्पीयसीति शेषः ) न्यृषेत् ( गमयेत् ) - ( तेन प्रवर्द्धयेदिति भावः ) " । [ ४८६ ]