Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 501–510
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 501–510
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्राजानुयाज ब्राह्मणे उदय मांस से गुद की पुष्टि ( गुद- प्रारण की कमी ) क्यों कर पूरी हो जाएगी? - इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-यह गुदा प्राण - स्वरूप है । यह प्राण - गुदा पूर्व की ओर वितत हो रही है । इसका रुख हृदय की प्रोर है । त्रिशत्कलोपेत प्रारण इसी का अनुगमन करता है अर्थात् उदर में कण्ठ में एवं नाभि में सर्वत्र यही गुदा प्राण अभिव्याप्त हो रहा है । यदि यह प्रारण उच्छिन्न हो जाय तो पशुपना ही न रहे । प्रत एव हम गुद प्राण को ही पशु कहने के लिए तय्यार हैं । जब तक प्रारण से यह पशु, पशु - प्राणन व्यापार किया करता है अर्थात् कुर्वद् रूप प्रारण से जब तक पशु में आदान विसर्ग क्रिया होती रहती है, तभी तक पशु का जीवन रहता है । जिस समय पशु में से प्रारण देवता कूच कर जाते हैं, उस समय सूखे काष्ठ की तरह सदा के लिए महानिद्रा की गोद में सो जाता है । प्रतएव प्राण ही को पशु कहने के लिए तय्यार हैं । अस्तु, कहना इससे यही है कि यही गुदा प्रारण ऊपर तक वितत रहता है । उदय मांस में भी इसी गुद - प्राण की सत्ता है, अतएव इसका सम्बन्ध कराना भी गुदा - प्रारण की पुष्टि में सहायक बन जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" प्राणो वै गुदः । सोऽयं प्राङाततः । तमयं प्राणोऽनु संचरति । प्राणो वै पशुः । यावद्धयेव प्राणेन प्रारिणति तावत् पशुः । अथ यदाऽस्मात् प्राणोऽप-क्रामति दावेव तहि भूतोऽनर्थ्यः शेते " ॥५ ॥
यह जो गुदा है - वह मेध है अर्थात् संगमनीय है । इसका सम्बन्ध उस दिव्यात्मा के साथ होता | एवं मेद ही मेघ है । मेद उदर में रहता है । अतएव उदय मांस से गुदा को युक्त करना मेद से मेध को युक्त करना है । गेद ही तो मेध है । अर्थात् मेद संगमनीय है । वही संगमनीय होने के कारण मेघ कहलाता है । अतएव उदय मांस से गुदा को युक्त करने में कोई आपत्ति नहीं है । यदि पशु मोटा - ताजा हो तब तो उदय मांस मिलाने की कोई श्रावश्यकता ही नहीं है । तब तो स्वयमेव मेधा संप्रति प्राप्त हो जाती है-" गुदो वै पशुः । मेदो वै मेधः । तदेनं मेधमुपनयति । यद्यु- सलो भवति - स्वयमुपेत एवह मेधं भवति " ॥ ६ ॥
अग्नीषोम यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) प्रयाज होते हैं - ग्यारह ( ११ ) अनुयाज होते हैं एवं ग्यारह ( ११ ) उपज होते हैं । श्रात्मा बिना पशु के रह नहीं सकता, अतएव उस दिव्यात्मा में तेतीस ( ३३ ) पशु-प्राणों को स्थापित करने के लिए पशु - स्वरूप तेतीस ( ३३ ) प्रयाजानुयाजोपयाज किए जाते हैं । अग्नी-षोमीय पशु याग में प्रयाजादि क्यों किए जाते हैं - इसकी यहीं उपपत्ति है । फलाना काम क्यों होता है? इसका उत्तर प्राकृतिक यज्ञ है । प्रकृति यज्ञ के अनुसार वैध यज्ञ का वितान किया जाता है, अतएव जो - जो मसाले प्रकृति - यज्ञ में काम प्राते हैं, जो - जोकाम प्रकृति - यज्ञ में होते वे सब के सब वैध यज्ञ में करने पड़ते हैं । आधिदैविक यज्ञ में चूंकि आत्मा बिना पशु - प्राण के नहीं रहता, अतएव यहाँ भी दैवात्मा में पशु प्राणाधान के लिए प्रयाजादि करने पड़ते हैं । चूंकि पशु - प्राण तीस [ ४८७ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयोजानुयाज ब्राह्मणे ( ३३ ) हीं हैं, अतएव प्रयाजादि तेतीस ( ३३ ) ही करने पड़ते हैं । " यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह " केवल इस सत्य को समझ लेने पर सारी यज्ञ - विद्या स्फुट प्रतिभासित हो जाती है । पूर्व के पशु - पुरो-ब्राह्मण में बतलाया गया था कि इस पशु से तीन कर्म किए जाते हैं- प्रधानयाग- स्विष्टकृत् - उप-यट् । प्रधानयाग जुहू से किया जाता है - स्विष्टकृद्याग वसाहोमहवनी से एवं उपयट्याग उपभृत् से किया जाता है । इन तीनों में प्रधानयाग प्रयाजस्थानापन्न है, उपयट्याग उपयाजस्थानापन्न है एवं स्विष्टकृ-द्या - अनुयाजस्थानापन्न है । तीनों में से प्रधानयाग पहले किया जाता है अतएव उसे प्रयाज कहते हैं, उसके पश्चात् ही स्विष्टकृद्याग किया जाता है, प्रतएव उसे अनुयाज कहते हैं । प्रधानयाग अध्वर्यु करता है, उसके बाद स्विष्टकृद्याग अध्वर्यु करता है एवं उपयट्याग स्विष्टकृत् के साथ - साथ ही दूसरी ओर उपयट् करता रहता है । इन तीनों में से जो स्विष्टकृत् अर्थात् अनुयाज याग और उपयाज याग है, उसकी आहुति से पृषदाज्य का सम्बन्ध कराया जाता है । दधिमिश्रित प्राज्य को ' पृषदाज्य ' कहते हैं । अनुयाज और उपयाज के साधक - उपभृत् वसा होमहवनी- दोनों पात्रों में रक्खे हुए प्राहुति द्रव्य से पृषदाज्य का सम्बन्ध करा दिया जाता है । अनुयाजादि करना तो दिव्यात्मा में पशु - प्राणाधान करना है - आत्मा को पशु - युक्त बनाना है | परन्तु इस प्राहुति के साथ पृषदाज्य का सम्बन्ध क्यों कराया जाता है - इसका क्या कारण है? - इसका उत्तर वही प्राकृतिक पशव्य याग है । अग्नीषोमीय पशु - याग से हम दिव्यात्मा उत्पन्न करना चाहते हैं । उत्पत्ति क्रिया में - प्रजनन क्रिया में द्वन्द्व अपेक्षित रहता है । जब तक युग्म न हो, तब तक प्रजनन क्रिया हो ही नहीं सकती । बिना योषावृषा के मेल के सन्तानोत्पत्ति हो ही नहीं सकती । अग्नि वृषा है - सोम योषा है । दोनों कहने को दो हैं - वास्तव में दोनों एक हैं । दोनों की समष्टि का नाम एक पुरुष है । इस एक पुरुष का ही आधा भाग योषा है, आधा वृषा | श्रग्नीषोमात्मक पुरुष का अग्नि भाग वृषा है, सोम भाग योषा है । एक ही पुरुष दलद्वय में विभक्त | अतएव श्रुति कहती है-" स वै नैव रेमे तस्मात् एकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् । × × × पतिश्च पत्नी च " । ( बृहद् ० प्रा ० उप ० १ ४ ३ ) बस - दलद्वय में विभक्त इस द्वन्द्व पुरुष से ही सृष्टि का निर्माण होता है । आज हमें पशु को उस दिव्यात्मा में उत्पन्न करना है । उत्पत्ति - एकजातीय द्वन्द्व पुरुष पर प्रर्थात् योषा वृषा युग्म पर निर्भर है - प्रतएव पशु उत्पन्न करने वाले अनुयाज और उपयाज याग से पृषदाज्य का सम्बन्ध कराया जाता है । इस कर्म में पृषदाज्य ग्रहण की यही उपपत्ति है । पृषदाज्य - सर्पि और दधि से संपत्ति द्वययुक्त है । एवं दोनों मिला कर एक ही दुग्ध - पुरुष है । दूध ही दधि बनता है - दूध ही घृत बनता हैं । दधि सान्नाय्य हो जाने से प्रवस्थान्तर में परिणत होता हुआ सोम हो जाता है, घृत अग्नि हो जाता है, इसीलिए " तेजो-वे घृतम् " " श्रायुर्वे घृतम् " यह कहा जाता है । घृत प्राग्नेय होने के कारण वृषा है एवं दधि सौम्य प्राधा भाग पुरुष है । पृषदाज्य होने के कारण योषा है । एक ही दुग्ध - पुरुष का श्राधा भाग स्त्री है, द्वन्द्व है । द्वन्द्व ही को मिथुन कहते हैं । जो द्वन्द्व है - वही जोड़ा कहलाता है, वही प्रजनन क्रिया में समर्थ है । प्रजनन - क्रिया द्वन्द्व - मिथुन पर अवलम्बित है । आज यजमान आत्मा में अनुयाज, उपयाज याग द्वारा पशु पैदा करना है । प्रजनन द्वन्द्व पर अवलम्बित है, अतएव द्वन्द्व - संपत्ति प्राप्त्यर्थ वह दोनों आहुतियों [ ४८८ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण से पृषदाज्य का सम्बन्ध करा देता है । ऐसा करता हुआ - यजमान प्राकृतिक प्रजननानुकूल मिथुन से ही प्रजनन करता है | बस इसी प्रजनन संपत्ति के लिए पृषदाज्य ग्रहण किया जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" अथ पृषदाज्यं गृह्णाति । द्वयं वा इदं ( पृषदाज्यम् ) सपिश्चैव दधि च ।
द्वन्द्वं वै मिथुनं प्रजननम् । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते " ॥७ ॥
पृषदाज्य से द्वन्द्व - संपत्ति प्राप्त हो जाती है, इसलिए पृषदाज्य का सम्बन्ध किया जाता है । अब पृषदाज्य ग्रहण की दूसरी उपपत्ति और बतलाते हैं-जिस पृषदाज्य का अध्वर्यु ग्रहण करता है, उस पृषदाज्य से अनुयाजों में प्रचार करता है अर्थात् पृषदाज्य से अनुयाज और उपयाज याग किया जाता है । यह अनुयाज ( और उपयाज ) पशु - स्वरूप है, क्योंकि इन ग्यारह ( ११ ) अनुयाजों से, ग्यारह ( ११ ) प्रयाजों से ग्यारह ( ११ ) उपयाजों से आत्मा में पशु ही तो उत्पन्न किया जाता है । प्रतएव अनुयाजों को हम पशु कहने के लिए तय्यार हैं । आत्मा के पूर्व भाग में रहने वाले पशु - प्रयाज कहलाते हैं - पश्चिम भाग में रहने वाले पशु श्रनुयाज कहलाते हैं । पृषदाज्य पय है । दधि और घृत - दोनों ही परमार्थतः दूध ही तो हैं । ऐसी अवस्था में अनुयाज - पशु में पृषदाज्य स्थापित करना - उनमें दूध ही स्थापित करना है । पृषदाज्य सम्बन्ध से दिव्यात्मा में उत्पन्न होने वाले अनुयाज पशुओं में पय आहित हो जाता है - दूध का सम्बन्ध हो जाता है । प्रकृति में जो नित्य पशव्य यज्ञ होता रहता है, उसमें वृषदाज्य भी रहता है । आधिदैविक प्राण- पशु - यज्ञ में दूध रहता है, इसीलिए तो इन परार्ध्य - प्रवरार्ध्य एवं मध्यम - इन तीनों पशुओं में दूध रहता है । दूर्वा वृक्षादि श्रवरार्ध्य पशु हैं, गो - प्रश्व - प्रवि - अजादि मध्यमार्थ्यं पशु हैं एवं मनुष्य परार्ध्य पशु हैं । तीनों में दूध रहता है । यह दूध इनमें तभी उपपन्न हो सकता है जब कि इनके उपादान भूत आधिदैविक प्राण- पशुओं में दूध हो । प्रारण-पशुओं में दूध है, तभी तो इन पशुत्रों में दूध होता है । दूध जब भी कभी होगा, पशुओं में ही होगा । चाहे वह पशु - स्त्री - पशु है या पुरुष- पशु है । दुग्धाधिष्ठाता पशु ही है । चूंकि प्राकृतिक यज्ञ में पृषदाज्य है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पार्थिव स्थूल पशुओंों में दुग्ध होता है । चूँकि इसी की नकल पर हमारा यह यज्ञ है, अतएव प्रकृतित्- हम भी अवश्य ही - अनुयाज पशु - याग के साथ दुग्ध स्वरूप पृषदाज्य स्थापित करना चाहिए । आत्मा को पशु से युक्त करना है । पशु की सर्वावयव संपत्ति दुग्ध बिना अधूरी रह जाती है । अतएव पृषदाज्य का सम्बन्ध अवश्य ही करना चाहिए । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " तेन ( पृषदाज्येन ) अनुयाजेषु चरति ( व्यवहरति ) । पशवो वाऽश्रनु-याजाः । पयः पृषदाज्यम् । तत् पशुष्वेवैतत् पयो दधाति " । उस प्राकृतिक पशु - यज्ञ की ओर परोक्ष दृष्टि रखते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि पृषदाज्य से ही तो इन पशुओं में दूध हित है - प्रर्थात् नित्य पशव्य - यज्ञ में पृषदाज्य सम्बन्ध होता है - इसका प्रत्यक्ष प्रमाण [ ४८६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण दुग्धयुक्तबनाने से लिए स्थूल पशुओं में दुग्ध का होना है । अतः हमें भी प्रकृतिवत् दिव्यात्मा के पशु को अवश्य ही पृषदाज्य का सम्बन्ध करना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं—-" तदिदं पशुषु पयो हितम् " । यदि दुग्ध ही स्थापित करना है तो फिर साक्षात् दुग्ध ही स्थापित क्यों नहीं कर दिया जाता? -इस प्रश्न का समाधान कर दिया गया है । पशु उत्पन्न करना है । उत्पत्ति में द्वन्द्व अपेक्षित है । इसलिए बाध्य होकर पृषदाज्य का ही सम्बन्ध करना पड़ता है । पृषदाज्य सम्बन्ध से दोनों काम हो जाते हैं | दूध का भी प्रधान हो जाता है । क्यों कि घी और दही दोनों दूध ही तो हैं अतएव द्वन्द्व - संपत्ति हो जाती है । इस प्रकार पृषदाज्य में दो उपपत्ति बतला कर अब एक तीसरी उपपत्ति और बतलाते हैं - यह पृषदाज्य प्रारण - स्वरूप है । गन्ध - रूप - रस - स्पर्श - शब्दादि से रहित अतिसूक्ष्म श्रतएव निराकार पदवाच्य जो मौलिक तत्त्व विशेष है, वही प्राण कहलाता है । ऐसी अवस्था में पृषदाज्य प्राण क्यों कर हो सकता है? क्योंकि पृषदाज्य तो स्थूल पदार्थ है, भौतिक वस्तु है- यौगिक वस्तु है, प्राण तो मौलिक तत्त्व है । इस प्रश्न का उत्तर यही है कि " पृषदाज्य प्राण नहीं हो सकता " - श्रापका यह कहना वास्तव में ठीक है । परन्तु किसी प्रकार पृषदाज्य भी प्राण बन जाया करता है । पृषदाज्य अन्न है - इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं है । मिश्रित आज्य - हमारा अन्न है । हम जो अन्न खाते हैं- पहले उसका ऊ रस बनता है । ऊ रस प्रारण में परिणत होता है । इस प्रकार होते - होते वह अन्न मन हो जाता है । परन्तु जो मनस्वी नहीं हैं ऐसे वृक्षादि में अन्न की प्राण पर ही विश्रान्ति हो जाती है । वृक्षादि - जिस पानी मिट्टी हवा को खाते हैं - वे ऊ बन जाते हैं, ऊ प्रारण बन जाता है । प्राण फिर खर्च हो जाता है, फिर श्राता है, अन्न फिर ऊ बन जाता है, ऊ फिर प्रारण बन जाता है । इस प्रकार अन्न ऊ प्राण की धारा अनवरत चला करती है । अतएव यज्ञ का लक्षण बतलाते हुए वेद भगवान् कहते हैं— " अन्नो प्राणानामन्योन्य परिग्रहो यज्ञः " इति । कहना हमें यही है कि अन्न अर्को बनता है - ऊ प्रारण बनता है । पृषदाज्य अन्न है । उसका प्राण ही परिणाम होता है । ' तात्स्थ्यात्ताच्छन्द्यम् ' से प्राणोद्देशेन दिए जाने वाले पृषदाज्य को हम ' प्राण ' कहने के लिए तय्यार हैं । पृषदाज्य हमारा उद्देश्य नहीं है, अपितु उद्देश्य प्रारण है । जुलाहे को जो सूत दिया जाता है - उसमें सूत उद्देश्य नहीं रहता अपि तु वस्त्र उद्देश्य रहता है । बस यही बात यहाँ भी समझनी चाहिए | इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" प्राणो हि पृषदाज्यम् । अन्नं हि पृषदाज्यम् । अन्नं हि प्रारणः " ॥ ८ ॥
वास्तव में देखा जाय तो प्रारण ही पशु का पशुपना है । यदि प्राण नहीं है तो पशु शुष्क काष्ठ है । अनुयाज करना - यज्ञात्मा में पशु को उत्पन्न करना है । यदि इस पशु में प्राणापानाधान ( श्वास-प्रश्वास ) नहीं किया जाएगा तो पशु का आधान करना, न करना, बराबर होगा । बस इसीलिए अनुयाज और उपयाज- दोनों में प्राण - स्वरूप पृषदाज्य का सम्बन्ध कराया जाता है । पहले अनुयाज होता है-[ ४६० ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण बाद में उपयाज होता है । अनुयाज और उपयाज - दोनों से पशु का स्वरूप बनता है । अनुयाज, पशु का पूर्वार्द्ध है अर्थात् हृदय से ऊपर का भाग है एवं उपयाज, पशु का पश्चिमार्द्ध है । हृदय से गुदा तक का भाग पश्चिमार्द्ध कहलाता है । बस, इसी प्राणाधान के लिए वह अध्वर्यु उपयाज से पहले - पृषदाज्य से अनुयाज में व्यवहार करता है- अर्थात् पहले अनुयाजाहुति से पृषदाज्य का सम्बन्ध करता है । ऐसा करता हुआ श्रध्वर्यु पशु के पूर्वार्द्ध भाग में - हृदय से ऊपर के भाग में प्रारण ही का स्थापन करता है एवं उसी पृषदाज्य से उपयाज में यजन करता है- अर्थात् अनुयाजानन्तरं पृषदाज्य का उपयाज से भी सम्बन्ध करता है । इससे जो इस पशु का हृदय से नीचे गुदा तक रहने वाला अपान नाम का प्राण है - उसे स्थापित करता है । इस प्रकार पूर्व - पश्चिम स्वरूप अनुयाज - उपयाज में पृषदाज्य का सम्बन्ध करने से उस पशु में जो हृदय से ऊपर में रहने वाला प्रारण है एवं अधस्मात् रहने वाला अपान है - वे दोनों प्राण श्रहित हो जाते हैं । प्रालम्भित पशु पृषदाज्य सम्बन्ध से प्राणापानयुक्त हो जाता है । इस प्रकार पृष-दाज्य से तीन काम हो जाते हैं- द्वन्द्व - सम्पत्ति पहला काम है- पयः स्थापन दूसरा काम है एवं प्राणाधान तीसरा काम है-" तेन ( पृषदाज्येत ) पुरस्तात् अनुयाजेषु चरित । स योऽयं पुरस्तात् प्राणस्तमेवैतद् दधाति । तेन ( पृषदाज्येन ) पश्चादुपयजति । स योऽयं पश्चात् प्राणस्तमेवैतद् दधाति । ताविमाऽउभयतः प्राणौ हितौ यश्चायमुपरिष्टात् ( हृद-यात् ) - पश्चाधस्तात् ॥९ ॥
अनुयाज ( स्विष्टकृत् ) अध्वर्यु करता है एवं उपयाज प्रतिप्रस्थाता करता है । प्रत्येक कर्म्म में याज्या और अनुवाक्या से काम होता है । होता अनुवाक्या करता है, अध्वर्यु याज्या करता है । जब होता - " इन्द्राय वौषट् " बोलता है, उसी समय अध्वर्यु आहुति डाल देता है । प्रत्येक कर्म के साथ - यह अनुवाक्या और याज्या क्रमनियत है । उधर से होता वर्षट्कार करता है इधर से अध्वर्यु प्राहुति देता है | यहाँ पर अनुयाज और उपयाज - दोनों कर्म्म साथ - साथ होते हैं । उधर से ग्रध्वर्यु अनुयाज करता रहता है इधर से प्रतिप्रस्थाता उपयाज करता रहता है । दोनों कर्म्म एक समय में एक साथ होते हैं । ऐसी अवस्था में एक प्रश्न होता है । वह यही है कि प्रत्येक कर्म्म में होता को अनुवाक्या करनी पड़ती है । होता जब " वौषट् ” बोल देता है, तभी आहुति दी जाती है । यहाँ पर होता तो एक है और अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दो ऋत्विक् भिन्न - भिन्न कर्म्म कर रहे हैं, उसमें भी आफत यह है कि दोनों साथ - साथ कर रहे हैं । जो समय अनुयाजाहुति का है, वही समय उपयाज प्राहुति का है । प्राहुति होता के " वषट्कार " किए बिना हो नहीं सकती । एवं एक होता दोनों कम्मों के लिए एककालावच्छेदेन दो वषट्कार कर नहीं सकता, क्यों कि प्रकृति यज्ञ से ऐसा ही विधान है । इस विप्रतिपत्ति को दूर करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - यहाँ पर इस अनुयाज - उपयाज कर्म में एक ही होता दोनों के लिए वषट्कार कर देता है - अर्थात् वषट्कार तो एक ही करेगा - परन्तु इसका तन्त्र द्वारा दोनों ऋत्विजों के साथ संबंध मान लेना चाहिए । एक ही होता अनुयाज करने वाले अध्वर्यु के लिए भी वषट्कार कर देता है एवं [ ४ १ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मरंग प्रयाजानुयाज ब्राह्मण वही होता उपयाज करने वाले प्रतिप्रस्थाता के लिए भी वषट् कर देता है - अर्थात् एक ही वषट्कार का तन्त्र मान कर उसका अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता - दोनों के साथ सम्बन्ध कर लिया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— " तद्वा एतदेको ( होता ) द्वाभ्यां वषट् करोति - प्रध्वर्यवे च - यश्चैष उप-यजति - ( तस्मै प्रतिप्रस्थात्रेचेति - शेषः ) " । प्रया याग पहले होता है इसलिए वह ' प्रयाज ' नाम से व्यवहृत होता है । प्रथम यजनीयता ही प्रयाज के " प्रयाज " नाम होने में कारण है । एवं पश्चात् यजनीय होने के कारण अनुयाज- अनु-या कहलाते हैं | परन्तु ' उपयाज ' नाम का क्या अर्थ है? उपयड् याज को " उपयाज " क्यों कहते हैं? -यह प्रश्न बाकी बच जाता है । इसी का उत्तर देते हैं--प्रया पहले हो जाता है - अनुयाज बाद में होता है परन्तु उपयाज के साथ- साथ ही होता है । अनुयाज यजन करने वाले अध्वर्यु के साथ ही साथ प्रतिप्रस्थाता उपयड् याग करता है, अतएव-" यजन्तमध्वर्युमुपयजति " इस व्युत्पत्ति से इस उपयट् को ' उपयाज ' कहा जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यद्यजन्तं ( श्रध्वर्युम् ) उपयजति तस्मादुपयजः " । उपयाज किया क्यों जाता है उसका कारण बतलाते हैं-" अथ यत् ( यस्मात् कारणात् ) उपयजति - ( तदुच्यते - इति शेषः ) " । पृषदाज्यस्वरूप अनुयाज करना प्रजनन क्रिया करना है - मिथुन क्रिया - प्रजनन क्रिया ( मैथुन ) करना है । प्रजनन क्रिया के बाद जो उपयाज करना है - उससे रेतः सिञ्चनादि करके दिव्यात्मा को पशु युक्त करके उत्पन्न करना है । बात यह है कि प्राकृतिक यज्ञ में पहले योषा - वृषा द्वन्द्व का मैथुन होता है । इस मैथुन क्रिया को ही प्रजनन क्रिया कहते हैं । यही अनुयाज कहलाता है । अनुयाज के अनन्तर उप-याज होता है । उपयाज से प्रजनन क्रिया का फल मिलता है - अर्थात् नई वस्तु उत्पन्न हो जाती है । बस, इसी प्राकृतिक यज्ञानुसार यहाँ पर भी अनुयाज से प्रजनन क्रिया कर उपयाज से आत्मा को पैदा किया जाता है । आत्मजनन ही उपयाज- यज्ञ का फल है ---" वैतज्जनयति - ( प्रजनयत्येवैतत् ) " । एक बात और है । उपयाज, अनुयाज के बाद में करते हैं, क्यों कि प्रकृति में भी मिथुनस्वरूप अनुयाज पहले होता है एवं मिथुनानन्तर सप्तपर्वा उपयाज से स्त्री से प्रजा उत्पन्न होती है । पहले मिथुन होता है, अनन्तर उपयाज द्वारा योषा से प्रजा उत्पन्न होती है । इसी प्रकृति के अनुसार यहाँ भी पहले मिथुन स्वरूप अनुयाज होता है, बाद में प्रजोत्पत्ति का साधक उपयाज होता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं— [ ४६२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण
" पश्चार्द्ध - उपयजति । पश्चाद्धि योषायै प्रजाः प्रजायन्ते ॥१० ॥
हमने ब्राह्मण के प्रारम्भ में कहा था, प्रयाज- अनुयाज - उपयाज तीनों ग्यारह ( ११ ) ग्यारह ( ११ ) होते हैं । इन तीनों में से प्रकृत में हमें उपयाज का विचार करना है । उपयाज कुल ग्यारह ( ११ ) होते हैं । ये ग्यारह उपयाज - ( १ ) उपयाज और ( २ ) प्रत्युपयाज- इन दो भागों में विभक्त हैं । सात ( ७ ) उपयाज कहलाते हैं एवं चार ( ४ ) प्रत्युपयाज कहलाते हैं । पैदा होने तक सात ( ७ ) ही उपयाजों की श्रावश्यकता होती है । वीर्य्याधान से पैदा होने तक सात ( ७ ) ही उपयाजों का उपयोग होता है - प्रतएव सात ( ७ ) अलग मान लिए जाते हैं । एवं बाकी बचे हुए चार ( ४ ) प्रत्युपयाज और करने पड़ते हैं दिव्यात्म - प्रजनन में इन दोनों में से क्रमप्राप्त पहले सात ( ७ ) उपयाजों की ही पद्धति बतलाई जाती है । क्यों उपयाज करना चाहिए? - यह बतला दिया गया, अब पद्धति बतलाते हैं । निम्नलिखित सात मन्त्रों से सात उपयाज किए जाते हैं-“ १ - समुद्रं गच्छ स्वाहा, २ - अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा, ३- देवं सवितारं गच्छ स्वाहा, ४- मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा, ५ - अहोरात्रे गच्छ स्वाहा, ६- छन्दांसि गच्छ स्वाहा, ७ - द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा " । ( वा ० सं ० ६।२१ ) इन सातों मन्त्रों द्वारा वीर्य्याधान से प्रारम्भ कर बच्चे के गर्भाशय से बाहर निकलने तक का विज्ञान बतलाया जाता है । मिथुन क्रिया के अनन्तर - जो मिथुन क्रिया ( मैथुन ) अनुयाज नाम से व्यव हृत की गई है - सात व्यापार और होते हैं । वे सात व्यापार ही सात ( ७ ) उपयाज कहलाते हैं । ये ही सात ( ७ ) उपयाज प्रजोत्पत्ति के साधक हैं । मैथुन के अनन्तर सन्तानोत्पत्ति के लिए सबसे पहले जो काम है, वह रेतसिञ्चन है । योनि में पहले - पहल पानी का अर्थात् पारमेष्ठ्य आपोमण्डल में उत्पन्न सोम का - रेत का सिवन होता है । पारमेष्ठ्य भृगु की घन, तरल, विरल - ये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । तीनों आप वायु- सोम कहलाते हैं । तीनों में ग्रवस्था मात्र का भेद है, अतएव तीनों तीनों से व्यवहृत होते हैं । हम जो अन्न खाते हैं, वह सोममय रहता है । वही सोम अन्न द्वारा भुक्त हो कर सातवें धातु में वीर्य हो जाता है । यह चूंकि पारमेष्ठ्य वस्तु है एवं इसमें पानी का ( भौतिक पानी का ) भी हिस्सा मिला रहता है, प्रतएव इस शुक्र को " आप " कहा जाता है । पैदाइश का उपक्रम पानी से ही होता है । पानी ही रेत ही सन्तानोत्पत्ति की पहली सीढ़ी है । ग्रतएव यह कहा जाता है-" पञ्चम्यां आहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " । ( छा ० उप ० ५।६।१ ) प्रकृत में केवल हमें इतना ही कहना है कि प्रजोत्पत्ति में मैथुनान्तक जो सबसे पहला काम है-वह यही रेत से है | सबसे प्रथम इसी प्राप की ( रेत की ) योनिस्थ आग्नेय रुधिर में प्राहुति होती है । मैथुनानन्तर यही पहला अनुयाज है । आज यह यजमान दिव्यात्मा पैदा करने के लिए अनुयाज द्वारा मिथुन - भाव पैदा कर चुका है । मिथुन भावानन्तर प्रकृतिवत् वह सबसे पहले रेतः सेक स्वरूप पहला [ ४६३ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) ' वा ० सं ० ६।२१ ' । २ १ शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ' वा ० सं ० ६।२१ ' । [ ४६४ ] उपयाज करता है । पहले उपयाज का मन्त्र है - " समुद्रं गच्छ स्वाहा " १ - हे हवि! तुम समुद्र में और गर्भाशय में प्रविष्ट ' जायो । ' समुद्र की ओर जाओ ' - इससे पानी ही अभिप्रेत है, क्यों कि समुद्र पानी ही होता है । पानी सोम तो है । सोम की घनावस्था को ही तो पानी कहते हैं एवं सोम ही को तो वीर्य्यं कहते हैं । श्रतएव हम ' आप ' को रेत कहने के लिए तय्यार हैं । ऐसी अवस्था में " समुद्रं गच्छ स्वाहा " बोलते हुए जो पहली ग्राहुति देना है उससे वह प्रतिप्रस्थाता श्रात्मा प्रजननाय अग्नि के गर्भा-शय में रेतः सिञ्चन ही करता है । इसी प्राकृतिक विज्ञान की ओर लक्ष्य रखते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य
कहते हैं-" स उपयजति । समुद्रं गच्छ स्वाहेति । आपो वै समुद्रः । श्रापो रेतः ।
रेत एवैतत् सिञ्चति ॥११ ॥
रेतः सेक के समय गर्भाशय खाली रहता है तभी वीर्य्याधान होता है । यदि गर्भ में पहले से बच्चा मौजूद है अथवा रजोदर्शन के बाद गर्भाधान के पन्द्रह ( १५ ) दिन निकल जाने से गर्भाशय का मुख मीलित होता है तो चाहे कितना ही रेतःसेक किया करो, वह सब व्यर्थ है । रेतःसेक का फल तभी हो सकता है, जबकि गर्भाशय में पोल हो अन्तरिक्ष हो - खाली जगह हो; तभी वीर्य्याधान ( गर्भाधान ) होगा । बस - रेतः सेक के समय - गर्भाशय में अन्तरिक्ष का ( खाली जगह का ) होना अत्यावश्यक है, तभी वीर्य्य प्रतिष्ठित हो सकता है-एवं अन्तरिक्ष का दूसरा अर्थ और भी है । जिस समय गर्भाधान होता है, उस समय से प्रारम्भ कर जिस समय बच्चा गर्भाशय के बाहर निकल जाए, तब तक, इन दोनों स्थितियों के बीच में कुछ अवकाश की भी जरूरत है । वीर्य का प्राधान प्रारण व्यापार है एवं उसका प्रजारूप में परिणत हो कर बाहर निकलना - प्रपातन व्यापार है । जाती हुई स्थिति के लिए ' प्राण ' शब्द व्यवहृत होता है, प्राती हुई स्थिति के लिए अपान शब्द व्यवहृत होता है । वीर्य का गर्भ में जाना - प्राणन और प्रजा बन कर वापस निकलना प्रपानन है । इस प्राणन अपानन के बीच में भी थोड़ा सा ( ६ महिने का ) अवकाश चाहिए । यदि प्राणन - क्रिया और प्रपानन क्रिया के बीच में ६ महिने का अन्तरिक्ष अर्थात् अवकाश न होगा तो भी प्रजोत्पत्ति नहीं होगी । इस अवकाश के बीच में ही वीर्य्यं का निकल जाना गर्भस्राव किंवा गर्भपात कह-लाता है । तएव वीय्यं सेकानन्तर नौ ( 2 ) महिने के अवकाश की भी आवश्यकता है । इस प्रकार रिक्त गर्भाशय में ही गर्भाधान होता है, इसलिए वीर्य्यं सेकानन्तर अन्तरिक्ष - सम्पत्ति प्रपेक्षित है; एवं गर्भ-पात और गर्भस्राव न हो जाए, इसलिए भी अन्तरिक्ष अपेक्षित है । बस, इसी प्राकृतिक प्रजननानुसार-रेतः सेकानन्तर- श्रन्तरिक्ष में उस रेत को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रतिप्रस्थाता " अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा " १२ २ मन्त्र बोलता हुआ दूसरी आहुति देता है । मन्त्र का अर्थ करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं -
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) १ प्रसूत एवैतत् प्रजनयति " ॥१३ ॥
' वा ० सं ० ६।२१ ' । १. शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मरंग [ ४६५ ] जितनी भी प्रजा उत्पन्न होती है, वे अन्तरिक्ष के अनु ही उत्पन्न होती है- अर्थात् प्रजोत्पत्ति में गर्भाशय का रिक्त रहना परमावश्यक है, तभी गर्भाधान हो सकता है एवं तभी प्रजोत्पत्ति हो सकती है । प्राज यह ऋत्विक् - इसी प्रकृति - यज्ञ के अनुसार ' अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा ' यह कहता हुआ - दिव्यात्मा को अन्तरिक्षातु ही उत्पन्न करता है । " अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहेति । अन्तरिक्षं वा अनु प्रजाः प्रजायन्ते । अन्त-रिक्षमेवैतदनु प्रजनयति ( दिव्यात्मानमिति शेषः ) " ॥१२ ॥
वीर्य जब गर्भाशय में जा कर प्रतिष्ठित हो जाता है एवं उसे पर्याप्त नव ( ६ ) महिने अवकाश मिल जाता है, तो वह परिपक्व हो जाता है । वही वीर्य्यबिन्दुस्थ भ्रूण हस्तपादशिरोविन्यासादियुक्त कर प्रजास्वरूप धारण कर लेता है । जब वह सर्वावयव से पूर्ण हो जाता है तो तदनन्तर उसे गर्भ से बाहर निकालने के लिए गर्भाशय में एक प्रकार का प्रेरणात्मक वायु प्रविष्ट होता है । यही प्रेरणात्मक वायु ' सविता ' नाम से व्यवहृत होता है । जिस समय यह गर्भ को धक्का मार कर बाहर निकालने वाला प्रेरक सविता वायु गर्भाशय में प्रविष्ट होता है - उस समय पेट में दर्द होने लगता है । कभी दाएँ भाग में दर्द होता है, कभी बाएँ भाग में दर्द होता है । कभी ऊपर की ओर होता है, कभी नीचे की ओर होता है । गर्भाशय में चारों ओर से बद्ध उस गर्भ को वह सविता वायु चारों ओर घूम - घूम कर गर्भाशय से पृथक् करता है | पृथक् होने से गर्भाशय में खिंचाव होता है - यही पीड़ किंवा शूल - किंवा दर्द कहलाता है । थोड़े व्यापार के अनन्तर वह वायु धक्का दे कर उस गर्भ को गर्भाशय से बाहर फेंक देता है । गर्भ तो बाहर निकल जाता है एवं वह वायु वर्तुल ( गोल ) वृत्त में परिणत होता हुआ उदर में घूमा करता है । यह वायु रुक्ष होता है । इसे बाहर निकालने के लिए स्त्री को स्निग्ध पदार्थों का सेवन कराया जाता है । अस्तु प्रकृत में हमें केवल इतना ही कहना है कि गर्भधारणानन्तर नौ ( 2 ) महिने के बाद सविता -वायु उसे बाहर निकाल देता है । रेतः सेक एवं अन्तरिक्ष में गर्भाधानानन्तर तीसरा यही काम | प्रत-एव यही प्रतिप्रस्थाता गर्भाशय में प्रविष्ट ग्रात्मा को सविता वायु द्वारा बाहर निकालने के लिए " सवि-तारं गच्छ स्वाहा " " इस मन्त्र से तीसरी आहूति देता है । इससे आत्मा उत्पन्न हो जाता है । सविता ही देवताओं के सविता हैं । बिना सविता के ( वायु के ) कोई चीज पैदा हो ही नहीं सकती । शरीर में जब तक वायु का संचार होता है तभी तक रुधिरादि में गति रहती है, तभी तक शरीर रहता है । सब में केवल " वातावरण " ही प्रधान है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं--" देवं सवितारं गच्छ स्वाहेति । सविता वै देवानां प्रसविता । सवितृ-जब तक बच्चा माता के गर्भाशय में रहता है, तब तक उसका आहार - विहार श्वास - प्रश्वास- सब कुछ माता के प्राहारादि पर अवलम्बित रहता है । माता द्वारा श्वास लेना ही - गर्भ का श्वास लेना है ।
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) ' वा ० सं ० ६।२१ ' । १ शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण [ ४६६ ] परन्तु जब वह बच्चा गर्भ से बाहर निकल जाता है तो उसी समय इसकी श्वास - प्रश्वास क्रिया पृथक् होने लगती है । अब इसका माता के श्वास - प्रश्वास से कोई सम्बन्ध नहीं रहता । श्वास को प्रारण कहते हैं । प्रश्वास को उदान कहते हैं । सूर्य्य से आने वाला जो कण्ठगत प्रारण है, वह प्रारण कहलाता है एवं श्राकर वापस ऊपर सूर्य की ओर जाने वाला वही प्रारण उदान कहा जाता है । आता हुआ प्राण है, हृदयस्थ-व्यान से धक्का खा कर वापस जाने वाला प्राण ही उदान है । वैदिक परिभाषानुसार जो वस्तु श्रात्मा से किंवा शरीर से संगम करने वाली है आत्मा की ओर आने वाली है, उसे " मित्र " कहा जाता है । मिति स्निह्यति धातु से त्राल प्रत्यय हो कर " मित्र " शब्द बनता है । जो ग्रात्मा से चिपकने वाला है-यही मित्र का अर्थ होता है । जो श्रात्मा से अलग हो कर आत्मा से निकल जाने वाली चीज है, वह ' वरुण ' कहलाती है । मित्र देवता है- वरुण असुर है । चूंकि प्रारण आता है, अतएव इसी परिभाषा के अनुसार हम प्राण को मित्र कहने के लिए तय्यार हैं एवं उदान को आत्मा से विमुख होने के कारण वरुण कहने के लिए तय्यार हैं । बस, गर्भाशय के बाहर निकलने के बाद इसी चौथे उपयाज की सत्ता जागती है । यह उस बच्चे में स्वतन्त्र मित्रावरुण ( श्वास - प्रश्वास ) - किंवा प्राणोदान कायम कर देता है । इसी प्राकृतिक यज्ञानुसार सविता द्वारा बाहर निकले हुए श्रात्मा में " मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहेति " " यह मन्त्र बोलता हुआ प्रतिप्रस्थाता उत्पन्न आत्मा में प्राणोदानाधान करता है । इसी श्वास - प्रश्वास विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं " मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहेति । प्रारणोदानौ वै मित्रावरुणौ । प्रारणोदा-नावेवैतत् प्रजासु दधाति " ॥ १४ ॥
जब तक बच्चा माता के गर्भ में रहता है - तब तक उसे न दिन का रस ( आग्नेय - प्राण ) और न ही रात्रि का रस ( सौम्य प्राण ) मिलता है । यदि मिलता है तो माता के द्वारा । परन्तु जब वह गर्भ के बाहर निकल जाता है तो उसे स्वातन्त्र्येण अहोरात्र का रस मिलता है । श्रहः के अधिष्ठाता सूर्य्य हैं । रात्रि के अधिष्ठाता चन्द्रमा हैं । दिन में अग्नि का राज्य रहता है- रात्रि में सोम का राज्य रहता है । ग्रहः की अग्नि में रात्रि के सोम की प्राहुति पड़ती रहती है । इसी अग्नीषोमात्मक अहोरात्र यज्ञ से जो कि ( ३६० की संख्या के कारण ) - " संवत्सर " यज्ञ कहलाता है- यच्चयावत् जड़ - चेतन प्राणियों की उत्पत्ति और स्थिति होती रहती है । इसी संवत्सर यज्ञ से अन्नादि पैदा होते हैं । उन्हीं के रस से प्रजा की पुष्टि होती है एवं स्वातन्त्र्येणापि प्रजा को अहोरात्र - रस मिलता है । यदि श्रहोरात्र रस न मिले तो प्रजा उसी क्षण उच्छिन्न हो जाए । अहोरात्र ही सारी सृष्टि का आलम्बन है । ग्रहोरात्र ही सारी सृष्टि का आलम्बन कैसे हैं? २ ' क्या जड़ और क्या चेतन - सबका आत्मा सूर्य्य है - यह बात हमने अनेक बार कही है | इस जगदधिष्ठाता सूर्य में मर्त्य और अमृत दो भाग रहते हैं । मर्त्य भाग पर भी सूर्य प्रजापति का शासन रहता है- श्रमृत भाग पर भी सूर्य्यं प्रजापति का शासन रहता है । अतएव श्रुति कहती है-२ इसका विवेचन श्री गुरुवर स्व ० पं ० मधुसूदन जी ओझा कृत ' अहोरात्रवाद " नाम के ग्रन्थ में देखना चाहिए ।