Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 511–520
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 511–520
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मरण प्रयाजानुयाज ब्राह्मणे
" श्री कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च ।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥
( ऋग्वेद मं ० १।३५।२ ) सूर्य का अहोरात्र स्वरूप जो तीन सौ साठ ( ३६० ) दिन का किंवा सात सौ बीस ( ७२० ) दिन और रात्रियों का संवत्सर- मण्डल है - वह तो मर्त्य - भाग है । एवं संवत्सर - मण्डल में आसमन्ताद् व्याप्त जो प्राणदान है, वही " अमृत " भाग है । संवत्सराग्नि भूताग्नि है । भूत मर्त्य कहलाता है, प्राण अमृत कहलाता है । बस - जब तक बच्चा गर्भाशय में रहता है तब तक वह इस भूत ( अहोरात्र ) श्रर्थात् मत्यं, एवं प्राण ( मित्रावरुण ) अर्थात् अमृतद्वय संपत्ति से अलग रहता है । जहाँ - गर्भाशय से अलग हुआ कि उसे दोनों संपत्ति मिल जाती हैं । अमृत भाग ( श्वास - प्रश्वास ) भी मिलने लग जाता है एवं मर्त्य - भाग ( अहोरात्र रस ) भी मिलने लग जाता है । बस - प्राज यह ऋत्विक्- " अहोरात्रे गच्छ स्वाहा " इस मन्त्र से उत्पन्न दिव्य प्रजा को प्रकृतिवत् अहोरात्र रस का भागी बनाता है । इसी अहोरात्र - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं ----" अहोरात्रे गच्छ स्वाहेति । अहोरात्रे वाऽअनु प्रजाः प्रजायन्ते । श्रहो -rasnet प्रजनयति " ॥१५ ॥
जब तक बच्चा गर्भ में रहता है तब तक वह मातृच्छन्दा रहता है । छन्द एक प्रकार के अव-च्छेद का नाम है । हदबंदी को ( वयोनाध को ) छन्द कहते हैं । यह छन्द शब्दार्थ भेदेन दो प्रकार का है । दोनों में छन्द - व्यवहार समान है । माठ वस्तु हो जाएँ तो वह अर्थछन्द कहलाएगा, आठ ( ८ ) अक्षर हो जाएँ तो वह शब्दछन्द कहलाएगा । क्या शब्दछन्द - क्या अर्थछन्द - लक्षणअपेक्षया " गायत्री, उष्ण, अनुष्टुर, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् जगती, भेदेन कुल सात ही प्रकार के हैं । एवं सात ग्राम्य पशु हैं - सात ही आरण्यक पशु हैं । जैसा कि महाभारत के भीष्मपर्व में लोक - गायत्री बतलाते समय भग-वान् वेदव्यास ने कहा है-" सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च महिषा वाररणास्तथा । ऋक्षाश्च वानराश्चैव सप्तारण्याः स्मृता नृप । गौरजाविमनुष्याश्च श्रश्वाश्वतर गर्दभाः । एते ग्राम्याः समाख्याताः पशवः सप्त साधुभिः " ॥ " प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि - परिमाण का - हदबन्दी का नाम छन्द है । दूसरी जो श्रात्मा की आहार - विहारादि की हदबन्दी है वह भी " छन्दान्तर्गत " हो जाती है । गर्भ के बाहर निकलने १ ' वा ० सं ० ६।२१ ' ।, २ ' महाभारत भीष्मपर्व, अ ० ४, गणपत कृष्णजी यन्त्रालय, बम्बई में मुद्रित संस्करण के आधार पर ' । [ ४ ९ ७ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मण से पहले बच्चे को माता की नाभि के छन्द में ( हदबन्दी में ) छंदित रहना पड़ता है । भूख - प्यास - सोना-खाना - पीना - यह सब काम माता के छन्द पर निर्भर रहते हैं । गर्भ - प्रविष्ट शिशु परच्छन्दा रहता है । परन्तु जब वह माता के गर्भ से बाहर निकल जाता है तो स्वच्छन्द हो जाता है । अब उसकी अपनी भूख है - प्रपनी प्यास है । बस यही छन्दसम्पत्ति प्राप्ति है । इसी प्रकृति - विज्ञान के अनुसार " छन्दांसि " " इत्यादि मन्त्र से उत्पन्न यज्ञ - प्रजा को छन्दयुक्त बनाया जाता है । इसी छन्दोविज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" छन्दांसि गच्छ स्वाहेति । सप्त वै छन्दांसि । सप्त ग्राम्याः पशवः । सप्तारण्याः तानेवैतदुभयान् प्रजनयति ॥ १६ ॥
बस - बच्चा सब तरह से सर्वाङ्गीण हो कर अन्त में द्यावापृथिवी की गोद में आ जाता है । अब तक माता के गर्भ में था । परन्तु अब - पृथिवी और आकाश के पेट में है । पृथिवी इसकी माता है, द्यौ इसका पिता है । पार्थिवाग्नि ( अग्नि ) इसका भाई है । अतएव श्रुति कहती है-" द्यष्पितः पृथिवि मातरध्रुगग्ने भ्रातर्वसवो मूळता नः । विश्व प्रदित्या अदिते सजोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वि यंत " ॥ ( ऋग्वेद मं ० ६।५१।५ ) पृथिवी से पृथिवी का आकर्षण अभिप्रेत है एवं द्यौ से द्यौ का आकर्षण अभिप्रेत है । उत्पन्न प्रजा ( मनुष्यादि ) दोनों के आकर्षण में रहती है । पृथिवी का आकर्षण है, इसीलिए तो मनुष्य आकाश में नहीं उड़ सकता एवं द्युलोक के अधिष्ठाता सूर्य का आकर्षण है, इसलिए वह जमीन से सट नहीं जाता । सूकरण के कारण मनुष्य का मस्तक ऊँचा रहता है । पार्थिवाकर्षण के कारण उसके पैर सदा जमीन से लगे रहते हैं । जिस समय बच्चा उत्पन्न होता है, उस समय उसमें पार्थिवाकर्षरण अधिक रहता है । अतएव वह जमीन पर लेटा रहता है । परन्तु उसमें ज्यों - ज्यों सूर्य का आकर्षण आता जाता है त्यों-त्यों वह खड़ा होने लगता है । अन्ततोगत्वा वह एकदम सीधा खड़ा हो जाता है । मस्तक सूर्य्यं के कारण ही ऊँचा रहता है । अतएव ज्यों - ज्यों सूर्य पश्चिमक्षितिज से नीचे जाने लगता है त्यों - त्यों मस्तक कता जाता है । यहाँ तक कि सूर्य के एकदम नीचे चले जाने पर मनुष्य जमीन पर सो जाता है । जहाँ सूर्योदय हुआ नहीं कि फिर उसका मस्तक उठा नहीं । कहना यही है कि वीर्य के बिन्दु में आलम्बन रूप से बैठा हुआ सप्तपुरुष पुरुष प्रजापति वीर्य्याधान से - छन्द पर्य्यन्त उस प्रजा को सुसंपन्न कर अपनी पैदा की हुई द्यावापृथिवी की पिटारी में ( जो पिटारी वैदिक परिभाषा में वसुधान - कोश कहलाती है ) जाबते से रख लेता है । उत्पन्न प्रजा दोनों से गृहीत हो जाता है । बस - सातवें उपयाज का यही काम है । उसी प्रकार आज यह प्रतिप्रस्थाता प्रजा को उत्पन्न कर उसे द्यावापृथिवी से गृहीत करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-[ ४ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण प्रयाजानुयाज ब्राह्मरण " द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहेति । प्रजापतिर्वै प्रजाः सृष्ट्वा ता द्यावा-पृथिवीभ्यां पर्य्यगृह्णात् । ता इमा द्यावापृथिवीभ्यां परिगृहीताः । तथो एवैष एतत् प्रजाः सृष्ट्वा ता द्यावापृथिवीभ्यां परिगृह्णाति ॥१७ ॥
बस, रेतःसेक से बच्चे के द्यावापृथिवी तक के सुपुर्द हो जाने तक प्राकृतिक यज्ञ में चूंकि सात ( ७ ) उपयाज होते हैं, अतएव यह प्रतिप्रस्थाता भी दिव्यात्मा को रेतः सेक द्वारा उत्पन्न कर तद्द्द्वारा स्वर्ग प्राप्ति के लिए सात ( ७ ) उपयाज करता है । उपयाजों के अलावा यहाँ चार ( ४ ) प्रत्युपयाज और किए जाते हैं । चूँकि ये चार उपयाज सात ( ७ ) उपयाजों का अतिक्रम करके किए जाते हैं - अतएव इन्हें ' प्रत्युपयाज ' कहते हैं । अब इन्हीं का यजन करते हैं— " प्रथात्युपयजति " । यद्यपि जिस के लिए उपयाज किए जाते हैं, वह काम सात ही उपयाजों में जा कर समाप्त हो जाता है, दिव्यात्मत्वोत्पत्ति सात ही से हो जाती है, तथापि आगे वंश - लोप न हो, इसके लिए चार ( ४ ) अत्युपयाज और किए जाते हैं । यदि यह यजमान प्रत्युपयाज न कर केवल सात ( ७ ) उपयाज ही करेगा तो इस यज्ञ से जो प्रजा पहले - पहल उत्पन्न होगी, वही रहेगी । आगे प्रजोत्पत्ति का मार्ग सर्वथा बन्द हो जाएगा । ऐसा न हो जाए- प्रागे के लिए वंश लुप्त न हो जाए- प्रतएव दिव्यात्म - प्रजनन के लिए सात ( ७ ) उपयाजों के ही काफी होने पर भी चार ( ४ ) अत्युपयाज और किए जाते हैं । प्रतएव प्रजा बार-बार उत्पन्न होती रहती है । प्राकृतिक यज्ञ में प्रत्युपयाज होता रहता है तभी तो प्रजोत्पत्ति का चक्र चलता रहता है - यही तात्पर्य है-" स यन्नात्युपयजेत् - यावतो हैवाने प्रजाः सृष्टाः तावत्यो हैव स्युः । न प्रजायेरन् । अथ यदत्युपयजति - प्रैवैतज्जनयति । तस्मादिमाः प्रजाः पुनरभ्यावर्त प्रजायन्ते " || १८ | ॥ इति प्रयाजानुयाजब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रष्टमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ४६६ ]
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ए तिस ष्ठेमाः पक्ति योषारं यन्तऽ भ्यवैति शूलाव पृथिव्य
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अष्टमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् ' उपयाज- ब्राह्मणम् ' [ सूल ] सोऽत्युपयजति । यज्ञं गच्छ स्वाहेत्यापो वै यज्ञ श्रापो रेतो रेत एवैतत्सिञ्चति ॥ १ ॥
सोमं गच्छ स्वाहेति । रेतो व सोमो रेत एवैतत्सिञ्चति ॥२ ॥
दिव्यं नभो गच्छ स्वाहेति । आपो वै दिव्यं नभ आपो रेतो रेत एवैत -: सिञ्चति ॥३ ॥
sofia वैश्वानरं गच्छ स्वाहेति । इयं वै पृथिव्यग्निवैश्वानरः सेयं प्रति-ष्ठेमामेवैतत्प्रतिष्ठामभिप्रजनयति || ४ || अथ मुखं विमृष्टे । मनो मे हाद्दि यच्छेति तथो होपयष्टात्मानं नानुप्रवृ-शक्ति || ५ || अथ जाघन्या पत्नीः संयाजयन्ति । जघनार्थो वै जाघनी जघनार्थाद्वै योषायै प्रजाः प्रजायन्ते तत्प्रैवैतज्जनयति यज्जाघन्या पत्नीः संयाजयन्ति ॥ ६ ॥
अन्तरतो देवानां पत्नीभ्योऽवद्यति । अन्तरतो वै योषायै प्रजाः प्रजा-यन्त उपरिष्टादग्नये गृहपतयऽउपरिष्टाद्वै वृषा योषामधिद्रवति ॥ ७ ॥
श्रथ हृदयशूलेनावभृथं यन्ति । पशोर्ह वाऽप्रालभ्यमानस्य हृदयं शुक्सम-भ्यवैति हृदयाद्धृदयशूलमथ यच्छ्रुतस्य परिवृन्दन्ति तदलञ्जुषं तस्मादु परितृयैव शूलाकुर्यात्तत्त्रिः प्रच्युते पशौ हृदयं प्रवृह्योत्तमं प्रत्यवदधाति ॥ ८ ॥
अथ हृदयशूलं प्रयच्छति । तन्न पृथिव्यां परास्येनाप्सु स यत्पृथिव्यां परा-स्येदोषधीश्च वनस्पतींश्चैषा शुक्प्रविशेद्यदप्सु परास्येदप एषा शुक्प्रविशेत्तस्मान्न पृथिव्यां नासु || ९ || [ ५०१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण अप एवाभ्यवेत्य । यत्र शुष्कस्य चार्द्रस्य च संधिः स्यात्तदुपगूहेद्यद्युग्र-भ्यवायनाय ग्लायेदग्रेण यूपमुदपात्रं निनीय यत्र शुष्कस्य चार्द्रस्य च संधिर्भवति तदुपगूहति मापो भौषधीहिसीरिति तथा नापो नौषधीहिनस्ति धाम्नो - धाम्नो राजंस्ततो वरुण नो मुञ्च । यदाहुरघ्न्या इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्चेति तदेनं सर्वस्माद्वरुणपाशात्सर्वस्माद्वरुण्यात्प्रमुञ्चति ॥१० ॥
श्रथाभिमन्त्रयन्ते । सुमित्रिया न आप प्रोषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै.. सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति यत्र वा एतेन प्रचरन्त्यापश्च हवा-अस्मात्तावदोषधयश्चापक्रम्येव तिष्ठन्ति तदु ताभिमित्रधेयं कुरुते तथो हैनं ताः पुनः प्रविशन्त्येषो तत्र प्रायश्चित्तिः क्रियते स वै नाग्नीषोमीयस्य पशोः करोति नाग्नेयस्य वशायाएवानुबन्ध्यायै तां हि सर्वोऽनु यज्ञः संतिष्ठत एतदु हास्याग्नी-षोमीयस्य च पशोराग्नेयस्य च हृदयशूलेन चरितं भवति यद्वशायाश्चरन्ति ॥११ ॥
[ अनुवाद ] पूर्वोक्त ११ उपयाजों में ७ उपयाज दिव्यात्मा को उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं, जिनका निरूपण पूर्व ब्राह्मण में किया जा चुका है । इस ब्राह्मण में ४ अत्युप-याजों का निरूपण किया जा रहा है जो कि प्रजोत्पत्ति की निरन्तरता के लिए किए जाते हैं । इनमें ३ प्रत्युपयाजों के तीन मन्त्रों से प्रजा के पौनः पुन्येन उत्पत्ति के लिए रेतः सेचन किया जाता है । प्रथम मन्त्र है - ' यज्ञं गच्छ स्वाहा ' - हे आहुति! आप यज्ञ की ओर जाओ । इस मन्त्र से प्रथम प्रत्युपयाज करता है । मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ परमेष्ठि- मण्डल से होता है, क्योंकि स्वयंभू प्रारणमण्डल है । प्रारण प्रसङ्ग होता है अतः सङ्गात्मिका मैथुनी सृष्टि की उत्पत्ति नहीं बन सकती । अप्तत्त्व स्नेहनधर्मा है तथा स्नेह से ही सङ्ग होता है । अतः सङ्गात्मक मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ उसी से होता है । परमेष्ठी में भृगु, अङ्गिरा, अत्रि भेद से तीन मनोता हैं । भृगु स्नेहनधर्मा होने से सौम्य है । अङ्गिरा तेजोधर्मा होने से ग्राग्नेय ' है । स्नेह योषाप्राण है तथा तेज ( अग्नि ) वृषाप्राण है । दोनों का संसर्ग ही यज्ञ है । इनमें संसर्जक तत्त्व आप: है । इसलिए यज्ञ को ' आप ' कहा गया है । और वह प्रप्तत्त्व ही रेत है । अतः इस प्रथम मन्त्र का उच्चारण करना रेतः सेचन करना ही है ॥ १ ॥
रेतः सेचन के बाद प्रतिप्रस्थाता ' सोमं गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ दूसरी आहुति सोम के अभिप्राय से देता है । रेत ( वीर्य ) ही सोम रूप है । दूसरी आहुति से प्रतिप्रस्थाता अग्नि- गर्भ में रेत का ही सेचन करता है । अन्न में पार्थिव रस के अतिरिक्त चन्द्रमा का रस भी रहता है, क्यों कि पृथिवी से ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और श्रोषधियाँ ही अन्न हैं- जैसा कि ' पृथिव्या प्रोषधयः, श्रोषधिभ्योऽन्नम् ' यह तैत्तिरीय श्रुति [ ५०२ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण बतला रही है । क्यों कि अमावस्या ' जब चन्द्रमा दिखाई नहीं देता है तब वह ओषधियों में प्रविष्ट हो जाता है । चन्द्रमा ही सोम है क्यों कि २७ वें अहर्गण पर विद्यमान भास्वर सोम-पिण्ड ही चन्द्रमा है । अतः अन्न सौम्य है । यह अन्न भुक्त होने पर रस, असृक्, मांस, मेद, अस्थि मज्जा रूप में परिणत होता हुआ अन्त में शुक्र ( रेत ) रूप में परित होता है | अतः ( शुक्र ) सोम ही है । इसी अभिप्राय से ' रेतो वै सोमः ' कहा है ॥ २ ॥
विशाल आकाश में नीलापन पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व का है । इसी कारण राम - कृष्णादि अवतार सब नील वर्ण के हैं । यद्यपि पारमेष्ठ्य अपतत्त्व नीला है न कि आकाश, तथापि लोक व लोकी में अभेद मान कर परमेष्ठी को नीला मान लिया जाता है । दिव्य नभ की नीलिमा नील अप्तत्त्व के कारण है । अतः प्रप्तत्त्व को ही दिव्य नभ कहा है । यह अपतत्त्व ही रेत ( शुक्र ) है क्यों कि शुक्र में प्रप्तत्त्व की सत्ता है । प्रतिप्रस्थाता द्वारा ' दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र द्वारा तृतीय प्राहुति प्रदान करना स्त्री - गर्भ में प्रापोरूप रेत ( वीर्य ) का सेचन करना है || ३ || वीर्य के लिए प्रतिष्ठा की अत्यन्त आवश्यकता है । यह सिक्त वीर्य गर्भाशयस्थ श्राग्नेय रुधिर में ही प्राहुत हो कर वहीं प्रतिष्ठित होता है । वीर्य की प्रतिष्ठा अग्नि है । अतः इस सिक्त वीर्य को अग्नि में प्रतिष्ठित करने के लिए ' अग्नि वैश्वानरं गच्छ स्वाहा ' इस मन्त्र के उच्चारण सहित चतुर्थ प्रत्युपयाज के लिए प्राहुति प्रदान की जाती है । यह पृथिवी ही, जिस पर प्राणी स्थित हैं, चित्य वैश्वानर अग्नि का पिण्ड है । अन्तरिक्ष में वायु की, द्युलोक में इन्द्र की तथा पृथिवी में वैश्वानराग्नि की सत्ता है । अतः चतुर्थ प्रत्युपयाज का यजन करता हुआ प्रतिप्रस्थाता वैश्वानराग्नि - प्रतिष्ठा में रेत को प्रतिष्ठित करता है ॥ ४ ॥
इस प्रकार चारों अत्युपयाजों को करने के बाद प्रतिप्रस्थाता ' मनो मे हाद्दि यच्छ ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ आहुति देने वाले हाथ से अपना मुख पोंछ लेता है । प्रति-प्रस्थाता ने पशु के गुदप्रारण भाग की आहुति दी है । इस प्राणाहुति से प्रतिप्रस्थाता के प्राण निकलने की संभावना है । ' मैं प्राणाहुति दे रहा हूँ ' ऐसी भावना के कारण प्रतिप्रस्थाता के प्राण निकलने की संभावना है । इसलिए पशु - प्राणाहुति प्रदाता प्रतिप्रस्थाता हाथ से मुँह का स्पर्श कर लेता है । साथ ही, हृदय से सम्बद्ध मेरा मन, मेरे हृदय में ही रहे ऐसी भावना करता है । इससे पशु - प्रारण के साथ प्रतिप्रस्थाता का प्रारण नहीं निकलता ॥ ५ ॥
यज्ञ में देवताओं की भाँति ही देवपत्नियों का भी यजन होता है, जिसे यजमान - पत्नी करती है । देवताश्नों का यजन करने के बाद पशु की जाघनी ( बालदण्ड, पुच्छदण्ड ) से ऋत्विक् यजमान पत्नियों द्वारा यंजन करवाते हैं । पशु की पूंछ को साफ कर उस पुच्छ का मांस निकाल लिया जाता है उसे ही जाघनी कहते हैं । जघन प्रदेश के सम्बन्ध से ही इसे जाघनी कहा जाता है | स्त्री के जघन प्रदेश से ही प्रजा उत्पन्न होती है । अतः ऋत्विक् [ ५०३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ०६ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण यजमान - पत्नी द्वारा जाघनी से देवपत्नियों का यजन कराते हुए उनके जघनार्ध से ही दिव्यात्मा को उत्पन्न कराते हैं ॥ ६ ॥
जाघनी के अन्तर - प्रदेश से पत्नी - संयाज कराया जाता है । पशु - पुच्छ के दो भाग किए जाते हैं, एक बाह्य तथा आन्तर । पुच्छ का बाल सहित चर्मभाग बाह्य भाग है और बिना लोम का स्वच्छ पुच्छभाग आभ्यन्तर भाग कहलाता है । बाह्यभाग को अलग कर अलोमक स्वच्छ आन्तरभाग से ही पत्नी - संयाज कराया जाता है । क्यों कि पत्नी के जाघनी के आन्तर-भाग रूप गुस्थान से प्रजा उत्पन्न होती है । अतः इस प्राकृतिक प्रजनन - सम्पत्ति के लिए ही जाघनी के प्रान्तरभाग का अवदान किया जाता है । जाघनी के बाह्यभाग से गृहपति अग्नि के लिए अवदान करते हैं क्यों कि अग्नि देवता वृषा अर्थात् पुरुष हैं । सोमत्वष्ट्रादि देव -पत्नियाँ योषा ( स्त्री ) हैं । प्रजनन के समय स्त्री नीचे और पुरुष ऊपर रहता है । अतः पुच्छ के आभ्यन्तरभाग से ही पत्नी - संयाज होता है तथा वृषारूप गृहपति अग्नि के लिए पुच्छ के बाह्यभाग का अवदान किया जाता है ॥ ७ । पत्नीसंयाज व गृहपति- श्रग्नि के यजन के बाद यजमान, ऋत्विक् आदि पशु के हृदय-शूल को ले कर तालाब के तट पर जाते हैं । हृदय के परिपाक का साधन लोहे का शूल ( काँटा ) ही हृदयशूल कहलाता है । यजन का कार्य पूर्ण हो जाने पर हृदयशूल को तालाब के किनारे पर गाड़ दिया जाता है । जब तलवार से शमिता यज्ञिय पशु का वध करता है । तब पशु काँप उठता है और उसका शोक हृदय में एकत्र हो कर शोक विद्युत् उस हृदयशूल में प्रविष्ट हो जाती है । शूल - वेधन से पूर्व यदि हृदय को अग्नि में पकाया जाएगा तो वह शोक हृदयशूल में नहीं आएगा और वह आहुति में तथा बाद में किए जाने वाले इडाप्राशन में भी चला जाएगा । अतः शूलवेधन कर के ही हृदय को पकाना चाहिए, जिससे हृदयशोक हृदय-शूल में प्रविष्ट हो जाए और हृदय शोकरहित हो जाए । पश्चात् उसे पका कर उसकी आहुति देवताओं को देनी चाहिए तथा इडाप्राशन भी करना चाहिए । इस प्रकार प्रधान, स्विष्टकृत्, उपयाज नामक त्रिविध यज्ञार्थ हेतु तीन हिस्सों में विभक्त पशु के हृदय भाग में शूल चुभो कर, पका कर तदनन्तर उसे पशु के सभी अङ्गों के ऊपर रखखा जाता है, क्यों कि सभी अङ्गों से पूर्व हृदय की आहुति दी जाती है ॥ ८ ॥
यज्ञ में अन्तर्वेदि - बहिर्वेदि भेद से दो प्रकार के मनुष्य होते हैं । यज्ञ - कर्म से सम्बन्ध रखने वाले ऋत्विगादि अन्तर्वेदि तथा पशुओं को लाने ले जाने आदि का कार्य करने वाले बहिर्वेदि हैं, जिन्हें परिकर्मी भी कहते हैं । शोकयुक्त हृदयशूल को वेदि से इतर स्थान में गड़वाने के लिए ऋत्विक् हृदयशूल परिकर्मी को दे देते हैं । परिकर्मी उस हृदयशूल को न पृथिवी में तथा न जल में फेंके । प्रन्यथा वह शोक पृथिवी से उत्पन्न होने वाली औषधियों व वनस्पतियों में अथवा जल में डाले जाने पर जल में प्रविष्ट हो जाएगा ॥ ६ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ०८ ) शतपथ ब्राह्मणं उपयाज ब्राह्मण भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसीलिए परिकर्मी शोकयुक्त हृदयशूल को आर्द्र - देश तालाब के किनारे ले जा कर शुष्क व आर्द्र की सन्धि - कर्दममय स्थान में डाले, जिससे किसी को भी हानि न पहुँचे । क्यों कि जल का उपयोग करने वाला शुद्ध कर्दमरहित जल ले लेगा तथा शुष्क मिट्टी को लेने वाला शुद्ध पङ्करहित मिट्टी को ले लेगा । यदि तालाब यज्ञ - प्रदेश से दूर हो तो परिकर्मी को यूप के बाहर पूर्व की ओर जहाँ शुष्क और आर्द्र की सन्धि हो, वहाँ हृदयशूल को निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए गाड़ देना चाहिए - ' मा s पोमौषधीहिंसी: ' । मन्त्र का दूसरा भाग है- ' धाम्नो धाम्नो राजंस्ततो वरुण नो मुञ्च ' इति । बन्धन के देवता वरुण हैं । हृदयशूल को भूमि में गाड़ना - उसे वरुण के बन्धन में ही डालना है । किन्तु हृदयशूल के साथ परिकर्मी भी बन्धन में न पड़ जाए, अत: वह वरुण से प्रार्थना करता है कि हे राजन् वरुण! जिस प्रकार गाय के द्वारा नुकसान कर देने पर भी लोग उसे अघ्न्या ( रक्षणीया ) कह कर छोड़ देते हैं, मारते नहीं; उसी प्रकार हमारे द्वारा शत्रु का अनिष्ट हो जाने पर भी वह हमें अघ्न्या ( रक्षणीय ) ही माने और हमारा अनिष्ट न करे । इस मन्त्र के प्रभाव से वरुण देवता उस परिकर्मो को सर्वविध वरुण-पापों से तथा सभी वारुण्य अपराधों से मुक्त कर देता है || १० || इसके बाद अध्वर्यु आदि ऋत्विक् - सुमित्रिया न आप प्रोषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए जल और औषधियों को मन्त्र से अभिमन्त्रत करते हैं हमारे काम में आने वाली आप और प्रोषधियाँ ( अन्न - जल ) हितकारिणी हों तथा जो हम से द्वेष करते हैं और हम जिन से द्वेष करते हैं उनके प्रति ये हितकारिणी हों । जितनी दूर में हृदयशूल का प्रभाव रहता है उतनी दूर में शोकाग्नि के कारण न जल रहता है, न ओषधियाँ अतः उन्हें वापस लाने एवं क्रुद्ध जल व ओषधियों से मित्रता करने के लिए ' सुमित्रिया न आप: सन्तु ' इत्यादि मन्त्र से अभिमन्त्ररण कर्म करते हैं । इससे वे जल और प्रोषधियाँ यजमान स्थान की ओर पुनः आ कर वहाँ प्रविष्ट हो जाती. हैं । हृदयशूल को भूमि में गाड़ने का कार्य अग्नीषोमीय पशु व आग्नेय पशु का नहीं, अपितु वन्ध्या गाय का होता है । वन्ध्या गाय के हृदयशूल के उपगूहन से ही अग्नीषोमीय व आग्नेय पशु के हृदयशूल का भी उपगूहन हो जाता है ॥११ ॥
[ विज्ञान भाष्य ] ग्रग्नीषोमीय यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) प्रयाज होते हैं - ग्यारह ( ११ ) अनुयाज होते हैं एवं ग्यारह ( ११ ) ही उपयाज होते हैं । इनमें से जो ग्यारह ( ११ ) उपयाज हैं वे सात ( ७ ) -चार ( ४ ) इन दो भागों में विभक्त रहते हैं । सात ( ७ ) उपयाज कहलाते हैं - एवं चार ( ४ ) अत्युपयाज कहलाते हैं । उपयाज दिव्यात्म को पैदा करने के लिए किए जाते है । ' एवं पुनः पुनः प्रजोत्पत्ति के लिए वंश नष्ट न हो जाय, इसलिए चार ( ४ ) प्रत्युपयाज किए जाते हैं । बस - इस उपयाज ब्राह्मण में उन्हों १ ' सातों उपयाजों का विशद विवेचन पूर्व के ' प्रयाजानुयाज ब्राह्मण ' में कर दिया गया है । ' [ ५०५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मणे उपयाज ब्राह्मण की इतिकर्त्तव्यता बतलाई जाती है । उपयाजानन्तर प्रतिप्रस्थाता निम्नलिखित चार ( ४ ) मन्त्रों से चार ( ४ ) प्रत्युपयाज करता है— “ १ - यज्ञं गच्छ स्वाहा, २- सोमं गच्छ स्वाहा, ३- दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा, ४- अग्नि वैश्वानरं गच्छ स्वाहा । " ( वा ० सं ० ६।२१ ) इन चारों में से पूर्व के तीन मन्त्रों से तो रेतः सिञ्जन किया जाता है एवं चौथे मन्त्र से सिक्त रेत को श्रग्नि - गर्भाशय में प्रविष्ट किया जाता है । प्रत्युपयाज करने का एकमात्र उद्देश्य है - वंश -परम्परा का अनवरत चलते रहना - पुनः पुनः प्रजा का उत्पन्न होते रहना । पुत्र हो - पोता हो - पड़पोता हो - इस प्रकार बार - बार रेतःसेक हुआ करे एवं उस से बार - बार प्रजाप्रजनन हुआ करे । बस इस पोन: -पुन्य प्रजा संपत्ति प्राप्त करने के लिए ही तीन मन्त्रों से केवल रेतः सिश्वन हीकिया जाता है । तीन बार रेतः सिञ्चन बतलाना - प्रजा के पौनःपुन्य की ओर लक्ष्य रखना है, अतएव यहाँ की पुनरुक्ति को दोषपरक नहीं समझना । वह प्रतिप्रस्थाता सर्वप्रथम - " यज्ञं गच्छ स्वाहा " " इस मन्त्र से पहला अत्युप-या करता है । हे श्राहुति! प्राप यज्ञ की ओर रेत की ओर जाओ । अर्थात् - रेत रूप बन कर अग्नि गर्भाशय में सिक्त हो जाओ । सारा विश्व ' स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी - इन पाँच मण्डलों में विभक्त है । इन पाँचों में से जो परमेष्ठिमण्डल है - वही यज्ञमण्डल कहलाता है एवं वही आपोमण्डल कहलाता है । ' प्राण, आप्, वाक्, अन्नाद, अन्न ' - पाँच यज्ञक्षर पूर्वोक्त पाँचों मण्डलों में रहते हैं । रहते क्या हैं? पाँचों यज्ञक्षरों का नाम ही स्वयम्भू आदि है । इन पाँचों में जो प्रारण मण्डल है, उसका मैथुनी सृष्टि से कोई सम्बन्ध नहीं है, क्यों कि वह सर्वथा असंग है । दो चीजों का जब बन्ध - सम्बध होता है - दो वस्तुओं की जब संसृष्टि होती है, तब मैथुनी सृष्टि होती है । संसृष्टि ही सृष्टि कहलाती है । स्वयम्भू - प्राण सहचर - सम्बन्ध से रहता है न कि बन्ध - सम्बन्ध से । बन्धन स्नेहन चाहता है । यह स्नेहन प्रारण में नहीं है, अतएव स्वयम्भू को सृष्टि से बाहर की वस्तु माना जाता है । स्वयम्भू के अनन्तर है - " आपोमय परमेष्ठी ” । इस परमेष्ठि पानी में स्नेहन होता है । बस इसी से यहीं से मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ होता है । इस परमेष्ठिमण्डल के भृगु - अङ्गिरा - अत्रि- ये तीन मनोता हैं । तीनों में जो भृगु है - वह स्नेहतत्त्व है, अङ्गिरा तेजस्तत्त्व है । बस इस स्नेह और तेज ( दूसरे शब्दों में अग्नि - सोम ) से ही मैथुनी सृष्टि होती है । स्नेह योषा प्राण है - तेज वृषा प्राण है । अवस्थात्रय के कारण एक ही भृगु श्राप वायु- सोम तीन नाम धारण कर लेता है । श्रतएव परमेष्ठी आपोमण्डल, वायु ( शिव ) मण्डल एवं सोममण्डल -तीनों भागों में व्यवहृत होता है । यह भृगु - सोम उस श्रङ्गिरा श्रग्नि में आहुत होता रहता है । अग्नि में सोमाहुति को ही " यज्ञ " कहते हैं । चूँ कि इसका जनक ग्रापोमय परमेष्ठी है, अतएव हम परमेष्ठी को " यज्ञ - मण्डल " भी कह सकते हैं । परमेष्ठ आप ही यज्ञ का प्रवर्तक है । यज्ञ का प्रारम्भ पानी से ही होता है । यही कारण है कि यज्ञ के प्रारम्भ में अपप्रणयन किया जाता है एवं, तथैव १ ' वा ० सं ० ६।२१ ' । [ ५०६ ]