Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 61–70
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण इन्द्रियाँ हैं - इसके वीर्य्य हैं - इन्हें ही अन्तरङ्गवित्त कहते हैं एवं ४ अध्वर्यु बहिर्वित्त हैं । बस, इस प्रकार इन दसों से ( ४० से ) युक्त जो आत्मा है - वही विराट् कहलाता है । यह विराट् प्रजापति पृथिवी से परमेष्ठि तक स्थिर है । सारे देवता देवता ही क्या सारा प्रपञ्च इस विराट् प्रजापति की महिमा से ही विराट् पर ही प्रतिष्ठित हो रहा है--" विराजा वै ( प्रजापतिना ) देवा अस्मिन् लोके प्रत्यतिष्ठन् " इसका यही चौथा अर्थ है । हमारे यज्ञ का सम्बन्ध रोदसी त्रिलोकी से है । पृथिवी अन्तरिक्ष, द्यो का नाम रोदसी है । इन तीनों में १० -१०-१० बँटे हुए हैं । तीनों विराटों की एक त्रिलोकी है । त्रैलोक्य की " त्रिशिनी विराट् " है । हमारे यज्ञ का सम्बन्ध त्रैलोक्य से अतएव हमें ३० विक्रम ही करने चाहिए । तभी ३० के ऊपर ( २१ वें अहर्गण के ऊपर ) रहने वाला सोम हमें मिलेगा । अतएव " शदक्षरा के विराट् ” ( ऐ. ब्रा. अ. १८ । १६ ) कहा गया है । सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि प्राण - देवता विराट् के कारण ही हमारे पृथिवीलोक में प्रतिष्ठित हो रहे हैं एवं सोमयज्ञ से सम्बन्ध रखने वाला विराट् ' त्रिशिनी ' है अतएव हम भी इस पृथिवीलोक में यावज्जीवन आनन्द से प्रतिष्ठित रहें अतः ३० विक्रम की ही वेदि की श्रोणि बनानी
चाहिए-" त्रिशदक्षरा वै विराट् । विराजा वै देवाऽअस्मिन् लोके प्रत्यतिष्ठन् ।
तथो एवैष एतद् विराजैवास्मिन् लोके प्रतितिष्ठति ॥७ ॥
कितने ही प्राचार्यों का मत है कि वैदिका श्रोणि भाग ३ ३ विक्रम का होना चाहिए । जो मध्य का शङ्क, है उससे ठीक साढ़े सोलह अङ्ग ुल दक्षिण में श्रोणि होनी चाहिए । साढ़े सोलह प्रङ्ग ुल ही उत्तर में होनी चाहिए । इसमें आधा - आधा अङ्ग ल तो मध्य शङ्क में ही शामिल हो जाता है । बाकी विराट् में २ ही विक्रम ज्यादा बढ़ते हैं । " न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्याम् " । ( ऐ. ब्रा. अ. १।६ ) यह नियम है । अतएव दो विक्रम ज्यादा हो जाने पर भी विराट् के स्वरूप में कोई बाधा नहीं है । इस प्रकार ३३ विक्रम मानना भी ठीक ही है । ३३ विक्रम मानने वालों को अन्तःकरण का भाव यही है कि पृथिवी के २१ तक अग्नि रहता है, २१ के बाद सोम रहता है । इस २१ तक १०-१०-१० ( पृथिवी १० - अन्तरिक्ष १० - द्यौ १० ) के हिसाब से त्रिशिनी विराट् समाप्त हो जाती है । सोम इसके ऊपर रहता है । उसी की सोमयज्ञ में आवश्यकता है अतएव सोम - संपत्ति प्राप्त्यर्थ ३ विक्रम अधिक करने चाहिए | इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर कहते हैं— " थो s पि त्रयस्त्रिंशत्स्युः । त्रयस्त्रिंशदक्षरा वै विराट् विराजैवा-स्मिल्लोके प्रतितिष्ठति ॥८ ॥
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण हमने श्राधा - आधा अङ्गुल इधर - उधर रख कर २ अङ्गुल की वृद्धि से २ अक्षर वृद्धि बतलाई थी परन्तु दूसरे प्रकार से एक - एक अक्षर की ही वृद्धि होती है । ३० के १०-१० के हिसाब से तीन विराट् हैं । इस प्रकार ३३ होने से ११-११-११ के तीन विराट् हो गए अतः एक ही अक्षर बढ़ता है । पूर्वोक्त दोनों ही पक्षों में कामाचार समझना चाहिए । यह तो हुई श्रोणि की व्यवस्था । अब चलिए ३६ विक्रम वाले पूर्व भाग की ओर । यह वेदि जिस कारण पूर्व की ओर ३६ विक्रमयुक्ता होती है - इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-" थ यत् षट्त्रिंशद् विक्रमा प्राची भवति ( तस्य कारणम् उच्यते ) " । सारे खगोल में ( १ ) गायत्री ( २ ) उष्णिक ( ३ ) अनुष्टुप ( ४ ) बृहती ( ५ ) पंक्ति ( ६ ) त्रिष्टुप ( ७ ) जगती - ये सात छन्द हैं । इन सातों छन्दों पर देव प्राण रहते हैं अतएव ' सप्त वै छन्दांसि । ( कौ ० १४१५ ) यह कहा जाता है । सात छन्दों में से जो बृहती छन्द है - उस पर सूर्य्यं भगवान् स्थिर रूप से तप करते हैं प्रतएव ' सूर्यो बृहतीमध्यूढस्तपंति ' यह कहा जाता है । जिस प्रकार देवता लोग विराट् छन्द से पृथिवी पर आते हैं - तथैव इस बृहती छन्द से वे वापस अपने स्थान में अर्थात् द्युलोक में चले जाते हैं । खगोल की जो पूर्वापर मध्य रेखा है उसे ही विष्वद्वृत्त कहा जाता है । इसे ही हो -रात्र और पूर्वापरवृत्त कहा जाता है । इस वृत्त से २४ दक्षिण २४ उत्तर की ओर जो परिसर है - उसी का नाम क्रान्तिवृत्त है । इसमें बृहती सहित सात पूर्वापर वृत्त है । जो सबसे अन्त का छन्द है उसी का नाम गायत्री छन्द है । सूर्य जब इस सबसे छोटे छन्द पर चला जाता है तो दिन सबसे छोटा होता है-और रात्रि सबसे बड़ी होती है क्योंकि यह वृत्त हमारे हिसाब से ( विषुवत् से उत्तर में रहने वालों के हिसाब से ) बिल्कुल छोटा है । यह छन्द २४ अक्षर का है । ६-६ अक्षर का एक - एक चरण है अतएव ' षडक्षरा वै गायत्री ' यह कहा जाता है । इसके बाद जो उष्णिक् छन्द है - वह इससे ४ अक्षर बड़ा २८ अक्षर का पूरा छन्द है - ७- अक्षर का एक - एक चरण है । इसके अनन्तर अनुष्टुप् ग्राठ अक्षर का छन्द है - इसमें कुल ३२ अक्षर हैं । बृहती छन्द ६ अक्षर का है - एक एक चरण में ६-६ अक्षर हैं-इस प्रकार कुल ३६ अक्षर हो जाते हैं । पंक्ति १० अक्षर का छन्द है । त्रिष्टुप् ११ अक्षर का है । जगती १२ अक्षर का है । सबसे बड़ा छन्द जगती ही है अतएव ६ अक्षर के बृहती छन्द पर आक्षेप करके प्राकृतिक स्थिति द्वारा समाधान किया गया है - जैसा कि श्रुति कहती है-" यदन्यानि छंदांसि वर्षीयांसि भूयोऽक्षरतराणि प्रथ कस्मादेतां बृहतीत्याचक्षते इति । एतया हि देवा इमाँल्लोकानाश्नुवत ते वै दशभिरेवा-क्षरैरिमं लोकमाश्नुवत दशभिरन्तरिक्षं दशभिदिवं चतुभिश्चतस्त्रो दिशो द्वाभ्या-मेवास्मिँल्लोके प्रत्यतिष्ठन् । तस्मादेतां बृहतीत्याचक्षते " ॥ ( ऐ. ब्रा अ. १६१२४ ) प्रत्येक छन्द में ३६० अंश होते हैं । इसी नियमानुसार बृहती में भी ३६० अंश मानने पड़ते हैं । सूर्य को मध्याकाश में रख कर ६०-६० अंश के चार टुकड़े कर डालिए । मध्याह्न से पूर्वक्षितिज तक [ ४४ ] .
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मणे वेदिनिर्माण ब्राह्मणे ६० हैं । एवमेव पंश्चिम क्षितिज तक ६० हैं । इसी प्रकार १८ अंश नीचे के श्राधे खगोल में है । १०-१० अक्षर का एक - एक विराद हो जाता है । यह बात पूर्व के प्रकरण में बतला श्राएं हैं । इस प्रकार ६० शात्मक बृहती छन्द के प्रत्येक चरण में १०-१० के हिसाब से कुल ६ विराट् हो जाते हैं । इस प्रकार चारों चरणों में कुल ३६ विराट् हो जाते हैं । एक - एक विराट् को अक्षर कहते हैं । इस प्रकार इस छन्द ३६ अक्षर हो जाते हैं । पृथिवी इस बृहती छन्द पर स्थित सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाया करती है । ३६० दिन में पूरी परिक्रमा लगा लेती है । पार्थिव आग्नेय प्राण ३६० दिन में इस सूर्य से सर्वात्मना सम्बद्ध हो जाते हैं । जो सौर प्राण प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी में आ गये थे वही ३६० दिन के संवत्सर यज्ञ में इसी बृहती द्वारा बृहती की परिक्रमा से सूर्य में जा मिलते हैं । यही पार्थिव देवताओं का उस सूर्य में- युलोक में - इस बृहती छन्द द्वारा शामिल होना है । इससे सिद्ध हो जाता है कि पृथिवी के प्राण को सूर्य में सर्वात्मना जाने के लिए बृहती छन्द की एक परिक्रमा अभीष्ट है । एक परिक्रमा में पार्थिव देवता द्युलोक में अर्थात् सूर्य में चले जाते हैं । इस प्रकार प्राकृतिक यज्ञ में पार्थिव देवता बृहती छन्द द्वारा सूर्य लोक में द्युलोक में जाया करते हैं । आज यह यजमान इसी स्वर्ग में जाने के लिए सोमयाग कर रहा है । इसमें जाने के लिए- इसी बृहती छन्द को जो कि ३६ अक्षर का है- तय करना पड़ता है अतएव प्रकृति की नकल पर ३६ अक्षर की ही प्रर्थात् ३६ विक्रम की ही वेदि बनाई जाती है । जिस प्रकार देवताओं का आहवनीय सूर्य्य होता है तथैव यहाँ पर ३६ वें विक्रम के पास उत्तर - वेदि के बीच में-जो ग्राहवनीय है वह इस यजमान का दिव्य ग्राहवनीय - सूर्य्य होता है । मेरी आत्मा का स्वर्ग से सम्बन्ध हो जाए अतएव ३६ विक्रम का पूर्वभाग बनता है - यही सब का खुलासा है— " शिदक्षरा वै बृहती । बृहत्या वै देवाः स्वर्गं लोकं समाश्नुवत । तथोऽएवैष एतद् बृहत्यैव स्वर्ग लोकं समश्नुते । सोऽस्य दिव्याहवनीयो भवति " ॥९ ॥
वेद का जो अर्थात् स्कन्ध है, वह दक्षिणेतर २४ विक्रम का होता है । वेदि का पूर्वभाग अर्थात् अग्रभाग २४ विक्रम का किसलिए होता है - इसका कारण बतलाते हैं-" अथ यत् चतुर्विंशतिविक्रमा पुरस्ताद् भवति " - ( तस्य कारणम् उच्यते इति शेषः ) । पृथिवी से ले कर पृथिवी के २१ अहर्गण तक अग्नि रहता है । इसी अग्नि में २१ के ऊपर रहने वाला पारमेष्ठ्य सोम अनवरत प्राहुत होता रहता है । इसी सोमाहुति के कारण २१ तक वितत रहने वाले इस अग्नि को हम यज्ञ कहने के लिए तैयार हैं । इस यज्ञ में अर्थात् अग्नि में गायत्री - त्रिष्टुप् जगती ये तीन छंद होते हैं । पृथिवी - पिण्ड से त्रिवृत् स्तोम तक अग्नि की घनावस्था रूप गायत्री छन्द रहता है । पञ्चदश स्तोम तक त्रिष्टुप् छन्द रहता है । एकविंशस्तोम तक जगती छन्द रहता है । इन तीनों में यज्ञ के प्रारम्भ का छन्द गायत्री छन्द है । यज्ञ के पूर्वार्द्ध में गायत्री छन्द है । गायत्री छन्द में २४ अक्षर हैं । पार्थिवाग्नि का नाम गायत्री है, यही ब्रह्मणस्पति में से सोम लाती है - जो कि सोम चन्द्रमा नाम से [ ४५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मरण प्रख्यात है । इस चन्द्रमा के साथ १२ महीने में पक्षानुसार पार्थिवाग्नि के २४ विभाग हो जाते । ये २४ विभाग उसी गायत्री अग्नि के हैं । बस ये इसके २४ अक्षर हैं । प्रतिफलित सौर तेज का नाम गायत्री है, उसी का नाम संवत्सराग्नि है । ' उद्ग्राभ निग्राभेण चन्द्र सम्बन्धेन ' इसी के २४ विभाग हो जाते हैं । बस चतुविशत्यक्षरा गायत्री का यही तात्पर्य है । अपिच यह पृथिवी सूर्य से २२ अंश के फासले पर उसके चक्कर लगाया करती है । इसलिए भी पार्थिवाग्नि को प्रर्थात् गायत्री को २४ अक्षर का कहा जाता है-कहना इस प्रपश्व से यही है कि प्रकृति - यज्ञ में गायत्री छन्द पूर्वार्द्ध है एवं वह २४ अक्षर का है । हमारे जो अंसद्वय हैं - वेदि का पूर्वभाग है - यज्ञ का पूर्वभाग है - श्रतएव प्रकृति के अनुसार हमें भी पूर्वार्द्ध भाग को २४ विक्रम का ही बनाना चाहिए । बस, वेदि का यही स्वरूप है अर्थात् वेदि के विषय में हमें जो कुछ कहना था कह चुके-" चतुविशत्यक्षरा व गायत्री । पूर्वाद्धों वै यज्ञस्य गायत्री । पूर्वार्द्ध एष
यज्ञस्य । तस्माच्चतुर्विंशतिविक्रमा पुरस्ताद् भवति । एषा मात्रा वेदे: " ॥ १० ॥
हमने बतलाया था कि वेद पुरुष के लिए वेदि बनाई जाती है । वेदि स्त्री - स्वरूप है प्रतएव इसके पश्चिम भाग को - श्रीरिण भाग को कन्धों की अपेक्षा बड़ा बनाया जाता है । जिस पुरुष का वक्ष-स्थल, नितम्ब भाग से चौड़ा होता है- वही भाग्यशाली और पराक्रमी होता है । यदि नितम्ब बड़े हैं और वक्षस्थल छोटा है तो समझलो ऐसा पुरुष सर्वथा निर्वीर्य्य है । समय पर धोका देने वाला है, मन्दभागी है । वक्षस्थल विशाल होना - यही पुरुष का सौन्दर्य है- पुरुषत्व है - ठीक इसके विपरीत यदि स्त्री के नितम्ब छोटे हैं और वक्ष स्थल बड़ा है तो वह भी किसी काम की नहीं । जो स्त्री श्रोणि - भाग से अलसगमना है - वही प्रशंसनीया है । जिसकी छाती चौड़ी है - नितम्ब छोटे हैं - प्राय: ऐसी स्त्री के संतान नहीं होती; होती भी है तो मरियल - सड़ियल - गलियल ही होती है । भारतीय सौन्दर्य नितम्ब की पृथुलता में है । चूँकि स्त्री के बड़े नितम्ब की प्रशंसा है - एवं वेदि - पुरुष की स्त्री है अतएव इसके श्रोणि भाग को बड़ा करना चाहिए - यही बतलाने के लिए याज्ञवल्क्य कहते हैं-" अथ यत् पश्चाद् वरीयसी भवति - ( तस्य कारणम् उच्यते ) " । लोक में पृथुश्रोणि- युक्ता स्त्री वरीयसी प्रशस्त्रा मानी जाती है । चूंकि वेदि का पश्चाद् - भाग श्रोणि है अतएव उसे पृथु ही करना चाहिए । श्रोणि पश्चिम भाग में होती है एवं वही स्त्री प्रशस्त्रा कहलाती है जो कि पृथुश्रोणि होती है । जो पृथुश्रोणि होती है - उसकी प्रशंसा करते हुए लोग कहा करते हैं ' इयं वै पृथु श्रोणि: ' अजी, इसकी सुन्दरता का क्या कहना है - यही इसका भाव है । अतएव वेदि को पश्चिमभाग - स्वरूप श्रोणि के स्कन्ध की अपेक्षा ६ विक्रम बड़ी ( २४ + ६ = ३० विक्रम की ) अथवा & विक्रम बड़ी ( २४ + 8 = ३३ विक्रम की ) बनाते हैं । " पश्चाद् वरीयसी पृथुश्रोणिरिति वै योषां प्रशंसन्ति " - ( लोकाः ) ( तस्मात् पश्चाद्भागस्य पृथुत्वं कर्त्तव्यम् ) । [ ४६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण इस प्रकार एक कारण तो पृथुता का यही है । देखने में सुन्दर लगे यही पहला कारण है । एक दूसरा कारण और भी है-" यद्वेव पश्चाद् वरीयसी भवति ( तस्य द्वितीयं कारणम् उच्यते - इति शेषः ) " । जिसका पश्चाद् - भाग बड़ा होता है वही उत्तरोत्तर प्रजनन करता है अर्थात् जिसके नितम्ब भाग स्थूल होते हैं उसके अधिक सन्तानें होती हैं । जिसका पश्चाद्भाग जितना बड़ा होता है उसके अधिक प्रजनन शक्ति से अधिक प्रजा उत्पन्न होती है । आज इस वेदि द्वारा यजमान यज्ञात्मा को अपने आपको -उत्पन्न करने वाला है अतएव वेदि को पश्चाद् - भाग से बड़ी कर उसमें प्रजनन शक्ति डालता है । श्रोणि-भाग के बड़े होने की यही उपपत्ति है । " पश्चादेवैतद् वरीयः प्रजननं करोति । तस्मात् पश्चाद् वरीयसः प्रज-ननादिमाः प्रजाः प्रजायन्ते " ॥११ ॥
वेदि के विषय का करीब - करीब सम्पूर्ण निर्णय हो चुका । केवल - यूप और उत्तरावेदि का निर्व-शेष रहा है । इसमें यूप तो प्रधान वस्तु है । इसके विषय में अभी और कहना है, अतएव न्याय प्राप्त होने पर भी सूची - कटाह न्यायेन पहले उत्तरावेदि का निर्वचन कर देते हैं । इस महावेदि के पूर्व पश्चिम भाग में एक उत्तरा वेदि बनाई जाती है - जिसके मध्य में इस महावेदि का श्राहवनीय कुण्ड होता है । इस महयज्ञ में उत्तरा - वेदि है - वह इस महायज्ञ की नासिका अर्थात् श्रेष्ठ भाग है । सारे शरीर में मस्तक भाग श्रेष्ठ हुआ करता है । उसमें भी नासिका - प्राँख, कान वगैरः से ऊंची निकली रहती 1 इसीलिए जो सब का मुखिया होता है - उसे ऊंचा रहने के कारण ' नाक ' कहा करते हैं । एवमेव यह उत्तरावेदि महावेदि के पूर्वभाग में है अर्थात् मस्तक भाग में है एवं यही सारी वेदी की नाक है । इसी में श्राहवनीय होती है । इसी में देवताओं के लिए आहुति दी जाती है अतएव यही सबसे श्रेष्ठ है । इस प्रकार एक प्रकार से तो इसका नाक ( श्रेष्ठ ) होना यों सिद्ध हो जाता है । नाक ऊँचा होता है अतएव इसे भी ' उत्तरावेद ' कहा जाने लगा । " नासिका ह वा s एषा यज्ञस्य यदुत्तरवेदिः " ( इति प्रथमा उपपत्ति ) । अपिच इसको मिट्टी लगा कर महावेदि की अपेक्षा कुछ ऊँची बनाते हैं । इसलिए भी ' उच्चामुपकिरति ' इस व्युत्पत्ति से इसे ' उत्तरावेदि ' कहते हैं-" नासिका ह वा एषा यज्ञस्य यदुत्तरवेदिः । अथ यदेनामुत्तरां वेदेरुप-किरति; तस्मादुत्तरवेदिर्नाम " ॥१२ ॥
भौतिक प्रस्मदादि सृष्टि से पहले इस रोदसी त्रिलोकी में भगवान् ब्रह्म प्रजापति की ( मन, प्राण, वाङ्मय, श्रात्मा की ) आदित्य और अङ्गिरा ये दो ही प्रजाएँ थीं । इन दोनों में से अङ्गिरात्रों ने प्रादित्यों [ ४७ 1
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मणं वैदिनिर्माण ब्राह्मण से पहले ही सोम को एकत्र कर लिया एवं अग्नि नाम के अङ्गिरा से कहा कि हैं अग्ने! आप स्वर्ग में श्रादित्यों के पास जाइए और कल सम्पन्न होने वाली हमारी स्वःसुत्या ( यज्ञ ) की बात प्रादित्यों से कह दें और साथ ही यह भी कह दें कि आप इस सोम से ( जिसे कि हम अङ्गिरात्रों ने एकत्र कर रखा है ) हमारे लिए यज्ञ कराएँ अर्थात् हमारे ऋत्विक् बनें । जिस पर हम बैठे हुए हैं - वह पृथिवी कहलाती है एवं जहाँ पर सूर्य का गोला दिखलाई पड़ रहा है वह द्युलोक है । इस सूर्य और पृथिवी के बीच जो रिक्त स्थान है वही अन्तरिक्ष है । इन तीन लोकों की समष्टि को ही रोदसी त्रिलोकी कहते हैं । सृष्टि-क्रम में स्वयम्भू भगवान् से सर्वप्रथम परमेष्ठि पिण्ड उत्पन्न होता है । इसमें रहने वाली प्रजा श्रमृत-स्वरूपा । इसके बाद सूर्य्य - मण्डल उत्पन्न होता है । सूर्य की रश्मियों का नाम मरीचियाँ है । मरी- ' चियों के संघर्ष से पानी उत्पन्न होता है जो मरीचि सम्बन्धात् ' मर ' कहलाता है । इसी मर पानी से रुद्रवायु के कारण श्राग्नेय वायु के कारण आपः फेन, उषा, सिकता, शर्करा, अर्यमा, श्रयः, हिरण्य क्रम से पृथिवी बन जाती है । तदन्तर इस पृथिवी - पिण्ड में उसी सूर्य का अग्नि प्रवर्ग्य बन कर प्रविष्ट हो कर, पृथिवी की वस्तु बन जाता है । सूर्य्य रश्मि से बना हुआ प्रतिबिम्ब जैसे अपनी स्वतन्त्र संस्था कायम कर - सूर्य की तरह अपने में से चारों ओर रश्मियाँ निकालने लगता है तथैव सूर्य्य से आया हुआ जो अग्नि है - वह पृथिवी की प्रातिस्विक वस्तु बन कर उसमें से ( पृथिवी में से ) प्रबल वेग से चारों श्रोर बाहर निकलने लगता है । पृथिवी से निकलने वाला जो प्राग्नेय प्राण है वही अङ्गिरा कहलाने लगता है -था यह शुक्ल तथापि पृथिवी के कृष्ण - प्राण के सम्बन्ध से यह शुक्ल अंगिरा प्राण सर्वथा काला हो जाता है । अतएव विज्ञान में अङ्गिरा को काला बतलाया जाता है । अस्तु, हमें सिर्फ इतना ही कहना है कि पृथिवी में से चारों ओर निकलने वाले जो प्राग्नेय प्राण हैं - वे सब अङ्गिरा कहलाते हैं । ये अङ्गिरा प्राण पृथिवी में से अनवरत निकला करते हैं और निकल कर द्युलोक की ओर जाया करते हैं । अतएव यह कहा जाता है-" इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन् । प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः " ॥ ( सामवेद पू ० १।१०।२ ) यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि यह अङ्गिरा प्रग्नि चित्यचितेनिधेय भेदेन दो प्रकार का है । जो पिण्ड में रहने वाला श्रङ्गिरा है - वह चित्य अङ्गिरा कहलाता है । यह पिण्ड ही में रहता है बाहर नहीं आता एवं जो चितेनिधेय अङ्गिरा है- जिसे समझने के लिए ' अग्नि ' कहेंगे - पिण्ड से बाहर बड़ी दूर तक २१ अहर्गण तक जाया करता है । " इत एत उदारुहन् " इसी अग्नि के लिए- अमृताङ्गिरा के लिए कहा जाता है । एवमेव सूर्य से निकलने वाले जो चितेनिधेय श्राग्नेय प्राण हैं - वे सब श्रादित्य प्राण कहलाते हैं । मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि, कीट इत्यादि का निर्माण इसी रोदसी द्यावा - पृथिवी से होता हैं । सूर्य के रस से अर्थात् श्रादित्य से और पार्थिव रस से अङ्गिरा से ही प्राणिमात्र की सृष्टि होती है । होती है यह सृष्टि प्रङ्गिरा - प्रादित्य से ही परन्तु इसका प्रेरक वही स्वयम्भू प्रजापति है । यदि वह न हो तो अङ्गिरा प्रादित्य स्वयं नहीं रह सकते प्रतएव मनुष्यादि को भी हम उसी ब्रह्म प्रजापति की प्रजा कहेंगे । सृष्टि के प्रारम्भ में जब कि पृथिवी और सूर्य बने ही थे उस समय उस ब्रह्म प्रजापति की [ ४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण श्रादित्य और अङ्गिरा अर्थात् पार्थिव प्राण और सौर प्रारण ये दो ही प्रजाएँ थीं । हम से पहले वास्तव में ये दो ही थे । इन दोनों ने हमें बाद में उत्पन्न किया है । हमने कहा है कि यह कथा रोदसी से सम्बन्ध रखती है न कि क्रन्दसी से क्यों कि क्रन्दसी में तो पितर- भृगु - ब्रह्मणस्पति बृहस्पति- सविता परमेष्ठि-सूत्रात्मा इत्यादि नाना प्रजाएँ उस समय भी रहती हैं जब कि प्रादित्य और अङ्गिरा भी उत्पन्न नहीं होते । में वास्तव अतएव इस कथा का मात्र रोदसी त्रिलोकी से ही सम्बन्ध समझना चाहिए । रोदसी त्रिलोकी में पहले ये दो ही उत्पन्न होते हैं । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" द्वयो ह वा इदम ( श्रस्मदादि सृष्टेः प्राक् ) प्रजा श्रासुः । आदित्या-चैवाङ्गिरसश्व " । सोम अग्नि में सोमाहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । यज्ञ में अग्नि - सोम दोनों अपेक्षित अग्नि और हैं । खाली सोम - दोनों से भी यज्ञ नहीं हो सकता - खाली अग्नि से भी यज्ञ नहीं हो सकता - प्रतएव यज्ञ हम से सोम ही अभिप्रेत है को ही यज्ञसाधनत्वात् यज्ञ कहने के लिए तैय्यार हैं । इनमें से प्रकृत में ही बचता है । यह सोम क्यों कि अग्नि ने तो संभरण किया था - ऐसी अवस्था में यहाँ वाच्य केवल सोम तक सोम ही सोम पृथिवी के रथन्तर अग्नि से जो कि २१ तक वितत है- ऊपर रहता है । २१ सोम से ३३ है - वह सूर्य से नीचे रहता है । यह सोम दिक् श्रौर भास्वर भेदेन दो प्रकार का है । जो भास्वर इसी दिक् सोम को - ' ब्राह्मणस्पत्य आ कर चन्द्रमा बन जाता है । दिक् सोम सूर्य्य से ऊपर ही रहता है । ब्राह्मणस्पत्य सोम सौराग्नि सोम भी कहा जाता है । चान्द्र सोम पार्थिवाग्नि में प्राहुत होता रहता है एवं यह पृथिवी में आ जाता है, में प्राहुत होता रहता है । इस चान्द्रसोम को भी सूर्य्य खाता है परन्तु पहले - सूर्य को प्रत्यक्ष में न मिल कर बाद में सूर्य्य इससे भोग कर पाता है । चान्द्रसोम अर्थात् भास्वर सोम आदित्य द्वारा पहले पार्थिवा-पार्थिवाग्नि द्वारा मिलता है क्यों कि सोम को उस यज्ञ को - सूर्य्यं अर्थात् । चन्द्रमा पृथिवी के कब्जे ङ्गिरा ( चितेनिधेय ) अपने में संग्रहीत कर लेते हैं । वास्तव में बात सच है । इस सोम को उस स्थान से में है । पृथिवी के द्वारा ही सूर्य्यं इसके साथ भोग करता है, स्वातन्त्र्येण नहीं में गायत्री कहा है । गायत्री लाने वाले यही पार्थिवाङ्गिरा प्राण हैं जिन्हें हमने सौपक प्राख्यान - भोग से पहले भास्वर सोम - स्वरूप ही सोमापहरण कर पार्थिव - देवताओं के पास आती है । प्रादित्य यही है कि चन्द्रमा पृथिवी चन्द्रमा का संग्रह पहले पार्थिव प्रङ्गिरा ही करते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मानता पड़ता है कि यह यज्ञ की पकड़ में रह कर पृथिवी के ही चारों ओर परिक्रमा लगाता है रख अतएव कर कहते हैं ( चन्द्रमा ) अङ्गिरा की वस्तु है । बस इसी विज्ञान को लक्ष्य में " ततोऽङ्गिरसः पूर्वे यज्ञं ( सोमं ) समभरन् " । होने वाला जो यज्ञ है दूसरे दिन होने वाला जो यज्ञ है उसे ' श्वः सुत्या ' कहते हैं । उसी दिन एवं के चारों ओर परिक्रमा लगाता है उसे ' सुत्या ' एवं ' सद्यः की ' यज्ञ कहते हैं । चन्द्रमा पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाती है । इस चन्द्रमा को साथ लिए हुए पृथिवी सूर्य्यं के अर्थात् प्रादित्यों नहीं करता । पृथिवी का ऊपर जाता चान्द्रसोम का भोग पहले सूर्य्यं करता है परन्तु सूर्य्यं अपने भाप [ ४६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण हुआ जो अमृताग्नि है वहीं उस सोम को सूर्य में हुत करता है । भोग करते - करते अमावस्या के दिन सूर्य सारे सोम का ( दिव्य सोम का ) भोग कर लेता है । उस दिन हमारे पृथिवी लोक में आसुरसोम मात्र शेष रह जाता है । असुर काले होते हैं । श्रमावस्या को प्रासुरसोम ही हमारे पास रहता है अतः एक अमावस्या में घोर अन्धकार होता है । जो सोम अङ्गिराम्रों से ग्रहीत होता है वह सोम पार्थिवाग्निः द्वारा पहले सूर्य में आहुत होता है, बाद में उसका पृथिवी से सम्बन्ध होता है । प्रङ्गिरा लोग स्वसुत्या के भरोसे ही बैठे रह जाते हैं एवं प्रादित्य लोग अद्यसुत्या कर डालते हैं । आगे बतलाई जाने वाली सारी कथा का वैज्ञानिक रहस्य इतना ही है कि भास्वरं सोम पार्थिवाङ्गिराम्रों द्वारा आता है एवं उसके साथ पहले प्रादित्यों द्वारा भोग होता है । बस, इसी विज्ञान को बच्चों को सिखाने के लिए कथा-रूप में परिणत कर साथ ही में व्यावहारिक शिक्षा देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - इस प्रकार सोम को एकत्र कर अग्नि से कहा कि तुम जाओ और प्रादित्यों से हमारी श्वः सुत्याके बारे में कह दो और उनसे कहो कि आप हमें इस सोम से यज्ञ करवाइए । श्रङ्गिरा का सोम के साथ पहले सम्बन्ध नहीं होता, इसकी सुत्या नहीं होती । श्रद्यसुत्या तो श्रादित्यों की होती है । अङ्गिरात्रों के साथ तो सोम का सम्बन्ध बाद में होता है । बस इसीलिए ' श्वः सुत्याम् ' कहा है । " ते यज्ञं ( सोमं ) सम्भृत्योचुरग्निमिमां नः श्रः सुत्यामादित्येभ्यः: प्रब्रूहि । अनेन नो ( अस्मान् ) यज्ञेन ( सोमेन ) याजयतेति " ॥ १३ ॥
अथवा ' श्रनेन नो यज्ञेन याजय ' का यह अर्थ समझना चाहिए कि हम कल यज्ञ करने वाले हैं-इसकी तो श्रादित्यों को खबर कर दें और श्राप इस सोम से हमें यज्ञ करवाएँ अर्थात् हमारे होता बन जाएँ ॥१३ ॥
of चूँकि अङ्गिरात्रों का दूत है प्रतएव इसे बाध्य हो कर द्युलोक में श्रादित्यों को श्वः सुत्यां की सूचना देने के लिए जाना पड़ा । श्रादित्य लोगों ने इसमें अपना अपमान समझा । उन्होंने विचार किया कि भला, अपने से पहले अङ्गिरा सोमयाग कर लेंगे और हम धरे ही रह जाएँगे । नहीं - ऐसा हर गिज नहीं हो सकता । यह विचार कर उन्होंने अपनी सभा की और उसमें निर्णय के लिए यह विषय रखा कि हे श्रादित्यो! आप कोई ऐसा उपाय निकालिए जिससे कि श्रङ्गिरा लोग पहले हमारे लिए ही यज्ञ करवाएँ - हमें अङ्गिरात्रों की श्वः सुत्या नहीं कराना पड़े-" ते हादित्या ऊचुः । उपजानीत यथा वास्मानेवाङ्गिरसो याजयात्र वयमङ्गिरस इति ॥१४ ॥
आदित्यों ने थोड़ी देर विचार कर उत्तर दिया कि हें आदित्यो! हम श्रङ्गिराओं से पहले ही -उनकी श्वः सुत्या के बीच में ही अद्यसुत्या की व्यवस्था कर लें । इसके अलावा उस अङ्गिरा - यज्ञ से छुटकारा पाने का और कोई भी उपाय नहीं है । सच हैं, यदि कोई किसी को बुलाता है और वहाँ उसका जाना न तो घर में कोई नया काम प्रायोजित कर उसे कहला देना चाहिए कि मैं तो श्राज कार्य-[ ५० ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मण वेदिनिर्माण ब्राह्मण और कोई वशात् प्रा नहीं सकता हूँ आप ही मेरे घर पधारिए । टालने की इससे अच्छी तरकीब नहीं है । " ते होचुः - न वाऽअन्येन यज्ञादपक्रम रणमस्त्यन्तरामेव सुत्यां प्रियामहा-ऽइति । ( श्रङ्गिरसां स्वसुत्यातः पूर्वमेवास्माकं सुत्यां प्रियाम है. एतेनान्येन्य प्रङ्गिरस यज्ञातिक्रमरणार्थ - द्वितीयः कश्चिदपि पथ्या नास्ति - इति भावः ) " । यह विचार कर श्रादित्यों ने उस यज्ञ को जिसे कि अङ्गिराम्रों ने एकत्र कर रखा था की - अपने श्वः-अधिकार में कर लिया और उस प्रगत अग्नि से कहा कि हे अग्ने! आपने हमें अङ्गिरानों का ' करने के लिए कहा है- परन्तु आज हम आपके श्रौर अङ्गिराम्रों दोनों के लिए प्रद्यसुत्या सुत्या अङ्गिरात्रों को निम-निमन्त्रण देते हैं अर्थात् आप हमें निमन्त्रण देने आए हैं परन्तु हम आपको और जाइए । हम न्त्रणदेने आए । इस प्रकार अद्यसुत्या करने वाले जो हम लोग हैं उनके प्राप होता बन बनना बड़े गौरव की बात है । जब आदित्यों ने होता बनने का लालच सुत्या करने वाले हैं । होता की ओर दिया तो अग्नि उस रिश्वत के प्रलोभन में आ गए । बस वे वहीं रह गए । पृथिवी में से द्युलोक बन जाता है । जाने वाला जो अमृताङ्गिरा है - वही अग्नि है । यह अग्नि द्युलोक में जा कर वहाँ की वस्तु है । इसी एवं यही उस चान्द्र सोम को सूर्य्य में श्रादित्यों में प्राहुत कर उनकी प्रद्यसुत्या कर डालता विज्ञान का अलङ्कार - पक्ष बतलाते हुए कहते हैं-" ते ( श्रादित्याः ) यज्ञं ( श्राङ्गिरससम्मृतं सोमं ) संजह: । ते यज्ञं संभृ-त्योचुः श्वः सुत्यां वै त्वमस्मभ्यमग्ने प्रावोचः । अथ वयमद्यसुत्यामेव तुभ्यं ) प्रब्रूमोऽङ्गिरोभ्यश्च ( प्रब्रूमः ) तेषां नः ( अद्यसुत्या कुर्वतामस्माकमादित्यानाम् त्वं होताऽसि - इति " ॥१५ ॥
अपने पास ही इस प्रकार आदित्यों ने दूत बन कर आए हुए अग्नि को तो अपना होता बना कर ओर किसी अन्य को ही रख लिया एवं श्रङ्गिराम्रों को अद्यसुत्या की खबर पहुँचाने के लिए उनकी भेज दिया--" तेऽन्यमेव प्रतिप्रजिघ्युः । श्रङ्गिरसोऽच्छ । ( एतद् वृत्तान्त बोधनाय -श्रग्निप्रतिनिधिम् - प्रङ्गिरसोऽभिमुखम् - ग्रन्यमेव प्रजिघ्युः ) " । हो गए । उसी समय वे वहाँ अङ्ग प्रत्या की योजना का वृत्तान्त सुनते ही प्राग बबूला दर्जे के द्युलोक के देवता थे - उन्होंने थाए और अग्नि के ऊपर तीव्र क्रोध करने लगे । आदित्य लोग ऊँचे एक प्रकार से ताना मारते अग्नि को रोका था अतएव प्रत्यक्ष में तो क्रोध करना अनुचित समझा हमारे किन्तु दूत बन कर कैसे आपने हुए अग्नि से कहा कि हे अग्ने! आप हमारे दूत बन कर आए थे । [ ५१ ]
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तृतीय काण्ड ( ०५ ) शतपथ ब्राह्मरण वेदिनिर्माण ब्राह्मरण हमारा प्रत्यादर नहीं किया? हमने आपको अपना दूत बनाया था और बड़ी इज्जत की थी । उसका बदला आपने हमें यह दिया कि दूसरों के होता बन गए! हमारे सारे अहसानों को भूल गए और जरा भी प्रत्यादर न किया!! प्रतएव क्रोध करते हुए उन्होंने कहा-" ते हाप्यङ्गिरसोऽग्नयेऽन्वागत्य चुक्रुधुरिव - कथं tris इति ( आदरस्य प्रत्यादरं न कृतवानसि ) " " ॥१६ ॥
नो' दूतश्चरन्न प्रत्या-जब श्रङ्गराओं ने अग्नि को ताना मारा तो अग्नि से रहा न गया । उसने अङ्गिराओं से कहा कि हे श्रङ्गिराओ! वास्तव में मैं आपके उपकारों का आभारी हूँ परन्तु क्या करू? - जो अनिन्द्य लोग हैं, बहुत ही ऊँचे दर्जे के प्रति पूजनीय आदित्य देवता हैं, स्वर्ग के अधिष्ठाता हैं- उन्होंने मेरा वरण कर लिया और कहा कि आज हम आपका होतृत्वेन वरण करते हैं- आज से आप हमारे होता हैं । बस, अनिन्द्यों से -प्रतिश्रेष्ठ देवताओं से वृत होकर ( वरण किया जाकर ) मैं वापस लौटने में समर्थ न हो सका । अर्थात् चित्त तो मेरा भी भीतर से दुःख पाता था परन्तु मुझ से एक बड़े आदमी का लिहाज न 1 तोड़ा गया श्रतएव मुझे बाध्य होकर उनकी बात स्वीकार करनी पड़ी । इसमें मेरा कितना अपराध है -यह आप स्वयं समझ सकते हैं-" अनिन्द्या वे ( श्रेष्ठाः - दिव्यदेवाः - द्युलोकाधिष्ठातारः ) मा ( मां ) वृष ( होतृत्वेनावृषत ) सोऽनिन्द्यैर्वृतो नाशकम पक्रमितुमिति " । इसमें प्राकृतिक विज्ञान से श्रानृशंशा धर्म की शिक्षा देते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि तुम्हारे से श्रेष्ठ - वयोवृद्ध - पूज्य तुम्हें किसी काम के लिए कहता है और उस काम से यदि तुम्हारी हानि भी होती है - यदि तुम्हें उससे दुःख भी मालूम होता है तब भी तुम उसका उल्लंघन मत करो । यही दिव्य धर्म है । पूज्यों की आज्ञा चाहे बुरी ही है - अपना नुकसान करने वाली ही है- तुम्हें उसका पालन करने में कभी प्राता - कानी नहीं करनी चाहिए । नतमस्तक होकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, यही सनातन धर्म है - यही हमारा देवीय धर्म है । इसके विपरीत कार्य्यं श्रासुर धर्म में प्रविष्ट होना है-" तस्मादु हानिन्द्यस्य वृतो नापक्रामेत् " । प्रकृत का अनुसरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - प्राखिर अङ्गिराओं को भी इस यज्ञ में शामिल होना पड़ा । प्रग्नि होता बने - वायु अध्वर्यु बने । इस प्रकार ऋत्विग् बनकर इस सद्यस्क्री यज्ञ से ( अद्य-सुत्या से ) अङ्गिरा लोगों ने ( पार्थिवाग्नि ने ) आदित्यों को यज्ञ करवाया । चूंकि यह यज्ञ प्रकृति में प्रङ्गिराओं से पहले हो जाता है अतएव इसका नाम - प्राकृतिक यज्ञविद्यारहस्य के ज्ञाता महर्षियों ने ' सद्यः की ' रखा है । सारे उपाख्यान का रहस्य इतना ही है कि सूर्य में जो ब्रह्मणस्पति का सोम प्राता है वह तो अपने आप आ जाता है परन्तु चान्द्र सोम की आहुति पार्थिवाग्नि द्वारा इसमें आहुत होती है । प्रङ्गिरा ही चान्द्र सोम से - अद्यसुत्या से सद्यः की यज्ञ से आदित्यों का यज्ञ करवाते रहते हैं । इस सोम का सम्बन्ध [ ५२ ]