Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 521–530

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) पानी से व्याप्त हो रहा है । अवस्था में ' यज्ञ गच्छ ' कहना याज्ञवल्क्य कहते हैं-' वा ० सं ० ६।२१ ' । १ प्रातपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण ॥२ ॥

इस पानी को " श्रद्धा " पानी उससे सोम उत्पन्न होता है । उस सोम की पर्जन्य नाम के वृष्टि - रेत की पार्थिव वैश्वान -[ ५०७ ] शरीर- ग्रग्निहोत्र ( भोजन ) के पहले भी आचमन किया जाता है, क्यों कि पानी ही यज्ञ है । एवं यह पारमेष्ठ्य भृगु प्राप ही तो रेत बनता है । अग्नि योनि है - पानी ( भृगु ) रेत है । सारा विश्व इसी आग -तात्पर्य कहने का यही है कि यज्ञ आपस्वरूप है । आप ही रेत है । ऐसी रेत का ही सिंचन करना है । इसी यज्ञ - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर

" सोऽत्युपयजति । यज्ञं गच्छ स्वाहेति । आपो वै यज्ञः । श्रापोरेतः ।

रेत एवैतत् सिञ्चति " ॥१ ॥

रेतः सिञ्चन से ही प्रजोत्पत्ति होती है । यह रेत अन्न से उत्पन्न होता है । हम जो श्रौषधि ( अन्न ) खाते हैं, उसमें चान्द्र - रस रहता है । वनस्पति में सौर - रस उल्वरण रहता है एवं प्रौषधि में चान्द्र रस उल्वरण रहता है । अतएव चन्द्रमा को प्रोषधियों का पति कहा जाता है । यह चन्द्रमा सोममय है भास्वर सोमपिण्ड ही चन्द्रमा कहलाता है । यही अन्न का सार भाग है । यही सोम अन्न में प्रविष्ट रहता है । इस अन्न को जब खाया जाता है तो वह सातवीं धातु के रूप में शुक्र हो जाता है । अन्न में प्रविष्ट सोम ही शुक्र बनता है । अतएव हम सोम को रेत और रेत को सोम कहने के लिए. तय्यार हैं । प्रतिप्रस्थाता दूसरी प्राहुति इसी सोमरस के सिवनाभिप्राय से देता है । " सोमं गच्छ स्वाहा " १ बोल कर प्राहुति देना, श्रग्नि - गर्भ में रेतः सिञ्चन ही करना है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" सोमं गच्छ स्वाहेति । रेतो वै सोमः । रेत एवैतत् सिञ्चति लाँख खोलने पर जो एक विशाल नीलाकाश दिखलाई पड़ता है - वही दिव्याकाश कहलाता है । यही हमारा परमेष्ठ्यमण्डल है । चूंकि इसी में पानी भरा रहता है, अतएव लोक - लोकी के प्रभेद व्यव हार की अपेक्षा से यहाँ ' दिव्य नभ ' से " आप " अभिप्रेत मान लिया जाता है । यही प्राप बरस कर अन्न बनता है । अन्न ही वीर्य्यं बनता है । भी कहा जाता है । इस श्रद्धा पानी की द्युलोकाग्नि में प्राहुति होती है । वृष्टि - देवता में ( पर्जन्याग्नि ) में आहुति होती है, उससे वृष्टि होती है । राग्नि में आहुति होती है, उससे औषधियाँ उत्पन्न होती हैं । उन श्रौषधियों की पुरुषाग्नि में प्राहुति होती है, उससे रेत उत्पन्न होता है एवं उस रेत की योषाग्नि में आहुति होती है, उससे गर्भ रहता है । इस प्रकार ' धु, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष, योषित् ' - इन पाँचों में ' श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न, रेत ' - इन पाँचों की प्राहुति होने से पाँचवी प्राहुति में वही श्रद्धा नाम का पानी पुरुष रूप में उत्पन्न होता है । अरुण महर्षि के पुत्र श्वेतकेतु महर्षि प्रवाहण से प्रश्न करते हैं कि हे प्रवाहण! पाँचवी प्राहुति में आप से पुरुष कैसे बन जाता है? यदि आप यह जानते हैं तो इसका उत्तर दीजिए । इसके उत्तर में पूर्व के आहुतिक्रम को बतला कर प्रवाहण कहते हैं—

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण " इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " । ( छा ० उप ० ५।१ ) कहना प्रकृत में केवल इतना ही है कि यहाँ दिव्यनभ से पारमेष्ठ्य ' आप ' अभिप्रेत है । वही चूं कि रेत बनता है, अतएव हम उसे रेत कहने के लिए तय्यार हैं । ऐसी अवस्था में “ दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा " " बोल कर आहुति देना रेत सिञ्चन करना ही है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" दिव्यं नभो गच्छ स्वाहेति । आपो वै दिव्यं नभः । श्रापो रेतः । रेत एवैतत् सिञ्चति ॥३ ॥

प्रयाजानुयाज ब्राह्मण में बतलाया गया था कि वीर्य्य के लिए प्रतिष्ठा की परमावश्यकता है । वी सिञ्चन किया गया और यदि वह प्रतिष्ठित नहीं हुआ तो उसका सिञ्चन करना सर्वथा व्यर्थ है यह सिक्त वीर्य्यं गर्भाशयस्थ आग्नेय रुधिर में ही प्राहुत होता है एवं यहीं प्रतिष्ठित होता है । वीर्य्य की प्रतिष्ठा अग्नि है । यदि वीर्य के साथ ऊष्मा का सम्बन्ध न हो तो सिक्त वीर्य्यं कथमपि परिपक्व नहीं हो सकता । चिड़िया अण्डा देने के बाद उसमें गर्मी डालने के लिए उस पर बैठा करती है । वह उसमें अपने शरीर की गर्मी डालती है । इसी को ' अण्डा सेना ' कहते हैं । इसी अण्डे सेने से शरीर की गर्मी डालने से यही वीर्य्य प्रतिष्ठित हो कर प्रजोत्पत्ति योग बनता है । बस - इस सिक्त वीर्य्य को अग्नि प्रतिष्ठित करने के लिए ही प्रतिप्रस्थाता - " अग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा " इस मन्त्र से चार ( ४ ) प्रत्यु-पयाज करता है । जिस पृथिवी प्रतिष्ठा पर हम बैठे हुए हैं वह क्या है? यदि यह पूछना चाहते हो तो इसका उत्तर है - " पृथिवी " । यह पृथिवी चित्यवैश्वानर अग्नि का पिण्ड है । अन्तरिक्ष में जैसे तेजस वायु की सत्ता रहती है- द्युलोक में जैसे प्राज्ञ इन्द्र की सत्ता रहती है तथैव इस पृथिवी में वैश्वा-नराग्नि की सत्ता रहती है । वैश्वानराग्नि पिण्डरूपा यह पृथिवी ही अस्मदादि भौतिक सृष्टि की प्रतिष्ठा है । बस, प्रतिप्रस्थाता इसी पृथिवी - प्रतिष्ठा में - वैश्वानराग्नि - प्रतिष्ठा में रेतः को प्रतिष्ठित कर उससे यजमान प्रजा उत्पन्न करता है । जैसे बिना प्रतिष्ठा के वीर्य्य- सेक से गर्भस्राव हो जाता है तथैव यदि यहाँ भी प्रतिष्ठा का श्राश्रय नहीं लिया जाएगा तो सिक्त वीर्य्य चू जाएगा एवं ऐसी अवस्था में प्रजोत्पत्ति सर्वथा न होगी । अतः प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित करने के लिए इस चौथे प्रत्युपयाज को अवश्य ही करना चाहिए - यही निष्कर्ष है । इसी प्रतिष्ठा - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं—

" अग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहेति " । इयं वै पृथिव्यग्निर्वैश्वानरः ।

सेयं प्रतिष्ठा । इमामेवैतत् प्रतिष्ठामभिप्रजनयति " ॥ ४ ॥

इस प्रकार चारों प्रत्युपयाज करके प्रतिप्रस्थाता--" मनो मे हाहि यच्छ " यह मन्त्र बोलता हुआ जिस हाथ से प्रत्युपयाज किए हैं अर्थात् प्राहुति दी है, उससे अपना मुंह पूँछ लेता | आज इस प्रतिप्रस्थाता ने दिव्यात्म में पशु को स्थापित करने के १ ' वा ० सं ० ६।२१ ' । २ ' वा ० सं ० ६।२१ ' | [ ५०८ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण लिए प्राणरूप गुदपशु की प्राहुति दी है । इस प्राणाहुति से इस प्रतिप्रस्थाता के भी प्राण निकलने की संभावना है, क्योंकि श्राज इसकी " मैं प्राणाहुति कर रहा हूँ " यह भावना हो रही है । भावना का अधिष्ठाता मन है । मन श्रद्धा रस श्राहुत रहता है । अतएव वह जैसी भावना करता है - वैसा ही फल-भोग पाता है । इसीलिए दार्शनिक शिरोमणि भगवान् कृष्ण कहते हैं--" श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः " । ( गीता १७।३ ) ऐसी अवस्था में आज " मैं प्राणाहुति दे रहा हूं " - ऐसी भावना के कारण प्रतिप्रस्थाता के प्रारण निकल जाने की सम्भावना है । बस, प्रारण न निकल जाए इसीलिए वह जिस हाथ से प्रारणाहुति दी थी, उससे मुख स्पर्श कर लेता है । एवं साथ ही " हृदय सम्बन्धी मेरा मन हृदय में ही प्रतिष्ठित हो जाए " यह भावना करता है । जो मन " मैं प्राणाहुति दे रहा हूं " ऐसी भावना कर रहा था - वही - " मेरा मन इससे पशु - प्रारण के साथ ही प्रतिप्रस्थाता मेरे हृदय " में ही प्रतिष्ठित रहे " यह भावना करने लगता है । का प्राण नहीं निकलता अपितु वह हृदय में ही प्रतिष्ठित जाता है । यहाँ पर " मन हृदय में प्रतिष्ठित हो जाए " यह कहा है । इसका कारण यही है कि यह प्रज्ञा-मन प्राणाविनाभूत है । इसीलिए तो -" यो वै प्रारणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः " । ( कौ ० उप ० ३।३ ) यह कहा जाता है । मन बिम्ब है । प्राण मन - बिम्ब की रश्मियाँ हैं । प्राण का आलम्बन मन ही है । प्रारण को पकड़े हुए यह मन हृत् प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित रहता है । अतएव श्रुति कहती है-" हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " - इति । ( यजुर्वेद ३४ | ६ ) जब तक दीपक प्रतिष्ठित रहता है अर्थात् दीप - बिम्ब प्रतिष्ठित रहता है तब तक दीप की रश्मियाँ इधर - उधर स्थानच्युति को प्राप्त नहीं हो सकतीं । स्थिर बिम्ब की रश्मियाँ बिम्ब को छोड़ कर नहीं जा सकतीं । परन्तु यदि बिम्ब ही अस्थिर हो जाता है तो रश्मियाँ भी प्रतिष्ठित हो जाती हैं । ठीक यही बात मन प्रारण के लिए भी समझनी चाहिए । मन बिम्ब है । प्राण रश्मियाँ हैं । यदि मन हृदय में प्रतिष्ठित है तो कुछ भी हो प्राण नहीं निकल सकता । यदि मन अप्रतिष्ठित हो जाए तो फिर चाहे कितना भी प्रयत्न करो, प्रारण नहीं ठहर सकता । प्रतिष्ठित मन, बन्धन का कारण है- प्रतिष्ठित मन, बन्धमुक्ति का कारण है । इसीलिए तो -" मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः " । ( मैत्रायण्युपनिषत् ६ । ३४ ) यह कहा जाता है | चूँकि मन ही प्रधान है, मन के प्रतिष्ठित रहने से प्राण अपने - प्राप प्रति-ष्ठित हो जाता है - प्रतएव प्राण को रोकने के लिए " मनो मे हार्दि यच्छ " कहा गया है । हाथ को मुख [ ५०६ ]

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण से लगाना हाथ में अनुशय रूप से लगे हुए पशु - प्रारण को शरीर में प्रतिष्ठित करना है । यह श्रात्मा मनप्राणवाङ्मय है । अतएव -" एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ” । ( बृ ० आ ० उप ० १।५।३ ) यह कहा जाता है । मन प्राण वाक् तीनों अविनाभूत हैं । यहाँ पर तीनों के निकल जाने का भय है. । अतएव तीनों को प्रतिष्ठित करने के लिए यहाँ तीन काम किए जाते हैं । हाथ से जो मुख पूँछा जाता है उससे प्राण को प्रतिष्ठित करना है । " सुनो मे हार्दि यच्छ " से मन को और वाक् को प्रति-ष्ठित करना है । हाथ को मुँह से लगा देने से और " मेरा मन प्रतिष्ठित हो जाए " मन ही मन ऐसी भावना कर लेने मात्र से मन और प्राण तो प्रतिष्ठित हो जाते हैं, परन्तु वाक् रह जाती है । वाक् को भी प्रतिष्ठित करने के लिए " मन्त्र वाक् " बोलता है । इस प्रकार " मनो मे हाद्दि यच्छ " " यह बोल कर मुख- स्पर्श करता हुआ उपयष्टा प्रतिप्रस्थाता अपने " मन - प्राण वाङ्मयात्मा " को अपने से प्रवर्ग्य नहीं कर लेता । इसी विज्ञान को लक्ष्य बनाता है - प्रर्थात् अपने आत्मा को प्राहुति से बचा कर प्रतिष्ठित में रख कर कहते हैं--" अथ मुखं विमृष्टे - मनो मे हाद्दि यच्छेति ( मन्त्रेणेति शेषः ) । तथो होपयष्टा ( प्रतिप्रस्थाता ) श्रात्मानं नानुप्रवृणक्ति " ॥५ ॥

उपयाज - कर्म्म समाप्त हो चुका - अब पत्नी संयाजक चलता है । जिस प्रकार यज्ञ में - देवताओं का यजन होता है - तथैव देव पत्नियों का भी यजन होता है । यजमान अथवा यजमान प्रतिनिधि अध्वर्यु एवं प्रमुख ऋत्विक्- देवतानों का यजन करते हैं । यजमान पत्नी देवपत्नियों का यजन करती है । यज-मानवत् - यजमान पत्नी की प्रतिनिधि कोई स्त्री नहीं होती, अतएव " पत्नी संयाज " कर्म्म स्वयं यजमान-पत्नी को ही करना पड़ता है । पशु के जो गुदादि प्रधान अंग हैं उनसे तो देवताओं का यजन कर दिया गया । अव पशु की जाघनी ( पुच्छ- मांस किंवा पुच्छ - दण्ड ) से ऋत्विक् लोग यजमान - पत्नी द्वारा देव-पत्नियों का वजन करवाते हैं-" थ जाघन्या ( पुच्छ दण्डेन ) पत्नी: ( सोमत्वष्ट्राद्या देवपत्नी: ) संयाजयन्ति ( यजमानपत्न्याः ऋत्विजः - इति शेषः ) " । पशु की जो पूँछ है, उसे साफ कर उसका मांग निकाल लिया जाता है । वही " जाघनी " कह-लाती है - जैसा कि कात्यायन कहते हैं-हैं— " जाघन्याः पशोः पुच्छरूपेण हविषा - इति " । १ ' वा ० सं ० ६।२१ ' । [ ५१० ]

पृष्ठ 525

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण जघन प्रदेश में चूँकि यह पुच्छ होती है - प्रतएव इसे " जघन प्रदेशे भवा " इस व्युत्पत्ति से " जाघनी ' ' कहा जाता है । अधिकरणमाला में भी ( ३।३।१८ जे ० ) जाघनी का यही अर्थ किया गया : है एवं सायरण भी जाघनी का यही अर्थ मानते हैं । पितृभूति एवं हरिहर प्राचार्य ने जाघनी को कटि पर लगाया है, परन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि कटि, श्रोणि को कहते हैं एवं श्रोणि की आहुति प्रधान यागादि में हो चुकी है । अतः जाघनी से पशु - पुच्छ - दण्ड ही अभिप्रेत समझना चाहिए । बस उसी से पत्नी - संयाज कम किया जाता है । जाघनी से पत्नी - संयाज कर्म्म क्यों किया जाता है? - इसको बतलाते हैं - यह जो जाघनी है - वह जघन भाग है एवं स्त्री के इस जंघा भाग से ही प्रजा उत्पन्न होती है । बच्चा जब भी उत्पन्न होता है - कटि प्रदेश के अन्तराल - प्रदेश से ही होता है । देवता और देवपत्नियों का यजन कर उनके मिथुन से दिव्यात्मा - प्रजनन करना है । देवता - वृषा है और देवपत्नी " योषा " है । सन्तान योषा के जघनार्ध से ही उत्पन्न होती है । आज देवपत्नियों के जघनार्ध से ही प्रजा उत्पन्न करनी है, अतएव उनका जाघनी से ही यजन करना चाहिए । जो ऋत्विक् लोग जाघनी से यजमान पत्नी द्वारा देवपत्नियों का यजन करवाते हैं, ऐसा करते हुए वे दिव्यात्मा को ही उत्पन्न करते हैं । तात्पर्य कहने का यही है कि प्रजनन में योषा के जघनार्ध का उपयोग होता है । देवपत्नियाँ योषा । इन्हीं से प्रजनन करवाना है । चूंकि जघनार्धं से प्रजनन के लिए जघन भाग ही उपयुक्त होता है, अतः और किसी अवयव से पत्नी संयाज न करवा कर " जाघनी " से ही पत्नी - संयाज करवाया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" थ जाघन्या पत्नीः संयाजयन्ति । जघनाद्धों वै जाघनी । जघनार्द्धा-द्वै ( जघन भागाद्वै ) योषायै ( योषायाः ) प्रजाः प्रजायन्ते । तत् प्रवैतज्जन-यति ( प्रजनयत्येवैतत् ) जघन्या पत्नीः सं याजयन्ति " || ६ || जिस जाघनी से पत्नी - संयाज किया जाता है, वह जाघनी का अन्तर- प्रदेश होता है । उस जाघनी के प्रर्थात् पशु -पुच्छ के दो विभाग कर लिए जाते हैं । पशु के ऊपर बाल सन्दोह रहता है । उन बालों सहित पुच्छ के चमं को उतार लिया जाता है- यह हिस्सा - ऊपर का होने के कारण " बाह्य " कहलाता है एवं भीतर का जो अलोमक स्वच्छ भाग है, वह " श्राभ्यन्तर " भाग कहलाता है । इस आभ्य-अन्तर से ही पत्नी - संयाज होता है एवं जो ऊपर का सलोमक जाघनी - भाग बचता है - उससे गृहपति अग्नि-देवता का यजन किया जाता है । पहले श्रलोमक जाघनी भाग से पत्नी संयाज होता है, तदनन्तर सलो-म उपरिभाग से गृहपति अग्नि का यजन होता है । इस प्रकार देवताओं की पत्नी के लिए जाघनी के अन्दर के भाग से अवदान करते हैं- प्रर्थात् श्रान्तर भागावदान देवपत्नियों के लिए होता है । इसका कारण यही है कि योषा के अन्तर भाग से अर्थात् गर्भाशय से ही प्रजा उत्पन्न होती है । प्रजा जब भी उत्पन्न होती है - स्त्री के गुदा स्थान में से ही होती है । बस इसी प्राकृतिक प्रजनन - संपत्ति के लिए ही -जाघनी के प्रान्तर भाग का प्रवदान किया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" अन्तरतो देवानां पत्नीभ्योऽवद्यति । श्रन्तरतो वै योषायै ( योषायाः ) प्रजाः प्रजायन्ते " । [ ५११ ]

पृष्ठ 526

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण जो पुच्छ का उपरिभाग है, उससे गृहपति अग्नि के लिए अवदान करते हैं । इसका कारण यही है कि अग्नि देवता वृषा है - पुरुष है । सोमत्वष्ट्रादि देव पत्नियाँ योषा हैं- स्त्री हैं । पुरुष जब स्त्री के से, उस पर हमला करता है । आज हमें दिव्यात्म साथ प्रजनन करता है तो वह उसके पीछे से, ऊपर प्रजनन करवाना है । प्रजनन में स्त्री पहले ( नीचे ) रहती है, पुरुष पीछे ( ऊपर ) रहता है । अतएव भीतर भाग से पत्नी यजन होता है एवं ऊपर के सलोमक - भाग से वृषा ( गृहपति - अग्नि ) यजन होता है । froad यही है कि प्रजनन संपत्ति प्राप्त्यर्थं ही प्राहुति का पूर्वोक्त प्रकारेण अवदान किया जाता है । - इसी अभिप्राय से कहते हैं-" उपरिष्टादग्नये गृहपतये ( प्रवद्यतीति शेषः ) । उपरिष्टाद्वै वृषा योषां ( अनु ) अधिद्रवति ॥७ ॥

" अथ हृदयशूलेनावभृथं यन्ति । उपयोग हो चुका, पत्नीसंयाज हो चुका - गृहपति यजन हो चुका । अब यजमान एवं ऋत्विग् वगैर: हृदयशूल को ले कर उसे फेंकने तालाब के किनारे जाते हैं । पशु का जो हृदय है - उसे एक काँटे में पिरोकर उसे पकाया जाता है । जिस प्रकार मांसशकलों को ( खण्डों को ) लोह - शलाका में पिरोकर . मांसाहारी मनुष्य मांस के टुकड़ों को पकाया करते हैं तथैव यहाँ पर भी जो पशु का हृदय है, उसमें एक घुसा दिया जाता है एवं उस काँटे से हृदय को पिरो कर काँटे से ही हृदय का परिपाक किया जाता है । बस, हृदय - परिपाक साधक इस शूल का नाम ही " हृदय शूल " है । जब सब काम समाप्त हो जाता है तो इस हृदय - शूल को तालाब के किनारे गाड़ दिया जाता । इसी के विषय में कुछ विशेष बातें बतलाते हैं । जिस समय तलवार से शमिता शामित्र - शाला में यज्ञिय पशु का आलम्भन करता है, उस समय शमिता को छुरा हाथ में लिए हुए प्राते देख कर आलभ्यमान पशु काँप उठता है । मारे शोक और भय के यह त्रस्त हो जाता है । उस आलभ्यमान पशु का जो शोक है, वह संकलित हो कर ' हृदय ' में जमा हो जाता | वास्तव में सच है - जब दुःख अथवा भय होता है, तो उसका असर हृदय पर ही होता है । भयभीत मनुष्य किंवा पशु का हृदय ही काँपता है, छाती ही धड़कती है - इससे मालूम होता है । कि शोक वास्तव में हृदय पर ही जा कर जमा होता है । प्रालभ्यमान पशु की भी यही अवस्था होती है । उसका सारा शोक हृदय में जमा हो जाता है । ऐसी अवस्था में उस शोकयुक्त हृदय में जब हृदय-शूल गोबा जाता है तो हृदयस्थ शोक हृदय से हृदय - शूल में श्रा जाता है । वह शोक - विद्युत हृदय- शूल में प्रविष्ट हो जाती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ पशोऽर्ह वाऽप्रालभ्यमानस्य हृदयं शुक् समभ्यवैति । हृदयात् - हृदय-शूलम् ” । [ ५१२ ]

पृष्ठ 527

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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण ऐसी अवस्था में यदि ऋत्विक् लोग हृदय को शूलवेधन से पहले ही पका कर बाद में उसका तृन्दन करते हैं तो वह शोक - भक्षरण के लिए एवं आहुति के लिए पर्याप्त हो जाता है । बात यह है कि हृदय में शोक रहता है । उसे यदि शूल बींधने से पहले ही पका लिया जाता है तो प्रग्नि ताप के कारण वह शुक्र ( शोक ) हृदय में जज्ब हो जाता है - अन्तर्य्याम बन जाता है, हृदय का आत्मा बन जाता है । बाद में शूल रोपने पर भी वह शोक हृदय से हृदय - शूल में नहीं आता, अपितु वह देवताओं में शामिल हो जाता है । हृदय के जरा से हिस्से का इडाप्राशन से भी सम्बन्ध कराया जाता है, तब इडाप्राशन करने वाले ऋत्विजों और यजमान में भी यह शोक चला जाता है । अतएव उस हृदय के शोक को कच्ची अवस्था में ही हृदय से हटाने के लिए हृदय- शूल से उसका परिवृन्दन करने के बाद शूलाकरण करना चाहिए । अर्थात् - पकाने से पहले E उस हृदय में शूल को गोब देना चाहिए जिससे कि हृदय-शोक प्राहुति एवं इडाप्राशन द्रव्य में न जा कर हृदय - शूल में आ जाए । तदनन्तर उसे पकाना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" यत् ( यदि ) शृतस्य ( परिपक्वस्य हृदयस्य ) परिवृन्दन्ति तदलं जुषं ( जोषाय भक्षरणाय अलं भवति - शोकयुक्तत्वात् न यागाहं भवतीत्यभिप्रायः ) । तस्मात् उ ( पुनः ) परिद्यैव शूलाकुर्य्यात् ( एवं च पाकात् पूर्वं शूलेन परि-तर्द्दनात् शुक्र हृदय शूलं प्राप्नोतीत्यर्थः ) ” । " पशु - पुरोडाश ब्राह्मण में बतलाया गया है कि इस पशु के तीन विभाग किए जाते हैं । ' प्रधान, स्विष्टकृत् - उपयट् ' - ये तीन कर्म्म ही तीन विभाग होते हैं । इस प्रकार निःप्रच्युत जो पशु है - उसमें जो हृदय भाग है - उसे शूल गोब कर अग्नि में पका कर पाकानन्तर शूल से अलग कर ग्राहुति के लिए निः प्रच्युत पशु के सारे अवयवों के ऊपर रक्खा जाता है । हृदयाहुति पहले ही हो चुकी है - केवल प्रसं गानुसार यहाँ पर उसी पूर्व कथन का अनुवाद कर दिया गया है । कहना यहाँ पर केवल इतना ही है । कि पाक से पहले हृदय को हृदय - शूल से गोबना चाहिए । गोब कर - पका कर उसे शूल से निकाल कर सब पशु श्रवयवों के ऊपर रख देना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं-“ त्रिः प्रच्युते पशौ - हृदयं ( हृदयशूलात् ) प्रवृह्योत्तमं प्रत्यवदधाति-( पाकोत्तरकाले हृदयं हृदयशूलात् प्रवृह्य इतरावयवानामुपरि स्थापयेदिति सायणाचार्याः || ८ || यज्ञ में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं - एक ( १ ) ग्रन्तर्वेदी और एक ( २ ) बहिर्वेदी । जो खास यज्ञक्रिया से सम्बन्ध रखते हैं, वे ऋत्विगादि अन्तर्वेदी कहलाते हैं एवं जो ग्रन्य वस्तुनों के उठाने धरने का - लाने ले जाने का काम करते हैं- वे " बहिर्वेदी " कहलाते हैं । ये ऋत्विगों से भिन्न हैं । इन को " परिकर्म्मा " कहा जाता है । शोकयुक्त हृदय - शूल को श्रवस्थान में गड़वाने के लिए यह ऋत्विक् एक परिकर्मी को हृदय शूल दे देता है । [ ५१३ ]

पृष्ठ 528

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 528 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण " थ हृदयशूलं प्रयच्छति " ( परिकर्मिणे - इतिशेषः ) । परिकर्मी को चाहिए कि वह उस हृदयशूल को न तो पृथिवी में गाड़े - न जल में डाले । यदि वह पृथिवी में डाल देगा तो उतनी दूर में उगने वाली औषधि वनस्पतियों में यह शोक जाएगा । एवं जो उस वनस्पति को खाएगा - उसे उस शोक का भागी बनना पड़ेगा । यदि पानी में डाल देगा तो पानी शोकयुक्त हो जाएगा, इसलिए न उसे पानी में डालना चाहिए, न पृथिवी में गाड़ना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" तन्न पृथिव्यां परास्येत् । नाप्सु । स यत् पृथिव्यां परास्येदोषधीश्च वनस्पतींश्चैषा शुक् प्रविशेत् । यदप्सु परास्येत् - अप एषा शुक् प्रविशेत् । तस्मा-न पृथिव्यां नाप्सु ॥९ ॥

तात्पर्य यही है कि न गीले में डाले- न सूखे में डाले । फिर कहाँ डाले? इसका उपाय बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हृदय- शूल को ले कर परिकम्मों को तालाब के किनारे चला जाना चाहिए । वहाँ जा कर जहाँ पर शुष्क और श्रार्द्र की अर्थात् जल और मिट्टी की सन्धि हो, ( कीचड़ हो ) वहाँ उसे डाल देना चाहिए । हृदयशूलस्थ शोक से किसी को हानि न पहुँचे - यही तात्पर्य है । जिसे गीला लेना होगा- वह शुद्ध पानी लेगा । जिसे शुष्क भाव अपेक्षित होगा- वह सूखी मिट्टी लेगा । दोनों की जो सन्धि - कर्दम- है, उसे कोई नहीं लेता है । अतः वहीं इसे डालना चाहिए । " अप एवाभ्यवेत्य यत्र शुष्कस्य चार्द्रस्य च सन्धिः उपगूहेत् " । स्यात् तत् ( तत्र ) यदि तालाब दूर हो एवं परिकर्मी इतनी दूर जाने में थकान के कारण आलस्य कर जाए तो एक पानी का बर्तन ले कर उसे यूप के बाहर पूर्व की ओर उँडेल ( ढोल ) देना चाहिए एवं वह पानी जितनी दूर में बहे - उसकी और पृथिवी की दोनों की सन्धि में उसे गाड़ देना चाहिए । इस प्रकार वह परिकर्मी एक पात्र ले कर उसे यूप के बाहर ढोल ( उँडेल ) देता है एवं आर्द्र और शुष्क सन्धि में -" मापो मौषधीहिंसी: धाम्नो धाम्नो राजंस्ततो वरुण नो मुञ्च । यदाहुरघ्न्या इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण तो मुञ्च " ॥ इति ॥ ( वा ० सं ० ६।२२ ) यह मन्त्र बोलता हुआ शोकयुक्त उस हृदय - शूल को गाड़ देता है । हे शोकयुक्त हृदयशूल! जिस स्थान में मैं आपको गाड़ता हूँ उस स्थान के प्रौषधि और वनस्पति की हिंसा मत कीजिए - अर्थात्-आप में रहने वाले शोक का असर उस स्थान में उगने वाली श्रौषधि - वनस्पति में न हो । एवं उस स्थान में जो पानी है, उसे भी दूषित मत करो । ईषदार्द्र स्थान में चूंकि शूल को गाड़ा जाता है, अतएव वहाँ पानी और मिट्टी दोनों की सत्ता रहती है । अतः दोनों की हिंसा के प्रभाव की प्रार्थना की जाती है । मन्त्र के इसी भाग का अर्थ करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-[ ५१४ ]

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तृतीय काण्ड ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण " ( यदि पुनः ) अभ्यवायनाय ग्लायेत् - अग्रेण यूपं ( यूपस्य - प्राग्देशे ) उदपात्रं निनीय - यत्र शुष्कस्य चार्द्रस्य च सन्धिर्भवति तत् ( तत्र ) उपगूहति मापो महिसीरिति ( मन्त्रेणेति शेषः ) तथा नापो नौषधीहिनस्ति " । मन्त्र का दूसरा भाग है-“ धाम्नो धाम्नो राजंस्ततो वरुण नो मुञ्च " । ( वा ० सं ० ६।२२ ) यह हृदय - शूल को जो जमीन के भीतर गाड़ना है - इससे उसे बन्धन में डालना है । बन्धन के भीतर गाड़ना है - इससे उसे बन्धन में डालना है । बन्धन के देवता वरुण हैं । संसार में जितना भी बन्धन होता है - उस सब के अधिष्ठाता देवता वरुण हैं । अग्नि विकास स्वरूप है - ' वरुण ' बन्धन स्वरूप है । वरुण पानी के देवता हैं - पानी संकोचधर्म्मा है । संकोच ही बन्धन का स्वरूप है । ग्राज यह परिकर्मी हृदयशूल को गाड़ता हुआ उसे वरुणदेवताक बन्धन में डालता है । इससे इसके भी बन्धन में बँधने की सम्भावना है । ऐसा न हो- शूल के साथ - साथ ही यह भी वरुण - पाश के बन्धन में आ जाए । श्रतः बन्धनाधिष्ठाता वरुण से प्रार्थना करता है कि हे राजन्! वरुण!! जिन - जिन स्थानों से हमारा बन्धन होने की सम्भावना है - उन सब स्थानों के बन्धनों से आप हमें उन पापों से विमुक्त कीजिए । अपराध हो जाने पर शत्रु लोग भी जिनके लिए " अघ्न्या " कहा करते हैं, हमें आप ऐसा ही बनाइए । गौ को अघ्न्या बतलाया जाता है । यदि गौ माता किसी का कुछ नुकसान भी कर देती है तो नीच से नीच, पापी से पापी मनुष्य भी " अरे! जाने दो । यह तो प्रन्या है - रक्षणीया है- पूजनीया है " यह कह देते हैं वैसे ही - यदि हम अपने शत्रुनों का यदि करें- कुछ नुकसान भी कर दें - उनका कुछ अनिष्ट भी कर दें - तो भी वे हमारे लिए " अघ्न्या " यही कहा अर्थात् - हमें रक्षणीय एवं पूजनीय ही समझा करें - आप से ( वरुण से ) हमारी यही प्रार्थना है । हे वरुण! आज हम आप से यही प्रार्थना करते हैं कि आप हमें सारे बन्धनों से मुक्त कर हमें " अघ्न्या " कहलाने लायक बना दीजिए " । मन्त्र का स्पष्टार्थ करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस प्रार्थना - मन्त्र से वरुण देवता इस परिकर्मी को सारे वरुण बन्धनों से एवं वरुण - पाश से मुक्त करते हैं-" तदेनं सर्वस्माद्वरुणपाशात् - सर्वस्मात् वरुण्यात् प्रमुञ्चति ॥१० ॥

इसके अनन्तर अध्वर्यु प्रभृति ऋत्विक्-" सुमित्रिया न प्राप प्रोषधयः सन्तु दुर्मित्रियाः । तस्मै सन्तु द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः " । ( वा ० सं ० ६।२२ ) यह मन्त्र बोलते हुए - पानी और औषधियों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करते हैं— [ ५१५ ] यो ऽस्मान्

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण उपयाज ब्राह्मण " हमारे काम में ग्राने वाले जो श्राप और औषधियाँ हैं ( अन्न - जल ) हैं - सुमित्रियान - अर्थात् - हित-कारी हों एवं जो हम से द्वेष करते हैं एवं जिन से हम द्वेष करते हैं - ऐसे उभयविध शत्रुओं के लिए ये औषधियाँ और आप अहितकारिणी बनें । जिस स्थान पर हृदय - शूल गाड़ा जाता है उस स्थान का श्राप और औषधियाँ " हमारे से इसने शोक का सम्बन्ध कराया " इस क्रोध के कारण उस स्थान से वे अलग हो जाते हैं अर्थात् जितनी दूर तक हृदय - शूल का असर रहता है उतनी दूर तक शोकाग्नि के कारण न पानी ही रहता है - न औषधि ही उगती है । उस स्थान की शोकाग्नि को शान्त करने के लिए वहाँ से पलायित श्रौषधियों के वापस आने के लिए कुछ आप औषधियों से मित्रता करने के लिए “ सुमित्रिया नः " इत्यादि से श्रभिमन्त्ररण - कर्म्म किया जाता है । ऐसा करने से वे श्रौषधियाँ और श्राप - यजमान की ओर अर्थात् यजमान स्थल की ओर पुनः प्रविष्ट हो जाती हैं । शुष्कार्द्र स्थान में - शोकयुक्त शूल गाड़ने से जो पानी और औषधियों का अपराध होता है उसका यही प्रायश्चित्त है । इस मन्त्र - प्रार्थना से उस स्थान से रुष्ट होने वाली आप-औषधियाँ प्रसन्न हो कर यजमान का अपराध क्षमा कर देती हैं-तात्पर्य यही है कि अन्न - जल युक्त स्थान में चूंकि हृदय - शूल का सम्बन्ध कराया गया है, इससे -यजमान से - अन्न - जल के दूर होने का संदेह रहता है । ऐसा न हो कहीं यजमान से अन्न और जल शत्रुता न कर बैठें - वे सदा इसके मित्र ही बने रहें- अतः " सुमित्रिया नः " इत्यादि मन्त्र से उनकी प्रार्थना की जाती है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" यत्र ( यस्मिन् स्थाने ) वाडएतेन ( हृदय - शूल निगूहनेन ) प्रचरन्ति आपश्च ह वाऽस्मात् - तावदोषधयश्चापक्रम्येव तिष्ठन्ति । तदु ताभिमित्रधेयं कुरुते । तथो हैनं ताः पुनः प्रविशन्ति । एषो - तत्र प्रायश्चित्तिः क्रियते " । " सुमित्रिया नः........ " इत्यादि मन्त्र से अभिमन्त्रण के कारण जल एवं प्रोषधियाँ यजमान-स्थान की ओर पुनः आ कर प्रविष्ट हो जाती हैं । हृदय - शूल को भूमि में गाड़ने का कार्य अग्नीषोमीय पशु व आग्नेय पशु का नहीं अपितु बन्ध्या गाय का होता है ।बन्ध्या गाय के हृदय - शूल के उपगूहन से ही अग्नीषोमीय व आग्नेय पशु के हृदय - शूल का भी उपगूहन हो जाता है— " स वै नाग्नीषोमीयस्य पशोः करोति, नाग्नेयस्य । वशायाएवानू-बन्ध्ययै । तां हि सर्वोऽनुयज्ञः सन्तिष्ठते । एतदु हास्याग्नीषोमीयस्य च पशोरा-ग्नेयस्य च हृदयशूलेन चरितं भवति यद् वशायाश्चरन्ति ॥११ ॥

॥ इति उपयाजब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रष्टमाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति तृतीयकाण्डे प्रष्टमोऽध्यायश्च समाप्तः ॥ [ ५१६ ]