Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 531–540
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 531–540
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नवमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ' पश्वेकादशिनी - ब्राह्मणम् ' [ मूल ] प्रजापतिर्वै प्रजाः ससृजानो रिरिचान - इवामन्यत । तस्मा-त्वराच्यः प्रजा श्रासुर्नास्य प्रजाः श्रियेऽन्नाद्याय तस्थिरे ॥ १ ॥
स ऐक्षतारिक्ष्यहम् । अस्मानु कामायासृक्षि न मे स कामः समाधि पराच्यो मत्प्रजा अभूवन्न मे प्रजाः श्रियेऽन्नाद्यायास्थिषतेति ॥ २ ॥
स ऐक्षत प्रजापतिः । कथं नु पुनरात्मानमाप्याययेयोप मा प्रजाः समावर्तेरंस्तिष्ठेरन्मे प्रजाः श्रियेऽन्नाद्यायेति ॥ ३ ॥
सोऽञ्छ्रायंश्चचार प्रजाकामः । स एतामेकादशिनीमपश्यत्स एकाद -शिन्येष्ट्वा प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययतोपैनं प्रजाः समावर्तन्तातिष्ठन्तास्य प्रजाः श्रियेन्नाद्याय स वसीयानेवेष्ट्वा भवत् ॥४ ॥
तस्मै कमेकादशिन्या यजेत । एवं हैव प्रजया पशुभिराप्यायतऽउपैनं प्रजाः समावर्तन्ते तिष्ठन्तेऽस्य प्रजाः श्रियेऽन्नाद्याय स वसीयानेवेष्ट्वा भवत्ये-तस्मै कमेकादशिन्या यजते || ५ || स श्राग्नेयं प्रथमं पशुमालभते । श्रग्निर्वै देवतानां मुखं प्रजनयिता स प्रजापतिः स उ s एव यजमानस्तस्मादाग्नेयो भवति ॥ ६ ॥
अथ सारस्वतम् । वाग्वै सरस्वती वाचैव तत्प्रजापतिः पुनरात्मानमा-प्याययत वागेनमुपसमावर्तत वाचमनुकामात्मनोऽकुरुत वाचो एवैष एतदाप्यायते वागेनमुपसमावर्तते वाचमनुकामात्मनः कुरुते ॥ ७ ॥
अथ सौम्यम् । अन्नं वै सोमोन्नेनैव तत्प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याय-यतान्नमेनमुपसमावर्ततान्नमनुकमात्मनोऽकुरुतान्नेनो एवैष एतदाप्यायतेऽन्नमेन-मुपसमावर्ततेऽन्नमनुकमात्मनः कुरुते || ८ || [ ५१७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० é ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण तद्यत्सारस्वतमनु भवति । वाग्वै सरस्वत्यन्नं सोमस्तस्माद्यो वाचा प्रसाभ्यन्नादो हैव भवति ॥९ ॥
अथ पौष्णम् । पशवो वै पूषा पशुभिरेव तत्प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्या-ययत पशव एनमुपसमावर्तन्त पशूननुकानात्मनोऽकुरुत पशुभिर्वेवैष एतदाप्यायते पवनमुपसमावर्तन्ते पशूननुकानात्मनः कुरुते ॥१० ॥
अथ बार्हस्पत्यम् । ब्रह्म वै बृहस्पतिर्ब्रह्मणैवैतत्प्रजापतिः पुनरात्मानमा-ध्याययत ब्रह्मैनमुपसमावर्तत ब्रह्मानुकमात्मनोऽकुरुत ब्रह्मणोऽएवैष एतदाप्यायते ब्रह्ममुपसमावर्तते ब्रह्मानुकमात्मनः कुरुते ॥ ११ ॥
तत्प ion भवति । पशवो वै पूषा ब्रह्म बृहस्पतिस्तस्माद् ब्राह्मणः पशूनभिधृष्णुतमः पुराहिता ह्यस्य भवन्ति मुखप्राहितास्तस्मादु तत्सर्वं दत्त्वा -जिनवासी चरति ॥१२ ॥
अथ वैश्वदेवं । सर्वं वै विश्वे देवाः सर्वेणैव तत्प्रजापतिः पुनरात्मान-माप्याययत सर्वमेनमुपसमावर्तत सर्वमनुकमात्मनोऽकुरुत सर्वेणोऽएवैष एतदा-प्यायते सर्वमेनमुपसमावर्तते सर्वमनुकमात्मनः कुरुते ॥१३ ॥
तद्यद्बार्हस्पत्यमनु भवति । ब्रह्म वै बृहस्पतिः सर्वमिदं विश्वे देवा अस्यै-वैतत्सर्वस्य ब्रह्म मुखं करोति तस्मादस्य सर्वस्य ब्राह्मणो मुखम् || १४ || अथैन्द्रम् । इन्द्रियं वै वीर्यमिन्द्र इन्द्रियेणैव तद्वीर्येण प्रजापतिः पुनरा-त्मानमाप्याययतेन्द्रियमेनं वीर्यमुपसमावर्ततेन्द्रियं वीर्यमनुकमात्मनोऽकुरुतेन्द्रिये -user एतद्वीर्येणाप्यायतऽइन्द्रियमेनं वीर्यमुपसमावर्ततऽइन्द्रियं वीर्यमनुकमा-त्मनः कुरुते || १५ || तद्यद्वैश्वदेवमन् भवति । क्षत्रं वाऽइन्द्रो विशो विश्वे देवा अन्नाद्यमेवास्मा एतत्पुरस्तात्करोति ॥१६ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० é ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मणे अथ मारुतम् । विशो वै मरुतो भूमो वै विड्भूम्नैव तत्प्रजापतिः पुनरा-मानमाप्याययत भूमैनमुपसमावर्तत भूमानमनुकमात्मनोऽकुरुत भूम्नोऽएवैष एत-दाप्यायते भूमैनमुपसमावर्तते भूमानमनुकमात्मनः कुरुते ॥१७ ॥
तद्यदेन्द्रमनु भवति । क्षत्रं वाऽइन्द्रो विशो विश्वे देवा विशो वै मरुतो विशैवैतत्क्षत्रं परिबृंहति तदिदं क्षत्रमुभयतो विशा परिवृढम् ॥ १८ ॥
अथैन्द्राग्नम् | तेजो वाऽग्निरिन्द्रियं वीर्यमिन्द्र उभाभ्यामेव तद्वीर्याभ्यां प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययतोभेऽएनं वीर्येऽउपसमावर्तेतामुभे वीर्येऽश्रनुके-आत्मनोऽकुरुतोभाभ्याम्बेवैष एतद्वीर्याभ्यामाप्यायतऽउभेऽएनं वीर्येऽउपसमावर्तेते-उभे वीर्येऽअनुकेऽप्रात्मनः कुरुते || १ ९ || अथ सावित्रम् । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्माऽएते सवितृ -प्रसूता एव सर्वे कामा: समृध्यन्ते ॥ २० ॥
अथ वारुणमन्तत श्रालभते । तदेनं सर्वस्माद्वरुणपाशात्सर्वस्माद्वरुण्या-प्रमुञ्चति ॥२१ ॥
तस्माद्यदि यूपैकादशिनी स्यात् । आग्नेयमेवाग्निष्ठे नियुञ्ज्यादथेतरा-व्युपनयेयुर्यथापूर्वम् ॥ २२ ॥
पूर्वम् || २३ || पश्वेकादशिनी स्यात् । आग्नेयमेव यूप श्रालभेरन्नथेत रान्यथा-तान्यत्रदीचो नयन्ति । आग्नेयमेव प्रथमं नयन्त्यथेतरान्यथापूर्वम् || २४ || तान्यत्र निविध्यन्ति । आग्नेयमेव प्रथमं दक्षिणाध्यं निविध्यन्त्यथेतरा-नदीचोऽतिनीय यथापूर्वम् || २५ || तेषां यत्र वपाभिः प्रचरन्ति । श्राग्नेयस्यैव प्रथमस्य वपया प्रचरन्त्यथेत-रेषां यथापूर्वम् ॥२६ ॥
तैर्यत्र प्रचरन्ति । प्राग्नेयेनैव प्रथमेन प्रचरन्त्यथेतरैर्यथापूर्वम् ॥ २७ ॥
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तृतीय काण्ड ( अ ० हं ) शेर्तपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मणं [ अनुवाद ] प्राकृतिक यज्ञ के अनुकरण पर ही इस वैध यज्ञ में पश्वेकादशिनी की जाती है । प्रजा के भिन्न - भिन्न रूप होने से उनके प्रजापति भी नाना हैं- जैसे- परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र | पृथिवी - प्रजा का स्वामी स्वयंभू आत्मा प्रजापति है, पार्थिव प्रजा का प्रजापति सूर्य, आप्य - प्रजा का प्रजापति परमेष्ठी, गन्धर्व - प्रजा का प्रजापति चन्द्रमा, मनुष्यादि प्रजा का प्रजापति पार्थिव वैश्वानर अग्नि, घटपटादि प्रजा का प्रजापति कुम्भकार - इस प्रकार अनन्त प्रजापति हैं । अपरिच्छिन्न परात्पर ही माया बल के द्वारा परिच्छिन्न हो कर अव्यय पुरुष बनता है । वही आदि प्रजापति कहलाता है । यह अव्यय - पुरुष अपनी परा व अपरा प्रकृति से युक्त हो कर अव्यय, अक्षर, क्षर भेद से त्रिधातुक बन जाता है । इसीलिए भगवद्गीता कहा है-" मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् । हेतुना तेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते " " इति । इनमें अव्यय, सृष्टि का आलम्बन - कारण है, अक्षर, निमित्त - कारण है जिसे परा-प्रकृति कहा गया है और अपरा प्रकृतिरूप क्षर, उपादान कारण है । त्रिधातुक इस श्रव्यय-पुरुष की अव्यय, अक्षर व क्षर रूप प्रत्येक धातु पञ्चकल है । अतः वह पञ्चदश बन जाता है और मूलभूत परात्पर को मिला कर षोडश कल बन जाता है । इसे ही षोडशी भी कहा जाता है । षोडश - कलात्मक इस अव्यय - पुरुष से ही सकल विश्व उत्पन्न होता है, इसी में प्रतिष्ठित रहता है तथा अन्त में इसी में विलीन हो जाता है । अव्यय - पुरुष की पाँच कलाओं में मन के मध्य स्थित होने से श्रानन्द, विज्ञान, मन युक्त अव्यय मुक्तिसाक्षिक कहलाता है । तथा मन, प्रारण व वाक् युक्त सृष्टिसाक्षिक अव्यय है । इसीलिए उपनिषद् में ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ' ऐसा कहा गया है । प्रकृत में सृष्टि का सम्बन्ध होने से मन, प्राण, वाक् इन तीनों कलाओं का निरूपण अभीष्ट है । मन का कार्य इच्छा, प्राण का कार्य-तप तथा वाक् का कार्य श्रम है । इच्छा, तप, श्रम से ही नवीन वस्तु उत्पन्न होती है । मन, प्रारण, वाक् में वाग्भाग ही सृष्टि का उपादान कारण है, जो वस्तुरूप में परिणत होने कारण खर्च होता रहता है । यह वाक् प्रमृत मर्त्य भेद से दो प्रकार की है । अमृता वाक् अमृताकाश है, यही इन्द्र है तथा मर्त्या वाक् मर्त्याकाश रूप है, जिसे इन्द्र - पत्नी कहते हैं । अमृता वाग्रूप इन्द्र से देवता उत्पन्न होते हैं तथा मर्त्याकाशरूप मर्त्या - वाक् से भूत उत्पन्न होते हैं । यह मर्त्या वाक् आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी रूप पाँचों भूतों की जननी है । इसी अभिप्राय से ' वागेवेदं सर्वम् ', ' वाची मा विश्वा भुवनान्यपिता ' इत्यादि वचन कहे गये हैं । तात्पर्य्य यह है कि सारी सृष्टि प्रजापति के वाग् - भाग से होती है । प्रजापति सृष्टि - निर्माण के लिए वाग्भाग के विसर्ग के साथ ही रिक्तता की पूर्ति हेतु प्रदान ( ग्रहण ) भी करते रहते हैं । प्रजापति जिन वस्तुनों का ग्रहण करता है वे प्रजापति का भोग्य होने से पशु कहलाती हैं । भोग्य को ही वेद में पशु कहा गया है । आधिदैविक सृष्टि में पशु शब्द [ ५२० ]
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण पशुप्राण अभिप्रेत है । पुरुष भी किसी दूसरे का भोग्य होने से पशु कहलाता है । इसीलिए पञ्च पशुओं की गणना में ' पुरुषाश्वगवाव्यजाः पशव: ' इस रूप से पुरुष को भी पशु बतलाया गया है । आधिदैविक यज्ञ में ११ पशुप्राण प्रजापति से उत्पन्न होते हैं किन्तु वह इनको ग्रहण भी करता रहता है, जैसे सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा पार्थिव पदार्थों के रस को ग्रहण भी करता रहता है । यही प्रदान - विसर्गात्मक यज्ञ है । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - प्रजापति अपने वाग्भाग द्वारा सृष्टि को उत्पन्न करता हुआ निरन्तर वाग्भाग के सृष्टि में खर्च होने के कारण अपने को रिक्त मानने लगा । क्यों कि उसने जिन प्रजानों को उत्पन्न किया वे पराङ्मुख हो गईं ॥१ ॥
प्रजापति ने विचार किया कि मैंने सौभाग्यवृद्धि तथा अन्न के लिए भोग्य बनने की जिस कामना पूर्ति के लिए प्रजानों को पैदा किया था वह कामना इन प्रजाओं के पराङ्मुख हो जाने से पूरी नहीं हुई ॥ २ ॥
प्रजापति ने सोचा कि ऐसा कौन सा उपाय है जिससे अपना रिक्त भाग पुनः आप्या-यित हो जाय तथा पराङ्मुख प्रजाएँ वापस आ जाएँ और अन्नादध तथा सौभाग्य के लिए में प्रतिष्ठित हो जाएँ ॥ ३ ॥
पराङ्मुख प्रजा को श्री और अन्नाद्य हेतु पुनः अपने अनुगत करने के लिए तदनुकूल उपाय तलाश करते हुए प्रजापति तप और श्रम करने लगे । तब प्रजापति ने इस पश्वेकाद-शिनी याग को देखा और उसके द्वारा अपने रिक्त स्थान को पुनः आप्यायित कर लिया । प्रजापति की पराङ्मुख प्रजा इस याग से पुनः उसके पास लौट आई और रिक्त प्रजापति इस पश्वेकादशिनीयाग से वसुमत्तर हो गये ॥ ४ ॥
प्रजापति की ही भाँति मनुष्य यजमान भी पश्वेकादशिनीयाग कर प्रजा और पशुओं से प्राप्यायित हो जाता है एवं यजमान से पराङ्मुख यजमान प्रजा पुनः सौभाग्य एवं अन्नाद्य के लिए उसके अनुगत हो जाती है । इस प्रकार यह याग कर वह भी वसुमत्तर ( अधिक धनवान् ) बन जाता है ॥ ५ ॥
पश्वेकादशिनी में ११ पशु होते हैं, जिनके नाम आग्नेय, सारस्वत, सौम्य, पौष्ण, बार्हस्पत्य, वैश्वदेव, ऐन्द्र, मारुत, सावित्र व वारुण हैं । इन पशुओं के देवता आधिदैविक-मण्डल में क्रमशः अग्नि, वाक्, सोम, पूषा, बृहस्पति, विश्वेदेव, इन्द्र, मरुत्, सविता व वरुण हैं । देवताभेद के कारण ११ पशुओं का स्वरूप भिन्न - भिन्न है । अतः यज्ञकर्ता यजमान तत्त-त्देवताओं अर्थात् प्राणों से निर्मित तत्तत्पशु को ही यज्ञ में ग्रहण करे । इन ११ पशुओं में शमिता पहले आग्नेय पशु का ही प्रलम्भन करता है, क्यों कि ग्रग्नि ही देवताओं का मुख प्रजनयिता है । सभी देवता श्राग्नेय हैं । एक ही अग्निप्राण पृथिवी के केन्द्र से निकल कर २१ वें अहर्गण पर विद्यमान सूर्य से भी ऊपर जाता है । पृथिवी से सूर्य तक व्याप्त यह [ ५२१ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) - शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण अग्निप्राण घन - तरल - विरल भेद से श्रग्नि वायु ( रुद्र ) व प्रादित्य - इन तीन रूपों में परिणत हो जाता है । इनमें घनाग्नि के ८ भेद ८ वसु हैं । तरलाग्नि के ११ भेद एकादश रुद्र कह-लाते हैं और विरलाग्नि के १२ भेद ही १२ आदित्य कहलाते हैं । दो सान्ध्य प्रारण दस्र व नासत्य नामक दो अश्विनीप्रारण हैं । अथवा प्रारंभ में पृथिवी व अन्त में द्युलोक होने से द्यावापृथिवी रूप दो प्रारण हैं । इस प्रकार १ ही अग्नि ३३ देवताओं में परिणत हो जाता है | अतः ३३ देवतानों का प्रजनयिता अग्नि है, जो सभी देवताओं के लिए अग्नि में ही आहुति देने के कारण भी सभी देवताओं का मुख है । इसीलिए ' अग्निमुखा वै देवाः ' यह कहा जाता है । प्रजनयिता होने से अग्नि देवताओं का प्रजापति भी है । अग्नि ही यजमान भी है, क्यों कि यज्ञनिष्पादन करने वाला ही यजमान होता है । अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ है । अग्नि व सोम में भी अग्नि ही यज्ञ का निष्पादक है तथा अग्नि में आहुति होने पर अग्नि ही शेष रहता है, अतः अग्नि ही यजमान है । इसीलिए सबसे पहले आग्नेय पशु का आलम्भन किया जाता है ॥ ६ ॥
आग्नेय पशु के प्रलम्भन के बाद सारस्वत पशु का आलम्भन किया जाता है । वाग् ही सरस्वती है । वाक् सत्या, सरस्वती, बृहस्पति, अनुष्टुप् भेद से चार प्रकार की है । उसमें परमेष्ठी की वाक् सरस्वत् समुद्र से उत्पन्न होने के कारण सरस्वती वाक् कहलाती है । यज्ञ का प्रारम्भ परमेष्ठिमण्डल से होता है । अतः इस सरस्वती के परमेष्ठी की वाक् होने से सरस्वतीदेवताक पशु का श्रालम्भन किया जाता है । यदि शब्दवाक् न होती तो यजमान अपनी कामना को प्रकट नहीं कर सकता, तथा अर्थवाक् न होती तथा हस्तपादादि की क्रिया न होती । अतः गई हुई वाक् की पुनः प्राप्ति तथा आत्मा के आप्यायन के लिए यजमान सारस्वत पशु का आलम्भन करता है ॥ ७ । । सारस्वत पशु के आलम्भन के बाद सौम्य पशु का श्रालम्भन करते हैं । पारमेष्ठ्य मण्डलस्थ सोम, वृष्टि बनता है और वृष्टि ही अन्न बनती है । अत: अन्न ही सोम है । इस सौम्यप्राण से बनने वाला पशु सौम्य कहलाता है । सौम्य पशु की आहुति देता हुआ यजमान अपने को आप्यायित करता है, जिससे अन्न उसके पास लौट आता है और उसके अनुकूल व अनुगत हो जाता है || ८ || सारस्वत पशु के बाद सौम्य पशु का आलम्भन किया जाता है, क्योंकि वाक् सर -स्वती है तथा अन्न सोम है । स्वयंभू - मण्डल के ' वेदा:, सत्यम्, नियतिः ' ये तीन मनोता हैं । उनमें वेदपद से ऋक् - साम - यजु इस वेदत्रयी का ग्रहण है । यजु में ' यत् ' और ' जू ' ये दो भाग हैं । इनमें ' एतीतियत् ' इस व्युत्पत्ति से यत् गतिशील तत्त्व का नाम है तथा जू शब्द ' जूरा-काशे सरस्वत्यां भवने स्त्रियाम् ' इस कोश के अनुसार आकाश का बोधक स्थिर तत्त्व है । यजु अधिदैवत में वायु व आकाश हैं और अध्यात्म में प्रारण व वाक् है । स्वयंभू प्रजापति ने ऋग्यजुः सामरूप त्रयीविद्या पर प्रतिष्ठित हो कर तप किया और यजु के जूरूप वाग्भाग से [ ५२२ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० é ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण अप्तत्व ( जल ) को उत्पन्न किया । यही पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व है ( द्रष्टव्य - शत ० ब्रा ० १०।३।५।११ ) । अप्तत्व से ही वृष्टि द्वारा अन्न उत्पन्न होता है । प्रथमा वाग् ( सरस्वती ) है बाद में अन्न है । इसलिए पहले सारस्वत पशु का श्रालम्भन होता है और बाद में सौम्य पशु का । क्योंकि सरस्वती वाक् है और अन्न सोम है । अतः जो अधिक बोलने वाला
होता है वह अन्नाद होता है । वह अन्न- सम्पत्ति को प्राप्त करता है ॥ ॥
तदनन्तर पौष्ण पशु का आलम्भन करता है । पूषा देवता से ही पशुप्रारण बनता है अतः पशु को पूषा कहा है । सृष्टि निर्माण के समय प्रजापति से अलग हुए पशुओं का आल-भन कर प्रजापति प्राहुति द्वारा पुनः इस पशु- सम्पत्ति से अपने आत्मा को श्राप्यायित कर लेता है । पशु उसके पास आ जाते हैं और उसके अनुकूल व अनुगत हो जाते हैं ॥ १० ॥
इसके बाद बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन किया जाता है । ब्रह्म ( ज्ञान ) ही बृहस्पति है | ज्ञानघन बृहस्पति सूर्य ( इन्द्र ) से भी ऊपर है । बृहस्पति स्वयंभू व परमेष्ठी के अन्त में है । प्रजापति ने इस ज्ञानरूप बृहस्पति से निर्मित बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन कर उसकी हुति दे सृष्टिनिर्माण में खर्च हुई ज्ञानमात्रा को आप्यायित कर अपने से पृथक् हुई ज्ञानमात्रा को पुनः प्राप्त किया व अपने अनुगत बनाया । उसी प्रकार यह यजमान प्रजापति बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन कर अपने से पराङ्मुख ज्ञान को पुनः प्राप्त करता है । उससे अपने को आप्यायित कर उसे आत्मा के अनुकूल व अनुगत बना लेता है ॥। ११ ॥ पौष्ण पशु के प्रलम्भन के बाद बार्हस्पत्य पशु के आलम्भन का कारण यह है कि पशु पूषा है और ब्रह्मबल श्रेष्ठ है । यही कारण है कि ब्रह्मबल - प्रधान ब्राह्मण, शरीरबल - प्रधान शूद्र, अर्थबल - प्रधान वैश्य तथा कर्मबल - प्रधान क्षत्रिय पर भी शासन करता है । क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी ब्राह्मण के लिए भोग्य हैं । भोग्य सदा भोक्ता के समक्ष पहले से उपस्थित रहते हैं । ब्राह्मण द्वारा प्रदत्त सम्पति का वे भोग करते हैं और ब्राह्मण अपनी ही सम्पत्ति का भोग करता है । ब्राह्मण के प्रति भी तीनों ही वर्ण भोग्य पशु हैं, ब्राह्मण भोक्ता है । अत: बार्ह -स्पत्य पशु के आलम्भन से पौष्ण पशु का आलम्भन किया जाता है ॥१२ ॥
बार्हस्पत्य पशु के प्रलम्भनानन्तर वैश्वदेव पशु का आलम्भन करते हैं । अग्नि, वायु, आदित्य आदि यावन्मात्र देवताओं का जो समुदाय है उसे ' विश्वेदेव ' कहते हैं - ' सर्वं वा विश्वे देवा: ' इति । प्रजापति ने सर्वस्वरूप वैश्वदेव पशु का आलम्भन कर सारी सम्पत्ति से अपने आमाको प्यायित किया तथा उन सर्वस्वरूप देवताओं को आत्मानुकूल या प्रात्मानुगत कर लिया । उसी प्रकार इस वैध यज्ञ में यह यजमान प्रजापति वैश्वदेव पशु का आलम्भन कर, उसकी आहुति देकर अपने को सर्वदेवसम्पत्ति से प्राप्यायित करता है तथा सर्वदेवसम्पत्ति को आत्मानुगत कर लेता है ॥१३ ॥
वैश्वदेव पशु का आलम्भन बार्हस्पत्य पशु के आलम्भन के बाद क्यों किया जाता है इसका कारण बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ब्रह्म ही बृहस्पति है तथा संसार [ ५२३ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण के सारे पदार्थ विश्वेदेवरूप हैं । ब्रह्म सर्वजगत्कारण होने से मुखस्थानीय पूर्वभावी है तथा विश्वेदेव विश्वरूप होने से पश्चाद्भावी है । कारण प्रथम तथा कार्य पश्चात् होता है अतः वैश्वदेव पशु के आलम्भन से पूर्व बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन किया जाता है ॥ १४ ॥
वैश्वदेव पशु के आलम्भन के बाद ऐन्द्र पशु का आलम्भन किया जाता है । इन्द्रियों का वीर्य ( शक्ति ) ही इन्द्र है । इन्द्र से स्पष्ट होने के कारण ही इन्हें इन्द्रियाँ कहा जाता है । ऐन्द्र पशु का प्रलम्भन कर जैसे प्रजापति ने इन्द्रिय वीर्य से अपने को पुनः प्राप्यायित किया उसी प्रकार आज यह यजमान प्रजापति ऐन्द्र पशु का आलम्भन कर इस इन्द्रिय - वीर्य से अपने को आप्यायित कर उसे आत्मानुकूल कर लेता है ॥ १५ ॥
पशु का आलम्भन वैश्वदेव पंशु के बाद किये जाने का कारण बतला रहे हैं कि बल, क्षत्र में होता है और इन्द्र, क्षत्र है । इसीलिए ' याचका च बलकृतिरिन्द्रकर्मैवतत् ' ऐसा निरुक्तकार यास्क ने कहा है । विश्वेदेव अर्थात् सारे देवता इस इन्द्र की प्रजा हैं अतः भोग्य हैं । भोक्ता इन्द्र राजा से पूर्व भोग्य प्रजारूप विश्वेदेव की आवश्यकता है । अतः प्रथम प्रजा-रूप वैश्वदेव पशु का आलम्भन और तदनन्तर भोक्तारूप ऐन्द्ररूप पशु का आलम्भन किया जाता है ॥ १६ ॥
इसके पश्चात् मारु ( मरूदेवताक़ ) पशु का आलम्भन किया जाता है । मरुत् विट् अर्थात् देवताओं की प्रजा हैं । शासक एक होता है और प्रजा अनेक होती है । मारुत पशु का लम्भन कर प्रजापति ने जैसे सृष्टि निर्माण में काम आई अपनी प्रजा से अपने को आप्या-यित किया उसी प्रकार आज यह यजमान पजापति मारुत पशु का वैध यज्ञ में आलम्भन करता हुआ अपने को बहुल प्रजा से आप्यायित कर उसे आत्मानुकूल बना लेता है ॥१७ ॥
मारुत पशु का प्रलम्भन ऐन्द्र पशु के बाद में किये जाने का कारण यह है कि इन्द्र क्षत्र है, राजा है; तथा विश्वेदेव व मरुत् उसकी प्रजा हैं । ऐन्द्र पशु के प्रलम्भन से पूर्व वैश्वदेव पशु का तथा ऐन्द्र पशु के बाद मारुत पशु का प्रलम्भन करना क्षत्र इन्द्र को दोनों ओर से आदि और अन्त से परिदृढ कर लेना है ॥ १८ ॥
पारु पशु के आलम्भन के बाद ऐन्द्राग्न पशु का आलम्भन किया जाता है । शान्त-तेज अग्नि है, उग्रतेज इन्द्र है । अग्नि ब्रह्म है, ब्राह्मण है । उसमें गूढ अर्थात् विकासोन्मुख तेज होता है । इसीलिए महाकवि कालिदास ने कहा है-' शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः ' इति । वह प्रात: कालिक सौर तेज के समान शान्त व विकासोन्मुख होता है । क्षत्र का वीर्य तेज मध्याह्नकालिक सूर्य के समान प्रखर व उग्र होता है । ऐन्द्राग्न पशु का प्रलम्भन कर प्रजापति ने जैसे अपने को शान्त व उग्र दोनों प्रकार के तेजों तथा वीर्यों से प्राप्यायित कर [ ५२४ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण उन दोनों वीर्यों को आत्मानुगत बना लिया, उसी प्रकार आज यजमान प्रजापति ऐन्द्राग्न पशु का आलम्भन करता हुआ दोनों प्रकार के वीर्यों से अपने को आप्यायित कर उन्हें आत्मसात् कर लेता है ॥ १६ ॥
ऐन्द्राग्न पशु के प्रालम्भन के बाद सावित्र पशु का आलम्भन किया जाता है । सविता देवताओं के प्रसविता ( प्रेरक ) हैं । सविता के प्रसव ( अनुज्ञा या प्रेरणा ) के बिना उपर्युक्त चीजें आत्मसात् नहीं की जा सकतीं । सविता का प्रसव प्राप्त करके ही सारे काम समृद्ध होते. । अतः सविता के प्रसव के लिए ही सावित्र पशु का आलम्भन किया जाता है ॥ २० ॥
सर्वान्त में वारुण पशु का आलम्भन किया जाता है । इस पशु का आलम्भन कर आहुति देने से वरुण कृत सारे बन्धनों से तथा सब प्रकार के वारुण्य अपराधों से यजमान मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
इस प्रकार इस अग्निष्टोमयाग में ११ पशुओं का आलम्भन किया जाता है । यदि पैकादशिनी पक्ष हो अर्थात् प्रत्येक पशु के लिए एक - एक यूप के हिसाब ११ यूप खड़े किये जाएँ तो पहले खड़ा किया जाने वाला जो सबसे मध्य का अग्निष्ठा यूप है उसमें श्राग्नेय पशु को बांधे । बाकी बचे हुए दस पशुओं को, जिस क्रम से यूप खड़े किये गये हैं, उसी क्रम से बाँधे ॥२२ ॥
पैशन में प्रत्येक पशु के लिए पृथक् - पृथक् यूप होने चाहिए । यह पक्ष हो तो ११ पशुओं के लिए ११ यूप होंगे । ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम आग्नेय पशु का आलम्भन करना चाहिए । शेष का जिस क्रम से गाड़े गये हैं उस क्रम से प्रालम्भन करे ॥ २३ ॥
इन पशु को प्रलम्भन के लिए उत्तर में शामित्रशाला में ले जाया जाता है । इस शामित्रशाला में भी प्रथम प्राग्नेय पशु को ही ले जाते हैं । शेष को यूप गाड़ने के क्रम के अनुसार ले जाना चाहिए ॥ २४ ॥
जहाँ उन पशुओं का आलम्भन करते हैं वहाँ ग्राग्नेयपशु को प्रथम आलम्भन करने में भी उसके दक्षिण भाग को ही पहले काटना चाहिए, क्यों कि दक्षिण भाग आग्नेय होता है । बाद में अन्य पशुओं को उत्तर की ओर यथापूर्व शामित्रशाला में ले जा कर उनका आलम्भन करते हैं ॥ २५ ॥
इन पशुओं की वपा की आहुति देते समय पहले आग्नेय पशु की वपा की आहुति देनी चाहिए | पश्चात् अन्य पशुओं की वपा की आहुति पूर्वोक्त क्रम के अनुसार अर्थात् जिस क्रम से शामित्रशाला में ले जाये गये हैं, उसी क्रम से देनी चाहिए ॥२६ ॥
पश्चात् पशुओं के अन्य अङ्गों की आहुति के समय भी पहले श्राग्नेय पशु के अवयवों की पूर्वोक्त क्रम से आहुति दी जानी चाहिए, क्यों कि आग्नेय पशु ही यज्ञ में मुख्य है || २७ || [ ५२५ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण [ विज्ञानभाष्य ] प्राकृतिक श्रग्निष्टोम यज्ञ ( श्राधिदैविकमण्डल ) में ग्यारह ( ११ ) पशु-प्रारण मौजूद हैं । उसी एकादश ग्यारह ( ११ ) पशुप्राण युक्त दिव्यात्मा को वैध अग्निष्टोम द्वारा उत्पन्न किया जाता है । अतएव जैसी स्थिति आधिदैविक यज्ञ की होती है ठीक वैसी ही स्थिति को इस मनुष्य यज्ञ में उत्पन्न करना पड़ता है । मनुष्य यज्ञ में भी सोमाहुति से उत्पन्न होने वाले नए यज्ञात्मा में प्रकृतिवत् ग्यारह ( ११ ) पशुओं का आधान करने के लिए ग्यारह ( ११ ) पशुओं का आलम्भन कर उनकी आहुति देनी पड़ती है । आहुति द्वारा उन ग्यारह ( ११ ) पशुओं के प्राणों को उत्पन्न दिव्यात्मा के अनुगत कर दिव्यात्मा को " सर्वावयव " युक्त बना दिया जाता है । प्रकृति - यज्ञ में भिन्न - भिन्न देवताओं के ग्यारह ( ११ ) पशु- प्रारण हैं, जैसा कि हम अनुवाद में ही बतलाने वाले हैं । उन ग्यारह ( ११ ) पशु - प्राणों का स्वरूप भिन्न भिन्न है । प्रतएव उनसे उत्पन्न होने वाले पार्थिव पशु भी भिन्न - भिन्न स्वरूप के ही होते है । उन ग्यारहों ( ११ हों ) की अलग- अलग पहचान है । किसी की पीठ सफेद होती है, किसी की पीठ काली और सफेद होती है । किसी का मस्तक सफेद और पीठ काली होती है । किसी केसिर पर छींटे होते हैं, किसी के कान लम्बे होते हैं, किसी की पूँछ लम्बी होती है और किसी के सींग लम्बे होते हैं । यह वैजात्य उन्हीं आधिदैविकमण्डल पशु - प्राणों पर निर्भर है । उन प्राणों में परस्पर वैजात्य है । अतएव विजातीय भिन्न स्वरूप वाले प्राण - पशुत्रों से उत्पन्न होने वाले पार्थिव पशुओं में भी वैजात्य हो जाता है श्रग्निषोम यज्ञ में इन भिन्न - भिन्न देवताक अतएव भिन्न - भिन्न स्वरूप वाले ही ग्यारह ( ११ ) पशु लाए जाते हैं, एक ही तरह के ग्यारह ( ११ ) पशु ( बकरे ) के तरह के पशु लाए जाते हैं तभी यज्ञ सुसंपन्न नहीं लाए जाते, अपितु प्राण पशु के अनुसार ग्यारह ( ११ ) होता है । यज्ञ का संचालन करने वाले भगवान् आदि प्रजापति अपने यज्ञ में ' पश्चेकादशिनी ' किया किया करते का प्रलम्भन कर उन्हें अपने में ग्राहुत करते हैं । वे अपने यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) पशुओं हैं । चूंकि प्रजापति भगवान् आधिदैविक यज्ञ में एकादश पशु समन्वय किया करते हैं- एवं प्रजापति के यज्ञ के अनुसार ही यह वैध यज्ञ किया जाता है, अतएव प्रजापति यज्ञवत् इस वैध - यज्ञ में भी अवश्य ही ' पश्चेकादशिनी ' होनी चाहिए । बस अग्निष्टोम यज्ञ में पश्चेकादशिनी क्यों करनी चाहिए? क्यों ग्यारह ( ११ ) पशुओं का प्रलम्भन करना चाहिए? - इसकी यही उपपत्ति है । " यद्वै देवा श्रकुर्वंस्तत्-करवाणि " इस प्रश्न का यही उत्तर है । अब यहाँ पर एक प्रश्न और बाकी बच जाता है । वह यही है कि उस ईश्वर प्रजापति को ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी, जिससे कि उसे अपने प्राधिदैविक यज्ञ में पश्चेकादशिनी ( एकादश पशु- समन्वय ) करनी पड़ी । बस इस ब्राह्मण में इसी प्रश्न का उत्तर दिया जाएगा । वेद में प्रजापति शब्द सहस्रों बार श्राता है । पद - पद पर प्रजापति शब्द का उल्लेख रहता है । यह प्रजापति क्या है? प्रजापति किसे कहते हैं? - इसका विवेचन हम पूर्व में कर आए हैं । अतएव यहाँ हम उसके विषय में अधिक कुछ नहीं कहेंगे । " प्रजापति " शब्द का सीधा अर्थ " प्रजा का पति स्वामी ' यही मालूम होता है । इस परिभाषा के अनुसार संसार के प्राणिमात्र प्राणिमात्र ही नहीं-अपितु जड़ - चेतन सारा प्रपञ्च - अपने को " प्रजापति " कह सकता है । सूर्यचन्द्र परमेष्ठी पृथिवी आदि प्रजा उस स्वयम्भू प्रात्मा की प्रजा है । इन सब प्रजानों का वह स्वयम्भू - ईश्वर पति है - प्रतएव हम [ ५२६ ]