Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 541–550

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण [ ५२७ ] पश्वेकादशिनी ब्राह्मण ( ऋग्वेद मं ० १०।१२१।१० ) ( यजुर्वेद ८३६ ) उसे भी प्रजापति कह सकते हैं । पार्थिव प्रजा का अधिष्ठाता सूर्य है, अतएव सूर्य को भी प्रजापति अतएव हम उन्हें भी प्रजापति कह सकते हैं । उन्हें भी प्रजापति कह सकते हैं । मनुष्यादि कह सकते हैं । आप्य प्रजा के अधिष्ठाता परमेष्ठी हैं, गन्धर्वप्राण प्रजा के अधिष्ठाता चन्द्रमा हैं, अतएव हम प्रजा का अधिष्ठाता पार्थिव वैश्वानराग्नि है, अतः उसे भी प्रजापति कह सकते हैं । शरीरस्थ भ्रूण एवं पुत्रादि के अधिष्ठाता होने के कारण हम भी प्रजापति कहला सकते हैं । छोटी - छोटी अपत्यकाओं के धिष्ठाता होने के कारण शैलाधिराज हिमालय भी प्रजापति कहला सकता है । घटपटादि सृष्टि के निर्मातृत्वेन एवं अधिष्ठातृत्वेन घट - निर्माता कुम्हार भी प्रजापति कहला सकता है | शरीरस्थ सूक्ष्म-कीटादि प्रजा पर आधिपत्य करने के कारण एक चींटी भी प्रजापति कहला सकती | अधिक क्या कहें? हम तो ज्यों - ज्यों प्रन्तस्थल में प्रविष्ट होते जाते हैं, त्यों - त्यों सिवाय प्रजापति के और कोई दूसरी वस्तु पाते ही नहीं । एक तिल भी प्रजापति है तो एक चींटी भी प्रजापति है । एक पर्वत प्रजा-पति है तो एक मायावच्छिन्न विश्वेश्वर भी प्रजापति है । जो कुछ " है " " कह कर व्यवहृत करने लायक है - सब प्रजापति हैं । जो सबसे बड़ा प्रजापति है - वह प्रजापति ही है- जो अणोरणीयान् प्रत्यनपिनद्ध प्रजापति है - वह भी प्रजापति ही है । इन दोनों के बीच में श्रस्मदादि जितने जीव हैं - सब प्रजा हैं - सब प्रजापति हैं । पार्थिव वैश्वानराग्नि की हम प्रजा हैं परन्तु शरीरस्थ कीटों के प्रजापति हैं । पृथिवी सूर्य्य की प्रजा है, तथा सूर्य्यं पृथिवी प्रजा का पति है परन्तु परमेष्ठी की प्रजा है । केवल - परमं सामान्य और परमविशेष दो तत्त्व ही ऐसे हैं जो प्रजापति नहीं हैं । इन दोनों के बीच में जितना भी प्रपञ्च है - पेक्षा तारतम्य से सब प्रजा है - सब प्रजापति है । जो प्रजा है वह भी एक तरह से देखा जाए तो प्रजापति है । प्रजापति के अलावा प्रजा आएगी कहाँ से? अतएव हम कह सकते हैं कि प्रजापति के अलावा न कोई है, न होगा, न हुआ । सब कुछ प्रजापति ही है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर वेद भगवान्

कहते हैं ---प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।

यत्कामास्ते जुहुस्तन्नो प्रस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥

" प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी " । श्रुति से मालूम होता है कि उस व्यापक प्रजापति का नाम " षोडशी " प्रजापति है । षोडशी से त्रिधातुक अव्यय पुरुष ही प्रभिप्रेत है । अव्यय अक्षर - क्षर इन तीन धातुयों का नाम ही अव्यय पुरुष है । अक्षर और क्षर - अव्यय पुरुष की परा अपरा प्रकृतियाँ हैं । ये दोनों पुरुषाविनाभूत हैं । अत-एव समष्टि के लिए " अव्यय पुरुष " शब्द प्रयुक्त होता है । पञ्चकल अव्यय- पञ्चकल अक्षर - पञ्चकल-क्षर एवं सोलहवाँ ( १६ ) परात्पर ( अखण्डात्मा ) है | इन सोलह ( १६ ) कलात्रों के कारण यह त्रैधातु-काव्यय पुरुष षोडशी पुरुष कहलाता है । यही हमारा ' प्रजापति ' है । इस षोडशी पुरुष के प्रात्मक्षर भाग से ही सारा विश्व ( प्रजा ) बना है, प्रतएव हम कह सकते हैं कि विश्व भी प्रजापति । पिता

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण ही तो पुत्र बनता है । आत्मा ही तो विश्व बनता है । ऐसी अवस्था आएगी कहाँ से? इसीलिए श्रुतियों में बराबर " श्रात्मैवेदं सर्वम " " पश्वेकादशिनी ब्राह्मण में श्रात्मा के अलावा दूसरी वस्तु " ब्रह्म वेदं सर्वम् " २ " सर्वं खल्विदं ब्रह्म 3 यह लिखा रहता । यह आत्मा षोडशकल है, अतएव " षोडशकलं वा इदं सर्वम् " ४ यह कहा जाता है । एक ही आत्मा नाना भाव - स्वरूप में विश्व में परिणत हो जाता है, अतएव " एकं वा इदं विबभूव सर्वम् " यह कहा जाता है । यह षोडशी आत्मा पुरुष कहलाता है । यही सब कुछ बना हुआ है । विश्व यज्ञरूप है । यज्ञ विश्वयज्ञात्मक पुरुषाविनाभूत है । अतएव --" पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम् " । ऋग्वेद मं ० ( १०।१०।२ ) यह कहा जाता है । यह एक ही षोडशी प्रजापति सब का आत्मा है । वही ईश्वर शरीर में प्रविष्ट रह कर महीयान् कहलाने लगता है । जीव - शरीर में प्रविष्ट रहने के कारण अरणीयान् कहलाने लगता है । कहने को अनन्त प्रजापति हैं, वास्तव में एक ही प्रजापति है । सूर्य और सूर्य्यं प्रतिबिम्बवत् वही अणोरणीयान् है, वही महतो महीयान् है । इसी अभिप्राय से वेद भगवान् कहते हैं-" अणोरणीयान् महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमतं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् || " ( महानारा ० उप ० ८३, तै ० प्रा ० १०।१०।१ ) अव्यय - पञ्चकल अक्षर - पञ्चकलक्षर एवं वही प्रजापति, प्रभव है - वही अब तक के सारे प्रपश्व से यही सिद्ध हुआ कि पञ्चकल परात्पर स्वरूप जो षोडशी पुरुष है, वही प्रजापति कहलाता है । विश्व की प्रतिष्ठा है - वही परायण है । पानी से उत्पन्न होने वाले भाग जैसे पर ही प्रतिष्ठित रह कर कालान्तर में पानी में ही विलीन हो जाते हैं - तथैव पानी पर उत्पन्न हो - पानी आत्मा से उत्पन्न विश्व आत्मा पर ही प्रतिष्ठित रहता है, अन्त में आत्मा में ही विलीन हो जाता है । इस षोडशी प्रजापति में जो प्रपञ्चक अव्यय है, वह तो सृष्टि का आलम्बन है, एवं पञ्चकल अक्षर निमित्त कारण है - पञ्च-कलक्षर उपादान कारण है । श्रव्यय जमीन है - प्रक्षर कुम्हार है- क्षर मिट्टी है । अव्यय - रूप पृथि-व्यालम्बन पर बैठ कर अक्षर रूप कुम्हार क्षर रूप मृत्तिका से विश्व - रूप घटपटादि का निर्माण किया करता है । अव्यय केवल सृष्टि - साक्षी मात्र है, सृष्टि उसके बिना हो नहीं सकती परन्तु यह सृष्टि से असङ्ग है । " न करोति न लिप्यते " यही अव्यय का स्वभाव है । सारी सृष्टियाँ अक्षर से ही होती हैं एवं अक्षर में ही विलीन हो जाती हैं । श्रतएव श्रुति कहती है-" यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति " - इति । ( मुण्डक उप ० २1१1१ ) १ ' छा ० उप ० ७।२५।२ ' । २ ' नृसिंह ० उप ० उत्तर ७ ' । ३ ( छा ० उप ० ६।१४ ' । ४ ' शत ० ब्रा ० १३।२।२।१३ ) ' । [ ५२८ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण हमने बतलाया है कि सृष्टि से असङ्ग रहता हुआ भी अव्यय सृष्टि - साक्षी अवश्य है । सृष्टि साक्षी ही नहीं अपितु मुक्ति - साक्षी भी अव्यय है । इस अव्यय की आनन्द - विज्ञान- मन - प्रारण वाक् - ये पाँच कलाएँ हैं । पाँचों में से आनन्द विज्ञान स्वरूप अव्यय मुक्ति साक्षी है । विज्ञान से आनन्द आता है । आनन्द ही ब्रह्म का स्वरूप है । इसीलिए श्रुति कहती है-" श्रानन्दायेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । श्रानन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति " । ( तै ० उप ० ३।६ ) श्रानन्द में पहुंचना - अपरा मुक्ति है - प्रानन्द बन जाना परा मुक्ति है । बस, उभयविध मुक्ति का साक्षी यही आनन्द विज्ञान स्वरूप अव्यय है । दूसरी कलाएँ हैं - प्राण, वाक् | यह सृष्टि सारी अव्यय है । मन दोनों में रहता है । विज्ञान आनन्द की ओर जा कर यह मन मुक्ति का कारण बन जाता है । एवं प्रारण वाक् की ओर जा कर यह मन बन्धन का कारण बन जाता है । अतएव भगवान् श्री कृष्ण

कहते हैं-" न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः ” ॥

कहना - इस प्रपञ्च से यही है कि श्रानन्द - विज्ञान मन - यह अव्यय भाग मुक्ति - साक्षी है एवं ' मन-प्रारण वाक् ' यह अव्यय भाग सृष्टि - साक्षी है । प्रकृत में हमें सृष्टि का स्वरूप बतलाना है । अतएव हम " मन - प्रारण वाक् ” इन तीन ही को अपना लक्ष्य बनाएँगे । ' मन - प्राण- वाक् ' - इन तीनों से इच्छा - तप - श्रम- ये तीन काम होते हैं । इच्छा होना - यह सृष्टि-साक्षी मन का काम है । अव्यय से भी पहले सर्वबल - विशिष्ट व्यापक रस था । यही रस- महामाया बलोद्भव के कारण परिच्छिन्न हो कर अव्यय पुरुष कहलाने लग गया । निष्कल निरञ्जन निर्धर्मक परात्पर हो माया की मिति में आ कर सकल - साञ्जन एवं सर्वधर्मोपपन्न हो गया । यह सर्वधर्मोपपन्न पञ्चकल अव्यय अपने सृष्टि - साक्षी मन से, जो कि इच्छा का जनक है - सर्वप्रथम " एकोऽहं बहुस्याम् " यह इच्छा करता है । मन का पहला रेत है - काम, इच्छा । इच्छा जब भी होती है - मन से ही होती है । एवं सृष्टि के प्रारम्भ में यदि पहले - पहल कुछ उत्पन्न होता है तो वह यही मन का रेत- काम ( इच्छा ) है | अतएव वेद भगवान् कहते हैं-" कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् " - इति । 1 ( ऋग्वेद मं ० १० १२६/४ ) मन के बाद है प्राण । इच्छा के होते ही प्रारण व्यापार होता है । इस प्रारण व्यापार को ही तप कहते हैं । इच्छा के अनन्तर होने वाला जो श्रान्तर- व्यापार ( कोशिश - कृति - यत्न ) है - उसे ही तप कहते हैं । इसमें प्रारण मात्रा खर्च होती है । इच्छा प्रप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लिए होती है । उस वस्तु को [ ५२६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण लेने के लिए पहले अपनी वस्तु कुछ खर्च करनी पड़ती है । लेने से पहले कुछ देना पड़ता है । लेते हैं-जहाँ देते हैं । देन है - जहाँ लेन है । प्रतएव प्रारण व्यापार स्वरूप तप का लक्षण करते हुए वेद महर्षि कहते हैं -" एतद्वैत इत्याहुत् स्वं ददाति ". - इस तप के अनन्तर वाग् व्यापार होता है । वाग्व्यापार को ही " श्रम " कहते हैं । बस श्रम के अनन्तर नई वस्तु उत्पन्न हो जाती है । मन प्रारण वाक् - जन्य इच्छा-तप श्रम ही सृष्टि - साक्षी है । इच्छा - तप - श्रम से ही नई वस्तु उत्पन्न होती है । हमने कहा था कि वही प्रजापति ईश्वर है - वही जीव है - ईश्वराव्यय ही जीवाव्यय बना हुआ है । इसीलिए तो — " ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया " । ( गीता १८।६१ ) यह कहा जाता है । जो स्थिति आधिदैविक में है - वही अध्यात्म में है । केवल मात्रा में अन्तर है । इसी अद्वैत तत्त्व को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-अपिच " यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव, पश्यति " ॥ ( कठ ० उप ० २।१।१० ) " पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते " || ( इश ० उप ० मङ्गलपाठ ) चूँकि वही षोडशी पुरुष अध्यात्म में है, अतएव जीवात्मा को उस परम प्रजापति से बहुत ही मिलता - जुलता बतलाया जाता है । जैसा कि वाजसनेय श्रुति कहती है-- ~ --" प्रजापतिर्ह वाऽइदमग्रएक एवास । स ऐक्षत । कथं नु प्रजायेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत । स प्रजा असृजत । ता अस्य प्रजाः सृष्टाः परा-बभूवुः । तानीमानि वयांसि । पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठं " । ( शत ० ब्रा ० २।५।१।१ ) पूर्वोक्त श्रुति प्रमाणों से एवं तर्क से मानना पड़ता है कि वही षोडशी पुरुष अध्यात्म में प्रतिष्ठित रहता है । चूंकि षोडशी सृष्टि - साक्षी ग्रव्यय - मनप्राणवाङ्मय है - प्रतएव जीवात्मा जब भी कभी कोई नई वस्तु उत्पन्न करना चाहता है कोई भी काम करना चाहता है उसे इच्छा - तप श्रम तीनों काम करने पड़ते हैं । बिना तीन के कोई भी काम नहीं हो सकता । यहाँ पर इतना और समझ लेना चाहिए कि मन - प्राण- वाक् - इन तीनों में मन श्रतिसूक्ष्म है । प्रारण कुछ स्थूल है । मन से स्थूल होने पर भी वह आँखों से न दिखलाई देने के कारण ' सूक्ष्म ' ही कहलाता है । एवं वाक् - स्थूल वस्तु है । वाक् से आकाश अभिप्रेत है । यह श्राकाश अर्थात् वाक् मर्त्य श्रमृत भेदेन दो प्रकार का है । मर्त्याकाश से भूत उत्पन्न [ ५३० ]

पृष्ठ 545

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) अपिच इसी अभिप्राय से ऐतरेय श्रुति कहती है-विज्ञान से प्रकृत में कोई सम्बन्ध नहींहै ' शत ० ब्रा ० ३ | ४ | २ | २ ' | १ पश्वेकादशिनी ब्राह्मस शतपथ ब्राह्मणं " १ [ ५३१ ] होते हैं - अमृताकाश से देवता उत्पन्न होते हैं । अमृताकाश ( अमृता वाक् ) का नाम " इन्द्र " है । चूँकि अमृताकाश नाम का वागिन्द्र ही सारे देवताओं का जनक है, अतएव - " इन्द्रः सर्वा देवता " यह कहा जाता है एवं मर्त्याकाश को - " इन्द्र- पत्नी " कहा जाता है । यही वाक् सारे भूतों की जननी है, वाकू से वायु उत्पन्न होता है - वायु से अग्नि उत्पन्न होता है - अग्नि से पानी उत्पन्न होता है - पानी से मिट्टी बनती है । इस प्रकार पाँचों भूत वाक् से उत्पन्न होते हैं । श्रतएव पाँचों को ' वाक् ' ही कह दिया जाता है । दूसरी ओर अमृता वाक् देव सृष्टि करती है । बस, सारा प्रपञ्च इसी उभयविध वाक् के गर्भ में - वाक्रूप बन कर ही समा रहा है । अतएव इस व्यापक अव्यय वाक् की स्तुति करते हुए वेद महर्षि कहते हैं—

" वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।

arat मा विश्वा भुवनान्यपिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी " ॥

वाक्षरं प्रथमजा - ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।

सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु " इति ॥

( तै ० ब्रा ० २२८८४-५ ) " वाचा वै वेदाः संधीयन्ते । वाचा छन्दांसि । वाचा मित्राणि संदधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । प्रथो वागेवेदं सर्वम् " इति । ( ऐ ० आ ० ३।१।६ ) कहना - इससे हमें यही है कि मन प्राण वाक्- तीनों में से वाक् से पञ्च महाभूत अभिप्रेत है । पृथिवी - जल- तेज वायु आकाश का नाम ही वाक् है । इन्हीं से हमारा शरीर बनता है- प्रतएव हम इस सासृङ्मांसादि सप्त धातुयुक्त शरीर को ' वाक् ' कहने के लिए तय्यार हैं । एवं इस शरीर के भीतर प्राण हैं - एवं प्राण के भीतर मन है- मन के भीतर विज्ञान है - विज्ञान के भीतर प्रानन्द है । अस्तु -आनन्द । प्रकृत में केवल मन प्रारण वाक् से ही सम्बन्ध है । मन प्राण सूक्ष्म होने के कारण आत्मा कहलाते । वाक्, सृष्टि कहलाती है । आत्मा और सृष्टि के अलावा और है ही क्या? सूर्य्य, पृथिवी, चन्द्र, परमेष्ठी, स्वयम्भू- एतत् पञ्चपदार्थ युक्त महाविश्व - महासृष्टि - उस महामायाच्छन्न ईश्वरात्मा का शरीर है एवं भूत - भौतिक - निम्मित शरीर - विश्वजीवात्मक विश्व है । मन-प्राण से वाक् उत्पन्न है । वाक् का नाम ही प्राकाश है । वही सब भूतों का जनक है । इसी सृष्टि - क्रम बताती हुई श्रुति कहती है-" तस्माद् वा एतस्मादात्मन श्राकाशः संभूतः । श्राकाशाद्वायुः । वायो-रग्निः । श्रग्नेरापः अद्द्भ्यः पृथिवी " इति । ( तै ० उप ० २1१1१ )

पृष्ठ 546

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ९ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण ईश्वर भी - मन - प्राण- वाक् से ही सृष्टि निर्माण करता है । जीव भी नई वस्तु इन्हीं तीनों से उत्पन्न करता है । जिस समय हम कोई वस्तु बनाते हैं, उस समय सबसे पहले मन का व्यापार होता है । मैं यह वस्तु बनाऊँ - पहले - पहल इच्छा होती है । इच्छा के होते ही प्रारण व्यापार होने लगता है, जिसे कि कोशिश कहते हैं । यह व्यापार शरीर के भीतर ही भीतर होता है । अतएव इसे श्रान्तर व्यापार कहते हैं । इसके होते ही वाग् व्यापार अर्थात् भूत - स्वरूप हाथ का व्यापार होने लगता है । हाथ के व्यापार से उसी समय नई वस्तु बन जाती है । हमने चाहा कि पुस्तक लिखें । बस चाह के साथ ही कोशिश होने लगती है । कोशिश के साथ ही कलम चलती है और पुस्तक तय्यार हो जाती है । मन-प्रारण वाक् से उत्पन्न होने वाले जो इच्छा - तप - श्रम हैं, उन्हीं से नई वस्तु उत्पन्न होती है । मन में इच्छा क्यों होती है? - इसका जनक आनन्द - विज्ञान स्वरूप अव्यय का ज्ञान भाग है । वही सृष्टि - साक्षी मन में इच्छा का प्रादुर्भाव करवाता है । इच्छा से कृति होती है । कृति और कर्म में फर्क है । एक बीमार आदमी में इन दोनों का भेद स्पष्ट मालूम हो जाता है । जिस मनुष्य को लकवा मार जाता है, वह उठने का प्रयत्न करता है, परन्तु उठ नहीं सकता । उसके भीतर - भीतर उठने की चेष्टा ( यत्न- कृति- कोशिश ) होती है - प्राण व्यापार होता है, परन्तु पैर उठ नहीं सकता । वाग् - व्यापार नहीं कर सकता । अतएव कृति और कर्म को भिन्न मानना पड़ता है । पर जहाँ तीनों मिले कि काम हुआ । इसी आत्म - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर किरणावली ग्रन्थ के रचयिता बौद्धमत दर्प - दलनकर्त्ता - ईश्वर - सत्ता को स्थापित करने

वाले उदयनाचार्य कहते हैं-" ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इच्छाजन्या कृतिर्भवेत् ।

कृतिजन्यं भवेत्कर्म - तदेतत्कृतमुच्यते " इति ॥

इस पूर्व के सन्दर्भ से सिद्ध हो जाता कि अव्ययादिषोडशकलोपेत श्रात्मादि “ प्रजापति " कह-लाता है । एवं उसका मन प्रारण वाङ्मय सृष्टि - साक्षी आत्मादि ' एकोऽहं बहुस्याम् ' इस इच्छा से सारी सृष्टि का निर्माण करता है । " ईश्वर प्रजापति " जीव- ईश्वर भेदेन दो प्रकार का है । जीव प्रजापति अन्तर्जगत् का निर्माण करता है - ईश्वर - प्रजापति बहिर्जगत् का निर्माण करता है । चूंकि प्रकृत में महासृष्टि का विवेचन है- आधिदैविक यज्ञ का वर्णन है - प्रतएव इस पश्वेकादशिनीयुक्त प्रजापति से उस महामायावच्छिन्न षोडशी प्रजापति का ही ग्रहण समझना चाहिए । वही ईश्वर प्रजापति " एकोऽहं बहुस्याम् " इस इच्छा से इस सारी प्रजा को सारी सृष्टि को - उत्पन्न करता है । उत्पन्न कर आप स्वयं " तद् तत् सृष्टवा तदेवानुप्राविशत् " के अनुसार उसमें प्रविष्ट हो जाता है । प्रजापति से उत्पन्न प्रजा, प्रजापति से अलग नहीं रह सकती । जैसे लोहे से उत्पन्न जंग लोहे पर ही वेष्टित हो जाता है - पानी से उत्पन्न भाग पानी पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं तथैव उस षोडशी प्रजापति से ( षोडशी प्रजापति के आत्मक्षर से ) उत्पन्न प्रजा उसी पर प्रतिष्ठित रहती है । क्यों प्रतिष्ठित रहती है, उत्पन्न प्रजा, प्रजापति को छोड़ कर उससे अलग क्यों नहीं हो जाती? - इसका उत्तर है - यही पश्वेकादाशिनी यज्ञ । प्रजापति पशु का आलम्भन कर यज्ञ किया करते हैं । श्रतएव उनसे प्रजा अलग नहीं होती । यदि प्रजापति श्रादान- विसर्गात्मक यज्ञ न करते एवं विसर्गरूपा सृष्टि ही किया करते तो थोड़े ही समय में [ ५३२ ]

पृष्ठ 547

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तृतीय काण्ड ( ० है ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मणं वे ' सर्वथा ' रिक्त हो जाते । उदाहरणार्थ - प्रध्यात्म जगत् पर दृष्टि डालिए । यदि हम परिश्रम करके नई - नई वस्तु उत्पन्न ही किए जाएँ एवं उससे अपना यज्ञिय बन्धन जोड़ें- उत्पन्न वस्तु को काम में न लाएँ तो थोड़े ही दिनों में हम क्षीणकाय हो जाएँगे । निदर्शन- पराधीन भारतवर्ष जी तोड़ मनप्राण - वाग्-व्यापार से नई सत्ताएँ बनाता है - पदार्थ उत्पन्न करता है, परन्तु प्रदान दूसरे ही कर ले जाते हैं । ये बेचारे विसर्ग में ही रहते हैं । बस, इसी से यज्ञ श्रृंखला टूटी हुई है । इस विज्ञान को हँसी में नहीं उड़ा देना चाहिए । वास्तव में बात ऐसी ही है । मलमूत्र प्रस्थिचर्मादि का हम विसर्ग करते हैं, परन्तु वे पदार्थ भी विदेशों में चले जाते हैं । प्रतएव हम उनका प्रदान नहीं कर सकते । हमारी जननी जन्मभूमि उन सार भागों में शून्य होती जा रही है - यही हमारी दुर्बलता का एकमात्र कारण है । जब तक हम विसर्ग के साथ प्रदान करना न सीखेंगे, तब तक हम प्रजा पर शासन नहीं कर सकते । विसर्ग करो - खूब करो, परन्तु प्रदान के लिए विसर्ग करो न कि सत्यनाश के लिए विसर्ग करो । प्रजापति के वाक् - भाग से सारी सृष्टि बनती रहती है । यदि वे सृष्टि बनाते ही जाते तो थोड़े ही दिनों में वे दिवालिए बन जाते । परन्तु वे साथ - साथ ही लेते भी रहते हैं । प्रतएव वह प्रजा उनसे अलग नहीं होती । इस आदान-विसर्गात्मक यज्ञ के कारण प्रजापति प्रजा से अलग नहीं हो पाते । आत्मा का जो भोग्य है, उसे वैदिक परिभाषानुसार पशु कहा जाता है । हम भी किसी के भोग्य रहे हैं, अतएव हम भी पशु कहलाते हैं । इसीलिए पञ्च - पशुत्रों में ' पुरुष ' को भी पशु माना जाता है । श्राधिदैविक सृष्टि में पशु से ' पशु - प्राण ' अभिप्रेत हैं । ये पशु - प्राण ग्यारह ( ११ ) प्रकार के हैं । ये प्रजापति से ही उत्पन्न होते हैं परन्तु प्रजापति इनका आदान भी कर लेते हैं । सूर्य से सारे पार्थिव पदार्थ जैसे उत्पन्न होते हैं वैसे सूर्य्य सारे पदार्थों को ले भी लेता है । इसी से सौर प्रजा सूर्थ्यानुगत हो रही है । इसी प्रकार ग्यारह ( ११ ) पशुनों का प्रलम्भन कर उन्हें अपने में आहूत करने के कारण ही आज प्रजापति की प्रजा प्रजापति के ( ईश्वर - प्रजापति के ) अनुगत हो रही है । सारी प्रजा ( सारी सृष्टि - किं ० वा पशु ) ईश्वरानुगत है । प्रजा उसी प्रजापति पर प्रतिष्ठित है - इसका एकमात्र कारण यही ' पश्वेकादशिनी ' है । बस, इस ब्राह्मण में यही विज्ञान बतलाया गया है । यद्यपि आत्मा और प्रजा - दोनों अविनाभूत हैं । प्रजा, प्रजापति के बिना रह ही नहीं सकती ॥ इस अविनाभाव का कारण है- पश्वेकादशिनी यज्ञ । यदि यज्ञ न होता तो प्रजा, प्रजापति से अलग हो जाती । इस संभावना को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- " एकोऽहं बहुस्याम् " इस इच्छा से षोडशी प्रजापति सृष्टि उत्पन्न करता हुआ, ( उत्पन्न कर ) अपने को बहुत्व के बजाए खाली - सा समझने लगा । कारण इसका यही था कि उसने जो प्रजा उत्पन्न की, वह उससे पराङ्मुख हो गयी । यह प्रजा उसके सौभाग्य के लिए - भोग्य सामग्री बनने के लिए उपस्थित न रही । प्रजा कभी अलग रहती नहीं - इसीलिए " रिरिचान इव " कहा है । कहाँ प्रजापति ने प्रजा से अपने को बहु बनाने की इच्छा की थी - कहाँ वे थे जितने भी न रहे । वास्तव में बात ठीक है । जितनी वाक् प्रजा के निर्माण में काम आ गई उससे तो वे हाथ घो ही बैठे । लोक में जिस प्रकार बहुत प्रजा वाला मनुष्य उसी प्रजा से सौभाग्यशाली बन जाता है - ऐसे प्रजापति नहीं बने । उत्पन्न होते ही प्रजा इनसे पराङ्मुख हो गई । इसी अभिप्राय से कहते हैं-[ ५३३ ]

पृष्ठ 548

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तृतीय काण्ड ( श्र ० é ) पश्वेकादशिनी ब्राह्मणं " प्रजापतिर्वै प्रजाः ससृजानो ( सृजन ) रिरिचान इवामन्यत ( न तु रित्तः अभूत् ) तस्मात् ( प्रजापतेः सकाशात् ) पराच्यः प्रजा प्रासुः । नास्य प्रजाः श्रिये अन्नाद्याय तस्थिरे " ॥१ ॥

जब प्रजापति प्रजा पराङ्मुख हो गई तो प्रजापति ने विचार किया कि अरे मैं तो प्रजा से अतिरिक्त हो गया । जिस बहुत संपत्ति प्राप्ति के लिए सौभाग्य के लिए एवं भोग्य के लिए मैंने प्रजा को उत्पन्न किया- वह मेरा काम जरा भी न बना, मेरी सारी आशाएँ निराशा में परिणंत हो गई । सोचता था कि प्रजा श्रनुगत रहेगी, परन्तु यहाँ तो उलटा हुआ । मेरी ही प्रजा मुझ से पराङ्मुख गई । मेरे सौभाग्य के लिए एवं भोग्य के लिए मेरी प्रजा मेरे श्रनुगत न रही । " स ऐक्षत ( विचारं कृतवान् ) अरिक्ष्यहम् ( प्रतिरिक्तोऽभूवम् ) । यस्मा कामाय असृक्षि न मे स कामः समाद्धि ( समृद्धियुक्तोऽभूत् ) । पराच्यो मत् - प्रजा अभूवन् । न मे प्रजाः श्रिये अन्नाद्यायास्थिषत " इति ॥२ ॥

इस प्रकार सोचते - सोचते प्रजापति ने अपने मन में विचार किया कि ऐसा कौनसा उपाय करें जिससे कि अपना रिक्त आत्मा फिर आप्यायित हो जाए । किस उपाय से इस रिक्तत्व को प्राप्यायित करें - एवं पराङ्मुख सारी प्रजा कैसे मेरे पास वापस लौट आए एवं वापस लौट कर मेरे पास स्थिर हो कर अन्नाद्य के लिए और श्री के लिए मेरे पास प्रतिष्ठित हो जाए, मेरे श्रनुगत हो जाए-" स ऐक्षत प्रजापतिः कथं नु पुनरात्मानमाध्यायेय । उप मा प्रजाः समावर्तेरन् । तिष्ठेरन् मे प्रजाः श्रिये अन्नाद्यायेति " ॥ ३ ॥

इस प्रकार बहुत्व संपत्यर्थ पराङ्मुख प्रजा को श्री और अन्नाद्य के लिए वापस अपने अनुगत करने के लिए प्रजापति तद्नुकूल कोई मार्ग ढूँढ़ते हुए तप और श्रम करने लगे । अर्चन् से तप अभिप्रेत है, श्राम्यन् श्रम श्रभिप्रेत है । भीतर से जो अशना रूप प्राण - सूत्र निकलते हैं, उन्हें " अर्क " कहा जाता है । ऐक्षत से मनोव्यापार अभिप्रेत है, अर्चन से प्रारण व्यापार अभिप्रेत है एवं श्राम्यन् से वाग्व्यापार अभिप्रेत है । बस - उस षोडशी आत्मा में इच्छा के होते ही तप और श्रम होने लगा । श्रम के होते ही कार्य सिद्धि सामने ही खड़ी रहती है । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि तप और श्रम करते हुए प्रजापति ने इस पश्वेकादशिनी को देखा । अर्थात् जो उनकी अभिलाषा थी उसकी पूर्ति का साधक इस पश्वेका-दशिनी को समझा । बस, फिर क्या देर थी? उसी समय पश्वेकादशिनी याग किया । पश्वेकादशिनी से यज्ञ करके प्रजापति ने अपने रिक्त श्रात्मा को फिर से श्राप्यायित कर लिया । इतना ही नहीं - कमी तो पूरी हुई सो हुई ही - पराङ्मुख प्रजा वापस लौट आई एवं इसके सौभाग्य एवं अन्नाद्य के लिए इसी के अनुगत हो गयी । इस प्रकार - रिक्त प्रजापति पश्वेकादशिनी से यजन करके वसीयान् ( वसुमत्तर ) हो गया । [ ५३४ ]

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मणं पश्वेकादशिनी ब्राह्मणे बतलाना इस सारे प्रपञ्च से हम को यही है कि सारी प्रजा, प्रजापति से उत्पन्न होती है एवं उत्पन्न हो कर वह प्रजापति के अनुगत रहती है । इसका एकमात्र कारण - आधिदैविक प्राणपश्वेका-दर्शिनी यजन है । जिन प्रारण पशुों को प्रजापति उत्पन्न करता है, उन्हें आलम्भन द्वारा वापस लेता भी रहता है । इसी से उसमें पशु - प्राण सत्ता - प्रजासत्ता रहती है । पश्वेकादशिनी भी बिना प्रजापति की इच्छा तप - श्रम के नहीं होती । बस, इसी मन - प्रारण वाक्- कृत सृष्टि - विज्ञान को बतलाने के लिए प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की परन्तु वह पराङ्मुख हो गई- इससे प्रजापति ने फिर श्रम किया । तद्द्द्वारा पश्वेका-दशिनी- उपाय किया । इससे यजन कर वह फिर प्रजा से अनुगत हो गया - यह आख्यान रचा गया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" सोऽञ्च्छ्राम्यंश्चचार प्रजाकामः । स एतामेकादशिनीमपश्यत् । स

एकादशिन्येष्ट्वा प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययत । उपैनं प्रजाः समावर्तन्त ।

प्रतिष्ठन्त अस्य प्रजाः श्रिये अन्नाद्याय । स वसीयानेवेष्ट्वाभवत् " ॥४ ॥

इस प्रजापतिकृत पश्वेकादशिनी विज्ञान का फल यही है कि जो मनुष्य इस विज्ञान को जान कर आधिदैविक उन ग्यारह ( ११ ) पशु - प्राणों से निर्मित पार्थिव ग्यारह ( ११ ) पशुओं का आलम्भन कर तद्वारा पश्वेकादशिनी करता है, वह भी प्रजापतिवत् अनन्त प्रजा से युक्त हो जाता है एवं सौभाग्य-शाली हो जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं जिस प्रकार प्रजापति ने श्राप्यायनादि के लिए पश्वेकादशिनी यजन किया था तथैव मनुष्य भी उस प्राप्यायनादि कामना के लिए ( तस्मैकम् ) पश्वेकादशिनी से यजन करे । इस यजन से जैसे प्रजापति संपन्न हो गए एवं हो रहे हैं - तथैव - यह यजनकर्त्ता यजमान भी प्रजा से एवं पशुओं से युक्त आप्या-यित हो जाता है एवं यजमान से पराङ्मुख यजमान प्रजा वापस लौट आती है तथा सौभाग्य एवं अन्नाद्य के लिए इसके अनुगत हो जाती है । इस प्रकार पश्वेकादशिनी से यजन कर प्रजापतिवत् - यह भी " वसीयान् " बन जाता है । प्रजावृद्धि, संपत्तिवृद्धि एवं प्रजानुकूल्य- यही इस पश्वेकादशिनी के फल हैं । इन्हीं फलों का दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं-" तस्मै कम् ( आप्यायनादिकामाय सुखसंपत्ति प्राप्त्यर्थम् - इतियावत ) -एकादशिन्या यजेत । एवं हैव प्रजया पशुभिराप्यायते । उपैनं ( यजमानं ) प्रजाः समावर्तन्ते तिष्ठन्तेऽस्य - प्रजाः श्रियेन्नाद्याय । स वसीयानेवेष्ट्वा भवति " । बस - प्राज यह अग्निष्टोमयाजी यजमान उन्हीं प्रजाकामादि फलों की प्राप्ति के लिए पश्वेका-दर्शिनी यजन करता है -" तस्मै कसेकादशिन्या यजते- ( श्रयं यजमानः इति शेषः ) " || ५ || [ ५३५ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ) पश्वेकादशिनी ब्राह्मणं शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी में कुल ग्यारह ( ११ ) पशु होते हैं— १ - श्राग्नेय - ( अग्निदेवताक ) २ - सारस्वत - ( वाग्देवताक ) ३ - सौम्य -- ( सोमदेवताक ) ४ - पौष्ण - ( पूषादेवता ) ५- बार्हस्पत्य- ( बृहस्पति देवताक ) ६ - वैश्वदेव -- ( विश्वेदेव देवताक ७- ऐन्द्र ( इन्द्रदेवताक ) ८ - मारुत-- ( मरुद्देवताक ) - एन्द्राग्न -- ( इन्द्राग्नीदेवताक ) १० - सावित्र - ( सवितादेवताक ) ११ - वारुरण - ( वरुण देवताक ) आधिदैविक मण्डल में प्रग्नि वाक् सोम पूषा बृहस्पति विश्वेदेव इन्द्र - इन्द्राग्नी मरुत - सविता वरुण - ग्यारह ( ११ ) देवता हैं । इन ग्यारह देवताओं के आग्नेयादि ग्यारह ( ११ ) पशु हैं । देवता - भेद से ग्यारहों पशुओं में स्वरूप भिन्नता श्रा जाती है । जिस पशु में अग्निदेवता का स्रोत आता रहता है - उसका भिन्न ही स्वरूप होता है । सौम्यदेवताक पशु भिन्न ही स्वरूप का होता है । यज्ञकर्त्ता यज-मान को चाहिए कि वह प्राकृतिक विज्ञान के अनुसार उन उन प्राणों से निम्मित उन - उन पशुओं को ही यज्ञ में लाए । ग्यारह ( ११ ) पशुओं में प्राण- परीक्षा कर ले । जब यह निश्चय हो जाए कि ग्यारहों पशु भिन्न - भिन्न देवताक पशु हैं, तभी उनका प्रालम्भन करे अन्यथा फल व्यर्थ हो जाता है । इन ग्यारहों पशुओं में से इस यज्ञ में - वह शमिता सर्वप्रथम प्राग्नेय पशु का ही आलम्भन करता है | कारण इसका यही है कि इन सारे पशुओं की आहुति प्राण - देवताओं को दी जाती है । प्राणदेवताओं के मुख एवं प्रजनयिता अग्नि हैं । प्रजनयिता होने के कारण ही अग्नि प्रजापति भी कहलाते हैं । प्राप्य -प्राण को जैसे असुर कहा जाता है - सौम्यप्राण को जैसे गन्धर्व कहा जाता है - परोरजाप्राण ( स्वायंभुव प्राण ) को जैसे ऋषि कहा जाता है तथैव श्राग्नेयप्रारण को देवता कहा जाता है । देवता आग्नेय है । अग्नि ही घन - तरल- विरल इन तीन अवस्थानों में परिणत हो कर - प्रग्नि वायु आदित्य इन तीन नामों से व्यवहृत होने लगता है । इस विभक्त अग्नि में अग्नि- श्रष्टपर्वा है । ये ही आठ वसु कहलाते हैं । वायु एकादशपर्वा है - ये ही ग्यारह ( ११ ) रुद्र कहलाते हैं । आादित्य द्वादशपर्वा है, ये ही बारह ( १२ ) आदित्य कहलाते हैं । इस प्रकार एक ही अग्नि अवस्था विशेष के कारण इकतीस ( ३१ ) स्वरूपों में परिणत हो जाता है । यह अग्नि पृथिवी से निकल कर सूर्य के रथ ( क्रान्तिवृत्त ) के ऊपर तक रहता है । अतएव इस पार्थिवाग्नि मण्डल साम को " रथन्तर " साम कहा जाता है । इसी के इकतीस ( ३१ ) विभाग हैं । इकतीस ( ३१ ) के आरम्भ में पृथिवी है - इकतीस ( ३१ ) के ऊपर द्यौ है । इस प्रकार द्यावा-पृथिवी को मिला कर कुल तेतीस ( ३३ ) देवता हो जाते हैं । [ ५३६ ]