Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 551–560

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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तृतीय काण्ड ( श्र ० e ) ये तीस - वही एक अग्नि है । ही है । अन्त के बारहवें आदित्य का नाम सारे देवता हैं । अतएव श्रुति कहती है-शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मणं इकतीस में जो आठ वसु हैं उनमें से पहले वसु का नाम ' अग्नि ' विष्णु है । इस ओर अग्नि है - उस ओर विष्णु है - बीच में " अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा श्रन्या देवता: " इति । ( ऐ ० ब्रा ० अ ० १1१ ) कहना हमें इस प्रपञ्च से यही है कि सारे देवताओं का मुख अग्नि ही है - वही उपक्रम में है । यहीं से देवता प्रारम्भ होते हैं एवं वही तेतीस ( ३३ ) देवताओं का जनक है । अतएव देव प्रजनीयता होने के कारण उसे हम ' प्रजापति ' भी कह सकते हैं । इसीलिए ' अग्निः सर्वा देवताः १ यह कहा जाता है । अपिच - चाहे जिस किसी देवता के लिए आहुति दी जाती है - अग्नि में दी जाती है, इसलिए भी अग्निसारे देवताओं का मुख है । जिस प्रकार यह अग्नि देवतानों का मुख है एवं प्रजापति है तथैव यजमान भी है । यज्ञ निष्पन्न करने वाले को ही यजमान कहते हैं । श्रग्नि ही तो यज्ञ - निष्पादक है । बिना अग्नि के यज्ञ हो ही नहीं सकता । अग्नि में सोमाहुति डालने का नाम ही यज्ञ है । ऐसी अवस्था में अग्नि का होना अत्यावश्यक है । अतएव यज्ञ निष्पादकत्वेन हम अग्नि को यजमान भी कह सकते हैं । इस प्रकार अग्नि सारे देवताओं का मुख होने से सब देवताओं में प्रजापतित्वेन भी मुख्य तथा यजमानत्वेन भी मुख्य है । तीनों प्रकार से सारे देवताओं में अग्नि ही श्रेष्ठ है । यज्ञ का सार भाग अग्नि ही है । जैसे बिना यजमान के यज्ञ रद्दी है तथैव बिना देवमुख - देवप्रजनयिता श्रग्नि- यजमान के यज्ञ निःस्सार है | अतः सबसे पहले उसी का यजन होना आवश्यक है । बस, ग्यारहों ( ११ हों ) पशुओं में से आग्नेय पशु का आलम्भन क्यों किया जाता है? - इसकी यही उपपत्ति है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--" स आग्नेयं प्रथमं पशुमालभते । अग्निर्वै देवनां मुखम् । प्रजनयिता स

प्रजापतिः । स उ एव यजमानः । तस्मादाग्नेयो भवति " ॥ ६ ॥

इसके बाद सारस्वत पशु का आलम्भन करते हैं । वाक् का नाम ही सरस्वती है । वाक् - सत्या -सरस्वती- बृहती - ग्रनुष्टुप् भेदेन चार प्रकार की है । इन चारों में से सत्या वाक् स्वायम्भुवी है । सरस्वती पारमेष्ठिनी है - इसे ही ' प्राम्भृणी ' भी कहते हैं । बृहती सौरी वाक् है तथा अनुष्टुप् पार्थिवी वाक् है । चारों में से यज्ञ का प्रारम्भ परमेष्ठि- मण्डल से होता है, अतएव उसी वाक् के पशु का आलम्भन किया जाता है । रोदसी समुद्र ' अ ' कहलाता है - क्रन्दसी समुद्र सरस्वान् कहलाता है । संयती समुद्र ' नभ-स्वान् ' कहलाता है - पारमेष्ठ्य समुद्र ही क्रन्दसी का सरस्वान् समुद्र है । चूँकि यह यज्ञियावाक् इस सर-१ ' ऐ ० ब्रा ० अ ० ६।३ ' । [ ५३७ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण स्वान् समुद्र से उत्पन्न होती है - प्रतएव इसे ' सरस्वती ' कहते हैं । प्रजापति ने खर्च क्या किया था? स्मरण for पूर्व प्रकरण का मन प्रारण वाक्- तीनों में से वाक् ही तो खर्च हुई थी । प्रजा वाङ्मय ही तो है | बस - उसकी क्षतिपूर्ति के लिए प्रजापति ने वाक्रूप सारस्वत पशु का आलम्भन किया । इस प्रकार वाक् पशु का ( सारस्वत पशु का ) आलम्भन कर प्रजापति ने वाक् से ही अपने को आप्यायित कर लिया । जो वाक् खर्च हो गई थी, वह इस प्रजापति की ओर वापस लौट आई । आई हुई वाक् के अनु ही प्रजापति ने आत्मा की कामना पूरी की । यदि वाक् न आती तो ' मैं बहु बन जाऊँ ' प्रजापति की यह कामना पूरी नहीं होती । बस, इसी प्रकार वाक् - पशु का आलम्भन कर यह यजमान भी वाक् से ही प्यायित हो जाता है । यज्ञ - श्रम से जो शब्द एवं अर्थात्मिका वाक् खर्च हो जाती है - वह वापस लौट आती है । एवं लौटी हुई उस वाक् के अनु ही यह यजमान आत्मा की कामनादि को पूरा करता है । यदि वाक् न हो तो इच्छा ही प्रकट नहीं हो सकती । एवं अर्थ वाकू न हो तो हाथ - पैर ही नहीं हिल सकते । बस, इन्हीं दोनों कामनाओं के लिए - वाक् को अनुकूल बनाने के लिए ( वाचमनुकाम् ) सार-स्वत पशु का श्रालम्भन किया जाता है— " अथ सारस्वतम् । वाग्वै सरस्वती । वाचैव तत् प्रजापतिः पुनरात्मा-नमाप्याययत । वागेनं ( प्रजापतिम् ) उपसमावर्तत । वाचमनुकामात्मनोऽ कुरुत | ( तथैव ) वाचो एवैष एतदाप्यायते । वागेनमुपसमावर्तते । वाचमनुका-मात्मना कुरुते ॥७ ॥

सारस्वतानन्तर सौम्य पशु का आलम्भन करते हैं । परमेष्ठि- मण्डल में होने वाला जो श्रद्धा पानी है - वही सोम बनता है । वही सोम वृष्टि बनता है । वृष्टि ही अन्न बनती है । अतः परम्परा - सम्बन्ध से प्रश्न को हम सोम कह सकते । इसी सौम्य - प्राण से जो पशु बनता है - वह सौम्य पशु कहलाता है । इसकी आहुति देना अन्न को ही आत्मसात् करना है । बस प्रजापति ने इस सौम्य पशु की आहुति से-अन से ही अपने आत्मा को आप्यायित किया । जो अन्न प्रजा की ओर चला गया था वह अन्न प्रजा-पति की ओर वापस लौट आया एवं इसी लौटे हुए अन्न के प्रनु प्रजापति ने अपनी आत्मा की कामनाएँ पूरी कीं । बस, वैसा ही यजमान करता है । अन्न संपत्ति प्राप्त्यर्थ ही सौम्य पशु का आलम्भन किया जाता है - यही निष्कर्ष है -" अथ सौम्यम् । अन्नं वै सोमः । श्रनेनैव तत् प्रजापतिः पुनरात्मानमा-प्याययत । श्रन्नमेनमुपसमावर्तत । श्रन्नमनुकमात्मनोऽकुरुत । श्रन्नेनो एवैष

एतदाप्यायते । अन्नमेनमुपसमावर्तते । श्रन्नमनुकमात्मनः कुरुते ॥८ ॥

सौम्य पशु के आलम्भन से अन्न संपत्ति अनुक ( अनुकूल ) हो जाती हैं । पहले सारस्वत - पशु का आलम्भन किया जाता है- बाद में सौम्य पशु का आलम्भन किया जाता है । जिस लिए कि सौम्य पश्वालम्भन - सारस्वत पश्वालम्भन के अनु ( पश्चात् ) किया जाता है - उसका कारण बतलाते हैं ---[ ५३८ ] 21

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण " तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) सारस्वतमनु भवति - ( सौम्यमिति शेषः ) -( तस्य कारणमुच्यते ) " । हमने बतलाया है कि वाक् ही सरस्वती है एवं अन्न ही सोम है । अध्यात्म किंवा आधिदैविक यज्ञ में अन्न वाक् के अनु ही रहता है । वाक् भी परमेष्ठी की वस्तु है । अन्न ( सोम ) भी परमेष्ठी की वस्तु है । वाक् आम्भृणी किंवा सरस्वती कहलाती है - यही पानी को उत्पन्न करती है । अतएव यह कहा जाता है-" सो s पोऽसृजत वाच एव लोकात् " । ( शत ० ब्रा ० ६।१।१।६ ) वाक् से ही चूंकि पानी उत्पन्न होता है, अतएव पानी को भी हम वाक् कह सकते हैं । इसी पानी से अन्न उत्पन्न होता है । पहले वाक् पानी बरसाती है । तब प्रन्न होता है, अन्न सदा वाक् के अनुगत रहता है । यह तो हुई आधिदैविक की कथा - अब चलिए अध्यात्म की ओर । जो मनुष्य बोलने वाला होता है एवं बलवान् होता है - वही अन्न - संपत्ति प्राप्त कर सकता है । पैदा करने वाली अर्थ - वाक् है एवं बुलवाने वाली शब्द वाक् है । जब तक शरीर में शब्द और अर्थ दोनों वाक् रहती हैं, तभी तक अन्न-संपत्ति मिलती रहती है । अन्न सदा वाक् के ही अनुगत रहता है । बल से शारीरिक बल अभिप्रेत है | बोलने से ज्ञान - बल अभिप्रेत है । यदि अन्न - संपत्ति प्राप्त करना है तो या तो शारीरिक परिश्रम करो या मस्तक ( उपदेश ) से काम लो । अन्न- प्राप्ति के ये दो ही साधन हैं । अन्न सदा वाक् के ही अनुगत रहता है । यही कारण है कि जो वाक् से प्रसामि - ( प्रतिप्रवृद्ध ) होता है - वह अन्नाद हो जाता है । वाग् बलाधिक्यात् - मनुष्य अन्नाद ( भोक्ता ) बन जाता है । भाष्यकार कृत- पसामि - अव्यय अर्थ हमारे खयाल से अशुद्ध समझना चाहिए । कहना यही है कि प्रकृति - यज्ञ में अन्न वाक् के अनुगत रहता है, अतएव सारस्वत के पीछे ही सौम्य पशु का प्रलम्भन करना युक्ति युक्त है -" वाग्वै सरस्वती । अन्नं सोमः । तस्माद्यो वाचा प्रसामि - अन्नादो हैव भवति " ॥९ ॥

इसके अनन्तर पौष्ण पशु का आलम्भन करते हैं— पूषा से ही पशु - प्राण बना है, अतएव हम पशुत्रों को ही पूषा कहने के लिए तय्यार । वस - जो प्रजापति के आत्मा में से सृष्टि निर्माण में निकल गए थे, उस पशु - रिक्त आत्मा को इन पशु - बलों पशु से फिर श्राप्यायित कर लिया । इस पौष्ण पश्वालम्भन से सारे पशु प्रजापति के श्रात्मा की ओर वापस लौट आए एवं प्रजापति ने वापस लौटे हुए पशुओं को आत्मा के अनुकूल बना लिया । अर्थात्-पराङ्मुख पशुओं को इस आलम्भन द्वारा अनुगामी बना लिया । तथैव पौष्णपश्वालम्भन कर यजमान भी पशु - प्राणों को अपने आत्मानुकूल बनाता है । पशु - संपत्ति प्राप्त्यर्थ ही - पौष्ण पशु का आलम्भन किया जाता है - यही तात्पर्य है । [ ५३६ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण " अथ पौष्णम् । पशवो वै पूषा । पशुभिरेव तत् प्रजापतिः पुनरात्मा-नमाप्याययत । पशव एनमुपसमावर्तन्त । पशूननुकान् ( श्रनुकूलान् ) श्रात्मनः कुरुत " ॥१० ॥

इसके बाद बार्हस्पत्य पशु का ज्ञानघन बृहस्पति सूर्य्य से भी ऊपर है । पांचों के बीचों - बीच सूर्य्य है । सूर्य्य से आलम्भन करते हैं । ब्रह्म ( ज्ञान ) ही बृहस्पति कहलाता है । सूर्य्य इन्द्र - स्वरूप | स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्र- पृथिवी - इन ऊपर के स्वयम्भू - परमेष्ठी - दोनों ' पूर्व ' कहलाते हैं । पृथिवी, चन्द्रमा उत्तर कहलाते हैं । पूर्वो के अन्त में अर्थात् परमेष्ठी के अन्त में सूर्य से ऊपर बृहस्पति है । एवं इन्द्र उत्तरों में प्रथम है । अतएव श्रुति कहती है-" बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति - इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः " इति । प्रजापति - इसी ज्ञान रूप बृहस्पति से निर्मित बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन कर सृष्टि निर्माण प्रक्रिया में खर्च हुई ज्ञान - मात्रा को प्राप्यायित करता है । प्रजापति ने इस बृहस्पति ब्रह्म से अपने आत्मा को आप्यायित कर लिया । जो ब्रह्म ( ज्ञान ) पराङ्मुख हो गया था - वही वापस लौट आया । आए हुए उस ब्रह्म को - ज्ञान को अपने श्रात्मा के अनुकूल बना लिया, आत्मसात् कर लिया, तथैव यजमान भी ब्रह्म को आत्मानुगामी बनाता है । ब्रह्म ( ज्ञान ) संपत् प्राप्त्यर्थ ही बार्हस्पत्य पशु का आलम्भन किया जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" थ बार्हस्पत्यम् । ब्रह्म वै बृहस्पतिः । ब्रह्मणैवैतत्प्रजापतिः पुनरा-त्मानमाप्याययत । ब्रह्मैनमुपसमावर्तत ब्रह्मानुकमात्मनो ऽकुरुत । ब्रह्मणोऽएवैष

एतदाप्यायते । ब्रह्मैनमुपसमावर्तते । ब्रह्मानुकमात्मनः कुरुते ॥११ ॥

बार्हस्पत्य पशु की पौष्ण पशु के ऋतु किया जाता है । किसलिए कि यहाँ पर बार्हस्पत्य पश्वा-लम्भन पौष्ण पश्वालम्भन के अनु ( पश्चात् ) होता है - इसका कारण बतलाते हैं ---" तद्यत् पौष्णमनु भवति ( तदुच्यते ) " । हमने बतलाया है कि पशु पूषा है एवं ब्रह्म - ज्ञान ही बृहस्पति है । सारा प्रपञ्च ज्ञान क्रिया - अर्थ इन तीनों विभागों में बँटा हुआ है । ज्ञान मन है, क्रिया प्रारण है, अर्थ वाक् है । ज्ञान क्रिया अर्थ कहो या मन - प्रारण वाक् कहो - एक ही बात है । ज्ञान, ब्रह्मवीर्य्य कहलाता है - यही बृहस्पति है । क्रियाक्षम वीर्य्य कहलाता है - यही इन्द्र है । अर्थ, विवीर्य कहलाता है, यही विश्वेदेव है । इन तीनों के अलावा एक शारीरिक बल और होता है, वह शूद्रवीर्य्य कहलाता है । ब्रह्मवीर्य्याधिष्ठाता ब्राह्मण कहलाता है । क्षत्रवीर्य्याधिष्ठाता क्षत्रिय कहलाता है, विड्वीर्य्याधिष्ठाता वैश्य कहलाता है । शूद्रबलाधिष्ठाता शूद्र कहलाता है । ज्ञान से काम लेने वाला ब्राह्मण है, पराक्रम से काम लेने वाला क्षत्रिय है - संपत्ति से काम [ ५४० ] 1

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण लेने वाला वैश्य है एवं शरीर बल से काम लेने वाला शूद्र है । इन चारों में पूर्व - पूर्व के बल श्रेष्ठ हैं । सबसे घटिया बल है शारीरिक बल । शरीरबल से श्रेष्ठ- विड्वीर्य्यं । संपत्ति का अधिष्ठाता वैश्य वैश्य संपत्ति के बल से दस पहलवान नौकर रख सकता है । एवं इससे भी श्रेष्ठ है क्षत्र वीर्य्यं । शासन बल के सामने विड्वीर्थ्य को नत मस्तक हो जाना पड़ता है । राज्य के एक चपरासी की धमकी से करोड़पति सेठों की धोती ढीली हो जाती है । इससे भी श्रेष्ठ है - ब्रह्म - बल । ब्रह्मबल के सामने शासन-बल को भी अपना मस्तक झुकाना पड़ता है । ब्रह्म - क्षत्र - विट्शूद्र - चारों में से तीन एक तरफ हैं - ब्रह्म एक तरफ है । ब्रह्म, ज्ञान स्वरूप है - तीनों कर्म्म - स्वरूप हैं । ब्रह्म क्षत्र- विट् शूद्र कहो या ज्ञान क्रिया श्रर्थ कहो या ब्रह्म - कर्म्म कहो - एक ही बात है । ज्ञान ही आत्मा है - कर्म्म ही विश्व है । विश्व भोग्य है-आत्मा भोक्ता है । जो वस्तु भोग्य होती है, उसे ही पशु कहते हैं । चूँकि क्षत्र - विड् - शूद्र - तीनों भोग्य हैं एवं ब्रह्म भोक्ता है, अतएव उन तीनों को पशु कह सकते हैं एवं ब्रह्म को आत्मा कह सकते हैं । इससे सिद्ध हो जाता है कि सारा विश्व पशु है और वह उस ब्रह्म की - ब्रह्माधिष्ठाता ब्राह्मण की संपत्ति है । क्षत्रिय - वैश्यादि - सब ब्रह्मसंपत्ति का ही उपभोग करते है । पशु ( सारा प्रपञ्च ) ब्राह्मण का अनुचर है, अतएव ब्राह्मण पशुओं के प्रति प्रायतवर्षक होता है - अर्थात् क्षत्रिय - वैश्य शूद्र - यहाँ तक कि यच्चयावत् प्राणी - ब्रह्मतेज से काँपा करते हैं, क्यों कि ब्रह्म ही सब पशुओं का अधिष्ठाता है । वास्तव में सच है । ज्ञान में ऐसा ही चमत्कार है । यही कारण है कि इस ब्राह्मण के सामने पशु अपने आप आ जाते हैं । मुख से आहित हो जाते हैं । जहाँ ब्राह्मण - बल रहता है वहाँ पशु - संपत्ति ब्रह्म के सामने आगे से आगे खड़ी रहती है, क्योंकि पशु - संपत्ति उस ब्राह्मण की अपनी संपत्ति है । चूँकि विश्व की पशु - संपत्ति ब्राह्मण की वस्तु है, अतएव " सर्वो ब्रह्मस्वं भुङ्क्त " के अनुसार सारी संपत्ति ब्राह्मणों की है - प्रतएव -क्षत्रिय जब संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होना चाहता है तो वह अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मण को दे कर अजिन ओढ़ कर निकल जाता है । ब्राह्मण ही दान क्यों लेते हैं? - इसका यही उत्तर है । ब्राह्मण को जो दान दिया जाता है - वह खैरात नहीं है, अपितु ब्राह्मण की अपनी वस्तु है, जो कि बतौर ॠरण के सारे मनुष्य काम में लाते हैं । अतएव दान ब्राह्मण को ही दिया जाता है । प्रकृत में इस प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि प्रकृति में ब्रह्म के सामने पशु पहले से तय्यार रहते हैं । यहाँ पर जो पोष्ण पशु है - वह पशु है । बार्हस्पत्य ब्रह्म है । अतः प्रकृतिवत् ब्रह्म के लिए पहले पौष्ण पशु का प्रलम्भन होना चाहिए । बाद में - बार्हस्पत्य का श्रालम्भन करना चाहिए । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं--" पशवो वै पूषा | ब्रह्म बृहस्पतिः । तस्माद् ब्राह्मणः पशूनभिधृष्णुतमः । पुराहिता ह्यस्य भवन्ति ( पशवः ) । मुख - श्राहिताः । तस्मादु तत् सर्वं दत्त्वा -अजिनवासी चरति " ॥१२ ॥

इसके बाद वैश्वदेव पशु का आलम्भन करते हैं -अग्नि वायु आदि यच्चयावत् देवताओं का जो संघ है - उसी का नाम " विश्वेदेव " है । विश्वे-देवाः को " सर्व " स्वरूप कहते हैं । प्रजापति ने सर्वस्वरूप वैश्वदेव पशु का आलम्भन कर सबसे ( सारी [ ५४१ ]

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण संपत्ति से ) अपने श्रात्मा को श्राप्यायित कर लिया एवं वे सारे देवता जो कि सृष्टि - प्रक्रिया में काम आ गये थे - प्रजापति की ओर लौट आए एवं प्रजापति ने सर्वस्वरूप उनको श्रात्मानुगत कर लिया । तथैव • वैश्वदेव पशु का आलम्भन कर यह यजमान अपने आत्मा को सर्वसंपत्ति से श्राप्यायित करता है । देव-प्राणरूपा सारी संपत्ति को आत्मसात् करने के लिए ही " वैश्वदेव " पशु का श्रालम्भन किया जाता है । " प्रथ वैश्वदेवम् । सर्वं वै विश्वे देवाः । सर्वरणैव तत् प्रजापतिः पुनरा-त्मानमाप्याययत । सर्वमेनमुपसमावर्तत । सर्वमनुकमात्मनोऽकुरुत । सर्वेरगोऽएवैष एतदाप्यायते - सर्वमेनमुपसमावर्तते सर्वमनुकमात्मनः कुरुते " ॥ १३ ॥

इस वैश्वदेव पशु का आलम्भन - बार्हपत्य पश्वालम्भन के अनु होता है । इसका कारण बत-लाते हैं-" तद्यद् बार्हस्पत्यमनु भवति - ( तदुच्यते ) " । ब्रह्म ही बृहस्पति है । एवं यह जो सारा प्रपञ्च है - वह विश्वेदेव है । सारे देवताओं को विश्वेदेव कहते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में सारे विश्वेदेव श्रा जाते हैं । अतएव हम इस सारे प्रपञ्च को ' विश्वेदेव ' कहने के लिए तय्यार हैं । सर्वरूप जो यह वैश्वदेव है उसके पहले बार्हस्पत्य पशु - याग करना - ब्रह्म को सर्वजगत् के मुख भागों में करना है । ब्रह्म और विश्व दो ही तो तत्त्व हैं । ब्रह्म पहले है - मुख स्थानीय है । विश्व पश्चाद्-भावी | चूँ कि प्रकृति में सबसे पहला स्थान ब्रह्म का है, दूसरा स्थान विश्वेदेवस्वरूप विश्व का है । बस - उसी प्रकृति के अनुसार ब्रह्म को मुख - भाग में करने के लिए ही पहले बार्हस्पत्य- पशु का आलम्भन किया जाता है एवं बाद में वैश्वदेव पशु का आलम्भन किया जाता है । प्रकृति में ब्रह्मसत्ता पहले है-अतएव उसी ब्रह्म का अधिष्ठाता ब्राह्मण सारे विश्व में मुख ( प्रधान ) माना जाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" ब्रह्म व बृहस्पतिः । सर्वमिदं विश्वे देवाः । अस्यैवैतत् सर्वस्य ब्रह्म सुखं करोति । तस्मादस्य सर्वस्य ब्राह्मणो मुखम् " ॥ १४ ॥

इसके बाद ऐन्द्र पशु का आलम्भन करते हैं । शक्ति है - वही इन्द्र है । सारी इन्द्रियाँ प्रज्ञा नाम के सृष्टम् ' इस व्युत्पत्ति से उन्हें ' इन्द्रिय ' कहा जाता है । वे इन्द्र - शक्ति हैं । इन्द्रियाँ शक्तिमती हैं - अतएव इन्द्र को भी शरीर में जो - जो इन्द्रिय - वीर्य्य है- इन्द्रियों की मनोमय इन्द्र से उत्पन्न होती हैं, अतएव इन्द्रेण इन्द्रियाँ ही एक प्रकार का वीर्य्य हैं - ताकत हैं-इन्द्रिय कहा जाने लगता है । बस इस ऐन्द्र पशु के श्रालम्भन से उसी से उसी वीर्य से प्रजापति ने आत्मा को आप्यायित किया एवं इन्द्रिय - वीर्य प्रजापति की ओर लौट आया तथा प्रजापति ने उसे प्रात्मानुकूल बना लिया । बस - तथैव यह यजमान भी इस ऐन्द्र- पश्वालम्भन से इन्द्रिय - वीर्य को श्रात्मसात् करता है । " याचकाच बलकृतिरिन्द्रक [ ५४२ ]

पृष्ठ 557

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण एवतत् " इस यास्क - निरुक्त प्रमारण से मानना पड़ता है कि इन्द्र ही वीर्य्याधिष्ठाता है । बस उसी वी को आत्मसात् करने के लिए " ऐन्द्र पश्वालम्भन " किया जाता है । " इन्द्रियं वै वीर्य्यम् इन्द्र इन्द्रियेणैव तद् वीर्येण प्रजापतिः पुनरात्मा-नमाप्याययत । इन्द्रियमेनं वीर्य्यमुपसमावर्तत । इन्द्रियं वीर्य्यमनुकमात्मनोऽ-कुरुत । इन्द्रियेोऽएवैष एतद् वीर्येणाप्यायते । इन्द्रियमेनं वीर्य्यमुपसमावर्तते । इन्द्रियं वीर्य्यमनु कमात्मनः कुरुते ॥१५ ॥

ऐन्द्र पश्वालम्भन वैश्वदेव के अनु किया जाता है— " तद्यद् वैश्वदेवमनु भवति - ( तदुच्यते ) " । ब्रह्म - क्षत्र- विड् - तीनों में क्षत्र ही इन्द्र है एवं और सारे देवता इस क्षत्र - इन्द्र की प्रजा हैं - अन्नाद्य हैं- भोग्य हैं । पहले अन्नाद्य हो, तब न राजा का राजापना है । प्रजा होगी तब न राजा कहलाएगा । यदि प्रजा - अन्नाद्य - ही न हो तो राजा, राजा नहीं कहला सकता । विश्वेदेव इन्द्र की प्रजा हैं - अन्नाद्य हैं । चूंकि उसकी सत्ता राजा से पहले होनी चाहिए, श्रतएव इस क्षेत्र - इन्द्र का क्षत्रत्व संपन्न करने के लिए - वैश्वदेव पश्वालम्भन पुरस्तात् ( ऐन्द्र से पहले ) करते हैं । " क्षत्रं वा इन्द्रः । विशो विश्वे देवाः । अन्नाद्यमेवास्माऽएतत् पुरस्तात् करोति " ॥ १६ ॥

इसके बाद मारुत - पशु का आलम्भन करते हैं । मरुत् - देवताओं की प्रजा बनिए हैं । शासक एक होता है - प्रजा बहुत होती है । बहुत्व ही भूमा है- भूमा ही सुख है - तृप्ति है - प्रानन्द है - इसीलिए यह कहा जाता है-“ यो वै भूमात सुखम् । यदपं तद् दुःखम् ” । चूँकि विट् प्रजा है - प्रजा ही भूमा है । ऐसी अवस्था में मारुत पशु से आलम्भन करना भूमा को ही आत्मसात् करना है । बस - प्रजापति ने मारुत- पशु के श्रालम्भन से भूमा द्वारा ग्रात्मा को श्राप्या-यित कर लिया । जो भूमा पराङ्मुख हो गयी थी वह इस यज्ञ से प्रजापति की ओर लौट आई । प्रजापति ने इसे अपने आत्मानुकूल बना लिया । तथैव भूमात्मसात्करणार्थ - यह यजमान मारुत - पशु का आलम्भन करता है -" अथ मारुतम् । विशो वै मरुतः । भूमो ( भूमा - उ ) वै विट् । भूम्नैव तत् प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययत । भूमैनमुपसमावर्तत । भूमानमनुकमा-[ ५४३ ]

पृष्ठ 558

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 558 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण त्मनोऽकुरुत | भूम्नोऽएवैष एतदाप्यायते । भूमैनमुपसमावर्तते । भूमानमनु-कमात्मनः कुरुते ॥१७ ॥

मारुत- पशु का प्रलम्भन - ऐन्द्र- पशु के पीछे किया जाता है - इसका कारण बतलाते हैं— " तद्यदैन्द्रमनु भवति ( तदुच्येत ) " । इन्द्र क्षत्र है - राजा है । विश्वेदेव विश् है अर्थात् प्रजा है । उन्हीं विश्वेदेवों में से एक मरुत् नाम की भी विश्वेदेव है - प्रजा है । इस प्रकार आदि में वैश्वदेव पशु द्वारा एवं बाद में मारुत पशु द्वारा इस क्षेत्र को घेरते हैं । प्रकृति में इस यज्ञ द्वारा इन्द्र क्षत्र दोनों श्रोर से प्रजा से घिरा हुआ है - प्रतएव प्रकृतिवत् यहाँ भी प्रजास्वरूप वैश्वदेव और मारुत् को इन्द्र क्षेत्र के दोनों ओर किया जाता है । राजा बीच में रहता है - उसके दोनों ओर प्रजा रहती है-" क्षत्रं वा इन्द्रः । विशो विश्वे देवाः । विशो वै मरुतः । विशे वैतत् क्षत्रं परिबृंहति । तदिदं क्षत्त्रमुभयतो विशा परिबृढम् " ॥१८ ॥

इसके बाद ऐन्द्राग्न पशु का श्रालम्भन करते हैं । जो शान्त तेज है - वही अग्नि है एवं जो चमक-दार इन्द्रिय - वीर्य है - वही इन्द्र है । उग्रतेज इन्द्र है- शान्त तेज अग्नि है । श्रग्नि ब्रह्म है - ब्राह्मण है । इसीलिए - " अग्ने महां असि ब्राह्मण भारतेति " यह कहा जाता है । इन्द्र क्षत्र है -क्षत्रिय है । बस- इन दोनों देवताओं से निम्मित ऐन्द्राग्न पशु के श्रालम्भन से प्रजा -पति ने इन शान्त और उग्र दोनों तेजों से अपने श्रात्मा को श्राप्यायित कर लिया । दोनों वीर्य्य प्रजा-पति की ओर लौटाए एवं प्रजापति ने दोनों को आत्मानुकूल बना लिया । तथैव ऐन्द्राग्न पशु का श्रालम्भन कर यह यजमान भी दोनों वीर्य्योों को श्रात्मसात् करता है--" श्रथैन्द्राग्नम् | तेजो वा अग्निः । इन्द्रियं वीर्य्यमिन्द्रः । उभाभ्यामेव तद् वीर्य्याभ्यां प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययत । उभेऽएनं वीर्य्येऽउपसमा वर्तेताम् | उभे वीर्य्येऽग्रनुकेऽश्रात्मनो ऽकुरुत । उभाभ्याम्वेवैष एतद्वीय्र्याभ्या-माध्यायते । उभेऽएनं वीर्य्येऽउपसमावर्तते । उभे वीर्य्योऽनुकेऽग्रात्मनः कुरुते ” ॥१ ९ ॥ इसके अनन्तर सावित्र पशु का आलम्भन करते हैं । सविता ही देवताओं के प्रसविता हैं । बिना सविता के प्रसव के पशु- वीर्य्य - वाक् - अन्न वगैरः श्रात्मसात् नहीं हो सकते । जब तक सविता प्रसव न करे - तब तक कोई भी काम समृद्ध नहीं हो सकता । बस इसी सविता के प्रसव के लिए ही सविता पशु का आलम्भन किया जाता है । इससे सविता आत्मसात् करने के लिए सारे प्राणों का प्रसव कर देते हैं । ऐसा होने से - यजमान के लिए सारे काम सवितृ - प्रसूत हो कर समृद्ध हो जाते हैं. [ ५४४ ]

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तृतीय काण्ड ( प्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण " थ सावित्रम् । सविता वै देवानां प्रसविता । तथो हास्माऽएते सवितृ -प्रसूताएव सर्वे कामा: समृद्ध्यन्ते ॥ २० ॥

इसके बाद सब के अन्त में ग्यारहवें ( ११ वें ) सविता - पशु का श्रालम्भन करते हैं । इससे यजमान की वरुण के सारे बन्धनों से एवं वरुण्य स्थानों से मुक्ति हो जाती है-" अथ वारुणमन्तत - प्रालभते । तदेनं सर्वस्माद् वरुणपाशात् - सर्व-स्मात् वरुण्यात् प्रमुञ्चति ॥२१ ॥

इस प्रकार इस यज्ञ में ग्यारह ( ११ ) पशुओं का आलम्भन किया जाता है । चूँकि पशु ग्यारह ( ११ ) हैं, अतएव यदि यूपैकादशिनी पक्ष हो अर्थात् ग्यारह ( ११ ) यूप खड़े किए हों तो जो सबसे बीच का- पहले दिन रोपा जाने वाला अग्निष्ठा यूप है उससे प्राग्नेय पशु को बाँधे, एवं जो बाकी बचे हुए दस ( १० ) पशु हैं - उन्हें जिस क्रम से यूप गाड़े हैं - उसी क्रम से बाँधे - * " तस्माद्यदि यूपैकादशिनी स्यात् प्राग्नेयम् ( पशुम् ) एव श्रग्निष्ठे

( यूपे ) नियुज्यात् । अथेतरान्व्युपनयेयुर्यथा पूर्वम् ॥ २२ ॥

यदि ग्यारह ( ११ ) प न हो कर - केवल पश्वेकादशिनी ही हो अर्थात् ग्यारह ( ११ ) पशु ही हों तो सबसे पहले प्राग्नेय पशु का ही झालम्भन करना चाहिए । बाकी दस का आलम्भन पूर्वोक्त क्रमा नुसार करना चाहिए -“ यद्यु पश्वेकादशिनी स्यात् प्राग्नेयमेव यूपे श्रालभेरन् - प्रथेतरान् यथापूर्वम् ” || २३ || इन पशुओं को आलम्भन के लिए उत्तर में ( शामित्र - शाला में ) ले जाया जाता है । वहाँ पर भी - प्राग्नेय पशु को ही पहले ले जाना चाहिए । बाद में यथापूर्व ले जाना चाहिए-" तान्यत्रोदीचो नयन्ति - आग्नेयमेव प्रथमं नयन्ति । श्रथेतरान्यथा-पूर्वम् " || २४ || उस शामित्रशाला में उनका प्रालम्भन करते हैं । इसमें भी श्राग्नेय पशु का ही प्रलम्भन पहले करना चाहिए क्योंकि दक्षिण भाग प्राग्नेय होता है । वाम - भाग सौम्य होता है । इस प्रकार जब एक का आलम्भन हो जाए तो अन्य पशुओंों को उत्तर की ओर यथापूर्व शामित्र - शाला में ले जा कर उनका आलम्भन करते हैं-[ ५४५ ]

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण पश्वेकादशिनी ब्राह्मण " तान् यत्र निविध्यन्ति - प्राग्नेयमेव प्रथमं दक्षिणाढ्यं ( दक्षिण-भागम् ) निविध्यन्ति । अथेतरानुदीचोऽतिनीय यथापूर्वम् " ॥२५ ॥

पशु के जिस समय इन पशुओं की वपा की आहुति दी जाती है उस देते समय हैं— भी पहले आग्नेय पा की ही प्राहुति देते हैं । बाद में यथापूर्वं अन्य वपात्रों की श्राहुति । " तेषां यत्र वपाभिः प्रचरन्ति - आग्नेयस्यैव प्रथमस्य वपया प्रचरन्ति अथेतरेषां यथापूर्वम् " ॥२६ ॥

पहले आग्नेय इसके बाद जहाँ उन पशुओंों की आहुति देने का समय श्राता है श्राग्नेय उस समय पशुओं भी को सारे कामों पशु के अवयवों की ही आहुति देते हैं । सारे प्रपञ्च से कहना यही है कि मेंमुख्यता ' देनी चाहिए क्यों कि वे ही यज्ञ में मुख्य हैं-" तैर्यत्र प्रचरन्ति । श्राग्नेयेनैव प्रथमेन प्रचरन्ति । श्रथेतरैर्यथापूर्वम् ” । ॥ इति पश्वेकादशिनीब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति नवमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ [ ५४६ ] ॥२७ ॥