Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 561–570

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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नवमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ' वसतीवरी- ब्राह्मणम् ' [ मूल ] यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश तेनैवैतद्रसेनापः स्यन्दन्ते तमेवैतद्रसं स्यन्दमानं मन्यन्ते ॥१ ॥

स यद्वसतीवरीरच्छेति । तमेवैतद्रसमाहृत्य यज्ञे दधाति रसवन्तं यज्ञं करोति तस्माद्वसतीवरीरच्छेति ॥ २ ॥

ता वै सर्वेषु सवनेषु विभजति । सर्वेष्वेवैतत्सवनेषु रसं दधाति सर्वारिण सवनानि रसवन्ति करोति तस्मात्सर्वेषु सवनेषु विभजति ॥३ ॥

ता वै स्यन्दमानानां गृह्णीयात् । ऐद्धि स यज्ञस्य रसस्तस्मात्स्यन्दमानानां गृह्णीयात् ॥४ ॥

गोपीथाय वाता गृह्यन्ते । सर्वं वाऽइदमन्यदिलयति यदिदं किं चापि योऽयं पवतेऽथैता एव नेलयन्ति तस्मात्स्यन्दमानानां गृह्णीयात् ॥५ ॥

fear गृह्णीयात् । पश्यन्यज्ञस्य रसं गृह्णानीति तस्माद्दिवा गृह्णीयादेतस्मै गृह्णाति य एष तपति विश्वेभ्यो होना देवेभ्यो गृह्णाति रश्मयो ह्यस्य विश्वे देवास्तस्माद्दिवा गृह्णीयाद्दिवेव वाडएष तस्माद्वेव दिवा गृह्णीयात् ॥ ६ ॥

एतद्ध वै विश्वे देवाः । यजमानस्य गृहानागच्छन्ति स यः पुरादित्यस्या-स्तमयाद्वसतीवरीगृह्णाति यथा श्रेयस्यागमिष्यत्यावसथेनोपक्लृप्तेनोपासीतैवं तत्त-एतद्धविः प्रविशन्ति तएतासु वसतीवरीषूपवसन्ति स उपवसथः ॥ ७ ॥

स यस्या गृहीता अभ्यस्तमियात् । तत्र प्रायश्चित्तिः क्रियते यदि पुरेजानः स्यान्निनाद्याद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भवन्ति यद्युमनीजानः या एनमीजान उपावसितो वा पर्यवसितो वा स्यात्तस्य निनाह्याद् गृह्णीयाद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भवन्ति ॥८ ॥

[ ५४७ ]

पृष्ठ 562

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण एतदुभयं न विन्देत् । उल्कुषीमेवादायोपपरेयात्तामुपर्युपरि धारयन् गृह्णीयाद्धिरण्यं वोपर्युपरि धारयन् गृह्णीयात्तदेतस्य रूपं क्रियते य एष तपति ॥९ ॥

प्रथात गृह्णात्येव । हविष्मतीरिमा प्राप इति यज्ञस्य ह्यासु रसः प्रावि-शत्तस्मादाह हविष्मतीरिमा आाप इति हविष्मां ग्राविवासतीति हविष्मा -न्ना यजमान प्राविवासति तस्मादाह हविष्मां प्रविवासतीति ॥ १० ॥

हविष्मान्देवोऽश्रध्वर इति । अध्वरो वै यज्ञस्तद्यस्मै यज्ञाय गृह्णाति तं हविष्मन्तं करोति तस्मादाह हविष्मान्देवोऽप्रध्वर इति ॥ ११ ॥

farai ' sue सूर्य इति । एतस्मै वै गृह्णाति य एष तपति विश्वेभ्यो होना देवेभ्यो गृह्णाति रश्मयो ह्यस्य विश्वे देवास्तस्मादाह हविष्मां प्रस्तु सूर्य इति ॥ १२ ॥

ता श्राहृत्य जघनेन गार्हपत्यं सादयति । श्रग्नेर्वोपनगृहस्य सदसि सादयामीत्यग्नेव नार्तगृहस्य सदसि सादयामीत्येवैतदाहाथ यदाग्नीषोमीयः पशुः संतिष्ठतेऽथ परिहरति व्युत्क्रामतेत्याहाग्रेण हविर्धाने यजमान श्रास्ते ता श्रादत्ते ॥१३ ॥

स दक्षिणेन निष्क्रामति । ता दक्षिणायां श्रोरणौ सादयतीन्द्राग्न्योर्भाग-यी स्थेति विश्वेभ्यो ह्येना देवेभ्यो गृह्णातीन्द्राग्नी हि विश्वे देवास्ताः पुनरा-हृत्याग्रेण पत्नीं सादयति स जघनेन पत्नों पर्येत्य ता श्रादत्ते ॥ १४ ॥

स उत्तरेण निष्क्रामति । ता उत्तरायां श्रोणौ सादयति मित्रावरुणयो-भागधेयी स्थेति नैवं सादयेदतिरिक्तमेतन्नैवं सम्पत्सम्पद्यतऽइन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थेत्येव ब्रूयात्तदेवानतिरिक्तं तथा सम्पत्सम्पद्यते ॥१५ ॥

गुप्त्यै वाताः परिह्रियन्ते । अग्निः पुरस्तादथैताः समन्तं पल्यङ्ग्यन्ते नाष्ट्रा रक्षांस्यपध्नत्यस्ता श्राग्नीध्रे सादयति विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थेति [ ५४८ ]

पृष्ठ 563

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T तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सतीवरी ब्राह्मण तदासु विश्वान्देवान्त्संवेशयत्येते वै वसतां वरं तस्माद्वसतीवर्यो नाम वसतां ह वै वरं भवति य एवमेतद्वेद ॥ १६ ॥

तानि वाडएतानि सप्त यजूंषि भवन्ति । चतुभिर्गृह्णात्येकेन जघनेन गार्हपत्यं सादयत्येकेन परिहरत्येकेनाग्नीध्रे तानि सप्त यत्र वै वाचः प्रजातानि छन्दांसि सप्तपदा वै तेषां परार्ध्या शक्वर्येतामभिसम्पदं तस्मात्सप्त यजूंषि भवन्ति ॥ १७ ॥

[ अनुवाद ] पशुओं का आलम्भन कर उनकी आहुति दे कर पशुयाग करने के बाद सुत्यायाग किया जाता है । सुत्यायांग में सोम की आहुति दी जाती है । सोम पीसने के समय जल की आवश्यकता होती है । इस सोमाभिषव के लिए जो यज्ञ में पानी लाया जाता है वह. वसतीवरी कहलाता है, जो सामान्य पानी नहीं किन्तु बहता हुआ पानी होता है । उस में आग्नेय देवप्राण की सत्ता होती है । वसतीवरी जल का स्वरूप बतलाया जा रहा है-देव व असुर दोनों प्रजापति की सन्तान हैं किन्तु दोनों परस्पर अत्यन्त विरोधी हैं । देवता बुद्धिप्रधान हैं तथा असुर बल प्रधान हैं । देवता प्रकाशमय प्राण हैं । देवासुर संग्राम में बलाधिक्य के कारण असुरों से जब देवता हार जाते थे तो अन्ततोगत्वा विष्णु की शरण ग्रहण करते थे, जो असुरों का संहार कर देवताओं को विजयश्री दिलाया करते थे । एक बार जब विष्णु असुरों का संहार कर श्रान्त हो गये तो प्रत्यञ्चा चढ़े हुए धनुष का तकिया लगा कर सो गये । असुरों के आक्रमण बढ़ रहे थे । अतः विष्णु को जगाने के लिए ब्रह्मा ने उपदीका ( दीमक ) को उत्पन्न किया और उसे धनुष की प्रत्यञ्चा को काटने की आज्ञा दी । दीमक ने प्रत्यंचा को काटा किन्तु उसे काटते ही विष्णु का मस्तक भी कट कर आकाश में चला गया । ब्रह्मादि देवता बहुत चिन्तित हुए । अन्त में विष्णु के कटे हुए मस्तक के स्थान पर घोड़े का मस्तक लगाया गया । वही हयग्रीव बना । उसी हयग्रीवावतार विष्णु ने असुरों का संहार किया । अधिदैवत में विष्णु का क्या स्वरूप है और उसका शिरश्छेद क्या है इसका निरूपण आवश्यक है क्योंकि इसी का प्रकृत से सम्बन्ध है । प्रत्येक पिण्ड के केन्द्र में षोडशी प्रजापति रहता है जो अव्यय, अक्षर, क्षर भेद से त्रिधातुक है । अव्यय, अक्षर व क्षर तीनों पञ्चकलानों से युक्त हैं । इनमें अक्षर की पाँच कलाएँ ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि व सोम हैं । इन पाँचों कलाओं में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र वस्तु के केन्द्र में रहने के कारण अन्तर्यामी व हृदय कहलाते हैं तथा अग्नि व सोम वस्तु के पिण्ड का निर्माण करते है । बाह्यपिण्ड का स्वरूप इन्हीं दोनों से बनता है । इसी आधार पर ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' - यह उक्ति प्रसिद्ध है 1 । तीनों हृदयाक्षरों में ब्रह्मा प्रतिष्ठा - तत्त्व है, विष्णु प्रशनायाशक्ति है तथा इन्द्रविक्षेपणशक्ति है । [ ५४६ ]

पृष्ठ 564

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तृतीय काण्ड ( अ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण विष्णु व इन्द्र द्वारा प्रदान- विसर्गात्मक यज्ञ होता रहता है । यज्ञ में विष्णु का प्राधान्य होने विष्णु को यज्ञ कहा जाता है । अशनायाशक्तिरूप विष्णु के कारण पृथ्वी - केन्द्रस्थ अग्नि २१ वें अहर्गण तक वितत रहता है किन्तु पृथिवी - पिण्ड का वाक् प्राण ३३ वें अहर्गण तक जाता है । इनमें १७ वें अहर्गण तक अग्नि की सत्ता है तथा इसके बाद ३३ वें अहर्गण तक सोम की सत्ता है । विरल रूप में परिणत अग्नि के जो १२ भेद १२ आदित्य रूप से कहे गये हैं, उनमें अन्तिम भेद विष्ण्वात्मक अग्नि ही है । १७ वें अहर्गण तक ही अग्नि केन्द्र से बद्ध रहती है । इसीलिए १७ वाँ ग्रहण अग्नि रूप विष्णु का मस्तक है । किन्तु इसमें सोम की प्राहुति होने पर उस अग्निरूप विष्णु का केन्द्र से सम्बन्ध टूट जाता है और वह प्रवर्ग्य बन कर सोम की घनावस्थारूप पानी में प्रविष्ट हो जाता है । यही यज्ञरूप विष्णु का शिरश्छेद है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है कि विष्णु के कटे हुए मस्तक का रस प्रवर्ग्य बन कर प्रतिस्विक रूप से विद्यमान अग्नि से अलग हो कर जल में प्रविष्ट हो गया । उसी यज्ञ - रस के कारण जल का बहाव होता है । इससे यह सिद्ध होता है कि जल में सांसि-fasara नहीं है अपि तु जल में प्रविष्ट विरलाग्निरूप यज्ञ - विष्णु के मस्तक के रस के कारण है । घनाग्नि का जल में प्रवेश बर्फ का कारण बनता है तथा विरलाग्नि का प्रवेश जल में द्रवीभाव का कारण है ॥१ ॥

वसतीवरी पानी ही यज्ञ - रस विद्यमान होने से यज्ञोपयोगी है । बन्द जल में वरुण - प्रवेश के कारण असुर - भाव रहता है, क्यों कि बन्धन वरुण का ही धर्म है । सोम, बिना यज्ञ रस के पूर्ण है क्योंकि उसका यज्ञ रस प्रवर्ग्य बन कर जल में प्रविष्ट हो गया है । अतः वसतीवरी पानी के द्वारा यजमान गये हुए यज्ञ रस का यज्ञ में आधान कर सोमयाग को रसवान् बनाता है, जिससे सोम की अकृत्स्नता न रहे || २ ||. यह सुत्यायाग प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन व सायंसवन इन तीनों में विभक्त है अतः Tedia पानी को तीनों सवनों में विभक्त करना तीनों सवनों को रसवान् बनाना है ॥ ३ ॥

क्यों कि यज्ञ का जो रस चला गया था वह स्रवणशील था, अतः स्रवणशील पानी का ही ग्रहण करना चाहिए जो दिव्य पानी होने से देवकार्यरूप यज्ञ में काम आ सकता है । बन्द पानी में वारुण श्रासुर भाव के प्रवेश के कारण दिव्यता नहीं रहती है ॥ ४ ॥

यदि यज्ञ - रस को सम्मिलित नहीं किया जाएगा तो यज्ञ - स्वरूप की रक्षा नहीं होगी । न बहने वाले कूप आदि के जल हैं वे सब अपने स्वरूप से च्युत हो कर मिट्टी के रूप में परि-त हो जाते हैं । बहने वाला वायु भी कभी गर्म, कभी शीत हो कर स्व - स्वरूप से च्युत हो जाता है, किन्तु बहने वाले जल कभी स्व - स्वरूप से च्युत नहीं होते । अत: इन्हीं बहते हुए काही ग्रहण करना चाहिए ॥ ५ ॥

वसतीवरी जलों को दिन यज्ञ - रस ही, बहता हुआ पानी ही है, ही लाना चाहिए न कि रात्रि में, क्यों कि रात्रि में यह यह निश्चय नहीं हो पाता । वसतीवरी जल में ही सारे [ ५५०

पृष्ठ 565

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तृतीय काण्ड ( अ ० e ) शतपथ ब्राह्मण बसतोवरी ब्राह्मण देवता आ कर प्रतिष्ठित होते हैं, क्यों कि सूर्य की रश्मियाँ ही सारे देवता हैं । वे दिन में ही

इस जल में प्रतिष्ठित रहते हैं । अतः दिन में ही वसतीवरी जल को लाना चाहिए ॥ ६ ॥

सौर आग्नेय प्राणों का नाम ही दिन है । जिस दिन यह यजमान यज्ञ करना चाहता है, उसके पहले दिन सारे देवता इस यजमान के घर में आ कर बस जाते हैं क्यों कि सभी देवता आग्नेय एवं सोमाभिलाषी हैं । यजमान सूर्यास्त से पूर्व ही वसतीवरी जल को ग्रहण कर उसे एक पात्र में रख यज्ञशाला में प्रतिष्ठित कर देता है । जल के सम्बन्ध से पात्र भी वसतीवरी ही कहलाता है । वसतीवरी देवताओं के ठहरने का स्थान है, क्यों कि वह जल देव-की ही वस्तु है । सारे देवता आते ही वसतीवरी जल में प्रविष्ट हो जाते हैं । ये देवता सुत्या से एक दिन पूर्व आ जाते हैं अतः सुत्या से पूर्व दिन को ' उपवसन्ति देवा यस्मिन् दिने वसतीवरीम् ' इस व्युत्पत्ति से ' उपवसथ ' कहते हैं ॥ ७ ॥

यदि किसी परिस्थितिवश सूर्यास्त से पूर्व वसतीवरी जल का ग्रहण न किया जा सके तो उसके लिए यह प्रायश्चित है कि यदि उस यजमान ने पहले सोमयाग किया है उस समय जो अवशिष्ट वसतीवरी जल पात्र में गंगाजल की तरह बंद कर रक्खा हुआ है उस जल को ग्रहण कर ले । यदि यजमान ने पहले यज्ञ नहीं किया है और किसी पड़ोसी ने यज्ञ किया है, तो उसके घर से और यदि पड़ोसी भी ऐसा न मिले तो किसी दूरवर्ती, सोमयाग किये हुए पुरुष के घर से वसतीवरी पानी ले आए ॥ 5 ॥

यदि उक्त सभी उपायों से वसतीवरी जल प्राप्त नहीं हो सके तो एक जलता हुआ पूला लेकर जल के किनारे पर चला जाए और उसे पानी पर घुमाता जाए और उस पानी को ग्रहण करे । अथवा एक सुवर्णशकल को जल पर घुमाता हुआ पानी ग्रहरण कर ले, क्यों कि प्रकाश सूर्य की वस्तु है तथा पृथिवी में गृहीत सूर्य - रश्मि ही सुवर्ण होने से सूर्य का रूप है । अतः ऐसे वसतीवरी पानी का ग्रहरण करना है ॥ ६ ॥

वह ध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ वसतीवरी जल को ग्रहण करता है— ' हविष्मतीरिमा आप: ' इति । श्रर्थात् ये जल देवताओं के हविरूप हैं । वास्तव में ये जल देव -तानों के उपवसथ हैं, अतः देवभोग्य होने से हवि रूप हैं । सोमाभिषव करते समय इस वस-तीवरी का सम्बन्ध सोम से किया जाता है । अतः हषि सम्बन्ध के कारण भी वसतीवरी जल हवि रूप है । फिर ' हविष्मा ३ प्रविवासति ' - अर्थात् वसतीवरी जल से निष्पन्न सोम से यज्ञ करने वाला है, अतः यजमान भी हविष्मान् कहलाता है । यज्ञ का जो रस जल में प्रविष्ट हो गया था, वसतीवरी पानी के ग्रहण के द्वारा उसे यज्ञ में सम्मिलित कर यज्ञ की कृत्स्नता का सम्पादन करता है ॥१० ॥

फिर निम्नलिखित मन्त्र - शेष का उच्चारण करता है - ' हविष्मान् देवो अध्वर: ' । यज्ञ को ही ध्वर कहते हैं । इस यज्ञ के लिए हविष्मती वसतीवरी पानी के ग्रहरण से यजमान यज्ञ को हविष्मान् बनाता है ॥ ११ ॥

[ ५५१ ]

पृष्ठ 566

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तृतीय काण्ड ( श्र ० é ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मणं पश्चात् ' हविष्माँ ३ अस्तु सूर्य: ' इस मन्त्र - शेष का उच्चारण करता है । अर्थात् सूर्य हविष्मान् हो । वसतीवरी का ग्रहरण सौर - रश्मि - रूप प्राणदेवताओं के लिए है तो इन सौर-रश्मि रूप देवताओं के प्रभव सूर्य के लिए इस वसतीवरी पानी का ग्रहण स्वतः सिद्ध है ॥ १२ ॥

उस वसतीवरी जल को यज्ञशाला में ला कर उच्चरित - ' अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि ' मन्त्र का अर्थ है कि शीर्णगृह वाले अग्नि के स्थान में मैं तुम्हें रखता हूँ । जैसे पार्थिवाग्नि काशी यह पृथिवी है वैसे यज्ञाग्नि का अशीर्णगृह गार्हपत्य है । गार्हपत्य पृथिवी - स्थानीय है । यही अग्नि का अशीर्ण ( नहीं नष्ट होने वाला ) गृह है । अग्नीषोमीय पशु की वपा की हुति के बाद हाथ धोए जाते हैं । उस समय पशु के अन्य अवयवों की आहुति से पूर्व ही वपामार्जनान्त में वसतीवरी जल लाया जाता है तथा गार्हपत्य के पश्चिम भाग में रख दिया जाता है । तब पशुयाग सम्बन्धी अन्य कर्म होते हैं । जाघनी से पत्नी संयाजान्त कर्म करने के बाद जब पशुयोग समाप्त हो जाता है तब गार्हपत्य के पश्चिम भाग में रखे हुए वसतीवरी जल को उत्तरावेदि को ओर ले जाने के लिए उठाते हुए वेदि - मध्य में स्थित दीक्षितों को अध्वर्यु ' चलो, चलो, चलो ' इस प्रकार तीन बार कहता है । वसतीवरी में स्थित ' सारे ' देव-तानों के चलने के समय यज्ञ में स्थित दीक्षित कैसे बैठे रह सकते हैं? उन्हें भी देवताओं की सेवा में चलना ही होगा । वहाँ हविर्धान- मण्डप के पास दोनों शकटों के मध्य में बैठा हुआ यजमान उस वसतीवरी जल को अपने हाथ में ले लेता हैं ॥१३ ॥

हविर्धा - मण्डप के दक्षिण द्वार से वसतीवरी जल हाथ में लिये हुए यजमान निकलता है और उत्तरावेदि की दक्षिण श्रोणि में ' इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस जल को रख देता है । पार्थिव देवताओं में अग्नि प्रधान है तथा सौर देवताओं इन्द्र । इन्द्र और अग्नि में ही सारे देवता हैं । अतः सारे देवतानों के लिए वसतीवरी पानी का ग्रहण होता है । इसके बाद यजमान वसतीवरी पानी को दक्षिण श्रोणि से उठा कर हविर्धान के पुरोदेश में बैठी हुई पत्नी के आगे रख देता है और पत्नी के पश्चिम भाग से आ कर पत्नी के आगे रखे हुए वसतीवरी को वह यजमान अथवा उसका प्रतिनिधि अध्वर्यु ले लेता है ॥ १४ ॥

जल को लेकर वह हविर्धान- मण्डप में प्रविष्ट हो जाता है । वहाँ से उत्तर द्वार से निकल कर उत्तरवेदि की उत्तरोरिण पर उसे रख देता है । यहाँ पर तैत्तिरीय संहिता वाले ' मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराश्रोणि पर वसतीवरी पानी को रखते हैं क्यों कि उनके मत में वपामार्जन के अन्त में नहीं, अपितु पशुयाग- समाप्ति के बाद वसतीवरी का ग्रहण होता है । ऐसी स्थिति में " अग्नेर्वोऽपन्न गृहस्य सदसि सादयामि ' यह मन्त्र उनके मत में कम हो जाता है क्यों कि वह वसतीवरी को महावेदि के गार्हपत्य में स्थापित करने का है । इस प्रकार ७ मन्त्रों की अपेक्षा कुल ६ मन्त्र रह जाते हैं जिससे ७ [ ५५२ ] 1

पृष्ठ 567

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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण मन्त्रों से होने वाली शक्वर - सम्पत्ति नहीं मिलेगी । उस न्यूनता की पूर्ति के लिए वसतीवरी उत्तरा श्रोणि में रखते हुए ' मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ ' इस मन्त्र का उच्चारण करते हैं । किन्तु ऐसा करना उचित नहीं, क्यों कि ७ मन्त्रों के स्थान में ८ मन्त्र हो जाएँगे तथा इस मन्त्र के उच्चारण से सारे देवताओं का ग्रहण नहीं होता, जब कि पूर्वोक्त ' इन्द्रवरुणयोर्भाग-धेयी स्थ ' मन्त्र द्वारा सारे देवताओं के लिए वसतीवरी का ग्रहरण हो जाता है । अतः ' इन्द्रा-योर्भागधेयी स्थ ' इसी मन्त्र से उत्तरा श्रोणि पर वसतीवरी का सादन करना चाहिए । इसी तैत्तिरीय मत का भगवान् याज्ञवल्क्य ने ' नैवं सादयेदतिरिक्तमेतत् नैवं सम्पत् सम्पद्यते ' के द्वारा निराकरण किया है ॥ १५ ॥

उपर्युक्त रीति से वसतीवरी जल को दक्षिण, पश्चिम, उत्तर तीनों तरफ ले जाया जाता है और इसका प्रयोजन यज्ञ- रक्षा है । पानी नाष्ट्रा राक्षस प्राणों का विनाशक है क्यों कि जल वज्र - रूप है । इसीलिए सन्ध्या करते समय यज्ञ - रूप शरीर की रक्षा के लिए ' पोमामभिरक्षन्तु ' कह कर जल का सम्बन्ध किया जाता है । इस तरह वसतीवरी पानी को दक्षिण, पश्चिम, उत्तर दिशा में घुमा कर, उत्तरा श्रोणि से उस जल को उठा कर आग्नी-धी में - निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रतिष्ठित कर देते हैं - ' विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ ' इति । अर्थात् आग्नीध्रीय में प्रतिष्ठित इस वसतीवरी जल में सारे देवता प्रतिष्ठित रहते हैं । इस जल का नाम वसतीवरी इसलिए पड़ा है कि यत्र - तत्र बसने वाले देवताओं का यह जल श्रेष्ठ स्थान है । अतः ' वसतां वरम् ' इस व्युत्पत्ति से इस जल को वसतीवर कहा जाता है । जो इस विज्ञान को जानता है वह भी बसने वाले मनुष्यादि में श्रेष्ठ बन जाता है ॥१६ ॥

इस प्रकार वसतीवरी ग्रहण से ले कर उसके प्राग्नीध्रीय में स्थापनपर्यन्त सात यजु-मन्त्र हो जाते हैं । वसतीवरी पानी के ग्रहण के समय बोले जाने वाले चार मन्त्र - ( १ ) ' हविष्मतीरिमा आप: ' ( २ ) ' हविष्माँ ३ आविवासति ' ( ३ ) ' हविष्मान् देवो अध्वर: ' ( ४ ) हविष्मां ३ प्रस्तु सूर्य: ये हैं । महावेदि के गार्हपत्य के पश्चिम भाग में वसतीवरी के स्थापन का यजुर्मन्त्र ( ५ ) ' अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि ' है । उत्तरावेदि की दक्षिण श्रोणि, हविर्धा के पुरोदेश में बैठी हुई पत्नी के पश्चिम भाग से ला कर पत्नी के आगे रखने तथा उत्तरावेदि की उत्तर श्रोणि में रखने के लिए प्रयुक्त होने वाला यजुर्मन्त्र ( ६ ) ' इन्द्राग्न्योर्भाग-धेयी स्थ ' यह है । पश्चात् प्राग्नीध्र में वसतीवरी के स्थापन के समय उच्चारण किया जाने वाला यजुर्मन्त्र ( ७ ) ' विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ ' यह है । छन्द वाक्छन्द तथा अर्थच्छन्द भेद से दो प्रकार के हैं । उनमें वाकू से ही उत्पन्न होने वाले वाक्छन्द सात हैं । इन में सब से अन्तिम छन्द शक्वरी है तथा उसके ७ पद ( चरण ) हैं । शक्वरी - साम वाग् - रूप यज्ञ - मण्डल की समाप्ति है । उस वाग् - रूप यज्ञमण्डल को वाचिक छन्द से पकड़ कर सारी यज्ञ - सम्पत्ति को आत्मसात् करने के लिए सात यजुर्मन्त्र बोले जाते हैं ॥ १७ ॥

[ ५५३ ]

पृष्ठ 568

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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण [ विज्ञान भाष्य ] पशु - याग करीब - करीब समाप्त हो चुका । इसके अनन्तर " सत्या " याग होगा । सुत्या - याग में - प्रातः - सायं मध्याह्न भेदेन प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन एवं सायंसवन - तीन सवन । तीनों में सोम की आहुति दी जाती है, अतएव इस कर्म को " सुत्या " किं वा सवन कहा है । सोमाहुति के लिए सोमवेलड़ियाँ रहती हैं । उनको काट कर प्रादेश मात्र ( १० अंगुल ) जितनी बना ली जाती हैं- एवं ऐसे - ऐसे कई टुकड़ों का एक -एक अंशु ( पूला ) बना लिया जाता है । बाद में हविर्धान-मण्डप से दक्षिणशकट के दक्षिण भाग में उपरव के ऊपर रखा हुआ जो सिल्ला है उस पर उसी उपरव पर रक्खे हुए चार ( ४ ) पत्थरों से इन पूलियों को कूटा जाता है - कूट कर उनका रस निकाला जाता है । उस समय पानी का उपयोग होता है । सोम को कूट कर रस निकालने के लिए पानी की श्राव-श्यकता पड़ती है । बस - सोमाभिषवार्थ यज्ञ में जो पानी काम में लाया जाता है, उसे " वसतीवरी " कहते हैं । बहते हुए पानी का नाम " वसतीवरी " है । बहते हुए पानी में देवप्रारण ( आग्नेय - प्राण ) बसता है अतएव इसे - ' वसतीवरी ' कहते हैं । जिसमें देवप्राण बसता है - वह ' वसतीवर ' कहलाता है, स्त्रीत्व-विवक्षा में वही " वसतीवरी " कहलाने लगता है । बस - यज्ञ में सोमाभिषवार्थ जो वसतीवरी पानी लाया जाता है, इस ब्राह्मण में उसी की इतिकर्तव्यता बतलाई जाएगी । श्रग्निषोमीय पशु की वपा की हुति के अनन्तर इस वसतीवरी को ग्रहण करना चाहिए । अग्नीषोमीय पशु - वपा की आहुति के अनन्तर अध्वर्यु को हाथ धोने पड़ते हैं । बस - जिस समय वपा मार्जना करे तभी वसतीवरी ले श्राना चाहिए । यही वसतीवरी ग्रहण करने का समय है, जैसा कि भगवान कात्यायन कहते हैं-" अग्नीषोमीयस्य वपामार्जनान्ते वसतीवरी ग्रहणम् " । ( का ० श्री ० सू ० ८।२४८ ) हमने बतलाया है कि बहते हुए पानी में देवता बसते हैं । अतएव वही " वसतीवरी " कहलाता है । आज यज्ञ में उसी वसतीवरी पानी को लाते हैं । अब वहाँ पर वसतीवरी पानी ही लाने की क्या आवश्यकता है? ' कूपादि बन्द स्थानों के जल से ही सोमाभिषव क्यों नहीं कर लिया जाता? ' यह प्रश्न होता है; इसी प्रश्न का उत्तर दिया जाता है । इस प्रश्न का उत्तर दिया जाए - इसके पहले पौराणविक हयग्रीवावतार कथा का स्मरण कर लेना चाहिए । यदि यह कथा श्रापके स्मरण से अलग हो गयी है तो थोड़े शब्दों में हम उसका आपको स्मरण दिला देते हैं-देवता और असुर दोनों ही भगवान् प्रजापति की सन्तान थे । दोनों ही में परस्पर घोर विरोध रहता था । असुर चाहते थे देवता नष्ट हो जाएँ तो हम असपत्न राज्य करें । देवता चाहते थे- असुर नष्ट हो जाएँ तो हम प्रसपत्न राज्य करें । बस इसी राज्य लालसा से इन दोनों में सदा ही तना - तनी चला करती थी । देवताओं के राजा इन्द्र थे । जब इन्द्र देखते थे कि अब असुरों से मोर्चा लेना कठिन है तो वे ब्रह्मा से प्रार्थना करते थे । ब्रह्मा जी यदि उस काम को अपने बूते के बाहर समझते थे तो वे इन्द्र को साथ लेकर पशुपति रुद्र भगवान् के पास जाते थे । यदि वे भी इस काम को कठिन पाते थे तो [ ५५४ ] 1

पृष्ठ 569

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मणं वे सब को साथ ले कर विष्णु लोक में भगवान् विष्णु के पास जाते थे । बस, भगवान् विष्णु अन्त में उन असुरों का संहार कर देवताओं के क्लेश निवृत्त करते थे । एक समय - असुरों का ऐसा प्रबल आक्रमण हुआ जिसे देख कर इन्द्र घबरा गए - घबरा कर ब्रह्मा के पास आए । ब्रह्मा जी रुद्र भगवान् पास आए - रुद्र भगवान् विष्णु के पास श्राए और सारी घटना कह सुनाई । उसी समय विष्णु भगवान् असुरों का विनाश करने के लिए चल पड़े । वहाँ पहुँच कर थोड़े ही दिनों में सारे असुरों का संहार कर डाला । असुर चूंकि बहुत थे, अतएव विष्णु भगवान् उन्हें मारते - मारते थक गए । अन्त में जब लड़ाई खत्म हो गई तो थकान के कारण विष्णु भगवान् अपने धनुष की चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा पर मस्तक रख कर गहरी निद्रा में निमग्न हो गए । इधर विष्णु भगवान् सोए, उधर से - इधर - उधर बिखरी हुई सेना को इकट्ठी कर असुरों ने दुबारा श्राक्रमण कर दिया । इन्द्र फिर घबराए - घबरा कर ब्रह्मा के पास पहुँचे - ब्रह्मा रुद्र के पास पहुँचे । रुद्र ने कहा कि भाई यह काम हमारे बस का नहीं है । इसके लिए तो " विष्णु भगवान् " के पास ही चलना चाहिए । यह कह कर - इन्द्र - रुद्र ब्रह्मा - तीनों भगवान विष्णु के पास आए । उस समय प्रत्यञ्चा पर अपना मस्तक रक्खे विष्णु भगवान् सो रहे थे । अब उन्हें कैसे जगाया जाए - यह चिन्ता आ पड़ी । आखिर ब्रह्मा ने इसका उपाय ढूंढ निकाला । उन्होंने उसी समय एक उपदीका नामक कीट ( दीमक ) उत्पन्न किया । इसी उपदीका को ' बंबी ' भी कहा जाता है । इस प्रकार उसे उत्पन्न किया । उत्पन्न कर उसे प्राज्ञा दी कि तुम धनुष पर लगी हुई इस प्रत्यञ्चा को काट दो । उसने ' जो प्रज्ञा ' कह कर काटना शुरू किया । बस - जहाँ वह प्रत्यचा कटी कि उसका जोर से धक्का लगा । धक्के के साथ ही उस पर रक्खे हुए विष्णु भगवान् का मस्तक कट कर आकाश में उड़ गया । कहाँ ब्रह्मा ने असुर विनाशार्थ विष्णु को जगाने के लिए यह उपाय किया था - कहाँ यह काण्ड हो गया । मस्तक कटा देख तीनों ही घबराए । परन्तु आाखिर तो तीनों ही विचित्र शक्तियाँ थीं । उसी समय एक घोड़े को मँगवाया एवं उसका मस्तक काट कर विष्णु के धड़ से जोड़ दिया । बस यही भगवान् " हयग्रीव " कहलाए एवं इन्होंने सारे असुरों का विनाश किया । बस, पुराणों में ' हयग्रीवावतार ' की कथा इस प्रकार बतलाई जाती है । वैदिक धर्म्म - यज्ञ को ही पुराण में " हयग्रीवावतार " की कथा में उपनिबद्ध किया गया है । पूर्वोक्त कथा सर्वथा वैज्ञानिक है, जिसका विस्तृत विवेचन हम धर्मयाग में ( जो कि धर्मयाग प्रवर्य नाम से भी प्रसिद्ध है ) करेंगे । यहाँ पर उसका थोड़ा सा दिग्दर्शन मात्र कराया जाता है-" विष्णु का मस्तक कट गया " इसमें सर्वप्रथम " विष्णु क्या है " यह समझ लेना चाहिए | पूर्व के ब्राह्मणों में हमने बतलाया है कि यज्ञ को विष्णु कहते हैं । संसार के जितने भी पदार्थ हैं - उन सब में प्रदान विसर्गात्मक यज्ञ हो रहा है । प्रत्येक पदार्थ की ओर न जा कर हमें सूर्य और पृथिवी की र ही चलना चाहिए । सूर्य्य में भी आदान विसर्गात्मक यज्ञ हो रहा है एवं पृथिवी में भी प्रादानविसर्गा • त्मक यज्ञ हो रहा है । प्रत्येक पिण्ड के केन्द्र में षोडशी प्रजापति रहता है जिसका कि स्वरूप पूर्व के " पश्वेकादशिनी " ब्राह्मण में बतला दिया गया है । उस षोडशी पुरुष की अक्षर नाम की पराप्रकृति है, उसकी ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र अग्नि- सोम ये पाँच कलाएँ हैं । इन पाँच में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ये तीन तो अन्त-मी हैं - हृद्य हैं एवं अग्नि, सोम प्रजापति हैं । इस प्रकार एक ही अक्षर अन्तर्य्यामी और प्रजापति- इन [ ५५५ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण दो भागों में विभक्त रहता है । अन्तर्यामी हृदय के अन्दर केन्द्र में बैठा हुआ सारे पिण्ड का नियमन किया करता है । इन तीनों में प्रतिष्ठा तत्त्व का नाम ब्रह्मा है- विशेषरण शक्ति का नाम इन्द्र है-शनाया शक्ति का नाम विष्णु है । इन्द्र हर वक्त केन्द्र से वस्तु को बाहर फेंका करते हैं एवं विष्णु बाहर से अन्न ला कर उस कमी को पूरा किया करते हैं । विष्णु प्रदान किया करते हैं - इन्द्र विसर्ग किया करते हैं । ये दोनों काम उस ब्रह्मा - प्रतिष्ठा पर हुआ करते हैं । जब तक ब्रह्म - प्रतिष्ठा न हो तब तक कोई भी पदार्थ प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । एवं जब तक ब्रह्म सत्ता का प्रादुर्भाव नहीं होता है, तब तक नई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती । श्रतएव " ब्रह्म व सर्वस्य प्रतिष्ठा " " ब्रह्म वे सर्वस्य प्रथमजम् ' - यह कहा जाता है । इस ब्रह्म - प्रतिष्ठा पर इन्द्र और विष्णु का श्रादान - विसर्गात्मक यज्ञ होता रहता है । इन्द्र अग्नि को बाहर फेंका करता है-विष्णु सोम को बाहर से लाया करते हैं । इस प्रदान - विसर्ग से पृथिवी पिण्ड का अमृत - प्राण बड़ी दूर तक वितत हो जाता है । जहाँ तक पार्थिव प्रारण वितत होता है उसे ही साहस्र - मण्डल कहते हैं । वही वषट्कार - मण्डल कहलाता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः । • इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम् " । ( ऋग्वेद मं ० ६६६८ ) इस साहस्र - मण्डल में तीस ( ३३ ) विभाग करा लिए जाते हैं । ये ही तेतीस ( ३३ ) तन्तु कह-लाते हैं -- ये ही तेतीस ( ३३ ) अहर्गण कहलाते हैं- ये ही तेतीस ( ३३ ) स्तोम्य सौम्य देवता कहलाते हैं । इन्हीं तन्तु रूप तेतीस ( ३३ ) देवताओं का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-अपिच " त्रयस्त्रिशतन्तवोऽयं वितन्वते इमं च यज्ञं स्वधया ददन्ते । तेषां छिमपि यदत्र स्वाहा यज्ञो प्रप्येतु देवान् " ( मैत्रा ० सं ० २ | ७ | १ ) " स्त्रशतन्तवो ये वितत्निरे य इमं यज्ञं स्वधया ददन्ते । तेषां छिन्नं प्रत्येतद्दधामि स्वाहा घर्मो देवां प्रप्येतु " । ( तै ० सं ० १।५।१० ) इन तेतीस ( ३३ ) में सतरह ( १७ ) तक अग्नि रहता है - तेतीस ( ३३ ) तक सोम रहता है । इस प्रकार अग्नि सोम तो हृदय से बाहर तेतीस ( ३३ ) तक व्याप्त रहते हैं एवं ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र- ये हृदय में बैठ कर नियमन किया करते हैं । पृथिवी के यच्चयावत् जड़ - चेतन पदार्थों की उपलक्षकता समझनी चाहिए । संसार के यच्चयावत् पदार्थों में वषट्कार मोजूद हैं । सब में पाँचों अक्षर मौजूद हैं । चूँकि ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र- तीनों अन्तर्य्यामी होने के कारण बाहर नहीं दिखलाई पड़ते । विश्वस्वरूप अग्नि - सोम [ ५५६ ]