Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 571–580

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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-तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) १ ' रामपूर्व ० उप ० ३।६ ' । ३ ' ऐ ० ब्रा ० अ ० १।१५ ' । शतपथ ब्राह्मण २ ' तां ० ब्रा ० ६।६।१० ' । ४ ' ऐ ० ब्रा ० १।१६ ' । [ ५५७ ] वसतीवरी ब्राह्मण १७ वें ) अहर्गण श्रतएव " सप्तदशो यज्ञ का स्वरूप सत-देव - संपत्ति के लिए प्रो ' श्रा -७ " इतने अक्षरों का प्रयोग ( संस्था में ) विभक्त यज्ञ-से ही बना हुआ है - वे तीनों तो हृद्य हैं । बाहर स्थूल जगत् में अग्नि - सोम का ही राज्य है, " अग्नीषोमात्मकं जगत् १ यह कहा जाता है । अतएव हाँ तो हम कह रहे थे कि तेतीस ( ३३ ) वाले वषट्कार में सतरह ( १७ ) तक अग्नि की सत्ता रहती है । सतरह ( १७ ) तक अग्नि - पिण्ड केन्द्र से बद्ध हो कर अपने प्रातिस्विक स्वरूप में रहता है । एवं सतरह ( १७ ) से ऊपर तेतीस ( ३३ ) तक सोम रहता है । वह सोम चूंकि इस सतरहवें ( १७ वें ) स्थान में रहने वाले अग्नि में आहुत होता है, अतएव इस सप्तदशाग्नि को " आहूयते यत्र सोम: " इस व्युत्पत्ति से " ग्राहवनीय " कहा जाता है । अग्नि दाहक पदार्थ है, सोम- स्प्रिंट- दारु - राल - इत्यादि पदार्थों की तरह पदार्थ है । ग्नि में प्राहुत होते ही वह जल पड़ता है । श्रग्नि में राल के पटकने से जैसे अग्नि की ज्वाला बड़ी दूर तक चली जाती है तथैव इस अग्नि में जब सोम की आहुति होती है तो यह सत्त-रहवाँ ( १७ वाँ ) अग्नि प्रज्वलित हो कर इक्कीस ( २१ ) तक चला जाता है । शुद्ध अग्नि सतरह ( १७ ) तक ही है । परन्तु सोम- मिश्रित अग्नि इक्कीस ( २१ ) तक रहता है । अग्नि का ऊपर जाना विष्णु का काम है । अग्नि ही एक प्रकार की प्रशनाया है- भूख है । पार्थिव विष्णु - सोम को आहत करने के लिए अग्नि को अशनाया स्वरूप में परिणत कर सतरह ( १७ ) तक ले जाते हैं । वहाँ पर जब सोम आहुत होता है तो अग्नि इक्कीस ( २१ ) तक व्याप्त हो जाता है । अतएव विष्णु सत्ता इक्कीस ( २१ ) तक मान ली जाती | नो ( 8 ) तक विष्णु का पहला विक्रम है, पन्द्रह ( १५ ) तक दूसरा विक्रम है-इक्कीस ( २१ ) तक तीसरा विक्रम है । नौ ( ९ ) तक पृथिवी - लोक है - पन्द्रह ( १५ ) तक अन्तरिक्ष - लोक है - इक्कीस ( २१ ) तक द्युलोक है । तीनों लोकों को विष्णु भगवान् तीन विक्रमों से नाप लेते हैं । अस्तु, इस समय इस विषय को हम अधिक नहीं बढ़ाना चाहते । कहना हमें यहीं है कि अग्नि में सोम की प्राहुति पड़ने का नाम ही यज्ञ है । प्रतएव हम यज्ञ - संपादकत्वेन अग्नि को ' यज्ञ ' कह सकते हैं । यह । अतएव श्रुतियों में बार - बार " यज्ञो वै विष्णु: " २ " विष्णुर्वे यज्ञः " 3 प्रति विष्णु - स्वरूप है - यही यज्ञ है यह लिखा रहता है । इस विष्णु यज्ञ की - पार्थिवाग्नि की - प्रातिस्विक सत्ता सतरहवें ( तक रहती है । यज्ञ - प्रजापति सतरह ( १७ ) तक ही प्रातिस्विकरूपेण रहता है । वै प्रजापति " ४ यह कहा जाता है । यज्ञ भगवान् सतरह ( १७ ) तक रहते हैं । रह ( १७ ) तक ही अभिव्याप्त रहता है, प्रतएव इस - सतरह ( १७ ) पर * अस्तु श्रौषट् " ये ' ज १ ° ये १ १ ८ १ २ जा १३ म १४ हे १५ वौ १ ६ षट् १७ किया जाता है । इन सतरह ( १७ ) अक्षरों से सतरह ( १७ ) ही अक्षर में प्रजापति पकड़ में आ जाता है । इसीलिए कहा जाता है-" चतुभिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरे वचं । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ " इति ।

पृष्ठ 572

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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण संपूर्ण प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि यह यज्ञ भगवान् विष्णु भगवान् श्रग्नि- प्राति स्विक रूपेण सत्यरूप से सतरह ( १७ ) तक ही रहते हैं । सतरह ( १७ ) के ऊपर तेतीस ( ३३ ) तक सोम रहता है । इस सतरह ( १७ ) में जब सोम बहुत होता है तो यह अग्नि प्रज्वलित हो कर इक्कीस ( २१ ) तक चला जाता है । सतरह ( १७ ) से प्रारम्भ कर पच्चीसवें ( २५ वें ) अहर्गण तक इस प्रति से एक नया यज्ञ होता है । यही यज्ञ ' नवाह ' कहलाता है । इस नवाह यज्ञ के ठीक केन्द्र में " भगवान् " सूर्य " हैं । इक्कीसवें ( २१ वें ) अहर्गण पर सूर्थ्य रहते हैं, अतएवं " एकविशस्तपति " यह कहा जाता है । कहना हमें यही है कि सतरह ( १७ ) से ऊपर अग्नि और सोम दोनों रहते हैं । सोम की जो घना -वस्था है - वह पानी कहलाती है । अतएव हम इसे भी पानी कहने के लिए तय्यार हैं । संतरह ( १७ ) इक्कीस ( २१ ) तक यही श्रग्निमिश्रित तेजस्वी पानी रहता है । इतनी दूर का पानी ज्योतिष्मान् रहता है । बस, सतरह ( १७ ) से इक्कीस ( २१ ) तक जो अग्निमिश्रित ज्योतिष्मान् प्राप्य प्राण है - वही " वेन " कहलाता है । इसी ' वेन ' का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-" प्रयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इमां संगमे सूर्य्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति " - इति ॥ ( ऋग्वेद मं ० १०।१२३।१ ) इस पानी में जो अग्नि प्रविष्ट रहता है वह केन्द्र से अलग हो जाने के कारण - प्रवर्ग्य बन जाने के कारण - " ऋत " कहलाता है । ऋत और सत्य - सारे विश्व में ये ही दो तत्त्व हैं । केन्द्र से बद्ध सहृदय सशरीरी तत्त्व ' सत्य ' कहलाता है एवं अशरीरी ऋत कहलाता है । सतरह ( १७ ) तक रहने वाला अनि केन्द्र से बद्ध रहने के कारण ' " सत्य " कहलाता है एवं सतरह ( १७ ) से ऊपर का श्रापः - प्रविष्ट प्रग्निहृत्सूत्र से अलग हो जाने पर " ऋत " कहा जाता है । यज्ञ प्रग्नि का, जिसे कि विष्णु कहेंगे-सतरहवाँ ( १७ वाँ ) स्थान मस्तक है क्यों कि यहीं पर इसकी सूक्ष्मावस्था समाप्त होती है । यह भाग प्रवर्ग्य बन कर इक्कीस ( २१ ) तक चला जाता है । यज्ञ विष्णु का शिरोभाग ( अग्नि की किरणों, रश्मियों ) से ऊपर रहने वाले पानी में ( सोमरूप पानी में ) कट कर चला जाता है । कट कर जाना इस लिए कहा जाता है कि सतरह ( १७ ) से ऊपर के पानी में प्रविष्ट होने वाला अग्नि सत्य से च्युत हो ऋत बन जाता है । उसकी केन्द्र से पकड़ छूट जाती है । बस यही विष्णु भगवान् का मस्तक कटना है । पार्थिव किंवा सौर सप्तदश अग्नि यज्ञ ही विष्णु है । वही पानी में प्रविष्ट रहता । सतरह ( १७ ) से ऊपर रहने वाले पानी में यह यज्ञ - विष्णु चला जाता है । सारा ही नहीं चला जाता, अपितु सतरहवें ( १७ वें ) स्थान का अग्नि ही चला जाता है, अतएव " मस्तक कट गया " यह कहा जाता है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-जिस समय यज्ञ का मस्तक कट गया, उस समय छिन्नसिरस्क यज्ञ का रस बह निकला । वह रस बह कर पानी में प्रविष्ट हो गया । चूंकि यज्ञ रस दौड़ कर पानी में प्रविष्ट हुआ था - प्रतएव उसी द्रुत गतिमान रस प्रवेश के कारण पानी बहते रहते हैं । पानी का स्वभाव है - बहना - यह क्यों बहता है? [ ५५८ ] 1

पृष्ठ 573

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तृतीय काण्ड ( ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण इसका उत्तर है - यज्ञ - रस प्रवेश । बहता हुआ द्रुत यज्ञ रस ( अग्नि ) इस पानी में प्रविष्ट हो गया है-अतएव पानी बहता रहता है । इस विज्ञान से सिद्ध हो जाता है कि पानी में जो तरलता है वही अग्नि है । यदि पानी में से अग्नि निकाल दी जाए तो पानी उसी समय बरफ बन जाए । यद्यपि बरफ भी अग्नि से ही बनती परन्तु वह अग्नि यह यज्ञाग्नि नहीं है, अपितु ध्रुव श्रग्नि है । घन अग्नि केन्द्र की सत्ता त्रिवृत् तक है ही, रहती है । घन - अग्नि के प्रवेश से पानी बरफ बन जाता है- तरल अग्नि प्रवेश से वही बरफ जाती है । पानी का संघात एवं विलयन - दोनों तेजः संयोग पर निर्भर हैं । पिघलना, घन बनना पानी बन अग्नि के काम हैं । अतएव पदार्थ विज्ञान वेत्ता भगवान् करणाद कहते हैं—, दोनों " अपां संघातो विलयनं च तेजः संयोगात् " इति । ( ० ५२८ ) करणाद कहते हैं कि पानी का संघात एवं विलयन दोनों तेजः संयोग से होते हैं । तेजःसंयोग से ही पानी बरफ बन जाता है एवं तेजः संयोग से ही बरफ पानी बन जाता है । मुक्तावलीकार कहते हैं कि जल में सांसिद्धिक द्रवत्व है । जल का जो बहना है - वह प्राकृतिक है । वे बेचारे कभी भारतवर्ष को छोड़ कर बाहर गए नहीं थे । पानी के बहने के लिए जितनी गर्मी चाहिए उतनी गर्मी ग्रीष्म प्रधान भारतवर्ष में सदा उपलब्ध रहती है । श्रतएव सौभाग्य से यहाँ पानी जम नहीं पाता । बस, इसी पर विज्ञान का मर्म समझने वालों ने जल में सांसिद्धिक द्रवत्व बतला डाला । जहाँ सूत्रकार " अपां संघातो विलयनं च तेजः संयोगात् " कहते हैं, वहाँ हमारे नैयायिक- शिरोमणि पानी की द्रवता को सांसिद्धिक बतलाते हैं । वेद भगवान् कहते हैं कि पानी में जो तुम बहाव देख रहे हो वह इस यज्ञ रस ( अग्नि ) की महिमा है । नैयायिक महाशय कह रहे हैं कि पानी में द्रवता स्वाभाविक है - द्रवता पानी का अपना स्वरूप है । वेद सूत्र एक तरफ हैं - सांसिद्धिक द्रव्यत्ववादी दूसरी ओर हैं । दोनों में से किस की बात सच्ची है - इसका निर्णय हम अपने विज्ञ पाठकों पर ही छोड़ते हैं । हम कह रहे थे कि त्रिवृत् सोमस्थ घन - अग्नि से पानी जम जाता है एवं सप्तदशस्थ यज्ञ - मस्तक-भूत तरलाग्नि प्रवेश से पानी पिघल जाता है एवं बहने लगता है । यह द्रुतता भी दो प्रकार की है - एक तो बहते हुए पानी की द्रुतता - एक स्थिर पानी की द्रुतता । दोनों में फर्क है । इन दोनों में से जो बन्द पानी है - उसमें से यज्ञ रस निकलने लग जाता है । बंध वारुणधर्म है । जहाँ पानी को रोका गया कि वह प्रासुर हुआ । सुर - धर्म के प्रविष्ट होते ही वह यज्ञ - भाग निकल जाता है । अतएव जो बहता हुआ पानी है उसे ही हम देव - प्रारण निवासात् " वसतीवरी " कहेंगे - न कि बन्द पानी को । बन्द - पानी सुर होता है, अतएव श्रायुर्वेद मर्मज्ञ वाग्भट्ट कहते हैं-" न पिबेत् पंकशैवालतृणपर्णाविलास्तृतम् । सूर्येन्दुपवनादृतमभिवृष्टं घनं गुरु || " जो पानी बहने वाले हैं - उनमें चूंकि देवता रहते हैं - इस यज्ञ का हुत - भाग रहता है- प्रतएवं वाग्भट्ट कहते हैं -[ ५५६ ]

पृष्ठ 574

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तृतीय काण्ड ( ० ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण " पश्चिमोदधिजाः शीघ्रवहा याश्चामलोदकाः । पथ्याः समासप्ता नद्यो विपरीता स्वतोन्यथा - ॥ " इति । J पानी का जो बहाव है वह उस अग्नि का ही - यज्ञ - रस का ही बहाव है । चूंकि वह श्रग्नि स्थान बह की रहा है - प्रतएव हम इसे कटे मस्तक का रस कहने के लिए तय्यार हैं । यदि अग्नि उस सत्य पकड़ से अलग न होता तो पानी में प्रविष्ट ही कैसे होता? परन्तु हम पानी में अग्नि देख रहे हैं - अतएव का जो मानना पड़ता है कि यह अलग हुआ रस है । सारे कथन का निष्कर्ष यही है कि बहते हुए पानी -बहाव है - वह उसमें प्रविष्ट छिन्नमस्तक यज्ञ - रस का बहाव है । पानी नहीं बहता - प्रपितु - छिन्न शिरस्क है । यज्ञ - रस बहता हुआ जा रहा है । देवता सारे प्राग्नेय होते हैं - जैसा कि कई बार बतलाया " जा कहने चुका के लिए अतएव हम बहते हुए पानी को आग्नेय - प्रारण देवताओं के बसने के कारण - " वसतीवरी तय्यार हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत ( विच्छिन्नमभूत् ) । तस्य ( छिन्नशिरसो ' यज्ञस्य ) रसो द्रुत्वा ( धावित्वा ) प्रपः प्रविवेश । तेनैव तद्रसेन ( द्रुत यज्ञ रसेन )

श्रापः स्यन्दन्ते । तमेवैतद्रसं स्यन्दमानं मन्यन्ते ॥१ ॥

वैज्ञानिक लोग - विज्ञानवेत्ता महर्षि - पानी में उस यज्ञ रस को ही स्यन्दमान मानते हैं । वैज्ञानिकों का मत है कि पानी में जो बहाव है - वह पानी का बहाव नहीं है अपितु यज्ञ रस का बहाव है । यह रस ही बह रहा है || १ | आज यह यजमान यज्ञ करना चाहता है- सोमाहुति देना चाहता है । परन्तु वह सोम सतरह ( १७ ) के ऊपर रहने वाला सोम बिना यज्ञ - रस के अधूरा है । जब तक यज्ञ रस ( अग्नि ) उसमें प्रविष्ट न हो तब तक वह अपूर्ण है, क्यों कि वह तो पानी में प्रविष्ट हो गया है । बस उस अलग हुए यज्ञ-रस को इस सोम यज्ञ में सुत्या यज्ञ में शामिल कर सुत्या को सर्वाङ्गीण बनाने के लिए ही वसतीवरी पानी लाया जाता है । आज यह यजमान वसतीवरी की ओर ( उसे लेने के लिए ) जाता है । ऐसा करता हुआ वह उसी यज्ञ रस को समेट कर अपने सोम यज्ञ में स्थापित करता है । उससे यज्ञ को रसमुक्त बनाता है । बहते हुए पानी में यज्ञ का रस - भाग मौजूद है । उसके बिना यज्ञ अकृत्स्न रह जाता है । इस कृत्स्नता को मिटाने के लिए ही ' वसतीवरी ' पानी लाया जाता है - यही तात्पर्य है । " स यद् वसतीवरीच्छेति -- ( प्रभिमुखं गच्छति ) - तमेवैतद् रसमाहृत्य

यज्ञे दधाति । रसवन्तं यज्ञं करोति । तस्माद्वसतीवरीरच्छेति " ॥२ ॥

हमने बतलाया था कि सुत्यायाग प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन सायंसवन- इन तीनों सवनों में विभक्त है । सुत्यायाग त्रिपर्वा है । यज्ञ में आए हुए उन वसतीवरी जलों का तीनों सवनों में विभाग कर देते हैं । ऐसा करता हुआ यजमान सारे सवनों में रसाधान कर देता है - सबको रस युक्त बना देता [ ५६० ] 1

पृष्ठ 575

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तृतीय काण्ड ( श्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण है । तात्पर्य यही है कि यज्ञ त्रिपर्वा है । अतः उसके किसी एक भाग में ही रसाधान किया जाएगा तो सारा यज्ञ रसयुक्त न होगा । आवश्यकता है - सब को रस युक्त करने की । अतएव तीनों ही के साथ वसतीवरी का सम्बन्ध करना चाहिए -" ता वै ( वसतीवरी - प्रापः ) सर्वेषु ( त्रिषु ) सवनेषु विभजति । सर्वे -ष्वेवैतत् सवनेषु रसं दधाति । सर्वारिण सवनानि रसवन्ति करोति । तस्मात् सर्वेषु सवनेषु विभजति " ॥३ ॥

बहता हुआ पानी ही वसतीवरी है । इसी अभिप्राय से कहते हैं--जो पानी सोमाभिषव में काम आता है - उसे- बहते हुए जलों में से ही ग्रहण करना चाहिए अर्थात् जो बहते हुए पानी हैं उन्हीं में से सोमाभिषवार्थ पानी लाना चाहिए, क्यों कि यज्ञ का रस चला गया था- इसलिए स्यन्दमान पानियों का पानी ही लाना चाहिए । यज्ञ रस को लेने के लिए यह पानी लाया जाता है । यज्ञ - रस स्थिर नहीं है अपितु ऐव है । अर्थात् यज्ञ रस का स्वरूप है - चलते जल । इसलिए ऐसे चलते हुए यज्ञ रस को तो चलते हुए पानी से ही प्राप्त कर सकते हो । जो बहता पानी है-वही रस है । जब तक यज्ञ - अग्नि रस उसमें है -तभी तक पानी बह रहा है । पानी बहता नहीं जा रहा, यज्ञ - रस बहता जा रहा है । यदि बहता हुआ यज्ञ रस निकल जाए तो उसी समय पानी जाम हो जाए । अतः बहते हुए पानी में से ही पानी लाना चाहिए क्यों कि वही वसतीवरी है-" ता वै स्यन्दमानानां गृह्णीयात् । ऐद्धि स यज्ञस्य रसः । ( हि स यज्ञ-रसः स्रवत् ) - तस्मात् स्यन्दमानानां गृह्णीयात् ॥४ ॥

एक तो - चलते हुए पानी का ग्रहण इसलिए करना चाहिए कि यज्ञ रस चलता हुआ पानी ही रहता है - अपि च चलते हुए पानी के ग्रहण करने का दूसरा प्रयोजन और भी है - इन पानियों को रक्षा के लिए ग्रहण किया जाता है । इस यज्ञ रस से इस सुत्या यज्ञ की रक्षा होती है । रक्षा से स्वरूप- रक्षा अभिप्रेत है । यदि यह रस यज्ञ में शामिल न हो तो यज्ञ स्वरूप की रक्षा न हो । और हमारा यज्ञ-स्वरूप पूर्णतया सुसंपन्न हो जाए इसमें कोई त्रुटि न हो - इसलिए यज्ञस्वरूप वसतीवरी पानी का ग्रहण किया जाता है । यज्ञ - स्वरूप रक्षा ही इनके ग्रहण का प्रधान कारण है । ऐसी अवस्था में बहते हुए पानी का ही ग्रहण करना चाहिए क्यों कि जो स्वयं संपन्न एवं सुरक्षित होता है - वही दूसरों को संपन्न एवं सुरक्षित बना सकता है । इस बहते हुए पानी से अलग नहीं बहने वाले जितने भी कूप सरोवर - नदी यादि के पानी हैं वे सब विकृत होते हैं । सब अपनी स्थिति से -स्वरूप से विचलित हो जाते हैं । बन्द पानी थोड़े दिनों में गाढा हो जाता है तथा होते - होते कालान्तर में वही पानी मिट्टी बन जाता है । बन्द पानी अपनी स्वरूप - रक्षा अधिक दिन तक नहीं कर सकता । भला, जो वन्द पानी ग्रपने स्वरूप को भी सुरक्षित नहीं रख सकता - स्वयं भी कालान्तर में स्वरूप से च्युत हो - मिट्टी बन जाता है - वह पानी यज्ञ को कैसे सुरक्षित रख सकता है? अन्धा अन्धे को क्यों कर रास्ता दिखला सकता है? जाने दो - बन्द [ ५६१ ]

पृष्ठ 576

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तृतीय काण्ड ( अ ० x ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण पानियों की कथा | बहने वालों में से भी जो यह वायु है, वह भी अपने स्वरूप को नहीं रख सकता । वायु भी कभी गर्म हो जाता तो कभी ठंडा हो जाता है - कभी अनुष्णशीत बन जाता है । भला, बहने वाले वायु तक की जब यह कथा है तो नहीं बहने वाले पानियों का तो कहना ही क्या है? अतएव बहते हुए पानी को ही काम में लाना चाहिए क्यों कि बहता हुआ पानी स्व - स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता है । बहता पानी सर्वथा निर्दुष्ट रहता है, अतः वही लेना चाहिए—-" गोपीथाय ( यज्ञस्वरूप रक्षाय ) वाडएता ( प्रापः ) गृह्यन्ते । सर्व वा Sear त् ( वहनशीलाद्द्भ्योऽन्यत् ) इलयति । ( स्वरूपच्युति लभते ) यदिदं कि-चापि योऽयं पवते ( सोऽपि इलयति का कथान्येषामिति भावः ) अथैता एव लयन्ति । तस्मात् स्यन्दमानानां गृह्णीयात् ॥५ ॥

इसमें भी एक शर्त और है । दिन में ही वसतीवरी ग्रहण करना चाहिए । सूर्य्यसत्ता में ही पानी लाना चाहिए । सूर्य्य - सत्ता में ही क्यों लाना चाहिए, इसका कारण बतलाते हैं । यज्ञ करना असिधार पर चलना है । जरा चूके कि मरे । आप रात को पानी लेने गए और संयोग से किनारे पर लगा हुआ कूड़ा - कर्कट भी साथ आ गया, तो बस यज्ञ दूषित हो गया - समझिए । अतः दिन में देख कर सावधानी से यज्ञ - रस लाना चाहिए । दिन में ही, यह वास्तव में यज्ञ रस ही है, यह विश्वास हो जाता है । दिन में लाए हुए जल पर पूर्ण श्रद्धा रहती है । उसमें जरा भी संशय नहीं रहता । रात को लाने में यज्ञ - रस श्राँखों के सामने नहीं रहता । अतएव श्रात्मविश्वास नहीं होता । इस अविश्वास से यज्ञ में हानि पहुँचती है | कहना यही है कि यह यज्ञ - रस ही है - यह प्राँखों से देखते हुए हम यज्ञ - रस ग्रहण करें - इसलिए दिन में ही पानी लाना चाहिए । " दिवा गृह्णीयात् । पश्यन् यज्ञस्य रसं गृह्णानीति " । तस्माद् दिवा गृह्णीयात् " । आकाश में जो सूर्य्य तप रहा है - उसी के लिए इस पानी का ग्रहण करते । इस पानी में विश्वे-देवता ( सारे देवता ) आ कर बैठते हैं । उनके बैठने के लिए ही इस पानी को लाया जाता है । इस सूर्य्य की जो रश्मियाँ हैं - प्रकाशी प्राण हैं वही विश्वेदेव हैं । दीपक रश्मि से जैसे अभिन्न है - तथैव रश्मि - प्राण-रूप विश्वेदेव अपने प्रभव सूर्य से अभिन्न हैं । ऐसी अवस्था में विश्वेदेवों के लिए इस पानी का ग्रहण करना- सूर्य्य के लिए ही ग्रहण करना है । चूँ कि सूर्य्यं के लिए इसका ग्रहण होता है, अतः उसकी सत्ता में ही ग्रहण हो तो उचित ही है । जिसके लिए वस्तु ली जाए वह वस्तु उसी के सामने ली जाती है तो वह और भी अच्छा होता है । अतएव - दिन में ही ग्रहण करना चाहिए । " एतस्मै वै गृह्णाति य एष तपति - ( कथमिति चेतदुच्यते ) विश्वेभ्यो ना देवेभ्यो गृह्णाति । रश्मयो ह्यस्य विश्वे देवाः । तस्माद् दिवा गृह्णी-यात् " । [ ५६२ ]

पृष्ठ 577

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' तृतीय काण्ड ( प्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी: ब्राह्मण ग्रपि च - वह वसतीवरी नाम का बहता यज्ञ रस पानी दिन ही तो है । सौरप्राण का अर्थात् आग्नेयप्राण का नाम दिन है । ग्रहः - श्राग्नेय है । रात्रि सौम्या है । पानी का जो बहना है - वह यज्ञ-रस का बहना है । यज्ञ रस का बहना - अग्नि का बहना है - ग्नि का बहना सौर प्राण का बहना है । अतएव बहते हुए पानी को हम दिवास्वरूप कहने के लिए तय्यार हैं । चूँ कि बहता पानी दिवा है - सौर-प्राण स्वरूप है, इसलिए भी उसे दिन में ही लाना चाहिए - दिन को दिन में लाना चाहिए । सौर प्रारण

रूप विश्वेदेव युक्त पानी को सौर प्रारण की सत्ता में ही लाना चाहिए ।

" दिवेव वा एषः ( अप्सु प्रविष्टो यज्ञरसः ) । तस्माद्वेव दिवा गृह्णी-यात् " ॥६ ॥

श्रपि च - सूर्य्यसत्ता में सूर्यास्त से पहले ही पानी ग्रहण करने का एक कारण और भी है । जिस दिन यजमान यज्ञ करना चाहता है, उसके पहले ही दिन सारे देवता यजमान के घर आ जाते हैं । देवता श्राग्नेय हैं । इनका रुख सोम की ओर रहता है । यजमान का मन सोमरूप है । " कल यज्ञ करूँगा " -जहाँ इसने यह भावना की कि सारे देवता - इस सौम्यमन अन्न की प्रोर अभिमुख हो जाते हैं । सारे प्राण - देवता यजमान के घर आ जाते हैं । कल यजमान सुत्या करने वाला है अतः पहले ही दिन विश्वे -देवता इसके घर आ जाते हैं । यजमान - सूर्यास्त से पहले ही वसतीवरी पानी का ग्रहण कर उसे एक पात्र में रख देता है । वह पात्र भी वसतीवरी सम्बन्धेन " वसतीवरी " ही कहलाने लगता है । जिस प्रकार किसी श्रेष्ठ आदमी के आने से पहले उसके लिए स्थान वगैरः निश्चित कर उस आने वाले की प्रतीक्षा की जाती है, वैसा ही यजमान का सूर्यास्त से पहले वसतीवरी ग्रहण कर उसे घट में ( यज्ञशाला में ) प्रतिष्ठित करना है । वसतीवरी देवताओं के ठहरने की जगह है - क्यों कि वह उन्हीं की वस्तु है । विश्वेदेव आते ही उस हवि रूप ( भोग्य होने से हविरूप ) वसतीवरी में प्रविष्ट हो कर उसमें प्रतिष्ठित हो जाते हैं । चूंकि विश्वेदेव यज्ञ से पहले दिन वसतीवरी में बस जाते हैं, अतएव इस पहले दिन को " उपवसन्ति देवा यस्मिन्दिने " इस व्युत्पत्ति से " उपवसथ " कहने लगते हैं । कहना यही है कि वसतीवरी देवताओं के . आराम करने की - निवास करने की जगह है । वसतीवरी का वसतीवरीपना सूर्य्यास्त से पहले ही रहता है । सूर्यास्त तक सौर प्रारण निवासात् वह पानी पवित्र एवं देव प्राण युक्त रहता है । अतः उसे सूर्यास्त से पहले ही ले आना चाहिए । यदि ऐसा न किया गया तो देवता खड़े रहेंगे एवं इससे यजमान का यज्ञ भ्रष्ट हो जाएगा । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर कहते हैं— " एतद्ध वै विश्वे देवा यजमानस्य गृहानागच्छन्ति । स यः पुरादित्य-स्यास्तमयात् वसतीवरीगृह्णाति यथा श्रेयस्यागमिष्यति आवसथेनोपल्कृप्तेनोपा-सीत एवं तत् ( ग्रह्णम् ) । तएतद्धविः प्रविशन्ति । तएतासु वसतीवरीषू-पवसन्ति । स उपवसथः ॥७ ॥

[ ५६३ ],

पृष्ठ 578

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 578 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण. वसतीवरी ब्राह्मण यदि सूर्य्यं वसतीवरी पानी ग्रहण करने से पहले ही अस्त हो जाए अर्थात् किसी कारणवशात् वह सूर्य्यास्त से पहले वसतीवरी न ला सके तो वह यह प्रायश्चित करता है । अर्थात् सूर्यास्त से पहले पानी न लाने का जो दोष है वह निम्नलिखित उपायों से हटाया जा सकता है--यज्ञ - कर्मादि के लिए वसतीवरी पानी मुँह बन्द करके गंगा जल की तरह सुरक्षित रख दिया जाता है । यह पानी साल भर तक रक्खा रहता है । यदि यज्ञकर्त्ता - कृतयज्ञ हो - अर्थात् इसने इस यज्ञ से पहले वर्ष भी यज्ञ किया हो तो घर में रक्खा हुआ जो सुरक्षित पानी है, उसे ग्रहण कर ले अर्थात् पूर्वकृत यज्ञ के समय लाए गए सुरक्षित रक्खे हुए पानी से यहाँ भी काम कर ले, क्यों कि वह सुरक्षित पानी दिन में ही गृहीत हुए हैं । यदि पहली बार ही यज्ञ कर रहा है - श्रनीजान ( पहले कभी यज्ञ नहीं किया ) है तो अपने पड़ोसी अथवा दूर वाला जो ईजान ( यज्ञ कर चुका ) हो - उसके घर में रक्खे हुए सुरक्षित पानी-में से ले आए क्यों कि उसके घर में रक्खा हुआ पानी तो दिन में ही गृहीत हुआ रहता है— " स यस्या गृहीता अभ्यस्तमियात् - तत्र प्रायश्चित्तिः क्रियते । यदि पुरे-जानः स्यात् - निनाद्यात् - ( सुरक्षितात् वसतीवरी घटात् श्रापः ) गृह्णीयात् । दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भवन्ति । यद्युग्रनीजानः स्यात् - एनमीजान उपासितो वा पर्यवसितो वा स्यात्तस्य निनाह्यात् गृह्णीयात् । दिवा हि तस्य वा: पुरा गृहीता भवन्ति " ॥८ ॥

दुर्भाग्य से यदि दोनों ही न प्राप्त हो सकें तो एक जलता पूला ले कर पानी के किनारे चला जाए एवं उसे पानी के ऊपर फिराते हुए उस पानी को ग्रहण करे अथवा एक सोने का टुकड़ा फिराते हुए पानी ले ले । ऐसा करता हुआ यह उसी सूर्य्य की अनुकृति करता है, जो कि तप रहा है । प्र का पूला भी सूर्य्य ही है, क्यों कि प्रकाश उसी की वस्तु है एवं सूर्य्य रश्मियाँ ही सुवर्ण बनी हुई हैं । " एतदुभयं न विन्देत् - उल्कुषीमेवादाय - उपपरेयात् । तामुपर्युपरि धारयन् गृह्णीयात् । हिरण्यं वोपर्युपरि धारयन् गृह्णीयात् । तदेतस्य रूपं क्रियते य एष तपति " ॥ ॥ इस यज्ञ में वसतीवरी पानी क्यों लाया जाता है? - इसकी उपपत्ति बतला दी गई, अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ वसतीवरी जल का ग्रहण करता है - " हविष्मती-रिमा श्राप: " " इति । यह पानी हविष्मती है अर्थात् हवि रूप है । हमने बतलाया था कि यह पानी हविष्मती है अर्थात् हवि रूप है । यह भी बतलाया था कि यह पानी विश्वेदेवताओं के बैठने के काम में १ - ' वा ० सं ० ६।२३ ' । [ ५६४ ]

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 579 का मूल पृष्ठ
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण वस्तीवरी ब्राह्मण आता है, अतएव हम इसे देवभोग्यत्वात् हविष्मती कहने के लिए तय्यार हैं । श्रपि च - यज्ञ का जो रस है-वही तो इस वसतीवरी में प्रविष्ट होता है । यज्ञ - रस ही देवताओं का हवि है, इसलिए भी हम इसे हविष्मती ( यज्ञ - रसवती ) कह सकते हैं । अपि च- सोम देवताओं की हवि है । इस हवि में ( अर्थात् सोमा-भिषव करते समय सोम में ) इसका सम्बन्ध किया जाता है । अतः हवि सम्बन्धेनापि इसे हविष्मती कह सकते हैं । अपिच इसलिए भी कि अन्न ही देवताओं का हवि है एवं पानी ही चौथी ( ४ थी ) आहुति में अन्न बनता है । पाँचों व्युत्पत्तियों में से एक व्युत्पत्ति बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— " यज्ञस्य ह्यासु रसः प्राविशत् - तस्मादाह - " हविष्मतीरिमा श्राप " -इति । " हविष्मां श्राविवासति " " वसतीवरी ' आप ' से निष्पन्न जो सोम - हवि है उससे यजमान यज्ञ करने वाला है, अतएव यजमान भी ' हविष्मान् ' कहलाता है । बस, इस प्रकार हविष्मान् यह यजमान हवि -ष्मती श्रापः का ग्रहण करता है - प्रतएव - " हविष्माँ आविवासति ( परिचरति ) " यह कहा गया है । यज्ञ में से जो रस निकल गया था उसे वापस यज्ञ में प्रविष्ट कर यज्ञ की कमी पूरी करने के लिए ही वसतीवरी का ग्रहण किया जाता है-" हविष्मान् - होना यजमान श्राविवासति ( परिचरति ) तस्मादाह -हविष्माँ आविवासति " - इति ॥ १० ॥

फिर मन्त्र का शेष भाग बोलता है - " हविष्मान् देवो प्रध्वरः इति २ यह जो यज्ञ है वही " अध्वर " कहलाता है । यज्ञ जनित हिंसा - " अशुद्धमिति चेन्नशब्दात् " के कारण हिंसा नहीं कहलाती, श्रतएव यज्ञ को अध्वर ( हिंसा - रहित ) कहा जाता है । हविष्मती आप- सम्बन्ध से यह यज्ञ भी हविष्मान् हो जाता है - अर्थात् हवि - स्वरूप यज्ञ का जो सार भाग निकल कर पानी में प्रविष्ट हो गया था उस को यज्ञ में शामिल कर उस कमी को पूरा कर यज्ञ को हविष्मान् बनाते हैं-" अध्वरो वै यज्ञः । तद्यस्मै यज्ञाय गृह्णाति तं हविष्मन्तं करोति । तस्मादाह - हविष्मान् देवो अध्वर इति ॥ ११ ॥

फिर मन्त्र का चौथा हिस्सा बोलता है - " हविष्माँ अस्तु सूर्य्य इति । " ' आप ' का सोम से सम्बन्ध कराया जाता है । सोम की प्राहुति विश्वेदेवताओं के लिए दी जाती है । सौर - रश्मि रूप प्राण देवताश्नों को ही - ' विश्वेदेव ' कहते हैं । इन्हीं के लिए तो ' वसतीवरी ' का ग्रहण किया जाता है । इनके लिए जो वसतीवरी का ग्रहण करना है - वह इनके प्रारूप सूर्य के लिए ही ग्रहण करना है । इस हविरूप पानी १' वा ० सं ० ६।२३ ' । २ ' वा ० सं ० ६।२३ ' । [ ५६५ ]

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तृतीय काण्ड ( ० है ) 61 त्येवैतदाह " । ' वा ० सं ० ६।२३ ' । १ बसतीवरी ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण [ ५६६ ] से मिश्रित सोमाहुति - अग्नि से विशकलित हो कर वास्तव में सूर्य में अर्थात् दिव्यप्रारण - देवताओं में चली जाती है । इससे सौर प्रारण हविष्मान् हो जाते हैं । सौर प्रारण सूर्य्यं से अभिन्न हैं, अतएव हम इस आहुति से सूर्य को हविष्मान् बतला सकते हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं— इसी के लिए वसतीवरी का ग्रहण करता है, जो कि यह आकाश में तप रहा है । यद्यपि ग्रहण करता है विश्वेदेवों के लिए, परन्तु चूंकि इस सूर्य की रश्मियों का नाम ही विश्वेदेव है - एवं रश्मियाँ और सूर्य अभिन्न हैं, प्रतएव - " हविष्माँ प्रस्तु सूर्य्यः " १ - यह कह दिया गया " हविष्मतीरिमा पो हविष्माँ श्राविवासति । हविष्मां देवोऽध्वरो हविष्मांऽस्तु सूर्य्यः ॥ ” ( बा ० सं ० ६।२३ ) ये पानी हविष्मान् है - ऐसे इनको हविष्मान् यजमान ही ग्रहण करता है । अर्थात् जो रुतबा ' आप ' हविष्मान् पानी का है, वही यजमान का है । अतः यजमान का इसे ग्रहण करना इस हविष्मती हो जाए एवं के स्वरूपानुकूल ही है । हे हविष्मान् श्राप! ( आप के ग्रहण से ) यह यज्ञ हविष्मान् वह यजमान आहुति द्वारा सूर्य्यं भी हविष्मान् हो जाए अर्थात् हमारा यज्ञ पूरा हो जाए ) - इस मन्त्र से अथवा यजमान - प्रतिनिधि अध्वर्यु वसतीवरी ' आप ' का ग्रहण कर लेता है ॥ १२ ॥

वहाँ उस ' लात्वापया ' से उस पानी को यज्ञ - शाला में ला कर उसे.---" अग्नेर्वो s पन्नगृहस्य सदसि सादयामि " । ( वा ० सं ० ६।२४ ) यह बोलता हुआ उसें गार्हपत्य - ( हविर्वेदि के आहवनीय ) से पश्चिम भाग में रख देता है का । . गार्हपत्य - पृथिवी - स्थानीय है । उत्तरावेदिस्थ आहवनीय द्युलोक - स्थानीय है । भी पृथिवी है, परन्तु ही यजमान पृथ्वी - रूपी अन्न ( अच्युत ) घर है । मिट्टी - चूने के मकान के गिरने का तो कुछ भय रहता का गृह सर्वथा अच्युत रहता । पार्थिवाग्नि का अपन अच्युत गृह जैसे पृथिवी है तथैव ग्रह इस है - यज्ञाग्नि उसमें ' आप ' अपन्नगृह -- यह गार्हपत्य है - ऐसा जो अग्नि देवता का अपन्न गृह है - ऐसे सद में - ऐसा ) रहता है-को ( वसतीवरी को ) प्रतिष्ठित करता हूं । अग्नि का घर सदा अपन्न ( अशीर्ण प्रग्नि - अपतित शरीर श्रपन्न रहता अग्नि का घर शरीर है । जब तक अग्नि का शरीर पर राज्य रहता है तब तक में मैं है । गार्हपत्य अग्नि का शरीर हैं अतएव हम उसे अपन कहने के लिए तय्यार हैं । ऐसे अपन्न गृह आप को रखता हूं - यही तात्पर्य है-" अग्नेर्वो s नागृहस्य सबसि ( प्रपतितगृहस्याग्नेः सदसि ) सादयामी-