Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 581–590
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 581–590
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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण सतीवरी ब्राह्मणे वसतीवरी पानी को वपा मार्जन के अन्त में ही ले आया जाता है । अग्नीषोमीय पशु की वपा की आहुति देकर हाथ धोए जाते हैं । वहीं और और अवयवों की आहुति देने से पहले ही पशु - याग सम्बन्धी कम्मों से पहले वपा मार्जनान्त में ही वसतीवरी पानी लाया जाता है एवं ला कर उसे गार्हपत्य के पास रख दिया जाता है । इसके बाद अग्नीषोमीय पशु - सम्बन्धी और और कर्म होते हैं । पशु - याग में सबसे अन्त में जाघनी से पत्नी - संयाज़ कर्म्म होता है । इस पर अग्नीषोमीय पशु - याग समाप्त होता है । बस, जिस समय अग्नीषोमीय पशु पत्नी - संयाजान्त समाप्त हो जाता है - पशु - याग खत्म हो जाता है - इसके बाद वसतीवरी पानी को उत्तरावेदि की ओर ले जाता है अर्थात् वपा मार्जनान्त में ही वसतीवरी को ले आना चाहिए एवं ला कर उसे गार्हपत्य के समीप रख देना चाहिए । तदनन्तर पशु - याग करना चाहिए । जब पशु - याग समाप्त हो जाए तो बाद में उसे उत्तरावेदि की ओर ले आना चाहिए । इसी अभिप्राय से कहते हैं— “ अथ यदा प्रग्नीषोमीयः पशुः संतिष्ठते - अथ परिहरति " । जिस समय वह पानी को वेदि की ओर ले जाने के लिए उठाता है उस समय वेदि - मध्य में स्थित दीक्षितों को यह पानी ले जाने वाला ऋत्विक् कहता है कि चलो चलो! पानी वेदि की ओर नहीं जा रहा, अपितु सारे देवता वेदि की ओर जा रहे हैं । भला, देवता चलें और दीक्षित बैठे ही रहें - यह कैसे हो सकता है? अतएव वह श्रध्वर्यु पानी उठाते ही कहता है कि चलिए चलिए अर्थात् देवता चल रहे हैं - आप भी इनकी अर्दली में चलिए । कात्यायन कहते हैं कि " चलिए - चलिए " यह प्रैष तीन बार करना चाहिए ---" प्रस्तमितेसं स्थाप्य व्युत्क्रामतेत्याह- त्रिः " ( कात्यायन - इति श्री सायणाचार्य ) " व्युत्क्रामत - इत्याहः " ( अध्वर्युः ) । यहाँ पर प्रसङ्गागत एक बात और समझ लेनी चाहिए । यहाँ पर कुल सात मन्त्र बोले जाते हैं । सात से ही आगे बतलाई जाने वाली सम्पत्ति प्राप्त होती है । हमने बतलाया कि वपामार्जन के अन्त में ही ' वसतीवरी ' लाया जाता है । एवं उसे ----" अग्नेर्वो s पन्नगृहस्य सदसि सादयामि " । ( वा ० सं ० ६।२४ ) इससे पहले उसे गार्हपत्य पर प्रतिष्ठित कर दिया जाता है । बाद में पत्नी - संयाजान्त पशु - याग कर " इन्द्राग्न्यो गिधेयी स्थ " इस मन्त्र से उसे हविर्धान के पास ले जाया जाता है । यहाँ पर तैत्तिरीयों का मत है कि वपामार्जनान्त में ' वसतीवरी ' नहीं लाना चाहिए अपितु पत्नी - संयाजान्त होने वाले पशु-याग को समाप्त करके बाद में पशु - याग करना चाहिए । परन्तु यह मत सर्वथा अशुद्ध समझना चाहिए क्योंकि जब पशु - याग के बीच में वपामार्जनान्त में ही पानी लाया जाता है तो बाकी बचे हुए पशु - कर्म्म करने के लिए उस लाए हुए वसतीवरी को पहले " श्रग्नेर्वा s पन्न गृहस्य " इस मन्त्र से गार्हपत्य पर [ ५६७ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) उत्तराः उत्तरवेदी ० उत्तराः पू ० हवि उ ० आग्नीध्रय प ० ' वा ० सं ० ६।२४ ' । १ 1 वसतीवरी ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण दक्षिण अथ वसतीवरी स्थापनम् दक्षिणाश्रोणिः दक्षिण [ ५६८ ] प्रतिष्ठित करना पड़ता है । एवं बाद में - " इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ ' ' १ से सीधा हविर्धान के पास ही ले जाना पड़ेगा । ऐसी अवस्था में " अग्नेर्वा " यह एक मन्त्र कम हो जाएगा - कुल ६ ही मन्त्र रह जाएंगे एवं सात से मिलने वाली शाक्वरसंपत्ति न मिलेगी । अतः वपामार्जनान्त में ही वसतीवरी लानी चाहिए | वसतीवरी को ला कर वह ऋत्विक उसे हविर्वेदि के गार्हपत्य श्राहवनीय के पास ( जो कि वहाँ वेदिका गार्हपत्य ही है ) रख देता है । बाद में पशु - यज्ञ समाप्त होने के बाद वेदिमध्यस्थ ऋत्विजों को ' व्युत्क्रामत ' कहता हुआ उस वसतीवरी पानी को हविर्धान मण्डप के पास ले आता है । हविर्धान- मण्डप में दो छकड़े रक्खे रहते हैं । उन दोनों के पूर्व भाग में बीचों - बीच यजमान बैठा रहता । बस, ऋत्विक् द्वारा ले गए पानी को यजमान अपने हाथ में ले लेता है -" थ परिहरति । व्युत्क्रामतेत्याह । श्रग्रेरण हविर्धाने यजमान प्रास्ते ता श्रादत्ते " ॥१३ ॥
इस हविर्धानमण्डप के पूर्व - पश्चिम उत्तर - दक्षिण - चारों ओर चार दरवाजे होते हैं । इसके उत्तर में आग्नीधीय है । दक्षिण में मार्जालीय है- पूर्व में उत्तरवेदि है और पश्चिम में सदोमण्डप है । चारों में जाने के लिए इसमें चार दरवाजे होते हैं । इन चारों में से जो दक्षिण का दरवाजा है - पानी हाथ में लिए हुए यह यजमान उसी दरवाजे से निकलता है--
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तृतीय काण्ड ( अ ० 2 ) शतपथ ब्राह्मण " स दक्षिणेन निष्कामित " । वसतीवरी ब्राह्मण एवं दक्षिण से उत्तरावेदि की दक्षिणाश्रोणि ( जो कि पास में ही पड़ती है - में ला कर उस पर ) " इन्द्रायोर्भागधेयी स्थ " यह मन्त्र बोलता हुआ रख देता है । इस पानी का विश्वेदेवताओं के लिए अर्थात् सारे देवताओं के लिए ग्रहण होता है । सूर्य्यास्त से पहले आने वाले विश्वेदेवताओं के लिए वसतीवरी पानी लाया जाता है । देवता पार्थिव - सौर भेदेन दो ही प्रकार के होते हैं । पृथिवी में भी प्रधान अग्नि ही है एवं द्यु के प्रधान देवता इन्द्र हैं । पार्थिव-प्रारण - देवता अग्नि - सम्बद्ध हैं - सौर प्रारण - देवता इन्द्र सम्बद्ध हैं । अतएव " इन्द्रः सर्वा देवता: ", " " श्रग्निः सर्वा देवता: " २ यह कहा जाता है । ऐसी अवस्था में " इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ " 3 से विश्वेदेवेभ्यो भागधेयी स्थ - यह अर्थ हो जाता है । इन्हीं के लिए पानी का ग्रहण होता है एवं इन्द्राग्नि ही सारे देवता हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" विश्वेभ्यो होना देवेभ्यो गृह्णाति । इन्द्राग्नी हि विश्वे देवाः " इति । इसके बाद यजमान उन्हें ( वसतीवरी आप ) को दक्षिणाश्रोणि में उठा कर - हविर्धान के प्रागे बैठी हुई पत्नी के आगे रख देता है— " पुनराहृत्याग्रेण पत्नीं सादयति " । इसके अनन्तर पत्नी के पश्चिम भाग में से आकर पत्नी के आगे रक्खे हुए उन वसतीवरी पानियों को वह यजमान अथवा यजमान प्रतिनिधि अध्वर्यु उठा लेता है— “ स जघनेन पत्नों पर्येत्य ता प्रदत्ते ॥ १४ ॥
इसके बाद उस पानी को ले कर वह हविर्धान- मण्डप में घुस जाता है । वहाँ पर घुस कर हविर्धान मण्डप के उत्तर मार्ग से निकलता है । निकल कर उत्तरावेदि की उत्तरश्रोणि पर उसे रख देता है, यहाँ पर दो मत हैं । तैत्तिरीय का मत है कि " मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ ४ यह मन्त्र बोल कर उत्तराश्रोणि पर पानी रखना चाहिए । ऐसा करने का कारण यही है कि उनके मत में वपामार्जनान्त में वसतीवरी का ग्रहण नहीं होता-अपितु पशु - यज्ञ समाप्त्यनन्तर वसतीवरी का ग्रहण होता है । ऐसी अवस्था में " अग्नेर्वाऽपना गृहस्य " यह एक मन्त्र उनके मत में कम हो जाता है । इस प्रकार कुल ६ मन्त्र हो जाते हैं । इस कमी को पूरा करने के लिए वे “ उत्तराश्रोणि " में पानी को " मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ " इस मन्त्र से पूरी करते हैं । परन्तु १ ' शत ० ब्रा ० ३ | ४ | २।२ ' । २ ' ऐ ० ब्रा ० अ ० ६।३ ' । ३ ' वा ० सं ० ६।२४ ' । ४ ' वा ० सं ० ६।२४ ' । [ ५६६ ]
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तृतीय काण्ड ( प्र ० 8 ) शतपथ ब्राह्मरण वसतीवरी ब्राह्मण वे ऐसा नहीं कर सकते । उन्हें वपामार्जनान्त में ही वसतीवरी ग्रहण करनी पड़ेगी । ऐसी अवस्था में " मित्रा" इसके प्रयोग से संपत् प्रतिरिक्त हो जाएगी - प्रथात् सात मन्त्र न रह कर आठ मन्त्र हो जाएँगे । एक मन्त्र बढ़ जाएगा । अतः यह न बोल कर “ इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ " यही बोलना चाहिए | बोलना भी यही चाहिए क्यों कि वसतीवरी का ग्रहण केवल मित्र और वरुण के लिए ही थोड़े ही होता है, श्रपितु सारे देवताओं के लिए ही इसका ग्रहण होता है । ऐसी परिस्थिति में " मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ " हर्गिज नहीं बोला जा सकता एवं इन्द्राग्नी से चूं कि मित्रावरुण का ग्रहण हो जाता है, इसलिए " मित्रावरुणयो ” बोलने की आवश्यकता भी नहीं है । इसी तैत्तरीय मत का उल्लेख कर उसका खण्डन करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" स उत्तरेण निष्कामित । ता ( वसतीवरी: ) उत्तरायां श्रेणौ साद-यति । मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थेति । नैवं सादयेत् । श्रतिरिक्तमेतत् । नैवं सम्पत् संपद्यते । इन्द्राग्न्योर्भागधेयी - स्थत्येव ब्रूयात् । तदेवानतिरिक्तम् । तथा संपत् संपद्यते " ॥१५ ॥
इस प्रकार इस वसतीवरी पानी को दक्षिण - उत्तर - पश्चिम - तीनों तरफ फिराया जाता है । इसका प्रयोजन यज्ञ - रक्षा मन्त्र है । पानी क्यों लाया जाता है? - इसका उत्तर ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही पांचवीं afuser में " गोपीथाय " ( यज्ञरक्षायै ) यह दिया गया था । चूं कि चारों ओर से यज्ञ को सुरक्षित करना. उचित है, इसीलिए इस यज्ञ रक्षा के लिए इनका चारों ओर परिहरण किया जाता है । केवल पूर्व की ओर नहीं ले जाया जाता क्योंकि पूर्व में तो स्वयं उत्तरावेदिस्थ आहवनीया अग्नि मौजूद ही है । अग्निसुरप्राण का नाशक है । अतः उधर से ( पूर्व से ) कोई भय नहीं रहता । बाकी बचती हैं-पश्चिम - उत्तर - दक्षिण - तीन दिक् । इन तीनों में आसुर याम्य प्रारण का अधिक आक्रमण दक्षिण से ही होता है - अतः पहले से उधर ही पानी को ले जाया जाता है । बाद में - पत्नी के पार्श्व भाग से परिक्रमा करके उत्तर की ओर ले जाया जाता है । पत्नी, यज्ञ का पश्चिम भाग है अतः इसके पीछे से ले जाना यज्ञ के पश्चिम भाग की रक्षा करना है - एवं उत्तर से उत्तर भाग की रक्षा करना है । पानी नाष्ट्रा और राक्षसों को मारने वाला यन्त्र है । इस प्रकार यज्ञ के चारों ओर आपवज्र का किला बना देते हैं । इसीलिए सन्ध्या करते समय पानी ले कर " श्रापोमामभिरक्षन्तु " कह कर शरीर के चौतरफ पानी का सम्बन्ध किया जाता है - तथैव यज्ञ - पुरुष- रक्षार्थ यहाँ पानी का सम्बन्ध किया जाता है । प्राकृतिक सौर यज्ञ के चारों ओर प्रापोमय परमेष्ठी मौजूद है । उसी परमेष्ठि - पिण्ड से प्राकृतिक यज्ञ सुरक्षित है । इसी अभिप्राय से कहते हैं ---" गुप्त्यै वा s एताः परिहियन्ते । श्रग्निः पुरस्तात् । अथैताः समन्तं पल्य-जयन्ते ( परिब्रोऽङ्गयन्ते - ह्रियन्त - इत्यर्थः ) नाष्ट्रा रक्षांस्यपध्नत्यः ( ता-श्रापः ) " । [ ५७० ]
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-तृतीय काण्ड ( अ ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण इसके बाद उत्तरा श्रोणि पर से उस पानी को उठा कर --" विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ " यह मन्त्र बोल कर उसे प्राग्नेधीय वेदि पर रख देते हैं । आग्नीध्रीय में स्थित इस वसतीवरी पानी में ही तो सारे देवता प्रतिष्ठित रहेंगे । अतः - " विश्वेषां " इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु उन पानियों में विश्वेदेवों को प्रतिष्ठित करता है-" ता आग्नीध्रे सादयति- विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ - इति । तदासु विश्वान् देवान्त्संवेशयति " । इस पानी का नाम ' वसतीवरी ' क्यों पड़ा? - यह बतलाते हैं । रहने वाले के लिए " वसतां " प्रयोग आता है । ये देवता श्रस्मदादि - बसने वाले मनुष्यों से भी श्रेष्ठ हैं । भला, देवता और हम बरा-बर क्यों कर हो सकते हैं? हम बसने वाले हैं एवं वे बसने वालों से श्रेष्ठ हैं- वसतांवर हैं । वे लोग इस पानी में रहते हैं - अतएव इसे " वसतीवरी " कहा जाता है । जो इस विज्ञान को जानता है - वह स्वयं भी वसतांवर - हो जाता है— " एते वै वसतां वरम् । तस्माद्वसतीवर्य्यो नाम । वसतां ह वै वरं भवति य एवमेतद् वेद " ॥१६ ॥
इस प्रकार वसतीवरी - ग्रहण से स्थापन पर्यन्त कुल सात यजुः मन्त्र हो जाते हैं । १ - हविष्मती -रिमा ग्रापः २ - हविष्माँ प्राविवासति, ३ - हविष्मां देवो अध्वरः ४ - हविष्मां प्रस्तु सूर्य्य: ' इन चार मन्त्रों सेतो वसतीवरी का ग्रहण करते हैं । एवं - “ अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि " इस एक मन्त्र से इसे बार्हस्पत्य के पश्चिम भाग में रखते हैं एवं ' इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ ' से उसे उठाते हैं । ' विश्वेषां देवानां " से आग्नीध्र पर स्थापित करते हैं । इस प्रकार सात ( ७ ) मन्त्र हो जाते हैं--" तानि वाडएतानि सप्त यजूंषि भवन्ति । चतुभिर्गृह्णाति । एकेन जघ-नेन गार्हपत्यं सादयति । एकेन परिहरति । एकेनाग्नीध्रे । तानि सप्त " । १ - हविष्मतीरिमा श्रापः । २- हविष्माँ - प्राविवासति । ३ - हविष्मान् देवोऽप्रध्वरः । ४ - हविष्माऽस्तु सूर्य्यः । ५- अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि । ६ - इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ । ७- विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ । तानि वा एतानि यजूंषि । [ ५७१ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ) शतपथ ब्राह्मण वसतीवरी ब्राह्मण सात यजु का फल बतलाते हैं । छन्द = वाक् - अर्थ भेदेन दो प्रकार के हैं । दोनों का एक कायदा है । वाचिक छन्द वाक् से ही उत्पन्न होते हैं । इनका विस्तृत विवेचन सौवणिकाद्रवाख्यान प्रतिपादक-" सोमाहरण ब्राह्मण " एवं धिष्ण्या ब्राह्मण में कर दिया गया है । वाक् से उत्पन्न होने वाले इन छन्दों में सबसे अन्तिम छन्द शक्वरी है एवं उसके सात चरण हैं । शक्वरी छन्द सबके अन्त में है एवं वह सप्तपदा है ' यहाँ पर केवल इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि शक्वरी सामवाक् रूप यज्ञ - मण्डल की समाप्ति है एवं वह सप्तपदा है । उसे अपने वाचिक छन्द से पकड़ कर सारी यज्ञ - संपत्ति को आत्मसात् करने के लिए ही सात ( ७ ) यजुः मन्त्र बोले जाते हैं-" यत्र वै वाचः प्रजातानि छन्दांसि । सप्तपदा वै तेषां परार्ध्या तमा ) - शक्वरी एतामभिसम्पदं - तस्मात् सप्त यजूंषि भवन्ति " ॥१७ ॥
( सर्वो-॥ इति वसतीवरीब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति नवमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मरणं समाप्तम् ॥ १ - इसका विवेचन ' सोमक्रयणी ब्राह्मण ' में कर दिया गया है । ५७२ ]
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नवमाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् ' सुत्या - ब्राह्मणम् ' [ सूल ] तान्त्सम्प्रबोधयन्ति । तेऽप उपस्पृश्याग्नीध्रमुपसमायन्ति त-श्राज्यानि गृह्णते गृहीत्वाज्यान्यायन्त्यासाद्याज्यानि ॥ १ ॥
अथ राजानमुपावहरति । इयं वै प्रतिष्ठा जनूरासां प्रजानामिमामेवैत-त्प्रतिष्ठामभ्युपावहरति तमस्यै तनुते तमस्यै जनयति || २ || अन्तरेणेषेऽउपावहरति । यज्ञो वाऽश्रनस्तन्वेव यज्ञान्न बहिर्धा करोति ग्रावसु सम्मुखेष्वधिनिदधाति क्षत्रं वै सोमो विशो ग्रावाणः क्षत्रमेवैतद्विश्यध्यूहति तद्यत्सम्मुखा भवन्ति विशमेवैतत्सम्मुखां क्षत्रियमभ्यविवादिनीं करोति तस्मा-सम्मुखा भवन्ति ॥३ ॥
स उपावहरति । हृदे त्वा मनसे त्वेति यजमानस्यैतत्कामायाह हृदयेन हि मनसा यजमानस्तं कामं कामयते यत्काम्या यजते तस्मादाह हृदे त्वा मनसे त्वेति ॥४ ॥
दिवे त्वा सूर्याय त्वेति । देवलोकाय त्वेत्येवैतदाह यदाह दिवे त्वेति सूर्याय त्वेति देवेभ्यस्त्वेत्येवैतदाहोर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छेत्यध्वरो वै यज्ञ ऊर्ध्वमिमं यज्ञं दिवि देवेषु धेहीत्येवैतदाह ॥ ५ ॥
सोम राजन्विश्वास्त्वं प्रजा उपावरोहेति । तदेनमासां प्रजानामाधि-पत्याय राज्यायोपावहरति || ६ || प्रथानुसृज्योपतिष्ठते । विश्वास्त्वां प्रजाऽउपावरोहन्त्वित्ययथायथमिव वा s एतत्करोति यदाह विश्वास्त्वां प्रजा उपाव रोहेति क्षत्रं वै सोमस्तत्पापवस्यसं-करोति तद्वेदमनु पापवस्यसं क्रियतेऽथात्र यथायथं करोति यथापूर्वं यदाह विश्वा-[ ५७३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मरण स्त्वां प्रजा उपावरोहन्त्विति तदेनमाभिः प्रजाभिः प्रत्यवरोहयति तस्मादु क्षत्रि-मायन्तमिमाः प्रजा विशः प्रत्यवरोहन्ति तमधस्तादुपासतऽउपसन्नो होता प्रात-रतुवाकमनुवक्ष्यन्भवति ॥७ ॥
अथ समिधमभ्याददाह । देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहीति छन्दांसि वै देवाः प्रातर्यावरणश्छन्दांस्यनुयाजा देवेभ्यः प्रेष्य देवान्यजेति वाऽअनुयाजै-श्चरन्ति || ८ || तदु हैकप्राहुः । देवेभ्योऽनुब्रूहीति तदु तथा न ब्रूयाच्छन्दांसि वै देवाः प्रातर्यावरणश्छन्दांस्यनुयाजा देवेभ्यः प्रेष्य देवान्यजेति वाऽश्रनुयाजैश्चरन्ति तस्मादु ब्रूयाद्देवेभ्यः प्रातर्यावभ्योऽनुब्रूहीत्येव ॥९ ॥
अथ यत्समिधमभ्यादधाति । छन्दांस्येवैतत्समिन्धेऽथ यद्धोता प्रातरनुवा-कमन्वाह छन्दांस्येवैतत्पुनराप्याययत्ययातयामानि करोति यातयामानि वै देव-छन्दांसि छन्दोभिहि देवा: स्वर्ग लोकं समाश्नुवत न वाऽग्रत्र स्तुवते न शंसन्ति तच्छन्दांस्येवैतत्पुनराप्याययत्ययातयामानि करोति तैरयातयामैर्यज्ञं तन्वते तस्मा-होता प्रातरनुवाकसन्वाह || १० || तदाहुः । कः प्रातरनुवाकस्य प्रतिगर इति जाग्रद्वैवाध्वर्युरुपासीत स निमिषति स हैवास्य प्रतिगरस्तदु तथा न कुर्याद्यदि निद्रायादपि कामं स्व-प्यात्स यत्र होता प्रातरनुवाकं परिदधाति तत्प्रचरणीति स्रुग्भवति तस्यां चतु-गृहीतमाज्यं गृहीत्वा जुहोति ॥११ ॥
यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वाऽपः प्रविवेश तमदः पूर्वे -धुर्वसतीवरीभिराहरत्यथ योऽत्र यज्ञस्य रसः परिशिष्टस्तमेवैतदच्छेति ॥१२ ॥
वैतामाहुति जुहोति । एतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते तमारुन्द्धे याभ्य उ चैवैतां देवताभ्य प्राहुति जुहोति ता एवैतत्प्रीणाति ता अस्मै तृप्ताः प्रीता एतं यज्ञस्य रसं सन्नमन्ति ॥ १३ ॥
[ ५७४ ] 1
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तृतीय काण्ड ( अ ० 8 ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण स जुहोति । शृणोत्वग्निः समिधा हवं मऽइति शृणोतु मइदमग्निरनु जानावित्येवैतदाह शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीरिति शृण्वन्तु मइदमापोऽनु जानन्त्वित्येवैतदाह श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञमिति शृण्वन्तु मइदं ग्रावाणोऽनु मे जानन्त्वित्येवैतदाह विदुषो न यज्ञमिति विद्वांसो हि ग्रावाणः शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहेति शृणोतु मइदं देवः सवितानु से जाना-त्वित्येवैतदाह सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैतद्यज्ञस्य रसम-च्छैति ॥१४ ॥
अथापरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा । उदप्रयन्नाहाप इष्य होतरित्यप इच्छ होतरित्येवैतदाह तद्यदतो होतान्वाहैतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते तमा-रुन्द्व एतानु चैवैतदनुतिष्ठते नेदेनानन्तरा नाष्ट्रा रक्षांसि हिनसन्निति ॥१५ ॥
श्रथ सम्प्रेष्यति । मैत्रावरुणस्य चमसाध्वर्यवेहि नेष्टः पत्नीरुदानयैक-afar एताग्नीच्चात्वाले वसतीवरीभिः प्रत्युपतिष्ठासं होतृचमसेन चेति सम्प्रेष एवैषः ॥१६ ॥
as उदञ्चो निष्क्रामन्ति । जघनेन चात्वालमत्रेणाग्नीध्रं स यस्यां ततो farmrut भवन्ति तद्यन्ति ते वै सह पत्नीभिर्यन्ति तद्यत्सह पत्नीभिर्यन्ति ॥ १७ ॥
यत्र वै यज्ञस्य शिरोऽच्छिद्यत । तस्य रसो द्रुत्वापः प्रविवेश तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा जुगुपुः ॥ १८ ॥
ते ह देवा ऊचुः । इयसु न्वेवेह नाष्ट्रा यदिमे गन्धर्वाः कथं न्विममभये-नाष्ट्रे यज्ञस्य रसमाहरेमेति ॥ १६ ॥
ते होचुः । योषित्कामा वै गन्धर्वाः सहैव पत्नीभिरयाम ते पत्नीष्वेव गन्धर्वा धिष्यन्त्यथैतमभयेऽनाष्ट्रे यज्ञस्य रसमाहरिष्याम इति ॥ २० ॥
ते सह पत्नीभिरीयुः । ते पत्नीष्वेव गन्धर्वा जगृधुरथैतमभयेऽनाष्ट्रे यज्ञ-स्य रसमाजहरुः ॥२१ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण सुत्या ब्राह्मण तथो s वैष एतत् । सहैव पत्नीभिरेति ते पत्नीष्वेव गन्धर्वा गृध्यन्त्यथैत-मभयेनाष्ट्रे यज्ञस्य रसमाहरति ॥ २२ ॥
सो s पोऽभिजुहोति । एतां ह वाऽप्राहुति हुतामेष यज्ञस्य रस उपसमैति तां प्रत्युत्तिष्ठति तमेवैतदाविष्कृत्य गृह्णाति ॥२३ ॥
यद्वैतामाहुति जुहोति । एतमेवैतद्यज्ञस्य रसमभिप्रस्तृणीते तमारुन्द्धे तमपो याचति याभ्य उ चैवैतां देवताभ्य श्राहुति जुहोति ता एवैतत्प्रीणाति ता अस्मै तृप्ताः प्रीताऽएतं यज्ञस्य रसं सन्नमन्ति ॥ २४ ॥
स जुहोति । देवीरापोऽपान्नपादिति देव्यो ह्यापस्तस्मादाह देवीरापो पापादिति यो व ऊभिर्हविष्य इति यो व ऊर्मिर्यज्ञिय इत्येवैतदाहेन्द्रियावान्म-दिन्तम इति वीर्यवानित्येवैतदाह यदाहेन्द्रियावानिति मदिन्तम इति स्वादिष्ठ इत्येवैतदाह तं देवेभ्यो देवत्रा दत्तेत्येतदेना प्रयाचिष्ट यदाह तं देवेभ्यो देवत्रा दत्तेति शुक्रपेभ्य इति सत्यं वै शुक्रं सत्यपेभ्य इत्येवैतदाह येषां भाग स्थ स्वाहेति तेषामु ह्येष भागः ॥ २५ ॥
अथ मैत्रावरुणचमसेनैतामाहुतिमपप्लावयति । कारिसीति यथा वा-अङ्गारोऽग्निना सातः स्यादेवमेषाहुतिरेतया देवतया प्साता भवति राजानं वाऽए-ताभिरद्भिरुपलक्ष्यन्भवति या एता मैत्रावरुणचमसे वस्त्रो वाऽप्राज्यं रेतः सोमो द्वाज्येन रेतः सोमं हिनसानीति तस्माद्वाऽपप्लावयति ॥ २६ ॥
श्रथ गृह्णाति । समुद्रस्य त्वाक्षित्या उन्नयामीत्यापो वै समुद्रोऽप्स्वेवैतद-क्षितिं दधाति तस्मादाप एतावति भोगे भुज्यमाने न क्षीयन्ते तदन्वेकधनानुन्नयन्ति तदनु पान्नेजनान् ॥२७ ॥
तन्मैत्रावरुणचमसेन गृह्णाति । यत्र वै देवेभ्यो यज्ञोऽपाक्रामत्तमेतद्देवाः प्रैषैरेव प्रैषमैच्छन्पुरोरुग्भिः प्रारोचयन्निविद्भिर्न्यवेदयंस्तस्मान्मैत्रावरुरणचमसेन गृह्णाति || २८ || प्रायन्ति । प्रत्युपतिष्ठतेऽग्नीच्चात्वाले वसतीवरीभिश्च होतृचमसेन च स उपर्युपरि चात्वालं संस्पर्शयति वसतीवरीश्च मैत्रावरुणचमसं च समापो [ ५७६ ]